Sunday, November 13, 2016

न से नमक

दो दिन पहले कई जगह नमक ’ब्लैक’ में बिका। नमक को लगा होगा कि जब धन काला हो सकता है तो नमक क्यों नहीं। लोकतंत्र में काला होने का सबको बराबर हक है। फ़िर क्या , नमक भी ब्लैक होने के लिये मचल गया। नोट के लिये लाइनों में लगे लोग नमक की लाइनों में लग गये। लोकतंत्र बचाये रखने के लिये लाइन जरूरी है। लाइन चाहे वोट देने के लिये हो या फ़िर नोट बदलने के लिये। नौकरी के लिये हो या फ़िर नमक के लिये। हो किसी की लाइन लेकिन लाइन लगनी चाहिये। लाइन है तो लोकतंत्र है। लाइन टूटी, लोकतंत्र दरका। लाइन लोकतंत्र की ’लाइफ़ लाइन’ हैं।

नमक तो देश में इफ़रात है। फ़िर भी इसकी कमी की अफ़वाह फ़ैल गयी। 20 रुपये का नमक 400 रुपये तक बिक गया। ’नमक ब्लैक’ के पैकेज के साथ धक्कम मुक्का, गाली-गलौज, पारपीट मुफ़्त में। परेशानी का ’मेक बाई जनता’ था नमक का ब्लैक होना।

नमक मामले में बातचीत करने के लिये एक ठेलुहा मित्र मिल गये। वे न नोट बदलने के लिये लाइन में लगे थे नमक लेने की कतार में। आइये देखिये उनसे हुये सवाल-जबाब:

सवाल: ये नमक के लिये भगदड़ का क्या कारण है यार जबकि नमक तो इफ़रात है देश में ?
जबाब: नमक के लिये लाइन लगाकर जनता ने एक बार फ़िर से अपनी ताकत दिखा दी कि परेशान होने के लिये वह किसी बाहरी सहातया की मोहताज नहीं है। परेशानी के मामले में जनता खुदमुख्तार है। स्थानीय स्तर पर परेशान होकत जनता ने ’लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण’ टाइप करके दिखा दिया। गांधी जी के सपनों को पूरा किया जनता ने।
सवाल: लेकिन जिस चीज की कमी नहीं है उसके लिये गाली-गलौज, मारपीट, लूटपाट करने का क्या मतलब है?
जबाब: यह तो जनता द्वारा संविधान के जनता संस्करण में आस्था व्यक्त करने का तरीका है। नमक के लिये गाली-गलौज, मारपीट, लूटपाट करने वाले लोगों ने अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का प्रयोग किया। अपनी रोजी-रोटी के लिये कहीं भी जा सकने के अधिकार का प्रयोग करके लोग नमक के दुकानों में घुस गये। ब्लैक में बेंचकर मांग और आपूर्ति के मूल सिद्धांत की पुष्टि की दुकानदारों ने।
सवाल: लेकिन जिनके घरों में नमक इफ़रात था वे भी क्यों नमक की लाइन में लग गये यार?
जबाब: अब यार आदत भी कोई चीज होती है न! जनता को आदत हो गयी है लाइन में लगने की। इसलिये नोट की लाइन से निकला आदमी नमक की लाइन में लग गया। लाइन में लगने का अभ्यास बना भी रहना चाहिये। कल को अगर पानी के लिये लाइन में लगना पड़ा, हवा के लिये कतार बनानी पड़ी तो अभ्यास काम आयेगा न! अभ्यास बहुत जरूरी है लोकतंत्र में जीने के लिये। लूटने वाले को लूटने का अभ्यास, लुटने वाले को लुटने का अभ्यास, पीटने वाले को पीटने की प्रैक्टिस तो पिटने वाले को पिटने की आदत बनी रहनी चाहिये। व्यवस्था बनी रहने से सुकून बना रहता है!
सवाल: लेकिन इससे अरहर की दाल, टमाटर, प्याज जैसे वीआईपी आइटम बड़ा बुरा महसूस कर रहे होंगे? उनमें दहशत हो रही होगी कि कहीं वे ’मंहगाई के मार्गदर्शक मंडल’ में तो नहीं ठेल दिये गये।
जबाब: इसमें सनीमा की साजिश है। तुमको याद होगा कि शोले पिक्चर में जब गब्बरसिंह सांभा के डायलाग –’सरदार आपका नमक खाया है’ के जबाब में कहता है न - ’तो अब गोली खा।’ तो जनता जब एटीएम से खाली हाथ लौटी तो उनको लगा होगा कि बैंक एटीएम ने पैसे न देकर उनको ’गोली’ दी है। तो उन्होंने सोचा होगा कि अब जब ’गोली’ मिल ही गयी तो नमक भी ले लिया जाये। वर्ना क्या पता गब्बरसिंह नाराज होकर फ़िर रात के बारह बजे हल्ला मचाये - ’रामगढ़ वालों तुमने ’गोली’ खा ली लेकिन नमक क्यों नहीं खाया?’ इसी चक्कर में वे नमक की लाइन में लग गये होंगे। उसी से भभ्भड़ मच गया। हिट पिक्चरों के साइड इफ़ेक्ट हैं ये सब। शोले में अगर सांभा गब्बर की दाल पिये होता तो दाल की दुकाने लुटतीं।
सवाल: लेकिन जिस तरह नमक जैसी इफ़रात में उपलब्ध चीज के बारे में बवाल देखकर डर नहीं लगता तुमको?
जबाब: यही तो हमारी ताकत है यार! हमारी खासियत है यह कि हमारे सामने कोई भी समस्या आ जाये हम अगले दिन उससे बड़ी दूसरी समस्या पैदा करके उस पहली समस्या का टेटुआ दबा देते हैं। बुखार और दिल के दौरे में आदमी पहले दिल के दौरे को का इलाज करवाता है न! इसी तरह बेरोजगारी, मंहगाई, कालाबाजारी, धार्मिक कट्टरता से निपटने के तरीके हैं ये अपन के। ये तो शाश्वत साथी हैं अपन के। ये तो घर के लोग हैं। ये हैं तो हम हैं। ये निपटे तो हम भी निपट गये। छोटी लकीर को मिटाने की जगह जैसे बड़ी लकीर खींचनी पड़ती है न! वैसे ही इन समस्याओं छोटा बताने के लिये इनसे बड़े दुश्मन पैदा करने पड़ते हैं और उनको निपटाते रहना पड़ता है। वो शेर है न :
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फ़िर जलते हुये शहरों में पानी बेंचना।
नयी समस्या पैदा करते रहना और उनके हल खोजना ही आज के समय का सच है। जो नयी समस्यायें पैदा नहीं कर सकता वह आज के समय में प्रगति नहीं कर सकता। हमें हर समस्या का अपने लिये धनात्मक उपयोग करना आना चाहिये।
सवाल: इस समस्या का क्या धनात्मक उपयोग किया जा सकता है?
जबाब: इस समस्या के बहाने बच्चों को वर्णमाला सिखाई जा सकती है। व्यवहारिक ज्ञान दिया जा सकता है। बच्चों को नमक के लिये लंबी लाइन दिखाकर बताया जा सकता है – ’बेटे ये लाइन लगी है वह नमक के लिये लगी है।’ नोटवादी युग में भी बच्चों को बताया जा सकता है कि ’न से नोट’ ही नहीं होता सिर्फ़। ’न से नमक’ भी होता है।
बातचीत और होती तब तक उनके घर से आवाज आई-’अरे एटीएम लेकर लाइन में लगो जाकर। क्या पता आज नोट निकल ही आयें।’
हम भी अपने दोस्त के साथ-साथ लाइन में लगे हुये मुफ़्त की विटामिन डी ग्रहण करते हुये एटीएम खुलने का इंतजार कर रहे हैं। लाइन बढ़ती जा रही है।


Tuesday, November 08, 2016

हम लायें इन किरणों को धुंध से निकालकर



आज सुबह निकले तो देखा सूरज भाई आसमान पर विराजमान थे। चेहरा अलबत्ता कुछ झटक गया सा लग रहा था। थोड़ा कुम्हलाया हुआ। देखते ही जिस तरह के भाव चेहरे पर आये उनके उससे लगा कि बस अब गाना गाने ही वाले हैं:
हम लायें इन किरणों को धुंध से निकालकर
इनको रखना तुम धूल-धुयें से संभालकर।
सड़क पर एक रिक्शे में बैठे बच्चे स्कूल जा रहे थे। उनके बैग लटके हुये रिक्शे के किनारे। रिक्शा वाला उचक-उचककर रिक्शा चला रहा था। धूप बेचारी उसकी मेहनत देखकर खिलने में सकुचा रही थी।
आर्मापुर गेट तक आते-आते ख्याल आया कि बताओ पांच आदमियों के बैठने की जगह वाली गाड़ी में हम अकेले जाते हैं। चार आदमियों का प्रदूषण बेफ़ालतू फ़ैलाते हैं। कुछ ऐसा जुगाड़ करें कि चार सवारी आर्मापुर गेट से झकरकटी तक या टाटमिल चौराहे तक बैठा लिया करें। प्रति व्यक्ति कुछ प्रदूषण ही कम करें। विकसित देशों की तरह हम भी अपना आने-जाने का समय डाल दिया करें नेट्पर । जिसको चलना हो साथ में वो चला चले।
लेकिन फ़िर तमाम बवाल याद आये तो इरादा दिमाग में ही दफ़ना दिया। जलाया नहीं। जलाने में धुंआ उड़ता है न ! कूड़ा जलाना मना है न स्मॉग के चलते। दफ़नाने से धुंआ नहीं होता।
विजयनगर चौराहे पर तमाम कौवे पता नहीं क्यों चक्कर काट रहे थे। आसमान में। महाकवि भूषण की मूर्ति के ऊपर सीने तक अनेक इश्तहार चिपके हुये थे। क्या पता महाकवि मन में कहते हों:
इस प्रदूषण को गरियाऊं कि
गरियाऊं चौराहे के जाम को।
फ़जलगंज जाते हुये एक आदमी बाल्टी में पाने भरे जा रहा था। दिन शुभ होगा ऐसा लगा। लेकिन सुबह बेजान दारूवाला ने लिखा था हमारी राशिवालों के लिये कि नये कपड़े पहनकर जायेंगे। वो तो नहीं हुआ। फ़िर यह पानी-सगुन भी क्या पता गच्चा हो।
पंकज बाजपेयी आज कुछ शान्त दिखे। कुछ कपड़े और पहन लिये हैं उन्होंने। उनसे कुछ और बात हो तब तक पीछे से आती बस ने हार्न दिया और हम आगे बढ़ गये।
झकरकटी पुल पर एक गाड़ी को ओवरटेक किये तो सामने से आते मोटरसाइकिल सवार को थोड़ा देरी सी हुई। उसने हेलमेट के अंदर से ’अंखियों से गोली मारे’ वाले अंदाज में मुझे देखा। हाथ से इशारा करते हुये पूछा- ’बड़ी जल्दी है क्या भाई?’ हमें लगा कि पुल पर ओवरटेक करना ठीक नहीं। लेकिन यह अकल तब आई तब ओवरटेक कर चुके थे। जित्ती तेजी से आई उत्ती तेजी से ही फ़ूट भी ली।
टाटमिल चौराहे के आगे एक मोटरसाइकिल सवार तेजी से पीठ पर बस्ता लादे चला जा रहा था। उसका हेलमेट उसके दायें हाथ में लटका हुआ था। लगता है उसको भरोसा था कि अगर कहीं दुर्घटना हुई तो हेलमेट फ़टाक से पहन लेंगे। हेलमेट हाथ में धारण करके चलने वाले सर पर कफ़न बांधकर चलते हैं।
मोड़ पर मट्ठे वाला खड़ा था। मट्ठा 12 रुपये ग्लास। हमें लगा मंहगाई बहुत बढ गयी है सच्ची में। 2011 में हम आठ 11 रुपये में पूरा खाना खाते थे। विजयनगर के एक ढाबे में। लेकिन फ़िर याद आया कि आज भी तो 10 रुपये में कैंटीन में पूरा खाना खाते हैं। इसलिये मंहगाई की बात हमने छोड़ दी और सीधा फ़ैक्ट्री में जमा हो गये जहां का हम नमक खाते हैं।
नीचे फ़ोटो जीटी रोड की नर्सरी की
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Monday, November 07, 2016

छठ पूजा का आयोजन

आज सबेरे जरा टहलने निकले। बाहर देखा सूरज भाई अभी तक हाजिर नहीं हुये थे। मन किया अब्सेंट लगा दें लेकिन फ़िर नहीं लगाई। उजाला उनके पायलट के रूप में कायनात में पसरा था। मतलब आयेंगे, भले ही थोड़ी देर से।
एक कुत्ता अपनी पूंछ को झंडे की तरह फ़हराता हुआ सड़क पर खड़ा था। हमारी तरफ़ ही देख रहा था मानो हमको सलामी दे रहा हो। हमको अपनी तरफ़ देखकर पूछ ’टाटा, बॉय-बॉय मुद्रा’ में हिलाई और निकल लिया।
आगे तीन मोर सड़क पार करते हुये दिखे। एक के पीछे एक ठुमकते हुये मोर ”तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर" वाले पोज में चले जा रहे थे। सड़क की इस तरफ़ के कूड़े के ढेर को छोड़कर उस तरह के कूड़े की तरफ़ लपकते हुये मोर अपनी फ़ोटो अगर फ़ेसबुक पर लगाते तो ’हाऊ क्यूट, हाऊ स्वीट’ घराने की तमाम टिप्पणियां मिलतीं।
नहर के किनारे छठ पूजा का आयोजन हो रहा था। लोगों की भीड़ पूजा के लिये उमड़ी हुई थी। सामने से लोग डलिया में फ़ल, पूजा सामग्री लिये चले आ रहे थे। कुछ सर पर धरे थे। पूजा करके लौटती महिलाओं के माथे से नाक तक सिंदूर चमक रहा था।
पूजा स्थल के पहले ही दोनों तरफ़ गाडियों की कतार लगी थी। पूजा का द्वार सजा हुआ था। लाउड स्पीकर व्यवस्था बनाये रखने का अनुरोध हो रहा था। अन्य उद्घोषणायें भी हो रहीं थीं। गेट के पास ही मांगने वाले भी हथेली फ़ैलाये बैठे थे।
नहर के किनारे लोगों की भीड़ जमा थी। पूजा कर थी। प्रसाद पा रही थी। हंस रही थी। खिलखिला रही थी। दोने में प्रसाद ग्रहणकरके दोना वहीं सड़क पर फ़ेंककर आगे बढ़ रही थी। जगह-जगह पूजा पण्डाल में प्रसाद बंट रहा था। लोग ज्यादा हो गये थे इसलिये पंचामृत प्लास्टिक की ग्लास में तली में चिपका हुआ बंट रहा था। लोग ग्लास टेढ़ा करके पंचामृत ग्रहण कर रहे थे। इसके बाद ग्लास को सड़क को समर्पित करके चले जा रहे थे।
लोगों को मेले में गन्दगी फ़ैलाते देखकर भारतेन्दु का वाक्य याद आया-”त्योहार हमारी मुनिसपैलिटी हैं।" भारतेन्दु जी के समय मुनिसपैलिटी अपना सफ़ाई का मुस्तैदी से करती होंगी शायद इसलिये उन्होंने ऐसा कहा। आज होते तो शायद ऐसा कहने में हिचकते।
एक जोड़ा नहर के पानी में खड़ा पूजा कर रहा था। आदमी फ़ुल पैंट पहने , औरत साड़ी में। पूजा के बाद फ़ोटो। उसके बाद आदमी उचककर पानी के बाहर आ गया। महिला को आने में दिक्कत हो रही थी। किनारे गीली मिट्टी के चलते फ़िसल-फ़िसल जा रही थी महिला। फ़िर ऊपर एक आदमी ने उसका हाथ पकड़ा । दूसरे हाथ को किनारे जमाकर वह बाहर आई। बाहर आकर मुस्कराई। फ़िर फ़ेमिली के लोगों के साथ फ़ोटो खिंचाई।
एक महिला थकी-थकी सी पूजा कर रही थी।थकी महिला को उसके साथ की बच्ची कागज के पैकेट वाला घोल पिला रही थी, प्लास्टिक के पाइप के सहारे। बगल में एक बुजुर्ग महिला कपड़े बदल रही थी। वहीं सड़क पर जाती एक महिला ने अपनी ही उमर की एक महिला के बीच सड़क पर पांव छुये। कई बार छुये। बीच सड़क पर पांव छुआई से ’जन-जाम’ हो गया थोड़ी देर को। जब पांव-छुआई खतम हुई तब ’जन-जाम’ खुला। एक और बुजुर्ग महिला ने अपने पांव छूने वाली महिला की पीठ पर देर तक आशीष मालिश की।
पांव छुआने वालों में एक बुजुर्ग आदमी भी थे। एक नवविवाहिता ने उनकी पत्नी के पांव छुये। इसके बाद उनके छुय़े। उनकी मूंछे तनी हुई थीं। पांव छुआते हुये उनका चेहरा भी तन गया। शायद बहू को तनकर ही आशीष देना चाह रहे हों।
इस बीच घोषणा हुई कि एक बच्ची खो गयी है। नीली फ़्राक पहने है। जिसको दिखे मंच के पास पहुंचा दे।
नहर किनारे मंच भी बना था। वहां ’एक दिया शहीदों के नाम’ का पोस्टर लगा था। तमाम दिये रखे थे सामने। कुछ जल रहे थे, ज्यादातर बुझ गये थे।
जगह-जगह ठेलों पर चाय की दुकानें लगी थीं। एक ठेले पर मियां-बीबी चाय बेंच रहे थे। बच्चे वहीं प्रसाद खाते हुये खेल रहे थे।
मेले में गुब्बारे और खिलौने वाले भी थे। एक गुब्बारे वाला साइकिल पर सिलिंडर धरे एक गुब्बारा लटकाये खड़ा था। वहीं बाहर पचीसों गुब्बारे फ़ुलाये दूसरा बच्चा खड़ा था। उसके गुब्बारे धड़ाधड़ बिक रहे थे। दस रुपये का एक गुब्बारा। पता चला शुक्लागंज घर है उसका। कम से कम 15 किमी दूर। वहां से गुब्बारा बेंचने आया है। पांच बजे आ गया था मतलब चार बजे चला होगा। उठा और पहले होगा। कमर में बांधे गुब्बारे ग्राहकों को देता जा रहा था। साथ में फ़ुलाता भी जा रहा था।
एक गाड़ी की डिग्गी में बच्चे तसल्ली से बैठे हुये थे। एक मोटरसाइकिल में तीन लोग बैठे हुये थे। बीच वाली महिला किनारे वाली महिला को कपड़ों से पकड़े हुये थी कि अगर गिरे तो उसे बचा ले।
नहर की दूसरी तरफ़ भी लोग पूजा करने वाले थे। लेकिन कम थे। इस बीच देखा सूरज भाई आसमान में अपनी सेना के साथ हाजिर थे। पुराने आसमान पर जलवा फ़ैला हुआ था उनका। मल्लब सुबह हो गयी थी।
यह छठ पर्व की खास सुबह थी।

Sunday, November 06, 2016

बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन

अजीब बवाल है यार है। यही दिन देखने को बचे थे। लिखने के पहले विषय तय करना पड़ेगा। ये तो ऐसा ही हुआ जैसे अपने घर में परिचय पत्र दिखा के घुसने को मिले। अपन तो जो मन आये लिखते हैं। आदतन उल्टा-पुल्टा। ईरान की बात को तूरान से जोड़ते हैं। मीडिया में हालिया चलन वाले शब्द यहां-वहां घुसा देते हैं। अपनी गरीबी की बात लिखकर थोड़ा रोना टाइप। दूसरों की अमीरी के किस्से थोड़ी हिकारत के साथ। नेताओं का जिक्र गाली के साथ। तकनीक का तफ़सरा बुड़बकपन के साथ। विनम्रता का चित्रण अक्खड़पन के साथ। अपन तो ऐसे ही बिनते हैं ताना-बाना!


ओत्तेरी की। विसंगति को तो भूल ही गये थे। अच्छा हुआ याद आ गया। व्यंग्य मतलब विसंगतियों का चित्रण। बिना विसंगति के व्यंग्य उसी तरह फ़ीका लगता है जैसे बिना गुंडों-बाहुबलियों के कोई लोकतांत्रिक सरकार। फ़िर वापस लौटते हैं। लिखे हुये वाक्यों तोड़ते-मरोडते हैं। सीधा समझ में आने वाली बातों को उलझाऊ बनाते हैं। उसमें विसंगतियां घुसाते हैं।


अब आप विसंगति का मतलब पूछेंगे क्या? पूछेंगे तो बताना ही पड़ेगा। लेकिन आप मोटा मोटी यह समझ लो कि अपने देश में विसंगति का मतलब है बिना गढ्ढे की कोई सार्वजनिक सड़क होना। बिना लिये दिये आपना ड्राइविंग लाइसेंस बनना। बिना जाम का कोई शहर होना। बिना प्रदूषण की दिल्ली होना। बिना उकसावे के किसी देशभक्त का बयान होना। बिना राजनैतिक पहुंच वाले किसी शरीफ़ और विद्वान व्यक्ति का किसी विश्वविद्यालय का कुलपति होना।


लेख में विसंगति घुसा के सांस ले ही रहे थे कि स्मृति ( अरे वो वाली नहीं भाई) ने टोंक दिया कि व्यंग्य में करुणा की अंतर्धारा भी होनी चाहिये। अब ये नया बवाल। करुणा कहां से लाई जाये। कित्ती करुणा मिलायी जाये? असली बंधानी हींग की तरह कोई असली करुणा भी मिलती होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि लेख बिना के करुणा के लिख दिया जाये और फ़िर पैकिंग करुणा के कागज से कर दी जाये। खैर करुणा को छोडिये अभी। करुणा तो अपने यहां इफ़रात में पसरी मिलती है। जिधर देखो उधर करुणा ही करुणा दिखती है। अपने खिलाफ़ हुई साजिश के किस्से सुनाता हर बड़ा लेखक करुणा का चलता-फ़िरता इश्तहार लगता है।


हमसे एक पाठक ने पूछा – “भाईसाहब आप अपने हर अटपटे लेखन को व्यंग्य क्यों कहते हैं? अपने बेवकूफ़ी के लेखन को जिसे आप व्यंग्य लेखन कहते हैं को अगर परिभाषित करने को कहा जाये तो कैसे करेंगे?”
मन तो किया कि पाठक को जबाब देते हुये रोने लगें। अपनी व्यंग्य साधना का इतना मार्मिक वर्णन करें कि वह दहल जाये। इत्ता रोयें कि देखकर उसके मन में मेरे प्रति करुणा पैदा हो जाये जिसको इकट्ठा करके दो-चार व्यंग्य लेख निकाल लें हम। बाकी चलते समय उसी को ’सप्रेम भेंट’ कर दें। लेकिन फ़िर हम किये नहीं। यह उन बड़े लेखकों को शोभा देता है जिनकी तमाम किताबें छप चुकी होती हैं, जिनको खूब इनाम मिल चुके होते हैं। हमको तो कोई दूसरा क्या , हम खुद ही लेखक नहीं मान पाते।


हमने अपने पाठक को प्यार से निहारते हुये बचपन में सुनी एक सब्जी बेंचने के लिये निकली स्त्री का सौंदर्य वर्णन सुनाया:
शकरकंद सी शकल बनाई
गाजर की पैजनियां
आलू के दो बन्द लगाये
ठुमक चली काछिनिया।
अपन का व्यंग्य लेखन इसी तरह का है। अखबार/टीवी में जैसे ही कोई खबर मिली उसको लपक लिया। थोड़ा अंग्रेजी मिलाई ताकि युवा पीढी पढ सके। आगे बढते हुये शब्दों के अनुप्रासिक श्रंगार किया। हट,पट, सट,खट,लट, झट। आओ,जाओ, भगाओ, पटाओ, दिलाओ। अबे, तबे, सबे, क्यों बे, हां बे, ना बे, फ़ूट बे।
किसी भी पढे-लिखे लेखक के लिये ’अनुप्रासिक श्रंगार’ का लालच सहज होता है। चाट के ठेले के पास से गुजरते हुये बतासे खाने की सहज इच्छा की तरह। ’शब्दों की ड्रिबलिंग’ में लेखक इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि अपना गोल किधर है यही भूल जाता है। इसी चक्कर में कभी अपने ही गोल पोस्ट में गेंद घुसा देता है। जब तक उसे होश आता है तब तक खेल खत्म होने का सीटी बज जाती है। ऐसे लेखक के यहां से लेख निकलता है तो देखते ही पता चल जाता है कि सीधा ’अनुप्रास ब्यूटी पार्लर’ से मेकअप कराकर आ रहा है।


कभी-कभी मन में विसंगतियों पर इत्ता गुस्सा आता है कि मन करता है एकदम सर्जिकल स्ट्राइक कर दें उनके खिलाफ़। ऐसे में जित्ती भी विसंगतियां सामने दिखती हैं उन सबको एक सिरे से गरिया देते हैं। कुछ इस तरह जैसे हर बड़ा लेखक अपने अलावा बाकी सारे लेखन को ’लगभग कूड़ा’ बताते हुये अपना बड़प्पन सुरक्षित रखता है। कभी-कभी तो इत्ता जोर से हड़काते हैं विसंगतियों को कि बेचारी सहमकर रोने लगती हैं। कभी-कभी मन करता है कि व्यंग्य में सपाटबयानी व्यंग्य सम्प्रदाय, सरोकारी व्यंग्य सम्प्रदाय, गाली युक्त व्यंग्य सम्प्रदाय के साथ एक ’वीरगाथा व्यंग्य सम्प्रदाय’ का चलन भी होना चाहिये।


इतना लिखने के बाद लगता है कि व्यंग्य लेख पूरा हो गया। परसाई जी की परम्परा से सीधे जुड़ गये। परम्परा से क्या जुड़े उनसे आगे का लेखन कर रहे। परसाई जी के जाने के बीस साल बाद कुछ लिखना उनसे आगे का ही लेखन हुआ न! भले ही देश दुनिया की समझ उत्ती भी न हो जितनी परसाई जी को साठ साल पहले थी।
अब जब लेख पूरा हो गया है तो इसका शीर्षक भी तय करना जरूरी है। वैसे शीर्षक तो पहले ही तय है- व्यंग्य का विषय क्या हो? इसके अलावा अगर हमसे किसी लेख का विषय तय करने को कहा जाये तो हम इस तरह के शीर्षक सुझायेंगे:


1. बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन
2. एवरेस्ट से उतरकर कूड़ा बीनता व्यंग्य लेखक
3. शब्द अनुप्रास की फ़िसलपट्टी पर झूलता लेखक
4. व्यंग्य के मठाधीशों का करुणा आख्यान
5. व्यंग्य के देवालय में चिरकुटई साधता लेखक
आपको कौन सा शीर्षक पसंद आया? आप भी कुछ सुझाइये!

Saturday, November 05, 2016

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था

आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन कुछ ऐसा कि लगते पर अमल अक्सर छूट जाता है। हर काम ’अंतिम समय पर’ करने के आदत। वो शेर है न नूर साहब का:

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था
इसीलिये सफ़र न कभी सुमार करता था।

मतलब इतना विश्वास है कि कल्लेंगे कभी काम। हो जायेगा। लेकिन घरैतिन का हिसाब अलग है । काम करना है तो अभी कर लो वर्ना छूट जायेगा।

बहरहाल जल्दी निकलने का फ़ायदा हुआ। तसल्ली से नजारे देखते हुये आये। घर के बाहर ही तीन महिलायें भी काम पर जाती दिखीं। वे भी लगता है जल्दी ही निकली थीं क्योंकि वे भी नजारा देखते हुये तसल्ली से बतियाये हुये जा रहीं थी।

आर्मापुर बाजार में गन्ने बिक रहे थे। छठ पर्व के लिये। पन्द्रह रुपये का एक गन्ना था। अभी तो ये शुरुआत थी। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा दाम सेंसेक्स सरीखे उतरेंगे-चढेंगे। बिकने के लिये तैयार गन्ने बड़े खूबसूरत लग रहे थे। जैसे डिग्री मिलने पर कालेंजों में नौकरी के लिये जाते बच्चे सामूहिक फ़ोटो खिंचवाते हुये हसीन लगते हैं वैसे ही गन्ने भी क्यूट लग रहे थे।

हमने गन्नों की फ़ोटो लेने के लिये खिड़की खोली गाड़ी की। धूल गाड़ी में घुसकर गुडमार्निंग करने लगी। गाड़ी में पहले से मौजूद धूल ने उसको बैठने की जगह नहीं दी तो बाकी की फ़िर आयी नहीं। सूरज की किरणें भी खिलखिलाते हुये घुस आईं और चमका दी गाड़ी।

हमारे फ़ोटो लेने तक वे तीन महिलायें आगे आ गयीं थीं। क्लिक करते ही कमरे के सामने आ गयीं। हमने फ़ोटो दुबारा लिया। उनको अंदाजा हो गया था कि वे कैमरे के सामने आ गयीं थीं। वे मुड-मुडकर हमको देखने लगीं। हमने सोचा हम भी देख लें लेकिन फ़िर नहीं देखा। देखने लगते तो देर हो जाती।


सड़क पर एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ चला जा रहा था। कुत्ते का अगला पैर शायद चोटिल था। अगला एक पैर जमीन से कुछ इंच ऊपर उठाये कुत्ता सड़क पर कर रहा था। आने-जाने वाले हरेक को सलाम करता हुआ कुत्ता संस्कारी कुत्ता लग रहा था। संभव है किसी बकैत कुत्ते का चौकीदार हो वो कुत्ता और उसकी सेवा शर्तों में आता हो कि जब तक यहां रहोगे आसपास तब तक अगली टांग हमेशा सलाम मुद्रा में रखनी होगी।

पता नहीं कुत्तों के यहां यह लंगड़े कुत्तों को दिव्यांग कहने की व्यवस्था लागू हुयी कि नहीं। लागू हो गयी होगी तो उसको लंगड़े की जगह दिव्यांग ही कहना होगा। न कहें तो क्या पता कोई कार्रवाई हो जाये अपने ऊपर तो अपन माफ़ी मांगते घूमें। क्या पता सजा ही हो जाये कि एक दिन पोस्ट नहीं कर पाओगे अपना रोजनामचा। हम तो अपील भी न कर पायेंगे। न अपना कोई अखबार है न कोई टीवी चैनल।

’श्वान चिन्तन’ करते हुये पलक झपकते जरीब चौकी के पास पहुंच गये।’पलक झपकते’  से बेहतर होगा कहना ’पलकें झपकाते’ हुये। एक ठेलिया पर एकदम लाल युवा टमाटर बिक रहे थे। इत्ते क्यूट और स्वीट लग रहे थे टमाटर कि मन किया गाड़ी वहीं ठेलिया के पार ठढ़िया कर प्यार कर लें टमाटरों को। लेकिन मुये दफ़्तर की याद ने फ़िर दौड़ा दिया आगे।

बाजपेयी जी मिले। जाड़े में उनकी ड्रेस बदल गयी है। गरम कोट पहने थे। हमने कहा नई ड्रेस बढिया है तो बोले -’ हां बुकेट प्रूफ़ है।’ सीना खुली ड्रेस को बुलेट प्रूफ़ ड्रेस बताते हुये बाजपेयी जी की बात सुनकर ऐसा ही लगा कि जैसा अपनी आबादी के बड़े हिस्से को भूख से बेहाल देश के नेता विकास की दौड़ में सबसे आगे बताते हुये लगते हैं।
बाजपेयी जी ने कहा -कोहली को पकड़वाओ। वो अपनी मां के साथ मिलकर बच्चों को उठवा रहा है। पाकिस्तान के शरीफ़ से बात करके उसको पकड़वाओ।
एक मानसिक रूप से असंतुलित आदमी को सुनकर लगता है कि देखो इस आदमी को अपनी चिन्ता नहीं है। समाज की चिंता है। तमाम बुद्धिजीवी जिनको तमाम उपलब्धियां हासिल हो चुकी होती हैं अक्सर रोते हुये दिखते हैं -हाय हमको ये इनाम नहीं मिला, वो सम्मान नहीं मिला, ये इज्जत नहीं मिली,वो अपमान हो गया। उनसे भले तो अपने बाजपेयी जी हैं जो कभी अपना रोना नहीं रोते।
आगे एक आदमी दूसरे के कन्धे पर हाथ धरे चला जा रहा था। लग रहा था मित्रभाव मूर्तिमान टहल रहा है सड़क पर। भाईचारा जिन्दगी में बाकायदा आबाद है।
ओवरब्रिज के पहले एक लड़का सड़क पर तेजी से भागता गाड़ी के सामने निकल गया। दोनों हाथ चकरघिन्नी की तरह तेजी से घुमाता हुआ भागता बच्चा सड़क की दूसरी तरफ़ जाकर खेलने लगा।
दस साल के करीब से निर्माणीधीन ओवरब्रिज अपने पूरे होने के इंतजार में बाट जोह रहा है। उसके आखिरी छोर पर कपड़ों की फ़ेरी लगाये हुये बैठे लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह पुल ऐसा ही अधबना बना रहे ताकि अपनी दिहाड़ी चलती रहे। उससे ज्यादा तो शायद पुल के बाद बना मंदिर का पुजारी सोचता होगा कि पुल बना तो मंदिर टूटेगा। कमाई बंद होगी। क्या पता मंदिर के पुजारी ने ही कुछ तगड़ा चढ़ावा चढाकर पुल की फ़ाइल रुकवा दी हो।
यही सब फ़ालतू की बातें सोचते हुये समय पर नहीं समय से बहुत पहले पहुंच गये और दिन भर के लिये जमा हो गये।
आपका दिन चकाचक बीते।

दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये


आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन कुछ ऐसा कि लगते पर अमल अक्सर छूट जाता है। हर काम ’अंतिम समय पर’ करने के आदत। वो शेर है न वाली असी साहब का:
मैं रोज मील के पत्थर शुमार (गिनती) करता था
मगर सफ़र न कभी एख़्तियार (शुरू)करता था।
तमाम काम अधूरे पड़े रहे मेरे
मैँ जिंदगी पे बहुत एतबार (भरोसा)करता था।
मतलब इतना विश्वास है कि कल्लेंगे कभी काम। हो जायेगा। लेकिन घरैतिन का हिसाब अलग है । काम करना है तो अभी कर लो वर्ना छूट जायेगा।
बहरहाल जल्दी निकलने का फ़ायदा हुआ। तसल्ली से नजारे देखते हुये आये। घर के बाहर ही तीन महिलायें भी काम पर जाती दिखीं। वे भी लगता है जल्दी ही निकली थीं क्योंकि वे भी नजारा देखते हुये तसल्ली से बतियाये हुये जा रहीं थी।
आर्मापुर बाजार में गन्ने बिक रहे थे। छठ पर्व के लिये। पन्द्रह रुपये का एक गन्ना था। अभी तो ये शुरुआत थी। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा दाम सेंसेक्स सरीखे उतरेंगे-चढेंगे। बिकने के लिये तैयार गन्ने बड़े खूबसूरत लग रहे थे। जैसे डिग्री मिलने पर कालेंजों में नौकरी के लिये जाते बच्चे सामूहिक फ़ोटो खिंचवाते हुये हसीन लगते हैं वैसे ही गन्ने भी क्यूट लग रहे थे।
हमने गन्नों की फ़ोटो लेने के लिये खिड़की खोली गाड़ी की। धूल गाड़ी में घुसकर गुडमार्निंग करने लगी। गाड़ी में पहले से मौजूद धूल ने उसको बैठने की जगह नहीं दी तो बाकी की फ़िर आयी नहीं। सूरज की किरणें भी खिलखिलाते हुये घुस आईं और चमका दी गाड़ी।
हमारे फ़ोटो लेने तक वे तीन महिलायें आगे आ गयीं थीं। क्लिक करते ही कमरे के सामने आ गयीं। हमने फ़ोटो दुबारा लिया। उनको अंदाजा हो गया था कि वे कैमरे के सामने आ गयीं थीं। वे मुड-मुडकर हमको देखने लगीं। हमने सोचा हम भी देख लें लेकिन फ़िर नहीं देखा। देखने लगते तो देर हो जाती।
सड़क पर एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ चला जा रहा था। कुत्ते का अगला पैर शायद चोटिल था। अगला एक पैर जमीन से कुछ इंच ऊपर उठाये कुत्ता सड़क पर कर रहा था। आने-जाने वाले हरेक को सलाम करता हुआ कुत्ता संस्कारी कुत्ता लग रहा था। संभव है किसी बकैत कुत्ते का चौकीदार हो वो कुत्ता और उसकी सेवा शर्तों में आता हो कि जब तक यहां रहोगे आसपास तब तक अगली टांग हमेशा सलाम मुद्रा में रखनी होगी।
पता नहीं कुत्तों के यहां यह लंगड़े कुत्तों को दिव्यांग कहने की व्यवस्था लागू हुयी कि नहीं। लागू हो गयी होगी तो उसको लंगड़े की जगह दिव्यांग ही कहना होगा। न कहें तो क्या पता कोई कार्रवाई हो जाये अपने ऊपर तो अपन माफ़ी मांगते घूमें। क्या पता सजा ही हो जाये कि एक दिन पोस्ट नहीं कर पाओगे अपना रोजनामचा। हम तो अपील भी न कर पायेंगे। न अपना कोई अखबार है न कोई टीवी चैनल।
कुत्ता चिन्तन करते हुये पलक झपकते जरीब चौकी के पास पहुंच गये। पलक झपकते से बेहतर होगा कहना ’पलकें झपकाते’ हुये। एक ठेलिया पर एकदम लाल युवा टमाटर बिक रहे थे। इत्ते क्यूट और स्वीट लग रहे थे टमाटर कि मन किया गाड़ी वहीं ठेलिया के पार ठढ़िया कर प्यार कर लें टमाटरों को। लेकिन मुये दफ़्तर की याद ने फ़िर दौड़ा दिया आगे।
बाजपेयी जी मिले। जाड़े में उनकी ड्रेस बदल गयी है। गरम कोट पहने थे। हमने कहा नई ड्रेस बढिया है तो बोले -’ हां बुकेट प्रूफ़ है।’ सीना खुली ड्रेस को बुलेट प्रूफ़ ड्रेस बताते हुये बाजपेयी जी की बात सुनकर ऐसा ही लगा कि जैसा अपनी आबादी के बड़े हिस्से को भूख से बेहाल देश के नेता विकास की दौड़ में सबसे आगे बताते हुये लगते हैं।
बाजपेयी जी ने कहा -कोहली को पकड़वाओ। वो अपनी मां के साथ मिलकर बच्चों को उठवा रहा है। पाकिस्तान के शरीफ़ से बात करके उसको पकड़वाओ।
एक मानसिक रूप से असंतुलित आदमी को सुनकर लगता है कि देखो इस आदमी को अपनी चिन्ता नहीं है। समाज की चिंता है। तमाम बुद्धिजीवी जिनको तमाम उपलब्धियां हासिल हो चुकी होती हैं अक्सर रोते हुये दिखते हैं -हाय हमको ये इनाम नहीं मिला, वो सम्मान नहीं मिला, ये इज्जत नहीं मिली,वो अपमान हो गया। उनसे भले तो अपने बाजपेयी जी हैं जो कभी अपना रोना नहीं रोते।
आगे एक आदमी दूसरे के कन्धे पर हाथ धरे चला जा रहा था। लग रहा था मित्रभाव मूर्तिमान टहल रहा है सड़क पर। भाईचारा जिन्दगी में बाकायदा आबाद है।
ओवरब्रिज के पहले एक लड़का सड़क पर तेजी से भागता गाड़ी के सामने निकल गया। दोनों हाथ चकरघिन्नी की तरह तेजी से घुमाता हुआ भागता बच्चा सड़क की दूसरी तरफ़ जाकर खेलने लगा।
दस साल के करीब से निर्माणीधीन ओवरब्रिज अपने पूरे होने के इंतजार में बाट जोह रहा है। उसके आखिरी छोर पर कपड़ों की फ़ेरी लगाये हुये बैठे लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह पुल ऐसा ही अधबना बना रहे ताकि अपनी दिहाड़ी चलती रहे। उससे ज्यादा तो शायद पुल के बाद बना मंदिर का पुजारी सोचता होगा कि पुल बना तो मंदिर टूटेगा। कमाई बंद होगी। क्या पता मंदिर के पुजारी ने ही कुछ तगड़ा चढ़ावा चढाकर पुल की फ़ाइल रुकवा दी हो।
यही सब फ़ालतू की बातें सोचते हुये समय पर नहीं समय से बहुत पहले पहुंच गये और दिन भर के लिये जमा हो गये।
आपका दिन चकाचक बीते।

Friday, November 04, 2016

हर तरफ मंगतों का हुजूम है

किरन और करन
शाम को जब दफ़्तर से घर लौटने पर अक्सर ही टाटमिल चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल की मेहरबानी से कुछ रुकना होता है। गाड़ी रुकते ही लपककर कोई न कोई गाड़ी पोंछने लगता है। मना करते न करते सामने का शीशा पोंछ डालता है। कुछ न कुछ आशा करता है। कभी-कभी कुछ फुटकर रूपये दे देते हैं। कभी बत्ती हरी होती है तो फूट लेते हैं।

जब पैसे नहीं देते तो लगता है अगले की मजूरी मारकर फूट लिए हैं। कभी मना करते हैं तो कहता है मर्जी हो देना नहीं तो मत देना। मानों उसकी सफाई न हुई जियो का मुफ्तिया सिम हो गया। अब्बी मुफ़्त है। बाद में मन करे तो जारी रखना, न मन करे तो बन्द कर देना।

एक दिन सिग्नल देर में हुआ तो बतियाने भी लगे। भाईसाहब गाड़ी पोंछते जा रहे थे जबाब देते जा रहे थे। बताया कि तीन-चार घण्टे 'सफाई सेवा' प्रदान करके 40-50 रूपये जुटा लेते हैं।कभी कोई देता है कभी नहीं भी देता है (कहते हुए उसने हमारी तरफ देखा)। कभी कोई पांच-दस भी दे देता है। कभी एकाध में टरका देता है। जिसकी जो मर्जी हो देता है , हम ले लेते हैं।

ये तो हुई बात कुछ करके कुछ पाने की आशा रखने वाली बात। दूसरी जमात में वे लोग हैं जो बिना कुछ किये कुछ चाहते हैं। जरीब चौकी क्रासिंग पर ऐसे तमाम बच्चे सक्रिय हैं। क्रासिंग पर गाड़ी रुकते ही खिड़की पर जुट जाते हैं। कुछ लोग कोई फोटो भी पकडे रहते हैं। खासकर शनिवार को एक बाल्टी में लोहे की पत्ती तेल में डुबाये हुए। तेल भी क्या पता तेल होता है या कोई मोबिलऑयल पता नहीं।

भीख मांगने वालों की उपेक्षा करके बचना तो आसान होता है। कभी उनकी फोटो खींचने की कोशिश करते हैं तो भाग जाते हैं। लेकिन अफ़सोस बहुत होता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी बच्चे पैदा होते ही मांगने के धंधे में उतार दिए जाते हैं। जिस उम्र में किसी स्कूल में होना चाहिए उनको उस आयु में चौराहे पर हथेली फैलाये मिलते हैं।

स्कूल जाने वाले बच्चे भी कभी-कभी यह एहसास कराते हैं कि अभाव और गरीबी हमारे अंदर मांगने की आदत के इंजेक्शन लगाती रहती है।

एक दिन घर से निकलते ही दो बच्चे मिल गए। पता चला पास के स्कूल में पढ़ते हैं। नौ बजे का स्कूल है। आठ बजे तैयार होकर भाई बहन चल दिए स्कूल। भाई करन 4 में पढ़ता है। बहन किरन 2 में शायद। कुछ गिनती पहाड़े पूछते हुए हम आगे बढ़े तो बच्चे ने कुछ पैसे मांगे। हमने पूछा क्या करोगे ? बच्चा बोला - चिज्जी खाएंगे।

यह बात जब तक हुई तब तक हम गाड़ी स्पीड में ले आये थे। बच्चे की मांग में भी , शायद आदत न होने के चलते, थोड़ी हिचक सी थी। कुल मिलाकर हम कुछ दिए बिना आगे बढ़ गए।

यह तो अबोध बच्चे थे। लेकिन आसपास देखते हैं तो लगता है चारो तरफ मांगने वालों का हुजूम हैं। कोई सुविधा मांग रहा है तो कोई रियायत।कोई वोट मांग रहा है तो कोई नोट। कोई अपने लिए जबरियन उपहार मांग रहा है तो कोई आरक्षण। कोई यश और सममान के लिए कटोरा थामें खड़ा है। हर तरफ मंगतों का हुजूम है। हम भी किसी न किसी रूप में इसी जुलूस में कहीं शामिल हैं।

शायद  हम मंगते समाज के रूप में विकसित हो रहे हैं। मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं। सन्तुलन गड़बड़ाएगा तो बवाल होगा ।

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मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं



शाम को जब दफ़्तर से घर लौटने पर अक्सर ही टाटमिल चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल की मेहरबानी से कुछ रुकना होता है। गाड़ी रुकते ही लपककर कोई न कोई गाड़ी पोंछने लगता है। मना करते न करते सामने का शीशा पोंछ डालता है। कुछ न कुछ आशा करता है। कभी-कभी कुछ फुटकर रूपये दे देते हैं। कभी बत्ती हरी होती है तो फूट लेते हैं।
जब पैसे नहीं देते तो लगता है अगले की मजूरी मारकर फूट लिए हैं। कभी मना करते हैं तो कहता है मर्जी हो देना नहीं तो मत देना। मानों उसकी सफाई न हुई जियो का मुफ्तिया सिम हो गया। अब्बी मुफ़्त है। बाद में मन करे तो जारी रखना, न मन करे तो बन्द कर देना।
एक दिन सिग्नल देर में हुआ तो बतियाने भी लगे। भाईसाहब गाड़ी पोंछते जा रहे थे जबाब देते जा रहे थे। बताया कि तीन-चार घण्टे 'सफाई सेवा' प्रदान करके 40-50 रूपये जुटा लेते हैं।कभी कोई देता है कभी नहीं भी देता है (कहते हुए उसने हमारी तरफ देखा)। कभी कोई पांच-दस भी दे देता है। कभी एकाध में टरका देता है। जिसकी जो मर्जी हो देता है , हम ले लेते हैं।
ये तो हुई बात कुछ करके कुछ पाने की आशा रखने वाली बात। दूसरी जमात में वे लोग हैं जो बिना कुछ किये कुछ चाहते हैं। जरीब चौकी क्रासिंग पर ऐसे तमाम बच्चे सक्रिय हैं। क्रासिंग पर गाड़ी रुकते ही खिड़की पर जुट जाते हैं। कुछ लोग कोई फोटो भी पकडे रहते हैं। खासकर शनिवार को एक बाल्टी में लोहे की पत्ती तेल में डुबाये हुए। तेल भी क्या पता तेल होता है या कोई मोबिलऑयल पता नहीं।
भीख मांगने वालों की उपेक्षा करके बचना तो आसान होता है। कभी उनकी फोटो खींचने की कोशिश करते हैं तो भाग जाते हैं। लेकिन अफ़सोस बहुत होता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी बच्चे पैदा होते ही मांगने के धंधे में उतार दिए जाते हैं। जिस उम्र में किसी स्कूल में होना चाहिए उनको उस आयु में चौराहे पर हथेली फैलाये मिलते हैं।
स्कूल जाने वाले बच्चे भी कभी-कभी यह एहसास कराते हैं कि अभाव और गरीबी हमारे अंदर मांगने की आदत के इंजेक्शन लगाती रहती है।
एक दिन घर से निकलते ही दो बच्चे मिल गए। पता चला पास के स्कूल में पढ़ते हैं। नौ बजे का स्कूल है। आठ बजे तैयार होकर भाई बहन चल दिए स्कूल। भाई 4 में पढ़ता है। बहन 2 में शायद। कुछ गिनती पहाड़े पूछते हुए हम आगे बढ़े तो बच्चे ने कुछ पैसे मांगे। हमने पूछा क्या करोगे ? बच्चा बोला - चिज्जी खाएंगे।
यह बात जब तक हुई तब तक हम गाड़ी स्पीड में ले आये थे। बच्चे की मांग में भी , शायद आदत न होने के चलते, थोड़ी हिचक सी थी। कुल मिलाकर हम कुछ दिए बिना आगे बढ़ गए।
यह तो अबोध बच्चे थे। लेकिन आसपास देखते हैं तो लगता है चारो तरफ मांगने वालों का हुजूम हैं। कोई सुविधा मांग रहा है तो कोई रियायत।कोई वोट मांग रहा है तो कोई नोट। कोई अपने लिए जबरियन उपहार मांग रहा है तो कोई आरक्षण। कोई यश और सममान के लिए कटोरा थामें खड़ा है। हर तरफ मंगतों का हुजूम हैं। हम भी किसी न किसी रूप में इसी जुलूस में कहीं शामिल हैं।
मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं। सन्तुलन गड़बड़ाएगा तो बवाल होगा ।

Sunday, October 30, 2016

दीपावली मतलब अंधेरे के खिलाफ़ उजाले की सर्जिकल स्ट्राइक



दीपावली को रोशनी का त्योहार माना जाता है। त्योहार के आते ही अंधेरे को निपटाने की बातें शुरु हो जाती हैं। गोया अंधेरा न हुआ जानी दुश्मन हो गया। पाकिस्तान टाइप। निपटा दो फ़ौरन उजाले की बमबारी करते हुये। एक तरह से दीपावाली अंधेरे के खिलाफ़ उजाले की ’सर्जिकल स्ट्राइक’ है।
ये सर्जिकल स्ट्राइक वाली बात पौराणिक संदर्भ में भी लागू होती है। राम ने लंका में घुसकर रावण को मारा। अपनी पसंद का राजा बना आये वहां। सीता जी को ले आये। जब वापस आये तो देश की जनता ने हर्षित होकर हल्ला-गुल्ला मचाया। पटाखेबाजी करी। शायद नारे भी लगाये हों- ’हमारा राजा कैसा हो, रामचन्द्र जी जैसा हो’। कुल मिलाकर कुछ-कुछ ऐसा ही सीन रहा होगा जैसा अभी अपनी सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हुआ।
लेकिन अंधेरे के खिलाफ़ ये उजाले की हल्ला बोल की प्रवृत्ति के पीछे बाजार की ताकत काम करती है। अंधकार पर रोशनी की विजय के नाम पर तमाम रोशनी के एजेंट अपनी दुकान लगाकर बैठ जाते हैं। इतना उजाला फ़ैला देते हैं कि आंख मारे रोशनी के चौंधिया जाती है। दिखना बंद हो जाता है। अंधेरे के ’अंधेरे’ से उजाले के ’अंधेरे’ में लाकर खड़ा कर देते हैं रोशनी के ठेकेदार। जब तक आपको कुछ समझ में आता है तब तक आपको लूटकर फ़ूट लेते हैं। आपको जब तक होश आता है तब तक आप लुट चुके होते हैं। जो लोग लुटने की शराफ़त नहीं दिखा पाते वे पिट भी जाते हैं।
पर हम तो प्रकृति के उत्पाद हैं। अपने लिये तो अंधेरा और उजाला प्रकृति के दो सहज पक्ष हैं। दिन और रात की तरह। प्रकृति ने हमें इसी तरह बनाया है कि जब धरती सूरज के सामने रहे तब हमें दिखता रहे। बाकी समय अंधेरा रहे। दिखना बंद हो जाये। यह वास्तव में धरती ने हमारे लिये आराम का इंतजाम किया है। जितने भी जीव जंतु हैं धरती पर सबके लिये इसी तरह का इंतजाम है। सब जीव जंतु इसे सहज भाव से लेते हैं। कोई हल्ला नहीं मचाता। लेकिन इंसान खुराफ़ाती है। जबसे उसने कृत्तिम रोशनी की खोज की होगी तबसे वह अंधेरे के खिलाफ़ हल्ला मचाता रहता है।
इंसान को अंधेरे में दिखता नहीं। अंधेरे में डरता है वह। अपनी औकात कम लगती हैं अंधेरे में उसे इसलिये वह अंधेरे को अपना दुश्मन मानकर उसके खिलाफ़ साजिश करता है। जहां देखो तहां अंधेरे का कत्ल करता रहता है। कहीं-कहीं तो इतनी ज्यादा रोशनी करती है कि अंधेरे से भी ज्यादा अंधेरा फ़ैल जाता है। अंधेरा कभी उजाले के खिलाफ़ साजिश नहीं करता। वह लड़ाई भिड़ाई भी नहीं करता उजाले से। जब उजाला अंधेरे पर हमला करता है तो चुपचाप किनारे हो जाता है। नेपथ्य में चला जाता है। जब उजाले की सांस फ़ूल जाती है अंधेरे से कुश्ती लडते हुये तब अंधेरा फ़िर से अपनी जगह वापस आ जाता है।
अंधेरे का बड़प्पन ही है कि वह उजाले घराने के किसी भी सदस्य को चोट नहीं पहुंचाता। वो एक शेर है न:
जरा सा जुगनू भी चमकने लगता है अंधेरे में,
ये अंधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है जी!
अंधेरा जरा से जुगनू को भी चमकने का मौका देता है। उजाले में यह उदारता नहीं होती। वह जहां रहता है वहां किसी अंधेरे को उजाले को पनपने का मौका नहीं देता। डरता है उजाला कि जरा सा मौका मिला अंधेरे को तो वह उजाले को भगा देगा।
अंधेरे पर उजाले की जीत की आड़ में तमाम घपले होते हैं। बिजली बनाने के नाम पर जंगल काट दिये जाते हैं। बांध बनाने के लिये आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है। शहर में बिजली का झटका गांवों में लगता है। कहीं 24 घंटे बिजली पहुंचाने के लिये दूसरी जगह 48 घंटे अंधेरे में डुबा दिये जाते हैं। एक जगह रोशनी की चकाचौंध होती है तो दूसरी जगह घुप्प अंधेरा। मतलब हाल ये होता है कि:
कल उजालों के गीत बहुत गाये गये!
इसी बहाने गरीब अंधेरे निपटाये गये।
अंधेरे पर उजाले का जयघोष करने वाले कामना करते हैं कि दुनिया में सदैव उजाला बना रहे। अंधेर-उजाले के लोकतंत्र की जगह रोशनी की तानाशाही सरकार बनी रहे। यह कामना ही प्रकृति विरुद्ध है। यह तभी हो सकता है जब धरती सूरज का चक्कर लगाना बन्द कर दे। जैसे ही ऐसा कुछ हुआ, ग्रहों का सन्तुलन बिगड़ जायेगा। सौरमण्डल की सरकार गिर जायेगी। धरती पर प्रलय जैसा कुछ आयेगा। अंधेरे पर उजाले की विजय का हल्ला मचाने वाला इंसान अपने टीन टप्पर, अस्थि-पंजर समेत ब्रह्मांड के किसी कोने में कचरे सरीखा पड़ा रहेगा न जाने किसी आकाशीय पिंड का चक्कर लगाते हुये।
मान लीजिये धरती नष्ट भी न हुई और आज से ही दुनिया से अंधेरा विदा हो गया। सब तरफ़ उजाला ही उजाला हो गया तो सोचिये क्या होगा। दुनिया के सारे अंधेरे में किये जाने वाले कार्य व्यापार ठप्प बन्द हो जायेंगे। जनरेटर बनाने/बेंचने वाली कम्पनियां बन्द हो जायेंगी। किराये पर गैस बत्ती देने वाले कटोरा लिये नजर आयेंगे। अंधेरे में देखने वाले उपकरण बनाने वाली कम्पनियां दीवालिया हो जायेंगी। अंधेरे-उजाले में रहने के अभ्यस्त लोग बिना हवाई यात्रा के ही जेट लैग के शिकार होने लगेंगे।
अगर कभी ऐसा हुआ तो पक्का फ़िर अंधेरे के भाव बढेंगे। कृत्तिम उजाले की जगह कृत्तिम अंधेरे का व्यापास शुरु होगा। अंधेरा पैदा करने वाले उपकरण बनेंगे। अंधेरा पैदा करने वाले बल्ब बनेंगे। अंधेरा उगाने वाली मोमबत्तियां बंद बनेंगी। लोग आंख के डाक्टर के पास जाकर दुखड़ा रोयेंगे – ’डा.साहब इस आंख से दिखता ज्यादा है। कोई कम दिखने वाली दवा दीजिये। रोशनी से बहुत तकलीफ़ होती है।’ उजाले की तानाशाही होगी तब मुहावरे भी बदलेंगे। लोग ’आंख के सामने अंधेरा छा जाने’ की जगह ’ आंख के सामने उजाला छा गया’ कहने लगेंगे। कवि गण अंधेरे के सम्मान में गीत लिखेंगे। दीपावली के बदले क्या पता कोई ऐसा त्योहार मनाया जाने लगे जिसमें अंधकार ही अंधकार पैदा किया जाये। नीरज की तर्ज पर कोई कवि कहे-
बुझाओ दिये पर रहे ध्यान इतना,
उजाला धरा पर कहीं रह न जाये।
आपको भी लग होगा कि कहां की अल्लम-गल्लम हांकने लगे। लेकिन कहने का मतलब मेरा इतना ही है कि धूप-छांह की तरह ही अंधेरे-उजाले का रिश्ता है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। खुशी मनायें लेकिन उसके लिये अंधेरे को गरियाये नहीं। उसकी भी इज्जत बनाये रखें। अंधेरा वास्तव में मिट गया तो रोशनी में आपस में समाजवादी कुनबे की तरह कटाजुज्झ होने लगेगी क्योंकि:
असल में अंधेरे की अपनी कोई औकात नहीं होती,
इसकी पैदाइश तो उजालों में जूतालात से होती है।

आपको दीपावली की मंगलकामनायें।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209516305677988

Sunday, October 23, 2016

आस्तिक कि नास्तिक


जो लोग ईश्वर को मानते हैं उनके हिसाब से दुनिया में जो हो रहा है उस सबका कर्ता-धर्ता भगवान ही है। वही लोगों को बनाता है। वही निपटाता है। भक्तों को परेशान करके इम्तहान लेता है, वही दयालु बनकर उनका कल्याण करता है। वही आतंकवादी बनाता है वही उनको ’सर्जिकल स्ट्राइक’ में निपटाता है। वही मनेरेगा चलाता है वही जियो का सिल दिलाता है। ट्रम्प के रूप में वही स्त्रियों के खिलाफ़ छिछोरी हरकतें करता है तो हिलेरी भौजी के रूप में वही उसकी भर्त्सना करता है। वही करण जौहर की पिच्चर में पाकिस्तानियों को रोल दिलाता है फ़िर वही उनके खिलाफ़ हल्ला मचवाता है इसके बाद वही बीच का रास्ता निकालता है। बहुत बड़ा कारसाज है ऊपर वाला।
नास्तिक भाई लोग मानते हैं कि ईश्वर जैसी कोई चीज ही नहीं। आस्तिकों द्वारा भगवान को साबित करने की हर दलील को वह उसी तरह नकार देता है जैसा आतंकवादी गतिविधियों के सबूत देखकर पाकिस्तान नेति, नेति कर देता है।
तमाम लोग भगवानों के भौकाल से जलते हैं। सोचते हैं कि ईश्वर के तो जलवे होते हैं। जो मन आये करें। जिसको जो मन आये वरदान दे दिया। न कोई काम न धाम। न मंहगाई की चिन्ता न आटे-दाल का सोचना। भक्त हैं न सब करने के लिये। लेकिन यह धारणा केवल जलवेदार भगवानों के किस्से सुनकर बनाई धारणा हैं। जैसे फ़िल्म इंडस्ट्री में बड़े अभिनेताओं और एक्स्ट्रा का काम करने वालों की हैसियत अलग-अलग हैसियत होती है वैसे ही देव समाज में भी छोटे देवताओं की सेवा शर्तें बड़ी कड़ी होती होंगी।पुराने समय में जो जरा-जरा सी बात पर पुष्पवर्षा करने के वाले देवता होते होंगे वे एक्स्ट्रा देवता लोग ही होते होंगे जिनको विमान का किराया देकर भेज दिया जाता होगा। क्या पता जो बहादुरी वाले स्टंट होते हैं ईश्वर के वो करने वाला कोई 'स्टंट देवता' होता हो उनके यहां।
क्या पता कि ईश्वर की जिन लीलाओं के किस्से हम सुनते आये हैं वो उनके द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइक होती हों। हर अगला अवतार आते ही कहता हो कि इसके पहले यह लीला किसी ने नहीं दिखाई।
लोग समझते हैं कि देवताओं की जिंदगी बड़ी ऐश से गुजरती होगी उनको केवल स्तुतियां मिलती होंगी लेकिन ऐसा होता नहीं हैं। आजकल देवताओं की सर्विस कंडीशन भी बड़ी कठिन हो गयी हैं। जैसे राजनीति में मंत्रिमंडल में मनमाफ़िक पद या चुनाव में टिकट न मिलने पर राजनीति में लोग पार्टी बदल लेते हैं वैसे ही जहां जरा सा काम नहीं बना किसी का तो वो फ़ौरन अपना देवता बदल देता है।
आजकल तो भगवानों पर भी पूजा, नमाज में गबन के आरोप लगते हैं और कोई कवि कहता है:
सब पी गये पूजा ,नमाज बोल प्यार के
नखरे तो ज़रा देखिये परवरदिगार के।
अगर भगवान के लिये भी चुनाव होते तो इसी तरह के आरोपों में उनकी सरकार गिर जाती।
माना जाता है कि आस्तिक मने ईश्वर को मानने करने वाला, नास्तिक मने ईश्वर को न मानने वाला। दोनों अलग-अलग स्कूल की तरह हैं। दोनों का अपना सिलेबस है। अपने मास्टर। अपने छात्र। दूर से देखने पर लगता है कि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि दोनों की मैनेजमेंट कमेटी में एक ही परिवार के लोग शामिल हैं।
यह कुछ ऐसे ही है जैसे किसी लोकतंत्र में तमाम तरह की विचारधाराओं वाली पार्टियां होती हैं। कभी किसी की सरकार बनती है, कभी किसी की। लेकिन असल में पार्टियों को चन्दा देने कारपोरेट से ही मिलती है चलती है उसी की है। लोकतंत्र में सरकारें तो बाजार की कठपुतली होती हैं। बाजार पक्ष को भी चन्दा देता है विपक्ष को भी। बाजार दोनों को बनाये रखता है ताकि दोनों आपस में हल्ला मचाते रहें और वो अपनी दुकान चलाता रहे।
खैर यह तो ’हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तरह हैं। बाजार में सेन्सेक्स की तरह ईश्वर के प्रति आस्था भी कम-ज्यादा होती रहती है। कभी तमाम लोगों के लिये भगवान सरीखे रहे बापू आशाराम बेचारे जेल की कोठरी में निराश पड़े हुये हैं महीनों से। नास्तिक लोग अपने स्वामी की बात उसी तरह मानते हुये कीर्तन मुद्रा में जमा हो जाते हैं जिस तरह आस्तिक अपने भगवान के लिये इकट्ठा होते हैं।
हमसे कोई पूछे कि ’आस्तिक’ कि ’नास्तिक’ तो हम तो यही कहेंगे कि भईया जौन पैकेज में फ़ायदा ज्यादा हो वही तौल देव हमको। जिअमें दीपावली का बम्पर डिस्काउंट चल रहा हो वही बुक कर देव हमारे लिये।
आपका क्या कहना है इस बारे में?

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209443595340275

Thursday, October 20, 2016

बातें बनाना सीखें



सुबह जब घर से निकलते हैं तो तमाम नजारे दिखते हैं। उनको देखते हुये लगता है कि अब्बी इसी पल इसे लिख दिया जाना चाहिये। लेकिन आगे निकल जाते हैं। निकलना पड़ता है !
सबसे पहली मुलाकात सूरज भाई से होती है। अपनी किरणों, उजाले और पूरे भौकाल के साथ मानो सर्जिकल स्ट्राइक सी करते हैं सूरज भाई। घर से बाहर निकलते ही लगता है कि अरे, ये तो हर तरफ़ उजाला है। रोशनी के लिये बाहर निकलता पड़ता है भाई !
कल दफ़्तर जाते समय देखा एक आदमी साइकिल पर सब्जी लादे आ रहा था। हैंडल पर सब्जी के झोले, कैंची पर सब्जी का बोरा और फ़िर साइकिल के कैरियर पर ऊंचाई तक सब्जी की गठरियां। साइकिल इस वजन से इधर-उधर हो रही थी। शायद कह भी रही हो-’हमसे न होई! हम न चलब!’ साइकिल के टेढे-मेढे होने को सीधा करने की कोशिश करता हुआ सब्जी वाला आगे चलता हुआ अपनी मुंडी कैरियर पर लदे बोरे में घुसाये हुये संतुलन बनाता कौनिउ तरन से संभालता चला जा रहा था।
मन किया साइकिल वाले को रोककर सर्जिकल स्ट्राइक और पेट्रोल के हालिया बढे हुये दामों के बारे में कुछ पूछ डालें। लेकिन पटरी के उस पार होने के चलते इरादा त्याग देते हैं। आगे बढ जाते हैं।
ओ.एफ़.सी. के पास सड़क पर महिला रोज हाथ फ़ैलाये बैठी दिखती है। कल सड़क पर साइकिल पथ बनाने के लिये लगे पिलर से पीठ सटाये बैठी दिखी। तसल्ली से आराममुद्रा में उसे बैठे देख एक बारगी लगा कि कोई बादशाह अपने तख्तेताऊस पर बैठा है। एक दिन उसकी बच्ची उस खम्भे पर चढने की कोशिश करते हुये उसे गले सा लगा रही थी।
आज देखा तो महिला वैसे ही हाथ फ़ैलाये अपने मांगने की तपस्या में रत थी। उसकी दोनों बच्चियां अपनी मां के काम से बेखबर दो पिलर के बीच की जमीन पर आपस में खेल रही थीं।
साइकिल सवारों के लिये बने साइकिल पथ पर साइकिल सवारों के अलावा बाकी लोगों ने कब्जा सा कर लिया है। सब्जी वाले, फ़ल वाले , जूस वाले अपने ठेलिया लगाये खड़े दिखे। साइकिल का रास्ता कुछ इस तरह कि अगल साइकिल वाला निकले तो जगह-जगह उसे उठाकर ले जाना पड़ेगा साइकिल। एक जगह साइकिल वाला सडक के लम्बवत साइकिल खड़ी किये किसी भी दूसरी साइकिल के निकलने का रास्ता बंद किये हुये था। कुल मिलाकर साइकिल पथ साइकिल सवारों के अलावा अन्य सवारियों का कब्जा दिखा। कुछ ऐसे ही जैसे गरीबी रेखा से नीचे वाली बढिया सुविधाऒं पर समर्थ लोग अपना कब्जा कर लेते हैं।
तमाम साइकिल वाले साइकिल पथ के वाहर बीच सड़क पर चल रहे थे। उनको वहीं जगह मिली चलने की।
कल देखा सड़क किनारे एक गाय मरी पड़ी थी। पेट फ़ूला हुआ था। शायद यह अपनी मौत मरी हो या पालीथीन के कारण। लेकिन चुपचाप बिना किसी को व्यवधान दिये वह मरी पड़ी थी किनारे। पास में ही गाय की मौत से बेखबर सुअर वीकेन्ड के बाद वाले उत्साह से कूड़े से अपने मतलब का सामान खोजने में व्यस्त थे।
जरीब चौकी क्रासिंग जब भी बन्द मिलती है वहां मौजूद बच्चे उछलकर गाड़ी की खिड़की के पास खड़े होकर मांगने लगते हैं। दो-तीन बच्चे देखते-देखते पांच छह हो जाते हैं। हाथ की खाल सूखी देखकर लगता है कि साफ़-सफ़ाई की औपचारिकता के झांसे में नहीं आते बच्चे। पैसे देने के बजाय कुछ बात करते हैं तो जबाब अनमने मन से देते हैं। जैसे ही फ़ोटो खींचने के लिये मोबाइल उनकी तरफ़ घुमाओ बच्चे भाग खड़े होते हैं।
क्रासिंग पर सवारी देखते ही मांगने वाले बच्चे देखकर लगता है कि जब अविकसित, विकासशील देश विकसित देशों से सहायता मांगते होंगे तो जैसे विचार विकसित देशों के मन में आते होंगे वैसे ही कुछ सवारियों के मन में आते होंगे। कभी कुछ चिल्लर दे दिया कभी टरका दिया।
पंकज बाजपेयी जी से बहुत दिन बाद मिलना हुआ। देखते ही बोले-" प्रेम चोपड़ा गिरफ़्तार हो गया। फ़र्जी पेरोल पर रिहा होकर बाहर घूम रहा था। बच्चों को पकड़कर ले जाता था।" प्रेम चोपड़ा के बाद कोहली पर ध्यान दिया उन्होंने-" कोहली बहुत बड़ा रैकेट चला रहा है। उसके खिलाफ़ रिपोर्ट है। अखबार में सब निकला है। पुलिस उसको पकड़ने गयी है।"
सामने एक ई-रिक्शा वाला जा रहा है। उसके पीछे लिखा है- "मोबाइल रिपेयर करना सीखें। टीवी बनाना सीखें।" हमको लगता है कभी कोई विज्ञापन इस तरह भी दिखेगा-" बातें बनाना सीखें। हवाई किले बनाना 
सीखें।"
लेकिन वह जब होगा तब होगा। अभी तो फ़िलहाल इसे पोस्ट करने के अलावा और कोई काम समझ नहीं करना अपन को ! 

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Sunday, October 16, 2016

मौसम है आशिकाना


कल एक मित्र से बात हो रही थी। उन्होंने पूछा –’ तुम्हारे उधर का मौसम कैसा है?’
हमने कहा – आशिकाना।
यह कल की ही बात नहीं। हमसे कोई भी मौसम के बारे में पूछता है हमारा जबाब हमेशा एक ही रहता है- आशिकाना। मौसम बदलता रहे उसकी बला से। भीषण गर्मी पड़ रही हो। भयंकर लू चल रही हो। भद्दर जाड़ा पड़ रहा हो। दांत के साथ शरीर भी किटकिटा रहा हो। लेकिन हमसे मौसम की जब भी किसी ने बात की हमारा जबाब हमेशा एक सा ही रहा - आशिकाना।
यह कुछ ऐसा ही है कि भले ही अमेरिका कहीं भी बम बरसा रहा हो। किसी देश को तबाह कर रहा हो। आतंकवादियों को हथियार मुहैया करा रहा हो लेकिन जब भी उसकी नीतियों की बात चलेगी वह बयान जारी करेगा-’अमेरिका शांतिप्रिय देश है।’
एक तरह से सही ही कहता है अमेरिका भी। जब सब लोग मर खप जायेंगे तो हल्ला कौन मचायेगा। परसाई जी भी लिखते थे- “अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं। बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है, सभ्यता बरस रही है।“
हमने एकाध बार सोचा भी कि हमको हर मौसम ’आशिकाना’ ही क्यों लगता है। कारण समझ में नहीं आया। एक मित्र ने अपनी राय बताई –’ जिसको जो सुविधा हासिल नहीं होती वह उसका हल्ला मचाता रहता है। तुम शायद आशिकी से महरूम रहे इसलिये उसका नाम लेकर काम चलाते हो। सींकिया लोग ही अपनी पहलवानी के किस्से सुनाते हैं। साहब के चैम्बर में डांट खाकर निकले लोग बाहर सबको बताते हैं-’ आज हमने साहब को कस के हड़का दिया।’
हम मित्र की बात का क्या जबाब देते? कहते खूब आशिकी किये हैं तो फ़र्जी किस्से सुनाने पडते। उसमें भी दोहरा नुकसान। पहले तो हमारा ’शराफ़त इंडेक्स’ फ़ौरन कम होता। इश्क करना खराब माना जाता है न अपने यहां। इसके बाद जब किस्सों का झूठ सामने आता तो और बवाल होता।
लेकिन बात बदलते मौसम की हो रही है। आजकल मौसम इतनी तेजी से बदलने लगा है कि बेईमान से भी ज्यादा बेईमान हो गया है। बरसात का मौसम निकल जाता है पानी नहीं बरसता नहीं लेकिन अचानक जाड़े में धुंआधार हो जाता है। इसके अलावा पहले मौसम समाजवादी टाइप होता है। पूरे शहर में एक सा मौसम। अगर भन्नानापुरवा में धूप खिली है तो बांसमंडी में भी कपड़े सुखाने के डाल दिये जाते थे। अगर अफ़ीमकोठी में बारिश हो रही है तो ये नहीं हो सकता था कि गन्देनाले में छतरियां न खुलीं हो। मतलब सब जगह एक सा मौसम होता था।
लेकिन आजकल अक्सर ऐसा नहीं होता है। पता चलता है चेन्नई में झमाझम हो रहा होता है उधर कश्मीर में बर्फ़ गिर रही होती है। एक ही शहर तक में भी यही नजारा दिखता है। अक्सर होता है कि आर्मापुर में पानी बरस रहा है उधर कैंट में धूप खिली होती है। मौसम का यह बदलता अंदाज खाते में सीधे सब्सिडी जाने जैसा है। आर्मापुर का आधारकार्ड बारिश के लिये रजिस्टर है तो पानी बरसा दिया कैंट का नंबर धूप के लिये जुड़ा है तो वहां किरणें खिल गईं। यह भी हो सकता है कि मौसम के पास भी पानी और धूप का स्टाक सीमित हो या सर्विस एजेंट कम हो जाते हों इसलिये एक-एक करके सप्लाई करता हो। लोग कहते हैं आदमी प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करता रहता है इसलिये कुदरत भी डर-डरकर निकलती है बाहर! टुकडों-टुकड़ों में सहमते हुये। इसीलिये कहीं धूप दिखती है, कहीं बारिश।
यह तो कुदरत के नजारे हैं। मौसम कैसा भी रहे उसका असर मन पर परिस्थिति के हिसाब होता है। इस लिहाज से इधर देश-दुनिया का मौसम बड़ी तेजी से बदल रहा है। कुछ लोग बहुत तेजी से अमीर हो रहे हैं, बहुत ताकतवर हो रहे हैं, सारी खुशियां कुछ लोगों तक सिमटकर रह गयीं हैं। संतुलन बनाये रखने के लिये तमाम लोग बहुत तेजी से गरीब, कमजोर और बेहाल हो रहे हैं।
पहले अपराध, धतकरम और तमाम बुराईयां डरी-सहमी सी रहती थीं। सबके सामने आने में उनको उसी तरह डर लगता था जिस तरह आज एक लड़की को अकेले बाहर निकलने में लगता होगा। लेकिन आज बदलते समय में अपराध, धतकरम और तमाम बुराईयों ने सत्ता और पूंजी के साथ गठबंधन सरकार बना ली है। गुंडे, बाहुबली जो पहले पर्दे के पीछे से सत्ता की सहायता करते थे वे अब खुद सरकार बनाने लगे हैं। माफ़िया मसीहा बनकर सामने आ रहे हैं। दुर्बुद्धि, गुंडई , अराजकता अपनी तेजी से बढती ताकत के साथ न्यायबुद्धि, भलमनसाहत और सज्जनता को पटकनी दे रही हैं। सच्चाई मुंह छिपाये कहीं कोने में खड़ी है। झूठ लिपा-पुता मंच पर अट्ठहास करते हुये सम्मानित हो रहा है। जनता भौंचक्की सी इस बदलाव को देखती है। उसको झटका तब लगता है जब उसको बताया जाता है कि इस सब की जिम्मेदार वही है! उसी ने झांसे में आकर अपनी बदहाली का इंतजाम किया है!
इधर मौसम बहुत तेजी से बदल रहा है।
लेकिन मौसम का बदलना भी एक शाश्वत सच है। मौसम हमेशा एक सा कहीं नहीं रहता। यह समय भी बदलेगा। पर बदलाव के लिये मौसम की मेहरबानी से ज्यादा मन की मजबूती चाहिये। रमानाथ अवस्थी के शब्दों में- ’कुछ कर गुजरने के लिये, मौसम नहीं मन चाहिये।’ या फ़िर परसाई जी के कहे के अनुसार –’ मौसम की मेहरबानी पर भरोसा करेंगे, तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी। मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होगा। वसन्त अपने आप नहीं आता ; उसे लाया जाता है। सहज आनेवाला तो पतझड़ होता है, वसन्त नहीं। अपने आप तो पत्ते झड़ते हैं। नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं। वसन्त यों नहीं आता। शीत और गरमी के बीच से जो जितना वसन्त निकाल सके, निकाल लें। दो पाटों के बीच में फंसा है, देश का वसन्त। पाट और आगे खिसक रहे हैं। वसन्त को बचाना है तो ज़ोर लगाकर इन दोनों पाटों को पीछे ढकेलो - इधर शीत को, उधर गरमी को। तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसन्त।’

यह तो हुई हमारे इधर के मौसम की बात ! अब आप बताइये आपके इधर कैसा मौसम है।

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Friday, October 14, 2016

दिखते नहीं, मिलते नहीं

कल सबेरे जरा बाहर निकले। सूरज भाई दिखे बहुत दिन बाद ! खिल गये। हंसते हुये हाल-चाल लिये दिये। उनके साथ की किरणें आसपास के पेड़,पौधों, फ़ूल, पत्तियों के साथ ’धूप खेला’ कर रहीं थीं। मुट्ठी-मुट्ठी भर धूप पेड़, पत्तियों, कली, घास, सड़क, मकान सबको फ़ेंक-फ़ेंक कर मार रही थीं। धूप के उजाले में सब खिल-खिला रहे थे।
एक आदमी बोतल में पानी लिये सड़क पर चला जा रहा था। चेहरा किसी अपराध बोध में झुका सा हुआ। इसके यहां लगता है न कोई सोच है न शौचालय! सूरज की किरणों ने उसके चेहरे पर भी धूप बिखेरी लेकिन वह वैसे ही सर झुकाये झाड़ियों के बीच से होता हुआ एक टूटी दीवार के अन्दर हो गया। अन्दर कहीं इत्मिनान से बैठकर ’बिना सोच वाले शौचालय’ में बैठ गया होगा!
सामने से सूरज भाई पूरे जलवे में दिखे। एक पेड़ के ऊपर अपना गाल धरे हमसे बतियाते रहे बहुत देर। वही सब शिकवे-शिकायतें। दिखते नहीं, मिलते नहीं।
सामने से तीन बच्चियां प्लास्टिक की बोरियां लिये सड़क पर आती दिखीं। वे कूड़ा बीनने निकली थीं। बोरियों की लम्बाई बच्चियों से ज्यादा थी। वे आपस में बतियाते हुये सामने से आ रही थीं। हमने पूछा- ’ क्या बीनने निकली हो?’ वे बोली- जो भी मिल जाये!’
हमने सामने से फ़ोटो लेने के लिये मोबाइल ताना। पहले तो वे पोज बनाकर खड़ी हो गयीं। इसके बाद अपना दुपट्टा चेहरे पर कर लिया। तीनों से। एक ने तो बोरी सटा ली मुंह पर। हमने कैमरा नीचे कर लिया। वे हमारे सामने से होते हुये सड़क पर चलती चली गयीं।
आगे लोग टहलते हुये दिखे। तेजी से आगे-पीछे हाथ हिलाते हुये। जितने टहलने जाते लोग दिखे उससे ज्यादा लोग निपटने के लिये जाते दिखे। हाथ में पानी की बोतल लटकाये हुये। कुछ लोग बोतल को इज्जत से लटकाये हुये थे, ज्यादातर उंगली से थामे हुये। यह हाल तो पानी भरी बोतल का था। लेकिन खाली बोतलों को उंगली में फ़ंसाये हुये ही चले जा रहे थे। खाली बोतल का हाल वोट डाल चुके वोटर की तरह हो जाता है। उसकी इज्जत पहले जैसी नहीं रहती।
एक साथ लोगों को टहलते और निपटने जाते देखकर मुझे ताज्जुब हुआ कि अभी तक किसी नेता ने यह बयान क्यों नहीं जारी किया -’घर-घर शौचालय बनने से लोगों का सुबह टहलना बंद हो गया है। लोगों के स्वास्थ्य खराब हो रहे हैं। 
मोड पर एक जगह दो लोग एक सुअर को पकड़ रहे थे। एक ने उसके दोनों पैर पकड़े दूसरे ने बांध दिये। पैर बांधते समय वह बड़ी तेज चिंचिया (सुअरिया ) रहा था। इसके बाद दोनों ने मिलकर उसका मुंह भी बंद कर दिया जैसे अखबारों के, समाचार चैनलों की आवाज विज्ञापन मिलने के बाद धीमी पड़ती जाती है वैसे ही सुअर की आवाज भी धीमी पड़ती गयी। हाथ-पैर और मुंह बंध जाने के बाद कुछ देर तक वह पीठ के बल आगे-पीछे सरकता रहा। इसके बाद अपने को नियति के हाथ सौंपकर चुपचाप लेट गया।
सुअर के चुप हो जाने के बाद दोनों लोगों ने उसको अपने साथ फ़टफ़टिया पर लादा। चालक और पीछे बैठी सवारी के बीच बंधे सुअर को लादकर वे घटनास्थल से गो, वेंट और गान हो गये।
घर के पास एक आदमी पुलिया पर बैठा अखबार पढ़ रहा था। हमको वहां देखकर वह सकपका सा गया। मानो चोरी करते पकड़ा गया हो। उसकी साइकिल पास में खड़ी थी जिसका एक पैडल गायब था। कुछ देर उससे बतियाने के बाद हम तैयार होकर दफ़्तर चले आये।
रास्ते में पंकज बाजपेयी मिले। बोले- ’नकली पेरोल पर लोग रिहा हो रहे हैं। बजरिया थाने में रिपोर्ट हुयी है। जार्डन, कनाडा, लीबिया के लोग शहर में आये हुये हैं। बच्चों को पकड़ रहे हैं।"
हमने कहा- " अखबार में तो कहीं नहीं छपती आप जो बताते हैं वो खबरें।"
वे बोले-"अखबार वाले खबरें दबा देते हैं। बहुत दबाव है उनपर।"
हम उनकी बात से सहमत हों या असहमत यह सोचते हुये चलते रहे। आखिर में फ़ैक्ट्री पहुंचकर वहां जमा हो गये।
यह किस्सा था कल का, आज का कभी फ़िर। मने -शेष अगले अंक में। ठीक? आप मजे से रहिये !