Saturday, December 17, 2022

बोधा स्तूप मिथक और ऐतिहासिक धरोहर



पिछली पोस्ट में होटल के पास के स्तूप को देखने का किस्सा लिखा था। Chandra Bhushan जी ने पूछा -' यह कौन सा स्तूप है? देखने से बोधा स्तूप लग रहा है। '
हमने होटल के पास के स्तूप खोजकर देखे और बताया कि यह बोधा स्तूप है।
इसके बाद और जानकारी ली नेट से तो पता चला कि जिस स्तूप को हम ऐसे ही चलताऊ तरीक़े से देखकर लौट वह कितना खास है। युनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल यह स्तूप लिच्छवी राजवंश के समय बना था। मिथक के अनुसार उस राजा विक्रमादित्य ने अपने महल के अहाते पानी के जलस्रोत बनवाया। उसमें पानी नहीं आया तो राजा ने पानी लाने का उपाय पूछा। ज्योतिषियों ने बताया कि 32 गुणों से सम्पन्न किसी इंसान की बलि देने पर पानी आएगा। 32 गुण वाले लोगों में राजा स्वयं एवं उनके दो पुत्र थे। राजा के आदेश पर उनके पुत्र ने उनकी बलि दी। बलि देते समय राजा का सिर कट कर पास स्थित वज्रयोगिनी मंदिर पर जाकर गिरा। राजा के पुत्र ने जिस स्थान पर उनके पिता का सिर गिरा था , स्तूप बनवाने का निश्चय किया।
स्तूप बनवाने के पहले राजपुत्र ने बलि देने का निश्चय किया। बताते हैं कि बलि के लिए मुर्गी स्वयं उस जगह तक गयी जहां आज बोधा स्तूप बना है।
उस समय तक लोग ओस की बूंदों के सहारे सूखे का मुकाबला कर रहे थे इसलिए इस जगह का नाम नेपाली भाषा के अनुसार खस्ती (खस माने ओस, ती माने बूंद) था। बाद में नेपाल के राजा की आज्ञा के अनुसार इस इस जगह का नाम खस्ती से बदलकर बोधनाथ रख दिया।
तिब्बती मिथक के अनुसार एक बुजुर्ग महिला ने कश्यप बुद्ध के निधन के बाद तत्कालीन राजा से एक भैंस की खाल के बराबर जमीन स्तूप बनाने के लिए मांगी। अनुमति मिलने के बाद उसने भैंस की खाल को पतली डोरियों के आकार में काटकर बहुत बड़े हिस्से को घेरकर अपने चार पुत्रों के साथ स्तूप बनाना शुरू कर दिया। जब उस समय के धनी और प्रभावशाली लोगों ने बुजुर्ग महिला को अपनी मेहनत और समझदारी से बड़ी जमीन पर स्तूप बनवाते हुए देखा तो उन्होंने राजा से अपनी आज्ञा निरस्त करने का अनुरोध किया। राजा ने कहा मैं अपने शब्द वापस नहीं ले सकता (नेपाली में खा-शोर) वहीं से इसका नाम (खस्ती) पड़ा।
बाद में जब तिब्बती लोग सन 1950 में नेपाल आये तो तमाम लोगों ने बोधा स्तूप के आसपास रहने का निश्चय किया। 1979 में बोधा स्तूप को विश्व धरोहर में शामिल किया गया।
उपरोक्त दोनों ही मिथकों में तत्कालीन राजाओं की प्रजावत्सलता और अपने दिए वचन पर कायम रहने की नजीर मिलती है। आज के जनप्रतिनिधियों की तरह पलटू नहीं थे वे लोग।
2015 में नेपाल में आये भूकंप में स्तूप क्षतिग्रस्त हो गया था। बाद में उसकी मरम्मत कराई गई।
जिस ऐतिहासिक धरोहर को हम ऐसे ही देखकर लौट आये उसके बारे में जानकारी चंद्रभूषण जी की टिप्पणी के बाद हुई। अगर वो सवाल न पूछते तो हम बोधा स्तूप के बारे में अनजान रह जाते।
चंद्रभूषण जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आधी गणित की पढ़ाई किये हैं। उनके स्वयं के अनुसार 'एक पत्रकार और एक अधूरे कवि' हैं। वे बेहतरीन लेखक हैं। गणित की पढ़ाई आधी छोड़ देने वाले चंद्रभूषण जी की पोस्टों में विज्ञान से जुड़ी नई से नई जानकारी मिलती हैं। समसामयिक राजनीति पर चुटीली टिप्पणियां करते हैं। पिछले साल उनकी तिब्बत पर केंद्रित किताब 'तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत' तिब्बत और तिब्बती समस्या को समझने का बेहतरीन जरिया है। किताब खरीदने का लिंक साथ के फोटो में दिया है।

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Friday, December 16, 2022

नेपाल की खुशनुमा सुबह



होटल के जिस कमरे में ठहरे थे उसकी खिड़की से बौद्ध स्तूप दिखता है। बुकिंग के समय ही एक विकल्प के रूप में मौजूद है -स्तूप की तरफ का कमरा। हालांकि पहले कभी आये नहीं थे लेकिन बताया दोस्तों ने तो वही बुक कराया था।
सुबह नींद जल्दी ही खुल गयी। सफर में अकसर ऐसा होता। जितनी भी देर से सोएं, जग जल्दी ही जाते हैं। उठकर खिड़की के पास आये। सामने स्तूप दिख रहा था। अच्छी तरह से देखने के लिए खिड़की खोलकर देखने के लिहाज से खोली तो कड़-कड़ की आवाज हुई। झांककर देखा तो खिड़की में कांच की फोल्डिंग कीलें सरीखी लगी थीं। खिड़की खोलते ही खुल गईं कीलें। 4-5 इंच लम्बी होंगी कीलें। खासतौर पर बनवाई गईं होंगी।
खिड़की पर इन कांच की कीलों का कारण बाद में समझ आया। शायद कबूतरों को खिड़कियों पर बैठने से रोकने के लिए यह इंतजाम किया गया हो। कबूतर खिड़की पर बैठकर अपने परिवार सहित गुटरगूं करते हुए बीट करके होटल गन्दा न कर पाएं इसलिए कांच की कीलों की बैरिकेटिंग टाइप की गई होगी।
सामने दिखते स्तूप पर कोई पहरेदारी नहीं थी। उसके ऊपर तमाम कबूतर दीगर पंक्षियों के साथ मस्ती और मजे से उड़ते हुए शायद होटल को चिढ़ा रहे थे कि देख बेट्टा यहां और खुली जगह है हमारे लिए। एक तुम्ही नहीं हो बैठने के आसरा हमारा।
कमरे में केतली पर पानी गरम करके चाय बनाई। पीकर चल दिए स्तूप देखने। पांचवीं मंजिल पर कमरा था। लिफ्ट से उतरे। उतरकर डाइनिंग हाल होते हुए बाहर आये। स्विमिंग पूल के बगल से गुजरते हुए पगडंडी नुमा रास्ते से होते हुए होटल के पिछवाड़े पहुंचे। वहां गेट पर दरबान था। उससे स्तूप का रास्ता पूछा और निकल लिए बाहर।
गेट के बाहर सड़क पर आते ही चहलपहल भरा जनजीवन दिखने लगा। लोग सड़क पर तेजी से, तसल्ली और हड़बड़ाते हुए आते जाते दिखे। घरों के सामने बैठे, खड़े लोग दिखे। एकाध गाय दिखी। बच्चे स्कूल जाते दिखे। स्कूल जाते बच्चे अकेले भी दिखे और साथ में भी। समूह में भी। इतनी सुबह स्कूल जाते बच्चे देखकर अच्छा लगा और हल्का ताज्जुब भी हुआ कि यहाँ स्कूल इतनी सुबह शुरू हो जाता है।
ज्यादातर बच्चे स्कूल यूनिफार्म में थे। खूबसूरत, प्यारे, चहकते, चमकते बच्चे। बतियाते, गपियाते। एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखे जाते। कुछ बच्चे साइकिल और मोटरसाइकिल पर भी जा रहे थे लेकिन ज्यादातर पैदल ही थे। किसी भी देश, समाज में स्कूल जाते बच्चे देखना सबसे अच्छे अनुभवों में से एक होता है।
गली में दुकानें ज्यादातर बन्द थीं। एकाध जनरल स्टोर उनींदे से आँख मूँदते हुए खुल रहे थे। कोई-कोई चाय की दुकान भी चहकती दिखी।
स्तूप की गली के मुहाने पर ही सब्जियों के ठेले लगे थे। जमीन पर भी दुकाने लगीं थीं। सबसे पहली ठेलिया पर एक महिला आलू और दीगर सब्जियां ठेलिया पर सजा रही थी। पीठ पर बच्चे लादे हुयी थी। पीठ पर बच्चा लादने का जुगाड़ शायद इंसान ने कंगारू से सीखा होगा। कंगारू सामने रखता है बच्चा। इंसान पीठ पर।
आगे गली में तमाम लोग बंद दुकानों के चबूतरे पर बैठे बौद्ध धर्म से संबंधित सामग्री बेचते दिखे। एक बौद्ध बीच सड़क पर बने खंभे के पास बैठा एक चपटा डमरू की तरह का बाजा बजाते हुए सामने रखी किताब से कुछ बाँचता जा रहा था। मंत्रोच्चार की तरह। बुद्ध धर्म की कोई सीख रही होगी। वह अपने काम में इतना तल्लीन था कि उसको डिस्टर्ब करने की हिम्मत नहीं हुई।
वह इंसान न जाने कितने समय ऐसा कर रहा होगा। उसकी जिंदगी में न जाने कितने उतार-चढ़ाव आए होंगे। कैसे उसने इस तरह पूजा करना और यह जिंदगी चुनी होगी इस सबके बारे में मुझे कुछ अंदाज नहीं। लेकिन अपने आप में उसकी जिंदगी एक महाआख्यान रही होगी। हरेक का जीवन अपने में एक अनलिखा महाआख्यान होता है।
आगे बढ़ने पर देखा कि कई जगह छोटे-छोटे दीपक बड़ी सी चौकोर ट्रे में रखे हुए हैं। किसी में कुछ कम किसी में कुछ ज्यादा। शायद स्तूप में पूजा के लिए इन दीपकों को ले जाते हैं। आगे मंदिर के सामने तो पूरी-पूरी ट्रे इन दीपकों से भरी दिखी। बहुत खूबसूरत था इन दीपकों को देखना।
स्तूप के सामने पहुँचने पर देखा कि सैकड़ों लोग स्तूप की परिक्रमा कर रहे थे। परिक्रमा करते हुए स्तूप की चहारदीवारी में लगे चक्र को घुमाते जा रहे थे। जगह -जगह हवन सामग्री से हवन हो रहा था। स्तूप के ऊपर पक्षी मजे उसे उड़ते हुए आनंदित हो रहे थे।
वहीं स्तूप के सामने बने मंदिर सी सीढ़ियों पर तमाम लोग बैठे चाय पी रहे थे। हमने भी एक चाय ली। महिला एक बड़े कंटेनर में चाय लिए सबको चाय पिला रही थी। 20 रुपए की एक चाय। चाय पीकर हमने महिला की फ़ोटो लेने के लिए पूछा। वह कुछ कहे तब तक साथ के आदमी ने बरज दिया -'नहीं, फ़ोटो नहीं लेना का।'
हम अपना मोबाइल नीचे करते तब तक चाय वाली महिला ने साथ के पुरुष की बात काटते हुए ह कहा -'ले लो फ़ोटो।' आदमी बेचारा चुप दूसरी तरफ देखने लगा। महिला सामने देख रही थी। हमने उसकी फ़ोटो ली। उसको दिखाई। उसने मुस्कराते हुए कहा -'बढ़िया है।'
हम भी खुश होकर आगे बढ़ गए। यह नेपाल की एक खुशनुमा सुबह की शुरुआत थी।

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Wednesday, December 14, 2022

काठमांडू में कैसिनो



‘यात्राओं में बेवकूफियां चंद्रमा की कलाओं की तरह खिलती हैं। ‘
होटल लौटते हुए बहुत पहले की यह बात फिर याद आई। लेकिन इस बार यह घटना यात्रा शुरू करने के पहले ही घट गई।
हुआ यह कि चलने के पहले होटल बुकिंग कराई तो जो पासपोर्ट में लिखा था वह लिखा -अनूप कुमार शुक्ला। आगे सरनेम का खाना था। हमने लिख दिया -शुक्ला। बुकिंग के लिए भुगतान कर दिया। बुकिंग हो गयी। नाम लिखा था -'अनूप कुमार शुक्ला शुक्ला।'
बुकिंग की तसल्ली का लुत्फ अभी पूरी तरह ले भी नहीं पाए थे कि शंका हुई कि यार यह नाम तो पासपोर्ट से अलग है। एक शुक्ला ज्यादा हो गया। बुकिंग कराने वाली साइट में लिखा था -नाम पासपोर्ट से वेरिफाई होगा। यह बात देखते ही शंका गहरी हुई कि कहीं होटल वाला घुसने न दे कि बुकिंग 'अनूप कुमार शुक्ला शुक्ला' की है और आप ‘अनूप कुमार शुक्ला’हैं। हम एक अतिरिक्त शुक्ला से मुक्त होने को बेताब होने लगे। नाम का जो अंश हमारी पहचान है वही ज़्यादा होने पर बवाल लगने लगा।
बुकिंग एजेंसी को फोन किया तो उसने बताया कि होटल वाला मान भी सकता है, मना भी कर सकता है वैसे परेशानी होनी नहीं चाहिए।
हमारे पास और कोई काम था नहीं इसलिए शंका और चिंता ही करने लगे। खाली समय चिंता की खाद-पानी होता है। हम कल्पना करने लगे कि नेपाल पहुंचे और होटल वाले ने कमरा देने से इनकार कर दिया।
साइट वाले से समस्या बताई तो उसने कहा नाम में सुधार होने में 24 से 48 घण्टे लग सकते हैं। वो लोग कर भी सकते हैं , मना भी कर सकते हैं। अजब ढुलमुल विनम्रता।
हमने सोचा कि बुकिंग कैंसल करके दुबारा करा लें। रात बारह बजे तक मुफ्त कैन्सलिंग की सुविधा थी। पता किया तो उसने बताया कि बुकिंग निरस्त करने पर पैसे हफ्ते भर में वापस आएंगे। हमने कहा कि आप नाम ठीक करवाओ, शाम तक हो गया तो ठीक नहीं तो बुकिंग कैंसल कर देंगे।
बहरहाल, दो घण्टे बाद एजेंसी के लोगों ने मेहनत करके नाम ठीक करवाया। इसके बाद कई लोगों ने पूछा -'आप हमारी सेवाओं से संतुष्ट हैं?' हमने कहा -हां। शाम तक तीन-चार लोगों ने सेवाओं से संतुष्टि की बात पूछी। सबने कहा -'फ़ीडबैक में लिख दीजिएगा।'
एक सुधार की तारीफ के तमाम तकादे। लगता है कि किसी एक काम के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों ने श्रेय लेने की कला इन एजेंसियों से ही सीखा है।
बहरहाल रात में जब होटल वापस पहुंचे तो देखा एक कोना थोड़ा ज्यादा गुलजार था। कुछ गाड़ियां भी खड़ीं थीं। गए तो देखा वह कैसिनो था। कैसिनो मतलब जुआघर।
कैसिनो के बाहर ही बोर्ड में लिखा था -'केवल विदेशी नागरिकों के लिए। नेपाली लोगों का प्रवेश वर्जित है।'
मतलब नेपाल में हैं लेकिन नेपाली जुआ नहीं खेल सकते। शायद ऐसा नेपाली लोगों के भले के लिए किया गया हो। देखिए नियम क्या लिखे थे:
1. प्रवेश प्रतिबंधित है।
2. नेपाल सरकार द्वारा नेपाली नागरिकों को जुआ खेलने वाले हिस्से में प्रवेश प्रतिबंधित है।
3. प्रवेश के समय परिचय पत्र (पासपोर्ट, वोटर आई डी आदि प्रस्तुत किया जाए ।
4. ड्रेस कोड : स्मार्ट कैजुअल। चप्पल और घुटन्ना पहने लोग अंदर न जा पाएंगे।
5. सुरक्षा वाले कोई भी तलाशी कर सकते हैं।
6. गोला बारूद अंदर ले जाने की मनाही है।
7. अंदर जाने वाले की सुरक्षा उसकी अपनी जिम्मेदारी है। अपने रिस्क पर अंदर जाएं।
8. अंदर कोई दुर्घटना हो जाये उसके लिए कैसिनो के लोग या नेपाल सरकार जिम्मेदार नहीं होगी।
9. मैनेजमेंट ऊपर दिए नियमों में से कोई भी कभी भी बदल सकता है।
10. कैसिनो के अंदर फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी मना है।
जुआ तो वैसे भी हमको नहीं खेलना था। कभी खेला भी नहीं , न मन क़िया। बिना मेहनत की कोई भी कमाई अंततः बर्बादी की तरफ ही ले जाती है। महाभारत जुआ का अपरिहार्य उत्पाद है। लेकिन मन किया कि देखें कि लोग कैसे खेलते हैं जुआ कैसिनो में। कैसे समाज की बर्बादी का ड्राफ्ट लिखा जाता है।
दरबान को बताया कि खेलना नहीं है, बस देखना है। जा सकते हैं?
जितने भोलेपन से हमने पूछा उससे दोगुने भलेपन से उसने कहा -'देख लीजिए। यहां इंट्री कर दीजिए। पासपोर्ट नम्बर और विवरण भर दीजिए।'
इंट्री की बात सुनते ही हमारा देखने का कौतूहल हवा हो गया। हम लौट लिए। जिस गली जाना नहीं उसके कोस गिनने से क्या फायदा? कौन सफाई देता कि खेलने नहीं देखने गए थे। तमाम लफड़े हैं शरीफ नागरिक बने रहने के। कितने कौतूहल कत्ल हो जाते हैं एक नागरिक को शरीफ बनाये रखने में। अगर 'कौतूहल कत्ल' की कोई सजा होती तो हर सभ्य समाज अनगिनत सजाएं भुगत रहा होता। वैसे देखा जाए तो भुगत तो रहे ही हैं लोग तमाम सजाएं, बस दर्ज नहीं हो रहीं।
वापस लौटकर रिसेप्शन पर आए। काउंटर पर मौजूद रिसेप्शनिस्ट से होटल और आसपास की जानकारी ली। नेपाल के बारे में भी। बात करते हुए जानकारियां अपने आप उद्घाटित होती हैं। उसकी ड्यूटी रात ग्यारह बजे तक थी। वह उस होटल की अकेली स्थायी कर्मचारी है। बाकी सब दिहाड़ी पर। रात की ड्यूटी में छोड़ने के लिए होटल का वाहन जाता है।
पास में स्थित बौद्ध स्तूप का रास्ता भी बताया महिला रिसेप्सनिष्ट ने इस हिदायत के साथ कि देर होने पर इधर से मत जाइयेगा। सुबह जाइयेगा। बताकर वह दिन भर की कमाई गिनने लगी। उसको घर जाना था।
सुबह बौद्ध स्तूप जाने की बात तय करके हम कमरे आ गए।’

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Tuesday, December 13, 2022

रात में नेपाल की सड़क



3D रेस्टोरेंट मतलब तीन बेटियों के रेस्टोरेंट से चाय पीकर लौटे तक काफी रात हो गयी थी। काफी रात मतलब करीब दस बजने वाले थे। सड़क पर केवल गाडियां थीं। सड़क के दोनों तरफ दुकानें बंद हो चुकी थीं। काफी दुकानों के साईन बोर्ड चमक रहे थे। दुकानों में काफी के नाम रोमन हिंदी में लिखे थे। लग रहा था किसी हिंदुस्तानी शहर में टहल रहे हैं।
थोड़ी दूर पर एक बौद्ध मठ के बाहर कुछ लोग खड़े दिखे। कुछ लोग मतलब 3-4 लोग। नेपाल के अलग-अलग हिस्सों से आये थे वे लोग। मठ काफी पुराना था। 69 लोग रहते हैं मठ में।
वे लोग किसी के इंतजार में थे। बात करने पर पता चला कि कोई बड़े मठ से जुड़े कोई बड़े बौद्ध आने वाले हैं। उनकी अगवानी के लिए ही खड़े थे वे लोग। हर आती-जाती गाड़ी को चौकन्ना होकर देखते। गाड़ी निकल जाने पर थोड़ा सहज होकर बतियाते, इसके बाद फिर चौकन्ना हो जाता। चौकन्नेपन और सहजता की साइकिल चल रही थी।
थोड़ी देर में एक बड़ी गाड़ी रुकी। मठ के बाहर खड़े लोग लपककर उनकी अगवानी में जुट गए। गाड़ी अंदर चली गयी। मठ का दरवाजा बंद हो गया।
जिस तरह लोग आने वाले का इंतजार कर रहे थे और जितनी भव्य गाड़ी में आये वीआईपी बौद्ध और लोग लपककर उनको अंदर ले गए और गाड़ी के अंदर जाते ही गेट बंद हो गया उसे देखकर लगा कि धर्म के मामले में तामझाम कितना बढ़ गया है। बड़ा साधु, बड़ा धार्मिक मतलब बड़ा रुतबा मतलब बड़ी गाड़ी, बड़ा प्रोटोकॉल। धर्म दिखावे की मनाही करते हैं, वही इफरात में दिखता है हर जगह।
बहरहाल, आगे बढ़े। एक तिराहे पर नेपाली पुलिस के तीन जवान ड्यूटी दे रहे थे। पता चला उनमें से एक स्थायी कर्मचारी है, बाकी दो दिहाड़ी पर हैं। चुनाव भर के लिए उनकी ड्यूटी लगाई गई है। चुनाव बाद वापस चले जायेंगे। नेपाल के अलग-अलग हिस्सों से आये थे दिहाड़ी सिपाही। अपने यहां के होमगार्ड सरीखे। पर होमगार्ड तो लगभग नियमित ड्यूटी करते हैं। लेकिन यहां दिहाड़ी सिपाही की ड्यूटी सिर्फ चुनाव भर को थी। क्या पता बाद में और कोई काम मिले।
करीब महीने भर के लिये ड्यूटी के लिए करीब 25 हजार नेपाली रुपये मिलने की बात बताई उन लोगों ने।
सिपाहियों ने बताया कि ये जो चौराहों पर ठेलिया वाले हैं उनको भी रात दस बजे तक ही अनुमति है ठेलिया लगाने की। रात दस के बाद कोई नहीं दिखेगा।
नेपाली सिपाहियों की फोटो खींचने के लिए पूछा तो मुस्कराकर खड़े हो गए। खींच ली हमने फ़ोटो।
होटल के बाहर दरबान मुस्तैद था। बातचीत से पता चला कि काफी दिन सऊदी अरब रह कर आये हैं। तबियत खराब हो गयी तो अब वापस आ गए। अब नहीं जाएंगे। वहाँ पैसा बहुत है लेकिन रहने की तकलीफ भी काफी।
नेपाल में मंहगाई की बात चली तो उन्होंने बताया कि यहां सब सामान तो बाहर से आता है। इसीलिए मंहगाई है। भारत मे मोटरसाइकिल के दाम पूछे हमसे तो हमने अंदाज से बता दिया -एक लाख रुपये। इस पर वो बोले -'यहाँ आते आते मोटरसाइकिल तीन से चार लाख रुपये मिलती है। पेट्रोल 200 रुपये लीटर है। हर सामान बाहर से आता है इसी लिए बहुत मंहगाई है।'
परेशानियों के इस एहसास के बावजूद दरबान के चेहरे पर मुस्कान थी और लहजा विनम्र। लेकिन यह तो हम देख रहे थे। हमको क्या एहसास उनकी परेशानी का। जो झेलता है वही अच्छी तरह समझता है।
दरबान से बात करके अंदर आये। होटल के अहाते में फव्वारा चल रहा था। फव्वारे के चारो तरफ रोशनी थी। पानी उछल-उछलकर ऊपर आ रहा था। थोड़ी देर रोशनी में चमकता और फिर नीचे चला जाता। जैसे स्टेज पर लोग आते है, अपना रोल अदा करते हैं और वापस मंच से चले जाते हैं उसी तरह पानी अपना रोल अदा कर रहा था।

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Monday, December 12, 2022

बेटियों का रेस्टोरेंट



पिछले महीने नेपाल जाना हुआ। दफ्तर के काम से। कानपुर से लखनऊ, लखनऊ से दिल्ली। दिल्ली से काठमांडू। सुबह दिल्ली से चलकर दोपहर के पहले काठमांडू पहुंच गए। हवाई अड्डे पर एकदम अनौपचारिक माहौल। एयरपोर्ट पर ही करेंसी बदलने के कई काउंटर थे। भारत और नेपाली करेंसी का कोई काउंटर नहीं था। पता चला कि भारत का रुपया नेपाल में चलता है, इसीलिए भारत-नेपाल करेंसी काउंटर की जरूरत ही नहीं।
हवाई अड्डे के बाहर निकल कर आये। कोई तड़क-भड़क नहीं। सादा जीवन उच्च विचार टाइप मामला। हवाई अड्डे के बाहर की इमारत देखकर लगा कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर खड़े हैं।
नेपाल पहुंचते ही पटर-पटर करने वाला फोन शांत हो गया। हमने नेपाल के लिए इंटरनेशनल रोमिंग प्लान लिया था। वह चालू नहीं हुआ था। साथ के ड्राइवर समझदार( स्मार्ट कहना ज्यादा ठीक होगा) उन्होंने फौरन अपने हॉटस्पॉट से हमको जोड़ लिया और संपर्क चालू। व्हाट्सएप से बातचीत शुरू। घर से निकलते ही बातचीत की मात्रा भी बढ़ जाती है।
होटल पहुंचकर कुछ देर आराम करके खाना खाया। दोपहर बाद काम निपटाया। देखते-देखते शाम हो गयी।
होटल में नाश्ता के अलावा एक खाने की व्यवस्था थी। शाम को सोचा बाहर खाएंगे। इसी बहाने थोड़ा घूम भी लेंगे। शाम को निकलते-निकलते आठ बज गए।
होटल के बाहर आये तो देखा सब दुकानें बंद। सड़क पर गाड़ियों के अलावा सन्नाटा। कोई दुकान खुली दिखी भी तो वह बन्द हो रही थी। नुक्कड़ पर एक ठेलिया पर कुछ नानवेज पकौड़ी टाइप बिक रही थी। पता किया तो मछली, चिकन घराने की पकौड़ियाँ थीं। एक बच्ची मोबाइल पर चैटियाती हुई अनमने ढंक से जबाब दे रही थी। दूसरी पास की फुटपाथ पर बैठी फोनालाप में रत थी। रात के सन्नाटे में अकेली लड़कियों को देखकर थोड़ा ताज्जुब हुआ। लेकिन फिर यह यह मंजर लगभग हर नुक्कड़ पर दिखा। आगे के मोड़ों पर ताज्जुब विदा हो गया। यह सामान्य बात लगी।
ठेलिया पर कुछ खाने के लिए नहीं मिला तो आगे बढ़े। मेन रोड के बगल में ही गली पर एक दुकान खुली दिखी। वहां चाय-काफी बिकती थी। हमको लगा कि चाय के साथ बिस्कुट खा लेंगे। लेकिन वहां पहुंचने पर पता चला कि दुकान बढ़ चुकी थी। बहुत कहने पर भी वो चाय या काफी बनाने के लिए राजी नहीं हुए। आदमी और औरत दोनों बोले-'सुबह आना तब चाय पिलायएंगे।' हमने कहा -'सुबह मतलब कितने बजे?' वो बोले -'छह बजे।'
हमारे बार-बार के अनुरोध के बावजूद वो चाय बनाने को राजी नहीं हुए। अंततः हमने वहां से एक बिस्कुट का पैकेट लिया। 190 नेपाली रुपये का। मतलब हिंदुस्तानी लगभग 120 रुपये। दुकान से बाहर निकलकर देखा बगल में एक बोर्ड लगा था -'डांस बार एवं रेस्टोरेंट।' वहां अंदर से ड्रम बजने जैसी आवाज आ रही थी।
रेस्टोरेंट ने ललचाया कि अंदर जाकर खाने के बारे में पूछें। लेकिन 'डांस बार' ने बरज दिया। कौन मानेगा कि अंदर रेस्टोरेंट में खाने की तलाश के लिए गए थे, डांस बार नहीं।
आगे मुख्य सड़क के दोनों ओर सब दुकाने बन्द हो चुकी थीं। बड़े-बड़े होटल खुले थे। लगभग हर चौराहे पर नानवेज पकौड़ी वाली ठेलिया दिखीं। हम आगे बढ़ते गए। लगा कि कहीं न कहीं तो कोई चाय का या खाने का जुगाड़ दिखेगा।
आगे बढ़ते हुए हर चौराहे पर सोचते कि अगले तक जाएंगे, फिर वापस हो लेंगे। इस चक्कर में कई चौराहे पार कर गए लेकिन कोई चाय की या खाने की दुकान न दिखी। फिर भी हम बढ़ते गए।
'कोशिशें अक्सर कामयाब हो जाती हैं' शायद यही साबित करने के लिए आगे एक रेस्टोरेंट खुला दिखा। खुला क्या हो तो वह बन्द ही गया था लेकिन दरवाजा खुला था। 3 D रेस्टोरेंट। हम फौरन 'दाखिल-रेस्टोरेंट' हो गए।
रेस्टोरेंट के अंदर माहौल एकदम घरेलू सा था। एक महिला कोने में बैठी एक बड़े बर्तन में कुछ खा रही थी। पास में खड़ा एक आदमी गोद में बच्चा लिए खड़ा था। दूसरा खाना खाती महिला के पास बैठा था। तीसरा सोफे-कुर्सी पर पेट के बल लेटा हुआ मोबाइल में कोई गेम खेल रहा था।
रेस्टोरेंट बन्द हो चुका था। खाने का कोई जुगाड़ नहीं था। मना हो गया। इस पर हमने पूछा -'अच्छा चाय मिल जाएगी?' हमारी आशा के विपरीत जबाब मिला -'हां चाय बन जाएगी। ।' हम खुश हो गए। कहा -'बनवा दीजिए।'
आदमी ने अंदर जाकर शायद दुकान में काम करने वाली बच्चियों को बुलाकर चाय बनाने को कहा। बच्चियों के चेहरे उनींदे से थे। शायद अनमने भी। लेकिन अपन ने उनको नजरअंदाज किया। 'अपना काम बनता, भाड़ में जाये जनता' वाला गुट ज्वाइन करके चाय का पूरी बेताबी के बावजूद तसल्ली वाले भाव से इंतजार करने लगे।
कुछ देर में चाय आई। बड़े ग्लास में ऊपर तक भरी चाय। इतना कि रेलवे स्टेशन के कागज वाले चार-पांच कप भर जाएं। हमने पूरी तसल्ली से बिस्कुट के साथ चाय पी। इस बीच महिला खाना खाती रही। आदमी बच्चा खिलाता रहा। चाय बनाकर लाई बच्चियां अंदर जा चुकी थीं।
इस बीच आदमी ने बताया कि यह रेस्टोरेंट उसने नया खोला है। पांच लाख रुपये महीने किराया है। एक और रेस्टोरेंट है उनका। उससे दोनों से कुल।मिलाकर 30-35 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है।
चलते समय चाय के दाम चुकाए। साठ रुपये की चाय। नेपाली साथ रुपये मतलब 37 रुपये करीब हिंदुस्तानी रुपये।
विदा होते हुए हमने 3D रेस्टोरेंट नाम का कारण पूछा। ऐसे ही कौतूहलवश। हमें लगा कि कोई 3 ईडियट जैसा कारण होगा नाम के पीछे। लेकिन काउंटर पर खड़ी महिला ने बताया कि यह नाम उसके पिता ने रखा है। उनकी तीन बेटियां हैं। बेटियों के नाम पर उन्होंने दुकान का नाम रखा 3 D रेस्टोरेंट मतलब तीन बेटियों का रेस्टोरेंट।
कितनी प्यारी बात। बेटियों का रेस्टोरेंट। नीमा नाम है जो बेटी मिली उस दिन और जिसने सब दुकाने बन्द होने के बावजूद हमको चाय पिलवाई। इतवार को पैदा हुई थी। शायद यह भी बताया कि इतवार को पैदा हुई इसलिए बुद्धिष्ट हुए।
लौटते हुए सड़क पर लोग बहुत कम दिख रहे थे। केवल गाड़ियों की आमद। पूरा नेपाल सो रहा था। नेपाल जल्दी सोता है, जल्दी जगता है। मज़े में लोग कहते हैं -सूरज अस्त, नेपाल मस्त।
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Wednesday, November 30, 2022

लिफाफे में कविता बनाम लिफाफे में किराया


लगभग चार वर्षों के इंतजार के बाद अरविंद तिवारी जी Arvind Tiwari का चौथा व्यंग्य उपन्यास प्रकाशित हुआ -'लिफाफे में कविता।' प्रकाशित होते ही खरीदा और पढ़ना भी शुरू कर दिया। एक छुटकी पोस्ट भी लिखी। सोचा पूरा पढ़ कर तसल्ली से लिखेंगे। उपन्यास पढ़ गए। लेकिन तसल्ली न मिली।
शुरू में तो अरविंद जी ने छोड़ दिया। बोले-'आराम से लिखना।' लेकिन छह महीने बाद जब लिखने का तकादा किया तो कथानक आधा उड़ गया दिमाग से। दुबारा पढ़े 192 पेज। वो तो कहो उपन्यास की रोचकता जबर्दरस्त है तो फिर मजे लेकर पढ़ गए। कहीं कोई कालजयी टाइप उपन्यास होता तो दुबारा पढ़ने में कोई न कोई याद आ जाता।
अभी हाल ही में एक लेखक का बहुप्रचारित उपन्यास छपकर आया है। बहुत उत्साह से मंगाने वाले मित्र से जब पूंछो कहा तक पहुंचे ? पता चलता है चालीस पेज पर अटके हैं। इस मामले में अरविंद तिवारी जी के सभी उपन्यास रोचक और पठनीय हैं।
उपन्यास पढ़कर उसके पंच और उसके बारे में व्यंग्ययात्रा में भेज भी दिया। छप भी गया। एक काम पूरा हुआ।
उपन्यास छपने के करीब साल भर बाद इसी महीने की शुरुआत में अरविंद जी का फोन आया। बोले -'उपन्यास पर गोष्ठी तय हुई है। आना है।' हमने कहा -'आएंगे। काहे नहीं आएंगे।'
तारीख बताई गयी 26 नवम्बर। जो कि एक दिन बाद सरक के 27 हो गयी। हमने 26 नवम्बर को पहुंचने का और 27 को लौटने का रिजर्वेशन करा लिया। सोचा था डेढ़ दिन आगरा घूमेंगे। शहर, किला, ताजमहल और भीड़-भाड़ देखेंगे, भटकेंगे। सुबह-शाम सूरज उगने-अस्त होने के समय ताजमहल देखने की बात भी सोच ली। शनिवार,इतवार का दिन। तसल्ली से आवारागर्दी का प्लान बन गया।
लेकिन सब कुछ प्लान के हिसाब से कहां होता है। घर के काम कुछ ऐसे पड़े कि 26 को जाना स्थगित हो गया। अब बचा दिन 27 का। 27 की सुबह गोमती में तत्काल से रिजर्वेशन कराया। लेकिन पैसे भगतान करते-करते मामला वेटिंग लिस्ट तक पहुंच गया। गाड़ी सुबह साढ़े सात पर जाती है। सोचा वेटिंग कन्फर्म हुई तो नहीं तो बस से निकल लेंगे।
शाम को सोचा कि काहे को वेटिंग का इंतजार किया जाए, रात की बस से निकल लेंगे। बैग तैयार कर लिया। लेकिन ऐन निकलने से पहले शरीर ने कहा -'आराम बड़ी चीज है। रात में घर में सोया जाए। सुबह निकलना।' मान ली बात।
सुबह छह बजे निकले। गोष्ठी 2 शुरू बजे होनी थी। बस स्टैंड पहुंचे। बस तैयार थी। बैठ गए। ड्राइवर बोला -'पांच घण्टे में पहुंच जाएंगे। एक्सप्रेस वे से चलेंगे।' हमने सोचा-' बहुत सही। ग्यारह-बारह तक आगरा पहुंच कर दो बजे तक गोष्ठी स्थल पहुंच जाएंगे।'
बस चली। कंडक्टर आया। टिकट बनाया। हमने इत्मीनान से पूछा कि आगरा कब तक पहुंचेंगे। कन्डक्टर दुगुने इत्मीनान से बोला -'दो बजे तक पहुंच जाना चाहिए।' हमारे हाथ के तोते तो नहीं लेकिन हल्के से होश तो उड़ ही गए। हमने कहा -'ड्राइवर तो पांच घण्टे कह रहा था।'
'ड्राइवर नया है। उसको पता नहीं होगा। दो बजे तक पहुंचेगे आगरा।' -कन्डक्टर ने और भी इत्मीनान से कहा। हमको लगा ये बस का ड्राइवर न हुआ किसी संस्था का कर्णधार हो गया जिसको पता ही नहीं कि कहां घसीटे लिए जा रहा है अपनी संस्था को, कहाँ पहुंचाएगा।
हमने रुट पूंछा तो उसने बताया -'कन्नौज, गुरसहायगंज, मैनपूरी, शिकोहाबाद, टूंडला होते हुए आगरा जाएगी।' मैनपूरी मतलब अरविंद तिवारी जी का जन्मस्थान, शिकोहाबाद मतलब वर्तमान निवास, आगरा मतलब गोष्ठी स्थल। मतलब बस सभी महत्वपूर्ण स्थलों को निपटाते हुए पहुंचनी है।
दो बजे आगरा में पहुंचने के कंडक्टर ने टूंडला में आधे घण्टे रुककर नाश्ते का प्लान भी बता दिया। हमने सोचा कि टूंडला उतरकर ओला या कोई और सवारी कर लेंगे। समय पर पहुंच जाएंगे।
रास्ते में ड्राइवर जगह-जगह रुककर सवारियां बटोरते हुए आगे बढ़ा। हम भी ग्राम्य सुषमा निहारते हुए गोष्ठी की कल्पना करने लगे। छप्पर, जानवर, बैल, खेत, उपले और तमाम बेतरतीब नजारे देखकर लगा कि कह दें -'अहा ग्राम्य जीवन भी क्या।' लेकिन नहीं कहे। गोष्ठी 2 बजे शुरू होनी थी।
इस बीच कल्याणपुर, मंधना, चौबेपुर, शिवराजपुर, बिल्हौर, मानीमऊ निकलते गए। हर स्टेशन पर हमारी कोई न कोई रिश्तेदारी। हरेक को तसल्ली से याद करते रहे। आगे बढ़ते गए।
कन्नौज के पहले अरविंद तिवारी जी का फोन आया। बोले -'कहाँ हो, किधर तक पहुंचे?' हमने बताया -'बस से आ रहे। 2 बजे तक पहुंचेंगे।' तिवारी जी ने सुना तो बोले -'ये तो बहुत गड़बड़ बस पकड़ ली। बहुत देर में पहुंचेंगी।' हमने कहा -'पहुंच जाएंगे।' तिवारी जी ने पूरा रुट बिना सांस लिए गिना दिया। बोले -'उस रुट के बारे हमें अच्छी तरह पता है। आपको लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे आना चाहिए था। या फिर गोमती से।'
अरविंद तिवारी जी खुद कवि रहे हैं। कवि सम्मेलनों में जाते रहे हैं।जिस बारीकी से रुट बताया उससे उनके उपन्यास की बात की पुष्टि हुई -'कविता की तरह रेलवे(बस) के टाइम टेबल को रटना मंचीय कवियों के लिए जरूरी होता है।'
बहरहाल तिवारी जी की हड़काई का असर यह हुआ कि हमको भी लगा कि अब गोष्ठी छूट गयी। लगने तक हम कन्नौज पहुंच गए थे। हमने वहीं ट्रेन की चेन खींचने वाले अन्दाज में अपना झोला उठाया और बस को तलाक दे दिया। सोचा कुछ नहीं तो कन्नौज से कार से चले जायेंगे। जो होगा देखा जाएगा।
कन्नौज में उतरकर चाय पीते हुए पता किया तो मालूम हुआ कि 12 किलोमीटर आगे एक्सप्रेस हाइवे है। 30 रुपये में ऑटोवाला पहुंचा देगा 15 रुपये में। वहां से दो घण्टे में आगरा पहुंच जाएंगे।
ऑटो वाले ने सवारी भरी और हमको भी भरकर आगे बढ़ा। एक छुटके ऑटो में 6 सवारी बैठाए था। फिर भी शिकायत कि एक सवारी कम है। नुकसान होगा।
रास्ते में ऑटो वाले ने बताया कि ऑटो के अड्डे पर तमाम लोगों को पैसे देने पड़ते हैं उसको। पुलिस, ठेकेदार, इसको उसको और न जाने किसको। ऑटो वह फोन पर बतियाते हुए ऐसे चला रहा था जैसे हवाईजहाज वाले ऑटो पायलट मोड़ में जहाज उड़ाते हैं।
जहां उतारा ऑटो वाले ने वहीं चढ़ाई के बाद एक्सप्रेस हाइवे था। चढ़ाई चढ़ते ही बस मिल गयी। हम लपककर चढ़ गए। पीछे बैठे। पूरी सीट सूरज की रोशनी में नहाई हुई थी। बलभर विटामिन डी लेते हुए आगरा की तरफ बढ़ गए। पहले के खड़खड़ाहट भरे रास्ते की जगह बस अब तैरती हुई सी चल रही थी। बेआवाज चलती बस में बैठे तसल्ली हो गयी कि अब तो समय पर पहुंच ही जायेंगे।
इस बार तिवारी जी का फोन आया तो बोले -'आपकी बस में आवाज नहीं आ रही।' उनको शायद लगा होगा कि अगला बस से उठकर वापस तो नहीं चला गया। हमने बताया कि एक्सप्रेस वे से आ रहे तो उन्होंने भी सुकून की सांस ली।
लंबे रास्ते से एक्सप्रेस वे की तरफ बढ़ते हुए हमको लगा कि हमारे बड़े-बुजुर्ग हमको आरामदायक रास्ते में ठेल कर अनेक अनुभवों से वंचित कर रहे। मैनपुरी, शिकोहाबाद होते हुए आते तो गोष्ठी भले छूट जाती लेकिन कितने रोचक अनुभव होते। परसाई जी पैसेंजर से चलते थे, खटारा बस पकड़ते थे ताकि जनता के बीच से अनुभव मिलें। तिवारी जी ने हमको उससे वंचित किया। परसाई जी की तरह बस यात्रा का लेख लिखने का मसाला रह गया।
लंबे रास्ते आते तो तिवारी जी बार-बार पूछते कहाँ तक पहुंचे, कितनी दूर हैं। हम बिना कुछ बोले ही प्रमुख वक्ता बन जाते। सञ्चालक हर वक्ता के बाद बताता -'कानपुर से आने वाले अनूप शुक्ल बस आने ही वाले हैं।' लेकिन इस एक्सप्रेस वे की बस ने सारी वीआईपी सम्भवनाये खत्म कर दीं।
आगरा के सारे रुट तिवारी जी ने लिखा रखे थे। उनको फॉलो करते हुए हम गोष्ठी स्थल यूथ होस्टल पहुंच गए। वहां तिवारी जी का फोन आया -'कहां तक पहुंचे?' हमने बताया -'घटनास्थल पहुंच गए।' उन्होंने पास ही स्थित आहार रेस्टोरेंट बुला लिया। वहां प्रेम जनमेजय जी प्रेम जनमेजय और अरविंद तिवारी जी मौजूद थे। उसकी फोटो साझा करते हुए तिवारी जी ने लिखा है -' हिंदी व्यंग्य के दो सैनिक' । हमने सोचा आगे लिख दें -'शिकार के इंतजार में।' लेकिन फिर नहीं लिखा। वहां लिखते तो फिर यहां क्या बताते?
हमारे पहुंचते ही खाने का फिर आर्डर हुआ। खाना खाकर हम लोग गोष्ठी स्थल की तरफ बढ़ें इसके पहले अरविंद तिवारी जी हमको एक लिफाफा देने लगे। हमने पूछा -'ये क्या?' बोले -'किराया है रख लो।' हमने मना कर दिया। हमने सोचा कि 'लिफाफे में कविता' की जगह 'लिफाफे में किराया' चल रहा।
तिवारी जी ने फिर कहा लेकिन हमने मना कर दिया तो कर दिया। बाद में हमारी न में आलोक पुराणिक Alok Puranik भी शामिल हो गए। हम बहुमत में हो गए। लोकतंत्र में जिसका बहुमत उसकी बात मानी जाती है।
हमने तो खाली मना ही किया था। आलोक पुराणिक जी ने फ्रंटफुट पर आकर डायलॉग भी मार दिया -'अरे तिवारी जी आप भी क्या बात करते हैं। आप जब और जहां बुलाएंगे हम आएंगे।' मौके पर सटीक डायलाग मार लेना भी समर्थ व्यंग्यकार की निशानी है। 🙂
अरविंद तिवारी जी मान तो गए हमारी बात। हालांकि बाद में उन्होंने फेसबुक थाने पर हमारी शिकायत दर्ज करा ही दी कि इन लोगों ने किराया तक नहीं लिया।
हम लोग समय पर गोष्ठी स्थल पहुंच गए। वहां आलोक पुराणिक जी अच्छे बच्चों की तरह नोट्स ले रहे थे। 'लिफाफे पर कविता' में जगह-जगह निशान, चिप्पियाँ लगाए हुए वे तैयारी में जुटे थे। ओपन बुक एक्जाम के लिए तैयारी। वक्ता सभी आ गए थे सिवाय डॉ अनुज त्यागी के। उनका और श्रोताओं का इंतजार था।

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Sunday, November 27, 2022

अतुल अरोरा से मुलाक़ात

 कल Atul Arora मुलाक़ात हुई। बहुत दिनों के बाद। इसके पहले की मुलाक़ात लगभग दस-बारह साल पहले हुई थी जब हम आर्मापुर में रहते थे। तीन साल पहले जब अपन अमेरिका की यात्रा पर थे तो अतुल न्यूजर्सी ,जहां हम हफ़्ते भर रहे , के बग़ल के मोहल्ले (स्टेट) में ही रहते थे। लेकिन उन दिनों फ़ेसबूक से दूरी बनाए रखने के चक्कर में वो हमारी पोस्ट्स देख न पाए और हमारे अमेरिका प्रवास के बारे में जान न पाए। लिहाज़ा दो कनपुरिये अमेरिका में मिल न पाए।

पहली मुलाक़ात हम लोगों की आभासी ही हुई। ब्लागिंग के चलते। 2004 में । अतुल रोज़नामचा ब्लॉग लिखते थे। उन दिनों उनकी पोस्ट्स सबसे ज़्यादा पढ़ी जानी पोस्ट्स होती थी। ‘लाइफ़ इन एच ओ वी लेन’ भारत से अमेरिका पहुँचे लोगों की ज़िंदगी का रोचक वृत्तांत है। बाद में ,शायद व्यस्तता के चलते , इस तरह के किस्से कम होते हुए ठहर गये। आजकल जो किस्से आते हैं उनके घर के किचन गार्डन में मूली और दीगर सब्ज़ियाँ उगाने की जिस तरह कहानी आती है उसके चलते कल मिलने पर हमारा सबसे पहला सवाल था -“भइया यहाँ से इंजीनियरिंग करके वहाँ सब्ज़ी उगाने गये थे क्या?”
लेकिन इसके लिए अतुल या किसी को क्या दोष देना। आजकल जिसको जो काम सौंपा गया वह उसको छोड़कर दूसरे काम में जुटा हुआ है। हर जगह डायवर्सिफ़िकेशन चल रहा है।
बहरहाल बात मुलाक़ात की । विदेश से देश लौटने पर लोगों के पास दिन होते हैं गिनेचुने , मिलने का मन होता है बहुत लोगों से। लोग भी मिलना चाहते हैं। दिन, घंटे और जगह तय होती है। मिलना होता है।
अतुल से मिलने की बात तय हुई थी 27 को लखनऊ में। हिमांशु बाजपेयी Himanshu Bajpai के साथ। हमारा ग्रुप भी बन गया कार्यक्रम तय करने के लिए। लेकिन फिर अरविंद तिवारी Arvind Tiwari जी के उपन्यास ‘लिफ़ाफ़े में कविता’ पर 26 को होने वाला कार्यक्रम 27 को शिफ्ट हो गया। लिहाज़ा हमारा लखनऊ जाना निरस्त हो गया। अतुल का भी कार्यक्रम बदला और हमारा 26 को मिलना तय हुआ।
बहरहाल मिलने के लिए बाहर कोई ‘ठीक-ठाक’ जगह खोजी गई। तय हुआ कि गोविन्दनगर के होटल दीप में मिलना होगा।
ये ‘ठीक-ठाक’ जगहों पर मिलने वाली बात लिखने-पढ़ने वालों की समाज में स्थिति की कहानी है। लोग लिखने-पढ़ने वालों को अच्छी नज़र से नहीं देखते। घर में घुसने नहीं देना चाहते हैं। मजबूरी में लोग बाहर मिलते हैं।
समय तय हुआ था सुबह साढ़े आठ बजे का। मिलनातुर लोग आठ ही बजे पहुँच गये। हमने अपने नामराशी अनूप शुक्ला Anoop Shukla को भी न्योता उछाल दिया -आओ,जलेबी खिलाते हैं। अनूप शुक्ला ने निमंत्रण स्वीकार तो किया लेकिन इस शर्त के साथ कि जैसे ही फ़ोन आएगा घर से , वो भाग लेंगे। उनकी ड्यूटी घर ताकने के लिए लगी थी।
दीप होटल में कोई चाय-पानी या बैठने का जुगाड़ नहीं था। इसके बाद कई जगह भटके। घंटा भर तो बैठने की जगह में भटकते रहे। आख़िर में किसी ने जगह सुझाई -चाय बार। पहुँचे तो चाय बार तो बंद था लेकिन बैठने के लिये ज़मीन में एक फुट ऊपर तक उगे पेड़ों के तने उपलब्ध थे। वहीं बैठकर मुलाक़ात हुई।
तमाम नई पुरानी यादें ताज़ा हुईं। अतुल ने फिर से लिखना शुरू करने का प्रण लिया। किताब फ़ाइनल करने का भी। इंजीनियर के अमेरिका जाकर किसान बन जाने की बात पर अतुल ने बताया कि सभी यही कहते हैं। इसी सिलसिले में बात चली कि कानपुर से कंप्यूटर की पढ़ाई करके सालों पहले कुवैत पहुँचे जीतेन्द्र चौधरी Jitendra Chaudhary आजकल घर, दफ़्तर या जहां बताओ वहाँ कैंडल लाइट डिनर की व्यवस्था का इंतज़ाम करने में लगे हैं आजकल।
बात देश दुनिया की भी हुई। अतुल ने बताया कि जब अमेरिका में बाढ़ में तबाही मची हुई थी तो वो दुनिया को चौड़े होकर बता रहे थे -‘सब कुछ ठीक है।’ बुश को क्या कहें अब तो वो रिटायर हो गये। आज भी हर जगह यही हाल है।
बातचीत के दौरान अनूप शुक्ला की उनके घर से पुकार लगी। वो फ़ोटो खिंचाकर फूट लिए। बाकी बचे तीन लोग मतलब अतुल , उनके जीजा जी और हमने वहीं एक चाय की गुमटी पर खड़े होकर चाय पी। फ़ोटो उसने फ्री ने खिंचवा दिये। मिल-मिलाकर हम लोग वापस लौट आये। तय हुआ कि अगले महीने की संभावित अमेरिका यात्रा के दौरान हम लोग फिर से मिलेंगे और अतुल हमको ‘क़ायदे से फ़िलेडेल्फ़िया घूमायेंगे’।
कल की मुलाक़ात में चीनी कितने चम्मच, कानपुर की घातक कथाएँ और मोहब्बत २४ कैरेट के लेखक मृदुल मृदुल कपिल को भी साथ होना था। लेकिन एन समय पर उनको दफ़्तर के काम से बाहर जाना पड़ा और वे आ न पाए। नौकरी जो न कराये।

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