Friday, January 25, 2013

धूप तड़ी पार हुई

http://web.archive.org/web/20140419161133/http://hindini.com/fursatiya/archives/3916

धूप तड़ी पार हुई

  1. बर्फ़ का छापा पड़ा
    चप्पे-चप्पे पे सर्द-पुलिस
    कोहरे का कर्फ़्यू लगा
    पहाड़ सब सहम गये। ये धूप तड़ी पार हुई
    पहुंच गई पहाड़ पार
    पसर गयी गली,मैदान
    छत,खेत, खलिहान में।
    घास पर रही खेलती,
    सब फ़ूल को हिला दिया,
    पेड़ खड़ा देखा गुमसुम,
    प्यार से नहला दिया।
    धूप के वियोग में ,
    पहाड़ तो ठिठुर गया,
    फोन किया धूप को,
    लौट आओ तुम प्रिया।
    धूप लौटी पहाड़ पर,
    बर्फ़ सब पिघल गयी,
    कोहरा भगा दबे पांव,
    पहाड़ फ़िर मुस्करा दिया।
  2. आसमान से उतरी धूप
    खिड़की से सीधे आकर
    कमरे के एक हिस्से में
    ठसके से पसर सी जाती है। धूप कमरे के इस हिस्से में,
    सीधी सब्सिडी सी आती है,
    ठहरती है एहसान सी दिखाती,
    आहिस्ते से खिसक जाती है।
    बाकी हिस्से सोचते रहते हैं
    आधार कार्ड बनवा लिये होते,
    तो अपन की किस्मत भी
    इस हिस्से सी चमक जाती।
    उन बेचारों को क्या पता
    धूप आधार कार्ड से नहीं
    खुले आसमान, खुली खिड़की
    खुलेमन-खुलेपन से आती है। 
  3. धूप थोड़ी देर से आयी आज
    दिन लगा एक बार फ़िर झुंझलाने
    हमेशा देर से आती है धूप जाड़े में
    थमाना होगा इसको भी नोटिस। दिया कहीं नोटिस तो बैठ जायेगी
    लंबी छुट्टी पर धूप चली जायेगी
    ठिठुर जायेंगी सुबह, दोपहर,शाम
    हफ़्तों आने में नखरे दिखायेगी।
    धूप आहिस्ते-आहिस्ते से आती है
    पेड़,पत्ती,फ़ूल को दुलराते,सहलाते
    दिन धूप को देख मुस्काता है
    ताजे गुलाब सा खिल जाता है।
  4. दिन घुसा दफ़्तर में
    अकड़कर घंटी बजाई
    उजाला आया ठिठुरते
    साहब, केहिका बुला लाई? धूप मैडम किधर हैं,
    उनको फ़ौरन बुला लाओ,
    सारी दुनिया ठिठुर रही
    कहो जरा गर्मी बिखराओ।
    उजाला बोला मुला साहेब
    धूप मैडम तो छुट्टी पर हैं
    अप्लीकेशन भेजवाइन हैं
    और जेहिका कहौ बुला लाई।
    दिन ने फ़ौरन फ़ोन मिलाया
    देर तक लाइन मिली नहीं,
    बातों से धूप की बेरुखी देख
    बेचारा एकदम्मै सहम गया।
    लेकिन फ़िर धूप पसीज गयी,
    इठलाती हुई सी चली आई.
    उसे देख दिन भी मुस्करा दिया,
    मन में धूप से बहुत कुछ कह दिया। :)

20 responses to “धूप तड़ी पार हुई”

  1. Kajal Kumar
    भले ही बस यूं ही सही, पर उम्दा है :)
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून:- सालाना चढ़ाई का मौसम आया
  2. प्रकाश गोविन्द
    दिया कहीं नोटिस तो बैठ जायेगी
    लंबी छुट्टी पर धूप चली जायेगी ……… bahut khoob :)
  3. प्रकाश गोविन्द
    आपके भीतर एक हाई क्लास कवि भी कुनमुना रहा है …. जरा संभलियेगा ! :)
  4. आलोक पुराणिक
    कतई मौसम विभाग में बैठ के लिख्खी दिक्खै यो कविता।
  5. Ramesh Sharma
    श्री मान जी आपने तो धुप को नोटिस की धमकी दे दी लेकिन क्या पता …… इसे भी कहीं किसी नेता……. या मैडम के पास हाजिरी तो नहीं लगानी पड़ती….. अब हमारे आप जैसों के पास आने में देर तो होगी ही….फिर हम उसका बिगाड़ भी क्या सकते हैं…पैर छूना और चौखट पे हाजिरी ज्यादा जरूरी है साहब ………<<<<<<<<<<<
  6. Ramesh Sharma
    Aap to kavi ho gai sir.
  7. प्रवीण महाजन
    Badhiya hai.. Lekin notice kisko doge, Jada, dhup ya Suraj ko…sambhalake kahi enquiry me ye sach na samane aa jaye ki sab thik samay pe kam kar rahe hai aur… Aap hi the…”late Latif” ? :)
  8. सलिल वर्मा
    बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं करेंगे!! नोटिस थमा दीजिए, बहुत कोमल है धूप , बुरा नहीं मानेगी और चली आयेगी, अपनी ममतामयी उष्मा प्रदान करने!!
    नोटिस के बाद तडीपार भी कर दिया!! काहे लोगों की जान लेने पर उतारू हैं सुकुल जी!!
  9. Govind Goyal
    shandar chitran hai mousam ka
  10. Suresh Sahani
    क्या सर?यहाँ भी अफसरशाही !फ़िलहाल धूप पर आपकी वार्निंग का असर हुआ है ।
  11. Anvita Bhuvan
    kush toh bahut hoge aap !lag bhi raha hai
  12. Mohammed Shuaib
    bahut badhiya
  13. Madhu Sharma
    bahut khoob.
  14. indian citizen
    किसी सरकारी विभाग के कर्मचारियों जैसा क्यों लग रहा है..
  15. arvind mishra
    धूप को कवि ने स्त्री लिंग बना दिया है! मजेदार है !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..एक मित्र की फरमाईश पर यह आधुनिक प्रेम कथा……..
  16. shikha varshney
    दिया कहीं नोटिस तो बैठ जायेगी
    लंबी छुट्टी पर धूप चली जायेगी
    लम्बी छुट्टी पर धूप को यहाँ ही भेज दीजिए
    धूप की खातिरदारी का मौका तो दीजिए.:):)
    shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..रिश्ते ..
  17. प्रवीण पाण्डेय
    चलो धूप हुयी नन्दलाला, तेरी राह तके दिनवाला।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..ठंड में स्नान
  18. Anonymous
    धूप को आपने एक नया ही रूप दिया है । ऑफिस और धूप ..सुन्दर
  19. girijakulshreshth
    धूप को आपने एक नया ही रूप दिया है । ऑफिस और धूप ..सुन्दर
  20. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] धूप तड़ी पार हुई [...]

Thursday, January 24, 2013

इसको आप किस तरह से देखते हैं

http://web.archive.org/web/20140420082609/http://hindini.com/fursatiya/archives/3901

इसको आप किस तरह से देखते हैं

इसको आप किस तरह से देखते हैं?
देश में कोई घटना/दुर्घटना घटी, किसी ने कोई विवादास्पद बयान दिया, किसी ने कोई नागवार हरकत की -टीवी चैनलों के प्राइम टाइम एंकर चार-पांच लोगों को जमा करके घंटा भर बहस करते रहते हैं- इसको आप किस तरह से देखते हैं। 

अक्सर लोगों के विवादास्पद बयान बहस के विषय होते हैं। किसी ने कोई बेवकूफ़ी की बात कही- चैनल वाले उसको दोहराते हुये बहस करवाते हैं- बताओ भला ऐसे कहना चाहिये। किसी के , कुछ लोगों के सामने दिये, बेहूदे बयान को पचीस बार दुनिया भर को सुनाते हैं। बेहूदगी का मासूमियत के साथ प्रचार करते हैं। किसी ने कोई चिरकुटई की उसको पचास बार दिखाते हुये कहते हैं – बताओ भला ऐसे करना चाहिये। किसी नये नेता ने कुछ बयान दिया वहां घंट भर सवाल उछलेगा- आप इस बयान का क्या मतलब निकलते हैं। लगता है जैसे अगले ने शुक्र ग्रह में बोले जाने वाली भाषा में बयान जारी किया है। अरे भाई किसी के साथ कुछ नया हुआ है तो वो कुछ तो कहबै करेगा। आप उसको भी घसीट लिये प्राइम टाइम में।

टीवी वाले आमतौर पर नकारात्मक बयानों पर ज्यादा बहस करते हैं। खाप पंचायतों, फ़तवों, बापुओं-बाबाओं, मुल्ला-मौलवियों, साधू-साध्वियों, तानाशाहों, भांड़ों-भड़ैतों, चिरकुटों-चमचों के बयान ताकते रहते हैं। टीवी के राडार की फ़्रीक्वैंसी इनके बयानों से पर सेट है। जहां कोई बयान उनके मुंह से निकला ये फ़ौरन उसे शिकार की तरह टांग के अपने चैनल पर ले आते हैं। बहस की आग में भूनते-पकाते-चखते-चबाते हैं। बीच में कामर्शियल ब्रेक के शिप लेते रहते हैं। इसके बाद अगले दिन के बयान की खोज में निकल जाते हैं।

किसी के बेवकूफ़ी के बयान पर स्यापा करते एंकर बताता है कि बताइये भला एक्कीसवीं सदी में पन्द्रहवीं सदी की बातें करते हैं। जबकि देखा जाये तो दुनिया हमेशा एक साथ कई शताब्दियों में जीती है। कोई हिस्सा इक्कीसवीं सदी में जीता है कोई सत्रहवीं में तो कोई बारहवीं में तम्बू ताने रहता है। सबसे आधुनिक माने जाने वाले देश दुनिया के पिछड़े देशों को उन्नीसवीं सदी के पिंडारियों की तरह लूटते हैं। अमेरिका में कुछ लोग तो रहन-सहन तक में पुरानी सदियों में जीते हैं (देखिये ई-स्वामी की पोस्ट- (अमरीका के विलक्षण आमिश “कछुए”!)।
आंकड़ा नहीं मेरे पास लेकिन मुझे लगता दुनिया भर की प्राइम टाइम खबरों पर दुनिया के नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा होती है। घपले, घोटाले, बलात्कार, हत्या, हमला, हार, हाय-हाय पर बहस। दुनिया हर दिन बुरी होते जाने के बावजूद ये सब अभी भी अल्पमत में हैं। दुनिया में हर दिन बहुत अच्छा भी होता रहता है। जिस दिन दुनिया में सैकड़ों बुरी बातें होती हैं उसीदिन करोड़ों-अरबों ऐसी घटनायें भी होती हैं जो अच्छी होतीं। बहुत अच्छी होती हैं। टीवी उनकी चर्चा प्राइम टाइम में नहीं कर पाता क्योंकि वे रोजमर्रा की बात है। टीवा छांटकर दुनिया की बुराई प्राइम टाइम पर दिखाता है। कभी-कभी लगता है कि टीवी का एंकर कबाड़ी की तरह होता है। कहीं भी कूड़ा-कबाड़ दिखता है खुश हो जाता है। उसको उठाकर अपने चैनल पर ले आता है। दुनिया भर को दिखाता है- देखो दुनिया में कित्ता कबाड़ इकट्ठा है।

टीवी पर अच्छी बातें भी दिखाई जाती हैं लेकिन उनका समय प्राइम टाइम नहीं होता। वह दोपहर के बाद चार बजे होगा या रात के दो बजे। अच्छी खबरों के बारे में टीवी पर बहसें सहमते हुये सी आती हैं। अच्छी खबर टीवी पर आने से डरती है कि कहीं कोई बुरा न मान जाये। वे सहमती हुयी सी , चुपके से आती है। अपने को दिखाकर चली जाती है।

टेलीविजन वालों को भी लगता है मीनाकुमारी सिन्ड्रोम होता है। बुरी खबरें दिखाकर खुश होते हैं।

प्राइम टाइम बहस का समय मतलब दुनिया का सबसे डरा हुआ और खराब समय होता है। दुनिया में प्रलय पता नहीं कब होगी लेकिन जब होगी उसको दिखाते हुये ब्रह्मांड का कोई एंकर इसके नियंताओं के मुंह के आगे माइक सटाकर चीखते हुये जरूर पूंछता दिखेगा- प्रलय की इस घटना को आप किस तरह से देखते हैं। :)

21 responses to “इसको आप किस तरह से देखते हैं”

  1. ajit gupta
    मैं तो इन्‍हें मंन्दिर के चबूतरे की तरह लेती हूँ या गांव की चौपाल की तरह। बस सारा दिन की गॉशिप को समेटकर मजे लेते रहते हैं। यदि किसी के मुखारबिन्‍द से कुछ निकल भी गया है तो उसका प्रोपेगेण्‍डा करने का अर्थ क्‍या है? लेकिन ये उसे सनसनी बनाकर ही छोड़ते हैं।
    ajit gupta की हालिया प्रविष्टी..जीवन के दो मूल शब्‍द – अपमान और सम्‍मान (insult & respect)
  2. Prakash Govind
    “अच्छी खबरों के बारे में टीवी पर बहसें सहमते हुये सी आती हैं।”
    सबसे अजीब हालत तो तब होती है जब प्राईम टाईम की बहस में आये हुए मेहमान एक साथ अपने-अपने सुर में अलाप ले रहे होते हैं …. और हम जमूरे की भांति झल्ला रहे होते हैं कि अमा एक एक करके बोलो न … काहे दीमाग का दही करने पे अमादा हो :-)
    Prakash Govind की हालिया प्रविष्टी..जो कि महज मखमल में टाट का पैबंद था
  3. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
    सच है, लगता है जैसे नकरात्मक खबरों की तलाश में ही रहते हैं यह टीवी एंकर और आमंञित महानुभावों की सहायता से इतनी बहस कराते हैं कि छोटा पर्दा किसी प्रायमरी पाठशाला की क्लास का सा दृश्य उपस्थित करता है। ऐसी खबरों का पोस्टमार्टम करने में सिद्धहस्त हो गये हैं कुछ चैनल।
  4. राहुल सिंह
    तीखा नजरिया.
    राहुल सिंह की हालिया प्रविष्टी..काल-प्रवाह
  5. भारतीय नागरिक
    मीडिया-इलेक्ट्रानिक ने अजब माहौल बना रखा है और इनकी टीआरपी मुझे आजतक समझ नहीं आई.
    भारतीय नागरिक की हालिया प्रविष्टी..सरोकार की पत्रकारिता और वेब-साइट पर तस्वीरें
  6. shikha varshney
    टेलीविजन वालों को भी लगता है मीनाकुमारी सिन्ड्रोम होता है। जबर्दस्त्त ..
    इसलिए तो हम कहते हैं कि ब्लॉग और फेसबुक सबसे अच्छा है. वहां मीना कुमारी कम और ऋषिकेश मुखर्जी सिंड्रोम अधिक देखने को मिलता है.:)
    shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..रिश्ते ..
    1. sanjay jha
      हा हा हा …………… “ऋषिकेश मुखर्जी सिंड्रोम”…………शानदार च जानदार पञ्च…………….
      प्रणाम.
  7. सतीश सक्सेना
    चटपटी खबर के तलाश में भटकते इन लोगों ने हमारे देश का दुनियां में मज़ाक ही बना दिया है , शायद ही कोई चैनल हो जो गंभीर बात अथवा देश के सम्मान पर कुछ कहता हो !
    आप आगे आइये महाराज …
    आनंद आएगा !
    :)
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..भाषा इन गूंगो की -सतीश सक्सेना
  8. shefali
    सच्ची बात ….यहाँ हर बुरी खबर अच्छी खबर होती है |
  9. Anonymous
    टीवी पर अच्छी बातें भी दिखाई जाती हैं लेकिन उनका समय प्राइम टाइम नहीं होता। अच्छी खबरों के बारे में टीवी पर बहसें सहमते हुये सी आती हैं। अच्छी खबर टीवी पर आने से डरती है कि कहीं कोई बुरा न मान जाये। वे सहमती हुयी सी , चुपके से आती है।
    बहुत सही.
    शानदार पोस्ट है. ऐसा कहना चाहिये, इसलिये नहीं कहा जा रहा बल्कि पोस्ट सचमुच जानदार है. एक बात और अखबार में काम करते हुए, जब शाम की पाली के सम्पादक गण दफ़्तर में प्रवेश करते थे, तो उनका पहला सवाल होता था- ” कुछ खास खबर?” और मेरा मुंह बिचका के कहना- ” न कुछ खास नहीं. अच्छे समाचार ही नहीं हैं आज तो” यहां अच्छे समाचार किसी बड़े राजनैतिक हंगामे, या बड़ी दुर्घटना के लिये कहा जाता :( ये अलग बात है कि खुद पर अफ़सोस होता कि कैसी घटिया सोच होती जा रही…. :)
  10. काजल कुमार
    टी.वी. चैनलों को ये चलन भारत में ही नहीं, सभी जगह यही हाल है.
    मुझे तो लगता है कि‍ इस धंधे को ही श्राप है.
    काजल कुमार की हालिया प्रविष्टी..कार्टून:- सालाना चढ़ाई का मौसम आया
  11. arvind mishra
    बचकानापन ,हास्यास्पद !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..आधुनिक प्रेमकथा का उत्तरार्द्ध
  12. देवेन्द्र पाण्डेय
    सार्थक व्यंग्य।
  13. देवांशु निगम
    वैसे ही जैसे रॉकस्टार में पीयूष मिश्रा कहते हैं “नेगेटिव, यहाँ नेगेटिव बिकता है” |
    प्राइम टाइम ही क्यूँ, यहाँ तो मुश्किल से कोई मूवी रिलीज़ होती है जिसमे कोई बवाल ना जोड़ दिया जाए | हीरो का हिरोइन से अफेयर होगा , सेंसर सीन्स पर कैंची चलाएगा, गानों के शब्द बकवास होंगे और उनपर भी चर्चा होगी | फिल्म में कुछ हो न हो अगर ये सब तड़के हैं तो फिल्म तो चल ही जाएगी |
    अब यही देख लीजिये , समाज में हो रहे अपराधों के बारे में जो धारावाहिक बन रहें हैं वो जागरूक कम बना रहे हैं, डरा ज्यादा रहे हैं | सास-बहू की जितनी टोटल लड़ाई नहीं हुई होगी, उससे ज्यादा तो एक-एक सीरियल दिखाने पर तुला हुआ है |
    बाकी सब तो ठीक है :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..मारे डर के हालत खराब, और लोग बोलते डर नहीं लगता !!!!
  14. girijakulshreshth
    समाचारों में जानकारी कम कचरा अधिक होता है ।
  15. प्रवीण पाण्डेय
    यदि देश को सच में आवश्यकता है तो वह है अच्छे समाचार चैनल की, आजकल तो लगभग सब ही पका रहे हैं।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..बख्शा तो हमने खुद को भी नहीं है
  16. aradhana
    इ बात बहुत सही पकड़े हैं आप. अच्छी ख़बरें भी आती हैं लेकिन प्राइम टाइम पर नहीं…
    और दुनिया एक साथ कई शताब्दियों में जीती है, पर आपका ये कहना- “सबसे आधुनिक माने जाने वाले देश दुनिया के पिछड़े देशों को उन्नीसवीं सदी के पिंडारियों की तरह लूटते हैं। अमेरिका में कुछ लोग तो रहन-सहन तक में पुरानी सदियों में जीते हैं” …लाजवाब है :)
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..New Themes: My Life and Silesia
  17. समीर लाल
    देखो दुनिया में कित्ता कबाड़ इकट्ठा है।
    समीर लाल की हालिया प्रविष्टी..आहिस्ता आहिस्ता!!
  18. समीर लाल
    :)
    समीर लाल की हालिया प्रविष्टी..चचा का यूँ गुजर जाना….हाय!!
  19. jitu
    भाई, हम तो इसको ऐसे ही नज़रंदाज़ करते है, ये सोचकर :
    भैंस जब भी पूँछ उठाएगी, गोबर ही देगी.
    इसलिए मस्त रहो व्यस्त रहो, नेताओं की बातों पर मत जाओ और न ही न्यूज़ चैनलों की चर्चा को सुनो, टेंशन दूर करनी है तो कोई कॉमेडी चैनल (जैसे राज्य सभा/लोक सभा टीवी) देखो.
  20. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] इसको आप किस तरह से देखते हैं [...]