Saturday, May 10, 2025

हिंदुस्तान -पाकिस्तान

 1947 में जब देश की धरती का बंटवारा हो गया तो उसी समय दिल्ली में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमें इसी विषय पर कविता पढ़नी थी। गीतकार रमानाथ अवस्थी जी ने पढ़ा:-

धरती तो बंट जायेगी
पर नीलगगन का क्या होगा?
हम तुम ऐसे बिछड़ेंगे
तो महामिलन का क्या होगा?
कविता को सुनकर , कहते हैं , मंच पर अनेक लोगों की आंखे भर आयी थीं,खासकर पाकिस्तान से आये शायरों की।
उस समय बंटवारे की घटना ताजा थी। जो लोग इससे प्रभावित हुए उनको इसका अफ़सोस रहा होगा। कुछ लोग वर्षों तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान की साझा विरासत की बात करते। देश के तमाम लोगों का विचार था कि भारत-पाकिस्तान को साझा गठबंधन में रहना चाहिए। देश की आजादी में योगदान देने वाले कई महापुरुष दोनों देशों से अनुराग रखते थे। गांधी जी तो पाकिस्तान जाना भी चाहते थे लेकिन उनकी हत्या हो गई।
भारत-पाकिस्तान महासंघ के बड़े हिमायतियों में लोहिया जी प्रमुख थे। उनका मानना था कि देश का विभाजन साम्राज्यवादी ताकतों की साजिश के तहत हुआ था। भारत पाक महासंघ के रूप में उनका प्रस्ताव था कि दोनों देश अपने-अपने संविधान के अनुरूप काम करें। लेकिन रक्षा , विदेश नीति और आर्थिक नीतियों जैसे मुद्दों पर निर्णय महासंघ करे। जयप्रकाश नारायण जी के भी कुछ ऐसे ही विचार थे।
कुछ लेखक, संस्कृति कर्मियों और सामाजिक जीवन से जुड़े लोग भी भारत पाकिस्तान के बीच महासंघ जैसे प्रस्ताव के बारे में कल्पना करते थे। इनमें कुलदीप नैयर, खुशवंत सिंह जैसे नामचीन लोग भी शामिल थे।
लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, पाकिस्तान फौज के नियंत्रण में आता गया भारत-पाकिस्तान महासंघ का सपना ख़त्म होता गया। छिटपुट नियमित झड़पों के अलावा तीन बड़ी लड़ाइयाँ हो चुकी हैं दोनों देशों के बीच। अब चौथी की तैयारी है। दोनों देशों की सेनायें अपने-अपने हिसाब से लड़ाई के लिए तैयार हैं। लड़ना शुरू भी कर दिया है। अब निकट भविष्य में दोनों देशों के महासंघ की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती।
कट्टरपंथ, सेना के नियंत्रण और तमाम दूसरे कारणों से पाकिस्तान के हाल बेहद ख़राब बताये जाते हैं। पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। आजादी के 78 साल के बाद एक साथ आजाद हुए दो देशों के बीच इतना अंतर आ चुका है कि कल्पना करना मुश्किल है कि कभी दोनों एक ही देश थे।
दोनों देशों के बीच एकता , मिलन के न जाने कितने कितने किस्से चले होंगे। न जाने कितनी कविताएँ लिखीं गईं होंगी। इनमें कुछ साझा होकर मिल जाने की होंगी, कुछ पाकिस्तान को मिटाकर हिंदुस्तान में शामिल करने की रही होंगी। हिंदुस्तान के वीर रस के कवियों की तो रोज़ी-रोटी ही पाकिस्तान विरोध की कविताएँ हालत चलती रही।
इन लोगों से मज़े लेते हुए शाहजहांपुर के ख्यालबाज लल्लन ने लिखा था:
फूंक देंगें पाक़िस्तान लल्लन ,
दो सौ ग्राम पीकर देखो ।
आज दोनों देशों के हाल ऐसे हैं कि उनके बीच एकता और भाईचारे की बात करने वालों को, दोनों देशों के युध्दातुर वीरबांकुरे, कायर और अपने वीरता के आनंद में ख़लल डालने वाला मानते हैं। पाकिस्तान का तो पता नहीं लेकिन हिंदुस्तान में कई लोग तो इस इंतज़ार में हैं कि कब लाहौर में चाय पियें, कब मिठाई खायें।
पाकिस्तान को अपने कब्जे में लेकर उसको बर्बाद करने वाले कुछ लोग तो देवताओं पर विजय के बाद इंद्राणी से मिलने के लिए ऋषियों की पालकी में सवार राजा ययाति की तरह व्यग्र हो रहे हैं। बड़ी बात नहीं कल को ये लोग लाहौर, रावलपिंडी , इस्लामाबाद , पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जे में हो रही देरी के लिए देश की सेना को धिक्कारने लगें जिस तरह ययाति ने पालकी लेकर धीमी चाल से चलते ऋषि अगस्त्य को धिक्कारा था।
जिस पीढ़ी ने प्रत्यक्ष युद्ध नहीं देखा और जिसने कभी युद्ध की त्रासदी नहीं झेली वह युद्ध के लिए इतनी उतावली है कि देरी उससे बर्दास्त नहीं हो रही है। आने वाले समय में क्या होगा आने वाले दिनों में ही पता चलेगा।
भारत-पाक महासंघ की अवधारणा फ़िलहाल तो गए जमाने की बात हो चुकी। आगे भी कभी दोनों साझा विरासत, साझा इतिहास वाले देश नजदीक आ सकेंगे इसकी भी संभावना कम ही है फ़िलहाल। अभी तो दोनों देश कट्टर दुश्मनी की स्थिति में हैं। आगे कभी मिल सकेंगे क्या दोनों देश ?
दुश्मनी पर बशीर बद्र का शेर है :
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे ,
फिर कभी जी दोस्त बन जायें तो शर्मिंदा न हों।
दुनिया में ऐसी कुछ मिसालें हैं जहाँ दो कट्टर दुश्मन देश बाद में एक हो गए। पूर्वी जर्मनी -पश्चिमी जर्मनी , उत्तरी वियतनाम-दक्षिणी वियतनाम दो उदाहरण तो याद आते हैं। इनमें दोनों देश कुछ समय अलग रहने के बाद एक हो गए। बर्लिन की दीवार तोड़कर जर्मनी एक हुए, अलगाव की दीवार पर ढहाकर वियतनाम एक हो गए।
इन दोनों उदाहरणों में दो देशों के बीच अलगाव का कारण विचारधारा रही थी। विचारधारा कमजोर पड़ी , कम्युनिष्ट खेमा ढीला पड़ा इसके बाद दो देश एक हो गए। लेकिन भारत पाकिस्तान के बीच ऐसा होना संभव नहीं दीखता क्योंकि अलगाव का कारण विचरधारा नहीं थी। दोनों के अलगाव में धर्म एक प्रमुख कारण (घोषित कारण ) रहा। जर्मनी और वियतनाम के अलगाव का कारण विचारधाराएँ थीं जो कुछ दशक पुरानी ही थीं। भारत-पाकिस्तान के विभाजन का कारण सैकड़ो सालों पुराने धर्म हैं। शायद इसीलिए इनका मिलना अभी तक नहीं हो पाया।
आगे भी कभी भारत-पाकिस्तान पास आ सकेंगे क्या ? यह कहना मुश्किल है। आ सकते हैं बशर्ते पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाल हो , सेना का नियंत्रण ख़त्म हो उदार लोग जो सत्ता लोलुप न हों और भारत में भी ग़ैर साम्प्रदायिक सोच के उदार लोगों का वर्चस्व हो। दोनों देशों की आम जनता तो शायद पास आने के लिए उतावली है। लेकिन देशों के निर्णय जिन लोगों के हाथ में होते हैं वे इतने भले और भोले नहीं होते।
अभी तो दोनों देश युद्ध के मुहाने पर हैं। देखिए कबतक स्थितियां सामान्य होती हैं। दोनों देश के हाल युद्ध के बाद कैसे रहते हैं। फिलहाल तो अभी कोई मिलना -जुलना संभव नहीं। लेकिन आगे कभी नहीं मिलेंगे यह भी कहना थीं नहीं। इतिहास अपने हिसाब से चलता है। जिन मराठों से लड़ते हुए मुगल सम्राट औरंगजेब बूढ़ा होकर मर गया उसी मुगल साम्राज्य की रखवाली और सुरक्षा का इंतज़ाम मराठा लोग अगले कई दशक करते रहे।
हिंदुस्तान -पाकिस्तान आज भले लड़ रहे हैं लेकिन हमेशा लड़ते ही रहेंगे यह सोचना ठीक नहीं लगता।
यह मेरा अपना सोचना है। आपका सोचना अलग हो सकता है।
संयोग यह भी कि आज दस मई है आज के ही दिन आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम की शूरुआत हुई थी जिसमें आज के हिंदुस्तान और पाकिस्तान के पूर्वज मिलकर लड़े थे।

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