Sunday, August 21, 2022

आज की सभा बर्खास्त



आज गंगापुल की तरफ निकले टहलने। रहने की जगह से लगभग 2500 कदम की दूरी पर शुरू होता है पुल। पुल की शुरुआत जहां होती है वहीं तमाम कूड़ा-कबाड़ पड़ा था। एक रिक्शेवाला उस कूड़े से अपने मतलब की चीजें खोजकर बोरे में भरता जा रहा था।
कूड़े में मतलब का सामान खोजता रिक्शावाला तीसरी दुनिया के देश की तरह लगा जो विकसित देशों की पुरानी/फेंकी हुई तकनीक और सामान बटोरकर अपना काम चलाते हैं।
सामने आसमान लाल बहुरंगी हो रहा था। अनेक तरह के रंगों का ख़ूबसूरत संयोजन। कोई रंग कहां खत्म और कहां शुरू , खोजना मुश्किल। लग रहा था कि आसमान सूरज की अगवानी में खिलखिला रहा था। आसमान की देखादेखी गंगा का पानी भी बहुरंगी हो रहा था। हर लहर इठलाती हुई आगे बढ़ रही थी। गोया नदी में 'हर लहर, जगर-मगर' अभियान चल रहा हो।
नदी का पानी आगे बढ़ते हुए दाएं-बाएं भी टहलता जा रहा था। पानी जैसे छोटे-छोटे मोहल्ले में बह रहा हो। आगे चलते हुए पानी शंकु के आकार में नदी में छिप जा रहा था। पानी के भंवर बन रहे थे। पानी आगे बढ़ रहा था।
सूरज भाई अब पूरी तरह ऊपर आ गए। पानी की टँकी के बगल में उनका कैंप नुमा लगा। सूरज भाई की फोटो पानी ने खींच ली। कविता याद आई:
भोर हुआ सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।
उगने के कुछ ही पल बाद सूरज भाई फिर गोल हो गए। जैसे दफ्तर में कर्मचारी आकर अपना टिफिन मेज पर रखकर चाय पीने निकल लेता है उसी तरह बादलों की आड़ में चले गए। सूरज भाई निकल लिए तो बाकी लोग भी फूट लिए। आसमान फिर श्वेत-श्याम सा हो गया। नदी का पानी के रंग भी गायब हो गए।
पुल पर तमाम लोग टहल रहे थे। कुछ बुजुर्ग हर आते-जाते को' हरिओम' बोलते हुए खड़े बतिया रहे थे। जो परिचित आता-जाता दिखता उसको हरिओम बोलकर फिर आपस मे बतियाने लगते।
दो महिलाएं पुल के फुटपाथ पर पैर फैलाये बैठी बतिया रहीं थीं। ऐसे जैसे अपने घर के आंगन में बैठी हों। उनमें से एक अपने घुटने सहला रही थी। शायद दर्द हो उनमें।
कुछ बच्चे भी पुल जगह-जगह खड़े, बतियाते दिखे। कोई सेल्फी ले रहा था। कोई नदी को निहार रहा था। एक बच्चा पुल के सीमेंट के खम्भे को पकड़े वर्जिश कर रहा था।
पुल की रेलिंग पर कुछ लोग भजिया के पैकेट खोलकर भजिया फैलाते दिखे। आसपास की चिड़िया उड़कर आती, भजिया चुनकर चली जाती। चिड़ियां एक होर्डिंग की रेलिंग पर बैठी चहचहाती हुई बतिया रहीं थीं। क्या पता मंहगाई पर चर्चा कर रहीं हों। कह रहीं हों-'मंहगाई के चलते लोगों ने दाना डालना कम कर दिया है। बड़ा जमाना खराब आ गया है।' चिड़ियां जो मन आये कह सकती हैं। उनको कौन ED या सीबीआई का डर है।
एक लड़की मोटरसाइकिल की सीट पर टिकी एक लड़के से बतिया और शायद हड़का रही थी। शायद पास ही रहती हो। उसके पहनावे और अंदाज से लग रहा था कि उठते ही बिना मुंह धोए बतियाने और तदनुसार हड़काने चली आई। लड़का सुरक्षित दूरी पर खड़ा लड़की के अमृतवचन ग्रहण कर रहा था।
गंगा में लोग डुबकी लगाते हुए नहा रहे थे। कुछ लोग सीने तक पानी में डूबे आपस में बतिया रहे थे। एक बाबा जी सर पर बालों का मुकुट सा धारण किये गंगा के पानी को अपलक देख रहे थे। कुछ लोग घाट किनारे सोए हुए भी थे। नदी मां की तरह लोगों की हर जरूरत पूरी करती है।
पुल के ऊपर से देखा कि दो दूध वाले पैकेट में दूध बेच रहे थे। फुटकर ले जाने वालों के अलावा एक आदमी बोरे में दूध के पैकेट डलवाता दिखा। बोरे में दूध के पैकेट डलते देख स्कूल के जमाने का जुमला 'बोरे में तेल' याद आया।
यह भी लगा कि जैसे आज दूध और पानी बिकता है वैसे ही क्या पता कल को हवा और धूप भी पैकेट में बिके। हर शहर के हिसाब से अलग हवा मिले। कानपुर और दिल्ली वालों को साफ हवा मुफीद नहीं आएगी। एलर्जी हो जाएगी। आदत नहीं है न। साफ हवा में थोड़ा प्रदूषण मिलाकर ही यहाँ हवा बिकेगी।
पुल से उतरकर गंगा किनारे की तरफ चले। एक जगह ऑनलाइन फार्म भरने की दुकान पर हर तरह का ऑनलाइन काम का विवरण लगा था। बगल में आटा चक्की की दुकान थी जिसमें पते के विवरण में जिला पंचायत अध्यक्ष का विवरण भी था।
आगे दो बच्चे सड़क से कुछ बीनते दिखे। पूछने पर बताया कि गुट्टा बीन रहे हैं। लड़की ने बताया कि लड़का गुट्टा खेल नहीं पाता। वह उसके लिए गुट्टा बीन रहा है। लड़के ने बताया कि उसका दालमोठ का पैकेट लड़की ने ले लिया है और अब दे नहीं रही है। लड़का घर से पैसे लेकर लाया था पैकेट।
लड़की से पैकेट छिनवाकर उसके लिए गुट्टा बीनते हुए लड़का मजे से सब बता रहा था। कोई शिकायत नहीं थी उसको बच्ची से।
फोटो खींचने पर लड़का शरमा गया। लड़की ने उसको साथ आने को कहा और मिलकर फ़ोटो खिंचवाया। लड़की ने लड़के का पैकेट कब्जे में रखा। लड़के को हड़काते हुए उसके साथ खेलती रही। लड़के ने अपना नाम कृष्ण और लड़की का नाम कुसुम बताया।
एक चाय की दुकान पर कुछ लोग बैठे बतिया रहे थे। चाय का चूल्हा शान्त था। हमने उन लोगों से वहाँ बच्चों को पढ़ाने वालों के बारे में पूछा। जय हो फ्रेंड्स ग्रुप के लोग आसपास के छोटे बच्चों को पढ़ाते हैं।
उन लोगों से जय हो फ्रेंड्स ग्रुप के लोगों की खूब तारीफ की। बताया कि आसपास के बच्चे उनके कारण पढ़ने लगे। वो लोग बच्चों को किताब-कॉपी भी देते हैं। त्योहार भी मनवाते हैं। राष्ट्रीय पर्व भी मनाते हैं। अच्छा काम करते हैं। इतवार को सुबह पढ़ाते हैं। बाकी दिन शाम को।
आगे दो लोग एक सुअर को बांधकर ले जा रहे थे। मुंह बंधा होने के कारण सुअर बोल नहीं पा रहा था। चिंचिया रहा था। मोटरसाइकिल पर रखकर चले जाने के बाद एक महिला और वहां मौजूद कुछ बच्चियों में कहा-सुनी होने लगी। महिला ने अपने साथ खड़े आदमी से उन बच्चियों की तरफ देखते हुए कहा-'छुछूदरन के मुंह न लगय का चाही।'
बच्चियां भी जबाब में कुछ कहते हुई चली गईं। कहा-सुनी स्थगित हो गयी।
आगे नदी में नहाते लोग दिखे। बालू घाट नाम था इस घाट का। पक्का बनने के बाद आंनद घाट हो गया नाम। गंगा अलबत्ता वही हैं।
नदी में लोग नहा रहे थे। किनारे कुछ लोग योग कर रहे थे। महिलाएं ज्यादा थे, पुरुष कम। मंदिरों, सत्संत और धार्मिक आयोजनों में आमतौर पर महिलाएं ज्यादा दिखती हैं। घर से बाहर निकलने का जरिया बनते हैं ये स्थल। योगस्थल में भी यही ट्रेंड बन रहा है।
एक बच्ची अपनी छोटी बहन को बार-बार लंहगा पहना रही थी। बार-बार वह ढीला हो जा रहा था। बच्ची फिर-फिर उसको लंहगा पहना रही थी। कई बार की कोशिश के बाद उसको लंहगा पहनाकर उसको गोद में लेकर झूला झुलाने चली गयी।
कुछ देर पहले जिस कुर्सी पर बैठी महिला छूंछुदरों को मुंह न लगाने की बात कह रही थी , उस पर एक बुजुर्ग बैठे थे। एक बच्चे को मूंगा लगी अंगूठी दी उन्होंने। बच्चे ने पहन ली। उसी समय एक और बुजुर्ग आये वहां और कुर्सी पर बैठे बुजुर्ग से कहा-'हमहू का कुछ देव।'
बुजुर्ग ने जेब से कुछ सिक्के निकाल कर बढ़ाये उनकी तरफ। उन्होंने बिना लिए कहा -'ये तो लोहा है। यहिका लेकर का करब? कुछ और देव।'
इस पर बुजुर्ग ने हंसते हुए कहा-'आज के समय में लोहा मिल जाये यहै बहुत है।'
रास्ते में कृष्ण और कुसुम फिर मिले। वे आपस में छुपन-छुपाई जैसा कुछ खेल रहे थे। इस बार लड़का अकेले फोटो खिंचाने को तैयार था। लड़की ने मुंह छिपा लिया। हम लौट लिये।
लौटते में वापस आते समय दो महिलाएं दिखीं। वे टहलकर घर वापस जा रही थीं। विदा लेते हुए उनमें से एक ने कहा-'आज की सभा बर्खास्त।' सभा बर्खास्त करने के बाद वे हंसते हुए विदा हो गयीं।
एक बुजुर्ग पुल पर पान मसाले की दुकान सजा रहे थे। एक जगह तीन महिलाएं बैठी बतिया रहीं थीं। दो महिलाएं आपबीती सुना रहीं थीं। तीसरी महन्त मुद्रा में सुन रही थी।
एक आदमी साइकिल पर आता दिखा। साइकिल का एक पैडल लटक गया था। नट खुल गया था उसका। साइकिल के हैंडल पर तिरंगा झंडा फहरा रहा था। उसने रुक कर कुछ चने पुल पर पक्षियों के लिए और बाकी नदी में मछलियों के लिए डाले। ऐसा वह जब भी पुल से गुजरता है, नियमित करता है।
काम के बारे में पूछने पर बताया कि मसाज का काम करता है। लोग बुलाते हैं, वह उनके घर मसाज करता है। तिलक नगर, स्वरूप नगर। आज कई लोगों ने बुलाया है। एक बार के मसाज के तीन सौ रुपये मिलते हैं।
पुल पार करके हम कैंट की तरफ बढ़ लिए। नरेश सक्सेना जी की कविता याद करते हुए:
पुल पार करने से
पुल पार होता है
नदी पार नहीं होती
नदी में धँसे बिना।
पुल का अर्थ भी
समझ में नहीं आता नदी में धँसे बिना
पुल पार करने से पुल पार नहीं होता
सिर्फ़ लोहा-लंगड़ पार होता है
कुछ भी नहीं होता पार
नदी में धँसे बिना
न पुल पार होता है न नदी पार होती है।

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Saturday, August 20, 2022

चाय में चीनी कम पीनी चाहिए

 


आज सुबह टहलने निकले तो कैंट में सुरक्षा कर्मी चुस्टैद हैं दिखे। दो लोग बैरियर पर और दो पार्क में कुर्सियों पर बैठे। पास में टेंट। टेंट खुला सा था जैसे दीवार हटा दी गयी हो। हमने पूछा -'ये टेंट खुला क्यों है?' उन्होंने बताया-' गर्मी लगती है।'
तिराहे पर मेक इन इंडिया का टाइगर मुंह खोले खड़ा था। सीमेंट का बना। जब से बना है तब से मुंह खुला है। जबड़े दर्द करने लगे होंगे बेचारे के। लेकिन क्या करे? खड़ा है ऐसे ही जैसे बना था।
आगे मोड़ पर दुविधा हुई कि किधर बढ़ें? एक बार मन किया कि गंगापार करके शुक्लागंज तक चला जाये। दूसरे शहर में चाय पी जाए। दूसरा मन किया जयपुरिया होते हुए नरोना चौराहे तक चला जाये। कुछ देर किसी पियक्कड़ की चाल की तरह मन लड़खड़ाता रहा। अंततः जयपुरिया की तरफ मुड़ गए।
जयपुरिया स्कूल के आगे रेलवे क्रासिंग पर तैनात बच्चा मोबाइल में घुसा था। शायद 'स्पॉट माई ट्रेन' में आने वाली ट्रेन का हिसाब देख रहा था। क्रासिंग बन्द थी। एक रिक्शेवाला लड़का रिक्शे पर बैठे-बैठे झुककर क्रासिंग के नीचे से निकला। क्रासिंग थोड़ी ऊंची थी। नीची होती तो सर फट जाता।
क्रासिंग के पार लोग गड्ढा खोदकर काम में लगे थे। ओवरब्रिज बन रहा है क्रासिंग पर। तीन-चार खम्भे खड़े हो गए हैं। कुछ साल में ओवरब्रिज भी बन जायेगा। तब क्रासिंग पर बैठा लड़का कहीं और मोबाइल चलाएगा। रिक्शावाला लड़का बैटरी रिक्शा चलाने लगेगा या कुछ और करेगा।
तिराहे पर चाय की दुकान खुल गयी थी। आसपास के लोग वहां चाय पीते हुये बतिया रहे थे। एक लड़का सड़क पर घुमते हुए लाइव टाइप कुछ कर रहा था। मोबाइल सेल्फी मोड़ में हाथ में, कान में स्पीकर की लीड। हमने पूछा भी -'लाइव रिपोर्टिंग कर रहे हो?' उसने सुना नहीं होगा। लाइव रिपोर्टिंग करता रहा।
बगल में फुटपाथ पर तमाम लोग सोए हुए थे। फुटपाथ गरीब लोगों के रैनबसेरे हैं। एक रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर चादर ओढ़े लम्बलेट था। बीच-बीच में कुनमुनाते हुए चादर ठीक करते हुए फिर तसल्ली से सोने लगता।
वहीं कानपुर लॉज का बोर्ड दिखा। ऊपर लिखा था -'ईस्थापित सं. 1940' । मन किया कहें -'ईस्थापित' नहीं बाबा -'स्थापित'। लेकिन सुनेगा कौन? कोई कहेगा -'कनपुरियों की वर्तनी कमजोर है।' लेकिन यह सोचा कि कोई कहेगा तो हम कहेंगे -'जब दुनिया में कहीं इलेक्ट्रॉनिक माध्यम नहीं था तब कानपुर में नेट चलता था। सन 1940 में इसका उद्घटान इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हुआ था। इसीलिए ईस्थापित लिखा है।
बगल में दुर्गेश डेकोरेटर का बोर्ड लगा था। पता था घसियारी मंडी का। अब घसियारी मंडी कहाँ है यह पता नहीं मुझे। Anoop Shukla जी बताएंगे।
नुक्कड़ पर चाय की दुकान गुलजार थी। रिक्शेवाले अपने रिक्शे पर बैठे चाय पीते हुए सुबह की शुरुआत कर रहे थे।
एक हवा की दुकान पर एक पहिये की हवा भरवाने के दाम पांच रुपये लिखे थे। कभी चवन्नी में भरती थी हवा। आज चवन्नी के कहीं पता नहीं। एक रुपये के सिक्के तक को लोग लेने से मना कर देते हैं। बहुत बेइज्जती होती है चवन्नी और रुपये की।
चवन्नी से याद आया कि हमारे एक सीनियर किसी काम को मना करने का कारण बताते हुए कहते थे -'यार इस काम में मिलना एक चवन्नी नहीं। हमसे न करवाओ ये काम। हम न करेंगे इसे।'
आगे फुटपाथ पर एक लड़का अपनी पान-मसाले की गुमटी लगा रहा था। झोले से निकालकर पान मसाले के पाउच झालर की तरह सजा रहा था। पास ही रहता है।
उसी के बगल में एक आदमी फुटपाथ से अपना बिस्तर समेट रहा था। बिस्तर मतलब प्लास्टिक के बैनर जिसमें लिखा था -'धनतेरस और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।' शुभकामनाओं के बैनर का बिस्तर बन गया। दुष्यंत जी की बात आगे बढ़ रही है:
न हो कमीज तो पावों से पेट ढंक लेंगे,
बहुत मुनासिब हैं ये लोग इस सफर के लिए।'
सामने की फुटपाथ पर दो बुजुर्ग लेटे हुए अक्सर दिखते हैं। यहीं रहते हैं। आज बात की। पता चला दोनों भाई हैं। उम्र 70 और 75 । उम्र बताई छोटे भाई शिवप्रसाद ने। बड़े भाई ओमप्रकाश ने उसको कन्फर्म कर दिया। अब जो बता दी वही सही।
सालों से यहाँ रह रहे हैं। पिताजी लखनऊ में रहते थे। मकान था। सब बिक गया। यहां कई बहनें हैं। कई तरह के काम किये। रिक्शा चलाया, मजदूरी की और अब मांगकर गुजारा करते हैं।
'रिक्शा चलाते थे पहले। चोरी हो गया। फिर छोड़ दिया चलाना।' -छोटे भाई शिवप्रसाद ने बताया।
हमने कहा -'किराये पर भी तो मिलते हैं। ले लो।। चलाओ।'
'किराए वाले रिक्शे बेकार हैं। पुराने 2000 रुपये के मिलते हैं। नया 12000 का आता है।'-जानकारी दी शिवप्रसाद ने। रिक्शा चलाने में अब कोई दिलचस्पी नहीं शिवप्रसाद की। लेकिन वे रिक्शों के विशेषज्ञ की तरह रिक्शों के बारे में बताते रहे जैसे लिखना छोड़ चुका लेखक आलोचक बन जाता है।
वहीं बगल में रहने वाले एक आदमी ने इन भाइयों के बारे में बताया कि बहुत दिन से यहीं रहते हैं। सीधे हैं। छोटा भाई बड़े की सेवा करता रहता है।
खुद के बारे में भी बता दिया उन्होंने। बस्ती के रहने वाले हैं। 35 साल से यहीं रह रहे। कपड़े मंडी में काम करते हैं। दो बेटे पढ़ते हैं। बेटी की शादी हो गयी। जहाँ काम करते हैं उन मालिक ने रहने की जगह दे दी। परिवार के साथ रहते हैं। रहने की जगह पर तमाम सरिया और बिल्डिंग मैटेरियल रखा था। रहने की जगह देने के पीछे सामान की रखवाली का भाव भी होगा।
चलते समय शिवप्रसाद ने कुछ पैसे मांगे। हमारे टटोला दस-बीस रुपये हों तो दे दें। सौ का नोट मिला। मन नहीं हुआ सौ रुपये देने का। कहा लौट के आते।
आगे नार्थ स्टार अस्पताल के पास सन्नाटा। एक महिला अपने दो बच्चों को नहला कर कपड़े पहना रही थी। सड़क किनारे मोबाइल रिपेयर की गुमटियां दिखीं। लगभग सभी में मोबाइल के हर तरह के रिपेयर की बात लिखी थी। सुबह के समय सब दुकानें बन्द थीं। दस बजे के बाद गुलजार होता है -'मोबाइल रिपेयर बाजार।'
बगल की सड़क रेलवे स्टेशन की तरफ जाती है। लेकिन हम वापस लौट लिए।
हीर पैलेस के सामने नुक्कड़ पर चाय की दुकान खुली थी। फुटकर कराने की मंशा से हमने चाय पी। चाय के लिए आर्डर देने से पहले पूछा -'सौ के खुले हो जाएंगे?'
चाय पीते हुए लोग बतिया भी रहे थे। एक बोला -'मथुरा चले जाओ। मुफ्त प्रसाद मिल रहा है। खाना भी। अगला बोला -'एक दिन के लिए क्या जाना? और अब तो जन्माष्टमी हो गयी। अब थोड़ी मिलेगा मुफ्त।'
चाय पीते हुए एक ग्राहक ने चाय वाले से कहा -'जरा चाय पी के देखो तुम भी।'
चाय वाले ने पूछा -'का मीठी कम है?'
उसने बताया नहीं। बोला -'पीके देखो फिर बताना।'
उसने चाय पी नहीं लेकिन तय हुआ कि उसके हिसाब से चाय कम मीठी थी।
चाय वाले ने बिना शर्मिंदा हुए सफाई दी। कुछ लोग कहते हैं चीनी कम डालो। कुछ कहते हैं और मीठा करो। इसीलिए हम ज्यादा नहीं डालते चीनी। जिसको कम लगती है उसको अलग से दे देते हैं। वैसे भी चाय गरम होते, उबलते हुए शीरा हो जाती है।
चाय कम मीठी तो नहीं थी। बल्कि हमारे हिसाब से ज्यादा ही थी।
अगला चाय पीकर चला गया। तब चाय की दुकान के पास पड़ी कुर्सी पर बैठे बीड़ी धौंकते हुए आदमी ने कहा -'चाय में चीनी कम पीनी चाहिए।'
हमने उससे कहा-'चीनी तो कम पीनी चाहिए। लेकिन बीड़ी भी तो नहीं पीनी चाहिए।'
उसने बिना शर्मिंदा हुए कहा -'लोग तो सुबह बिना मुंह धोए दारू पीते हैं। हम तो बीड़ी ही पी रहे।'
चीनी कम से हमको मृदुल कपिल की किताब चीनी कितने चम्मच की याद आई।
यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे राजनीतिक दल अपने दल के किये पाप को दूसरे दल के बड़े पाप की आड़ में छिपाते हैं।
चाय वाले ने आपबीती बताई-'हम तो यहीं पैदा हुए, यहीं जिये, यहीं मरेगें। 35 साल हो गए दुकान चलाते। पिताजी बलराम गोंडा से आये थे।'
चाय की दुकान से वापस होकर उन भाइयों की तरफ गए। दस रुपये दिए शिवप्रसाद को। दो चाय के पैसे। बोले -'हमारी चाय दस रुपये की आती है। दस और देव।'
दिए हमने। पूछा भी -'जाड़े में और बरसात में कहां सोते हो? नहाते कितने दिन में हो।'
जहां जगह मिल जाती है वहीं सो लेते हैं। जब पानी का जुगाड़ हो जाता है- नहा लेते हैं। उनकी आवाज और अंदाज में कोई दैन्य भाव नहीं था। न कोई पलायन। जो है उसमें मस्त। जो टी शर्ट पहनी थी शिवप्रसाद ने उसमें लिखा था -skil india कौशल भारत कुशल भारत। स्किल इंडिया की टी शर्ट पहने बेफिक्री से मांगते हुए जिंदगी काट रहे हैं लोग।
क्रासिंग खुली थी। एक आदमी रेल की पटरी के बीच की मिट्टी निकाल रहा था। वहीं एक बच्चा और एक बुजुर्ग भी खड़ा था। बुजुर्ग बच्चे को याद कर रहा था। पहले कोयले के इंजन चलते थे। लोग गाड़ी खड़ी करके कोयला गिरा देते थे। लोग बटोर लेते थे। उससे खाना बनता था। अब वो इंजन बन्द हो गए। बिजली के चलने लगे।
बच्चा बिना किसी तवज्जो के सुन रहा था। मैंने पूछा-'कहाँ पढ़ते हो?'
बताया -'मरियमपुर स्कूल। क्लास टू में।'
गरीब, नङ्गे पांव बच्चे से पूछा -'एडमिशन किसने करवाया?'
'मम्मी ने।'
'मम्मी क्या करती हैं?'
'काम करती हैं। कानपुर क्लब में।' -बच्चे ने बताया।
हम कुछ और पूछे तब तक वहीं खड़े दूसरे आदमी ने जानकारी दी-'ये मनमौजी है। जब मन करता है स्कूल जाता है। जब नहीं करता नहीं जाता। बाप दारू पीता है।'
'अब नहीं पीते' -बच्चे ने बाप के बारे में जानकारी दी। स्कूल जाने न जाने के बारे में कुछ नहीं बोला बच्चा। अलबत्ता उसके खुले हुए हाथ अब उसकी गर्दन के दोनों ओर कैंची की तरह मुड़ गए थे। मानो अपने बारे में नकारात्मक बातें सुनकर बचाव मुद्रा में आ गया हो। उसके गर्दन के दोनों तरफ कैंची मुद्रा में हाथ देखकर फिल्मों के दृश्य याद आ गए जिनमें विलेन से अपनी इज्ज़त बचाने की कोशिश में महिलाएं अपने हाथ मोड़कर सीना ढंकते हुए बचने की कोशिश करती हैं।
हम वापस हो लिए। एक रिक्शेवाला रिक्शा चलाते हुए चाय पीता आता दिखा। एक बंदर लंगड़ाते हुए सड़क पर कर रहा था।
सूरज भाई आसमान में जलवा नशीन थे। पूरी कायनात में उनकी सरकार चल रही थी। मन किया उनसे पूछें कि क्या आपके यहाँ भी चुनाव होते हैं? क्या आपके यहाँ भी संसदीय समिति होती है?
लेकिन हमने पूछा नहीं। क्या पता वो बुरा मान जाएं यह सोचते हुए कि हम अपनी तुलना उनके यहां से कर रहे हैं।
आजकल जरा-जरा सी बात पर बुरा मानने का फैशन है। कौन, कब, किस बात का बुरा मान जाए कुछ कह नहीं सकते।

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Thursday, August 18, 2022

एक पौवे भर का काम हो गया



आज बहुत दिन बाद सुबह टहलने निकले। लोग भी टहलते दिखे। कुछ फुर्ती से कुछ तसल्ली से। एक जगह बोर्ड में लिखा था -गति सीमा 40 । उसके नीचे लिखा था -ड्राइविंग सीखना मना है।
40 के नीचे किमी गोल था और ड्राइविंग के नीचे से 'यहां' नदारद था। लेकिन समझदार को इशारा काफी।
समझने को तो कोई यह भी समझ सकता है कि 40 मतलब टहलने की गति सीमा 40 मीटर प्रति मिनट है। वहीं कहीं बिना ड्राइविंग लाइसेंस के पकड़े जाने पर कहा जा सकता है-'हमारे कैंट में ड्राइविंग सीखना मना है तो लाइसेंस कैसे बनवाएं।'
सड़क पर और इधर-उधर तमाम बन्दर भी 'मार्निंग वाक' करते दिखे। कुछ सीनियर टाइप बन्दर फुटपाथ पर अलसाये से लेते हुए थे। दो-चार जूनियर बन्दर उनकी 'शरीरपुर्सी' जैसी करते हुए जुएं जैसा कुछ निकाल रहे थे।
कैंट का ओवरब्रिज बन गया है। कई सालों के बाद पिछले साल चालू हुआ। पुराना गंगापुल बन्द हो गया। इस पुल से अनगिनत लोगों की यादें और किस्से जुड़े होंगे। इसी का नाम लेते हुए लोग कहते थे:
कानपुर कनकैया
जँह पर बहती गंगा मैया
ऊपर चले रेल का पहिया,
नीचे बहती गंगा मैया
चना जोर गरम।
शुक्ला गंज की तरफ जाने वाला रास्ता बंद हो गया है। सड़क पर गाड़ियां आना-जाना बन्द हो गया है। लोगों ने सड़क को घर के आंगन की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं। तमाम चीजें सूखने को पड़ी हैं। सड़क के दोनों तरफ की दुकाने उजड़ गयी हैं। पहले यहां से गुजरने वाले लोग चना-चबेना खरीदते थे। अब दुकान वाले इधर-उधर घूमकर बेंचते हैं।
एक पुल बन्द हो जाने से कितनों के रोजगार पर फर्क पड़ता है। एक पुल बन जाने से भी न जाने कितने लोगों को रिजगर मिलता है।
रिक्शेवाले सुरेश अपने ठीहे पर, एक रिक्शे की सीट पर बदन उघारे लेटे हुए थे। 15-20 रिक्शे बचे हैं उनके पास। बैटरी रिक्शे के समय में पैर से चलाने वाले रिक्शे का चलन कम हो गया है।
सुरेश के बगल में बैठे एक बुजुर्ग कारीगर पहिये का रिम ठीक कर रहा था। रिम को गोल घुमाते हुए बोला -'ठीक हो गया न?'
सुरेश के हां बोलने पर बोला-'चलो एक पौवे भर का काम हो गया।'
पौवे भर का काम मतलब इतनी मजदूरी जिससे दारू का पौवा आ जाये। ठेका पास ही है। बस्ती उजड़ गयी तो वहां भी रौनक कम है लेकिन चल तो रहा ही है।
मजदूरी की इकाई हरेक के लिए अलग-अलग होती है। किसी के लिए कुछ रुपये, किसी के लिये आज के खाने का हिसाब, किसी के लिए पौवे का जुगाड़।
एक लड़का पतंग उड़ाने की कोशिश कर रहा था। बार-बार नाकाम होने के बाद सर झुका कर वापस घर की तरफ चल दिया।
नीचे पैदल पुल भी बन्द है। लेकिन लोग आते दिखे उससे। गेट बंद है तो क्या। बगल के गर्डर पर पैर रखकर पास की बस्ती में घर तक पहुंच जाएंगे।
गंगा जी में पानी खूब है। तसल्ली से बह रहा था। बीच-बीच में हरियाली के टापू जैसे बने दिखे। जैसे पानी के ठहरने के लिए स्टॉपेज बने हों।
सुबह-सुबह सूरज भाई गंगाजी में डुबकी लगाए नहाते दिखे। उनके नहाने से पूरा पानी भी चमकने लगा। संगत का असर। पानी के साथ-साथ दिशाएं भी सूरज भाई के समर्थन में रंग गयीं। पूरी कायनात में सूरज भाई के जलवे दिखने लगे

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Tuesday, August 09, 2022

मोबाइल में सब झूठ बातें करते



अरु वैली और बेताब घाटी से वापस आकर कुछ देर बाजार में टहलते रहे। दिल की धड़कन तेज हो जाती है, उसको काबू में रखने की दवा। रोज एक लेनी होती है। अगले दिन की दवा नहीं थी पास में। सोचा ले ली जाये।
पहलगाम में किसी दवा की दुकान पर दवा नहीं मिली। किसी ने कहा -'अस्पताल में देख लीजिए। शायद मिल जाये।'
अस्पताल टैक्सी स्टैंड के पास ही है। अमरनाथ यात्रा के चलते वहां डॉक्टरों की और दवा की व्यवस्था है। बाहर ही उपलब्ध दवाओं की सूची लगी थी। उनमें हमारी दवा का नाम नहीं था। वहां मौजूद डॉक्टरों से बात की। उन्होंने कहा -'इस बारे में कुछ बता नहीं सकते।'
डॉक्टर लोग महाराष्ट्र, गुजरात और देश के अन्य प्रदेशों से आये थे। अमरनाथ यात्रा के चलते उनकी ड्यूटी लगी थी। डॉक्टर लोग लोगों को देख रहे थे और दवाएं लिखते जा रहे थे। इलाज बताते जा रहे थे।
दवा न मिलने पर हम वापस आ गए। इस संकल्प के साथ कि अगले दिन श्रीनगर में सबसे पहला काम दवा लेने का करेंगे। एक संकल्प और लिया कि अब जब भी कभी बाहर जाएंगे तो पूरे यात्रा के समय की दवा पास में रखेंगे। यह दूसरा वाला संकल्प हालांकि पहले भी कई बार ले चुके हैं। लेकिन संकल्प लेना और उसपर अमल करना अलग बात है। कई संकल्प लिए जाते हैं और लेने के बाद भुला दिए जाते हैं। हम लोग संकल्प भुलाई में उस्ताद हैं।
शाम को लिड्डर नदी के किनारे बहुत देर ध्यान मुद्रा में बैठे रहे कि सूरज भाई फिर से विदा होते समय नदी में नहाते हुए जाएं। नदी को रंगबिरंगा करके जाएं। लेकिन शायद सूरज भाई का मूड कुछ अलग था। वे बिना नदी में उतरे विदा हो गए। नदी भी उनसे बेपरवाह इठलाती हुई बहती रही। नदी की जगह कोई शायर होता तो शेर भी पढ़ता:
तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने गम से कब खाली,
चलो बस हो चुका मिलना,न तुम खाली न हम खाली।
लेकिन मुस्कराती बहती नदी ने ऐसा कुछ नहीं कहा। मस्त, मुस्कराती बहती रही। उसको सूरज से कोई शिकायत नहीं। सृजन रत लोग शिकायत बाजी में उलाहनों, शिकायतों में समय और ऊर्जा बर्बाद नहीं करते।
अगली सुबह फिर गए नदी किनारे तो अमरनाथ यात्रा के यात्री जा रहे थे। उनके लिए गाड़ी वाले लगे हुए। सवारियों को ले जाने के जाने के लिए उनसे बात कर रहे थे। कल जो हमको ले गए थे अरु घाटी और बेताब वैली वो ड्राइवर भी थे वहां। यात्रा के लिए लकड़ी बेंचने वाला भी था। चाय वाला अलबत्ता नदारद था।
नदी किनारे लोग फोटोशूट में लगे थे। सेल्फ़ी प्वाइंट पर और पहलगाम लिखे बोर्ड के पास लोग फ़ोटो खींच रहे थे। कुछ लोग रेलिंग पर भी पोजरत थे।
वहीं एक बुजुर्ग सन्त जोगिया कपड़े पहने मिले। पास की छुटकी चिलम भरकर पीने का इंतजाम कर रहे थे। बात करने लगे तो उन्होंने चिलम भरना स्थगित करके बात करना शुरू किया।
नागपुर जिले की नरखेड़ तहसील के नादा शिंदे गांव के रामदेव सालमे आदिवासी गोंड हैं। 57 की उम्र। अमरनाथ यात्रा पर 11 जुलाई को चले थे, 13 को जम्मू पहुंचे। उसके बाद आगे अमरनाथ यात्रा के लिए आगे बढ़े। सारी यात्रा सरकारी माध्यम से। ठहरना कैम्पो में जहां खाना-पीना मुफ्त है।
2005 से गृहस्थ साधु हो गए रामदेव। बढ़ई का काम करते हैं। गांव में मंदिर बनवाया है। उसी में पूजा पाठ करते हैं। गांव जंवार में लोग उनको मिस्त्री, जवाई , महाराज जी या फिर सलामे बोलते। रामदेव कोई नहीं कहता।
तीन बेटियां हैं एक बेटा। दो बेटियों की शादी कर दी। एक की करनी है। 20 साल की है लड़की। लड़का अमर 18 साल का है। पढ़ाई छोड़ दी उसने अब साथ में काम करता है। बँटाई में खेती भी। लड़का भी कोई नशा नहीं करता।खर्रा(दारू) तक नहीं पीता।
दामाद दोनों अच्छे हैं। कोई नशा नहीं करता। आजकल लड़कियों की शादी में लोग बिना दारू वाला लड़का खोजते हैं। जैसे ही लड़का मिलेगा, तीसरी लड़की की भी शादी कर देंगे।
2005 से लगातार अमरनाथ यात्रा में आ रहे हैं रामदेव। बीच में दो साल कोरोना के कारण नहीं आ पाए। अगले बार बेटे को भी लाएंगे। पत्नी को नहीं लाये। तमाम् झमेला। घर में आराम से हैं।
हमको खुशी हुई कि यात्रा में कोई तो मिला जो हमारी तरह अकेले निकला है।
11 जुलाई को घर से निकले रामदेव के पास कोई मोबाइल नहीं। इस बारे में पूछने पर उन्होंने मोबाइल के बारे में अपनी राय बताते हुए कहा -'मोबाइल में सब झूठे बाते करते। फालतू टाइम बेस्ट। खाने के टाइम मोबाइल, हगने के टाइम मोबाइल।'
रामदेव हाथ में चिलम लिए कसमसा रहे थे। चिलम भी उनकी हथेली में दबी सोच रही होगी -'आगे की यात्रा कहाँ रुक गयी। आग किधर है।'
रामदेव को उनकी चिलम के साथ छोड़कर हम आगे यात्रा कैम्प की तरफ गए। लंगर भी थे वहां। 12 कैम्प लंगर थे। उसकी व्यवस्था देखने के लिए अंदर जाने की कोशिश की। लेकिन काफी पूछताछ के बाद उन्होंने मना कर दिया।
मना करने के दौरान कैम्प की व्यवस्था के बारे में बताया वहां तैनात जवान ने। यह भी की यात्रा करनी है तो शुरू में आना चाहिए। बाद में बाबा बर्फानी भक्तों की भीड़ के चलते आकार में छोटे हो जाते हैं।
लौटते में फिर लिड्डर नदी को देखते हुए आये। सुबह सुबह नदी मन लगाकर प्रफुल्लित मुद्रा में बह रही थी।

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मेरे अब्बू मुझे कभी नहीं डाँटते



पहलगाम में रामदेव जी मिलने और अमरनाथ यात्रियों के कैंप बाहर से देखने के बाद वापस लौट आए। लौटते हुए लिड्डर नदी को एक बार फिर मन लगाकर देखा। नदी तो अभी भी वहीं बह रही होगी । हजारों किलोलीटर पानी उसमें बह चुका होगा। लेकिन उसके इठलाते हुए बहने का दृश्य मेरे जेहन में जस का तस स्थिर है।
नदियां अपने उद्गम के पास इठलाती हुए बहती हैं। ऐसे जैसे बच्चियाँ बचपन में अपने घर में खिलंदड़े अंदाज में उछल-कूद करती रहती हैं। आगे जाकर अधिकांश नदियों की गति धीमी हो जाती है। उनका पानी गंदा हो जाता है। अतिक्रमण हो जाता है उनके किनारे। यह सब कुछ ऐसे ही जैसे लड़कियां दूसरे के घर जाकर तमाम बंदिशों और जिम्मेदारियों और विपरीत परिस्थितियों में जीते हुए रहती हैं। नदियाँ और स्त्रियाँ दोनों जीवन दायिनी होती हैं। दोनों की जीवनचर्या लगभग एक सरीखी होती है।
नहा-धोकर नाश्ता किया और चलने के लिए तैयार हो गए। दो दिन का कमरे का किराया 3000 रुपए और चाय, दूध खाने का खर्च 820 रुपए हुए। भुगतान करके अटेंडेंट के साथ फ़ोटो खिंचवाए और ड्राइवर का इंतजार करने लगे।
ड्राइवर की तबियत एक दिन नासाज रहने के बाद कुछ ठीक हो गई थी। उसके आने तक सामने काम करने वाले बढ़ई से बतियाए। सामने की काटेज बन रही थी। पास के गाँव से काम करने आते हैं मोहम्मद रफीक। काम के बारे में पूछने पर बताया कि अंदर का लकड़ी का काम तो लगभग साल भर मिलता रहता है। बारिश और जाड़े में बाहर के काम करना मुश्किल हो जाता है।
29 साल के रफीक हाल ही में तीसरे बच्चे के पिता बने हैं। अपने बच्चे और पत्नी जानम के फ़ोटो भी दिखाए उन्होंने हमें। परिचित , रिश्ते में ही विवाह हुआ था हनीफ़ का। अपने परिवार से खुश हैं।
29 साल में तीन बच्चों के बाद और बच्चे होने की आशंका से कुछ डरे लगे रफीक को मैंने आपरेशन कराने की सलाह दी तो उनका कहना था –‘पैसे का इंतजाम करवा के करवाएंगे।‘
हमने बताया –‘ये आपरेशन तो मुफ़्त होते हैं। अस्पताल में चले जाओ। आपरेशन करवाओ। घर चले आओ। मस्ती में जीवन बिताओ।‘
मुफ़्त आपरेशन की जानकारी रफीक के लिए आश्चर्य का विषय थी। इसके प्रति उत्साहित हुए लेकिन उनको शंका थी कि कहीं इससे आदमी में मर्दानगी में कमी नहीं तो नहीं हो जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो उनका पारिवारिक जीवन बेपटरी हो सकता है।
हमने एक विशेषज्ञ की तरह पूरे विश्वास के साथ (अज्ञानी का आत्मविश्वास तगड़ा होता है) उनको आश्वस्त किया –‘ऐसा कुछ नहीं होता है। फटाफट आपरेशन करवाओ। चैन की वंशी बजाओ। चिन्ता मुक्त हो जाओ।‘
और भी तमाम बातें हुई रफीक से। उनके बचपन के बारे में, उनके घर-परिवार-समाज के बारे में। बेमतलब की। आवारगी जैसी। आवारगी से याद आया मुस्तक युसूफ़ी साहब की बात –‘मूंगफली और आवारगी में खराबी यह है कि आदमी एक दफा शुरू कर दे तो समझ नहीं आता, खत्म कैसे करें।‘
कुछ देर में ड्राइवर साहब आ गए। हम सामान और खुद को गाड़ी में लादकर वापस श्रीनगर के लिए चल दिए ।
रास्ते में वही जगहें मिलीं जिनको देखते हुए आए थे। सड़क की दाईं-बाई तरफ सेव और दीगर फलों के बगीचे थे। एक बगीचे में रुके हम लोग। कई एकड़ में फैले बगीचे में तरह-तरह के सेव और दूसरे फल दिखे। सेव अभी पके नहीं थे। बताया गया कि एक महीने में पाक जाएंगे। दूर-दूर जाते हैं सेव यहां से बिकने के लिए।
जो बच्चा बगीचा घुमा रहा था मुझे उससे मैंने उसकी पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा। बताया ग्यारहवीं में पद्धत है बच्चा। उसकी हावी और दोस्तों के बारे में पूछा। यह भी कि उसके क्लास में लड़कियां भी साथ पढ़ती हैं या नहीं। उसने बताया –‘हां लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते हैं।‘
हमने पूछा –‘लड़कियों से दोस्ती है कि नहीं?’
उसने बताया- ‘नहीं।‘ आगे यह भी कहा- ‘लड़कियों से दोस्ती उसको पसंद नहीं।‘
हमने फिर पूछा-‘ लड़कियों से दोस्ती क्यों पसंद नहीं है?’
उसने कहा –‘क्योंकि उसको लड़कियों का साथ पसंद नहीं है।‘
हमने पूछा- ‘क्यों लड़कियों का साथ क्यों पसंद नहीं है? आगे शादी होगी तब कैसे निभेगी अगर लड़कियों का साथ पसंद नहीं?’
उसने कहा-‘ शादी की जब होगी तब की बात अलग। अभी इसलिए पसंद नहीं क्योंकि उनसे दोस्ती में लड़के बिगड़ जाते हैं। ‘
हमने पूछा- ‘कैसे? किस तरह बिगड़ जाते हैं लड़के लड़कियों से दोस्ती करने में?’
उसने बताया-‘ लड़कियों से दोस्ती में लड़के उनसे मिलते-मिलाते हैं। साथ घूमते है। उससे उनका ध्यान बँटता है। पढ़ाई प्रभावित होती। फिर जब दोस्ती के बाद ब्रेक अप हो जाता है तो लड़के नशे के चक्कर में पड़ जाते हैं।‘
बालक यह बता ही रहा था कि सामने सड़क पर एक लड़का-लड़की बात करते दिखे। उसने उनकी तरफ इशारा करते हुए बताया। वो देखिए उनकी दोस्ती है। वे बात कर रहे हैं।
मैंने बच्चे से पूछा-‘ तुम उनको जानते हो?’
बालक ने कहा –‘हां, वो मेरे क्लास में पढ़ते हैं।‘
हमने कहा –‘हमारी बात कराओ उनसे।‘
बच्चा थोड़ा झिझक गया। शायद सोचने लगा कि कैसे बात करवाये। तब तक हमने खुद आगे बढ़कर उन बच्चों से कहा –‘ये बता रहा है कि तुम लोग इसके साथ पढ़ते हो।‘
दोनों ने लड़के की तरफ देखते हुए कहा –‘हाँ।‘
इसके बाद हमने उन बच्चों से बात की। ज्यादातर बात लड़की ने ही की। बहुत खूबसूरत बच्ची , मुझसे बेझिझक बात कर रही थी। उसका घर बगीचे के पीछे ही है। घर में माँ-पिता और छोटा भाई हैं। पढ़ाई-लिखाई और हावी आदि के बाद लड़की ने मुझसे पूछा –‘आप कहाँ से आए हैं? अमरनाथ यात्रा के लिए आए थे क्या?’
हमने बताया। करीब पाँच मिनट की बात के बाद लड़की ने कहा-‘ घर चलिए आपको चाय पिलाएं?’
हमने कहा –‘अभी हमको श्रीनगर जाना है। चाय फिर कभी आएंगे तब पियेंगे। दूसरी बात हमको चाय पिलाने ले चलोगी तो घर में अब्बू डाँटेंगे तुमको कि किस सड़क चलते को ले आई चाय पिलाने के लिए।‘
इस पर लड़की ने कहा- ‘मेरे अब्बू मुझे नहीं डाँटेंगे। वो मुझे कभी नहीं डांटते। वैसे भी आजकल वो अमरनाथ यात्रा के लिए काम पर गए हैं।‘
प्यारी बच्ची का आत्मविश्वास देखकर बहुत अच्छा लगा। वह अपने घर चली गई।
हमने वहाँ सेव का रस पिया। जैम और कुछ आचार खरीदा और आगे बढ़ लिए।
रास्ते में जमींदार केसर किंग की दुकान पर रुके। जलालउद्दीन जी ने फिर कहवा पिलाया और दुबारा आने को कहा।
एक जगह ड्राइवर ने बताया –‘यहां क्रिकेट के बल्ले बनते हैं।‘
हमको कश्मीर में क्रिकेट तो खेलना नहीं था तो बिना रुके आगे बढ़ गए।
दोपहर बाद श्रीनगर पहुच गए। सबसे पहले दवा की दुकान से दवा ली और वापस उसे होटल पहुंचे जहां से गए थे। वही कमरा नंबर भी वही (106) जिसमें जाते समय ठहरे थे।
कुछ देर आराम करने के बाद शाम को बाकी बचा हुआ श्रीनगर देखने के लिए निकल लिए।

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