Saturday, November 24, 2007

रद्दी

http://web.archive.org/web/20140419052643/http://hindini.com/fursatiya/archives/374

रद्दी

गोविन्द उपाध्यायजी ने जब अपने बचपन के संस्मरण लिखना शुरू किया था तो स्वामीजी की प्रतिक्रिया थी-

हटो-बचो छा गए हम!हिंदी ब्लागलेखन जब अपनी नई उंचाईयाँ छूता है मेरा सीना गर्व से फूल जाता है. देखो बच्चों इसे कहते हैं “लेखन” इस की टक्कर का कुछ लाओ तो जाने!! गोविंद उपाध्यायजी को पहली बार पढ रहा हूँ और उनसे आगे लिखते रहने की मनुहार है. फुर्सतिया जी दूसरी किस्त छाप दीजिए हम पीसी के आगे से हिलूंगा नही तब तक!
गोविन्द्जी ने काफ़ी दिन की चुप्पी के बाद लिखना शुरू किया था, हमारे उकसाने पर। उनके छोटे भाई भोला नाथ उपाध्याय (पप्पू) की प्रफ़ुल्लित प्रतिक्रिया थी-

फुरसतिया भाई साहब को कोटिशः धन्यवाद | मैने तो एक छोटा सा काम किया था और आपने तो इनाम क्या पूरा खजाना लुटा दिया | भैया लिखते हमेशा से अच्छे हैं पर इतनी अच्छी प्रस्तुति पहली बार देख रह हूं | सच है कि हीरे की चमक अच्छी तराशनवीशी पर ही होती है अन्यथा वह कहीं अन्धेरे में ही पड़ा रहता है । अत्युत्तम सम्पादन एवं प्रस्तुति के लिये बधाइयां स्वीकार करें।
इसके बाद गोविन्दजी का लिखना दनादन शुरू हो गया है फिर से। पिछले दिनों उनकी एक कहानी मुंबई की एक पत्रिका में छपी। वह कहानी हमने उनसे झटक ली और यहां आपके लिये पेश कर रहे हैं। पढ़िये और बताइये कैसी लगी। उनकी और कहानी पढ़ने के लिये यहां और यहां देखें।

रद्दी

[यह कहानी समर्पित है उन मजदूरों को, जो कुप्रबंधन व बाजारवाद के दबाव से बंद हो गई मिलों के कारण अचानक रद्दी में बदल गये । जिन्होंने अपने जीवन की सारी उर्जा इन कारखानों में झोंक दिया ... और जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर ठगे से देख रहें हैं उन बंद मिलों के दरवाजों की तरफ ....। उन्हें अभी भी आशा है-मिलें फिर धुंआ उगलेंगी ...]
गोविंद उपाध्याय गोविंद उपाध्याय
सशक्त युवा कथाकार गोविंद उपाध्याय का जन्म ५ अगस्त, १९६० को हुआ। देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनकी लगभग १५० रचनायें प्रकाशित हुई हैं, कथा संग्रह “पंखहीन” शीघ्र प्रकाश्य। जाल पर आप उनकी कथायें यहाँ , यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं। सम्प्रति- आयुध निर्माणी में कार्यरत हैं।
लोटा पाड़े बेंच पर बैठे सुरती मलने में मगन थें। जानकी मिस्त्री मशीन का चक्का खोल रहे थें। चक्का ससुरा था कि खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था । जानकी मिस्त्री का काला चेहरा पसीने से लथपथ होकर और आबनूसी हो गया था ।
“का हो भइया जरको दम नहीं रहल का । आधा घंटा से चक्का पकड़ कर हांफ रहे हो । भउजइयो अपने करम को रो रही होंगी।” लोटा पाड़े खिलखिला कर हंस दिये । और जानकी उनके मज़ाक की गहराई समझ कर मुस्कराए ।
दोनो की बहुत पुरानी दोस्ती थी । इस मिल में साथ-साथ आये थें । काफी दिन साथ-साथ रहे भी । जानकी हेल्पर से मिस्त्री बन गए तो पाड़े जी को भी कारीगर बना दिया । वैसे जानकी की का औकात कि किसी को कुछ बना दें । वो तो एक मशीन खराब थी जेम्स साहेब बोलें- “ जानकी तुम तो कारीगर आदमी हो और तुम्हारे रहते मशीन बिगड़ा पड़ा है । हमको अच्छा नहीं लगता है । ” जानकी भी तब जोसिया गये और एक-एक पुर्जा खोल कर मशीन को ठीक कर के ही दम लिया। बहुत खुश हुआ था साहेब । पीठ ठोक कर बोला , “ हम तुमसे बहोत खुश हैं । हम तुम्हारे को कुछ देना मांगता है । बोलो क्या मांगता है ।”
जानकी मिस्त्री भी हाथ जोड़ कर बोले, “ हजूर इ हमरे गांव जेवार के बाभन देवता हैं । काफी दिन से हेल्परी कर रहे हैं । बढिया काम सीख गये है । आप किरपा कर देते हजूर त…”
और बिना किसी ना नुकर के जेम्स साहेब लोटा पाड़े को कारीगर बना दिये । ये बात जानकी ने कभी अपने मुंह से नहीं कहा होगा । लेकिन पाड़े महराज को इस किस्से को सुनाने में कोई गुरेज़ नहीं था । जानकी कई बार टोक भी चुके थें, “ बस महराज , रहे भी दिहल जाय । उ जमाना ही दुसर था । आदमिये कहां मिलते थें । अब तो अपने लरिका बच्चा को भर्ती कराने को सोंचिए तो कोई घासे नहीं डालेगा । हर काम में बिचौलिया हो गया है । केतना तो साला युनियन बन गया है । लाला झंडा, पीला झंडा, नीला झंडा….. जिसको काम नहीं करना है कवनो रंग का झंडा पकड़ लो…आ सबसे मजेदार बात त इ है कि साहबो लोग भी इन्ही की सुनता है । नहीं तो गेट पर खड़ा हो कर ‘ ले कर रहेगें ..दे कर रहेंगे…’ चिल्लायेगे ।” लोटा पाड़े पचपन पार कर चुके थें । जानकी उनसे एकाध साल बड़े होगें । दोनो के परिवेश में ज़मीन आसमान का अंतर था । लोटा पाड़े शुद्ध शाकाहारी दोनो समय पूजा-पाठ करने वाले जबकि जानकी मास-मछरी वाले ..मिली तो सो ग्राम पी भी लें ।
गोविंद उपाध्याय ठेलुहा,फुरसतिया के साथ
लोटा पाड़े का चरित्र भी बेजोड़ था । पांच फुटिया गोल मटोल से ..रंग पीली गोराई वाला. ..सिर के आगे के बाल उम्र के इस पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते साथ छोड़ चुके थें । लगातार सुर्ती के सेवन ने दांतो को अनुशासन हीन बना दिया था, वे गंदे व कमजोर हो चुके थे । उपर व नीचे के दो-दो दांत भाग चुके थें । शेष दांतो की विश्वासनियता पर भी संदेह था ..न जाने कब साथ छोड़ दें । पाड़े जी के पास एक तांबे का लोटा था । वह लोटा क्या था उनके पूर्वजों के सम्मान का प्रतीक था । यह लोटा गांव से चलते समय अपने साथ लाये थें । कभी वह बहुत भारी रहा होगा लेकिन आज समय की मार ने उसे बेढंगा बना दिया है । मिल में चाय टाइम के समय पाड़े का लोटा चाय वाले के सामने सबसे पहले आ जाता । पूरे चार कप चाय लेते थें पाड़े महराज । जब कभी बहुरिया के हाथ के खाने से उबिया जाते तो इसी लोटवे में दो मुठ्ठी चावल डाल कर डभका लेते । कोई टोकता, “ का हो पाड़े जी आज बहुरिया से फिर झगड़ आये हैं का..”
लोटा पाड़े का चरित्र भी बेजोड़ था । पांच फुटिया गोल मटोल से ..रंग पीली गोराई वाला. ..सिर के आगे के बाल उम्र के इस पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते साथ छोड़ चुके थें । लगातार सुर्ती के सेवन ने दांतो को अनुशासन हीन बना दिया था, वे गंदे व कमजोर हो चुके थे ।
दर असल लोटा पाड़े को बवासीर की शिकायत थी और बहुरिया को थोड़ा चट्कार भोजन पसंद था। जब बीमारी उभरती तो लोटा ही एकमात्र सहारा होता … चावल डभकाओ, माड़ पसाओ… और नमक डाल कर सटक लो……और इसी बात से जानकी को चिढ था , “ का महराज बहुरिया से कह दें त का उ बिना तेल मिर्चा के नहीं बना देगी । उ का कहते हैं अपनी तरफ ‘मड़हा मरद चउरही जोह, ओकरे घरे बरक्कत न होय’ (माड़-भात खाने वाले पुरुष और कच्चा चावल खाने वाली स्त्री के घर में कभी प्रगति नहीं होती है)”
लोटा पाड़े फिस्स से हंस देते, “ हां जानकी भइया तोहार कहल सही है । मगर बहुरिया मनबे नहीं करती है । एकाध दिन सही बनायेगी फिर उहे राग माला..” लोटा पाड़े बड़े शान से इस लोटे के बारे में बताते, “ जउरा के महराज के यहां जजमानी में मिला था यह लोटा । राजा साहेब को बुढौती में लरिका हुआ । रानी साहिबा भागवत भाखी थीं । लोटा मुरादाबाद से सवा-सवा किलो का पेशल आडर दे कर बनवाया गया था । पूर्ण आहुति के बाद एक पांति में बइठा कर पांव लागि-लागि कर जेवार के इकइस बड़का बाभान को सर-समान के साथ इ लोटा भी दान में दिये थें ।”
यह लोटा ही उनकी पहचान बन गया था। तभी तो गोरखपुर से कानपुर आते-आते लल्लन पाड़े ‘लोटा पाड़े’ हो गये ।
लोटा पाड़े बाल ब्रह्मचारी थें । चौदह वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिये थें । छोड़ते नहीं तो क्या करते। एक-एक दाने को तो मोहताज था परिवार । पूरी पूस की रात, कन (शकरकंद) खा कर … और चट्टी (बोरा) ओढ़ कर गोंइठा के आग के सहारे कट गया । फागुन आया तो सोचा कि दलहन व तेलहन से घर को कुछ राहत मिलेगी… तो कुछ मौसम की मार अ कुछ बड़का भइया की नशा खोरी … एक्को दाना घर नहीं पहुंचा । लल्लन पाड़े के सब्र का प्याला भर गया , “ का फायदा है अइसी खेती – बाड़ी का । चुल्हा भाड़ में जाय साला … जब मजूरी ही करना है तो का देश का परदेश …..” और पहिली ट्रेन पकड़ कर आ गये शहर में । पांच साल तक क्या-क्या नहीं किया । गारा-माटी ढोया ..भइसा गाड़ी खींचा… तभी मिले थें जानकी । गांव जवार का होने से जल्दी ही घनिष्टता भी हो गयी । एक बार पाड़ेजी बीमार पड़ गये । अब इस परदेश में कौन था जो उनका देख-भाल करता । जानकी अपने ठीहे पर लाये। खूब सेवा किये । बस उसी दिन से जाति भेद भी मिट गया । जानकी को वो भइया कहते और जानकी उनको महराजजी… भले ही पूरा मिल उन्हें लोटा पाड़े बोलता हो ।
लोटा उनके जीवन में उतना ही अहम था जितना की जनेउ । गंगा मेला के दौरान तीन रुपया में एक दर्जन जनेउ खरीद लाते । साल भर की फुरसत । जनेउ क्या था मोटा धागा । पाड़े जी संदूकची की चाबी उसमें लटकी रहती । मारकीन की गंजी और मोटी धोती जो घुटने से थोड़ा उपर ही रहती, यही उनका सदाबहार परिधान था । सर्दी में जरूर एक लोई ओढ लेते । लेबर कालोनी में जब जानकी ने अपने लिए क्वाटर लिया तो पास में ही लोटा पाड़े के लिए भी व्यवस्था कर दिया । जब पाड़े बाबा का जांगर थकने लगा तो गांव से बड़े भाई का एक बेटा पास आकर रहने लगा । कुछ दिन बाद पतोहू भी आ गई । अब दो रोटी सकून की मिलने लगी थी । नहीं तो लोटा में चावल और आलू उबाल कर खाते पूरी ज़िन्दगी निकल गई थी । वैसे भी भाई-भतिजे को डर था कि पाड़े को मिलने वाला धन बिना वारिस के कहीं डूब न जाय । भतीजा किसी शो रूम में सेल्स मैन का काम करता था । उसकी एक प्यारी सी बच्ची थी । बहुत प्यारी-प्यारी बातें करती-“ बाबा मेले लिए पीं-पीं वाला जूता किन दीजिए… बोलने वाली गुलिया ला दीजिए….” अढाई साल की हो गई थी । लोटा पाड़े का फुरसत का समय बड़े आनन्द से कट जाता ।
लोटा उनके जीवन में उतना ही अहम था जितना की जनेउ । गंगा मेला के दौरान तीन रुपया में एक दर्जन जनेउ खरीद लाते । साल भर की फुरसत । जनेउ क्या था मोटा धागा । पाड़े जी संदूकची की चाबी उसमें लटकी रहती ।
आखिर जानकी मिस्त्री ने मशीन का चक्का खोल ही दिया । चहेरे पर थोड़ा सकून आया । अभी बहुत काम पड़ा था । मशीनें पुरानी, लोग पुराने । खुचुर-पुचर काम चल रहा था। बस दो ही ऐसा विभाग बचा था जहां पुरानी मशीने थीं और जानकी तथा लल्लन जैसे पुराने लोग ।
अब भर्ती भी कहां हो रही थी । आदमी का सारा काम तो मशीनें ही कर लेती है ।
मशीनें आटोमेटिक आ रही थीं उसमें दूसरा हिसाब-किताब था । सब मशीन में कमप्युटर लगा था । नये लड़के आतें । फटाफट बटन दबातें , प्रोगराम बन जाता । मशीन क्या जादू का पिटारा, तीन चौथाई काम खुद ही कर लेती । खाली मटेरियल पकड़वाना पड़ता । सामान तो जादू की तरह खुदबखुद बन कर बाहर आ जाता । उसकी मरम्मत तो दूर उसको छूने में ही जानकी की रूह कांपती । वैसे भी उसकी मरम्मत के लिए दूसरे कम्पनी का आदमी आता था।
जानकी थें जाति के कहांर । लेकिन अब जाति सिर्फ कहने को रह गई थी । दो लड़का और दो लड़की । यानि कि मैच बराबर पर छूटा था । जानकी की मेहरारू कभी रही होंगी कटीली । अब बुढापा और गठिया ने उन्हें काफी लाचार कर दिया था। एक तो भारी शरीर उपर से इ बीमारी…। इसी कारण बड़का को जल्दी बियहि दिये कि बुढिया को थोड़ा आराम मिलेगा । लेकिन पतोहू एक नम्बर की नंगिन मिल गई । उसका एक पांव हमेशा मायके में ही रहता । ऊपर से दो बच्चे भी हो गये थें । वो दोनों दादी की छाती पर ही सवार रहते । बड़ा लड़का किसी दवा कंपनी का प्रतिनधि था और काम से अक्सर बाहर ही रहता ।
जब काम का बोझ बढ जाता ….बुढिया बहू पर भुनभुनाती, “ बुजरी छिनार है, जरूर कवनो यार है उसका मायके में, शादी के पांच बरिस बाद भी उहे दिखाई देता है । कवनो न कवनो बहाना बना कर भागने की तैयार रहती । अरे हमरे घर भी तो बेटी है .. दू-दू बरस हो जाता है…बेटी का सकल देखने को अंखिया तरस जाती हैं । ”
जब से आधुनिकीकरण का सिलसिला चला है । इधर कवनो साहेब झांकने भी नहीं आता । पहिले आठ घंटा खटने के बाद भी रोक लिया जाता था । अब तो कोई पुछंतरे नहीं है । सब साला कारीगर लोग दिन भर बकचोदी करता है । दुसरे के मेहरारू के बारे में गन्दा-सन्दा बात करेगा ।
जानकी इन सबसे फ्री थें । बड़ी वाली लड़की की शादी कर चुके थें । छोटा लड़का सिविल से डिप्लोमा कर रहा था और छुटकी इंटर की तैयारी में लगी थी । सब कुछ ठीके ठाक चल रहा था । नौकरी में भी पहले काफी सम्मान मिलता था । लेकिन जब से आधुनिकीकरण का सिलसिला चला है । इधर कवनो साहेब झांकने भी नहीं आता । पहिले आठ घंटा खटने के बाद भी रोक लिया जाता था । अब तो कोई पुछंतरे नहीं है । सब साला कारीगर लोग दिन भर बकचोदी करता है । दुसरे के मेहरारू के बारे में गन्दा-सन्दा बात करेगा । पोलिटिक्स के बारे में ए बी सी डी… नहीं मालूम लेकिन नेता लोगन का भ्रष्टाचार पर ऐसा भाषण झाड़ेगा जइसे देस का सारा बोझा यही ससुर लोग ढो रहा है । हां पुरानी मसीन बार-बार मरम्मत मांगता है । …और अब उनके बुढे सरीर में जान कहां बचा है । एक ठो अभी काम करना चालू नहीं किया के दूसरा खराब.. दूसरा सही हुआ तो पहिला खराब …और जानकी बेजार हो गये हैं इन मशीनों से…. बाबा आदम के जमाने की तो हैं …कवनो का पुर्जा नहीं मिलता है बाजार में । साला जोगाड़ से काम कब तक करेगा । कोई कह रहा था ये भी सब जल्द ही खोद कर फेंक दिया जायेगा । और इसे भी आटोमेटिक प्लांट कर दिया जायेगा । तब वो का करेगें । करेगें क्या… घुंइया छिलेगें.. कितना दिन बचा है दू साल…..
इधर बड़ा हल्ला हो रहा है… मिल दूसरा कवनो सेठ खरीद रहा है । बहुत घाटा हो गया है । यदि सेठ ने मिल नहीं लिया तो समझो कि मिल बंद । मिल गेट पर रोज एक युनियन अपना झंडा-डंडा लेकर मालिक लोगों को गरिआता ,” हमने अपने खून पसीने से सींचा है इस मिल को ..और मालिक इसे दूसरों के हाथों बेंच कर हमारे बीबी-बच्चों के पेट पर लात मार रहा है ….हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है । हम ये बेइंसाफी नहीं बर्दाश करेगें । हम इनकी ईट से ईट बजा देगें । ”
लोटा पाड़े भी जोशिया जाते, “ जो हमसे टकरायेगा …चूर-चूर हो जायेगा । ”
“कुछ नहीं होगा महराज… हमीं लोगों का भुरकुस निकल जायेगा । सरवा व्यवस्था से कोई जीता है आजतक …काम कोई करने नहीं चाहता है । मिल हराम खोरों का गढ बनता जा रहा है । अब पूरा का पूरा जनम पतरी … जाति ..जनम का तारिख…भरती का तारिख….सब कुछ कमपूटर के बक्सा में डाल दिया गया है । काम करो न करो लाइन से परमोशन मिलेगा । का गधा … का घोड़ा… उ का कहता है रमरतिया –‘बने रहो लुल्ल, तनख्वाह लो फुल ।’ जब यही सोंच रह गयी है हम सभी की …फिर मालिक से किस बात की शिकायत …आखिर केतना दिन पोसे.. अपना बोझा दोसरे के कपारे पर डाल कर अपना जान छोड़ायेगा… दूसरा सेठ आयेगा त डंडा डाल कर काम लेगा ….जो नहीं झेल पायेगा ओकरे पिछाड़े लात मार कर बाहर कर देगा । कम से कम काम वाला लोगन का इज्जत तो होगा ना.. महराज जी आप त मेहनत वाला लोगन के लाइन के आदमी हो ….आप काहें इन चुतियापा में पड़े हो । वइसे भी अब जमाना बदल गया है । एतना ज्यादा बदल गया है कि सरकार का बुता है जो मालिक को उधार पइसा दे कर हमको पोस रही है ।” जानकी मिस्त्री पाड़े महराज को समझाने का प्रयास करते ।
लोटा पाड़े भी कोई बेवकूफ नहीं थें, “ का जानकी भइया आपो किस दुनिया में हैं । साला बड़का पढाई वाला तो घांस छिल रहा है । हम लोगों को कौन पूछेगा । इ सरवा झंडा है तो साहेब लोग थोड़ा चिंहुंका रहता है । जिस दिन इहो नहीं रहेगा तो मालिक लोग लखेद-लखेद कर मारेगा । इ झंडा और डंडा में बहुत ताकत है जानकी भइया । नाहीं त इ मिल कबका…… ”
जानकी मिस्त्री निरुत्तर हो गये, “ वाह महराज, आप तो काफी समझदार हो गये हैं । लेकिन जो हम कह रहें हैं । जरा उहो त सोचिए । मिल केतना त पइसा लगा दिया । ओकरे बाद भी घाटा । आखिर केतना दिन झेलेगा । कवनो कुबेर का खजाना तो है नहीं । दुनो हाथ से उलिचते जाओ । और उ बढता जायेगा । जरा आपे सोंचिये हमारे को जो पगार मिल रहा है ….. ओतना काम हम कर रहें का …आपे कह रहें हैं की बाहर हमको कवनो कानी कौड़ियो नहीं देगा । “ पाड़े जी बोले, “सब ठीक है भइया । आप का कवनो बात काटे हैं का कभी । लेकिन साहब लोग का कवनो जिम्मेदारी नहीं है का …. हमसे कई गुना पगार है उनका…”
“का महराज फिर बुरबकई वाला बात कर दिये न…. अब्बे इ मिल बंद हो जाय त किसका नुकसान होगा…हमरे न … साहब लोग को तो पचास जगह नौकरी धरा है । एक ठो छोड़ेगा दस जगह से बुलावा आ जायेगा । हम मजदूर हैं .. हमें मजदूरी नहीं मिलेगी तो हम बेकार हो जायेगें…. उ का कहते हैं …जब ज्यादा माल बेकार होने लगता है ‘स्क्रेप बढ रहा है’ त हमें स्क्रेप नहीं बनना है महराज जी …..” जानकी मिस्त्री भावुक हो गये और उठ कर लाइन में मशीन ठीक करने चल दिये ।
दो वर्ष की बात है । मिल चलती रहेगी तो फंड ..ग्रेज्युटी ..मिल जायेगा । छुटकी का व्याह भी धूम धाम से कर देंगे । छोटा बेटा भी कहीं हिल्ले से लग जाए तो वह यह शहर छोड़ देगें । फिर गांव लौट जायंगे । बस मिल चलता रहे… शहर के हालात बिल्कुल ठीक नहीं है । देखते- देखते भारत का मेनचेस्टर कहे जाने वाला यह शहर आज मजदूरों के स्क्रेप में बदल चुका है । धुआं उगलने वाली मिलें एक सुबह मौत की तरह शांत हो जातीं …कोई नहीं जानता इसमें कल तक हंसते-खेलते मजदूर अब क्या कर रहें हैं ।
मिल गेट पर नारे-बाजी रोज होती रही । लोटा पाड़े गला फाड़ कर चिल्लाते, “ जो हमसे टकरायेगा …चूर-चूर हो जायेगा । ” दिल्ली तक से बड़का नेता लोग भी आते रहें…। मिल की धड़कन को कोई तेज नहीं कर पाया । हां इन सब से इतना जरूर हुआ कि मिल दूसरे सेठ ने नहीं खरीदा । मिल धीरे-धीरे मर गया ।
जानकी मिस्त्री का गांव लौटने का सपना अधूरा रह गया । मिल खुलने के इंतजार में ,इसी शहर में दम तोड़ दिये और लोटा पाड़े … लोटा पाड़े अब भाई-भतिजों के लिये बोझ थें । उनका दिमाग भी ठीक से नहीं चल रहा था। जानकी भइया भी नहीं रहें जो उनकी सुध लेतें । एक दिन बहुरिया उनका लोटा नचा कर फेंक दिया, “ पता नहीं यह बुढवा कब तक खून चूसेगा । लगता है कउआ का मास खा कर आया है…. ”
रोज-रोज की जलालत से तंग आकर लोटा पाड़े घर छोड़ दिये । अब जांगर था नहीं कि मेहनत करते । पेट की आग तो बुझानी ही थी । भीख मांगना शुरू कर दिया । लोटा अब भी था उनके पास, लेकिन वह अब भिक्षा-पात्र बन चुका था । एक हाथ में लोटा.. दूसरे में सहारे के लिए डंडा…
अक्सर डंडा के उपरी छोर पर चिथड़ा बांधे बंद मिल के गेट पर आकर चिल्लातें, “ दुनिया के मजदूरों एक हो…. जो हमसे टकरायेगा …चूर-चूर हो जायेगा ।”
शहर में मजदूरों का स्क्रेप थोड़ा और बढ गया था । मिडिया चींखी… संसद में भी खूब हो-हल्ला होता रहा…फिर शांति…. लेकिन लोटा पाड़े कहां शांत थें… उनकी मुठ्ठियां अभी भी तनी थीं…….
गोविन्द उपाध्याय

14 responses to “रद्दी”

  1. Gyan Dutt Pandey
    बढ़िया कहानी पढ़ाने को धन्यवाद। इसमें सवाल बहुत बनते हैं और काउण्टर कहानी भी शायद बन जाये। पर लोटा पांड़े सच हैं और यह सच बहुत देखा है – हताश, दम तोड़ता।
  2. आलोक पुराणिक
    ग्रेट।
  3. eswami
    चित्रण मार्मिक है और सही भी है – अब तो यह एक वैश्विक समस्या है.
    समाजिक और आर्थिक सरंचना की कोई भी अवधारणा [कम्युनिज़्म/केपिटलिज़्म/आदी] संतुलित व्यवस्था नहीं दे पाई है फ़िर उस पर परिवर्तन की गति से सामंजस्य रखने का नाम ही अनुकूलनशीलता है – कठिन कर्म है. जो परिवर्तन ला रहे हैं अब तो वे खुद भी बौखलाए हुए हैं.
    तनावग्रस्त अमरीकी लगभग तीन बार अलग-अलग प्रकार के काम करना सीखता है और करता है. औसतन चार साल में एक बार नौकरी बदलता है – १८-३८ वर्ष की आयू के बीच १० नौकरियां बदल चुकता है – ऐसे में मील के बंद होने पर उस पर जनमभर आश्रित रहने का पिलान बनाये अधेड मजदूरों के संघर्ष की कहानी कुछ पुरानी सी लगती है – “ये मील हमारी मां है (और हम शाश्वत शैशव हैं)” टाईप के डायलाग और श्वेत-श्याम युग के सिनेमा की याद दिलवाती है.
    लालची कार्पोरेट जगत ने रद्दी को रीसाईकल करने के बजाए दुनियाभर में सस्ते मजदूर कबाडने की कवायद चला रखी है और भय व्यक्त किया जाता है कि वे जितने जल्दी काम पा रहे हैं उतनी ही गति से रद्दी में तब्दील होते जाएंगे!
  4. नितिन
    कहानी पसंद आई।
  5. balkishan
    लोटा पाडे और जानकी की कहानी बहुत कुछ कह रही है. बहुत सा दर्द और बहुत सी चिन्ताए इसमे छिपी है. ये समस्या पूरे विश्व मे फैली है, फ़ैल रही है. पर हल कुछ नज़र नही आता.
  6. Sanjeet Tripathi
    बढ़िया कहानी के लिए शुक्रिया!!
  7. भुवनेश
    वाह फुरसतियाजी
    हम तो गोविंदजी के पहले से ही मुरीद हैं पर शिकायत है कि उनका लिखा इतना कम पढ़ने के लिए उपलब्‍ध हो पाता है….
  8. Anonymous
    Aapka blog pad kar aisa lagta hai ki hindi likhne aur padhne wale log abhi bhi hai. Mere Janene walon main to sirf sadharan hindi ki hi jaankari hai aur kai aise log bhi hai, chahe aap unse hindi main baat kare par uttar angrezi main aata hai.
    aapki writting bahut hi umda hai. padhkar maza aaya.
  9. Alkesh Khedle
    Vridh hote Majdooro ki dasha ka marmik chitran nishchit hi prashnshaniya hai.
  10. सुरेश साहनी
    सरवाईवल आफ़ द फ़िटेस्ट: शायद हमें जागने में वक्त लगे. उपाध्याय जी की कहानी
    मिलकर्मियों के संघर्ष का अच्छा चित्रण है. किन्तु कहानी के उद्देश्य तक नहीं पहुँची है
    या हो सकताहै कि मैं समझने में असमर्थ रहा हूं.
    लेकिन किसी ने कहाहै:-
    ‘लो अतीत से उतना ही, जितना पोषक है!
    जीर्ण शीर्ण का मोह मृत्यु ही का द्योतक है !!.
  11. Anonymous
    aap jaisa bolna aata nahi ghuma phira kar ,sidhe yahi kahoongi kahani bahut shaandar rahi ,
  12. jyotisingh
    aapki rachna ko padhne par adbhut aanand ki anubhuti hoti hai ,kya gazab ki shaili aur bejod shabdo ka sangam ,aapke aage kuchh bolne ki himmat hi nahi
  13. pragya
    Such a nice story near to reality or you can say reality is in form of story.
  14. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] रद्दी [...]

Friday, November 23, 2007

ब्लाग नौटंकी उर्फ़ चिठेरी-चिठेरा संवाद

http://web.archive.org/web/20140419213925/http://hindini.com/fursatiya/archives/373

ब्लाग नौटंकी उर्फ़ चिठेरी-चिठेरा संवाद


टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा
हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के इतवार का एक आकर्षण होता है उर्मिल कुमार थपलियाल की लिखी हुयी सप्ताह की नौटंकी। पिछले इतवार के कुछ अंश देखे जायें-


नटी:आधा बीत गया नवंबर।
नट: मुआ मुकद्दर। मरा सिकन्दर।
नटी:सत्ता बन गई मोटा अजगर।
नट: क्या कहन। भई क्या कहने।
नटी: कपटी पहने संत का चोगा।
नट: सारे भोगी करते योगा।
नटी: थाने में है टुन्न दरोगा।
नट:क्या कहने। भई क्या कहने।
(नक्कारा बुश के आगे खड़े मुशर्रफ़ की तरह थरथरा के बजता है) -उर्मिल कुमार थपलियाल

इसी नट-नटी की तर्ज पर हमने सोचा कि एकाध बार ब्लाग-नौटंकी लिखी जाये तो कैसा रहे! :) नट-नटी की तर्ज पर ब्लागर-ब्लागराइन तो जमेगा नहीं। ज्ञानजी ने चिठेरा बताया था एक दिन ब्लागर को। सो चिठेरा-चिठेरी सम्वाद लिखे जायें। सम्वाद का मसौदा पेशे-खिदमत है:-

ब्लाग नौटंकी उर्फ़ चिठेरी-चिठेरा संवाद

चिठेरा: अरी चिठेरी, बड़ी कम उमर लग रही है आज तो! क्या ज्ञानजी के यहां से हर्र की गोली खा के आ रही है!
चिठेरी: तू भी तो नये नारद की टिपटाप लग रहा है। स्लिम-ट्रिम। धड़ाधड़ महाराज की तरह स्मार्टनेस बिखराये जा रही है।
चिठेरा: तू कौन ब्लागवाणी से कम इतरा रही है। न जाने कित्ते तेरे पे फ़िदा है। किसी नये-नवेले ब्लाग की तरह खूबसूरत लग रही है। :)
चिठेरी: मैं खूबसूरत लग रही हूं! सच!
चिठेरा:मुच!
चिठेरी: हाय चिठेरे, तू कित्ता रईस दिल है। मेरे लिये इत्ता बड़ा झूठ बोल गया। मैं तो तुझे एकदम निठल्ला समझती थी। लेकिन तू तो दिल का समीरलाल निकला। किसी को निराश नहीं करता! :)
चिठेरा: तू भी मेरी तारीफ़ कर न! कौन रोकता है! कौन टोकता है! कर न! :)
चिठेरी: नई यार, मुझसे झूठ नई बोला जाता। :)
चिठेरा: चल छोड़ अच्छा ला थोड़ा पुराणिक मसाला खिला।
चिठेरी:अरे पुराणिक मसाला वाला भग गया हरिद्वार। दुकान बन्द करके। तीन दिन बाद आयेगा।
चिठेरा: क्यों भला उसकी अभी तीर्थ करने की उमर है? अभी तो जवान है!
चिठेरी:अरे वो बड़ा लुच्चा है। स्मार्ट लुच्चा। जो अगड़म-बगड़म हरकतें करता है उनको टाइम-टाइम पे हरिद्वार में धो आता है। ताकी नयी हरकते कर सके।
चिठेरा: और वो समीर पुड़ियाधर गयी?
चिठेरी: वो जबलपुर में भेड़ाघाट के किनारे गयी है। रेलवे के फ़ाटक पर किसी गोरी-छोरी को कनखियों से निहार रहा होगा।
चिठेरा: तुझको नहीं निहारेगा। :)
चिठेरी:अरे टिप्पणीझौंसे! तेरी तो ऐसी-तैसी। न जाने कैसी-कैसी ! मैं तुझे क्या ऐसी-वैसी, जैसी-तैसी लगती हूं। :(
चिठेरा: अरे, स्माइली लगा तो दी फ़िर काहे अकड़ रही है। ज्यादा करेगी तो तेरा बहिष्कार कर दूंगा।
चिठेरी:तू मेरा बहिष्कार करेगा! करके तो देख। बड़ा प्रमेन्द भैया की तरह टीन-टप्पर बन रहा है। करके तो देख। इतने समझौता करवाने वाले आ जायेंगे कि ब्लाग-सड़क जाम हो जायेगी। पोस्ट वर्षा होने लगेगी। सब तरफ़ यू एन ऒ छाप टिप्पणियां दिखेंगी।
चिठेरा: अरे, तू तो सच में बुरा मान गयी। ये ले एक स्माइली और ले ले। खुश रह। नाराज मत हो खून जलता है। शकल ऐसे ही माशाअल्लाह है। और भी बेनजीर भुट्टो नुमा हो जायेगी। मान जा! :) :)
चिठेरी: चल मान गई। तू भी क्या याद करेगा किसी रईस चिठेरी से पाला पड़ा है। लेकिन तो एक बात गांठ बांध ले अकल के दुश्मन कि मुझे अपनी तारीफ़ के सिवाय और कोई मजाक नहीं पसन्द। अबकी मजाक किया तो कोसने लगूंगी कि कोई लड़की तुम्हें अचानक देखने आ जाये और तुझसे चाय बनवा के पी जाये। जैसा घुघुती दीदी ने मसिजीवी की तरह शरातत के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं। हमेशा पंगेबाज बनने की कोशिश करता है। जबकि तू जानता है तू कब्भी उत्ता पंगा नहीं ले सकता। अब तो वो भी बेचारे नहीं लेते। हाऊ सैड! हाऊ बैड।
चिठेरा: तुम भी एकदम्मै सेन्सेक्स की तरह अनसर्टेन हो। कहीं का कहीं बतरस-पतंग उड़ाने लगती हो। कित्ती मनभावन अदा है। :)
चिठेरी: तुझे तो ठीक से तारीफ़ भी नहीं करनी आते निगोड़े। एक हफ़्ते का क्रैश कोर्स कर डाल जबलपुर जाके समीरलाल के यहां। कुछ सीख। जिन्दगी सुधर जायेगी। वर्ना बना फ़ुरसतिया बरबाद होता रहेगा।
चिठेरा:अब इस उमर क्या सीखेंगे?
चिठेरी:अरे अभी तेरी उमर ही क्या हुयी है। जब ज्ञानजी जैसे अनुभवी लोग अपने अनुभव-कोठार में नयी चीजे समा ।रहे हैं । पुलकोट के साथ फोटो लगा रहे हैं। तो तू क्यों नईं कर सकता जी! चल जा कर। टाइम मत खोटी कर।
चिठेरा: तुम कित्ती अच्छी हो। मेरा कित्ता भला सोचती हो। भगवान करे तेरे ब्लाग पर पाठकों की भीड़ ऐसे ही जमी रहे जैसे राहत-योजना का पैसा बांटने वाले केन्द्र में लगी रहती है। तेरे ब्लाग पर टिप्पणियों की ऐसे बौछार हो जैसे अमेरिका इराक में बम बरसाता है। तेरे दुश्मन सद्दाम की तरह मारे जायें। :)
चिठेरी: चल, चल। बहुत हो गयी मस्केबाजी। चिठेरी खुश हुई। जा आफिस भाग। दफ़्तर तेरा इंतजार कर रहा है।
चिठेरा: चला -चला लेकिन ऐसे हड़बड़ाते हुये मिलना भी कोई मिलना हुआ भला। :)
[ब्लाग नक्कारा आशीष की शादी पर बजने वाले पूर्वाभ्यास की तरह बजता है] :)

आज का पाडकास्ट

होली का त्योहार देवर-भाभी के लिये खास तौर पर याद किया जाता है.देवर भाभी का एक लोगगीत मुझे बहुत पसंद है. प्रख्यात गीतकार लवकुश दीक्षित का लिखा/गाया अवधी भाषा का यह गीत भाभी द्वारा देवर की बदमासियों ,शरारतों के जिक्र से शुरु होकर खतम होता है जहां भाभी बताती है कि देवर पुत्र के समान होता है.अपनी शैतानियां समाप्त कर दो। मैं देवरानी को बुलवा लूंगी ताकि तुम्हारी विरह की आग समाप्त हो जायेगी| यह भी कहती है कि मैं होली खेलूंगी जैसे भाई के साथ सावन मनाया जाता है। जो साथी लोग अवधी नहीं जानते उनकी सुविधा के लिये भावानुवाद दिया है।

निहुरे-निहुरे कैसे बहारौं अंगनवा,
कैसे बहारौं अंगनवा,
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।

भारी अंगनवा न बइठे ते सपरै,
न बइठे ते सपरै,
निहुरौं तो बइरी अंचरवा न संभरै,
लहरि-लहरि लहरै -उभारै पवनवा,
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।
छैला देवरु आधी रतिया ते जागै,
आधी रतिया ते जागै,
चढ़ि बइठै देहरी शरम नहिं लागै,
गुजुरु-गुजुरु नठिया नचावै नयनवा,
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।
गंगा नहाय गयीं सासु ननदिया,
हो सासु ननदिया,
घर मा न कोई मोरे-सैंया विदेसवा,
धुकुरु-पुकुरु करेजवा मां कांपै परनवा,
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।
रतिया बितायउं बन्द कइ-कइ कोठरिया,
बन्द कइ-कइ कोठरिया,
उमस भरी कइसे बीतै दोपहरिया,
निचुरि-निचुरि निचुरै बदनवा पसीनवा,
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।
लहुरे देवरवा परऊं तोरि पइयां,
परऊं तोरि पइयां,
मोरे तनमन मां बसै तोरे भइया,
संवरि-संवरि टूटै न मोरे सपनवां,
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।
माना कि मइके मां मोरि देवरनिया,
मोरि देवरनिया,
बहुतै जड़ावै बिरह की अगिनिया,
आवैं तोरे भइया मंगइहौं गवनवां,
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।
तोरे संग देउरा मनइहौं फगुनवा,
मनइहौं फगुनवा,
जइसै वीरनवा मनावैं सवनवां,
भौजी तोरी मइया तू मोरो ललनवा,
टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा|

लवकुश दीक्षित
भावार्थ:
आंगन में झुके-झुके कैसे झाड़ू लगाऊं?बदमास देवर (पति का छोटा भाई )टकटकी लगाकर मुझे देख रहा है। आंगन बड़ा है। बैठकर सफाई करना मुश्किल है। अगर झुकती हूं तो मुआ आंचल सरकता है। हवा आंचल को बार-बार लहरा कर उभार देती है। शरारती देवर आधी रात से ही जाग जाता है। बेशर्म होकर देहरी पर बैठकर आंखें नचाता ताकता रहता है। सास-नंद गंगा स्नान के लिये गये हैं। पति विदेश गये है। घर में कोई नहीं है मेरे कलेजे में धुक-पुक मची है। डर लग रहा है। रात तो मैने कोठरी बंद करके बिता ली। अब दोपहर में बहुत उमस है। आंचल से पसीना छूट रहा है।
मेरे प्यारे देवर,मैं तेरे पांव पकड़ती हूं। मेरे तन-मन में तुम्हारे भइया बसे हैं। मैं केवल उन्हींके सपने देखती हूं। मैं जानती हूं मेरी देवरानी(देवर की पत्नी)मायके में है। विरह की आग तुमको जला रही होगी। पर जब तुम्हारे भइया आयेंगे तो मैं उसका गौना करवा कर उसको बुलवा लूंगी। मैं तुम्हारे साथ होली खेलूंगी जैसे भाइयों के साथ सावन का त्योहार मनाया जाता है। भाभी मां के समान होती है इसलिये तुम मेरे पुत्र के समान हो। :)

8 responses to “ब्लाग नौटंकी उर्फ़ चिठेरी-चिठेरा संवाद”

  1. anita kumar
    अनूप जी बहुत ही बड़िया आइडिया लाए आप, वैसे दूसरे ब्लोग भाइयों की शिकायत जायज है जी लपेटे तो सब को लपेटें , अब एक सीरीयल ही बना डालिए, हर इतवार का प्रोग्राम्… गाना भी बड़िया है जी
  2. प्रभात टन्डन
    खूब लपेटा आपने सब को ! अब जल्दी से उर्मिल थपिलियाल जी को ब्लागर समुदाय का हिस्सा बनवाने मे अपनी पहल कीजिये । :)
  3. प्रमेन्‍द्र
    अच्‍छा संवाद था, पढ़कर मजा आया, :)
    मैने भी आज ही देखा है।
  4. फुरसतिया » काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाये
    [...] ऐसे ही देखा कि मैंने अपने ब्लाग पर जो लवकुश दीक्षित का गीत निहुरे-निहुरे कैसे बहारौं अंगनवा पोस्ट किया वह न जाने किन-किन हस्तियों ने गाया है। लवकुश जी को पता भी न होगा और न जाने किन-किन लोगों ने इसे गाकर मंच लूट लिया होगा। [...]
  5. shambhu nath
    दोहाः मेरे पति की मात हे सदा करव कल्याण..
    तुम्हरी सेवा में न कमी रहू हरदम रखूं ध्यान//
    जय जय जय सासू महरानी हरदम बोलो मीठी वाणी.
    तुम्हरी हरदम करवय सेवा फल पकवान खिलाउब मेवा//
    हम पर ज्यादा करो न रोष हम तुमका देवय न दोष.
    तुम्हरी बेटी जैसी लागी तुम्हारी सेवा म हम जागी//
    रूखा-सूखा मिल के खाबय करय सिकायत कहू न जावय
    पति देव खुश रहे हमेशा उनके तन न रहे क्लेशा.
    इतना वादा कय लिया माई फिर केथऊ कय चिंता नाही//
    जीवन अपना चम-चम चमके फूल हमरे आंगन म गमके.
    जैसी करनी वैसी भरनी तुम जानत हो मेरी जननी//
    संस्कार कय रूप अनोखा कभौ न होय हमसे धोखा.
    हसी खुशी जिनगी बीत जाये सुख दुख तो हरदम आये//
    दोहाः रोग दोष न लगे ई तन मा.जाता रहे कलेश
    सासू मॉ की सेवा जो करे खुशी रहे महेश..
  6. काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाये
    [...] अपने ब्लाग पर जो लवकुश दीक्षित का गीत निहुरे-निहुरे कैसे बहारौं अंगनवा पोस्ट किया वह न जाने किन-किन [...]
  7. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] [...]

Tuesday, November 20, 2007

ब्लागर प्रयाण् गीत

http://web.archive.org/web/20140419213258/http://hindini.com/fursatiya/archives/371

ब्लागर प्रयाण् गीत

सबह हुई,
आंख मल,
बिस्तर से निकल,
चाय चढ़ा।
नेट लगा,
कमेंट देख,
मुस्करा,
खिलखिला।
पोस्ट लिख,
लिंक भेज,
इंतजार कर,
धीरज धर।
देश को रो,
जी का चैन खो,
दुखी हो,
सुख मिलेगा।
फोटो लगा,
ज्ञान-बीड़ी जला,
पुराणिक मसाला खा,
मौज कर।
फ़ुरसत में रह,
पाडकास्ट झिला,
सब झेलाते हैं,
पीछे मत रह।
कविता मत लिख,
पढ़ेगा तो मरेगा,
होगा अपराध बोध ,
ये क्या किया तूने अबोध।
ज्यादा मत बहक,
चिट्ठा-चर्चा कर,
वन लाइनर लिख,
मस्त रह, अलमस्त दिख।
बहुत हुआ,
घड़ी देख,
तैयार हो,
आफिस भाग। :)

31 responses to “ब्लागर प्रयाण् गीत”

  1. arun arora
    पर पंगा मत ले
    वर्ना पंगेबाज आ जायेगा…:)
  2. Rakesh Khandelwal
    एक जोड़
    एक तोड़
    एक कान को मरोड़
    शब्द चुन
    कविता बुन
    बस सुना, मत सुन
    इधर चटक
    उधर मटक
    लिखा है खूब
    लिख जरा
    न पूछ खोटा कौन है
    न पूछ कौन है खरा
    नजर बचा के बास की
    कलम उठा के खास सी
    यूँ पोस्ट रोज कीजिये
    हमें भी हर्ष दीजिये
  3. जीतू
    धीर धर,
    विवादित लिख
    कुछ फ़ड्डा कर
    (अप)यश मिलेगा
    बकिया चकाचक लिखे हो प्रभु।
  4. kakesh
    फुर्सत नहीं
    तो वन लाइनर लिख
    ज्ञान जी को पकड़
    आलोक जी को जकड़
    लिंकित कर
    पोस्ट लिख
    चर्चा कर
  5. प्रत्यक्षा
    “ये क्या किया तूने अबोध”
    आखिर कविता क्यों लिख डाली ?
  6. अफ़लातून
    क्या – क्या ,
    मत कर,मत कर, मत कर ?
  7. मीनाक्षी
    मस्त मस्त सिद्ध हस्त
    जो लिखा है सत्य सब !
    सलाम हे,कलम के भक्त
    हर्षित हुए सुबह के वक्त !
  8. संजय बेंगाणी
    अगड़म बगड़म
    दही रगड़म
    कुछ भी लिख
    पर पोस्ट कर
    धर्म निभा
    हे ब्लॉगर
  9. Shiv Kumar Mishra
    टिप्पणियां देखी
    जिसने भी टिपियाया
    कविता ही लिखी
    ‘हम भी शब्दों से खेलूँगा’
    टिपण्णी की शक्ल में
    कविता ही ठेलूँगा
    एक लाइन की चिटठा चर्चा
    बचाए समय का खर्चा
    एक हाथ में चाय की कप
    फ़ोन पर गप-शप
    सब ऐसे ही चलता रहे
    अनूप भइया, कीप इट अप
    कभी तो भूलिए
    आफिस की देरी
    ब्लॉग पर लिखिए
    बड़ी सी पोस्ट
    सामने रहे की-बोर्ड
    बगल में चाय और टोस्ट
    आज-कल नहीं लिखते
    ‘जबरिया’ कभी भी
    थोडी तो निकालिए ‘फुरसत’
    समय है अभी भी
    अगर ऐसा नहीं हुआ
    तो हम जुलूस लेकर आयेंगे
    हमारे शहर के ‘बुद्धिजीवी’
    आपके घर के बाहर
    नारे लगायेगें
  10. परमजीत बाली
    वाह!वाह!
    आप का लिखना
    हमें भाया
    पढ़ कर बहुत
    मजा आया
    ऐसे ही लिखें
    सदा फुरसतिया जी
    यूहीं फुर्सत में दिखें।
  11. सागर चन्द नाहर
    हम कविता नहीं लिखेंगे!! :)
    वैसे यह तो ब्लॉगर प्रणय गीत है प्रयाण गीत नहीं
  12. सृजन शिल्पी
    चाहे तू खेल
    शब्दों से
    या फिर कोई
    मुद्दा उठा
    कर घमासान
    चर्चा में रह

    जगा सोते को
    या फिर बहला
    सबके मन को

    कर टिप्पणी
    टिप्पणी पा।
    पाठक बढ़ा
    फैन-फोलोइंग बना
    लोकप्रिय बन
    छप पत्र-पत्रिकाओं में।
    किताबें पढ़
    देख सिनेमा
    समीक्षा छाप।
    ब्लॉगर मीट कर
    फोटो-वर्णन छाप।
    घर-दफ्तर का काम छोड़
    पोस्ट पढ़
    पोस्ट कर
    ब्लॉगिंग कर
    खुश रह।
    कोई कोसे
    कोई डाँटे
    परवाह मत कर
    तू है आजाद
    कर अभिव्यक्ति
    पहली बार
    मिला है
    यह मंच
    धड़ाधड़ छाप
    बकबक कर।
    दूसरों की सुन,
    अपनी भी सुना।
    तारीफ कर
    तारीफ पा।
    कर खिंचाई
    गाली खा।
    अहा !
    क्या है मजा।
    रोजमर्रा के खाली वक्त को
    चिट्ठाकारी में खपा।
    क्या पता
    किसने देखा कल
    हो सकता है
    कल तू बन जाए प्रेमचंद
    परसाई को भी दे पछाड़
    या फिर होने लगे कमाई
    एडसेंस से
    और तू हो जाए मालामाल।
  13. रवि
    फुरसतिया का यह पोस्ट
    फुर से उड़ गया
    क्या ब्लॉगिंग ने
    एक और परसोना
    बदल दिया??????????????????
  14. anita kumar
    जल्दी से घर आ, नेट लगा, पोस्ट पढ़,
    फ़ुरसतिया के वन लाइनर पे
    पुराणिक मसाले में लेफ़्ट का किवाम,
    ज्ञान बीड़ी से चलती कबाड़ी की कार, साइकल की रेलम पेल,
    छोड़ ये वन लाइनर, थोड़ी फ़ुर्सत निकाल,
    पुराणिक का पुराना मसाला निकाल,
    लंबी सी पोस्ट में
    थोड़ा मल्लिका, थोड़ा राखी को ढाल,
  15. प्रियंकर
    क्या बात है !
    विस्तारित गद्य के बाद कोडीफ़ाइड कविताएं .
    अच्छा लगा यह प्रयाणगीत — नित्यक्रिया और नेटक्रिया के पश्चात ऑफ़िस जाने के लिए प्रेरित-उत्तेजित करता प्रयाणगीत . अरे तो अब और कौन सा कुरुक्षेत्र के लिए कूच करना है . अब तो ऑफ़िस ही कुरुक्षेत्र है .
  16. Aarchi
    aap logo ki kavita likhen ka andaz bilkul alag hai..
    aam bhasha ko bhi kitna mazedar bana dete hai..
    yun hi jari rakhiye..
  17. Sanjeet Tripathi
    दोपहर हुई,
    ब्लॉग्स देखे,
    कभी मुस्काए,
    कभी झुंझलाए,
    और
    टिपियाए।
    मन हुआ तो पोस्टाए भी।
    मस्त लिखे हो प्रभो!!
  18. rachana
    कई दिनो बाद आपके ब्लॉग पर आई,
    छोटी सी पोस्ट देख, बहुत हर्षाई!
    कविता तो है ही खूब,
    टिप्पणियाँ भी भाईं!!
    सभी को काव्यमय देख,
    मैने भी कलम चलाई!!
  19. neelima sukhija
    ब्लॉग न लिख पाये तौ
    कोई बात नही
    ओर कुछ नही
    तौ कमेंट ही सही
  20. Gyan Dutt Pandey
    वाह!
    पोस्ट मस्त!!
    टिप्पणियाँ मस्त!!!
    गलती हमारी जो आये लेट
    और सारा मसाला भाई लोग गये ठेल!!!! :-)
  21. अजित वडनेरकर
    अरे, अद्भुत कविता लिख डाली आज आपनेमैं देख नहीं पाया थावाह वाह वाह….
    कुछ कुछ अमर घर चल …..और कुछ कुछ – उसने कहा था में ….वजीरा , ला पानी पिला जैसे संवादों का लुत्फ है इसमें।
    सूबेदारनी की धत् वाला पार्ट हम लिख देते हैं…:)
  22. आलोक
    मस्त
    मस्त
    (इतनी ही कविता आती है)
  23. सारथी चिट्ठा अवलोकन 10 | सारथी
    [...] अनुभव अपनी नीयत साफ रखना….. अवलोकन लुच्ची नजर, चुनिंदा नजारे- चश्मा आलोक पुराणिक का अनुभव अपनी नीयत साफ रखना….. काव्य ओस की एक बूँद खबर आज़ादी एक्स्प्रेस ओह! तो अब ताजमहल नहीं रहेगा….. खोजी लेख बढ रहा देह व्यापार कैसे चलता है देह व्यापार का धंधा? गजल जब कभी बोलना वक्‍त पर बोलना, मुद्दतों बोलना मुख्‍तसर… चिट्ठाकारी ब्लोग लेखक और लेखक ब्लोगर (२) ब्लागर प्रयाण् गीत (काव्य विधा में) जाल-संगणक अपने लेख को अखबारी लेख की शक्ल दें देशज औषधि शास्त्र डायबीटीज : सही औषधीय गुणो से युक्त कोहा वृक्ष पत्रकार/पत्रकारिता पत्रकार या बेकार पर्यावरण मोटापे से ग्‍लोबल वार्मिंग का क्‍या संबंध? भाषा यह पक्षपात क्यों? वर्णन कोहरा या अम्बर की आहें ! विश्लेषण फतवा और मुस्लीम औरत दुनिया के 200 अच्छे विश्वविद्यालयों में एक भी भारत का नहीं है विज्ञान जूँ (जी हां, शीर्षक में एक ही अक्षर है) औषधि गुण मुलेठी के जारी है संजीवनी बुटी ,सोम की खोज ……! (श्रंखला) सफल जीवन साधारण सी पीठ पर न लादें जॉब स्ट्रेस का शैतान साहित्य-परिचय छायावाद की सबसे बड़ी देन हास्य हिन्दी चिट्ठाकारों का वर्गीकरण (हास्य+गंभीर लेख) हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी क्यों नहीं है?? [...]
  24. Isht Deo Sankrityaayan
    कर दिया साहब, जो-जो आपने कहा सब कर दिया.
  25. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] ब्लागर प्रयाण गीत [...]
  26. संतोष त्रिवेदी
    गज़ब अवलोकन और प्रस्फुटन है :-)
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..जुगनू बन जलता हूँ !
  27. चंदन कुमार मिश्र
    प्रवाह कम लगा।
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..भारत में बौद्ध धर्म की क्षय – दामोदर धर्मानंद कोसांबी
  28. i was reading this
    When will i notice a variety of users blog posts I prefer with web search, even though just became a Blog writer membership, it functions decent. I remember there exists a way, although i am not looking at it now. Many thanks for your facilitate..
  29. Fender FA-100
    Hello! I just wanted to ask should you ever have any issues with hackers? My last blog (wordpress) was hacked and I ended up losing numerous months of hard work due to no backup. Do you might have any solutions to protect against hackers?
  30. click here now
    I have got got word of web blogs and kind of figure out what they are really. My real question is what things you write down using a internet site, like products thats on your mind or just regardless of what? And what websites am i allowed to logon to to commence blogs? .
  31. like it
    How can you unearth many different weblogs on Blogger with keyword and key phrase or lookup?