Monday, May 19, 2025

अपने समय को जानने के लिए अपने आप को जानिए- उदय प्रकाश


 [उदय प्रकाश Uday Prakash जी मेरे पसंदीदा लेखकों में से हैं। उनकी कई कहानियां आज की प्रसिद्द कहानियों में शामिल हैं। वे हिंदी के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखकों में से एक हैं। उनका कथेतर गद्य मुझे सबसे अधिक पसंद है। पिछले दिनों 20 अप्रैल को दिल्ली के आक्सफोर्ड बुक सेंटर में उनका एक व्याख्यान हुआ था। विषय था -'भाषा और समाज।' करीब 22 मिनट के उनके इस व्याख्यान को मैंने रिकार्ड किया। थोड़ा दूर से रिकार्ड किया था इसलिए आवाज कहीं धीमी है। कई बार सुना इसे। आज सोचा कि इसे टाइप करके पोस्ट किया जाए। वीडियो की रिकार्डिंग और संगत के 50 वे एपिसोड में उदय प्रकाश जी का इंटरव्यू टिप्पणी में दिए लिंक में है। कुछ वाक्य जो अधूरे लगे उनको अपनी तरफ से पूरा किया है। पोस्ट लम्बी है। बहुत कम लोग पढ़ेंगे। लेकिन जितने लोग पढ़ेंगे वह ही बहुत होगा। जैसा इस पोस्ट में एक जगह कहा भी गया है -'अपने आइडिया को लेकर आप आ सकते हैं और उस आइडिया से जुड़ेगा वही आपका अपना होगा आपका मित्र होगा।भले की कोई एक हो। ']

अंग्रेज़ी में जो मशहूर कहावत है -Man is a social animal. आदमी एक सामाजिक प्राणी है। (इसमें महिलाएँ भी शामिल हैं)। सब कुछ के बावजूद हम कहीं न कहीं सामाजिक पशु ही हैं। और जो चीज़ हमको जानवर होने से अलग करती है वो भाषा है।
और भाषा वो भाषा जिसकी हम आज बात कर रहे हैं यह विकसित भाषा है। दुनिया में बहुत सारी विकसित भाषाएं हैं। एक लम्बे अरसे के बाद वो हासिल हुयी हैं। रामविलास शर्मा की का कहना था कि वो सब आपकी चेतना है। आप अपनी चेतना को जितना ही नीचे लेते(गिराते) जाएँगे उतना ही आप पशु होते जाएँगे। तो ऐसे समय में जब हम आज यह बात कर रहे हैं भाषा और समाज दोनों बड़े जोखिम भरे विषय हैं। अगर आप समाज के बारे में बात करेंगे तो आप देख ही रहे हैं। बंगाली के एक बुजुर्ग लेखक हैं (गौतम सान्याल जी ), कहीं कम आते-जाते हैं, एक दिन उन्होंने लम्बी बाते शुरू कर दीं। उन्होंने कहा -"मैं बहुत याद करता हूँ आपको।"
मैंने कहा -"क्यों याद करते हैं?"
उन्होंने कहा -"आपसे ऐसी-ऐसी किताबों की जानकारी मिली जिनको मैंने पहले नहीं पढ़ा था।उनको मैं पढ़ता हूँ।"
मैंने कहा -"उनमें से क्या याद है?"
उन्होंने पहली किताब जो बताई वह थी 'एलिस इन वंडर लैंड।' तो मैंने कहा -"वो क्यों याद है?"
वो बोले -"मैं आज का माहौल देखता हूँ तो मुझे बार -बार वही किताब याद आती है।"
मैंने कहा -"क्यों?"
तो उन्होंने कहा -"आपको याद है न कि एलिस टाईम मशीन में बैठ जाती है और कहती है -'मैंने past (विगत) को जाम कर दिया और हमने future को भी जाम कर दिया। अब हम बैठे हैं इसमें तो क्या सवाल पूछे अपने बगल वाले से जो हमारा सहयात्री है ? जवाब बड़ा मुश्किल है। उसका जवाब है क्योंकि हमारे पास Future नहीं है past भी नहीं है, सिर्फ़ आज है हमारे पास।"
तो हम जिस समय में हैं आज उस समय जब हम भाषा और समाज के बारे में बात करेंगे तो अगर एक लेखक के रूप में बताऊँगा तो मुझे बड़ा दुःख होगा। क्योंकि समाज जिसे हम कहते थे वह आज है नहीं। एक ऐसा कंसेप्ट है जो बनाया गया है। एक मल्टीपल सोसाइटी है। इतने समाज हैं। हम लोग यहाँ बैठे हैं यह कुछ लोगों का समाज है।
मार्केट समाज नहीं बनाता, यह आप मान कर चलिए। मार्केट आपकी किताबें पहुँचा देगा लेकिन समाज नहीं बनाएगा। यह बात कई बार साबित हुई है। एक बार मैं यूनिवर्सिटी जा रहा था। मैच चल रहा था हिंदुस्तान-पाकिस्तान का। सारे लोग ट्रांज़िस्टर पर सुनने के लिए आ गए। जब मैं यूनिवर्सिटी पहुँचा तो सुनने वालों में कुछ स्टूडेंटस थे, बच्चे थे। यही विषय था -भाषा और समाज। तो मैंने कहा -'वो ज़्यादा बड़ा समाज था जो स्पोर्ट्स वाला था । उसमें इतने सारे लोग थे। यहाँ कुछ ही लोग लाकर जुटा दिए गए हैं और लेखक बोल रहा है तो ऐसा लग रहा है कि मोहनजोदड़ो के समय का कोई छोटा शहर हो जिसको लेखक संबोधित कर रहा हो।
तो यह मुझे हमेशा लगता है कि हम समाज के बारे में फ़िलहाल उतना न सोचें। नाम चोमस्की जो आज 95 साल के हो गए और कहीं आ-जा नहीं पाते, बोरखेज जो कहीं आते-जाते नहीं थे वो समाज के बारे में क्या सोचते थे? वो रियलिटी के बारे में क्या सोचते हैं?
मैंने बहुत पहले से कहना शुरू किया कि कुछ चीजें जिनको आप मानकर चलते हैं कि वे हैं क्या आप सचमुच उनको जानते हैं, देखा है कभी उनको? जैसे समाज है, जनता है, रियलिटी (यथार्थ) है इनको क्या आपने देखा है? अपने नहीं देखा। आपने वो देखा तो आपके साथ घटित हुआ है। तो उस मास्टर क्लास का यही मक़सद है कि आप अपने बारे में सोचें। अगर अपने बारे में सोचेंगे, अपने टाईम के बारे में सोचेंगे और आपके साथ जो हो रहा है उसके बारे में सोचेंगे तो शायद आप अपने समाज के बारे में अपने समय के बारे में ज़्यादा कंट्रिब्यूट कर जाएँगे।
अगर आप कहीं आवांगर्द (अपने समय से आगे की कोई भी चीज़ ) बनकर या कोई मसीहा बनकर, ऐसे बहुत हो गए हैं और वे किस तरह का समाज बना रहे हैं और उसका असर क्या पड़ रहा है , तो लगता है ऐसे भ्रम , मैग्लोमीनियास ( मानसिक बीमारी का एक लक्षण जो महानता, धन आदि के भ्रम से चिह्नित होता है। असाधारण या भव्य चीजें करने का जुनून। ) होते हैं (तो समाज का कुछ भला नहीं होने वाला)।
फ़िल्में देखिए। ज़्यादातर फ़िल्में अब वो बची हैं जिनमें समाज के बारे में नहीं सोचा गया है और जिन्होंने समाज के बारे में सोचा उन्होंने भाषा को कितना भ्रष्ट किया आप इसके नतीजे देख रहे हैं। लोग क्लेरिफ़िकेशन दे रहे हैं, माफ़ियाँ माँग रहे हैं। (वे) कह रहे हैं समाज की जो बोली है, भाषा है हम वही लाएँगे। तो समाज से आप प्रभावित हो रहे हैं। समाज को कुछ दे नहीं रहे हैं। समाज से आप इंफ़ेक्टेड (प्रदूषित) हैं।
लेखक की सबसे बड़ी ताक़त है कि वह समाज बनाता है। ग़ालिब ने अपना एक समाज बनाया, गांधी ने अपना एक समाज बनाया। अच्छे, अच्छे कवियों, लेखकों को देखिए उन्होंने अपना समाज बनाया। समाज उन्हें नहीं बनाता। Language is a not social product only (भाषा केवल एक सामाजिक उत्पाद नहीं है) । यह सिर्फ़ सामाजिक उत्पादन नहीं है। ऑथर (लेखक, रचयिता) किसको मानते हैं? ऑथर (वह) होता जिसकी Language (भाषा) में ऑथरिटी होती है। वही होता है ऑथर। ऑथरिटी किसकी है? ऑथरिटी सारे प्रोफ़ेट्स की है। आप याद कीजिए चाहे कृष्ण को लीजिए, क्राइस्ट को लीजिए, प्राफेट मोहम्मद को लीजिए (ये) सब ऑथरस हैं। साइंस के पहले रेशनिलिटी (चेतना) नहीं थी और उन्होंने भाषा पे जो ऑथरिटी बनाई उसी से ऑथर बना। अगर कोई व्यक्ति ऑथर है तो वह मसीहा है। (अब) वह ऑथरिटी नहीं रही।
तकनीक सुख तो देती है यह मान के चलिए, लेकिन वह रिड्युस भी करती है। छोटा बनाती है। और हम इतने छोटे हो गए हैं कि आप एक 'एप' देखिए और आप अलग-अलग हो गए। तो ग्रोथ आफ टेकनालोज़ी का सामाजिक विकास का कोई पैमाना नहीं है (तकनीक का विकास का मतलब सामाजिक विकास नहीं है)। आप नहीं सकते कि हम इतने टेक्निकली एडवांस हैं तो हमारा समाज भी उतना ही ज़्यादा एडवांस हो या हमारा लिट्रेचर या हमारे क्रिएटेट आउटपुट (रचनात्मक उत्पाद) भी उतने ही एडवांस हों।ऐसा नहीं होता है। मुझे लगता है कि कभी-कभी आपको कई फ़्रंट्स को देखना पड़ता है और तब आप देखेंगे जब आप अपने बारे में सोचेंगे।
कोई ऐसा समाज जहाँ कोई बच्ची सुरक्षित न रहे, कोई वृद्ध कहीं सुरक्षित न रहे जो वलनरेबल (अरक्षित) है उसे ज़िंदगी जीना मुहाल हो जाए। और आप फ़िल्म भी ऐसी लेकर आएँगे जिसमें उन चीज़ों को पेश किया जा रहा हो जिनको पेश नहीं करना चाहिए (Nonrepresntational presentation नहीं होना चाहिए) इस पर बहुत लम्बी डिबेट चली है। आपको याद होगा जब इराक़ में (अमेरिका का) हमला हुआ था उसमें लोगों की गरदन काटते हुए दिखाया गया था इतना सेन्शूअस तरीक़े से कि आप देखकर दहल जाते थे। क्या यह जो Nonrepresntational presentation (ग़ैरप्रतिनिधित्ववादी प्रदर्शन) है क्या यह होना चाहिए चाहे वह भाषा में हो या विजुअल फार्म के प्रेजेंटेशन हो ? हम लोग यहाँ से सोचना शुरू करते हैं।
मुझे कई बार ऐसा लगता है कि आप सब लोग , आप तो नई पीढ़ी के हैं, (हम तो पुरानी पीढ़ी के हैं, हमने तो अपना फ़्यूचर ब्लाक कर रखा है) आप तो फ़्यूचर में जाएँगे लेकिन आपके सामने जो चैलेंजेज होंगे वो ज़्यादा बड़े होंगे। हमारा तो बीत गया सब कुछ, हमने तो जी लिया जैसे भी जीना था लेकिन आप क्या करेंगे? हम तो सलाह देंगे कि अपने समय को जानने के लिए अपने आप को जानिए और यह कोई ऐसा मॉब या कोई गिरोह या कोई आरगेनिज़ेशन बनाकर (नही किया जा सकता)। आप नतीजे देखिए डेमोक्रेसी नहीं बची। डेमोक्रेसी जब आयी थी तक की बात को आप फूकोयामा को पढ़िए । डेमोक्रेसी इसलिए नहीं बची कि जो उसका आइडिया था (वह रहा नहीं )
ऐसे समय में आपके पास सबसे ज़्यादा सम्भावनाएँ हैं अपने आइडिया को लेकर आप आ सकते हैं और उस आइडिया से जुड़ेगा वही आपका अपना होगा आपका मित्र होगा। वही फ़्रेटरनिटी (बिरादरी) बनेगी वही आपका समाज बनेगा। हो सकता है वो दस लोगों का समाज हो, हो सकता है पाँच लोगों का समाज हो, हो सकता है वह सिर्फ़ दो लोगों का समाज हो। या यह भी हो सकता है, जैसा बोर्खेस कहते हैं, कि आप अकेले ही हों। तो इसकी चिंता ही नहीं करनी चाहिए।
मुझे लगता है कि यह समय शायद इस तरह का है कि छप रही हैं किताबें। मेरे पास रोज इतने फोन आते हैं , कोई कहानी मांगता है , कोई कविता मांगता है, कोई कहता है इंटरव्यू दे दीजिये। कोई कुछ और कहता है। और फिर घर में इंफ्लक्स है कागज़ का , वर्ड्स का , किताबों का। और फिर आपको ब्लर्ब लिखना है। अगर आप ईमानदार हैं कोई कहेगा कि पांच लाइन लिख दीजिये , तीन लाइन लिख दीजिये। ऐसा हो सकता है कि तीन वाक्य लिखने में तीन हफ्ते लग गए, तीन महीने लग गए। तो यह जीवन ब्लर्ब लिखने के लिए तो नहीं बना।
किताबों का जो अम्बार है हर शब्द पढ़ने के लिए नहीं बना है। क्योंकि हर शब्द की अपनी एक सत्ता होती है। अपनी दुनिया होती है। तो एक तो बहुत अधिक प्रोडक्शन करने से, कागज़ को बरबाद करने से, पेड़ों को कटवा देने से हम लोग प्रकृति के विनाश में पार्टी होते हैं।
मैं जहाँ रहता हूँ अनूपशहर में वहां का पेपरमिल एशिया के सबसे बड़े पेपरमिल में एक है। वहां जो डिफारेषटेशन हुआ उसके बारे में मैं जानता हूँ। वन्यप्राणी कहाँ गए, पेड़ नहीं रहे। शाल का पेड़ जिसको हमारे यहाँ सरई कहते हैं। शाल के एक पेड़ को ग्रो करने में 80 साल लगते हैं।अब 80 साल तक तो कोई कागज़ का कारखाना इन्तजार नहीं करेगा। इसलिए तेजी से बढ़ने वाले पेड़ लगाए गए। वाटर लेवल कम हो गया। जानवर कहाँ गए पता नहीं। ब्लेम कर दिया गया कि हंटर्स (शिकारियों) ने उन्हें मार डाला या आदिवासियों ने। लेकिन ऐसा कहीं नहीं है। आदिवासियों से बड़ा फारेस्ट गार्ड (जंगल रक्षक) कोई नहीं। उनके यहाँ कोई फर्नीचर नहीं होता। अब इसी को देखिये आक्सफोर्ड बुक सेंटर में कितना सारा फर्नीचर है। आदिवासी जलाते नहीं है। उतनी लकड़ियां उनको नहीं चाहिए। वे अगर बांस को भी काटते हैं तो देखते हैं कि कौन सा बांस पूरी तरह से ग्रो कर चुका है , उसको काटते हैं। एक बढ़ते हुए बांस को नहीं काटते। उनसे कुछ चीजें हमको सीखनी चाहिए। (हालांकि) हम (बहुत )लेट हो गए हैं।
जिनकी हम आलोचना करते हैं , पाश्चात्य संस्कृति की (उनसे भी कुछ चीजें सीखने की हैं ) मैं तो फार्चूनेटली (सौभाग्यवश) उन राइटर्स में से हूँ जिनको बाहर जाने का बहुत मौका मिला। अब मैं यह कह सकता हूँ गर्व के साथ और इसे आप अन्यथा मत लीजिये मैं शायद हिंदी का सबसे ज्यादा ट्रान्सलेटेट राइटर हूँ। जब कोई कहता है कि आपकी रीडरशिप कितनी है तो मैं कहता हूँ आप इंटीगरल रीडरशिप देखिये वर्ल्ड ओवर लैंगुएजेज में और इंडियन लैंगुएजेज में। मेरे ख्याल से मुझसे ज्यादा कम ही होंगे। जिनको आपने तमाम एवार्ड देकर प्रोमोट किया है उनसे ज्यादा ही (मेरे पाठक) होंगे। किसी अनुवादक के पास मैंने अप्रोच नहीं किया है। कुंआ नहीं जाता कि आओ पानी पियो। जिसको प्यास लगती है वो कुएं के पास आता है।
कुछ ऐसा लिखिए कि आप मैनेज न करें। आपकी रचनाएं ऐसी हों कि कहीं का भी हो ,किसी भी देश का हो , वो कहीं से सुनकर आपके पास आये। मैं एक उदाहरण दे रहा था कि जिनकी हम लोग आलोचना करते हैं , पश्चिमी हैं , पश्चिमी हैं। मैं एक उदाहरण दूंगा -"मेरे एक अनुवादक हैं उनको आप सब जानते हैं वे पीस कीपिंग फोर्स में रहे हैं , रेड क्रास में रहे हैं। कश्मीर में रहे हैं। भोजपुरी बढ़िया बोलते हैं , हिंदी भी बढ़िया बोलते हैं। बोलने लगेंगे तो लगेगा कि अमेरिकी हैं या हिन्दुस्तानी। उनका घर जो उन्होंने बनाया, यह मान के चलें कि अध्यापक के पास ज्यादा पैसे नहीं होते , शिकागो में एक लेन है , छोटा सा पार्ट है, जिसको कहते हैं डीयरबॉर्न
( Dearborn ) लेन, ( Dearborn Station एक स्टेशन का नाम था किसी जमाने में , उसको प्रिंटर्स लेन भी कहते हैं। सारे प्रिंटिंग प्रेस उसी लेन में थे जहाँ से पुराने जमाने की किताबें छपा करतीं थीं , 18 वीं सदी , 19 वीं सदी में। अब वह (स्टेशन) बंद हो चुका है। लेकिन प्रिंटर्स के जो घर थे वो अब वहां पर हैं। (वो) अजीबोगरीब घर होते हैं। घर क्या फैक्ट्री होती हैं। कहीं पर किसी का घर है , कहीं पर कॉम्पजिटेटर हिस्सा है। अब उनको रिडिजायन करना है। ऐसा डिजाइन हुआ है कि वहां जाकर लगता है कि किसी भूलभुलैया में आ गए। उनको बुकसेल्फ बनाना था और एक अलतार (वेदी ) बनाना था। कारपेंटर आया। कारपेंटर जैकेट पहने थे।
उसके सारे टूल्स जैकेट में थे। उसने काम शुरू किया और देखते ही देखते उसने पूरा बुकशेल्फ बना दिया। चालीस के करीब उसकी उम्र रही होगी। फिर वो वेदी बनाने लगा। मैंने कहा -'इसमें कितना समय लगेगा ?' उसने कहा -'चार घंटे , पांच घंटे।' मैंने कहा -'हमारे यहां कारपेंटर आते हैं तो तीन महीने जाते ही नहीं। ' उसने कहा -'ऐसा कैसे हो सकता है ?' फिर उसको लगा कुछ कि कहीं बाहर से हैं। उसने पूछा -'आप कहाँ से हैं ?' मैंने कहा -'इंडिया से। ' तो उसने कहा ,'इण्डिया तो मैं नहीं आया।सीलोन आया हूँ ' फिर बात खाने पीने की होने लगी, होने ही लगती है । उसने पूछा -'क्या पसंद है ?' मैंने कहा -'वाइन। ' फिर उसने कहा -'कौन सी चीज है जो आप मिस करते हैं ?' मैंने बता दिया कि हिरन। तो उसने कहा -'मैं कल आकर खिलाता हूँ। ' अगले दिन उसने हिरन की टांग भेज दी। मैंने कहा -'ये कहाँ से लाये ?' उसने कहा -'मैंने शूट किया। हंट (शिकार )किया। ' मैंने कहा -'क्यों ? ' तो उसने कहा -'हमारे यहाँ तो अलाउड है।
तो जो जानकारी मिली वो मैं बताना चाहता हूँ कि आप मॉनिटर करते हैं और आप जानते हैं कि कौन प्रोडक्टिव एज में हैं , कौन नान प्रोडक्टिव एज में। जो नान प्रोडक्टिव एज में हैं उनको आप हंट आउट कर देते हैं। जहाँ प्रोडक्टिव एज में हैं उनकी केयर करते हैं , मॉनीटर करते हैं। यही बात है। यह मत मानिये हमको यहाँ यही करना था। (हमने) नदियां ख़त्म कर डालीं। जंगल खत्म कर दिये।कागज़ पैदा किया। जानवरों को खत्म कर दिया। और आप देख रहे हैं 48 में हरा था हमारा इलाका यहीं जहाँ हम बैठे हुए हैं। 1975 में जब मैं जेेएनयू आया था तब बसें नहीं चलतीं थीं। एक बाइक थी दिवाकर आजाद के पास , उसकी सात -आठ गर्लफ्रेंड थीं सिर्फ एक बाइक थी। आज आप देखिये पार्किंग की जगह नहीं मिलेगी। कितना अच्छा लगता था। आर के पुरम सेक्टर आठ पर उतरते थे , जहाँ संगम सिनेमा हुआ करता था ,वहां से पैदल चलते हुए जेे एन यू पहुंचते थे। अब आप देखिए जाकर वहां क्या हाल हैं ?
चीजें बदली हैं , समाज बदला है और भीड़ । दिल्ली की आबादी उस समय 52 लाख थी आज दो करोड़ से ऊपर है। कारों का हिसाब आज से दस साल पहले का यह था कि अगर सारी कारों को एक के पीछे एक खड़ा कर दिया जाए तो आगरा -वगैरा सब पार हो जाएंगे और रोड जाम हो जाएगा।दोनों , तीनों लेन। इतनी कारें हैं (दिल्ली में )। मैंने कहा -'इसके क्या बात हुई ?'
तो इस समय में आप लिख रहे हैं और आप उम्मीद कर रहे हैं कि आप समाज के बारे में लिख रहे हैं। पहले आप अपने बारे में लिखिए। तो मेरा फिर से कहना है , चेखव कहते हैं -'बहुत बड़ी -बड़ी चीजों को मत देखो। छोटी -छोटी चीजों को देखो। ' तो उन छोटी -छोटी चीजों को देखिये। और कोशिश कीजिये (ऐसा लिखने की ) कि कोई अकेला लड़का या लड़की या बच्ची पढ़े आपको तो उसे लगे कि यह मेरे बारे में लिखा है। यह कोशिश होनी चाहिए।
मैं उन्हीं गौतम सान्याल (बंगाली लेखक ) की बात से अपनी बता समाप्त करता हूँ। उन्होंने कहा कि मुझे एक चीज हमेशा हांट करती है कि मुझको एक चींटी ने जहाँ पर नाखून जुड़ते हैं उस जगह पर काट लिया। तो उन्होंने कहा -'मैं सोच रहा हूँ कि इसने काटा क्यों मुझे ? मैंने ऐसा क्या कर दिया कि इसने मुझे काट लिया? उनके दिमाग में कहीं अटक गयी यह बात।
तो जब आप इस स्तर तक सोंचने लग जाएँ तब आपको लगता है कई छोटी सी बात बहुत बड़ी परिणतियों की ओर , बहुत बड़ी रियलिटीस की ओर एक फ्यूचर में होने वाली जो संभावनाएँ हैं उनकी ओर इशारा कर देती हैं। तो यही कोशिश रहनी चाहिए। समाज के बारे में बात करना मेरे ख्याल से ठीक नहीं है। हमने तो फ्यूचर भी जाम कर दिया है , पास्ट भी जाम कर दिया है। आज के वक्त के बारे में , भाषा के बारे में , समाज के बारे में बोलना ठीक नहीं। बोलूंगा तो आप जानते हैं कि लेखक सबसे वल्नरेबल (कमजोर) होता है। मन की बात और है जो कही जाती है। लेखक अपने मन की बात कहेगा तो मुश्किलें बहुत आएंगी।
-उदय प्रकाश

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