कालोनी के गेट के बाहर ही एक आदमी सड़क पर ' देशी कमोड पर दिव्य निपटान' मुद्रा में बैठा अपने मोबाइल को शीशे की तरह देखता बैठा था। पास से देखने पर लगा किसी को हड़काते हुए कुछ कह रहा था। पता दूसरी तरफ़ कौन था लेकिन मुझे लगा क्या पता अमेरिका के राष्ट्रपति को हड़का रहा हो -"दो दिन हुए हमारे यहाँ उप राष्ट्रपति जी के इस्तीफ़े को, अभी तक तुम्हारा ट्वीट नहीं आया। क्यों नहीं किया अभी तक ट्वीट -'हमारे कहने पर हुआ इस्तीफ़ा।'"
लेबल
Wednesday, July 23, 2025
बारिशों में पतंगे उड़ाया करो
Saturday, July 19, 2025
नोयडा से होशियार पुर
कल रात संगत में ज्ञानरंजन जी से अंजुम शर्मा की बातचीत सुनी। सुबह जागने के बाद ज्ञान जी की 'बहिर्गमन' कहानी का निर्मल वर्मा, श्रीकांत वर्मा से कनेक्शन की बात जानकर कहानी पढ़ना शुरू की। आधी पढ़ी फिर टहलने निकल गए।
कालोनी के बाहर निकलते ही एक घर के बाहर तमाम छोटी-बड़ी कई घंटियाँ टंगी दिखीं। उनको देखकर मुझे ज्ञान जी की कहानी घंटा याद की आई। इसको लौटकर पढ़ेंगे। इस कहानी के इस अंश पर काफ़ी देर बातचीत हुई संगत में :
"मैंने ध्यान दिया हॉल में दो प्रकार की महिलाएँ थीं। कुछ बिलकुल डाँगर चिरईजान और कुछ जिन्हें देखकर लगता बाल्टी भर के हगती होंगी। मोटी औरतें पुरुषों के प्रति सबसे अधिक ललकपन दिखा रही थीं। पुरुष भी पीछे नहीं थे। चीज़ों को चखते हुए वे दूसरों की औरतों का शील सभ्यता-पूर्वक चाट रहे थे।"
इस अंश के हिस्से "जिन्हें देखकर लगता बाल्टी भर के हगती होंगी।" को अंजुम शर्मा द्वारा महिला विरोधी बताये जाने पर ज्ञान जी ने विस्तार से इस पर अपनी बात रखी। इसे आप संगत में सुन सकते हैं। किसी कहानी के लिखे जाने के पचास-साथ बाद उसपर किसी भी तरह की कोई चर्चा होना उस कहानी के ख़ास होने की निशानी है।
आगे एक कालोनी के गेट पर एक मांगने वाला बैठा दिखा। कालोनी के गेट पर किसी भिखारी की के होने की बात थोड़ी अटपटी लगी लेकिन फिर वहीं कालोनी के अंदर स्थित मंदिर से घंटे की आवाज सुनाई दी भिखारी का वहाँ बैठने का कारण समझ में आ गया। जहाँ मंदिर वहाँ भिखारी। लेकिन यह बात सिर्फ़ मंदिरों तक ही सीमित नहीं है। दूसरे धर्मों पर भी लागू है।
सड़क पर चलते हुए सामने से 'कन्यावती' अपने बेटे के साथ आते दिखी। हमारी सोसाइटी के बाहर प्रेस करने वाले की पत्नी है। हरदोई के रहने वाले हैं दोनों। पहले दिन नाम सुना तो लगा उसका नाम सत्यनारायण की कहानी की लीलावती/कलावती की तर्ज पर रखा गया है। कन्यावती घर से खाने का टिफिन लिए , बेटे को प्रैम में बिठाए उस जगह जा रही थे जहाँ उसका पति प्रेस का ठीहा जमाये हुए है। उसने बताया कि वहीं पास ही उसका घर है।
आगे बस्ती में घुसते ही ऐसा लगा नोयडा खत्म हो गया और किसी शहर का पुराना इलाका शुरू हो गया है। यह इलाका होशियारपुर का है। गली में पानी भरते , आते-जाते लोग दिखे। एक महिला अपने बच्चे का हाथ थामे उसे स्कूल के लिए घसीटते ले जा रही थी। एक मकान में बाहर सीढ़ियों पर दो छोटे बच्चे एक -दूसरे के गले में हाथ डाले आपस में बतिया रहे थे। इरान-इजरायल युद्ध, अमेरिका की एकतरफा दादा गिरी, टैरिफ़ के झमेले, बिहार में चुनाव आयोग के कारनामों और सावन में कावंडियों की श्रद्धा और हुड़दंग से बेपरवाह वे एक दूसरे से बतियाने में तल्लीन थे। शायद उनके जीवन के ये सबसे खूबसूरत पल हों।
गालियाँ अधिकांश कंक्रीट की थीं। एक घर के बाथरूम से निकला पानी सड़क पर निर्द्वंद बह रहा था। सामने किसी का घर नहीं था इसलिए शायद किसी को एतराज भी नहीं था। जगह-जगह गलियों में अहातों जैसा माहौल था। लोग नंगे बदन पानी के नल के सामने प्लास्टिक के डब्बे लिए लाइन में खड़े थे। स्टील और लोहे की बाल्टियाँ अब राजनीति में नैतिकता की तरह कहीं दिखती नहीं। जगह-जगह छोटी-छोटी खाने-पीने की दुकानें भी दिखीं।
एक जगह शंकर भोजनालय नाम का ठेला दिखा। अलग-अलग तरह पराठे और सब्जी के रेट लिखे हुए थे। प्याज के पराठे भी बिक रहे थे। शायद भक्त कांवड़ियों की नजर पड़ी नहीं ठेले पर वरना तोड़-फोड़ कर दिए होते। यह भी हो सकता है शंकर जी का नाम देखकर छोड़ दिए होते। कल गाजियाबाद में KFC के रेस्टोरेंट को बंद कराने और तोड़फोड़ की घटना के बारे में जानकर मुझे परसाई जी का लेख 'आवारा भीड़ के ख़तरे' याद आया।
सड़क पार एक निःशुल्क शौचालय दिखा। उसके शटर पर ताला लगा था। मुझे लगा शायद दिल्ली की सरकार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश की सरकार भी मुफ्त की सुविधाएं बंद करने पर आमादा है।
आगे जाने पर देखा कि थोड़ी दूर पर एक मुफ्त शौचालय चालू था। शायद इसीलिए पीछे वाले पर ताला लगा हुआ हो।
लौटते होशियारपुर की गलियों के मुहाने देखते हुए आए। हर संकरी गली के बाहर एक बड़ा सा बैंक्वेट हाल दिखा। कहीं कुछ और। ऐसी हर बड़ी इमारत के बाहर खड़े दरबान की वर्दी पर DCP लिखा दिखा। हमने पहले उसको डीएसपी पढ़ा। लगा पुलिस के अधिकारी भला कहाँ इनकी रखवाली के लिए लगायें जाएँगे। बाद में डीसीपी देखा तो साफ़ हुआ मामला। लेकिन फिर यह लगा कि पहले की सोच भी कोई बहुत ग़लत नहीं है। आज पुलिस बड़े -बड़े पैसे वालों की रखवाली करने के लिए ही तो है। एक से एक हिस्ट्रीशीटर की सुरक्षा के लिए सिस्टम लगा हुआ है।
एक मकान के पास से गुजरते हुए देखा एक लड़की पहली मंजिल के रेलिंग पर झुकी, रेलिंग पर अपना चेहरा टिकाये नीचे किसी से बात कर रही थी। सामने देखा तो एक लड़का एक पेड़ से फूल तोड़ रहा था। दोनों शायद फुसफुसाहट से ऊँचे घराने वाली आवाज़ में बतिया रहे थे। हमको वहाँ से गुजरते देख बतियाना स्थगित करके केवल एक-दूसरे को देखने तक सीमित कर लिया। हम उनकी बातचीत में व्यवधान के अपराध बोध से ग्रसित होकर तेज़ी से आगे बढ़ गए। शायद वे फिर बतियाने लगे हों। हमने पहले सोचा कि मोड़ से पलट के देखें उनको लेकिन उनके वार्तालाप में व्यवधान की बात सोचकर बिना पलटे आगे बढ़ गए।
कालोनी के बाहर प्रेस की दुकान पर देखा तो कन्यावती का बच्चा वहीं आसपास की दुकानों के बुजुर्गों के साथ खेल रहा था। कन्यावती और उसका पति कालोनी के घरों में प्रेस के कपड़े लेने गए हुए थे।
हम टहलते हुए वापस घर आ गए।
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Friday, July 18, 2025
भुल्लकड़ी के बहाने
कल रात देर तक बारिश हुई। तेज बारिश। सुबह -सुबह कालोनी के सारे ब्लॉक धुले-धुले लगे। ऐसा लगा उनको धोकर सुखाने के लिए टाँग दिया गया हो। मकानों के फोटो लेते हुए सोचा कि क्या पता उनको भी बुरा लगता हो कि बिना पूछे उनके फोटो ले लेते हैं लोग। क्या पता कोई ब्लॉक यह सोचकर भी एतराज करता हो कि ख़ुद तो कपड़े पहनकर घूमते हैं , हमको बिना कपड़े खड़ा रखते हैं जालिम इंसान लोग। हो सकता है इस पर कोई दूसरा ब्लॉग उसको समझाता हो -"अरे हमारे ऊपर ये प्लास्टर, पेंटिंग ही तो हमारे कपड़े हैं।"
बगल के स्कूल में लोग अपने बच्चों को भेजने के लिए आते दिखे। हर दूसरा बच्चा कार से आता दिखा। कारों की भीड़ स्कूल के सामने, गली में हर जगह है। सड़क पर कारों का जाम सा लग गया।
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार हजारों स्कूल बंद कर दिए। कारण बताया गया कि स्कूल में बच्चे नहीं हैं। क्या पता सरकार आने वाले समय में संभावित जाम से बचने के लिए स्कूल बंद करा रही हो। सरकारें वैसे भी बहुत दूरदर्शी होती हैं।
टहलते हुए अक्सर दोस्तों, साथ काम करने वालों और सीनियरों से बात हो जाती है। हाल-चाल पता हो जाते हैं। पुराने लोगों से बात करते हुए उनसे पुरानी यादें साझा होती हैं, नयी जुड़ती हैं। जिनसे भी हमारे संबंध रहते हैं उनसे जुड़ी कुछ यादें हमारे ज़ेहन में होती हैं, कुछ अच्छी, कुछ बुरी। जिन लोगों के साथ केवल खराब यादें ही जुड़ी होती हैं आम तौर पर हम उनसे बाद में भी संबंध नहीं रखना चाहते। जिनसे संबंध बने रहते हैं उनसे जुड़ी कोई न कोई याद होती है जिसका जिक्र करके बात आगे बढ़ती है। कई बार दो मित्र एक-दूसरे को अलग-अलग यादों के सहारे याद करते हैं।
घूमते हुए उसी पैदल ब्रिज पर आए जिस पर रात भी चढ़े थे। उसी जगह पर खड़े होकर आती-जाती गाड़ियाँ देखीं जहाँ से कल देख रहे थे। सड़क वही थी लेकिन सुबह का नजारा रात के नजारे से अलग था। जो गाड़ियाँ कल आती-जाती दिखीं थीं आज वाली उनसे अलग होंगी। कुछ देर गाड़ियों को देखने के बाद नीचे उतर आए।
तिराहे पर जहाँ कबूतर बैठते हैं कुछ लोग दाना डाल रहे थे। लेकिन कबूतर वहाँ नहीं थे। वे वहीं पास ही ऊपर की रेलिंग पर बैठे थे। सुबह का नाश्ता करने के बाद उनका पेट भरा था शायद इसीलिए वे दाने को देखते हुए भी आराम से ऊपर ही बैठे रहे। इंसान और जानवर यही अंतर होता है। कबूतर की जगह इंसान होते तो दाने समेट के अंदर रख लेते। आगे काम आयेंगे, सोचते हुए।
पार्क के पास एक दुकान में हर सब्जी/फल के दाम लिखे दिखे। पहली दुकान देखी जहाँ सब्जियों के दाम लिखे थे। लेकिन कुछ सामानों के दाम अपडेट नहीं लगे। आम भी 59/- रुपए किलो, धनिया भी इसी तरह भाव।
पार्क में टहलते हुए उन बुजुर्ग की याद आयी जिनकी मोटरसाइकिल नहीं मिल रही थी। पता नहीं मिली होगी कि अभी तक खोज रहे होगे, गाड़ी को गरियाते हुए।
आजकल तो हर सामान के साथ चिप का जुगाड़ हो रहा है। भूल जाओ तो पता चल जाएगा कि कहाँ है सामान। नयी गाड़ी खरीदी थी तो कुछ दिन तक यह देखते रहना हमारा शग़ल था कि गाड़ी अभी किधर है ?
लेकिन ये याददाश्त का भी अजब लफड़ा है। याद आते-आते गुम हो जाती है। दुनिया के तमाम काम आजकल पासवर्ड के सहारे चलते हैं। अक्सर भूल जाते हैं। क्या पता केन्द्रीकरण के समय में आने वाले समय में सारे पासवर्ड की कुंजी किसी एक के पास पहुँच जाये और वो उसे भूल जाते। ऐसा होगा तो दुनिया के तमाम काम-धंधे ठहर जाएँगे।
क्या पता दुनिया बनाने वाले सर्वशक्तिमान जब दुनिया को देखता हो तो इसमें सुधार के बारे में सोचता हो। लेकिन क्या पता उसको भी अपना पासवर्ड बिसरा गया हो। याद ही न आ रहा हो। इसी के चलते दुनिया के तमाम गरीबों, असहायों की प्रार्थनाओं पर कोई कारवाई न कर पाता हो। अपने सच्चे भक्तों पर दुष्टों की बदमाशियाँ चुपचाप देखता रहता हो। क्या पता इसी किसी चक्कर में कोई नया अवतार न हो पा रहा हो। प्राणियों का उद्धार अटका हुआ हो। क्या पता सर्वशक्तिमान की यह भुलक्कड़ी अस्थायी हो । कुछ दिन बाद उसे सब कुछ याद आ जाये और वह अपनी दुनिया को ठीक कर दे। लेकिन क्या पता सर्वशक्तिमान भी अल्जाइमर जैसी किसी तकलीफ़ के चपेटे में आ गया हो जिसका कोई इलाज उसके यहाँ भी न हो और वह भी अपने किसी सर्वशक्तिमान को याद कर रहा हो।
क्या पता भूलने की बीमारी का आने वाले समय में कोई इलाज निकल आए। इंसान के दिमाग़ का नियमित अंतराल पर बैकअप लेते रहने का हिसाब बन जाये जैसे कम्प्यूटर नेटवर्क का लिया जाता है। जब किसी इंसान के याददाश्त गड़बड़ाए तो उसके दिमाग़ का मदरबोर्ड बदल दिया जाये। सारी यादें नए मदरबोर्ड में फिट करके याददाश्त का मामला टनाटन कर दिया जाये।
क्या होगा आने वाले समय में यह तो बाद में पता चलेगा। अभी तो जरा देख लें चश्मा कहाँ रखा है। मोबाइल किधर है?
Thursday, July 17, 2025
पार्क में मोटरसाइकिल
शाम को टहलने निकले। सुबह जो लोग लड़ते-झगड़ते दिखे थे वे आसपास बैठे चाय पी रहे थे। जिसके ऊपर गंदगी का आरोप लगा था उसके दोनों बच्चे नंग-धड़ंग दिगम्बर आपस में खेल रहे थे। दोनों मियाँ बीबी चाय पी रहे थे।
पूछने पर बताया कि वे राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले हैं। आते जाते रहते हैं। यहाँ दिहाड़ी पर काम करते हैं। सामने कुछ प्लास्टिक की गाड़ियाँ भी रखी थीं। शायद बेचने के लिहाज़ से। लेकिन बिकती नहीं हैं वे।
अभी बारिश हो रही है। हवा ठंडी बह रही है। पता नहीं फ़ुटपाथ में रहने वाले लोग कहाँ शरण पाये होंगे।
फ़ुटओवर ब्रिज से गाड़ियाँ आती-जाती दिख रहीं थीं। दूर जाती गाड़ियों की लाल लाइट मानो इशारा कर रही हो -“हमारा पीछा मत करो। भिड़ जाओगे।
सड़क पर एक बुजुर्ग मिले। उन्होंने पूछा -“यहाँ कोई पार्क है?” जिस जगह पूछा था वहाँ आगे-पीछे दोनों तरफ़ पार्क थे। हमने बता दिए। वे पास के पार्क की तरफ़ चले गए। हम दूसरे पार्क में आकर टहलने लगे।
कुछ देर बाद वही बुजुर्ग सामने से आते दिखे। हमने पूछा-“पार्क नहीं मिला क्या पीछे ?”
वे बोले-“पार्क तो मिल गया। लेकिन वहाँ मोटरसाइकिल नहीं मिली। मोटरसाइकिल के पहले उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए बहन से जुड़ी गाली भी दी थी।
पता चला किसी पार्क के पास मोटरसाइकिल खड़ी करके भूल गए कि किस पार्क के पास खड़ी की। पार्क दर पार्क खोज रहे हैं मोटरसाइकिल। हमने उनको आसपास के और पार्क बताये। वे उनको खोजने चल दिए।
हमको याद आया हम सुबह अपना चश्मा आधा घंटा खोजते रहे और मोबाइल भी दस मिनट खोजा। हमको तो चश्मा और मोबाइल मिल गए। उन बुजुर्ग को पता नहीं उनकी मोटरसाइकल मिली कि नहीं ?
सबेरे की सैर
| नोयडा सिटी सेंटर के पास का तिराहा। |
Saturday, July 12, 2025
कांवड़ धारी बच्चे
गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर कुछ कांवड़ धारी बच्चे दिखे। शंकर जी की फ़ोटो लगी टी शर्ट, बरमूडा टाइप नेकर पहने कांवर टांगे बच्चे ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। हाथ में स्मार्टफोन लिए बतिया रहे थे।
Friday, July 11, 2025
हम भारत के लोग
हर जगह का बाजार का हिसाब अलग-अलग होता है। कानपुर में नीबू, खीरा, केला आदि गिनती के हिसाब से मिलते हैं। दिल्ली/NCR में तौल के भाव। कानपुर में आधा दर्जन केला, पाँच नीबू के हिसाब से ख़रीद होती है। नोयडा, दिल्ली में किलो, पाव के हिसाब से। और भी जगह तौल के हिसाब से मिलती होंगी चीजें जो कानपुर और दूसरी जगह गिनती के हिसाब से मिलती हैं।
Thursday, July 10, 2025
प्रधानमंत्री संग्रहालय
कल प्रधानमंत्री संग्रहालय देखने गए। तीन मूर्ति भवन। लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन से तीन मूर्ति भवन की तरफ़ पैदल जाते हुए तमाम सांसदों, मंत्रियों के बड़े-बड़े बंगले दिखे। प्रवेश द्वार के पास बंदूक लिए सुरक्षा पर तैनात जवान। बंगलों की सुरक्षा के लिए लगाए गए तार अलबत्ता कई जगह टूटे दिखे।
Wednesday, July 09, 2025
अभी तो मैं जवान हूँ - सैंट्रो सुंदरी
दिल्ली में पुरानी गाड़ियों को 15/10 साल बाद हटाने की चर्चा अक्सर होती है। आजकल फिर हो रही है। इस बार यह भी जुड़ गया कि पुरानी गाड़ियों को तेल भी नहीं देंगे।
Monday, July 07, 2025
एलिगेटर एलकार्ट्ज़ मतलब मगरमच्छ से घिरी दुर्गम जेल
पिछले दिनों अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों को उनके मूल देश वापस भेजा गया। उनमें भारत के लोग भी थे। प्रवासियों को वापस भेजते समय उनको हथकड़ी बेड़ी लगाकर भेजा गया था। इसकी कड़ी प्रतिक्रिया भी हुई। लोगों ने विरोध किया। इस पर भारत के विदेश मंत्री ने संसद में बयान देते हुए कहा -"अमेरिका वाले ऐसा ही करते हैं। पहले भी ऐसा हुआ है।"





