Wednesday, July 23, 2025

बारिशों में पतंगे उड़ाया करो


 कालोनी के गेट के बाहर ही एक आदमी सड़क पर ' देशी कमोड पर दिव्य निपटान' मुद्रा में बैठा अपने मोबाइल को शीशे की तरह देखता बैठा था। पास से देखने पर लगा किसी को हड़काते हुए कुछ कह रहा था। पता दूसरी तरफ़ कौन था लेकिन मुझे लगा क्या पता अमेरिका के राष्ट्रपति को हड़का रहा हो -"दो दिन हुए हमारे यहाँ उप राष्ट्रपति जी के इस्तीफ़े को, अभी तक तुम्हारा ट्वीट नहीं आया। क्यों नहीं किया अभी तक ट्वीट -'हमारे कहने पर हुआ इस्तीफ़ा।'"

इस पर शायद उधर से जबाब आया होगा -"भाई साहब, हमको हमारी हथियार लॉबी ने लड़ाई करवाने, रुकवाने के ट्वीट करने के लिए ही अधिकृत किया हैं। और कुछ करेंगे तो वे लोग नाराज हो जायेंगे।"
हम भाई साहब को वहीं बैठा छोड़कर आगे बढ़ गए। उपराष्ट्रपति जी के इस्तीफ़े पर इतने अधिक बयान आ चुके हैं सचाई पता करना मुश्किल है। लेकिन हर बयान महाभारत काल में धौम्य ऋषि द्वारा पाण्डवों को अज्ञातवास के पूर्व आशीर्वाद एवं उपदेश से जुड़ी है:
"राजसेवक कितना ही विश्वस्त क्यों न हो ,कितने ही अधिकार उसे क्यों न प्राप्त हों,उसको चाहिये कि सदा पदच्युत होने के लिये तैयार रहे और दरवाजे की ओर देखता रहे। राजाओं पर भरोसा करना नासमझी है।"
हर कालोनी में काम करने वाले जाते दिखे। कारखानों में जिस तरह कभी कामगार जाते दिखते थे उसी तरह आजकल कालोनियों में घरों में काम करने वाले जाते दिखते हैं। कारख़ाने भले न नए खुल रहे हों लेकिन कालोनियाँ तो आबाद हो रही हैं।
एक कालोनी का पार्क दिखा तो हम घुस गए उसमें टहलने के लिए। टहलने वाले कुछ लोगों ने जय श्री राम कहते हुए बाक़ी के साथियों से विदा ली। टहलते हुए एक बुजुर्ग ने, जिन्होंने घुटने पर बैंड पहन रखा था और थोड़ा तकलीफ़ के साथ टहल रहे थे, अपने साथ टहलने वाले से बताया -"आज हमने कुछ शेयर जो प्रॉफिट में थे, उनको बेच दिया। इसके बाद कुछ लाल निशान वाले शेयर खरीद लिए।" साथ वाले ने कुछ शेयर खरीदने के बारे में राय मांगी। बुजुर्ग ने कहा -"हम तुमको एक लिंक भेंजेंगे। उसको देखकर स्टडी करना, फिर ख़रीदना।"
पार्क का एक चक्कर लगाकर हम बाहर आ गए। दूसरे मोहल्ले के पार्क में पाँच सौ कदम टहल के आना मुझे 'सर्जिकल टहलाई' सरीखा लगा। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि हमको रोक सके।
लौटते हुए तिराहे की फुटपाथ पर एक आदमी बासी रोटी रखता दिखा। एक-एक करके चार रोटी उसने फुटपाथ पर रखी। उसको खाने के लिए गाय, कुत्ते या कबूतर कोई नहीं था वहाँ। शायद बाद में आयें खाने।
बासी रोटी से हमको याद आया कि मीना कुमारी को बासी रोटी खाना पसंद था । मीना कुमारी के बारे में और कुछ सोचते तब तक सामने फुटपाथ पर भरतपुर से आया प्रवासी दिख गया। गर्मी से बचने के लिए वह पंखा झल रहा था। उसको पंखा डुलाते देखकर हमको महाकवि भूषण जी की पंक्ति याद आयीं :
"तीन बेर खाती थी वे, तीन बेर खाती हैं।
विजन डुलाती थी वे, विजन डुलाती हैं।"
(पहले जो रानियाँ बड़े महलों में रहती थीं और दिन में तीन बार भोजन करती थीं, वे अब जंगल में तीन बेर खाकर दिन काट रही हैं , जिन पर पंखे झले जाते थे, वे विजन (जन विहीन विजन मने जंगल) में डुलाती मतलब डोलती फिरती हैं ।)
अकेले पंखा डुलाते देखकर हमने परिवार के बारे में पूछा। बताया बनवारी ने -"वो लोग सेक्टर 24 में चले गए। वहाँ हमारे गाँव के और लोग हैं। उनके साथ है परिवार।" काम के बारे में बताया -"बरसात में कोई काम मिल नहीं रहा। गाड़ियाँ एकाध बिक जाती हैं बस।"
बगल के लोगों से लड़ाई होती थी बनवारी के परिवार के लोगों की। उनमें कोई नहीं दिखा। हमने पूछा तो बताया बनवारी ने -"हमने उनको भगा दिया।"
हमने बनवारी का फोटो लिया तो बदले में उसने पूछा -"रक्षाबंधन कब है?" हमने बताया -"9 अगस्त को है।" बातचीत से लगा कि राखी बेचने का प्लान है बनवारी का।
बारिश में बाजार में किसी शेड के नीचे जाकर बैठ जाते हैं, सामान यहीं पालीथीन से ढँका रहता है। इतनी असुरक्षित जिंदगी जीने के बावजूद उसके चेहरे पर कोई चिंता का भाव नहीं दिख रहा था। या शायद हमको ही ऐसा लगता हो। तमाम बातें हम अपने पूर्वाग्रह के हिसाब से समझते हैं।
मोड़ के बाद फिर एक पार्क दिखा। हम उसमें भी टहल लिए। एक जगह चाँदनी के पेड़ से सफेद फूल ज़मीन पर पड़े हुए थे। टहलने वाले लोग उनको रौंदते हुए टहले होने। सफेद फूलों की चटनी सी बनी हुई थी टहलने के रास्ते में। रौंदे हुए फूलों को देखकर मुझे गाजा, सीरिया में मारे जाते लोगों की याद आयी। वे भी ऐसे ही रौंदे जा रहे होंगे।
चाँदनी के फूलों से Gyandutt जी की याद आयी। पिछले तीन दिनों से वे जो भी पेड़ देखते हैं उनमें से एक बारे में लिखते हैं। मैंने उनको फ़ोन करके बात की। आज के पेड़ के बारे में पूछा। और बातें हुईं। ज्ञान जी ने अपने घर के पास से गुजरने वाली रेलगाड़ियां देखने के लिए मचान भी बनाया था। पता चला बारिश में तहा के रख दिया। डुओलिंगों से फ्रेंच सीख रहे थे वह भी स्थगित है आजकल। अब फिर शुरू करेंगे। ज्ञान जी ने ब्लागिंग के दिनों से जितने काम करने के बारे में सोचे हैं उतने शायद फलाने जी ने भी नहीं सोचे होंगे। लेकिन अच्छी बात यह कि ज्ञान जी ने अपने किसी इरादे पर अमल नहीं किया सिवाय मचान पर चढ़ने के। उस पर से भी उतर आए। कई किताबों भर की लिखाई करने के बावजूद अभी तक ज्ञान जी ने किताब छापने का इरादा तक नहीं किया।
ज्ञान जी बात करते-करते पानी बरसने लगा। हम आगे की टहलाई स्थगित करके कालोनी के पीछे के गेट से कालोनी में घुस गए। मन किया बारिश में भीगते हुए टहला जाये। लेकिन मोबाइल, घड़ी भीगने की बात सोचकर शेड के नीचे आ गए। कुछ देर बारिश होते देखते रहे। टहलते रहे। राहत इंदौरी का शेर याद आया :
"जिंदगी क्या है ख़ुद ही समझ जाओगे,
बारिशों में पतंगे उड़ाया करो।"
शेर को याद करके हमने सोचा कि जो इंसान मोबाइल, घड़ी के भीगने की बता सोचकर बारिश में भीगने से परहेज करे वो बारिश में पतंग क्या उड़ाएगा?
कुछ देर और टहलने के बाद हम टहलाई स्थगित करके लिफ्ट से ऊपर आ गए। घर की बालकनी से बारिश के नजारे देखते हुए सोचते रहे कि बनवारी अब पंखा डुलाना छोड़कर मार्केट के किसी शेड के नीचे चला गया होगा।

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Saturday, July 19, 2025

नोयडा से होशियार पुर

 कल रात संगत में ज्ञानरंजन जी से अंजुम शर्मा की बातचीत सुनी। सुबह जागने के बाद ज्ञान जी की 'बहिर्गमन' कहानी का निर्मल वर्मा, श्रीकांत वर्मा से कनेक्शन की बात जानकर कहानी पढ़ना शुरू की। आधी पढ़ी फिर टहलने निकल गए।

कालोनी के बाहर निकलते ही एक घर के बाहर तमाम छोटी-बड़ी कई घंटियाँ टंगी दिखीं। उनको देखकर मुझे ज्ञान जी की कहानी  घंटा  याद की आई। इसको लौटकर पढ़ेंगे। इस कहानी के इस अंश पर काफ़ी देर बातचीत हुई संगत में :

"मैंने ध्यान दिया हॉल में दो प्रकार की महिलाएँ थीं। कुछ बिलकुल डाँगर चिरईजान और कुछ जिन्हें देखकर लगता बाल्टी भर के हगती होंगी। मोटी औरतें पुरुषों के प्रति सबसे अधिक ललकपन दिखा रही थीं। पुरुष भी पीछे नहीं थे। चीज़ों को चखते हुए वे दूसरों की औरतों का शील सभ्यता-पूर्वक चाट रहे थे।"

इस अंश के हिस्से "जिन्हें देखकर लगता बाल्टी भर के हगती होंगी।" को अंजुम शर्मा  द्वारा महिला विरोधी बताये जाने पर  ज्ञान जी ने विस्तार से इस पर अपनी बात रखी। इसे आप संगत में सुन सकते हैं।  किसी कहानी के लिखे जाने के पचास-साथ बाद उसपर किसी भी तरह की कोई चर्चा होना उस कहानी के ख़ास होने की निशानी है। 

आगे एक कालोनी के गेट पर एक मांगने वाला बैठा दिखा। कालोनी के गेट पर किसी भिखारी की के होने की बात थोड़ी अटपटी लगी लेकिन फिर वहीं कालोनी के अंदर स्थित मंदिर से घंटे की आवाज सुनाई दी भिखारी का वहाँ बैठने का कारण समझ में आ गया। जहाँ मंदिर वहाँ भिखारी। लेकिन यह बात सिर्फ़ मंदिरों तक ही सीमित नहीं है। दूसरे धर्मों पर भी लागू है। 

सड़क पर चलते हुए सामने से 'कन्यावती' अपने बेटे के साथ आते दिखी।  हमारी सोसाइटी के बाहर प्रेस करने वाले की पत्नी है। हरदोई के रहने वाले हैं दोनों। पहले दिन नाम सुना तो   लगा उसका नाम सत्यनारायण की कहानी की लीलावती/कलावती की तर्ज पर रखा गया है। कन्यावती घर से खाने का टिफिन लिए , बेटे को प्रैम में बिठाए उस जगह जा रही थे जहाँ उसका पति प्रेस का ठीहा जमाये हुए है। उसने बताया कि वहीं पास ही उसका घर है।

आगे बस्ती में घुसते ही ऐसा लगा नोयडा खत्म हो गया और किसी शहर का पुराना इलाका शुरू हो गया है। यह इलाका होशियारपुर का है। गली में पानी भरते , आते-जाते लोग दिखे। एक महिला अपने बच्चे का हाथ थामे उसे स्कूल के लिए घसीटते ले जा रही थी। एक मकान में बाहर सीढ़ियों पर दो छोटे बच्चे एक -दूसरे के गले में हाथ डाले आपस में बतिया रहे थे। इरान-इजरायल युद्ध, अमेरिका की एकतरफा दादा गिरी, टैरिफ़ के झमेले, बिहार में चुनाव आयोग के कारनामों और सावन में कावंडियों की श्रद्धा और हुड़दंग से बेपरवाह वे एक दूसरे से बतियाने में तल्लीन थे। शायद उनके जीवन के ये सबसे खूबसूरत पल हों।

गालियाँ अधिकांश कंक्रीट की थीं। एक घर के बाथरूम से निकला पानी सड़क पर निर्द्वंद बह रहा था। सामने किसी का घर नहीं था इसलिए शायद किसी को एतराज भी नहीं था। जगह-जगह गलियों में अहातों जैसा माहौल था। लोग नंगे बदन पानी के नल के सामने प्लास्टिक के डब्बे लिए लाइन में खड़े थे। स्टील और लोहे की बाल्टियाँ अब राजनीति में नैतिकता की तरह कहीं दिखती नहीं। जगह-जगह छोटी-छोटी खाने-पीने की दुकानें भी दिखीं। 

एक जगह शंकर भोजनालय नाम का ठेला दिखा। अलग-अलग तरह पराठे और सब्जी के रेट लिखे हुए थे। प्याज के पराठे भी बिक रहे थे। शायद भक्त कांवड़ियों की नजर पड़ी नहीं ठेले पर वरना तोड़-फोड़ कर दिए होते। यह भी हो सकता है शंकर जी का नाम देखकर छोड़ दिए होते। कल गाजियाबाद में KFC के रेस्टोरेंट को बंद कराने और तोड़फोड़ की घटना के बारे में जानकर मुझे परसाई जी का लेख 'आवारा भीड़ के ख़तरे' याद आया। 

सड़क पार एक निःशुल्क शौचालय दिखा। उसके  शटर पर ताला लगा था। मुझे लगा शायद दिल्ली की सरकार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश की सरकार भी मुफ्त की सुविधाएं बंद करने पर आमादा है। 

आगे जाने पर देखा कि थोड़ी दूर पर एक मुफ्त शौचालय चालू था। शायद इसीलिए पीछे वाले पर ताला लगा हुआ हो। 

लौटते होशियारपुर की गलियों के मुहाने देखते हुए आए। हर संकरी गली के बाहर एक बड़ा सा बैंक्वेट हाल दिखा। कहीं कुछ और। ऐसी हर बड़ी इमारत के बाहर खड़े दरबान की वर्दी पर DCP लिखा दिखा। हमने पहले उसको डीएसपी पढ़ा। लगा पुलिस के अधिकारी भला कहाँ इनकी रखवाली के लिए लगायें जाएँगे। बाद में डीसीपी देखा तो साफ़ हुआ मामला। लेकिन फिर यह लगा कि पहले की सोच भी कोई बहुत ग़लत नहीं है। आज पुलिस बड़े -बड़े पैसे वालों की रखवाली करने के लिए ही तो है। एक से एक हिस्ट्रीशीटर  की सुरक्षा के लिए सिस्टम लगा हुआ है। 

एक मकान के पास से गुजरते हुए देखा एक लड़की पहली मंजिल के रेलिंग पर झुकी, रेलिंग पर अपना चेहरा टिकाये नीचे किसी से बात कर रही थी। सामने देखा तो एक लड़का एक पेड़ से फूल तोड़ रहा था। दोनों शायद फुसफुसाहट से ऊँचे घराने वाली आवाज़ में बतिया रहे थे। हमको वहाँ से गुजरते देख बतियाना स्थगित करके केवल एक-दूसरे को देखने तक सीमित कर लिया। हम उनकी बातचीत में व्यवधान के अपराध बोध से ग्रसित होकर तेज़ी से आगे बढ़ गए। शायद वे फिर बतियाने लगे हों। हमने पहले सोचा कि मोड़ से पलट के देखें उनको लेकिन उनके वार्तालाप में व्यवधान की बात सोचकर बिना पलटे आगे बढ़ गए। 

कालोनी के बाहर प्रेस की दुकान पर देखा तो कन्यावती का बच्चा वहीं आसपास की दुकानों के बुजुर्गों के साथ खेल रहा था। कन्यावती और उसका पति कालोनी के घरों में प्रेस के कपड़े लेने गए हुए थे। 

हम टहलते हुए वापस घर आ गए। 

इस पोस्ट को ब्लॉग पर पढ़ेंगे तो संबंधित पोस्ट्स के लिंक भी मिल जायेंगे। ब्लॉग पोस्ट का लिंक टिप्पणी में दिया है। 



Friday, July 18, 2025

भुल्लकड़ी के बहाने

कल रात देर तक बारिश हुई। तेज बारिश। सुबह -सुबह कालोनी के सारे ब्लॉक धुले-धुले लगे। ऐसा लगा उनको धोकर सुखाने के लिए टाँग दिया गया हो। मकानों के फोटो लेते हुए सोचा कि क्या पता उनको भी बुरा लगता हो कि बिना पूछे उनके फोटो ले लेते हैं लोग। क्या पता कोई ब्लॉक यह सोचकर भी एतराज करता हो कि ख़ुद तो कपड़े पहनकर घूमते हैं , हमको बिना कपड़े खड़ा रखते हैं जालिम इंसान लोग। हो सकता है इस पर कोई दूसरा ब्लॉग उसको समझाता हो -"अरे हमारे ऊपर ये प्लास्टर, पेंटिंग ही तो हमारे कपड़े हैं।" 

बगल के स्कूल में लोग अपने बच्चों को भेजने के लिए आते दिखे। हर दूसरा बच्चा कार से आता दिखा। कारों की भीड़ स्कूल के सामने, गली में हर जगह है। सड़क पर कारों का जाम सा लग गया। 

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार हजारों स्कूल बंद कर दिए। कारण बताया गया कि स्कूल में बच्चे नहीं हैं। क्या पता सरकार आने वाले समय में संभावित जाम से बचने के लिए स्कूल बंद करा रही हो। सरकारें वैसे भी बहुत दूरदर्शी होती हैं। 

टहलते हुए अक्सर दोस्तों, साथ काम करने वालों और सीनियरों से बात हो जाती है। हाल-चाल पता हो जाते हैं। पुराने लोगों से बात करते हुए उनसे पुरानी यादें साझा होती हैं, नयी जुड़ती हैं। जिनसे भी हमारे संबंध रहते हैं उनसे जुड़ी कुछ यादें हमारे ज़ेहन में होती हैं, कुछ अच्छी, कुछ बुरी। जिन लोगों के साथ केवल खराब यादें ही जुड़ी होती हैं आम तौर पर हम उनसे बाद में भी संबंध नहीं रखना चाहते। जिनसे संबंध बने रहते हैं उनसे जुड़ी कोई न कोई याद होती है जिसका जिक्र करके बात आगे बढ़ती है। कई बार दो मित्र एक-दूसरे को अलग-अलग यादों के सहारे याद करते हैं। 

घूमते हुए उसी पैदल ब्रिज पर आए जिस पर रात भी चढ़े थे। उसी जगह पर खड़े होकर आती-जाती गाड़ियाँ देखीं जहाँ से कल देख रहे थे। सड़क वही थी लेकिन सुबह का नजारा रात के नजारे से अलग था। जो गाड़ियाँ कल आती-जाती दिखीं थीं आज वाली उनसे अलग होंगी। कुछ देर गाड़ियों को देखने के बाद नीचे उतर आए।

तिराहे पर जहाँ कबूतर बैठते हैं कुछ लोग दाना डाल रहे थे। लेकिन कबूतर वहाँ नहीं थे। वे वहीं पास ही ऊपर की रेलिंग पर बैठे थे। सुबह का नाश्ता करने के बाद उनका पेट भरा था शायद इसीलिए वे दाने को देखते हुए भी आराम से ऊपर ही बैठे रहे। इंसान और जानवर यही अंतर होता है। कबूतर की जगह इंसान होते तो दाने समेट के अंदर रख लेते। आगे काम आयेंगे, सोचते हुए।

पार्क के पास एक दुकान में हर सब्जी/फल के दाम लिखे दिखे। पहली दुकान देखी जहाँ सब्जियों के दाम लिखे थे। लेकिन कुछ सामानों के  दाम अपडेट नहीं लगे। आम भी 59/- रुपए किलो, धनिया भी इसी तरह भाव। 

पार्क में टहलते हुए उन बुजुर्ग की याद आयी जिनकी मोटरसाइकिल नहीं मिल रही थी। पता नहीं मिली होगी कि अभी तक खोज रहे होगे, गाड़ी को गरियाते हुए। 

आजकल तो हर सामान के साथ चिप का जुगाड़ हो रहा है। भूल जाओ तो पता चल जाएगा कि कहाँ है सामान। नयी गाड़ी खरीदी थी तो कुछ दिन तक यह देखते रहना हमारा शग़ल था कि गाड़ी अभी किधर है ? 

लेकिन ये याददाश्त का भी अजब लफड़ा है। याद आते-आते गुम हो जाती है। दुनिया के तमाम काम आजकल पासवर्ड के सहारे चलते हैं। अक्सर भूल जाते हैं। क्या पता केन्द्रीकरण के समय में आने वाले समय में सारे पासवर्ड की कुंजी किसी एक के पास पहुँच जाये और वो उसे भूल जाते। ऐसा होगा तो दुनिया के तमाम काम-धंधे ठहर जाएँगे। 

क्या पता दुनिया बनाने वाले सर्वशक्तिमान जब दुनिया को देखता हो तो इसमें सुधार के बारे में सोचता हो। लेकिन क्या पता उसको भी अपना पासवर्ड बिसरा गया हो। याद ही न आ रहा हो। इसी के चलते दुनिया के तमाम गरीबों, असहायों की प्रार्थनाओं पर कोई कारवाई न कर पाता हो। अपने सच्चे भक्तों पर दुष्टों की बदमाशियाँ चुपचाप देखता रहता हो। क्या पता इसी किसी चक्कर में कोई नया अवतार न हो पा रहा हो। प्राणियों का उद्धार अटका हुआ हो। क्या पता सर्वशक्तिमान की यह भुलक्कड़ी अस्थायी हो । कुछ दिन बाद उसे सब कुछ याद आ जाये और वह अपनी दुनिया को ठीक कर दे। लेकिन क्या पता सर्वशक्तिमान भी अल्जाइमर जैसी किसी तकलीफ़ के चपेटे  में आ गया हो जिसका कोई इलाज उसके यहाँ भी न हो और वह भी  अपने किसी सर्वशक्तिमान को याद कर रहा हो। 

क्या पता भूलने की बीमारी का आने वाले समय में कोई इलाज निकल आए। इंसान के दिमाग़ का  नियमित अंतराल पर बैकअप लेते रहने का हिसाब बन जाये जैसे कम्प्यूटर नेटवर्क का लिया जाता है। जब किसी इंसान के याददाश्त गड़बड़ाए तो उसके दिमाग़ का मदरबोर्ड बदल दिया जाये। सारी यादें नए मदरबोर्ड में फिट करके याददाश्त का मामला टनाटन कर दिया जाये। 

क्या होगा आने वाले समय में यह तो बाद में पता चलेगा। अभी तो जरा देख लें चश्मा कहाँ रखा है। मोबाइल किधर है? 




Thursday, July 17, 2025

पार्क में मोटरसाइकिल

शाम को टहलने निकले। सुबह जो लोग लड़ते-झगड़ते दिखे थे वे आसपास बैठे चाय पी रहे थे। जिसके ऊपर गंदगी का आरोप लगा था उसके दोनों बच्चे नंग-धड़ंग दिगम्बर आपस में खेल रहे थे। दोनों मियाँ बीबी चाय पी रहे थे।

पूछने पर बताया कि वे राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले हैं। आते जाते रहते हैं। यहाँ दिहाड़ी पर काम करते हैं। सामने कुछ प्लास्टिक की गाड़ियाँ भी रखी थीं। शायद बेचने के लिहाज़ से। लेकिन बिकती नहीं हैं वे।

अभी बारिश हो रही है। हवा ठंडी बह रही है। पता नहीं फ़ुटपाथ में रहने वाले लोग कहाँ शरण पाये होंगे।

फ़ुटओवर ब्रिज से गाड़ियाँ आती-जाती दिख रहीं थीं। दूर जाती गाड़ियों की लाल लाइट मानो इशारा कर रही हो -“हमारा पीछा मत करो। भिड़ जाओगे।

सड़क पर एक बुजुर्ग मिले। उन्होंने पूछा -“यहाँ कोई पार्क है?” जिस जगह पूछा था वहाँ आगे-पीछे दोनों तरफ़ पार्क थे। हमने बता दिए। वे पास के पार्क की तरफ़ चले गए। हम दूसरे पार्क में आकर टहलने लगे।

कुछ देर बाद वही बुजुर्ग सामने से आते दिखे। हमने पूछा-“पार्क नहीं मिला क्या पीछे ?”

वे बोले-“पार्क तो मिल गया। लेकिन वहाँ मोटरसाइकिल नहीं मिली। मोटरसाइकिल के पहले उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए बहन से जुड़ी गाली भी दी थी।

पता चला किसी पार्क के पास मोटरसाइकिल खड़ी करके भूल गए कि किस पार्क के पास खड़ी की। पार्क दर पार्क खोज रहे हैं मोटरसाइकिल। हमने उनको आसपास के और पार्क बताये। वे उनको खोजने चल दिए।

हमको याद आया हम सुबह अपना चश्मा आधा घंटा खोजते रहे और मोबाइल भी दस मिनट खोजा। हमको तो चश्मा और मोबाइल मिल गए। उन बुजुर्ग को पता नहीं उनकी मोटरसाइकल मिली कि नहीं ?

सबेरे की सैर

लिफ्ट से नीचे उतरे तो नज़र अनायास ऊपर की मंजिल की ओर गई। नजर जाते ही ध्यान आया कि जब हम नीचे होते हैं तो ऊपर देखते हैं। ऊपर होते हैं तो निगाह नीचे जाती है। सामने देखना बाद में शुरू होता है।

ऊपर की मंजिल बालकनी के कोने में एक सुखी टाइप परिवार दिखा। एक गोल-मटोल स्वस्थ सा जवानी की तरफ़ उन्मुख बच्चा बनियाइन पहने अपने दाँये हाथ से हवा में डमरू जैसा बजा रहा था। उनके खड़े उसके माँ-बाप उसको जिन भी निगाहों से निहार रहे थे उनको वात्सल्य की निगाह ही कहाँ जाएगा।
नोयडा सिटी सेंटर के पास का तिराहा।
सामने से एक युवा महिला साइकिल पर चली आ रही थी। देखकर लगा कुछ दिन ही हुए होंगे उसका विवाह हुए। उसके माथे पर सिंदूर और चेहरे पर मुस्कान चमक रही थी। शायद कालोनी के घरों में काम करती होगी। खाना बनाने जैसा कुछ काम। कालोनी के माध्यम वर्गीय परिवारों में खाना बनाने के काम के लिए काम वाली महिलायें लगी हैं। कई घरों में खाना बनाती हैं। कोई-कोई तो छह से सात घरों में काम करती हैं। एक घर में दिन में दो बार खाना बनाती हैं। मतलब दिन भर में बारह-चौदह बार खाना बनाती हैं।

कालोनी से बाहर निकलते ही एक दंपति अपने बच्चे को स्कूल बस में बैठाने के लिए लपकते दिखे। बच्चे की मम्मी ने भागती हुई आईं थीं बच्चे को बिठाने। शायद देर हो गई थी। बस में चढ़ाकर हाँफते हुए बच्चे से बोली -"बाय करो बेटा।" बच्चे ने बाय किया। तब तक उनकी साँस स्थिर हो गई थी। हाँफना छोड़कर वे भी मुस्कराने लगीं। उनके पति की गाड़ी बस के सामने बीच सड़क पर खड़ी थी। दोनों दरवाज़े डैनों की तरह खुले थे। बस के हार्न बजाने के बाद लपककर उन्होंने कार किनारे की। मियाँ-बीबी गाड़ी में बैठकर चले गए।

आगे एक कालोनी से गुजरते हुए एक घर के बाहर बेंच नुमा चबूतरे पर दो बच्चियाँ दिखीं। बड़ी बच्ची सीधे बैठी थी, छोटी बच्ची बेंच पर अधलेटी थी। शायद उनकी माँ उस घर में काम करती होंगी या क्या पता बच्ची ही साफ़-सफ़ाई का काम करती हो और गेट खुलने का इंतजार कर रही हो



पार्क में एक आदमी लंगड़ाते हुए टहल रहा था। एक पैर एकदम सीधा किए चलते हुए। उस पैर में शायद चोट लगी थी। उसको देखकर लगा -"चोट लगने पर बड़े-बड़े सीधे हो जाते हैं। पैर क्या चीज है।"

नोयडा सिटी सेंटर तिराहे पर खड़े होकर कुछ देर ट्रैफिक देखा। गाड़ियाँ दिल्ली की तरफ़ भागती हुई चली जा रहीं थीं। कोई भी ठहरकर, तसल्ली से जाते हुए नहीं दिखा। सब हड़बड़ाये हुए भागते जाते दिखे। शायद उनको इस बात का डर होगा कि तसल्ली से चलने पर कहीं जिला बदर न कर दिए जाएँ।

मोड़ के आगे एक आदमी अपनी मोटरसाइकिल पर, उसकी लंबाई के लंबवत दिशा में, आलिंगन मुद्रा में लेटा हुआ अपने मोबाइल पर झुका हुआ था। मोटरसाइकिल चुपचाप उसकी छाती के नीचे दबी खड़ी थी। उसकी चाबी सवार के हाथ में थी इसलिए कुछ बोल भी नहीं सकती थी। पेट्रोल भी तो वही डलवाता था।

आगे दो लोग सड़क किनारे अपनी-अपनी स्कूटी खड़ी किए फुटपाथ पर बैठे अपने-अपने मोबाइल में डूबे हुए था। मन किया कि उनसे कुछ बात करें। लेकिन उनकी मोबाइल तल्लीनता देखकर उनको डिस्टर्ब करने की हिम्मत नहीं पड़ी। उनकी 'मोबाइल तपस्या' भंग होने पर क्या पता वो नाराज होकर कोई श्राप जारी कर देते।
मोबाइल तपस्या में डूबे लोग।


बगल से एक कूड़ा गाड़ी निकली। गाड़ी के डब्बों में गीला कूड़ा/सूखा कूड़ा देखकर मुझे लगा कूड़ा गाड़ी किसी लोकतांत्रिक देश की राजनीतिक पार्टियों को लिए जा रही है। गीला कूड़ा मतलब सत्ता धारी पार्टी, सूखा कूड़ा मतलब विपक्षी पार्टी। यह विचार आते ही मुझे लगा कोई राजनीतिक पार्टी मेरे विचार से बुरा न मान जाये। यह सोचते ही मैंने अपने विचार को उसी कूड़ा गाड़ी में फेंक दिया। पता नहीं मेरा विचार गीले कूड़े में गिरा या सूखे में। पता नहीं उन कूड़ों ने मेरे विचार के साथ क्या सुलूक किया हो। मुझे डर है उसकी बेहूदगी पर रीझकर किसी ने उसे अपनी संसद में न भेज दिया हो।

फुटपाथ किनारे के लोग आपस में तेज-तेज आवाज में लड़ रहे थे। एक महिला दूसरी को इस बात के लिए डाँट  रही थी कि उसके बच्चे फुटपाथ में गंदगी करते हैं। दूसरी महिला क़सम खाते हुए कह रही थी -"हमारे बच्चे ने गंदगी नहीं की।" अपनी सफ़ाई को मजबूती देने के लिहाज से उसने कहा -" उसके बच्चे मर जायें जिसने यहाँ गंदगी की।" 

हम थोड़ा ठहरकर उनका झगड़ा सुनने लगे। दोनों अपनी-अपनी बात हमसे कहने लगे। "अंकल जी, ये गंदगी करती है", "अंकलजी, ये झूठ बोलती है"। हमको लगा हम थोड़ा देर और रुककर उनकी लड़ाई में अंकल सैम की तरह सीजफायर कराकर ट्वीट करें। लेकिन हमको अपने विचार बेहूदा लगा। हम उनको लड़ता हुआ छोड़कर आगे बढ़ गए। 

उनके बगल में ही पिंक ट्वायलेट था। महिलाओं के लिए मुफ्त। शायद महिलाएं उनका उपयोग करती हों लेकिन शायद वहाँ बच्चे नहीं जाते होंगे। या कोई और कारण रहा होगा। लेकिन उनके लड़ने की आवाज़ें दूर तक पीछा करती रहीं। 

नुक्कड़ पर पान की दुकान पर एक नौजवान  सिगरेट पीते हुए धुआँ उड़ा रहा था। धुँआ ऊपर की और लहराते हुए नागिन डांस जैसा करते हुए हवा में गुम हो गया । धुएँ का कालापन ऐसे हवा में  घुल गया  जैसे कोई भ्रष्टाचारी किसी राजनीतिक पार्टी में विलीन हो गया हो। 

पार्क में पेड़-पौधे-हरी घास बहुत खूबसूरत लग रहे थे। हमने उनकी फ़ोटो लेने की सोची लेकिन फिर नहीं ली। सोचा कि पेड़-पौधों की भी निजता होती है। कहीं किसी पेड़ को बुरा लग गया तो उनका मन दुखी होगा। 

लौटते हुए एक आदमी गाड़ी साफ़ करते हुए दिखी। पैर के पंजे में प्लास्टर चढ़ा हुआ था। बताया उसने -"चोट लग गई थी। दफ़्तर में खोलकर बैठें इसे।" 

थोड़ा और बात होने पर उसने बताया वह ड्राइवर है। उसके साहब रिटायर्ड ब्रिगेडियर हैं। डाक्टर हैं। जो लोग विदेश जाने वाले होते हैं उनका मेडिकल करते हैं। बताते-बताते उसकी आवाज में अपने साहब का रुतबा भी मिल गया। हम उसको गाड़ी पोंछता छोड़कर घर आ गए। 






Saturday, July 12, 2025

कांवड़ धारी बच्चे

 


गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर कुछ कांवड़ धारी बच्चे दिखे। शंकर जी की फ़ोटो लगी टी शर्ट, बरमूडा टाइप नेकर पहने कांवर टांगे बच्चे ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। हाथ में स्मार्टफोन लिए बतिया रहे थे।

पास गए तो देखा उन बच्चों के साथ एक बच्ची भी थी। पता चला हरिद्वार तक ट्रेन से जाएंगे। लौटेंगे पैदल ,जल लेकर। चार-पांच दिन लगेंगे वापस लौटने में। तय नहीं किया वापसी में कहां-कहां रुकेंगे।
बच्चों में उत्साह है। उनके साथ उनके परिवार के लोग भी हैं लेकिन उनके पास कांवर नहीं हैं। बातचीत से पता लगता है कि वे भी जाएंगे हरिद्वार ।
पढ़ाई के बारे में पूछने पर बच्ची ने बताया -"बाहरवीं करके छोड़ दी पढ़ाई। भैया लोग भी ऐसे ही हैं। पढ़ाई छोड़ चुके हैं।
"खाली हैं इसीलिए कांवर यात्रा पर जा रहे हैं।" -मैं ऐसी धारणा बनाता हूँ। हर साल कांवर यात्रा, तीर्थ यात्रा पर जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। लोग इसे भक्ति भाव से जोड़कर देखते हैं। मुझे लगता है भक्तों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रतीक है कि लोगों के पास काम नहीं है। पढ़ाई छूट गयी है, काम करते नहीं, खाली हैं तो तीर्थ यात्रा ही सही। सरकार भी कांवर यात्रा करने वालों के लिए खास इंतजाम करके उनको यात्रा के लिए उकसाती रहती है। इसी बहाने अपना एजेंडा भी सेट करती रहती है।
कांवर धारी युवाओं को देखकर लगा कि ये आधुनिक श्रवणकुमार हैं जो अपने कंधे पर सरकारें ढो रहे हैं। सरकारें इनकी कांवरो की बँहगियो पर बैठी आनंद कर रही है। ये युवा आंख मूंदकर , अपने भविष्य से निर्लिप्त, अपने बुजुर्गों को अपने कंधे पर लादे घूम रहे हैं ।
" वापसी ने चार-पांच दिन की यात्रा में कहाँ रुकना है, कहाँ खाना-पीना है इसका कोई प्लान बनाया है?" पूछने पर बच्ची ने बताया -"कोई प्लान नहीं बनाया। जहां रात हो जाएगी , जब थक जाएंगे, रुक जाएंगे।"
"पहले भी गए होंगे, पैदल चलने में पैर में छाले पड़ जाते होंगे" इस सवाल के जवाब में एक महिला ने कहा-"सच्चे भक्त छाले नहीं पड़ते।" उसके साथ की महिला ने उसकी बात को काटते हुए कहा -"शुरू में पड़ते हैं, फिर ठीक हो जाते हैं।" अपने साथ के बच्चे की तरफ इशारा करते हुये उस महिला ने कहा -" पिछली बार इसकी चप्पल चोरी हो गयी थीं। इसके छाले पड़ गए थे।"
बच्चों के साथ उनके घर वालों का उत्साह देखकर लगा कि कांवड़ यात्रा उनके लिए घर से बाहर निकलने का एक जरिया है। धार्मिक स्वरूप होने के कारण यात्रा पर जाने को सामाजिक स्वीकृति भी मिली हुई है।
कांवर यात्रियों से और कुछ बात करते तब तक ट्रेन आ गयी। आसपास के स्टेशनों से कानपुर आने वाली पैसेंजर गाड़ियों में दूधिया लोग दूध के डब्बे टांगे रहते हैं उसी तरह कई कांवर ट्रेन की खिड़कियों से टंगी थीं।कांवरियों की ड्रेस से दूर से पता चल रहा था कि वे हरिद्वार जा रहे हैं। टीटी शायद उनसे टिकट के बारे में पूछता भी नहीं होगा।
कांवर यात्रियों को लेकर ट्रेन हरिद्वार की तरफ चल दी। हमारी गाड़ी भी आ गयी। हम गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी में कोई कांवर वाला दिखा नहीं।

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Friday, July 11, 2025

हम भारत के लोग


 हर जगह का बाजार का हिसाब अलग-अलग होता है। कानपुर में नीबू, खीरा, केला आदि गिनती के हिसाब से मिलते हैं। दिल्ली/NCR में तौल के भाव। कानपुर में आधा दर्जन केला, पाँच नीबू के हिसाब से ख़रीद होती है। नोयडा, दिल्ली में किलो, पाव के हिसाब से। और भी जगह तौल के हिसाब से मिलती होंगी चीजें जो कानपुर और दूसरी जगह गिनती के हिसाब से मिलती हैं।

ग्राहक और दुकानदार के बीच में तराजू एक बिचौलिये के रूप में शामिल है दिल्ली/एनसीआर में। बिना बिचौलिए के यहाँ काम नहीं होता।
क्या पता कल को और मामलों में भी तराजू घुस जाये। गिनती में गिनी जाने वाली चीजें तौल के हिसाब से गिनी जाने लगें।
क्या पता कल को इंसान की गिनती भी तौल के हिसाब से होने लगे। इंसान की क़ीमत उसके वजन के हिसाब से लगने लगे। किसी घर में पाँच वोट के तर्ज पर कहा जाये वहाँ -350 किलो वोट हैं। जिसको सबसे ज्यादा वजन के वोट मिलेंगे वह उम्मीदवार जीता हुआ कहा जाएगा। धर्मकाँटे मतदान केंद्र के रूप में प्रयोग होंगे।
यह भी हो सकता है लोगों की संपत्ति के आधार पर उनके वोट की क़ीमत आँकी जाये। जिसके पास जितना ज्यादा संपत्ति उसके वोट की उतनी ज्यादा क़ीमत। ऐसा हो तो फिर किसी दल को सरकार बनाने के लिए दुनिया भर के ताम-झाम की जरूरत नहीं होगी। देश के पचीस-तीस लोग मिल-बैठ कर सरकार बना लेंगे। देश का समय, संसाधन, पैसा बचेगा। एक दिन में चुनाव निपट जायेगा।
हालांकि हो तो अभी भी वैसा ही रहा है। लेकिन अभी दबे-छुपे तरीक़े से होता है, फिर सीधे होने लगेगा। मामला पारदर्शी हो जाएगा।
दुनिया के लगभग सभी देशों में जहाँ चुनाव होते हैं, वहाँ के पैसे वाले लोग चुनाव का नतीजा तय करते हैं। अमेरिका के हालिया चुनाव में एलन मस्क के सहयोग की चर्चा है। अमेरिका के बारे में वहीं के एक भूतपूर्व राष्ट्रपति ने कहा था -"अमेरिका में कारपोरेट सड़क चलते किसी आदमी को पकड़कर अमेरिका के लोगों से कहता है -यह तुम्हारा राष्ट्रपति है।"
अभी तो आम जनता अपने वोट से सरकार बनाती है। वोट डालने के लिए देश का नागरिक होना अनिवार्य है। नागरिकता के लिए देश में जन्म लेना अनिवार्य है या फिर नागरिकता मिलना जरूरी है।
बिहार में कुछ दिन बाद होने वाले चुनाव के लिए चुनाव आयोग मतदाता सूची को तैयार कर रहा है। 2004 के बाद पैदा हुए लोगों से जन्म प्रमाण पत्र जमा करने को कहा गया है। उनके पिता का भी जन्मप्रमाण चाहिये नागरिकता साबित करने के लिए। इसका विरोध हो रहा है अलग-अलग कारणों। लोगों का कहना है कि उनके पास जन्मप्रमाण पत्र है ही नहीं तो कहाँ से लायें?
जन्मप्रमाण पत्र की कहानी भी अनूठी है। अपने सेवा काल में हमने देखा कि पेंशन वगैरह के लिए लोग अपने परिवार के जन्म प्रमाण अलग-अलग हिसाब से बदलवा लेते। एक केस में एक पिता ने अपने बच्चे की जन्मतिथि दो-साल आगे-पीछे करवाने की अनुमति मांगी। हमको चूँकि असलियत पता थी इसलिए हमने मना कर दिया था। नाम और दूसरे विवरण भी बदलते ही रहते हैं लोग। फोटो के लिए तो लोग मजे लेते हुए कहते हैं -"हमारी शक्ल इतनी ख़राब हो गई है कि आधार कार्ड/वोटर कार्ड से मिलने लगे है।"
बिहार मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने आधार कार्ड और राशन कार्ड को नागरिकता का आधार मानने का सुझाव दिया है। माननीय न्यायाधीश महोदय ने कहा -"ये कागज तो हमारे पास भी नहीं है।"
लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय का सुझाव चुनाव आयोग मानता है या नहीं यह अभी पता नहीं है। माननीय उच्चतम न्यायालय का सुझाव दफ़्तरी भाषा में कोई पत्र "जारी करने के पहले/बाद में देखना चाहें" घराने का है। अब यह देखने वाले पर निर्भर है कि वह इस पर क्या रूख अपनाता है।
चुनाव आयोग क्या निर्णय लेता है , इसका बिहार के चुनाव पर क्या असर पड़ता है यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन अगर एक बड़ी आबादी कागजी कार्यवाही के कारण वोट डालने से वंचित रह गई तो इसका गंभीर परिणाम हो सकता है।
इसी सिलसिले में मुझे अपने पढ़ाई के दिनों का एक क़िस्सा याद आता है। हम लोग बीएचयू में पढ़ते थे। एम टेक में हम लोगों को स्कालरशिप मिलती थी। एक बार मिलने में देरी हुई। हम बार -बार पूछताछ करते थे, जबाब नहीं मिलता था।
एक दिन हम लोग दफ़्तर में संबंधित बाबू के पास गए। पूछा। बाबू ने झुँझलाकर थोड़ा ऊँची आवाज़ में कहा -"हम तुम्हारे नौकर नहीं है।"
यह सुनते ही हमारे साथी यादव जी का पारा हाई हो गया। उन्होंने बाबू से दोगुनी ऊँची आवाज में कहा -" सुनो, तुम हमारे नौकर हो और सामने जो HOD बैठे हैं वो भी हमारे नौकर हैं।"
अपनी बात को समझाते हुए यादव जी ने आगे कहा -"हम लोग यहाँ इस लिए नहीं पढ़ने आते हैं कि तुम लोग यहाँ नौकरी करते हो। तुमको नौकरी यहाँ इसलिए मिली है क्योंकि हम यहाँ पढ़ने आते हैं।"
ऊँची आवाज़ में यादव जी की कही यह बात सामने कमरे में बैठे विभागाध्यक्ष महोदय ने सुनी या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन यह जरूर हुआ कि हमारी स्कालरशिप अगले दिन हमारे खाते में आ गई।
यह घटना करीब 39 साल पुरानी है। यादव जी और हम भी पढ़ाई करके और अपनी-अपनी नौकरी करके रिटायर हो चुके हैं। लेकिन यादव जी की कही बात हमको अभी आज सुनी लगती है। अपने क़रीब 36 साल के सेवा काल में लोगों से जुड़े निर्णय लेते समय हमेशा याद रही कि हमारी नौकरी लोगों की सेवा के लिए है।
चुनाव आयोग और किसी भी सरकार को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे जनता के लिए हैं, जनता उनके नहीं है। भारत का संविधान भी यही कहता है -"हम भारत के लोग।"
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Thursday, July 10, 2025

प्रधानमंत्री संग्रहालय

 


कल प्रधानमंत्री संग्रहालय देखने गए। तीन मूर्ति भवन। लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन से तीन मूर्ति भवन की तरफ़ पैदल जाते हुए तमाम सांसदों, मंत्रियों के बड़े-बड़े बंगले दिखे। प्रवेश द्वार के पास बंदूक लिए सुरक्षा पर तैनात जवान। बंगलों की सुरक्षा के लिए लगाए गए तार अलबत्ता कई जगह टूटे दिखे।

तीन मूर्ति भवन से पहले 1 , सफदरजंग दिखा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी का निवास स्थान। उसको देखने चले गए अंदर। सुरक्षा के लिए तैनात लोगों ने बैग ले जाने दिया लेकिन पानी की बोतल बाहर धरवा ली।
इस घर में इंदिरा जी अपने पिता जवाहर लाल नेहरू जी के निधन के बाद रहने आयीं थीं और बाद में प्रधानमंत्री बनने से लेकर मृत्यु पर्यंत रहीं। उनके निधन के बाद इस घर को उनकी स्मृति के रूप में संरक्षित किया। इंदिरा जी और उनके परिवार के लोगों से जुड़ी अनेक यादें यहाँ मौजूद हैं। उनका ड्राइंग रूम, पढ़ने का कमरा और उनके जीवन से जुड़ी अनेक यादें यहाँ संरक्षित हैं।
राजीव गांधी जी भी इस घर में रहे। उनसे जुड़ी अनेक यादें भी यहाँ संरक्षित हैं। राजीव जी जो कम्प्यूटर प्रयोग करते थे (T5200) यहाँ रखा हुआ है। राजीव गांधी की हत्या के बाद बने जाँच आयोग (वर्मा कमीशन) की रिपोर्ट का अंश भी वहाँ लगा हुआ है। उसके अनुसार :
" प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी नवंबर, 1984 से नवंबर 1989 तक देश के ऐसे व्यक्ति थे जिनकी जान को सर्वाधिक खतरा था और उनकी जान को यह खतरा उनकी हत्या तक कम नहीं हुआ । यह स्पष्ट है कि उनके सुरक्षा प्रबंधों के लिए एस.पी. जी. कवर अथवा समान प्रभावकारी उपयुक्त विकल्प की आवश्यकता थी। मंत्रिमंडल सचिवालय के दिनांक 30/01/1990 के नोट में निहित केंद्रीय सरकार के निर्णय के परिणाम स्वरूप फ़रवरी, 1990 में एस.पी. जी. कवर हटाने के बाद उनमें से कोई सी भी सुरक्षा व्यवस्था उनके लिए उपलब्ध नहीं थी।"
यह जानकर दुख हुआ कि देश के एक महत्वपूर्ण नेता के लिए कोई भी सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी।
वहीं पर राजीव गांधी जी का पायलट के रूप में त्यागपत्र की प्रति भी दिखी।
इंदिरा गांधी जी की जिस जगह हत्या हुई थी वह जगह काँच की छड़ों से ढँकी हुई है। दूर से ही उसे देखा जा सकता है। इंदिरा जी के बनाए स्केच और दूसरी ड्राइंग भी दिखीं।
इंदिरा गांधी स्मृति स्थल के बाद तीन मूर्ति संग्रहालय देखने गए। 50 रुपये का प्रवेश शुल्क है यहाँ। इसके अलावा प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी और कई दीगर गतिविधियों के लिए अलग से फ़ीस है। हमने केवल संग्रहालय देखने के लिए टिकट लिया। अंदर जाने के पहले हमारा बैग एक लाकर में रखकर उसकी चाबी हमको थमा दी गई।
तीन मूर्ति भवन पहले केवल जवाहर लाल नेहरू जी से सबंधित चीजों का संग्रहालय था। बाद में इसमें उनके बाद के प्रधानमंत्रियों से जुड़ी स्मृतियाँ भी संजोयी गई हैं। मुझे पता नहीं क्या बदलाव किए गए इस प्रक्रिया में लेकिन अधिकतर यादें डिजिटल मोड में संग्रहित हैं। इससे उससे जुड़ाव में यान्त्रिकता का पुट तो रहता है। जवाहर लाल जी का शयन कक्ष, उनका ड्राइंग रूम और उनकी लाइब्रेरी देखकर बहुत अच्छा लगा। आजादी के मौके पर उनके उनके प्रख्यात संबोधन को उनकी हस्तलिपि में देखकर अच्छा लगा। उनके उस भाषण की वीडियो क्लिप भी कई सुनी।
कुछ दिन पहले Kanak Tiwari जी ने संविधान पर अनूठी बातचीत में नेहरू जी को याद करते हुए कहा था -" बिना किसी पूर्व तैयारी के दुनिया के किसी भी विषय पर जवाहरलाल नेहरू जैसा बेहतरीन वक्ता कोई नहीं था।" नेहरूजी का भाषण सुनकर कनक तिवारी जी की बात याद आ गई।
गैलरी में तमाम किताबें रखी थीं। पता नहीं क्यों? क्या पहले भी वे इसी तरह रखीं थीं या बाद में यह व्यवस्था की गई।
नेहरू जी से संबंधित संग्रहालय देखने के बाद अन्य प्रधानमंत्रियों से संबंधित संग्रहालय देखने गए। देश के सभी प्रधानमंत्रियों से जुड़ी प्रमुख घटनाओं का डिजिटल प्रदर्शन वहाँ किया गया था। उनका प्रदर्शन देखकर एहसास हुआ कि उसमें घटनाओं के प्रस्तुति करण में वर्तमान सरकार के रूख का भी ख्याल रखा गया है। नेहरू जी के प्रधानमंत्री बनते समय पटेल जी के पक्ष में लोगों का बहुमत था इस घटना को तफ़सील से बताया गया है, आपातकाल से जुड़ी घटनाओं और संविधान में धर्मनिपेक्षता जोड़ने की घटना का विस्तार से विवरण दिया है।
अन्य प्रधानांत्रियों से जुड़ी जानकारियाँ भी वहाँ मौजद हैं। नरेंद्र मोदी जी के हिस्से में उस स्टेशन का फ़ोटो भी मौजूद है जहाँ वे जवानों को चाय पिलाते थे (चाय बेंचने का जिक्र नहीं है वहाँ) ।
मोरारजी देसाई जी से जुड़े विवरण से पता चलता है कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए बंबई में 109 लोग पुलिस की गोली से मारे गए थे। इसके बावजूद वे मुख्यमंत्री बने रहे। आज ऐसी कोई घटना हो जाये तो बवाल हो जाये। (वैसे अपवाद आज भी हैं, सैकड़ों लोग कई राज्यों में प्रशासनिक लापरवाही के कारण मारे गए, मारे जा रहे हैं लेकिन देश/प्रदेश के कर्णधारों को कोई फर्क नहीं पड़ता)।
देश के कर्णधारों द्वारा एक-दूसरे को लिखे पत्र भी मौजद हैं वहाँ। लाल बहादुर शास्त्री द्वारा जय प्रकाश नारायण जी को लिखे पत्र, चरण सिंह जी द्वारा आपातकाल हटाने को लेकर लिखा पत्र और भी कई पत्र। इंदिरा जी और नेहरू जी के आपसी पत्र भी मौजुद हैं वहाँ।
प्रधानमंत्री दीर्घा से नीचे आते हुए गैलरी में एक तरफ़ अलग-अलग प्रधानमंत्रियों से जुड़ी घटनायें और दूसरी तरफ़ वर्ष वार देश से जुड़ी उल्लेखनीय घटनाओं का जिक्र करते हुए फोटो लगे हैं। इनमें देश में टीवी कब आया , केरल का जिला पूर्ण साक्षर कब हुआ, विश्वसुंदरी कब बनी, आधार कार्ड कब शुरू हुआ, अभिनव बिंद्रा ने कब स्वर्ण पदक जीता, मिल्खा सिंह के रोम ओलंपिक , राकेश शर्मा का अंतरिक्ष में जाना आदि घटनाओं के वर्षवार विवरण और सबंधित फोटो हैं।
वर्षवार इन उल्लेखनीय घटनाओं के जिक्र में मैं खोज रहा था कि कहीं नोटबंदी से जुड़ी खबर का भी जिक्र होगा। लेकिन हाल के समय की इस सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक का कहीं कोई जिक्र नहीं दिखा।
स्मारक देखने के बाद वहीं मौजूद कैंटीन में खाना खाया। 75 रुपए की थाली में दो रोटी, दाल, सब्जी, चावल और पापड़ भी था। पापड़ आधा खाया, आधा थाली में रखे-रखें तेज हवा में उड़ गया। बगल की मेज़ पर बच्चे हुए खाने को तल्लीनता से खाते हुए चिड़िया का वीडियो बनाने का विचार उसकी निजता के उल्लंघन की बात सोचकर छोड़ दिया।
प्रधानमंत्री संग्रहालय से निकलकर गेट के बाहर बनी पहले विश्वयुद्ध में मारे गए और लापता शहीदों के नाम का जिक्र करते हुए बने स्मारक को देखा।
जाते समय मेट्रो में एक बच्चा मेरी घड़ी से खेलने लगा। हमने घड़ी उतारकर उसे दे दी, क़ायदे से खेलने के लिए। उसने कुछ देर खेलने के बाद घड़ी फेंक दी। संयोग से हमने उसे कैच कर लिया। इसके बाद उसको अपने हाथ में ही बाँधे-बाँधे खेलने दिया, उसको दी नहीं घड़ी।
मेट्रो स्टेशन के सुलभ शौचालय के बाहर बैठी महिला ने सुलभ शौचालय की सुविधा के लिए दो रुपए फुटकर मांगे। हमारे पास दस का नोट था। उसके पास पाँच रुपए का ही नोट था। तीन रुपए की चपत लगी। महिला वहीं बैठे-बैठे अख़बार के लिफ़ाफ़े बनाती जा रही थी। बताया कि इस तरह सौ पचास रुपए बच जाते हैं।
हमने बताया कि बचपन में हम भी खूब लिफ़ाफ़े बनाते थे। इस पर उसने कहा -"मायके में यह सब नहीं करते नहीं थे, ससुराल में आकर करने लगे। करना पड़ता है।"
अचानक उसको याद आया कि वह शौचालय की देखभाल कर रही है। उसने अपनी तरफ़ से ही कहा -" हम बनिया हैं, सफ़ाई कर्मी नहीं हैं । पहले दूसरा काम करते थे, अब होता नहीं तो यहाँ करते हैं काम। बैठे-बैठे।"
उसकी बात सुनकर हमको हँसी आ गई। उसको मन में यह डर था कि कहीं हम उसको सफ़ाई कर्मी न समझ लें। उसका फ़ोटो लेने के लिए पूछा तो उसने मना कर दिया। हम बाहर आ गए। तीन मूर्ति भवन की तरफ़ चल दिए। उसके बाद का किस्सा तो आप पढ़ ही चुके हैं।
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Wednesday, July 09, 2025

अभी तो मैं जवान हूँ - सैंट्रो सुंदरी


 दिल्ली में पुरानी गाड़ियों को 15/10 साल बाद हटाने की चर्चा अक्सर होती है। आजकल फिर हो रही है। इस बार यह भी जुड़ गया कि पुरानी गाड़ियों को तेल भी नहीं देंगे।

गाड़ियों को हटाना एक बात लेकिन उनको तेल न देना अलग बात है। बुजुर्ग गाड़ियों को तेल न देना कुछ ऐसा ही है जैसे परिवार के किसी बुजुर्ग को खाना-पीना न देकर कसाईघर में भेज देना। कटने-पीटने के लिए। गाड़ियों का कोई वृद्धाश्रम तो होता नहीं। जायेंगी तो कटने-पिटने के लिए ही। गाड़ियाँ भी सोचती होंगी, कितना कठकरेजा है समाज।
पुरानी गाड़ियों के हटाने के पीछे अदालती आदेश का हवाला देने वाले यह बात छिपा जाते हैं कि इतनी गाड़ियाँ क्यों बढ़ीं सड़क पर। सार्वजनिक परिवहन की सुचारू व्यवस्था न कर पाना एक बड़ा कारण है निजी वाहनों के बढ़ने का। बाकी और भी कारण होंगे लेकिन सड़क पर निजी वाहन बढ़ने का एक प्रमुख कारण सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का सुचारू इंतजाम न होना है। सरकारें अदालती आदेश की आड़ में अपनी नाकामी छिपा रही हैं।
जिस तरह आज की समस्याओं का दोष लोग पुराने समय में हुए निर्णयों पर थोपते हैं उसे पुराने समय के लोग अगर देख पाते तो अपना माथा पीट लेते। शायद कहते -"इतने बहानेबाज और नाकारा लोग हमने तो सपने में भी नहीं सोचे थे।"
ऐसे समय में हमें अपनी सैंट्रो सुन्दरी याद आ रही है। 26 साल की उमर में भी जवान गाड़ियों की तरह फटाक से कहीं भी चलने के लिए तैयार हो जाती है। आधी चाबी घुमाते ही स्टार्ट हो जाती है, खिलखिलाते हुए चल देती है। गाड़ियों की उमर के लिहाज से वह बुजुर्ग हो चुकी है लेकिन चलने के मामले में किसी युवा गाड़ी की तरह ही चपल है।
हमारी सैंट्रो सुंदरी गाड़ियों में राणा सांगा की तरह है। न जाने कितनी जगह चोटों के निशान हैं उसमें। इन निशानों के बावजूद वह हमको बहुत खूबसूरत लगती है। उसकी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती उसकी बहादुरी है। भीड़-भाड़ में कहीं भी बेख़ौफ़ घुस जाती है। बाकी गाड़ियाँ जब जहाँ अगल-बगल की गाड़ियों को देखकर सहम जाती हैं, बचाने का संकेत देने लगती हैं ऐसी जगह भी हमारी सैंट्रो सुन्दरी बिना डरे, बिना हल्ला मचाये चलती रहती है। जहाँ नई गाड़ी, जिसकी मरम्मत में केवल फ़ाइल चार्ज लगता है, की एक खरोंच भी हमें दहला देती है वहीं हमारी थर्ड पार्टी बीमा वाली सैंट्रो सुन्दरी के घाव हमने आज तक नहीं गिने।
हमारी सैंट्रो सुंदरी का रजिस्ट्रेशन तीस साल तक के लिए है। 1999 के दिसंबर में खरीदी थी, जनवरी 2030 तक चलेगी । इसके बाद पता नहीं कि उसका क्या होगा? आगे रजिस्ट्रेशन होगा या विंटेज कार बनेगी, कुछ पता नहीं। हमको तो यह भी पता नहीं कि विंटेज कार का रजिस्ट्रेशन कैसे होता है।
फ़िलहाल तो बिंदास चल रही है, आगे क्या होगा यह चार साल बाद देखा जाएगा। अभी तो हर बार चलते हुए सैंट्रो सुन्दरी गाती लगती है -अभी तो मैं जवान हूँ।
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Monday, July 07, 2025

एलिगेटर एलकार्ट्ज़ मतलब मगरमच्छ से घिरी दुर्गम जेल


 पिछले दिनों अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों को उनके मूल देश वापस भेजा गया। उनमें भारत के लोग भी थे। प्रवासियों को वापस भेजते समय उनको हथकड़ी बेड़ी लगाकर भेजा गया था। इसकी कड़ी प्रतिक्रिया भी हुई। लोगों ने विरोध किया। इस पर भारत के विदेश मंत्री ने संसद में बयान देते हुए कहा -"अमेरिका वाले ऐसा ही करते हैं। पहले भी ऐसा हुआ है।"

भारत के लोगों को हथकड़ी बेड़ी लगाकर भेजे पर हुई आलोचना और तीखी प्रतिक्रिया के बाद विदेश मंत्री ने आश्वासन दिया था -"इस बारे में हम अमेरिका से बात करेंगे।"
अमेरिका से क्या बार हुई, और कितने लोग आए, हथकड़ी-बेड़ी में आए या खुले हाथ-पैर यह तो पता नहीं चला लेकिन यह पता चला कि अमेरिका में अवैध प्रवासियों को वापस भेजने से पहले रखने के लिए एक डिटेंशन कैंप बन रहा है। डिटेंशन कैंप (हिरासत केंद्र) का मतलब है एक ऐसा स्थान जहां उन लोगों को रखा जाता है जो किसी देश में अवैध रूप से रह रहे हैं या जिनके पास देश में रहने के लिए वैध दस्तावेज नहीं हैं. उन्हें तब तक हिरासत में रखा जाता है जब तक कि उनकी स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती या उन्हें उनके देश वापस नहीं भेज दिया जाता।
फ्लोरिडा राज्य के जंगल के दलदली इलाके में बन रही हिरासत केंद्र के पास एक हवाई पट्टी भी है। योजना है कि इस जगह क़ैद अवैध अप्रवासियों को यहीं से हवाई जहाज से उनके मूल देश वापस भेज दिया जाएगा। इस खुली जेल की क्षमता 5000 कैदियों को रखने की है जिसे बढ़ाकर 10000 तक किया जा सकता है। कैदियों के लिए चारपाई वाले बिस्तरों की कतारें और जंजीरों से बंधे पिंजरे हैं।
दलदली ज़मीन होने के कारण इलाके में मगरमच्छ और अजगरों की भरमार है। कैदियों को उनकी जान का ख़तरा है। कैदियों को ऐसी अमानवीय स्थितियों में रखने के इंतजाम को लेकर अमेरिका सरकार की आलोचना हो रही है।
इस अवैध प्रवासी हिरासत केंद्र (Immigration detention ) का नाम Alligator Alcatraz है। एलिगेटर मतलब मगरमच्छ । अलकाट्राज जेल दुनिया की दुर्गमतम जेलों में से मानी जाती थी। पूरे अमेरिका भर के छँटे हुए कैदी और दूसरी जेलों में हुड़दंग करने वाले कैदी यहां लाए जाते थे। समुद्र की तेज लहरों और बहुत ठंडे पानी के चलते यहां समुद्र के रास्ते भागना भी बहुत कठिन काम था।
जेल के दौरे के दौरान एक संवाददाता ने अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प से सवाल पूछा -" क्या यह विचार था कि भागने की कोशिश करने वाले बंदियों को मगरमच्छ खा जाएंगे?"
" मुझे लगता है कि यही अवधारणा है। सांप तेज़ होते हैं लेकिन मगरमच्छ - हम उन्हें (कैदियों को) मगरमच्छ से दूर भागना सिखाएंगे।" ट्रम्प ने जवाब दिया।
आगे ट्रम्प ने जानकारी दी -" सीधी रेखा में मत भागो, इस तरह भागो, उन्होंने ज़िगज़ैग की तरह इशारा करते हुए कहा। तुम्हें पता है कि तुम्हारी संभावना लगभग एक प्रतिशत बढ़ जाती है।"
अपने देश के लोकतंत्र और मानवीय गरिमा और उच्चादर्शों पर गर्व करने वाले देश का मुखिया दूसरे देशों को नागरिकों को , भले ही वह अवैध रूप से वहाँ आ गए हों, इस तरह की परिस्थितियों में रखता है जहाँ से भागने की कोशिश में उनको मगरमच्छ खा सकते हैं। सवाल पूछने पर वह कहता है -"हम उनको भागना सिखायेंगे जिससे उनके बचने की संभावना एक प्रतिशत बढ़ जाएगी।"
मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का नारा लगाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति को याद भी नहीं होगा कि आज अमेरिका की कमान संभालने वाले लोगों के पूर्वजों ने यहाँ के मूल निवासियों को मारकर देश पर कब्जा किया है। अगर अमेरिका के मूल निवासी बाहर से आए लोगों के साथ ऐसा कर पाते तो शायद ट्रम्प यहाँ आते भी नहीं, अपने मूल देश में ही कुछ काम-धाम कर रहे होते।
हर घटना का व्यापारीकरण करने वाले देश में राष्ट्रपति के दौरे के दौरान फ्लोरिडा रिपब्लिकन पार्टी ने व्यापारिक वस्तुएं लांच (टी शर्ट, कैप और दूसरे पेय) कीं और इस कैंप को एक उपनाम दिया, "एलीगेटर अल्काट्राज़", जिसे राज्य ने आधिकारिक बना दिया। अब 'एलिगेटर अलकार्ट्स' के चित्रों वाली T शर्त और कैप बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। T शर्ट पर जेल जैसी सुविधा के बाहर मगरमच्छ और का सांप लोटते हुए चित्र देखकर ऐसा लगता है कि मैल शर्ट से नीचे गिर रहा है।
अमेरिकी प्रशासन द्वारा अवैध प्रवासियों के मुद्दे को जिस अमानवीय तरीके और तमाशे पूर्ण अंदाज़ में निपटा जा रहा है, उसकी आलोचना करते हुए अमेरिकी पत्रकार मोनिका हेसे (Monika Hesse) ने वासिंगटन पोस्ट अख़बार में अपने लेख में लिखा :
"एलीगेटर अल्काट्राज़ एक अमानवीय स्थान है, लेकिन जब इसे तमाशा माना जाता है, तो सिर्फ़ कैदी ही अपनी मानवता नहीं खोते। हम सभी ऐसा करते हैं। इसका प्रभाव अमेरिकियों को यह बताना है कि वे इसे बहुत गंभीरता से न लें। परिवारों को तोड़ा जा रहा है, लेकिन यह सब हंसी-मज़ाक के लिए है। हम संवैधानिकता की सीमा पर नाच रहे हैं, लेकिन यह बढ़िया टेलीविज़न बना रहा है। हम पूरी तरह से असंगत हो गए हैं, यहाँ तक कि स्वर निर्धारित करने में भी असमर्थ हैं। अगर ग्वाटेनामो बे आज खुल जाता है, तो वहाँ एक थीम वाला रेस्तरां होगा जिसमें हैप्पी आवर स्पेशल टैगलाइन होगी "गिट मोट गिटमो।"
एलीगेटर अल्काट्राज़ की अवधारणा में छिपी अमानवीयता और तमाशेबाजी की तुलना रोमन गुलामों के साथ हुए अन्याय से करते हुए मोनिका ने लिखा :
"मैं रोमन ग्लैडिएटर लड़ाइयों के बारे में सोचा करती थी । किस तरह का समाज पिकनिक लंच पैक करके दूसरे इंसानों को, गुलामों या युद्धबंदियों को, मौत तक एक दूसरे से लड़ते हुए देखता है? ग्लैडिएटर किंवदंती का एक और हिस्सा यह है कि इन लोगों को बड़े जानवरों, बड़े मांसाहारी जानवरों से लड़ने के लिए मजबूर किया जाता था। लेकिन इसके लिए कोई भौतिक सबूत नहीं था, कुछ महीने पहले अप्रैल में, जब पुरातत्वविदों ने 1800 साल पुराने ग्लैडिएटर के खोदे गए कंकाल पर विशाल काटने के निशानों का विश्लेषण किया। तब इसकी पुष्टि हुई - शेर। किस समाज में दोपहर बिताने का यह सबसे अच्छा तरीका होगा? मैं सोचा करता था कि क्या यह क्रूरता विकास का मुद्दा था या धर्म का मुद्दा था या बस वैकल्पिक गुणवत्ता वाले मनोरंजन की कमी थी, उनके पास निकोलस केज (अमेरिका मनोरंजन कर्ता कलाकार) नहीं था।"
इस कैंप का समर्थन करने वाले बेजी जॉनसन ने एलीगेटर अल्काट्राज़ के चित्र की कैप लगाते हुए फोटो लगायी है और इस परियोजना का समर्थन किया है। उनकी इस ट्विटर पोस्ट पर उनको जमकर गालियाँ मिली हैं।
एलीगेटर अल्काट्राज़ की भावना की आलोचना करते हुए मोनिका लिखती हैं :
"लेकिन फिर आप बेनी जॉनसन को लाखों मगरमच्छों के लिए ऑनलाइन जयकार करते हुए देखते हैं और आप फ्लोरिडा जीओपी के स्टोरफ्रंट को देखते हैं और आपको पता चलता है कि यह लगभग 4 जुलाई है, अमेरिका का 249वां जन्मदिन और हमारे देश के बहुमत के अधिकारी छुट्टी का सप्ताह इस तथ्य का जश्न मनाने में बिता रहे हैं कि अन्य देशों के प्रवासियों को संयुक्त राज्य अमेरिका से इतना प्यार है कि वे यहां आने के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालते हैं और हमारी प्रतिक्रिया यह है कि हम आशा करते हैं कि उन्हें मगरमच्छ खा जाएंगे।
आप यह सब देखते हैं और सोचते हैं, कोई बात नहीं। हम ऐसे ही हैं। रॉक में आपका स्वागत है। क्या आपका मनोरंजन नहीं हुआ?"
पर्यावरण विद, मूल अमेरिकी नागरिक और मानवाधिकार समर्थक इस कैम्प का कर रहे हैं। लेकिन अमेरिकी प्रशासन इस सबसे बेपरवाह हिरासत केंद्र बनाने के तत्पर हैं। इस बारे में हम कुछ कर भी नहीं सकते। हमारे विदेश मंत्री जी कह ही चुके हैं -"अमेरिका वाले ऐसा ही करते हैं। पहले भी ऐसा हुआ है।"
आपका क्या सोचना है इस बारे में ?
1. अमेरिका की दुर्गम जेल अलकार्ट्ज़ के बारे में जानकारी का लिंक
2. एलिगेटर एलकार्ट्ज़ का इलाक़ा देखने के लिए बेनी जॉनसन का एक्स का लिंक

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