Monday, December 17, 2007

चिठेरी उवाच- आजा इंग्लिश सिख लें

http://web.archive.org/web/20140419214522/http://hindini.com/fursatiya/archives/383

चिठेरी उवाच- आजा इंग्लिश सिख लें

चिठेरी को देखकर चिठेरा ऐसे खुश हो जाता है जैसे कोई मासूम खुराफ़ती किसी विवाद को फ़ैलाकर प्रफ़ुल्ल्तित होता है!
चिठेरा: अरी ओ चिठेरी, किधर गयी तू दिखती नहीं। एकदम्मै समीरलाल बन गई।
चिठेरी: अरे सब जगह हल्ला मच गया था। ब्लागर मीट मुर्दाबाद-मुर्दाबाद। सो हम दुबक गये कोने में! तुम भी दिखे नहीं।
चिठेरा:हां , रिजेक्टेड नारा था। रिजेक्टेड माल में दिखा। फिर आज कैसे आ गयी? डर कहां गया?
चिठेरी: वो अभय तिवारी ने कहा न छाती ठोंक के। हम तो जबरिया मिलबै यार हमार कोई का करिहै। :)
चिठेरा: अभय तिवारी ने छाती ठोंकी? किसकी? कैसे? कहां? किधर? कैसे? क्या वे ऐसे हैं? :)
चिठेरी: अरे बरजोर बेवकूफ! हर जगह अपनी अकल लगाता है। डिफ़ेक्टिव आइटम की तर हर जगह डिफ़ेक्टिव हकरतें करता है। तू मेरे ब्लाग पर कमेंट न करता होता नियमित रूप से तो अभी तेरी शिकायत कर देती।
चिठेरा: मेरी बात को गलत मत समझ री चिठेरी। मैं तुससे जरूरी डिस्कसन करना चाहता हूं। तुम पहले से ही उखड़ने लगी।
चिठेरी: क्या जरूरी डिस्कसन है रे? क्या ये जगह सिनेमाहाल है जहां डिस्कसन के लिये हुड़क रहा है? फिर आलोक पुराणिक भी नहीं दिख रहा तो फ़ायदा डिस्कशन-फ़िस्कशन का? ऐसी हरकत से क्या फ़ायदा जाड़े में जिसका हल्ला न मचे। आय डोन्ट लाइक इट। इट्स यूजलेस।
चिठेरा: हाय री चिठेरी, तेरे से गले से अंग्रेजी छलक रही है। एकदम नये-नवेले किर्केटर की तरह। पूरे छह शब्द ठोंक दिये दो वाक्य में। ये छक्का मारने की प्रेरणा कहां से मिली?
चिठेरी:ज्ञानजी के ब्लाग से। उन्होंने आज अंग्रेजी केबारे में बहुत हिंदी लिखी है। सब समझ में आ गयी। तू भी सिखेगा?
चिठेरा: मुझे कौन सिखायेगा? मेरा कौन है यहां जो मुझे गिटिर-पिटिर सिखाये?
चिठेरी: मैं हूं न! तू चिन्ता बेकार करता है। आजा इंग्लिश सिख ले। शुरू करें।
चिठेरा: करो! लेकिन मुझे डर लग रहा है। कुछ होगा तो नहीं अंग्रेजी सीखने से। डरता हूं कोई ऊंच-नीच न हो जाये।
चिठेरी: किससे डरता है रे तू? इत्ता तो अमेरिका ओसामा से भी नहीं डरता जित्ता तू डर रहा है अंग्रेजी से?
चिठेरा: छोड़ ! अब तू शुरू कर। जो होगा देखा जायेगा। जब सर दिया अंग्रेजी में तो डिक्शनरी से क्या डरना? चल शुरू कर।
चिठेरी: अच्छा एकदम रैपिडेक्स वाली अंग्रेजी सिखाती हूं तेरे को। तू जब मुझसे मिलता है तो मुंह फ़ाड़ के गंवारों की तरह, ओह सारी अपनी तरह ,हाय री चिठेरी, अरी चिठेरी कहता है न ! उसे अंग्रेजी में जानते हो कैसे कहते हैं?
चिठेरा: कैसे कहते हैं? बता तो सही । मैं भी जानूं भला अंग्रेजी के गंवार कैसे बोलते हैं!
चिठेरी: अंग्रेजी में इसे कहते हैं- हेलो चिठेरी, हाऊ डू यू डू? या ज्यादा कड़ा अंग्रेज हुआ तो बोलेगा- हे चिठेड़ी, हा दु यू दु? बोल के देखो! जस्ट ट्राय। डोन्ट फ़ाल शाई।
चिठेरा: अभी नहीं। कल हनुमानजी का व्रत है। उसके बाद ई पराक्रम शुरू करेंगे। लाल लंगोटे वाले का आशीर्वाद ले लें।
चिठेरी: अच्छा एज यू विश।
चिठेरा: लेकिन चिठेरी ये अंग्रेजी है बहुत मजेदार! देखो। तुम हिंदी में अकेली रहती हो। अंग्रेजी में जाते ही दु-दु (दो-दो) हुई गयीं। क्या जलवे हैं अंग्रेजी के। अब समझा कि काहे देशभर में लोग अंग्रेजी स्कूल खोले हैं। सब एक का दू और दुई का चार कर रहे हैं। :)
चिठेरी: तुझको किती बार समझाया तू फ़ुरसतिया के संग मत रहा कर। तेरा भी दिमाग कुंद हो रहा है। तू जित्ती जलदी हो सके अंग्रेजी सीख ले। कल्याण होगा तेरा।
चिठेरा: अच्छा तू कहती है तो सीखूंगा। वैसे एक बात कहूं चिठेरी। बुरा तो नहीं मानेगी?
चिठेरी: कह लेकिन अगर मेरी तारीफ़ के अलावा कोई और बात हुयी तो बुरा न मानने की कोई गारण्टी नहीं। इस मामले में मैं महिला चिट्ठाकारों को अपना महाजन मानती हूं। वे जहां जाती हैं वही मेरा रास्ता है। :)
चिठेरा: तू जब अंग्रेजी पढ़ा रही थी तो एकदम ऐसी लग रही थी जैसे इंजमाम हक क्रिकेट के मैदान पर अंगेजी में हाकी की कमेंन्ट्री कर रहे हों। एकदम्मै ऐसी लग रही थी कि का बतावैं कैसी लग रही थी। कुछ-कुछ होने लगा मन में। :)
चिठेरी: अरे मूढ़मति, गोबर गणेश कुछ बता तो कैसी लग रही थीं। शर्मा मत। शरम बेंच खा। बेशरम हो जा।
चिठेरा: तू एकदम जगर-मगर लग रही थी। मन कर रहा था तुझे ऐसे ही टुकुर-टुकुर ताकता रहूं। दीदा फ़ाड़े।
चिठेरी: तो देख न । अगर-मगर काहे करता है। कोई राशनिग थोड़ी हैअ ताकने में। चल आगे बता।
चिठेरा: तू जब हंसते हुये अंग्रेजी पढ़ा रही थी न! तो लग रहा था कि किसी बगीचे में गुनगुनी धूप खिली है। हमारा मन फूल सा इतराने लगा देखकर कि हमारी चिठेरी कित्ती सोंणी लग रही है।
चिठेरी: सच्ची। मैं ऐसी लग रही थी्?
चिठेरा: मुच्ची। मैं तेरे से झूठ बोल कर कौन से अपने ब्लाग पर कमेंट पा जाउंगा। तू तो कभी करती नहीं मेरे ब्लाग पर कमेंट। मैं ही जुटा रहता हूं तेरे ब्लाग पर। चाहे पोस्ट पल्ले पड़े या न पड़े।
चिठेरी: तू बोल्ड है रे बौड़म। इत्ती अच्छी बाते करते हुये जरा भी डरा नहीं। तेरे जैसे बेवकूफ़ी भगवान सबको क्यों नहीं देता।
चिठेरा: हम रेड एन्ड व्हाइट पीने वालों की बात ही कुछ और है। :)
चिठेरी: तू रेड और व्हाइट भी पीता है निगोड़े? बताया नहीं पहले ! चल परे हट। दूर जा! दुर्-दुर।
चिठेरा: अरे री चिठेरी। तू भी अकल के नाम पर नवाज शरीफ़ है। रेड एंड व्हाइट मतलब टमाटर का सूप और दूध। हम यही पीते हैं जाड़े में। तेरे दिमाग में तो लगता है इन्फ़ैक्शन हो गया है। चल अब जा मुझे भी सोने दे।
चिठेरी: चल जा, तू भी सो जा। शब्बाखैर। सपने में गलत हरकत मती करना किसी से। हमारे सिवाय किसी को ताका भी तो समझ ले तेरी खैर नहीं। लिमिट में रहना। :)
चिठेरा: ओके , टेक केयर, ब्बाय, गुड नाइट। सी यू टुमारो।
चिठेरी:अरे चिठेरे, धोखेबाज तू तो इंगलिश बोल लेता है। तैने मुझसे छिपा के अंग्रेजी सीखी। मझे बताया भी नहीं। जा मैं तुझसे नहीं बोलती। मैं तुझे श्राप देती हूं कि तू जब किसी के सामने धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने की कोशिश कर तो ‘आई मीन’, ‘यूसी’, ‘यू नो ‘, ‘आई मीन टु से’ कहकर अंग्रेजी बोलने वाले आम भरतीय की तरह हकलाने लगे। आज से तेरी-मेरी कुट्टी।
(ब्लाग नक्कारा २०-२० ओवर वाले मैच में फ़्री हिट सा बजता है।)

11 responses to “चिठेरी उवाच- आजा इंग्लिश सिख लें”

  1. anita kumar
    :) ये चिठेरे और चिठेरी से मिलना पड़ेगा, ये बिल्कुल आलोक जी के थिएटर वाले चिरकुट प्रोफ़ेसर और वरिष्ठ महिला अधिकारी लगते है। बड़ी इम्पोर्टेंट डिस्कशन कर रहे थे जी ये लोग॥ब्लोगरी का उद्धार हुआ समझो
  2. Gyan Dutt Pandey
    अरे पण्डितजी, जब चिठेरा-चिठेरी ने भी अंग्रेजी सीख ली है तो आप भी सीख लो। दन्न से अपना अन्ग्रेजी में ब्लॉग बना लो – “Always Relaxed”| :-)
  3. भुवनेश
    हम तो जबरिया टिपियाये यार हमार कोई का करिहै ;)
  4. Dineshrai Dwivedi
    अंगरेजी में चिठेरा-चिठेरी झकझक नहीं लिखी जा सकेगी।
  5. balkishan
    अद्भुत संवाद है!
    व्यंग्य के साथ.
    आप धन्य हो.
  6. आलोक पुराणिक
    सही जा रे ले हैं, चिठेरी और चिठेराजी। इंगरेजी सिखा दीजिये इन्हे बस ज्ञानजी से ना मिलवाईये, वो ग्रामेटिकल मिस्टेक सी निकालने लगेंगे।
  7. बोधिसत्व
    मुझे चिढ़ेरा चिठेरी दोनो अच्छे लगे…शुक-शुकी संवाद की याद आ गई…
  8. Sanjeet Tripathi
    एल्लो जी, लो कल्लो बात, अब तो इन्ने भी अंग्रेजी सीख ही ली, तो मैं काय कू नई सीखूं, जा रेला हूं अंग्रेजी सीखने।
  9. जीतू
    दिख्खे तो सही है, लेकिन कंही ना कंही कुछ कसक बाकी है। कंही शुकुल का टच नही आ रहा, ध्यान दो।
  10. अजित वडनेरकर
    ब्लाग जगत में ये चिठेरा चिठेरी अमर हो सकते हैं अगर आप इस गंभीरता से लें तो। गंभीरता यानी आवृत्ति और विषय-चयन में। अभी आप स्वांतःसुखाय लिख रहे हैं मगर ये पात्र ग़ज़ब ढा सकते हैं उन अवसरों पर जब ब्लागजगत लड़खड़ा रहा होता है, प्रमादग्रस्त दिखता है, बौखला रहा होता है , गालियां बक रहा होता है या गालियां खा रहा होता है।
    बढ़िया लिखा है इस बार भी। जमाए रखिये कनपुरिया ठाठ…
  11. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] चिठेरी उवाच- आजा इंग्लिश सिख लें [...]

Sunday, December 16, 2007

भैया, एक तमंचा लेन हतो

http://web.archive.org/web/20140419214943/http://hindini.com/fursatiya/archives/382

भैया, एक तमंचा लेन हतो


पिस्टल0.32
अभी दो दिन पहले गुड़गांव में आठवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे ने अपने सहपाठी के सीने में चार गोलियां उतार दीं।
चार खुद उतारीं फिर पांचवी के लिये तमंचा अपने दोस्त को दे दिया- ले तू भी उतार ले।
लोगों का कहना है- भारत भी अमेरिका हो रहा है। अमेरिका में ऐसा होता था। बच्चे अपनी पिस्तौल लेकर स्कूल जाते । वहां धड़धड़ा कर फ़ायरिंग करते। तमाम को निपटाते। फिर खुद भी निपट लेते। अपने भी गोली मार लेते।
भारत में लोग कहते- हाय, कैसे कर लेते हैं ये मासूम बच्चे ऐसा? क्या सिखा रहे हैं अमेरिकी अपने बच्चों को?
अब देखो। बता दिया एक किशोर ने। कैसे किया जाता। ऐसे किया जाता है।
चार गोलियां खुद मारी। पांचवी दोस्त से कहा तू भी मार ले।
जैसे टेस्टी चाकलेट अपने दोस्त को देते हुये कहते हैं तमाम बच्चे। तू भी टेस्ट कर। इट्स टेस्टी।
इसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन बुद्धिमान लोग करेंगे। हम आपको इसका दूसरा पहलू दिखाते हैं।
तमाम लोग हमारे यहां रिवाल्वर लेने आते हैं।
पूछते हैं- कै भैया एक तमंचा लेन हतो! कौन वालो अच्छो रहिये। गनफ़ैक्ट्री को या कि एस.ए.एफ़. को?
हम कहते हैं- दोनों एक हैं। एक ही तरीके से बनते हैं। एक ही सामान लगता है। एक ही अंदाज है। कहीं से ले लो।
वे कहते हैं- मुला सुन्त हैं कि एस.ए.एफ़. की बैरल बढ़िया है। जल्दी फ़टत नाईं है।
हम बताते हैं- तो एस.ए.एफ़. से लै लेव।
लेकिन सुन्त हैं हुवां देर बहुत लगत है। हमें जल्दी लेने है। -वे हड़बड़ाते हैं।
तो फ़ील्डगन लै लेव- हम टरकाते हैं।
लेकिन आजकल हुवौं लम्बी लाइन लगत है। दु-दुई महीना मां नम्बर आउत है। कौनौ जुगाड़ नाईं है कि तुरन्तै मिलि जाये? – वे अधीर हो जाते हैं।
जुगाड़ कुछ नहीं। उसके लिये प्रधानमंत्री से लिखवाना पड़ता है। लिखवा लाओ। ले लेव तुरन्त।- हम रास्ता बताते हैं।
अरे, फिरि आपके हुवां होइवे का कौन फ़ायदा? काहे के अफ़सर हौ फिर आप? – वे हमारी नौकरी की ऐसी कर देते हैं। मन हुआ तो तैसी भी कर देते हैं।
कुछ लोग तो ऐसी-तैसी एक साथ कर देते हैं। लेकिन अब आपको क्या बतायें। रहीमदास जी रोक लेते हैं-
रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही रखो गोय।
सुनि अठिलैंहै लोग सब, बांट न लैहे कोय॥

रिवाल्वर लेने तमाम लोग आते हैं। ज्यादातर अमीर किसान, व्यापारी और दो नम्बरी नौकरशाह।
दो नम्बरी नौकरशाह का मतलब उन लोगों से है जिनकी तनख्वाह कम है लेकिन आमदनी ज्यादा है। वे मेहनत करते हैं। नौकरी से पैसा पीटते हैं और पैसा खर्चने के लिये उपाय तलाशते हैं। ऐसे लोग न जाने कितने ऐसे काम करते हैं जो कोई सीधी-साधी तन्ख्वाह वाला करने की सोच भी न पाये। क्या-क्या गिनायें। आप खुदै समझदार हैं। :)
हम तमंचा-ग्राहकों को समझाते हैं। काहे के लिये पैसा फ़ूंकते हो। ये कोई अच्छी चीज नहीं है। घर में रहेगी तो चलेगी ही। कभी दुर्घटना भी हो सकती है।
वे समझाते हैं। पड़ी रहेगी। कभी काम आयेगी। पांच साल बाद बेच देंगे। दुगने दाम में बिकेगी।
आत्मरक्षा का हथियार पैसा कमाने का साधन हो गया।
बिजली विभाग का एक दोस्त बताता है- यार, गर्मी के मौसम में जरूरी है। लोग सब-स्टेशन घेर लेते हैं। ऐसे में हवाई फ़ायरिंग करके धमकाया जा सकता है। पिछले साल तीन घंटे अंधेरे में बंद रहे। मेज के नीचे।
ठेकेदारों से डील करने वाला एक वीर अफ़सर बताता है- यार, ठेकेदारों से निपटना बड़ा टेढ़ा काम है। पिस्तौल पास रहती है तो साले हड़कते हैं।
ठेकदार बताते हैं- आजकल ठेकदारी में काम कौन देखता है? बिना जलवे के ठेकेदारी करना मुश्किल है। इसलिये ये सब बहुत जरूरी चीजें हैं।
एजेन्सी वाले कहते हैं- लाखों रुपये रहते हैं पास में। कट्टा रहता है तो कोई जल्दी हिम्मत नहीं करता।
लोगों के पास अपने-अपने तर्क हैं साठ-बासठ हजार खर्च करने के। लोग खर्चा करते हैं। रिवाल्वर ले जाते हैं।
अफ़सर वैसे ही पिट रहे हैं, लोग ऐसे ही लुट रहे हैं , ठेकेदार वैसे ही आपसी दुश्मनी में एक दूसरे को निपटा रहे हैं।
ऐसे ही कट्टा खरीदोत्सुक अपने एक मित्र को हम सलाह देते हैं- रिवाल्वर लेने से पहले एक लाकर लो। जिसकी चाभी दो लोगों के पास हो। एक तुम्हारे पास दूसरी पत्नी के पास। रिवाल्वर दोनों की सहमति से ही निकले। एक दूसरे की सहमति से चले।
वे हमारी बात हंसी में उड़ाते हैं- तुम यार हर बात को मजाक में लेते हो।
ऐसा हमारे साथ अक्सर होता है। हमारी हर ज्ञान की बात को लोग हंसी में उड़ा देते हैं।
आपको क्या लगता है? ये हंसी में उड़ाने वाली बात है?
ऐसे ही किसी ने आत्मरक्षार्थ रिवाल्वर लिया होगा। घर में रखा होगा। जिसका उपयोग उनके बच्चे ने किया होगा। अपनी क्लास के बच्चे को उड़ाने के लिये।
स्वामीजी की बात याद आती है। चीजें अपना उपयोग कराती हैं। तमंचा अपवाद नहीं है।
चीजें खरीदने से पहले विचार कर लें। कौनौ हर्जा नहीं है। :)

21 responses to “भैया, एक तमंचा लेन हतो”

  1. Gyan Dutt Pandey
    अच्छा, आपकी फिलेटरी (फेक्टरी का तत्सम शब्द) में तमंचे बनते बिकते हैं। पहले बताये होते।
    बाकी अपना वैष्णवी विचार यह है कि जब तमंचा मुकाबिल हो तो ब्लॉग बनाओ! मन भी लगा रहे और सुकुल छाप ब्लॉगर बन जाओ तो अगला हड़क के भी रहे।
    ये तमंचे की फोटो देख के ही भय लगता है! :)
  2. Sanjeeva Tiwari
    इस पोस्‍ट का लिंक हमारे कुछ रिवाल्‍वर खरीदने के उत्‍सुक प्रेमियों के काम जरूर आयेगा । हम इसे उन्‍हें भेज देते हैं, शायद कुछ तो सोंच उठेगी उनके मन में भी । धन्‍यवाद भईया
  3. arun arora
    भैया हमे तौ दौई चा ठौ बडे बडे से बमई भीजवाई देओ वाई से धमकाय़ लिया करेगे,और जे हमाये बिलोग पे आजकल टिपियाये नही रहे हो का एक आध वही आके फ़ोरनो पडिहे का..?
  4. प्रमेन्‍द्र
    बाबू, एक कट्टा हमहु का उधार दै दो :)
  5. Shiv Kumar Mishra
    बाप रे…तमंचों में भी निवेश करते हैं लोग…पाँच साल में मूल क्या डबल हो जाता है?…
    बहुत ज़बरदस्त पोस्ट.
  6. संजय बेंगाणी
    एक तंमचे का बन्दोबस्त हमारे लिए भी कर दे तो कृपा होगी. इन दिनो पच्चीस साल बाद पता चला की हम भारत के बहुत ही भयानक प्रांत में रहते है. तो बाहर आने जाने में बहुत डर लगता है. :)
  7. sanjay tiwari
    बंदूक का व्यापार?
    और बंदूक के व्यापारी?
    दुखद यह है कि धीरे-धीरे ऐसी घटनाएं बढ़ेंगी. हिंसा कभी लॉ एण्ड आर्डर की समस्या नहीं होती. हिंसा का जन्म हमारी अर्थव्यव्यवस्था के गर्भ से होता है. थोड़ा विचार करने पर समझ में आ जाता है कि हम जैसी आर्थिक प्रणाली में रहते हैं उसी तरह का सामाजिक परिवेश बनता है.
  8. nitin
    वाकई चीजें अपना उपयोग कराती हैं।
  9. आलोक
    आयुध निर्माणी का हिन्दी जालस्थल, वह भी पूरा यूनिकोडित, देख कर बहुत खुशी हुई।
    यूँ गुड़गाँव वाला किस्सा अफ़सोस जनक है पर स्कूल में रहते हुए मुझे भी कई लड़कों को जान से मार डालने का मन हुआ है। ऐसे में कोई बड़ा भाई या माता पिता से बात कर सके तो मामला ठीक रहता है।
  10. अभय तिवारी
    ज्ञान की बात अब आप करेंगे तो ज्ञान जी क्या करेंगे? वो भय खा ही गए हैं.. हमें आप से ये उम्मीद नहीं थी कि तमंचा दिखा के आप उनकी बात छिना लेंगे.. !
  11. आलोक पुराणिक
    ओजी पहले क्यों नहीं बताया कि आप तमंचे बनाते हैं।
    अगली ब्लागर मीट में ले आइये सस्ते वाले आठ दस, फिर देखिये अपनी साइट को पचास हजार से कम हिट मिलें तो। क्या धांसू सीन बनेगा-तमंचा ब्लागर ताने पड़ा है-पढ़ और सिर्फ पढ़ ही नहीं, तारीफ भी कर। और सिर्फ तारीफ ही नहीं ऐसी कि सच्ची सी लगे।
    तमंचित ब्लागर भी देर सबेर तमंचे की राह पकड़ेगा। आपकी दुकान तो ब्लागरों से चल निकलेगी।
    1. deepak
      अरै भोसडी के मै तमँचे ना बनाता ज्यादा बकवाश करये ना
  12. parulk
    aapki boli baani sunkar humey unaao yaad aagaya…vahan “kattey ” kaa prayog bahut aam hai
  13. भुवनेश
    मैं भी सोच रहा हूं कि आपकी फैक्‍टरी से एक तमंचा ले ही लूं, कम से कम सामने वाला डरकर ही टिप्‍पणी कर जायेगा…. :)
  14. Sanjeet Tripathi
    क्या भाव ;)
  15. जीतू
    का हो बबुआ! लड़कन बच्चन को तमंचा दिलाय रहे हो। अच्छी अच्छी बाते बताओ, ये का कभी तमंचा, कभी मैडोना, तुम तो बच्चों को गलत राह पर ले जा रहे हो शुकुल,
    ये
    अच्छी
    बात
    नही
    है…….
  16. अजित वडनेरकर
    सही सही । गन फैक्टरी वाली साइट पर ज्यादा सामग्री नहीं है।
    स्वामी उवाच – चीजें अपना उपयोग कराती हैं। तमंचा अपवाद नहीं है, पसंद आया ।
  17. आभा
    ई तँमचो संमचो की बात तो हमई बहुत ङरात है………
  18. Dineshrai Dwivedi
    भाया, म्हाईं तो म्हांका गांव को ठाकर एक बन्दूक फोकट में दे रियो छो। पण म्हां ईं नट ग्या। म्हां ब्हामणां ईं तो कलम ई सुहाणी लागै छै। छोकी करी नं, फोकट की बन्दूक छोरा छोरी ईं बगाडती। ईं आफत सूं तो बच्या।
  19. सृजन शिल्पी
    सही है, चीजें होती हैं तो अपना उपयोग करा ही लेती हैं।
    अमेरिका के विपुल आयुध भंडार ही उससे दुनिया के तमाम देशों में नए-नए युद्ध छेड़ते रहने के लिए उकसाते हैं। यही हाल आतंकवादियों का भी है।
  20. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] भैया, एक तमंचा लेन हतो [...]