कवि को भले ही जल्दी रही हो लेकिन पाठक कतई हड़बड़ी में नहीँ था। कत्तई तसल्ली में रहता है पाठक। इसीलिये 9 फरवरी'16 को 'सस्नेह' भेजा गया Nirmal Gupta जी का कविता संकलन आते ही किस्तों में बांचा भले गया लेकिन इस पर लिखने के लिए हमेशा तसल्ली का इन्तजार रहा। तसल्ली का जब पता किया तो मालूम हुआ वह अच्छे दिन के बाद आएगी। इसलिए इस पर कुछ भी लिखना टलता रहा।
निर्मल गुप्त से मेरी जानपहचान एक व्यंग्यकार के रूप में थी। बाद में पता चला कि भाई साहब मूलत: कवि हैं। कविता का संक्रमण उनके व्यंग्य लेखों में भी दीखता है।
पहला पन्ना खोलते ही लिखा दीखता है किताब में:
"हमारी गर्दने वायलन हैं
रेतोगे भी तो
बज उठेंगी बड़े सलीके से।"
रेतोगे भी तो
बज उठेंगी बड़े सलीके से।"
इससे अंदाज लगता है कि कवि दुष्यंत कुमार घराने की संवेदना वाला है जो लिखते हैं:
"न हो कमीज तो पावों से पेट ढँक लेंगे,
बहुत मुनासिब हैं ये लोग इस सफर के लिए।"
बहुत मुनासिब हैं ये लोग इस सफर के लिए।"
धूमिल की सच का दुस्साहस की रचना परम्परा को समर्पित इस कविता संग्रह में एक कम साठ कविताएं शामिल हैं। आम आदमी के जीवन की रोजमर्रा की घटनाओं को देखते एक संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति हैं ये कवितायेँ।
'पिता और व्हील चेयर' कविता लगभग हर उस घर की कहानी सी है जिसमें बुजुर्ग अपने अतीत की यादों से जुड़े रहते हुए नए ज़माने की सहूलियतों के सहारे जिंदगी जीने की ललक लिए हुए कब विदा हो जाता है पता ही नहीं चलता:
"उन्होंने पूछा था
तब हम सबसे या
कमरे की नम हवा से
यार, वह स्टीफन हॉकिंग की व्हील चेयर
क्या अब मिलने लगी है जुम्मे की पैठ में।
तब हम सबसे या
कमरे की नम हवा से
यार, वह स्टीफन हॉकिंग की व्हील चेयर
क्या अब मिलने लगी है जुम्मे की पैठ में।
वह बिना हिले डुले बैठे थे
बैठे ही रहे देर तक
हम लोगों को मालूम नहीं था
उनके सवाल का जबाब
तभी वह चले गए चुपचाप
व्हील चेयर वहीँ छोड़कर।"
बैठे ही रहे देर तक
हम लोगों को मालूम नहीं था
उनके सवाल का जबाब
तभी वह चले गए चुपचाप
व्हील चेयर वहीँ छोड़कर।"
रोजी-रोटी कमाने के लिए शहर आये रामखिलावन के अपनी सहज संवेदनाओं को स्थगित करना सीखने की कहानी है कविता 'रामखिलावन जीना सीख रहा है':
राम खिलावन बहुत उदास है
पर वह जुबानी मातमपुर्सी के लिये
दौड़ा-दौड़ा गांव नहीं जाएगा।
वह अब शहर में रह कर
सलीके से जीना सीख रहा है।"
पर वह जुबानी मातमपुर्सी के लिये
दौड़ा-दौड़ा गांव नहीं जाएगा।
वह अब शहर में रह कर
सलीके से जीना सीख रहा है।"
'संवाद का पुल' कविता में पीढ़ियों के साथ बदलते संवाद के बदलते अन्दाज की बात करते हुए वे याद करते हैं:
'मेरे पिता मेरे लिखे खत का
तुरन्त भेजते थे जबाब
उसमें होती थीं ढेर सारी आशीष
शुभकामनाएं,
बदलते मौसम का विवरण
और उससे खुद को बचाये रखने की कुछ ताकिदें।"
तुरन्त भेजते थे जबाब
उसमें होती थीं ढेर सारी आशीष
शुभकामनाएं,
बदलते मौसम का विवरण
और उससे खुद को बचाये रखने की कुछ ताकिदें।"
इसी कविता में आगे है:
''बचपन से मैंने जाना
जब कभी मेघ बरसे
मेरे पिता आ गए
छाता लेकर
उन्होंने मुझे कभी भीगने नहीं दिया।"
जब कभी मेघ बरसे
मेरे पिता आ गए
छाता लेकर
उन्होंने मुझे कभी भीगने नहीं दिया।"
यह भरोसे की बात है। जब भी विपत्ति आई पिता मौजूद। इसको पढ़ते हुए मुझे अपना एक शेर याद आ गया:
"तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
कि भीग तो पूरा गए, पर हौसला बना रहा।"
कि भीग तो पूरा गए, पर हौसला बना रहा।"
'मैं जरा जल्दी में हूँ' कविता में आज के समय की आपाधापी की कहानी है।
"अब मैं ज़रा जल्दी में हूँ
मेरे पास इतनी भी फुरसत नहीं
बैठकर किसी के पास
अपनी खामोशी कह सकूं
उसकी तन्हाई सुन सकूं।"
मेरे पास इतनी भी फुरसत नहीं
बैठकर किसी के पास
अपनी खामोशी कह सकूं
उसकी तन्हाई सुन सकूं।"
हर कविता में जीवन के रोजमर्रा के बिम्ब मिलते हैं। कविताओं में अतीत की न भूलने वाली स्मृतियाँ है, रिश्तों में प्यार की चाहना है और अपने आसपास की जिन्दगो से जुड़े अनुभव हैं जिनको पढ़ते हुए लगता है कि अपन भी इसी तरह के अनुभव से गुजरे हैं।
अपनी रचना प्रक्रिया की बात करते हुए निर्मल गुप्त लिखते हैं:
"मेरे लिए कविता की रचना प्रक्रिया से गुजरना कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे कोई मुसाफिर रेलगाड़ी में बैठकर एक तय मार्ग से होकर बार-बार गुजरे और नित नए अनुभवों का साक्षी बने। दृश्यावली वही रहे, लेकिन उसमें से नए-नए रंग और अर्थ प्रकट होते जाएँ। जिस प्रकार रेलगाड़ी में बैठा हुआ आदमी चाहकर भी अपना सक्रिय हस्तक्षेप दर्ज नहीं करा पाता, उसी तरह मैं भी अपनी कविताओं में महज एक सहयात्री की अकिंचन भूमिका में हूं।
इस सहयात्री को आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।"
संयोग कि यह पढ़ते हुए अपन भी रेलगाड़ी में बैठे हुए हैं और इन कविताओं को बांचते हुए इनमें से नए रंग खिलते देख रहे हैं। खासकर आखिरी कविता 'पुस्तक मेले में किताब' जिसमें:
"पुस्तक मेले में
शेल्फ पर रखी किताबें
टुकुर-टुकुर झांकती हैं
इस आस में कि कोई तो आये
जो उन्हें अपने साथ ले जाए
पढ़े मनोयोग से
सजा ले अपनी दिल की गहराई में।"
शेल्फ पर रखी किताबें
टुकुर-टुकुर झांकती हैं
इस आस में कि कोई तो आये
जो उन्हें अपने साथ ले जाए
पढ़े मनोयोग से
सजा ले अपनी दिल की गहराई में।"
यह बात इस किताब की ही नहीं है पुस्तक मेले की और तमाम किताबों की है। संयोग से आज ही निर्मल गुप्त के तीसरे व्यंग्य संग्रह 'हैंगर पर एंगर' का पुस्तक मेले में विमोचन है। वहीँ यह कविता पुस्तक भी बड़ी बहन की तरह नई किताब का स्वागत करते हुए मिलेगी। निर्मल जी को किताब के विमोचन की शुभकामनाएं।
यह रही 'मैं जरा जल्दी में हूँ ' पर एक त्वरित प्रतिक्रिया। बाकी फिर तसल्ली से।
पुस्तक: मैं ज़रा जल्दी में हूँ
कवि:निर्मल गुप्त
प्रकाशक: अयन प्रकाशन , नई दिल्ली।
कीमत: सजिल्द 300 रूपये
कवि:निर्मल गुप्त
प्रकाशक: अयन प्रकाशन , नई दिल्ली।
कीमत: सजिल्द 300 रूपये
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