Friday, May 02, 2025

रिटायरमेंट का एक साल

 दो दिन पहले रिटायरमेंट का बाद का एक साल पूरा हुआ। ये साल ऐसे बीत गया जैसे सेवाकाल के 36 साल कुछ महीने बीत गए ।

36 साल की बातें याद करते हैं तो लगता है बस एक सफ़र पूरा हो गया। कोई ख़ास बात नहीं हुई। साल भर में ही लगता है कि हाँ कहीं नौकरी करते थे। पूरा समय जैसे एक बक्से में बंद करके धर दिया हो कोने में। कभी-कभी खोल के कुछ देख लेते हैं। फिर वापस तहा के धर देते हैं।
रिटायरमेंट के पहले सोचा था कि ख़ूब पढ़ेंगे, ख़ूब लिखेंगे, ख़ूब घूमेंगे। कुछ सामाजिक काम भी करेंगे। पढ़ना, लिखना, घूमना भले ही ख़ूब न हुआ हो। सामाजिक काम बस इतना ही हुआ कि असामाजिक नहीं हुए शायद।
इस बीच कई बेहतरीन किताबें पढ़ीं। तमाम पिक्चरें देखीं। किताबों और सिनेमा का चुनाव ऐसे ही बेतरतीब ढंग से हुआ। जिन मित्रों ने किसी किताब या सिनेमा के बारे में लिखा, पसंद आने पर किताब पढ़ ली, सिनेमा देख लिया। कुछ दिन तक तो रोज एक पिक्चर के हिसाब से देखा सिनेमा। आप अपनी पसंद की किताब या सिनेमा बताएँ जिसको हमें देखना चाहिए।
घूमना अलबत्ता उतना नही हुआ जितना सोचा था। एक श्रीलंका की यात्रा ही हुई जिसके किस्से अभी तक चल रहे हैं। इसके पहले कोलकता भी एक बार और हो आए। उसके कुछ किस्से लिखे, काफ़ी बाक़ी हैं। ख़ासकर शांतिनिकेतन का क़िस्सा लिखना बाक़ी है।
किताबें तीन प्रकाशित हुईं। तीनों सेल्फ़ पब्लिशिंग। इनमें दो नई किताबें थीं -'बेवकूफ़ी का सफ़र' और 'पुलिया पर ज़िंदगी'। तीसरी Alok Puranik जी पर केंद्रित किताब 'आलोक पुराणिक -व्यंग्य का एटीएम' उसकी ग़लतियाँ ठीक करके फिर से प्रकाशित की। उस किताब की दो प्रतियाँ बिकीं। पहली ई बुक छपने के फ़ौरन बाद, दूसरी प्रिंट आन डिमांड छपने के दस दिन बाद। आख़िरी बिक्री 17 मार्च को हुई थी। काश आलोक पुराणिक क़ायदे भर के बदनाम इंसान होते तो कुछ किताबें और बिक जातीं।
ये तीनों किताबें अमेजन /फ्लिपकार्ट पर मौजूद हैं। गूगल पर खोजेंगे तो लिंक मिल जाएँगे।
किताबें और भी प्रकाशित करने के मन था। एक कविता संग्रह भी जिसमें अभी तक की लिखी सारी कविताओं और 'कट्टा कानपुरी' के नाम से की तुकबंदियों का संकलन है। कविताएँ और तुकबंदियाँ छाँट ली थीं। नाम भी तय कर लिया था - 'अंधेरे का बड़प्पन।' शीर्षक के पीछे दीवाली के मौक़े पर लिखा यह शेर था :
'ज़रा सा जुगनू भी चमकता है अंधेरे में,
यह अंधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है?'
वैसे सही में सोचा जाए तो ऊँची बात ही है। पूरे अंधेरे के साम्राज्य में अकेला जुगनू धड़ल्ले से चमकता रहता है। अंधेरा उसे चमकने देता है। कोई इंसानी समाज होता तो उसको मसल देता। टेटुआ दबा देता जुगनू का। कम से कम जुगनू के ख़िलाफ़ 'देश द्रोह' की रिपोर्ट तो लिखा ही देता।
उर्दू पढ़ना और लिखना सीखने का मन था। अभी तक उसका ककहरा ही नहीं सीख पाए हैं। अब फिर से सोचा है कि साल खतम होने तक पढ़ना सीख जाएँ। सीखना तो स्पेनिश भी शुरू किया था डुओलिंगो से (duolingo) । कुछ वाक्य सीखे थे। लेकिन फिर आलस ने हमला कर दिया। डुओलिंगो बेचारे की साँसे भी नोटीफिकेशन देते-देते थम गईं।
घूमना फ़िलहाल स्थगित है लेकिन जल्द ही शुरू होगा। साल बीतते-बीतते किसी न किसी जगह घूमने ज़रूर जाएँगे। मन तो है देश में उत्तर भारत की तरफ़ असम, मेधलय, नागालैंड अरुणाचल घूमने का । विदेश में वियतनाम या भूटान । देखिए कहाँ जाना हो पाता है। करनी तो नर्मदा परिक्रमा भी है। देखिए कब कर पाते हैं। इरादा करने में कोई खर्च थोड़ी होता है।
बाक़ी कुछ हो पाए या न हो पाए लेकिन पढ़ना जारी है। साल बीतने के पहले कुछ किताबें ज़रूर पढ़ लेनी हैं जो पढ़ने का मन था पर अभी तक पढ़ नहीं पाए थे।
(पिछले साल रिटायर मेंट के मौक़े पर विदाई पार्टी के वीडियो टिप्पणी में दिए हैं। मन करे तो देख सकते हैं)



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