ब्रह्मपुत्र रिवर फ्रंट से बाहर निकलकर हम लोग काफ़ी देर सड़क पर टहलते रहे। (इसके पहले का किस्सा यहाँ पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/p/1A4GxXUoeH/)
एक जगह बैटरी वाले रिक्शे दिखे। बैटरी से चलने वाले इन रिक्शों में पैडल नहीं मारना पड़ता है। बस पैडल पर पैर रखकर चलते जाते हैं रिक्शे वाले। रिक्शे वाले सवारी के इंतजार में बैठे थे। बात की तो पता चला कि बिहार के भागलपुर से हैं। रिक्शे का किराया 300 रुपया पड़ता है। बैटरी रिक्शा मालिक चार्ज कराता है। बिहार से गुवाहाटी रिक्शा चलाने आते हैं। महीने -दो महीने रिक्शा चलाते हैं फिर घर वापस चले जाते हैं।
आगे एक और रिक्शेवाले दिखे। बिहार के मधेपुरा से आए हैं गुवाहाटी में रिक्शा चलाने। मधेपुरा लालू यादव का चुनाव क्षेत्र रहा है। मन किया कुछ बात करें लालू यादव के बारे में लेकिन फिर नहीं किए।
बैटरी रिक्शे में बैठने वाली सवारी की सीट के नीचे रखी रहती है। स्टार्ट बटन आगे हैंडल पर। बैटरी से चलने वाले रिक्शे देखकर याद आया कि कानपुर में पैडल मारकर चलने वाले रिक्शे चलते हैं। पचास रुपया किराया लगता है। कोलकाता में कुछ जगह अभी भी हाथ से खींचने वाले चलते हैं। गुवाहाटी में बैटरी चालित रिक्शे। एक ही समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह के रिक्शे चल रहे हैं। कुछ ऐसे जैसे एक ही समय में किसी भी देश में बहुत अमीर, मध्यम वर्ग और गरीब-गुरबे के तबके लोग रहते हैं।
वहीं एक जगह ठेले पर भेलपूरी बिक रही थी। भेलपूरी खाती हुई बालिका से उसके स्वाद के बारे में पूछा तो उसने कहा -'टेस्टी है। आप भी खाइए।' कहने के बाद वह तल्लीनता से भेलपूरी खाने में मशगूल हो गई। हमारी तरफ़ पलटकर भी नहीं देखा। हम भी उसकी तरफ़ से मुँह फेर कर आगे बढ़ गए। खाई नहीं भेलपूरी।
आगे एक जगह कड़क चाय का बोर्ड हमारा स्वागत करता दिखा लेकिन हम वहाँ भी नहीं रुके। थोड़ी दूर पर बने म्यूजियम को देखने निकल गए।
म्यूजियम का टिकट 33 रुपए का था। तीन मंजिलों में बने इस म्यूजियम में आसाम की कलाकृतियाँ, जीवन से जुड़े विभिन्न सामानों का संग्रह था। सैकड़ों साल पुरानी मूर्तियों पर उनको पाये जाने का समय और स्थान लिखा था। मूर्तियाँ बनाने वाले अपने जमाने के प्रसिद्ध कारीगर रहे होंगे। लेकिन किसी मूर्ति पर उसके कारीगर का नाम नहीं लिखा था। समय के साथ बिरले लोगों का नाम ही बचता है। कुछ लोगों का केवल काम ही बचता है। तमाम लोगों का तो काम भी नष्ट हो जाता है समय के साथ। जनता के पैसे से अपने बड़े-बड़े पोस्टर, होर्डिंग बनवाने वाले लोगों को यह एहसास होता तो शायद कुछ अलग बात होती।
मूर्तियों कलाकृतियों के अलावा वहाँ सिक्के, कपड़े बनाने के उपकरण और लिखाई-पढ़ाई से संबंधित चीजें भी थीं। ताम्र पत्रों पर जमीन के हस्तांतरण के दस्तावेज थे। उनको पढ़कर समझना मुश्किल। क्या पता आज से सौ-दो सौ साल बाद आज के तमाम दस्तावेज़ पढ़े जा सकेंगे या नहीं। आने वाले समय में उनकी भाषा कितनी बदल चुकी होगी, कहना मुश्किल।
एक जगह आसाम के एक आम घर का ताना-बाना सजा था। जलता हुआ चूल्हा, बर्तन, घड़ा, बर्तन रखने की जगह, लकड़ियाँ, झाड़ू, सूप, अल्यूमियम की केतली। वहीं पर दूध और खाना रखने रस्सी का बना सिकहर लटकता दिखा। सिकहर से मध्यप्रदेश में मंत्री द्वारा एक पत्रकार से बोले शब्द 'घंटा' पर हुई चर्चा की याद आई। रागदरबारी में इसी तरह के भाव व्यक्त करने के लिए 'सिकहर' शब्द का प्रयोग हुआ है। अब उसका कोई जिक्र ही नहीं करता। समय सबको समेटकर किनारे कर देते है।
दिन भर घूमकर वापस लौटते हुए एक होटल में कुछ नाश्ता करने के लिए रुके। इसके बाद डॉक्टर साहब को विदा करके हमने कैंट जाने के लिए ऑटो खोज। दो लोगों ने ऑटो कैंसल कर दिया। तीसरे ने साथ चलने की हामी भारी। ऑटो स्टार्ट करने के बाद कैंट के बारे में जानकारी लेते हुए पूछा - ‘ महाराज जी आते हैं उधर ?’
विवरण के लिए पोस्ट का लिंक : https://www.facebook.com/share/p/1ACqk4mGUi/
ऑटो वाले ने करीब आधे घंटे बाद हमको आफिसर्स मेस छोड़ दिया। यह हमारा गुवाहाटी में दूसरा दिन था।
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