रचनाजी ने हमसे कुछ सवाल
पूछे थे। हालांकि उन्होंने जैसे लिखा था
आप
सभी वरिष्ठ और सम्मानित चिट्ठाकार हैं, शायद आपके अपने चिट्ठों के लिये
कोई मानक भी निर्धारित होंगे..यदि आप अपने चिटठे पर न लिखना चाहें तो कोई
बात नही उससे मुझे लगा कि शायद किन्हीं और अनूपजी के लिये
होगा जो कोई महान व्यक्ति होंगे। लेकिन बाद हमने सोचा जवाब दे देते हैं।
हमसे पूछा गया होगा तो जवाब स्वीकार किया जायेगी नहीं तो कोई बात नहीं। सो
हमने रचनाजी की पहली बात,
जवाब देंगे तो खुशी होगी, को ही ध्यान में रखते हुये जवाब देने का प्रयास करके उनको खुश करने का प्रयास किया है।
और रही बात हम लोगों को जी और जीतेंद्र को भाई कहने की तो
उन्मुक्तजी
ऐसा है कि वहां खाड़ी के देशों के सारे छटे हुये लोगों लोग डर के मारे भाई
बोलते हैं। शकील भाई, दाउद भाई, ये भाई-वो भाई। तो ऐसाइच अपन
जीतू भाई भी अपना रुतबा जमायेला है। भौत मेनत करेला, दंड पेलेला है। इधर का माल
उधर करना। नारद पर सटाना सब कुछ करेला। इसी लिये अक्खा ब्लागर लोग इसको भाई बोलता। टेंशन नई लेने का।
१. मेरे लिये चिट्ठाकारी के मायने: जैसा मैं कई बार लिख चुका हूं कि हम मजाक-मजाक में चिट्ठाजगत में धंस गये| एक बार जो धंसे तो फिर धंसते चले ही गये। रविरतलामी का
लेख पढ़कर,
देबाशीष के ब्लाग पर मौजूद
छहारी के लिंक से सूरदास की तरह टटोल-टटोलकर टाइप किये कुल जमा नौ शब्दों से
पहली पोस्ट लिखी। होते करते अब हम सबसे लम्बी पोस्टें लिखने वाले चिट्ठाकार के रूप में बदनाम हो गये। लोग हमारी पोस्ट देखकर,
फुरसत से पढ़ेंगे,
सोचकर हमारा ब्लाग पढ़ना स्थगित करते रहे। और वह फुरसत किसी को कहां
मयस्सर। बहरहाल, अब लोगों ने मजबूरी में ही सही मेरी पोस्ट पढ़ना शुरू किया
है।
ब्लागिंग मेरे लिये शुरू में अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। अपना सारा पहले का लिखा कूड़ा कबाड़ हमने अपने ब्लाग पर डाल दिया, डालते गये।
अनुगूंज
शुरुआती दिनों में अभिव्यक्ति का अच्छा माध्यम बना। अनुगूंज के जरिये हमने
कुछ नये लेख बहुत मन लगाकर लिखे। उनमें मेरा सबसे पहला लेख -
क्या देह ही है सब कुछ
मुझे अभी भी लुभाता है। अनुगूंज की दुबारा अविलम्ब शुरुआत होनी चाहिये।
अनुगूंज के साथ ही हम लोग उन दिनों अंग्रेजी ब्लागरों द्वारा आयोजित ‘
भारतीय ब्लाग मेला
‘ प्रतियोगिता में भी कुछ दिन उचक-उचक कर हिंदी के ब्लाग नामांकित किये। एक बार जब हिंदी के कई ब्लाग वहां चर्चित हुये तो अतुल की ‘डांसिग-मेल’ आयी- हिंदी
ब्लाग मेला
में छा गयी। उसमें होना-हवाना कुछ नहीं था लेकिन कुछ चर्चा होती थी हम उसी
में निहाल हो जाते थे। एकाध बार अतुल, जीतेन्द्र से पंगा हुआ। कुछ लोगों
ने अपने ब्लाग में कलाकारी पूर्ण फोटो लगाये उसको अतुल और जीतेंन्द्र ने
करमचंद जासूस बनकर फ्राड बताया। फिर बाद में उन लोगों ने हम लोगों के ब्लाग
की चर्चा बन्द कर दी। इसपर बड़ा वबाल हुआ। हम सब लोगों ने
मैडमैन नामक ब्लागर के यहां इतनी टिप्पणियां कीं कि बेचारा पगला गया और उसने अपने ब्लाग पर कमेंट बन्द कर दिये। फिर उसी समय
अक्षरग्राम पर तमाम
बहसे
हुयीं। निरंतर का प्रकाशन शुरू हुआ। उसी समय चिट्ठाचर्चा शुरू किया गया।
चिट्ठाचर्चा शुरू करने के पीछे ‘ब्लाग मेला’ में कुछ अंग्रेजी ब्लागरों
द्वारा हिंदी ब्लाग से बिदकने के कारण अपना मंच बना था। वे हिंदी से बिदकते
थे। हमने कहा हम दुनिया की किसी भी भाषा की चर्चा करेंगे। कुछ दिन इसे मैं
अकेले लिखता रहा। अंग्रेजी ब्लाग्स के बारे में भी लिखने के कारण इसे वे
भी पढ़ते थे। लेकिन समय के अभाव के कारण इसे बाद में स्थगित करना पड़ा। बाद
में हमें अंदाजा लगा कि हमारा तरीका गलत था। फिर हमने अपने और साथियों से
अनुरोध किया और अब मेरे ख्याल में चिट्ठाचर्चा हमारे ब्लाग जगत की एक
उपलब्धि है। आगे मेरा मन है कि हम इसे इसके मोटो
‘दुनिया की किसी भी भाषा के चिट्ठे का चर्चा’ के अनुरूप बना सकें तो क्या कहने!
चिट्ठाचर्चा,
निरंतर और
अभिव्यक्ति के साथ-साथ मेरा अपने लेखन के अलावा इधर-उधर सहयोग होने लगा। फिर
स्वामीजीने
एक दिन मुझपर डोरे डाले और हमें हिंदनी पर बैठा दिया। उस समय मैं सोचता था
कि हर हफ़्ते एक लेख चिट्ठाकारी के काफ़ी है। महीने में चार लेख हमारा
लक्ष्य था। हम उसे बखूबी हासिल भी कर रहे थे। लेकिन अब हालत यह है कि हम
इसमें इतना डूब गये हैं कि अगर दो दिन कुछ न लिखें तो लगता है पाप कर रहे
हैं। पहले हमें अपने विजिटर देखने का भी शौक बहुत था। दिन में कई बार
काउंटर देखते कि कितने लोग आये, कितने गये। अब अर्सा हो गया आवा-जाही का
रिकार्ड देखे।
पहले हम सोचते थे ये लिखें, ऐसा लिखें-वैसा लिखें। लिखने के पहले नयी
नवेली दुल्हन की तरह सजाव-श्रंगार करते थे। बार-बार सोचते थे ये लिखा है
इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी। लोग क्या कहेंगे। अब हिंदी ब्लागजगत इतना अपना
लगता है मैं इन सब सहज सोच से उबर चुका हूं। यह मैं इसलिये लिख रहा हूं
ताकि
बता सकूं कि हम भी उस दौर से गुजर चुके हैं जिससे हमारे तमाम साथी आज गुजर
रहे हैं।आज टिप्पणियों की बहुत चर्चा होती है। वास्तव में यह तो आना-जाना
शुरू करने का बहाना है। नये ब्लागर के लिये दूसरों (पुरानों) के ब्लाग पर
टिप्पणियां करना उनको अपने आगमन के बारे में सूचना देना जैसा है। यह एक
जरिया है जिससे वे आपके ब्लाग पर पहुंचते हैं।
नारद
तो एक रिजर्वेशन काउंटर है। आपको डिब्बे में बैठाना का जरिया। डिब्बे के
अंदर तो आपको अपना व्यवहार खुद ब खुद बनाना है। अगर आप चाहते हैं कि लोग
आपके लेखन के बारे में राय जाहिर करें तो कभी-कभार आपको भी अपनी राय जाहिर
करने का विचार बनाना चाहिये।
हम कहां ये क्या लिखने लगे। हमें तो अपने लिये चिट्ठाकारी के मायने
लिखने थे। ये सब अटरम-सटरम पढ़कर कहीं रचना जी हमारा पूरा जवाब न खारिज कर
दें। लेकिन क्या करें आदत से मजबूर हैं। असल में दो-ढाई साल की इतनी अधिक
यादे हैं कि वे मौका मिलते ही छलकने लगती हैं।
अब मेरे लिये चिट्ठाकारी अभिव्यक्ति का जरूरी माध्यम बन गयी है। अपने
विचार यहां लिखकर सुकून मिलता है। हमारे तमाम दोस्तों ने कहा कि अपना लिखा
छपाते क्यों नहीं। कहीं भेजते क्यों नहीं लेकिन हम अपन राम इसी में मस्त
हैं। पिछले दिनों हमने अपने सारे लेखन का प्रिंट आउट लिया। करीब दो सौ लेख
का वजन २० किलो। कोई पूछे कि कितना लिखा तो हम कह सकते हैं बीस किलो। रद्दी
कागज का भाव अगर दो रुपये किलो लिया जाये तो हमने चालीस रुपये के बराबर
लिख लिया।
मौज-मजे के लिये शुरू की गयी चिट्ठाकारी अब हमारे लिये अपनी मातृभाषा,
राजभाषा की सेवा करने का कारण बनती जा रही है। लोगों को अपनी समझ से हिंदी
के बेहतरीन लेखन से परिचित कराने का प्रयास इसी लालच के कारण होने लगा कि
मन करता है जो हमने अच्छा पढ़ा उसे हमारे साथी भी जानें। खुद पढ़ें
दूसरों को भी पढ़ायें। इसके अलावा अब चिट्ठाकारी मेरे लिये नेट पर हिंदी
भाषा को समृद्ध करने के एक उपाय के रूप में सामने आयी है। इंटरनेट पर हिंदी
की अधिकाधिक सामग्री उपलब्ध करने कराने का संकल्प धीरे-धीरे करके आकार ले
रहा है। आज नहीं तो कल मैं जितना हो सका उतना नेट हिंदी से संबंधित सामग्री
उबलब्ध कराने का प्रयास करुंगा और मुझे पूरा भरोसा है कि हमारे तमाम साथी
भी जितना हो सकेगा उतना इसमें अपने तरीके से सहयोग करने का प्रयास करेंगें।
तो रचनाजी, चिट्ठाकारी यात्रा ने हमें
‘ अब कबतक ई होगा ई कौन जानता है
के मौज-मजे और कौतूहल से शुरू करके इधर-उधर की गप्पाष्टक करते हुये हिंदी
को समृद्ध करने के संकल्प के उस मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां हम सोचने और
कहने लगे हैं
‘अब हम देखते हैं ई कैसे नहीं होगा’। चिट्ठाकारी हमारे लिये
‘कइसे होगा’ से शुरु करके
‘कइसे नहीं होगा’ तक की यात्रा है जिसकी मंजिल है
‘देखो हम कहते थे अब हो गया न!‘
अपनी तमाम तकनीकी सीमाऒं के बावजूद मुझे इस बारे में कोई दुविधा नहीं है
कि अगर हम चाहे तो हिंदी भाषा की समृद्धि के लिये इतना योगदान दे सकते
हैं कि खुद हमको ताज्जुब होगा एक दिन -अरे यह हमने किया, हमने कर डाला, वाह
क्या बात है।
२.चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना :हम मिलनसार
व्यक्ति हैं। अपने पसंदीदा लोगों से मिलने में हमें मिलना अच्छा लगता है।
जब किसी शहर जाते हैं तो प्रयास रहता है कि वहां के अधिक से अधिक दोस्तों
से मेल मुलाकात कर लें। हमारी इस आदत के चलते
इंद्र अवस्थी ने एक बार मेल में लिखा-
शुकुल तो झांखर (कांटेदार झाड़ियां ) हैं, जिसको देखो उससे लिपट जाते हैं।
तो सच तो यह है कि अगर मौका मिले तो हम सारे ब्लागर साथियों से मिलना
चाहेंगे। उसमें देश-दुनिया के सारे हिंदी चिट्ठाकार शामिल हैं। हम एक बार
अपना देश साइकिल से घूम चुके हैं। ज्यादातर हम अपने कालेज के दोस्तों के
यहां रुके। अब फिर से भ्रमण कामना होने लगी है। शायद शहर-शहर घूमते हुये
ब्लागर साथियों मिलन-योग हो। और एक बात हम साफ़ कर दें कि हम जिससे मिलना
चाहते हैं उसके पते, फोन नंबर के कभी मोहताज नहीं रहे। सब मिल जाता है जब
मिलने का मन होता है- बशर्ते अगला बचने का प्रयास न करे। वो कहा भी है
तुलसीदास जी ने -
जेहि पर जाकर सत्य सनेहू, मिलहिं सो तेहिं नहिं कछु सन्देहू।
हम परसाईजी से मिलने गये तो हमें सिर्फ़ यह पता था कि वे नेपियर टाउन में
कहीं रहते हैं। हम खमरिया से घूमते-टहलते उनसे मिलकर ही वापस लौटे। ऐसे ही
एक बार हम इलाहाबाद के तेलियरगंज में चार घंटे घूमते रहे अपने एक मित्र
यादव जी की तलाश में और लौटे तभी जब गले लगे हुये यादवजी से सुन लिया-
अरे गुरुदेव आप! चाय-पान गप्प-सड़ाका होना तो अपरिहार्य था। उन दिनों हमने बशीर बद्र से यह नहीं सुना था-
कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिजाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो।
अब जब हमने कई बार इस शेर को सुन लिया है तब भी हमें लगता है कि यह शेर हमारे लिये नहीं किसी और के लिये लिखा गया होगा।
अब जब रचनाजी ने हमसे पूछा है कि यदि आप किसी साथी चिट्ठाकार से
प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है? इसका जवाब यह हम तो सबसे
मिलना चाहते हैं और चूंकि यह सवाल रचनाजी ने पूछा है तो हम यही कहना चाहते
हैं कि हम सबसे पहले आप से ही मिलना चाहते हैं। वैसे यह विचार है खतरनाक
क्योंकि रचनाजी ने अपने बारे में लिखते हुये बताया है कि वे किसी भी मजाक
का बुरा मान सकती हैं और हम मजाक करते रहना मेरी आदत हैं।
३. चिट्ठाकारी से व्यक्तित्व में बदलाव: चिट्ठाकारी
अभिव्यक्ति का एक नया माध्यम है। इधर लिखा-पोस्ट किया, उधर से टिप्पणी आ
गयी। यह वास्तव में आश्चर्यजनक किंतु सत्य टाइप का मामला है। इसके अलावा
अगर मैं अपने बारे में कहूं तो मेरे अन्दर कई बदलाव आये। लिखना शुरू हुआ।
लोगों से परिचय बढ़ा। दुनिया-जहान के बारे में प्राथमिक जानकारियां पाते
रहने का सिलसिला बना। अपने बारे में नये सिरे से जानने का मौका मिला। हमने
कभी कल्पना भी नहीं की थी कि हम अपने संस्मरण लिखेंगे लेकिन अतुल के
संस्मरण पढ़कर उसे लिखने का सिलसिला शुरू हुआ। हमने कभी सोचा नहीं था कि
प्रोग्रामिंक सीखेंगे लेकिन अब अक्सर सोचते हैं कि सीखा जाये। नेट पर हिंदी
को समृद्ध करने की चाह कभी इतनी बलवती नहीं रही जितनी अब चिट्ठाकारी करने
के बाद हुयी। नये दोस्तों की दुनिया खुली हमारे लिये इसकी बदौलत। आज
देश-दुनिया में चारो तरफ़ आपा-धापी है, दुनिया बगटुट भागती जा रही है न जाने
किस तरफ़। ऐसे में भी हमें सुकून और ताजगी का अहसास होता है अपने चिट्ठाकार
दोस्तों के माध्यम से। अपने दोस्तों से संपर्क करके और उनके तमाम
निस्वार्थ योगदान देखकर देखकर लगता है कि दुनिया उतनी बुरी नहीं है जितनी
लोग कहते हैं। अब चाहे इसे मेरी खामख्याली समझा जाये लेकिन यह सच है कि
चिट्ठाकारी शुरू करने के बाद से मेरे मन में अच्छाई के प्रति विश्वास बढ़ा
है, मेरा खुद का आत्मविश्वास बढ़ा है और मुझे यह फिर से लगने लगा है कि हम
चाहें तो क्या कुछ नहीं कर सकते।
पसंदीदा पोस्ट: वैसे तो अपनी कई पोस्टें मुझे पसंद हैं। स्वामीजी तो कहते हैं कि मैंने
ये पीला वासंतिया चांद से अच्छी कोई पोस्ट अभी तक नहीं लिखी। लेकिन मुझे इसके अलावा अपने गुरुजी के ऊपर लिखा संस्मरण
सतगुरु की महिमा अनत सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। मैं उसे पढ़ने की बात तो छोडि़ये उसको याद करने मात्र से भावुक हो जाता हूं।
दोस्तों की तो तमाम पोस्टें हैं जो मुझे बेहद पसंद हैं। आजकल तो लोग एक
से एक अच्छी पोस्ट लिख रहे हैं। ऐसे में किसी एक पोस्ट के बारे में कहना
बड़ा कठिन है। लेकिन मुझे एक पोस्ट स्वामीजी की याद आती है जो उन्होंने
शिक्षा व्यवस्था
के बारे में अनुगूंज में लिखी थी। उस समय तक स्वामी का लेखन का अन्दाज
धुंआधार टाइप का था। अब लोगों को पता नहीं लैसी लगे लेकिन वह पोस्ट मेरे
दिमाग में एक बेहतरीन पोस्ट के रूप में दर्ज है। हिंदी ब्लाग जगत की कुछ
बेहतरीन पोस्ट देखने का मन रखने वालों को
अनुगूंज की पुरानी पोस्टें देखनी चाहिये।
मेरी पसंद की पुस्तकें: किताबें पढ़ना मुझे सबसे अच्छा लगता है। कुछ किताबों को मैं बार-बार पढ़ता रहता हूं। उनमे प्रमुख हैं:-
* हरिशंकर परसाई रचनावली: इसमें परसाई जी के लेख छह खण्डों में संकलित हैं।
*रागदरबारी- लेखक श्रीलाल शुक्ल आजादी के बाद के भारतीय गांव समाज का अनूठा चित्रण। अपने ढंग का हिंदी का एकमात्र व्यंग्य उपन्यास।
*कसप- लेखक मनोहरश्याम जोशीजोशीजी की अनूठी शैली में लिखी गयी अप्रतिम प्रेम कथा।
*
आदि विद्रोही- लेखक हावर्ड फ्रास्ट अनुवादक अमृतराय रोम
के गुलामों के विद्रोह की कहानी। ये गुलाम ग्लैडियेटर कहलाते थे। पीढी़ दर
पीढ़ी गुलाम रहते थे। ग्लैडियेटर्स को रोमन लोग अपने मनोरंजन के लिये तब तक
लड़ाते थे जब तक दो में से एक मर नहीं जाता था।
*समकालीन पत्र पत्रिकायें तद्बभव, ज्ञानोदय, वागर्थ, हंस, कथादेश, परिकथा आदि-इत्यादि!
अब इस प्रक्रिया का सबसे कठिन काम उन लोगों के नाम जाहिर करना जिनसे इस
कड़ी को आगे बढ़ाने के लिये कहा जाये। मैं चाहूंगा कि मेरे निम्नसाथी इस कड़ी
में शामिल हों:-
१.
रमनकौल:
रमन कौल हिंदी ब्लागिंग के शुरुआती दिनों से हमारे साथी बने हुये हैं।
इधार कुछ दिनों से वे इधर-उधर हो गये लेकिन जब भी कुछ अच्छा काम होता है तो
उनकी बधाई अवश्य आती है-खासकर निरंतर से जुड़े मसले पर। उन्होंने वायदा भी
किया है कि जल्दी ही उर्दू ब्लाग्स की चिट्ठाचर्चा शुरू करने वाले हैं।प
हिंदी चिट्ठाजगत पहली ब्लागर मीट का श्रेय भी उनको ही है जब वे अतुल के
यहां जाकर उनसे मिले।
२.
हिंदीब्लागर:-
जब से हिंदी ब्लागर महोदय ने लिखना शुरू किया हम उनके लेखन के मुरीद हैं।
भले ही उनसे परिचय केवल हिंदी ब्लागर के रूप में है लेकिन मुझे लगता है मैं
उनको बहुत अच्छी तरह जानता हूं। सिर्फ नाम, पता आदि दुनिवायी बातें पता
करनी हैं। वे तो जिस दिन मन होगा हम पता कर लेंगे। वे मुझे अपने दिल के
करीब लगते हैं।
३.
सीमाकुमार:-
मैंने सीमाजी से कहा था कि वे फैशन डिजाइनिंग वगैरह से जुड़ी बातें बताते
हुये लिखना शुरू करें। उन्होंने हां भी कहा था। लेकिन अभी तक उन्होंने केवल
कुछेक कविताऒं और चंदेक सूचनाओं से आगे लिखना शुरू नहीं किया है। हमें
उनके बहुमुखी लेखन का इंतजार है।
४.
बेजीजी:-
बेजीजी को हमारा चिट्ठाचर्चा करने का अन्दाज बहुत भाता है। यह बात जब
उन्होंने अपनी एक टिप्पणी में लिखी तो हम और मेहनत से चर्चा में जुट गये।
यह खास ख्याल रहते हुये कि कहीं बेजीजी का चिट्ठा न छूटने पाये- तारीफ़ आदमी
को कहीं का नहीं छोड़ती। बेजीजी की छोटी-छोटी, सहज कवितायें बिना बोर हुये
पढ़ना अपने-आप में मजेदार अनुभव है।
५.
मैथिलीजी:
जैसा धुआंधार स्वागत मैथिलीजी का हिंदी ब्लाग जगत में हुआ वैसा शायद अभी
तक किसी का नहीं हुआ। आज मैथिलीजी हमारे लोगों के ब्लाग पर नियमित टिप्पणी
करने वालों में से हैं। सालों पहले बैंक से सेवा निवृत्ति के बाद वे अब
हिंदी सेवा के लिये कुछ करना चाहते हैं। इंशाअल्लाह जल्दी ही उनकी साइट भी
शुरू होने वाले है। हम चाहते हैं कि वे अपने तकनीकी ज्ञान का उपयोग करते
हुये नारद से भी जुड़े रहें।
इन पांचों साथियों मेरे पांच सवाल हैं( कुछ सवाल उन्मुक्तजी से कापी किये :)):-
१.आपकी सबसे प्रिय पुस्तक और पिक्चर कौन सी है? क्यों?
२.आपके जीवन की सबसे उल्लेखनीय खुशनुमा घटना कौन सी है ?
३.आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते/करती हैं?
४.क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?
५.यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी?
अथवा
६. अपने जीवन में आप कौन सा एक काम/लक्ष्य ऐसा है जिसे पूरा करना चाहेंगे /चाहेंगी?
अब हमने अपना होमवर्क करके कापी जमा कर दी। रचनाजी बतायें कि इससे
संतुष्ट हैं या नहीं।हम पास हुये या फेल। सवालों के जवाब हमने पूरी
ईमानदारी से देने का प्रयास किया है। अब इससे वे संतुष्ट कितना हैं यह वे
बतायें।
मेरी पसंद
बुश बेचारा तो शान्ति चाहता था
वह तो कह रहा था
सद्दाम तू मेरे को पसन्द नहीं
और भैया तू अपना मुल्क छोड़कर चला जा
सद्दाम गया नहीं तो बुश बेचार क्या करता?
-
विष्णु नागर
मुझे तो यह संख्या अच्छी लगी!!
देबाशीष दादा को आयोजन की सफलता की बधाई!
वोटो पर मत जाइए। हमारे लिए आपका ब्लॉग केवल हिन्दी का ही नही, विश्व का सबसे अच्छा ब्लॉग है। मेरा सबसे पसंदीदा चिट्ठा।
राजकुमार केशवानी जी को पहली बार पढ़ने का मौक़ा मिला है. ज़ोरदार कविता है.
इंडीब्लॉगीज़ के विजेताओं को बधाई! सफल आयोजन के लिए देबाशीष जी को भी बधाई!
हिंदी श्रेणी में मात्र 334 वोट गिरने से यही साबित होता है कि हिंदी ब्लॉगिंग को अभी लंबा सफ़र तय करना है.
फ़ोटोब्लॉग श्रेणी में हिंदी ब्लॉग जगत की एकमात्र प्रविष्टि ‘छायाचित्रकार’ को मात्र 65 मत मिलने से ये भी ज़ाहि हुआ कि वोटिंग का कष्ट उठाने वाले कुल 334 हिंदी-ब्लॉगप्रेमियों में से भी ज़्यादातर ने हिंदी के एक फ़ोटो ब्लॉग को आगे बढ़ाने की जहमत नहीं उठाई. मात्र एक अतिरिक्त क्लिक की ही तो बात थी!
इस चुनाव में शामिल सारे चुनिंदा ब्लॉगरों को पुस्तक-उपहार देने की आपकी पहल अनुकरणीय है.
इंडीब्लॉगीज़ का आयोजन वास्तव में एक बडा यज्ञ था. श्री देबाशीष जी साधुवाद के हकदार हैं ही.
तद्भव से परिचय कराने के लिये धन्यवाद
मैथिली
इंडीब्लागीस चुनाव, २००६ ke safal aayojan per badhaayi..
Kaafi achhe achhe blogs parhne ko milte hain aajkal.
Haasya mein aapka blog aur Geeton mein Rakesh Khandelwal Ji ka blog atulniy hain.
Maja aa jaata hai parhkar aap donon ko ..