Monday, February 26, 2024

पुस्तक मेले में मित्र - मुलाक़ात

 

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पुस्तक मेले में सबसे राजकमल प्रकाशन पर सबसे ज्यादा भीड़ थी। कई किताबें लेनी थी राजकमल प्रकाशन से। राजकमल प्रकाशन की 'पुस्तक मित्र योजना' से बहुत दिन किताबें मंगवाई। एक हजार रुपये की धरोहर राशि जमा करके सदस्य बने थे। साल में दो सौ रुपये की किताबें उपहार स्वरूप और किताबों पर 25 % डिस्काउंट । इधर काफी दिनों से पुस्तक मित्र योजना से किताबें मंगवाई नहीं। कई वर्षों उपहार राशि के बराबर भी किताबें मंगानी बाकी हैं।
राजकमल प्रकाशन के आनलाइन आर्डर में भुगतान व्यवस्था के पुराने अनुभव भी अच्छे नहीं रहे मेरे। कुछ वर्ष पहले 2000 रुपये का दो बार भुगतान हो गया। अभी उसका हिसाब बकाया है। अपन भी आलसी। लगता है कर लेंगे हिसाब भी। मंगा लेंगे किताबें। बात करने पर राजकमल के साथियों हमेशा डीटेल भेजने और किताबें भेजने की बात कही लेकिन हमारे आलस्य ने सबको धता बता दी।
पुस्तक मेले में घुमने के दौरान पता चला कि विनीत कुमार Vineet Kumar की किताब 'मीडिया का लोकतंत्र' आई है राजकमल प्रकाशन से। बहुत खोजी लेकिन मिली नहीं। पता चला अभी स्टाल पर आई नहीं है ! बाद में विमोचन हुआ किताब का लेकिन तब तक अपन लौट चुके थे मेले से।
राजकमल प्रकाशन में जब हम किताबें खोज , खरीद रहे थे उसी समय राजकमल प्रकाशन के लेखक मंच पर मैत्रेयी पुष्पा जी से बातचीत चल रही थी। बमुश्किल दस पन्द्रह लोग सामने बैठे सुन रहे थे। उससे कई लोग बातचीत से बेखबर, निर्लिप्त किताबें खरीद रहे थे। अगल-बगल से गुजर रहे थे। बातचीत के सवाल-जबाब भी ऐसे ही थे जो तमाम बार पढ़े-सुने जा चुके थे। अपन भी कुछ देर टहलते हुए घुमने लगे।
मेले में घूमते हुए सैफ से मुलाक़ात हुई। Saif Aslam Khan सैफ शाहजहांपुर से हैं। सैफ़ देश के जाने माने Illustrator, कार्टूनिस्ट और डूडल आर्टिस्ट हैं। मेरे शाहजहाँपुर से स्थानान्तरण पर उन्होंने जो स्केच बनाया था वह मेरे घर के ड्राइंग रूम में लगा है। शाहजहांपुर की कैंट की बेंच नंबर सात उनकी पसंदीदा बेंच हैं। इससे जुडी तमाम यादें वे साझा करते रहते हैं। अब तो सैफ और बेंच नम्बर सात का रिश्ता इस कदर अटूट हो चुका है कि सैफ का पता ही बेंच नंबर सात हो गया है।
सैफ और हम लोग मेले में टहल रहे थे तो एक स्टाल पर सैफ को सुधीर विद्यार्थी Sudhir Vidyarthi जी दिखे। भारतीय क्रान्तिकारियो के बारे में जितना लेखन और क्रान्तिकारियो को प्रतिष्ठा दिलाने का जितना काम सुधीर विद्यार्थी जी ने किया है उतना शायद ही किसी और लेखक ने किया हो। क्रान्तिकारियो से जुड़े अनेक संस्मरणों की किताबें है उनकी। बरेली से जुड़े संस्मरणों की उनकी किताब 'शहर आइना है' बहुत दिनों से लेने की सोच रहे थे। सुधीर विद्यार्थी जी जिस स्टाल पर थे वहां उनकी कई किताबें थी। हमने उनकी किताबें खरीदी। उनके आटोग्राफ भी लिए।
साथ में असगर वजाहत की किताब 'उम्र भर सफ़र में रहा' भी ली। असगर वजाहत जी खूब घूमें हैं और खूब किस्से लिखे हैं घुमक्कड़ी के। हफ्ते भर पहले संगत में अंजुम शर्मा से हुई बातचीत में इब्बार रब्बी जी ने असगर वजाहत जी की इस घुमक्कड़ी का जिक्र करते हुए कहा -'मुझे इस मामले में (घुमक्कड़ी) असगर वजाहत से जलन होती है।'
अपन को जलन तो नहीं अलबत्ता मन करता है कि असगर वजाहत जी Asghar Wajahat की तरह खूब घूमूं और उसके बारे में लिखूं। उम्मीद है कि जल्द ही घुमने और लिखने का सिलसिला शुरू होगा।
#पुस्तकमेला2024-8

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Friday, February 23, 2024

भाषा में नहीं- प्रेम, स्त्री अस्मिता और समाज में स्त्रियों की स्थिति की कवितायें


भावना प्रकाशन से निकलने के बाद सेतु प्रकाशन गए। हमने पुस्तक मेले में जाने से पहले मोटा-मोटी कई किताबों की लिस्ट बनाई थी दिमाग में । इनको खरीदना है। उनमे से कुछ याद रहा , बहुत कुछ छूट गया।
सेतु प्रकाशन पर किताबें लेते हुए याद आया कि सपना भट्ट की कविता की किताब 'भाषा में नहीं' लेनी है। किताब लेने के बाद लगा कि किताब के साथ फोटो भी खिंचानी चाहिए। भुगतान करने के बाद काउंटर पर बैठे सज्जन से फोटो खींचने के लिए कहा। किताब सामने सटाकर फोटो खिंचाई। बाहर आकर स्टाल के फोटो भी लिए।
सपना भट्ट से करीब आठ साल पहले से परिचय है। फेसबुक के माध्यम से। उनकी कवितायें पढ़कर तारीफ़ करते थे। लगता था कि ये भी फेसबुकिया अंदाज में कवितायें 'बनाती' हैं। वैसे भी कविता के बारे में अपन की समझ ऐसी-वैसी ही है। कविताओं के यादगार अंश व्यंग्य लेखों के पञ्च वाक्यों सरीखे लगते हैं। कविताओं के याद रह जाने वाले अंश/विम्ब पढ़कर लगता है कि क्या बिम्ब है। क्या सोच है। यह हमको क्यों नहीं सूझता।
बाद में सपना भट्ट की कविताओं की ख्यात नाम लोगों ने तारीफ़ की तो उनकी कविताओं के कद का उंचा हो गया। लगा कि ये तो ऊँची वाली कवितायें लिखती हैं। फिर उनका कविता संग्रह आया - 'चुप्पियों में आलाप।' तो उनकी कविताओं के बारे में राय और उम्दा हो गयी। वो बात अलग कि उनका पहला कविता संग्रह लेने का विचार आजकल करते-करते रह गया। जब दूसरा कविता संग्रह खरीदा तब याद आया कि पहला तो लेना बाकी है। ध्यान भी नहीं आया कि किस प्रकाशन से आया था। लिहाजा बाद में कल आनलाइन खरीदा। २६ फरवरी को आयेगा।
सपना भट्ट की कविताओं पर तो कोई कविता का जानकार ही ठीक से लिख सकता है। अपन तो बस ऐसे ही कुछ कह सकते हैं। प्रेम, स्त्री अस्मिता और समाज में स्त्रियों की स्थिति उनकी कविता के प्रमुख विषय हैं। लगभग हर कविता में कोई न कोई अंश ऐसा है जिसे उद्धरित किया जा सकता है लेकिन केवल अंश उद्धरित करने से कविता पूरी नहीं होती। कविता 'किसकी याद आती है' का अंश है :
" चूल्हे की याद आती है
दाल सिझाने, भात पसाने के वक्त
किताब पढ़ते हुए हाथ जला जला लेने की याद आती है
खेतों की याद आती है
धान रोपने फसल काटने की याद आती है
सत्रहवें बरस
उस लडके की दी हुई चिट्ठियों की याद आती है
फिर बरबस बहुत सी गालियों की याद आती है
उस फ़ौजी की याद आती है
जिससे व्याह के लिए इनकार कर दिया मां ने
अपनी जात और कुल मर्यादा की खातिर"
जीवन से जुडी तमाम यादों का जिक्र करते हुए जो सपना कविता के अंत में वह बात लिखती हैं जिसको कहने के लिए ही शायद यादों का ताना-बाना बुना गया था :
"मुझे मेरे डोले से लगकर रोती-बिलखती
मुझ पर खील दाल चावल वारती
मूर्छित होती अपनी माँ की याद नहीं आती
पितृ सत्ता के स्त्री रूप की याद आती है...."
स्त्री को देवी बताकर उनके साथ होते अन्याओ के खिलाफ अपनी बात कहते हुए सपना लिखती हैं:
"देखना !
हम सब औरतें एक दिन देवालयों में देवियों की उपाधि ठुकराकर
युगों से पथराई प्रतिमाओं से बाहर निकल आयेंगी
हम देवत्व की नहीं मनुष्य की संज्ञा के लिए लड़ेंगी।"
मां और पापा को समर्पित कविता संग्रह की कई कविताओं में माँ- पिता मौजूद हैं । वे लिखती हैं :
"मैंने दुःख नहीं कहे पिता से विवाह के बाद
पिता ने ही निरखकर
एक दिन मुझसे कहा
कि बेटियों के अकले रोने
और गुमसुम रहने से पिताओं की उम्र कम होती है।
और सच में
पिता उम्र से बहुत पहले चले गए
मैं क्या करती !
रोने और गुमसुम रहने कब किसका जोर चलता है ..."
माँ को याद करते हुए लिखी कविता में सपना लिखती हैं :
"मायके जाने पर
देखती हूँ तुम्हारी बिस्तर
जिस पर पहले आयोडेक्स और गाढे तेल की
महक वाला तकिया हुआ करता था
अब उस पर करीने से चादर बिछी रहती है
मेरी आँखे धुंधला गयी हैं या
तुम ही दीवार पर लगी तस्वीर में नहीं हो अपनी
तुम्हारे मोटे कांच
और सुनहरी कमानी वाला
चश्मा भी तो कहीं नहीं मिलता
कितना चिल्लाती थी हम पर
आओ फिर से बरज दो
चौके में चली आयी हूँ चप्पलें पहनकर "
माँ को याद करते हुए आगे लिखती हैं:
"एक मजे की बात बताऊँ
तुम्हारी परम घसियारिन सहेली
गीता आंटी के नकली दांतों का सेट
हँसते ही जब तब बाहर आ गिरता है
तुम देखती तो कितना हंसती
वहां कौन है तुम्हारी सहेली
किससे चिढती हो!
किसे देती हो पहाडी गालियाँ
किसे अपने उबाऊ न भजन सुनाती हो "
तुम दो बरस बाद जाती
तो देख पाती
कितनी सुन्दर कविताएँ लिखने लगी है मेरी बेटी तुम पर"
संग्रह की कविताएँ तीन भागों में संकलित हैं-'थोड़ी सी उम्मीद', 'निर्जन पगडंडियों से गुजरते हुए' और 'मैं अनगिनत दिशाओं से'। समकालीन रचनाकारों स्वदेश दीपक और अनीता वर्मा को याद करते हुए लिखी कविताएँ इन रचनाकारों से सपना के आत्मीय जुड़ाव बताती हैं।
रचनाकारों से जुड़ाव का बात पसंदीदा किताबो तक जाता है। मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास 'कसप' सपना भट्ट का पसंदीदा उपन्यास है। उपन्यास के नायक के लिए इस्तेमाल शब्द 'लाटा' उनकी माँ पर लिखी कविता में इस तरह आता है:
"इतना तरस गयी हूँ तुम्हारी आवाज को
कि दायें मकान वाली सुमन फूफू से कहती कि मुझे
लाटी कहकर पुकारा करें "
कविता संग्रह में प्रेम से जुड़े अनेक मनोहारी, आत्मीय, मार्मिक बिम्ब हैं। 'तुम्हारी और आ रही हूँ' कविता का अंश है :
"प्यार मेरे
ऐसी कौन दिशा है जो तुम तक नहीं जाती ?
मेरा लजीला मुख आज
तुम्हारे चमकीले सूर्य के उजास से प्रकाशित है
मैं अनगिनत दिशाओं से तुम्हारी और आ रही हूँ"
'मन की एकलौती कामना' कविता में आशा भरा इंतजार है। कामना के पूरा होने का विश्वास कितना पक्का है :
"एक सदी में एक बार आने वाला वह क्षण
निमिष भर को जब ठिठकेगा कंठ में तुम्हारे
तभी तुम्हारे होंठो पर धर दूंगी
अपने तरसे हुये मन की एक्लौती कामना
सगरी देह को कान बनाकर सुनूंगी
तुम्हारी आवाज में मनचीता स्वीकार
कि सुन पगली
प्यार करता हूँ तुझसे !"
कविता संकलन पलटते हुये पहले पृष्ठ की सूचना भी पढी जो इस प्रकार है:
"इस पुस्तक की बिक्री से प्राप्त राशि का 0.5% "बालिका शिक्षा अनुदान कोष" में जायेगा। किताब के दाम 275 रुपये हैं। मतलब एक रुपया कुछ पैसे एक किताब की बिक्री पर "बालिका शिक्षा अनुदान कोष" में जायेगा। आन लाइन किताब की खरीद का लिंक टिप्पणी बक्से में दिया है।
एक साधारण पाठक की निगाह से सपना भट्ट की कवितायें पढना खुशनुमा अनुभव रहा। सपना भट्ट को उनके कविता संंकलन के लिये बधाई। शुभकामनाये।
पुस्तक का नाम: भाषा में नहीं
रचयिता: सपना भट्ट Sapna Bhatt
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन
पृष्ठ : 167
कीमत : रुपये 275
आनलाइन खरीद का लिंक:टिप्पणी बक्से मे

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Tuesday, February 20, 2024

पुस्तक मेले की यादों की धमकी और भावना प्रकाशन



पुस्तक मेले में दो दिन के कुल जमा कुछ घण्टे रहे। तमाम यादें इकट्ठा हुईं। कुछ लिख गईं बहुत बाकी हैं। बची हुई यादें रोज हल्ला मचाती हैं। कहती हैं हम पर भी लिखो न। कुछ तो हड़काती हैं -'लिखो हम पर नहीं तो मानहानि का मुकदमा कर दूंगी। बताए दे रहें। सच्ची।'
पहले दिन की कुछ बातें साझा की। जो किताबें ले गए थे साथ उनको घर में पलट के देखा और रख दिया बगल में, आराम से पढ़ने के लिए। ऐसी तमाम किताबें अपने पढ़े जाने का इंतजार कर रही हैं।
इस बीच पहले दिन की सबसे पहले विमोचन की फोटो कल भेजी लालित्य ललित जी ने। फोटो देखकर एक बार फिर से मन मेले में पहुंच गया। बिना टिकट। हमने डांटा मन को -'अबे, इत्ती सुबह कहाँ खुलता है मेला। अब तो खत्म भी हो गया।'
मन बेचारा मन मानकर वापस लौट आया और पुरानी यादों के साथ खेलने लगा।
अगले दिन मेट्रो से गये मेले। चालीस रुपये एक तरफ का किराया।
इस बार हाल नम्बर पांच से घूमना शुरू किया। हाल नम्बर पांच में अंग्रेजी की दुकानें थीं। यहां चकाचक सेल्सपर्सन भी दिखे दुकानों में-' में आई हेल्प यू घराने के।' जबकि अधिकांश हिंदी स्टालों में प्रकाशक खुद मौजूद थे -'पीर ,बाबरची, भिस्ती, खर की भूमिका निभाते हुए।'
एक कोने में बने लेख मंच में किसी किताब पर अंग्रेजी में बात भी हो रही थी। हमने खड़े होकर कुछ देर सुना और फिर चल दिये। आगे के मोर्चे हमको आवाज दे रहे थे।
ये जो आगे में मोर्चे आवाज देने वाली बात लिखी हमने वो हमने पहली बार और आखिरी बार भी कानपुर के भगवती प्रसाद दीक्षित'घोड़े वाले'के मुंह से सुनी थी। दीक्षित जी जब चुनाव लड़ते तो घोड़े पर चढ़ते हुए आते। कुछ देर भाषण देते और फिर चल देते कहते हुए -'आगे के मोर्चे हमें आवाज दे रहे हैं।'
दीक्षित जी से आखिरी बार उनके घर के नीचे मिला था तो उन्होंने सुनाया था:
'चलो न मिटते पदचिन्हों पर,
अपने रास्ते आप बनाओ।'
(पोस्ट का लिंक टिप्पणी बॉक्स में)
आगे बढ़ने पर दूसरे हाल दिखे। सब हाल आपस में मिले हुए थे। एक जगह बच्चों के कुछ कार्यक्रम हो रहे थे। बच्चों से कुछ कलाकृतियां बनवाई जा रही थी। फ़ोटो हो रहीं थीं बच्चों के माता पिता अपने नौनिहालों के कौतुक करतब देखते हुए निहाल हो रहे थे। हम भी थोड़ी देर निहाल हुए और आगे बढ़ गए।
आगे बढ़ते हुए हम हाल नम्बर 2 में आ गए जहां से हिंदी किताबों के स्टॉल का सिलसिला शुरू हुआ। पहली दुकान मिली भावना प्रकाशन। भावना प्रकाशन से तमाम साथी व्यंग्यकारों की किताबें आई हैं। सुभाष चन्दर Subhash Chander जी का हिंदी व्यंग्य का उपन्यास और दीगर किताबें वहां सामने नोटिस बोर्ड की तरह लगी थीं। दुकान के अंदर जाकर किताबें देखने लगे।
किताबें देखने में मशगूल हुए ऐसा कि पीछे से आई हुई अर्चना चतुर्वेदी की कई आवाजें नहीं सुनाई दी। बाद में जो आवाज सुनाई दी वो थी -'कट्टा कानपुरी।' अर्चना चतुर्वेदी ने बताया इसके पहले वो हमको हमारे नाम से आवाजिया चुकी थीं जिनको हमने सुना नहीं था। इससे पता चलता है कि असल नाम के मुकाबले तखल्लुस वाले नाम की धमक ज्यादा होती है।
अर्चना चतुर्वेदी की किताब 'घूरे का हंस' एक दिन पहले विमोचित हुई हुई थी। उनकी और किताबें भी वहां मौजूद थीं। उन पर हम पहले ही पैसे खर्च कर चुके थे। लिहाजा ताजी किताब 'घूरे का हंस' उठाई और अर्चना जी के साथ फोटो खिंचाई। व्यंग्यकार, मीमकार सौरभ जैन (डॉ सौरभ जैन ) भी साथ ही थे। किताब में लेखिका के आटोग्राफ भी ले लिए।
इस बीच टहलते हुए बगल की स्टाल के प्रकाशक भी वहां आ गए। अर्चना ने उनसे मजे लेते हुए कहा -'हम तो आपके यहाँ से किताब छपवाने की सोच रहे थे लेकिन आप पैसे मांग रहे थे इसलिए नहीं छपवाई।'
प्रकाशक जी कुछ बोले नहीं। अर्चना जी से और इधर-उधर की बातें हुईं तमाम सारी फिर वो मेला घूमने निकल लीं सौरभ के साथ। हम फिर घुस गए दुकान में।
भावना प्रकाशन से कई किताबें लीं। उनमें सुभाष चन्दर जी द्वारा संपादित हास्य कहानियों का संकलन भी था। अच्छा संकलन लगा देखने में। यह लिखते हुए सुभाष जी के हास्य बोध के बारे में बड़ा खुराफाती जुमला आया दिमाग में। टाइप भी हो गया। लेकिन हमने उसको डपट के भगा दिया। कहते हुए-'नेपथ्य में रह बे। सुभाष जी बुरा मान गए तो निकाल बाहर करेंगे हिंदी व्यंग्य के इतिहास से। एक पैरा जो लिखा है हमारे बारे में वो हटा के नया संकलन छपा देंगे।
खुराफाती जुमला बेचारा मन मार कर बैठ गया। बैठा है। लेकिन कभी न कभी तो मुंह उठाएगा ही।
इस बीच भावना प्रकाशन के नीरज जी ने मेरे लेखन की तारीफ भी कर दी। कहा -'आपका लेखन रोचक है।' इसी तरह की कुछ और भी बातें जो किसी भी लेखक को झांसे में डाल सकती हैं। कुछ लेखक तो इस तरह की बातों को दिल पर ले लेते हैं और तबियत भी खराब कर लेते हैं। लेकिन अपन ने खुद को संभालते हुए इधर-उधर की बातें करनी शुरू कर दीं।
भावना प्रकाशन पर मुस्ताक अहमद यूसुफी जी किताब दिखाई दी। शीर्षक है -'पापबीती।' पता चला कि पहले लफ्ज प्रकाशन से ' धनयात्रा' नाम से आई किताब ही दूसरे अनुवादक ने नए नाम से छापी है। खूबसूरत छपाई और बेहतरीन अनुवाद। अनुवाद की खूबी यह कि इसमें जगह-जगह टिप्पणियों के माध्यम से लेखन में आये सन्दर्भो के बारे में विस्तार से बताया गया था। इसके अनुवादक डॉ आफताब अहमद फिलहाल कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयार्क से संबद्ध हैं।
बाद में पता चला कि किताब के प्रकाशक कानपुर के ही हैं। प्रकाशक से बतियाये भी। तारीफ भी की। प्रकाशक भी खुश हो गए। तारीफ से हर कोई खुश हो जाता है।।
पापबीती के साथ ही युसूफ़ी साहब की 'आब-ए-गुम' भी खरीदी। यह किताब लफ्ज़ प्रकाशन से आ चुकी है-' खोया पानी' नाम से।
युसूफ़ी साहब की दोनों किताबें हासिल-ए-पुस्तकमेला लगा।
मुझे युसूफ़ी साहब की किताबें लपककर लेते हुए देखकर नीरज जी ने कहा -'तमाम व्यंग्यकारों को तो युसूफ़ी साहब के लेखन के बारे में पता ही नहीं।'
हमारा कहने का मन हुआ कि व्यंग्यकार को पता हो जाएगा तो लिख कैसे पायेगा? लेकिन फिर कहा नहीं। क्या पता कौन बुरा मान जाए।
लेकिन यह बात तो कहनी पड़ेगी की भावना प्रकाशन वाले नीरज जी बड़े खतरनाक किताब वाले हैं।अपनी स्टाल पर मौजूद किताबों के बारे में बताते-बताते कई किताबें खरीदवा दीं।
भावना प्रकाशन से निकलकर पुस्तक मेले में और दुकानों की तरफ बढ़े।

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Saturday, February 17, 2024

बहुवचन प्रतिभाओं की संगत में

 



पुस्तक मेले में कई मित्रों की पुस्तके थीं। उनके विमोचन हो रहे थे। उन पर बातचीत हो रही थी। पुस्तक मेले में ऐसे तमाम रचनाकार उपस्थित थे जिनकी रचनाएं पुस्तकों के रूप में मौजद थीं। ये रचनाकार कम चर्चित भले हों लेकिन अपने लोगों के बीच उनकी अहमियत और पहचान तो है ही। अपने इन रचनाकार मित्रों के बारे में सोचते हमको पंकज चतुर्वेदी Pankaj Chaturvedi जी की बात याद आती है:
"आज का समय बहुवचन प्रतिभाओं का समय है। प्रतिभाएं विराट भले न हों , लेकिन हैं और बहुतायत में हैं।"
ऐसी बहुवचन प्रतिभाओं की संगत में उनकी रचनाओं से रूबरू होते हुए पुस्तक मेले का आनंद लिया गया।
पुस्तक मेले में विमोचनबाजी का सिलसिला शुरू होते ही सामने से भाई प्रमोद Pramod Kumar से मुलाक़ात हुई। लगभग आठ साल पहले प्रमोद जी से मंडी हाउस में पहली मुलाक़ात हुई थी। उस मुलाक़ात का जिक्र करते हुए लिखा था (लिंक टिप्पणी में ):
"....वहां प्रमोद कुमार जी भी आ गये। प्रमोद जी से भी पहली मुलाकात थी। आलोक जी Alok Puranik के पुराने मुरीद और पाठक। दस साल पुराने ’गुप्त पाठक’ से मिलकर आलोक जी भी खुश हो गये। हमारे मामा नदन जी कई कवितायें प्रमोद जी को याद हैं और वे उन्होंने जिस तरह वहां दोहराई उससे लगा कि कितने गहरे साहित्य प्रेमी हैं प्रमोदजी। फ़तेहपुर, कानपुर की कितनी यादे हैं उनके। ऐसे प्रेमी पाठक मित्र से मिलकर मन खुश हो जाना सहज बात है। इस चक्कर में आलोक जी विदा लेने के बाद फ़िर रुक गये कुछ देर के लिये।"
प्रमोद जी अपनी फेसबुक वाल पर नियमित रूप से बेहतरीन शेर साझा करते हैं। आज उन्होंने बशीर बद्र का ये शेर साझा किया है:
भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियां वही फासले !
न कभी हमारे कदम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई !!
बशीर बद्र के शेर के उलट हमारी जब मुलाक़ात हुई तो लपक कर हाथ मिलाते हुए प्रमोद जी ने कन्हैयालाल नंदन जी कविता सुनानी शुरू की जिसे हमने भी साथ दोहराया। चुनाव शीर्षक यह कविता नंदन जी अक्सर मंचो पर सुनाया करते थे:
"पहाड़ी के चारों तरफ
जतन से बिछाई हुई सुरंगों पर
जब लगा दिया गया हो पलीता
तो शिखर पर तनहा चढ़ते हुए इंसान को
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि वह हारा या जीता।
उसे पता है कि
वह भागेगा तब भी
टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा
और अविचल होने पर भी
तिनके की तरह बिखर जायेगा
उसे करना होता है
सिर्फ चुनाव
कि वह अविचल खड़ा होकर बिखर जाये
या शिखर पर चढ़ते-चढ़ते बिखरे-
टुकड़े-टुकड़े हो जाये।"
नंदन जी की याद आई तो यह भी याद आया कि वे बाद के दिनों में ईश्वर से अपना उलाहना देते हुए पढ़ते थे :
सब पी गए , पूजा नमाज बोल प्यार के,
ज़रा नखरे तो देखिये,परवरदिगार के।
प्रमोद जी से थोड़ी देर बातचीत के बाद वो मेला देखने निकल लिए । अपन भी इधर - उधर विमोचनबाजी में व्यस्त हो गए।
थोड़ी देर बाद प्रभात गोस्वामी जी Prabhat Goswami और फारुख अफ़रीदी जी Farooq Afridy Jaipur स्टाल पर आये। जयपुर से सुबह चलकर मेले में पहुंचते-पहुंचते शाम सी हो गई थी। प्रभात जी और फारुख जी की किताबें भी न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन पर मौजूद थीं। उनका भी विमोचन हुआ । शाम को मैंने फोन किया तो दोनों जयपुर के रास्ते पर थे।
न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन पर तमाम व्यंग्यकारों की चयनित व्यंग्य रचनाएं मौजूद थीं। सबके कवर पेज लेखक की फोटो को छोड़कर एक जैसे थे। अनुशासित जैसे कवर पेज। आजकल अधिकतर व्यंग्य लेख एक जैसे लगते हैं तो कवरपेज एक जैसे लगना सहज सा है।
मेले में ज्योति त्रिपाठी से भी मुलाकात हुई। करीब दस साल की फेसबकिया मित्रता के बाद पहली मुलाक़ात। कभी ज्योति हमारे लेखन को बहुत पसंद करतीं थी। एक बार टिप्पणी करते हुए लिखा -' आपकी पोस्ट पढ़ते हुए समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला।'
ज्योति अपने आसपास के जीवन के बारे में कवितायें लिखती हैं। कविताओं में स्त्री विषयक मसलों पर अपनी राय व्यक्त करती हैं। उनकी कविताओं का बड़ा पाठक वर्ग है। कविताओं के साथ ज्योति ने कई धारावाहिक उपन्यास भी अपनी फेसबुक वाल पर पोस्ट करते हुए लिखे हैं। इन उपन्यासों में जनता की राय का ख्याल रखते हुए भी पात्रों के साथ ट्रीटमेंट किया गया है। इनमे से एक उपन्यास 'रुप्पू' प्रकाशित भी हुआ है। यह उपन्यास जब छपा था तब मैंने इसे खरीद कर इस पर अपनी टिप्पणी भी लिखी थी। मेले में ज्योति से मुलाक़ात होने पर अगले दिन यह उपन्यास फिर से खरीदा गया और लेखिका के आटोग्राफ लिए गए।
ज्योति के साथ उनके चाचा कमलाकर मिश्र जी भी थे। पता चला उन्होंने भी एक उपन्यास लिखा है जो कि उनके खुद के अदालती अनुभवों पर आधारित है -'पिताजी और तारीख।' पता चलने पर हमने हिन्द युग्म स्टाल पर उनके साथ जाकर किताब खरीदी और कमलाकर जी के आटोग्राफ लिए। इसके बाद सबने साथ में मिलकर चाय पी।
मेले में पता चला अनूप मणि त्रिपाठी Anoop Mani Tripathi भी मौजूद थे अपनी नई किताब के साथ। साथ में 'जे बिनु काज दाहिने बाएं' संतोष त्रिवेदी भी थे। संतोष त्रिवेदी ने इस बार व्यंग्य पर एहसान करते हुए इस बार कोई किताब नहीं छपवाई ।
अनूपमणि त्रिपाठी के स्टाल पर उनकी किताब के साथ फोटो खिंचाया और किताब खरीदी भी। अनूप मणि की यह तीसरी किताब है। पहली दो किताबों हमने खरीदकर पढी भी हैं लेकिन उनके बारे में लिखना अभी तक उधार है। इस किताब से एक और उधर चढ़ गया।सब चुकाया जाएगा आहिस्ते-आहिस्ते।
अनूप मणि के साथ राजीव तनेजा जी से भी मुलाक़ात हुई । राजीव तनेजा आजकल नियमित रूप से किताबें पढ़कर उनके बारे में नियमित रूप से लिखते हैं। ऐसा काम जो कम लोग करते हैं। बल्कि बहूत कम लोग करते हैं।
लौटते हुए पंकज सुबीर और मनीषा कुलश्रेष्ठ जी से शिवना प्रकाशन पर मुलाक़ात हुई। कुछ दिन पहले मनीषा जी की संगत में हुई बातचीत की तारीफ़ की शुरुआत करते कुछ और तारीफ़ की। पंकज सुबीर जी ने भी तारीफ़ में कुछ और जोड़ा। इसके बाद हम पंकज सुबीर जी से अगले दिन आने के लिए कहकर चले आये। बगल की दूकान पर नीरज शर्मा Neeraj Sharma और डा शर्मा मौजूद थे। उनको भी अगले दिन आने की बात कहकर निकल लिए।
पुस्तक मेले Abhishek Awasthi से भी मुलाक़ात हुई। अभिषेक की मृगया के बाद दूसरी किताब आनी है। किताब तो सौरभ जैन सौरभ जैन की भी आनी है दूसरी। अभिषेक और सौरभ दोनों इस मामले में लखनउवा अंदाज में पहले आप , पहले आप कहते पाए गए। सौरभ इस बीच डाक्टर भी हो गये हैं पीएचडी वाले। सौरभ के बनाये मीम के जलवे दैनिक भास्कर में दिखते रहते हैं।
जब हम न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन पर थे तो वहीं कनपुरिया पत्रकार , रचनाकार संजीव मिश्र Sanjiv Mishra भी आये। मिलते ही हमारे नामराशि अनूप शुक्ला Anoop Shukla के हिस्से की तारीफ़े हमारे लिए करनी शुरू की। हमने बताया कि हम वो वाले अनूप नहीं हैं तो उन्होंने कुछ कम करके नये सिरे से हमारे लेखन की तारीफ़ की। नामराशि मित्रों के साथ का यह फ़ायदा तो होता है कि तारीफ़ मुफ़्त में मिल जाती है।
संजीव मिश्र जी ने हाल में कानपुर के चर्चित माफिया विकास दुबे पर किताब लिखी है -बवाली कनपुरिया। इसमें विकास दुबे के अपराध जगह में प्रवेश करने से शुरू करके उसके दबदबा बनने और मारे जाने की विस्तार से चर्चा है। पठनीयता ग़ज़ब की है। किताब के बारे में अलग से। किताब पेंगुइन बुक स्टाल पर मौजूद थी। हमने स्टाल पर जाकर किताब ली और संजीव जी के ऑटोग्राफ़ भी लिए।
पुस्तक मेले में हमारे आने की सूचना पाकर हमारे कालेज के मित्र विनोद अग्रवाल जी Vinod Kumar Agrawal भी आये मिलने। उस समय तक मेले के टिकट मिलने बंद हो गए थे। हमने जब सबेरे आनलाइन टिकट खरीदा था तो रास्ते में किसी ने चेक नहीं किया था। विनोद भाई ने जब बताया कि टिकट मिला नहीं है तो अपने ने अपना टिकट व्हाट्सेप से उनको भेज दिया। हमको आशा नहीं थी कि उनको उस पर आने को मिलेगा लेकिन कुछ देर बाद वे हमारे स्टाल पर मौजूद थे। हमारे साथ काफी देर रहे। तमाम पुरानी यादें साझा की गईं। लौटते में घर तक छोड़ने भी आये।

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