Tuesday, January 27, 2026

आप मारवाड़ी हैं क्या?

 


आप मारवाड़ी हैं क्या? -टैक्सी ड्राइवर ने गाड़ी में बैठते ही पूछा।

हमने कहा नहीं। मैं मारवाड़ी नहीं हूँ। लखनऊ से आया हूँ।
टैक्सी मैंने गुवाहाटी के खानपारा मोड़ से पकड़ी। काजीरंगा नेशनल पार्क से गुवाहाटी आते हुए शहर से करीब दस किलोमीटर पहले पड़ता है खानपारा। खानपारा मोड़ के डिवाइडर पर एक महिला अनानास के फल को लाइन से सजाकर बेचने के लिए रख रही थी।
खानपारा मोड़ पर शिलांग जाने के लिए कई टैक्सियाँ खड़ी थीं। करीब 90 किलोमीटर दूर है खानपारा मोड़ से शिलांग। साझे की टैक्सी 500 रुपए की। अकेले जाने के लिए 2000 रुपए। साझे की टैक्सी के लिए बाकी सवारी आने में कितनी देर लगती इसका अंदाजा नहीं था। इसलिए अकेले ही चल दिए।
थोड़ी दूर जाने पर किसी का फ़ोन आया। ड्राइवर फ़ोन पर चिल्लाते हुए उसे डाँटने लगा। भाषा समझ में नहीं आयी लेकिन यह अंदाज़ लग गया कि वह सामने वाले को हड़का रहा था। हड़काने में तल्लीन ड्राइवर को देखकर मुझे लगा कि कहीं यह गाड़ी इधर-उधर न भिड़ा दे।
फ़ोन पर हड़काने के कार्यक्रम खत्म होने के बाद मैंने ड्राइवर से कहा कि हमे तो डर लग रहा था तुम्हारे चिल्लाने से। इस पर उसने हँसते हुए बताया जिसका फ़ोन आया उसको कुछ देर पहले उसने फ़ोन किया था। उसने उठाया नहीं था इसलिए वह उसको हड़का रहा था कि जब ज़रूरत थी तब उसने फ़ोन क्यों नहीं उठाया।
रास्ते में सब दुकानें बंद थीं। ड्राइवर ने बताया कि इतवार को सब बंद रहता है। कोई दुकान खोलेगा तो फ़ाइन लगेगा।
ड्राइवर से लखनऊ, कानपुर, दिल्ली, चण्डीगढ़ के बारे में कुछ-कुछ कहता रहा। उसकी बातचीत से अंदाज़ हुआ कि उसको इन जगहों के बारे में उतना ही पता है जितना नार्थ ईस्ट के बारे में शेष भारत के लोगों को पता है।
ड्राइवर ने बताया -"यहाँ सब बड़ा-बड़ा दुकान, काम-काज मारवाड़ी लोग का है। सरकार पर पूरा कब्जा है मारवाड़ी का। वो जो चाहता है वही होता है सरकार में। बहुत पैसा देता है चंदा में सरकार को। काहे नहीं मानेगा सरकार उसका बात? जरूर मानेगी। मानना पड़ेगा उसको।"
मुझे लगा कि ड्राइवर मेघालय के बहाने पूरी दुनिया की बात कर रहा है। दुनिया के सब देशों की सरकारें वहाँ के पैसे वाले, कॉर्पोरेट के कब्जे में हैं। जो वे चाहते हैं, सरकार में बैठे लोग वैसा ही करते हैं।
गाड़ी चलाते-चलाते ड्राइवर ने केले के पत्ते जैसी मुलायम पुड़िया से पान का पत्ता निकाला। उसमें सुपाड़ी और कुछ और मिलाकर पान बनाया । खाया।
एक हाथ से स्टीयरिंग थामे-थामे पान बनाते देखकर मुझे फिर लगा कि कहीं इधर-उधर न हो जाये गाड़ी। मैंने कहा भी -'आराम से पान बना लो फिर गाड़ी चलाओ।' लेकिन उसने अपने अंदाज़ में ही काम किया। पान खाने के पहले मुझे भी पूछा पान खाने के लिये। मैंने मना कर दिया।
मेघालय के बारे में आपनी राय बताते हुए कहा -'यहाँ क्राइम कमती है। चोरी कम है। आप अपना सामान कहीं छोड़ दें तो कोई छुएगा नहीं। वापस जाएँगे तो मिल जाएगा।'
इंदौर की सोनम रघुवंशी द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या का विस्तार से वर्णन किया ड्राइवर ने। एक्शन करते हुए गर्दन पर वार करने का पोज बनाते हुए बताया कि लोकल लोग बताया कि कैसे उसने सिक्योरिटी लेने से मना किया था। हफ्तों तक मीडिया की खुराक बने रहे किस्से का फिर से विस्तृत वर्णन सुनने को मिला।
अपने बारे में बताया पहले दारू खूब पीता था। अब छोड़ दिया। केवल पान खाता है। सेहत का ख्याल जरूरी है।
परिवार के बारे में बताते हुए कहा -'मेरा एज 40 साल है। बीबी बीस साल के करीब है। दस साल पहले शादी बनाया। एक लड़का है। आठ साल का।'
हमने पूछा कि बीस साल की बीबी से दस साल पहले शादी किया ऐसा कैसे? क्या उस समय बीबी दस की थी? इतना अंतर कैसे उमर में?
इस पर उसने पत्नी की उमर में दो-चार साल की बढ़ोत्तरी करते हुए कहा -'दो चार साल ऊपर होगा बीबी का उमर।'
इतने उमर के अंतर के बावजूद लड़की के घर वाले मान कैसे गए शादी के लिए यह पूछने पर उसने कहा -'हम सीधा जाकर लड़की की माँ से बोल दिए कि शादी बनाना है मुझे इससे। वो राजी हो गई।'
शादी का कारण पत्नी की ख़ूबसुरती बताते हुए उसने मोबाइल पर अपने परिवार के कई फोटो दिखाये। खूबसूरत पत्नी के साथ खुश -खुश ड्राइवर को देखकर उनकी उम्र में अंतर लगा नहीं।
हमने कहा -'तुम्हारी बीबी तुमको बुड्ढा कहती होगी?'
इस पर हँसते हुए कहा उसने -'हाँ कहती है कभी-कभी। इस पर मैं उससे कहता हूँ कि जब मैं मर जाऊँगा तो तुम शादी बना लेना। इस पर वह मुझे पीटती है प्यार में कि ऐसा क्यों बोलता मैं।'
पत्नी भी काम करती है। गोवाहाटी में वह जनरल मर्चेंट की दुकान चलाती है।
रास्ते में टोल पड़ा। कानपुर- लखनऊ हाईवे के टोल प्लाजा की तरह ही गोवाहाटी -शिलांग के बीच में पड़ता है टोल। 95 रुपए टोल फीस पड़ी।
रास्ते में पैसे भुगतान के तरीके पर बात हुई। हमने कहा हम डिजिटल पेमेंट कर देंगे। ड्राइवर का कहना था कि उसको नक़द पैसे चाहिए। हमने कहा कि ठीक है कहीं बैंक से निकालकर दे देंगे।
शिलांग में एक जगह गाड़ी रोककर उसने मुझसे प्रस्ताव किया कि हम दुकान वाले को दो हज़ार रुपये पेमेंट कर दें और वह दुकान वाले से दो हज़ार रुपये ले लेगा। हमने उससे कहा -'चिंता न करो मेरे पास हैं। मैं दे दूँगा नकद।' इस पर खुश होते हुए उसने जो कहा उसका मतलब था -'जब पैसे थे पास में तो बैंक से पैसे निकालने का नाटक क्यों किया?'
पैसे भुगतान करने के बाद चलते समय उसने अपना नम्बर दिया। उसमें जो नाम आया वह उसके नाम से अलग था। मैंने पूछा तो उसने बताया कि यह फ़ोन उसकी पत्नी का है। डिजिटल पेमेंट करते तो पैसे पत्नी के खाते में जाते। नकद भुगतान में पैसे उसके पास रहेंगे।
मुझे लगा कि मातृसत्तात्मक परिवार होने के कारण पैसे का नियंत्रण पत्नी के हाथ में होगा। पत्नी के पास पैसे चले जाने के बाद मिलने में परेशानी होगी। इसलिए नकद पैसे मांगे होंगे उसने। सरकार से टैक्स चोरी की तर्ज पर घर की सरकार से भी टैक्सी चोरी का एक उदाहरण देखने को मिला इस बहाने।
ड्राइवर मुझे मेरे रहने के स्थान पर छोड़कर चला गया। अपन शिलांग घूमने के लिए जगहें खोजने लगे।
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शिलांग में पहला दिन


 यात्रा वृत्तांत लिखते हुए सिलसिलेवार लिखने का मन होता है। शुरुआत में इस पर अमल भी करते हैं। लेकिन बाद में यात्राओं के दौरान नए -नए किस्से इतनी तेजी से जुड़ते हैं कि लगता है पहले ताजा किस्सा लिख लें। बीत गया हिस्सा बाद में तफ़सील से लिखेंगे।

अब जैसे गुवाहाटी का किस्सा ही लें। गुवाहाटी में पहले और दूसरे दिन का किस्सा तो लिखा मैंने। लेकिन इसके बाद के गुवाहाटी और फिर काजीरंगा के किस्से रह गए। गुवाहाटी से शिलांग आ गए तो यहाँ के किससे शुरू हो गए। लफड़ा है। लेकिन जो है सो है। अभी शिलांग के किस्से चल रहे हैं तो यही जारी रखते हैं। ठीक है न?
गुवाहाटी से शिलांग आते हुए ड्राइवर और उनकी पत्नी की उमर के अंतर को लेकर सवाल उठे कि दस साल पहले शादी हुई। बच्चा सात साल का है। तो पत्नी की उमर बीस और पति की चालीस कैसे हो सकती है?
हमने अभी ड्राइवर को फ़ोन करके फिर कन्फ़र्म किया और कहा सही में बताओ कि पत्नी की उमर बीस साल है? इस पर उसने हँसते हुए कहा (कुछ कन्फ़र्म नहीं किया) -" पत्नी से मिलवा देते हैं। ख़ुद देख लेना।"
परसों गुवाहाटी वापस लौटना है। उसी ड्राइवर को गाड़ी लाने को बोला है। रास्ते में और बातचीत होगी इस बारे में। उसका अपडेट पोस्ट करूँगा।
शिलांग पहुँचने के बाद चाय पीकर टहलने निकले। शाम के पाँच बज गए थे। अंधेरा होने वाला था। पास ही सिविल बाजार टहलते हुए एक टैक्सी वाले से एलिफ़ेंट फ़ाल्स जाने का भाड़ा पूछा। करीब नौ किलोमीटर का भाड़ा बताया उसने एक हज़ार रुपये। हमने किराए को ज्यादा समझकर आगे बढ़ गए। यह भी सोचा कि शाम को क्या झरना देखना।
आगे एक मोपेड वाले ने मुझे रोककर पूछा -' स्पीडो राइड चाहिए?' हमने एलिफेंट फाल्स का किराया पूछा। उसने जो बताया उसको छह सौ बताया। आख़िर में बात चार सौ रुपए पर तय हुई। उसने हमको हेलमेट पकड़ाया और स्कूटी के पीछे बैठने को कहा।
मेघालय में दुपहिया वाहन पर पीछे बैठने वाली सवारी को भी हेलमेट पहनना अनिवार्य है। इससे बड़ी बात यह कि इसका यहाँ पालन भी होता है।
शहर के बाहर जाते ही सड़क का मूड खराब दिखने लगा। पूरी सड़क किसी अराजक लोकतंत्र की शासन व्यवस्था की ऊबड़-खाबड़ थी। सड़क बन रही थी। मिट्टी और बजरी के कारण बहुत धीरे-धीरे चलते हुए हम आगे बढ़े।
सर्दी काफ़ी थी। अच्छा हुआ हम फूल स्वेटर और जैकेट पहने थे। आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए हम को एलिफ़ेंट फ़ाल्स प्वाइंट पहुँचे। झरना देखने का टिकट एक सौ रुपया था। हमारी जानकारी में मेरी जेब में सौ का नोट पड़ा था। हमने बिना देखे उसे टिकट काउंटर पर दे दिया। काउंटर पर खड़ी महिला ने तुरंत टिकट और तीन सौ रुपये वापस किए। इससे मुझे अंदाजा हुआ कि नोट पाँच सौ का था।
यह आभास होते ही हमने उससे कहा -' मैं अकेले हूँ। साथ वाला तो रैपिडो ड्राइवर है। उसका टिकट क्यों बनाया?' उसने अच्छा, ओके कहते हुए टिकट वापस लिया। दो आदमी को काटकर एक किया और सौ रुपया और वापस कर दिया ।
अंदर पहुँचकर सीढ़ियाँ उतरते हुए झरने के पास तक पहुँचे। झरने से पानी नीचे गिर रहा था। हमने उसका फोटो लिया वीडियो बनाया। झरने के पानी सर्दी का एहसास करा रहा था।
हमने लोगों के देखादेखी हम झरने के नजदीक पत्थर पर खड़े होकर वीडियो बनाने के लिए आगे बढ़े। एकाध पत्थर पर तो पैर ठीक पड़ा। बाद में आगे बढ़ने पर पैर हल्का लड़खड़ाया। जूता पानी में भीग गया। जूते के साथ मोजा भी गीला हो गया। पैर से सेंध लगाकर सर्दी पूरे शरीर में घुसने लगी। वो तो कहो पानी से पैर फौरन खींच लिया वरना बड़ा लफड़ा होता।
थोड़ी देर की फ़ोटो बाजी, वीडियो बाजी करने के बाद हम वापस लौटे। वापस लौटते हुए ड्राइवर से अपनी भी फ़ोटो खिंचा लिए।
सीढ़ियों से उतरते और बाद में वापस जाते समय चढ़ते हुए कई बार पैर लड़खड़ाया। लेकिन संभल गए। हर बार लगता कि कहीं किसी हड्डी के डॉक्टर के दर्शन न करने पड़ें।
ऊपर पहुँचकर वहाँ बने के कैफ़े में चाय पी। चाय और कुछ नाश्ते के एक सौ साथ रुपये हुए। ड्राइवर को चार सौ रुपए देने थे। उसके पास आनलाइन भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं थी। लिहाजा ड्राइवर की सलाह पर हमने ड्राइवर के चार रुपए मिलाकर कुल पाँच सौ साथ रुपए भुगतान किए। कैफ़े वाले ने चार सौ रुपये मुझे नक़द थमा दिये।
लौटते हुए आहिस्ते-आहिस्ते आ रहे थे। सड़क पर भीड़ थी। साथ में गीली मिट्टी के कारण सड़क रपटीली भी थी। एक जगह शायद रपटन ज्यादा थी। रपटन में स्पीड कुछ ज़्यादा हो गई। जब तक हम आगे कुछ समझ पायें तब तक हमारा ड्राइवर, स्कूटी और हम भी सड़क पर लंबलेट हो गए। सड़क पर लेटने की मुद्रा ऐसी जैसी सड़क कोई बिस्तरा हो जौर जिसमे अपन तिरछे होकर लेट गए हैं। हमारे घुटने में हल्का दर्द महसूस हुआ। जींस का घुटना और जैकेट की कोहनी में गीली मिट्टी लग गई।
हम आहिस्ते से उठे। पास में आ गए युवक ने हाथ पकड़कर उठाने में मदद की। खड़े होकर हमने देखा कि कई दुपहिया वाहन वहां सरेंडर मुद्रा में लेटे हुए थे। अच्छी बात यह हुई कि गिरते ही लोगों ने रील बनाने के बजाय गिरे हुए लोगों को उठाने में सहायता दी। हमको तो घुटने में हल्का दर्द महसूस होने के अलावा कोई चोट नहीं लगी थी। अलबत्ता ड्राइवर का होंठ हल्का सा कट गया था। उससे ख़ून बहने लगा। उसको दबाकर रखने के बाद थोड़ी देर में ख़ून रूक गया।
सड़क से उठने के बाद हमने स्कूटी की कमान अपने हाथ में ले ली। आहिस्ते-आहिस्ते स्कूटी चलाते हुए अपनी रुकने की जगह तक आए। ड्राइवर को चार सौ रुपए भुगतान किए। वह चला गया। जाने से पहले उसने गिर जाने के लिए और हमारी जींस और जैकेट ख़राब होने के लिए माफ़ी माँगी। हमने उसके कन्धे पर हाथ रखकर उसको विदा किया।
स्कूटी का सफ़र शुरू होने से लेकर ख़त्म होने तक ड्राइवर ने अपनी दास्तान बताई। जैसे उसने बताया उसके अनुसार उसके माँ-पिता नेपाल के थे। दोनों ने भागकर शादी की। चार बच्चे होने के बाद माँ किसी और के साथ चली गई। तब ड्राइवर की उमर दस साल थी। कहाँ गई, किसके साथ गई , पता नहीं चला। उसके बाद पिता ने चारों बच्चों को पाला। अब ड्राइवर की उमर तीस पार है।
स्कूटी चालक ने अपने किस्से भी सुनाये। जैसा उसने बताया उसके अनुसार उसका पहले एक बंगाली लड़की से प्रेम संबंध और संसर्ग रहा। उसकी शादी हो जाने के बाद कई विवाहित महिलाओं से संसर्ग का सिलसला चला। फ़िलहाल मेघालय की जिस लड़की से प्रेम संबंध है वह अभी पढ़ रही है। लड़की के नर्स का कोर्स पूरा करने के बाद उससे शादी का प्लान है। लड़की लड़के से उमर में छोटी है लेकिन पढ़ाई में आगे है। हमने उससे कहा कि ज़्यादा पढ़ने के बाद लड़की किसी और से भी शादी कर सकती है।
इस पर उसने कहा -' हाँ , हो सकता है। मैंने उससे कह भी दिया है कि कोई बेटर पार्टनर मिल जाये तो उससे शादी बना लेना।'
करीब दो घंटे साथ रहने के दौरान उसने हर प्रेम संबंध और संसर्ग के किस्से तफ़सील से बताये। उसने यह भी बताया कि पास में ही बाजार में जरूरत के हिसाब से साथ देने वाली महिलायें उपलब्ध हो जाती हैं।
यह भी लगा कि इसी देश के कुछ हिस्सों में प्रेम संबंध का पता चलने पर पंचायतें और घर वाले प्रेम करने वालों की जान ले लेते हैं। वहीं कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ लोगों के लिए प्रेम करना और सबंध बनाना ब्लिंकिट से सामान मंगाने की तरह सहज और सुगम और आम बात है। यह अलग बात है कि देश की बड़ी आबादी को ब्लिंकिट से सामान मंगाना बनाना भी दुर्गम काम है। प्रेम संबध बनाना भी। उनके लिए प्रेम अभी भी आग का दरिया है जिसे डूबकर पार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बना।
पहले का किस्सा यहाँ पढ़े : https://www.facebook.com/share/p/17jHBbLrN8/
अगले दिन की घुमाई का किस्सा इस पोस्ट पर पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/p/1CAaexzgfv/

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Monday, January 26, 2026

अभी से कुछ 'कहने नहीं सकते'

 ब्रह्मपुत्र रिवर फ्रंट में एक जगह पर नौ साल के विहान को डांस का अभ्यास कराते उनके गुरु जी।

गुरु जी डांस इंडिया डांस टाइप की प्रैक्टिस कर रहे थे। बच्चे को उछालकर सर तक ले जाते फिर उलटा करके डांस करते हुए डांस स्टंट करते लगे गुरु जी। 9 साल के बच्चे विहान की माँ अनीता अपने बच्चे को गुरु जी के साथ स्टंट डांस करते हुए देख रही थी। बच्चे के पिता सीआरपीएफ में नौकरी करते हैं।
हमने बच्चे की माँ से पूछा -'क्या इसे डांस इंडिया डांस जैसे किसी कम्पटीशन में भेजने का विचार है? ' इस पर उन्होंने कहा -' सिखा रहे हैं। सीख जायेगा तो जाएगा। अभी से कुछ 'कहने नहीं सकते'।'

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गुवाहाटी म्यूजियम


 ब्रह्मपुत्र रिवर फ्रंट से बाहर निकलकर हम लोग काफ़ी देर सड़क पर टहलते रहे। (इसके पहले का किस्सा यहाँ पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/p/1A4GxXUoeH/)

एक जगह बैटरी वाले रिक्शे दिखे। बैटरी से चलने वाले इन रिक्शों में पैडल नहीं मारना पड़ता है। बस पैडल पर पैर रखकर चलते जाते हैं रिक्शे वाले। रिक्शे वाले सवारी के इंतजार में बैठे थे। बात की तो पता चला कि बिहार के भागलपुर से हैं। रिक्शे का किराया 300 रुपया पड़ता है। बैटरी रिक्शा मालिक चार्ज कराता है। बिहार से गुवाहाटी रिक्शा चलाने आते हैं। महीने -दो महीने रिक्शा चलाते हैं फिर घर वापस चले जाते हैं।
आगे एक और रिक्शेवाले दिखे। बिहार के मधेपुरा से आए हैं गुवाहाटी में रिक्शा चलाने। मधेपुरा लालू यादव का चुनाव क्षेत्र रहा है। मन किया कुछ बात करें लालू यादव के बारे में लेकिन फिर नहीं किए।
बैटरी रिक्शे में बैठने वाली सवारी की सीट के नीचे रखी रहती है। स्टार्ट बटन आगे हैंडल पर। बैटरी से चलने वाले रिक्शे देखकर याद आया कि कानपुर में पैडल मारकर चलने वाले रिक्शे चलते हैं। पचास रुपया किराया लगता है। कोलकाता में कुछ जगह अभी भी हाथ से खींचने वाले चलते हैं। गुवाहाटी में बैटरी चालित रिक्शे। एक ही समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह के रिक्शे चल रहे हैं। कुछ ऐसे जैसे एक ही समय में किसी भी देश में बहुत अमीर, मध्यम वर्ग और गरीब-गुरबे के तबके लोग रहते हैं।
वहीं एक जगह ठेले पर भेलपूरी बिक रही थी। भेलपूरी खाती हुई बालिका से उसके स्वाद के बारे में पूछा तो उसने कहा -'टेस्टी है। आप भी खाइए।' कहने के बाद वह तल्लीनता से भेलपूरी खाने में मशगूल हो गई। हमारी तरफ़ पलटकर भी नहीं देखा। हम भी उसकी तरफ़ से मुँह फेर कर आगे बढ़ गए। खाई नहीं भेलपूरी।
आगे एक जगह कड़क चाय का बोर्ड हमारा स्वागत करता दिखा लेकिन हम वहाँ भी नहीं रुके। थोड़ी दूर पर बने म्यूजियम को देखने निकल गए।
म्यूजियम का टिकट 33 रुपए का था। तीन मंजिलों में बने इस म्यूजियम में आसाम की कलाकृतियाँ, जीवन से जुड़े विभिन्न सामानों का संग्रह था। सैकड़ों साल पुरानी मूर्तियों पर उनको पाये जाने का समय और स्थान लिखा था। मूर्तियाँ बनाने वाले अपने जमाने के प्रसिद्ध कारीगर रहे होंगे। लेकिन किसी मूर्ति पर उसके कारीगर का नाम नहीं लिखा था। समय के साथ बिरले लोगों का नाम ही बचता है। कुछ लोगों का केवल काम ही बचता है। तमाम लोगों का तो काम भी नष्ट हो जाता है समय के साथ। जनता के पैसे से अपने बड़े-बड़े पोस्टर, होर्डिंग बनवाने वाले लोगों को यह एहसास होता तो शायद कुछ अलग बात होती।
मूर्तियों कलाकृतियों के अलावा वहाँ सिक्के, कपड़े बनाने के उपकरण और लिखाई-पढ़ाई से संबंधित चीजें भी थीं। ताम्र पत्रों पर जमीन के हस्तांतरण के दस्तावेज थे। उनको पढ़कर समझना मुश्किल। क्या पता आज से सौ-दो सौ साल बाद आज के तमाम दस्तावेज़ पढ़े जा सकेंगे या नहीं। आने वाले समय में उनकी भाषा कितनी बदल चुकी होगी, कहना मुश्किल।
एक जगह आसाम के एक आम घर का ताना-बाना सजा था। जलता हुआ चूल्हा, बर्तन, घड़ा, बर्तन रखने की जगह, लकड़ियाँ, झाड़ू, सूप, अल्यूमियम की केतली। वहीं पर दूध और खाना रखने रस्सी का बना सिकहर लटकता दिखा। सिकहर से मध्यप्रदेश में मंत्री द्वारा एक पत्रकार से बोले शब्द 'घंटा' पर हुई चर्चा की याद आई। रागदरबारी में इसी तरह के भाव व्यक्त करने के लिए 'सिकहर' शब्द का प्रयोग हुआ है। अब उसका कोई जिक्र ही नहीं करता। समय सबको समेटकर किनारे कर देते है।
दिन भर घूमकर वापस लौटते हुए एक होटल में कुछ नाश्ता करने के लिए रुके। इसके बाद डॉक्टर साहब को विदा करके हमने कैंट जाने के लिए ऑटो खोज। दो लोगों ने ऑटो कैंसल कर दिया। तीसरे ने साथ चलने की हामी भारी। ऑटो स्टार्ट करने के बाद कैंट के बारे में जानकारी लेते हुए पूछा - ‘ महाराज जी आते हैं उधर ?’
विवरण के लिए पोस्ट का लिंक : https://www.facebook.com/share/p/1ACqk4mGUi/
ऑटो वाले ने करीब आधे घंटे बाद हमको आफिसर्स मेस छोड़ दिया। यह हमारा गुवाहाटी में दूसरा दिन था।

https://www.facebook.com/share/p/1VB2qz4ePy/

Sunday, January 25, 2026

ब्रह्मपुत्र रिवर फ्रंट पर


 गोवाहाटी में आने का मुख्य आकर्षण यहाँ डॉक्टर एम के लंगथासा Mohanta Langthasa और कर्नल रावत से मिलना था। कर्नल रावत शाहजहांपुर में निर्माणी के सुरक्षा अधिकारी थे। उनसे हमारे प्यारे पारिवारिक संबंध हैं। उनसे और उनके परिवार से मिलना इस यात्रा की सुखद उपलब्धि है। कर्नल रावत असम में काफ़ी समय रहे हैं। कई आपरेशन में भाग लिया जिनके बारे में वे अब जब किताबों में पढ़ते हैं तो उनको लगता है -'इसके बारे में तो मुझे लिखना चाहिए।' असम के बारे में तमाम जानकारियां उन्होंने बातचीत के दौरान साझा की हैं। उनको पढ़ने का भी काफ़ी शौक है। उनके घर की लाइब्रेरी में कई महत्वपूर्ण किताबें देखी मैंने। लगा कि ये किताबें हमको भी पढ़नी चाहिए। उनको हमने अपने अनुभवों पर किताब लिखने के बारे उकसाया है। क्या पता आने वाले समय में उनकी लिखी किताबें पढ़ने को मिलें।

डॉक्टर एम के लंगथासा हमारे विभाग के डॉक्टरो के वरिष्ठतम पद (DHS) पर कई साल काम करने के बाद 15 साल पहले रिटायर हुए हैं। उनके समय में किए गए काम को लोग आज भी याद करते हैं। मैं कानपुर और शाहजहांपुर में पोस्टिंग के दौरान उनसे व्यक्तिगत और पारिवारिक संपर्क रहा। उनको लोग एक बेहतरीन डॉक्टर और प्यारे इंसान के रूप में याद करते हैं। आयुध निर्माणियों के तमाम डॉक्टरों के वे रोल मॉडल हैं।
डॉक्टर लंगथासा जी लंबे समय बाद मुलाक़ात हुई। तमाम पुरानी यादों को दोहराया गया। गोहाटी घूमने के बारे में बताया तो डॉक्टर साहब ने अपनी गाड़ी निकाली और साथ घूमने निकल लिए। आहिस्ते-आहिस्ते शहर की सड़को पर घूमते हुए कई जगहें दिखाईं।
गोहाटी की कचहरी के बाहर वकीलों की कम भीड़ देखकर लगा यहाँ मुकदमे कम हैं या वकील। वैसे भी लाहे-लाहे जीने वाले समाज में कोर्ट कचहरी का क्या काम ?
सड़क पर भीड़ थी। कई जगह हल्का जाम भी। जगह-जगह फ्लाई ओवर बनते दिखे। कुछ जगह सड़क पार करने के लिए पैदल पार पथ बने थे। उनमें से कुछ में सीढ़ियों के साथ एस्केलेटर भी लगे थे। लोग उन पर चढ़कर सड़क पार करते दिखे।
हम लोग ब्रह्मपुत्र नदी किनारे बने रिवर फ्रंट को देखने गए। वहाँ एक बड़े पुराने बंगले को पुरातात्विक संग्रहालय का रूप दिया गया है। आसाम से जुड़ी चीजों का संग्रह है। तरह-तरह के वाद्य यंत्र , कला कृतियाँ और पेंटिंग भी।
संग्रहालय की तरफ़ जाते हुए एक पेड़ पर लड़के हुए तमाम चमगादड़ दिखे। सर के ऊपर पेड़ पर लटके चमगादडों को देखकर लगा दुनिया के तमाम देशों में ताकतवर पदों पर काबिज नुमाइंदे हैं जो दुनिया को उलटी तरफ़ ले जाने की पूरी करने में जुटे हैं। लड़ाई के सारे इंतज़ाम करने के बाद शांति के लिए कमेटी बनाने के लिए झगड़ रहे हैं।
संग्रहालय का टिकट सौ रुपए है। 75 वर्ष से अधिक की उम्र के लोगों का प्रवेश मुफ्त है। डाक्टर साहब 75 पार हैं। उनका टिकट नहीं पड़ा। किसी ने उनसे प्रमाण भी नहीं मांगा। लोग उनको जानते हैं। वे अक्सर यहाँ की लाइब्रेरी में किताबें देखने आते रहते हैं।
संग्रहालय के सामने ही स्टारबक्स का कॉफ़ी हाउस है। हम लोगों ने वहाँ कॉफ़ी पी। बाहर बैठकर कॉफ़ी पीते हुए आर्डनेंस फैक्ट्री से जुड़े हुए कई अधिकारियों से बातचीत की। सबको एक दूसरे के फ़ोन नम्बर दिए। सबका धन्यवाद हासिल किया।
कॉफ़ी पीने वहीं पास में पार्क में टहलते रहे। एक जगह जमींन पर शतरंज के बड़े आकार के मोहरे रखे हुए थे। पार्क में आते-जाते लोग उन मोहरों को उठाकर एक खाने से दूसरे में रखते जा रहे थे। लोगों द्वारा उठाकर रखे जाने पर ऐसा लगता मानो सही में कोई प्यादा, कोई वजीर, कोई राजा एक जगह से उठाकर दूसरी जगह रख दिया गया हो। एक दर्शक ने राजा का मोहरा उठाकर दूसरी जगह रखा तो ऐसा लगा जैसे किसी बाहुबली देश ने दूसरी/ तीसरी दुनिया किसी देश के प्रशासक को उठाकर उसकी जगह कोई दूसरा प्रशासक रख दिया हो।
शतरंज के खेल के बगल में ही सांप-सीढ़ी के खाने बने हुए थे। पास ही एक बड़ा सा पांसा रखा हुआ था। एक युवा जोड़ा वहाँ पासा फेंकता हुआ सांप-सीढ़ी का खेल खेल रहा था। लड़का पाँसा फेंक रहा था। जो नंबर आ रहा था, लड़की उसके हिसाब से आगे-पीछे घूम रही थी। कुछ देर में लड़की पाँसा फेंकने लगी और लड़का वहाँ बने खानों में टहलने लगा। उनको खेलते देखकर हम भी वहाँ खड़े हो गए। कुछ देर में उनसे बतियाने भी लगे।
बातचीत के दौरान पता चला कि लड़की आसाम पब्लिक सर्विस की तैयारी कर रही है। दोस्त के साथ घूमने आयी है। लड़के का नाम बेदांत, लड़की का नाम डोरियोली (Doriyoli) । डोरियोली पहली बार सुना था। मतलब पूछने पर उसने बताया -नदी की धारा।
हमने उनका फ़ोटो खींचा और उनको भेजने के लिए उनका नंबर मांगा। लड़के ने एयरड्रॉप से भेजने को कहा। एयरड्रॉप से मुझे लक्षद्वीप का एयरड्रॉप का क़िस्सा याद आ गया। (https://www.facebook.com/share/p/17wW6YceMY/)।
शतरंज और सांप सीधी के खेल वाले हिस्से निकलकर हम लोग देर तक ब्रह्मपुत्र नदी के नए बने रिवरफ्रंट पर टहलते रहे। लोग वहाँ अपने परिवार वालों के साथ, दोस्तों के साथ घूमने आए थे। युवा लोग ज़्यादा दिखे। सब फोटो खींचने, खिंचवाने में जुटे थे। लड़कियां खासतौर से पोज बनवा कर फोटो खिंचाते, सेल्फी लेती दिखीं। एक जगह हथेलियों के आकार की कलाकृति में आसाम का नक्शा बना था। उसके सामने खड़े होकर एक युवती अपना फ़ोटो खिंचा रही थी। उसका साथी बार-बार फ़ोटो ले रहा था। कई फोटो लेने के बाद संतुष्ट हुआ और आगे बढ़ा।
सामने ब्रह्मपुत्र नदी बह रही थी। नदी के बीच में बने उमानंदा मदिर देखने लोग नाव से जा रहे थे। हमने उसको देखना अगले दिन के लिए स्थगित कर दिया। रोप वे से नदी को ऊपर से देखने का विचार था लेकिन उस दिन मरम्मत के लिए रोप वे बंद था।
पार्क के एक कोने में कुछ लोग डांस करते दिखे। पास गए तो देखा कि एक बच्चे के साथ उनके गुरु जी डांस इंडिया डांस टाइप की प्रैक्टिस कर रहे थे। बच्चे को उछालकर सर तक ले जाते फिर उलटा करके डांस करते हुए डांस स्टंट करते लगे गुरु जी। 9 साल के बच्चे विहान की माँ अनीता अपने बच्चे को गुरु जी के साथ स्टंट डांस करते हुए देख रही थी। बच्चे के पिता सीआरपीएफ में नौकरी करते हैं।
हमने बच्चे की माँ से पूछा -'क्या इसे डांस इंडिया डांस जैसे किसी कम्पटीशन में भेजने का विचार है? ' इस पर उन्होंने कहा -' सिखा रहे हैं। सीख जायेगा तो जाएगा। अभी से कुछ 'कहने नहीं सकते'।'
हम लोग बच्चे को शुभकामनाएँ देकर आगे बढ़ गए।

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