Thursday, January 12, 2017

मैं जरा जल्दी में हूँ-निर्मल गुप्त




कवि को भले ही जल्दी रही हो लेकिन पाठक कतई हड़बड़ी में नहीँ था। कत्तई तसल्ली में रहता है पाठक। इसीलिये 9 फरवरी'16 को 'सस्नेह' भेजा गया Nirmal Gupta जी का कविता संकलन आते ही किस्तों में बांचा भले गया लेकिन इस पर लिखने के लिए हमेशा तसल्ली का इन्तजार रहा। तसल्ली का जब पता किया तो मालूम हुआ वह अच्छे दिन के बाद आएगी। इसलिए इस पर कुछ भी लिखना टलता रहा।
निर्मल गुप्त से मेरी जानपहचान एक व्यंग्यकार के रूप में थी। बाद में पता चला कि भाई साहब मूलत: कवि हैं। कविता का संक्रमण उनके व्यंग्य लेखों में भी दीखता है।
पहला पन्ना खोलते ही लिखा दीखता है किताब में:
"हमारी गर्दने वायलन हैं
रेतोगे भी तो 
बज उठेंगी बड़े सलीके से।"
इससे अंदाज लगता है कि कवि दुष्यंत कुमार घराने की संवेदना वाला है जो लिखते हैं:
"न हो कमीज तो पावों से पेट ढँक लेंगे,
बहुत मुनासिब हैं ये लोग इस सफर के लिए।"
धूमिल की सच का दुस्साहस की रचना परम्परा को समर्पित इस कविता संग्रह में एक कम साठ कविताएं शामिल हैं। आम आदमी के जीवन की रोजमर्रा की घटनाओं को देखते एक संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति हैं ये कवितायेँ।
'पिता और व्हील चेयर' कविता लगभग हर उस घर की कहानी सी है जिसमें बुजुर्ग अपने अतीत की यादों से जुड़े रहते हुए नए ज़माने की सहूलियतों के सहारे जिंदगी जीने की ललक लिए हुए कब विदा हो जाता है पता ही नहीं चलता:
"उन्होंने पूछा था 
तब हम सबसे या 
कमरे की नम हवा से
यार, वह स्टीफन हॉकिंग की व्हील चेयर
क्या अब मिलने लगी है जुम्मे की पैठ में।
वह बिना हिले डुले बैठे थे
बैठे ही रहे देर तक
हम लोगों को मालूम नहीं था 
उनके सवाल का जबाब
तभी वह चले गए चुपचाप 
व्हील चेयर वहीँ छोड़कर।"
रोजी-रोटी कमाने के लिए शहर आये रामखिलावन के अपनी सहज संवेदनाओं को स्थगित करना सीखने की कहानी है कविता 'रामखिलावन जीना सीख रहा है':
राम खिलावन बहुत उदास है
पर वह जुबानी मातमपुर्सी के लिये 
दौड़ा-दौड़ा गांव नहीं जाएगा।
वह अब शहर में रह कर 
सलीके से जीना सीख रहा है।"
'संवाद का पुल' कविता में पीढ़ियों के साथ बदलते संवाद के बदलते अन्दाज की बात करते हुए वे याद करते हैं:
'मेरे पिता मेरे लिखे खत का
तुरन्त भेजते थे जबाब
उसमें होती थीं ढेर सारी आशीष
शुभकामनाएं,
बदलते मौसम का विवरण
और उससे खुद को बचाये रखने की कुछ ताकिदें।"
इसी कविता में आगे है:
''बचपन से मैंने जाना 
जब कभी मेघ बरसे
मेरे पिता आ गए
छाता लेकर
उन्होंने मुझे कभी भीगने नहीं दिया।"
यह भरोसे की बात है। जब भी विपत्ति आई पिता मौजूद। इसको पढ़ते हुए मुझे अपना एक शेर याद आ गया:
"तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
कि भीग तो पूरा गए, पर हौसला बना रहा।"
'मैं जरा जल्दी में हूँ' कविता में आज के समय की आपाधापी की कहानी है।
"अब मैं ज़रा जल्दी में हूँ
मेरे पास इतनी भी फुरसत नहीं
बैठकर किसी के पास 
अपनी खामोशी कह सकूं
उसकी तन्हाई सुन सकूं।"
हर कविता में जीवन के रोजमर्रा के बिम्ब मिलते हैं। कविताओं में अतीत की न भूलने वाली स्मृतियाँ है, रिश्तों में प्यार की चाहना है और अपने आसपास की जिन्दगो से जुड़े अनुभव हैं जिनको पढ़ते हुए लगता है कि अपन भी इसी तरह के अनुभव से गुजरे हैं।
अपनी रचना प्रक्रिया की बात करते हुए निर्मल गुप्त लिखते हैं:
"मेरे लिए कविता की रचना प्रक्रिया से गुजरना कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे कोई मुसाफिर रेलगाड़ी में बैठकर एक तय मार्ग से होकर बार-बार गुजरे और नित नए अनुभवों का साक्षी बने। दृश्यावली वही रहे, लेकिन उसमें से नए-नए रंग और अर्थ प्रकट होते जाएँ। जिस प्रकार रेलगाड़ी में बैठा हुआ आदमी चाहकर भी अपना सक्रिय हस्तक्षेप दर्ज नहीं करा पाता, उसी तरह मैं भी अपनी कविताओं में महज एक सहयात्री की अकिंचन भूमिका में हूं।
इस सहयात्री को आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।"
संयोग कि यह पढ़ते हुए अपन भी रेलगाड़ी में बैठे हुए हैं और इन कविताओं को बांचते हुए इनमें से नए रंग खिलते देख रहे हैं। खासकर आखिरी कविता 'पुस्तक मेले में किताब' जिसमें:
"पुस्तक मेले में 
शेल्फ पर रखी किताबें
टुकुर-टुकुर झांकती हैं
इस आस में कि कोई तो आये
जो उन्हें अपने साथ ले जाए
पढ़े मनोयोग से
सजा ले अपनी दिल की गहराई में।"
यह बात इस किताब की ही नहीं है पुस्तक मेले की और तमाम किताबों की है। संयोग से आज ही निर्मल गुप्त के तीसरे व्यंग्य संग्रह 'हैंगर पर एंगर' का पुस्तक मेले में विमोचन है। वहीँ यह कविता पुस्तक भी बड़ी बहन की तरह नई किताब का स्वागत करते हुए मिलेगी। निर्मल जी को किताब के विमोचन की शुभकामनाएं।
यह रही 'मैं जरा जल्दी में हूँ ' पर एक त्वरित प्रतिक्रिया। बाकी फिर तसल्ली से।
पुस्तक: मैं ज़रा जल्दी में हूँ
कवि:निर्मल गुप्त
प्रकाशक: अयन प्रकाशन , नई दिल्ली।
कीमत: सजिल्द 300 रूपये

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अनूप मणि त्रिपाठी से मुलाकात


"अनूप, तुम अगर लड़की होते तो स्वेटर बहुत बढ़िया बुनते। "
यह बात हमसे हिंदी व्यंग्य के बुजुर्गवार Anup Srivastava जी ने पिछले हफ्ते कही। अपनीं बात को विस्तार देते हुये अनूप जी ने मेरे लिखने की तारीफ़ करते हुए कहा --'तुम लिखते ऐसा हो जैसे लड़कियां स्वेटर बिनती हैं।'
अब जब लड़कियां तक सिलाई-बुनाई का सीखना बन्द कर चुकी हैं तब इस तरह तारीफ़ कित्ती दिलखुश करने वाली हो सकती है , समझा जा सकता है। अनूप जी से मिलना हमेशा मजेदार रहता है।
इस बार जब वे मिले तो पिछले दिनों की माथे की चोट से उबर चुके थे। लेकिन पसली की नई चोट से मुलाकात हो गयी थी। पिछले कुछ दिनों से अपने अनूप जी भी राणा सांगा हो रखे हैं। कोई न कोई चोट लगी ही रहती है। ये तो दिखने वाली चोटें हैं। दिल में कितनी छुपाये हैं , उसका उनको ही पता होगा। लेकिन वे चोटों की परवाह किये बिना अपने काम-काज, आयोजन, प्रयोजन में लगे रहते हैं। एक नौजवान को भी शर्माने वाली ऊर्जा के साथ।
अट्ठहास का नया अंक साथ में लेकर हम लोग गोपाल चतुर्वेदी जी से मिलने गए। आलोक पुराणिक द्वारा संपादित अट्टहास के जनवरी अंक की तारीफ हमारी दीदी Nirupma Ashokने भी की यह कहते हुए कि यह अंक बहुत बढ़िया है। यह सूचना Alok Puranik को इस सुझाव के साथ कि अगर वे चाहें तो व्यंग्य पत्रिका नियमित निकालकर व्यंग्य के सबसे तगड़े पहलवान के साथ सबसे बड़े खलीफा भी बन सकते हैं (जब कभी बन जाएंगे तब खलीफा की जगह माफिया पढ़ा जाएगा)
अनूप जी से मिलने के बाद एक और अनूप से मिलने का सुयोग बना। अनूप मने Anoop Mani Tripathi से इसके पहले दो बार की मुलाकात है। एक तब वलेस के पहले और अब तक के अंतिम भी कार्यक्रम में उनका व्यंग्यपाठ सुना था। दूसरा तब जब मेरी किताब 'बेवकूफी का सौंदर्य' का विमोचन हुआ था। विमोचन के समय से अनूप भाई जब भी बात होती है तब हमारे बच्चों को हीरो बताते हैं और हमारी घरैतिन की बड़ी तारीफ़ करते हैं। विमोचन के मौके पर जो भाषण दिया था और उसके बाद उनके व्यवहार से बहुत प्रभावित हुए वे।
हमारे साथ यही लफड़ा है कि हमारे घर वालों से जो भी मिलता है वो उनकी ही तारीफ़ करता है। हमारी कोई तारीफ़ नहीं करता। 
तो लखनऊ में जब हमने फोनियाया अनूपमणि को सूरज भाई अपना इंटरवल पूरा कर चुके थे। लेकिन जनाब व्यंग्यकार महोदय ' सूरज निकला, चिड़ियाँ बोली' वाली मुद्रा में थे। बोले बस अभी उठे हैं। हम बोले -'इत्ती जल्दी क्यों उठ गए? कौनौ हडबड़ी है क्या ?'
खैर अब क्या किया जाए। जब जग गए तो उठ भी गए।
जब बात हुई तो मिलना भी तय हुआ। मिलन स्थल रहा लखनऊ का बर्लिंगटन चौराहा। हम पहुंच गए। देखा वहां राणा प्रताप की मय घोड़े की मूर्ति। पीछे से खड़े होकर देख रहे थे तो ऐसा लगा मानो राणा प्रताप अपने घोड़े के सामने वाली सराय होटल मीरा इन में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। होटल वाला शायद उनका भाला देखकर डर रहा है। लेकिन राणा प्रताप कह रहे होंगे -'जाएंगे तो भाले के साथ।' बिना भाले राणा प्रताप तो ऐसे ही लगेगें जैसे बिना पञ्च का व्यंग्य।
बहरहाल ज्यादा देर तक हमको राणा प्रताप को निहारना नहीं पड़ा। अनूप मणि आ गए। फटफटिया पर। हम लोग वहीँ पास की चाय की दुकान पर खड़े होकर चाय पीते हुए गपियाये। घटनास्थल पर ही उनके मोबाइल में हिंदी टाइपिंग टूल डाउनलोड किया गया और उनकी चहकन सुनी गयी -'वाह यह तो मजेदार है।'
जैसा कि आमतौर पर होता है कि लेखक लोग आपस में एक दूसरे की किसी न किसी बहाने तारीफ़ करते हैं। हमने भी अनूप के लेखन की थोड़ी तारीफ़ की।फिर ज्यादा समझ में नहीं आया तो यह सुझाव दे डाला-'अब भाई तुम व्यंग्य उपन्यास लिख डालो।'
इस पर उनका कहना था -"लिख तो डालें लेकिन डर लगता है कहीं कोई पकड़कर सम्मानित न कर दे। " हमने कहा -"लेखन में यह जोखिम तो हमेशा बना रहता है।लेकिन चिंता न करो इनाम के साथ बुराई करने वाले भी मिलते रहेंगे। संतुलन बना रहेगा।"
संयोग की बात अनूप का पहला व्यंग्य संग्रह ' शो रूम में जननायक' उनकी रचनाओं के पुरस्कृत होने पर अंजुमन प्रकाशन से छप रहा है। हमारे शायर -ए-आजम Venus Kesariयह पुण्य का काम कर रहे हैं। किताब तो हमने खरीद ली अब अंजुमन प्रकाशन की प्राइम मेंबरशिप लेनी बकाया है।
अनूप मणि को 14 जनवरी को ही हिंदी भवन में एक और इनाम मिलना है। अर्चना चतुर्वेदीके पिताजी की स्मृति में स्थापित यह पहला युवा पुरस्कार अनूप मणि को मिलेगा इसके हम भी गवाह बनेंगे।
हमने ज्यादा नहीं पढ़ा अनूप मणि को लेकिन जितना पढ़ा है उससे अगर हम वरिष्ठ लेखक और आशीर्वादी उम्र वाले होते तो कहते -'मैं अनूप में व्यंग्य की संभावनायें देखता हूँ।'
फिलहाल इतना ही। अब्बी तो पुस्तक मेला में मिलना है। आगे भी लिखा जाएगा। फ़िलहाल इतना ही। आप भी आइए मेले में न। मिलते हैं। 

Monday, January 09, 2017

पुलिया की दुनिया का विमोचन


कल से दिल्ली में विश्वपुस्तक मेला शुरु हो गया। तमाम कवि/लेखक/व्यंग्यकार अपनी नई किताब का विमोचन, नये संस्करण का पु्नर्विमोचन करवाने के लिये दिल्ली पहुंचेंगे प्रगतिमैदान। ख्यातनाम लोग मित्रों की किताबों का विमोचन करेंगे। उन सबको बधाई। शुभकामनायें।
विमोचन के लिहाज से देखा जाये तो मेरी पहली किताब ’पुलिया पर दुनिया’ का विमोचन अनूठे ठंग से हुआ था। जिस पुलिया पर बैठने वाले किरदारों के किस्से इस किताब में हैं उसी पर इसका विमोचन हुआ था। मतलब घटनास्थल पर ही।
किताब के विमोचनकर्ता थे ’पुलिया पर दुनिया’ के सबसे प्रमुख किरदार ’रामफ़ल’। जाड़े की एक धूपभरी दोपहरी में पुलिया पर गये अपन किताब लेकर। ’रामफ़ल’ को किताब पकड़ाई। कहा ये देखो किताब बनी ऐसी। फ़िर उनको विमोचन मुद्रा में किताब पकड़ाई। फ़ोटो खींची और बस हो गया विमोचन। थर्मस में चाय ले गये थे। डिस्पोजेबल ग्लास भी। वहीं चाय पी गयी और चले आये।
किताब आम लोगों के बारे में है। इसके परिचय लिखते हुये मैंने लिखा था:
" व्हीकल फ़ैक्ट्री जबलपुर की आफ़ीसर्स मेस और फ़ैक्ट्री के बीच बनी एक पुलिया पर बैठे लोगों के विवरण हैं इस किताब में। तरह-तरह के लोग दिखे पुलिया पर। हर व्यक्ति अपने में एक अलग किरदार है। पुलिया पर बैठे लोगों से बतियाते हुये एहसास होता है कि आपाधापी भरी जिन्दगी जीते हुये हम अपने आसपास की दुनिया से कितना अपरिचित रह जाते हैं।
“पुलिया पर दुनिया” आम लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी का रोजनामचा है। इसकी खासियत यही है कि कोई खास व्यक्ति इसमें शामिल नहीं है। सब आम लोगों के किस्से हैं।"
किताब की कोई समीक्षा तो नहीं छपी। लेकिन आनलाइन गाथा पर कुछ पाठकों की प्रतिक्रियायें हैं। जैसे कि ये:
1. Akanksha Verma
i take this book for my father. after reading this book my father said that this book really touch his past, when he enjoy with friends at tea shop in evening. I am very happy to see my father happy.
2. Sonu Singh
ha ha ha, nice book. what we do today, we didn't meet with our friends and not sharing our feeling. This book realize me what is the importance of people in our life.
किताब आनलाइन उपलब्ध है। ई-बुक और पेपरबैक दोनों फ़ार्मैट में। खरीदने का मन करे तो इस लिंक पर जाकर आर्डर कर सकते हैं।
इस तरह हमारा भी पुस्तक मेला शुरु हो गया। 
व्हीकल फ़ैक्ट्री जबलपुर की आफ़ीसर्स मेस और फ़ैक्ट्री के बीच बनी
BOOKSTORE.ONLINEGATHA.COM

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Sunday, January 08, 2017

चुनाव और दंगल


आजकल जाड़े का मौसम है। जाड़े के साथ जुगलबंदी करने के लिये चुनाव का मौसम भी आ गया है। चुनाव आयोग ने चुनावों की घोषणा कर दी है।
जाड़े में रजाई का जुगाड़ किया जाता है। चुनाव के मौसम में देशसेवा के ठेके तय किये जाते हैं। ठेका हासिल करने के लिये आजकल टेंडर भरे जा रहे हैं। लोकतंत्र में जनसेवा करने का यही तरीका चलन में है। इसमें सारे काम जनता के लिये होते हैं। अपने यहां लोकतंत्र है। लिहाजा यहां भी जो होता है सब जनता के लिये होता है। विकास, प्रगति, उन्नति, लड़ाई, झगड़ा, हत्या, बलात्कार, घपला-घूस मतलब कि दुनिया के सारे अल्लम-गल्लम काम जनता के लिये ही होते हैं। अंग्रेजी में तो कह भी दिया गया है- ’डेमोक्रेसी इज ऑफ़ द प्युपल, बाई द प्युपल, फ़ॉर द प्युपल।’ लोकतंत्र में सब काम जनता करती है। करना पड़ता है। देश भी जनता ही चलाती है। चलाना पड़ता है।
लेकिन जनता को तो पचास काम होते हैं। रोजी-रोटी का जुगाड़ करना होता है, घूस-घपले का इंतजाम करना होता है, हत्या-बलात्कार का शिकार होना होता है, दंगे-भूख-ठंड-बाढ़-सूखे-आपदा-दुर्घटना में मरने का काम निपटाना होता है। इस सब में ही इतना समय खप जाता है कि देश के लिये समय ही नहीं मिलता उसको। इसलिये वो अपने प्रतिनिधि चुनती है। उनको सेवा का मौका देती है। इसके लिये चुनाव होते हैं।
चुनाव में लोग जनता के सामने आते हैं। हाथ जोड़कर सेवा का मौका देने के लिये गिड़गिड़ाते हैं। दीगर दिनों में जनता की ’मां-बहन’ एक करने वाले चुनाव के समय जनता को ’माई-बाप’ बताते हैं। गली-गली में शोर मचाते हैं। नारे लगाते हैं। जलवा कायम बताते हैं। खुद को जनता का सच्चा सेवक बताते हैं।
इस मामले में अपने देश की जनता एकदम भोला भंडारी है। जैसे शंकर जी वरदान के मामले में एक के साथ चार फ़्री वाली स्कीम चलाते हैं वैसे ही जनता भी लोगों को सेवा के मौके बार-बार थमाती है। गुंडे, जाहिलों, गंवारों तक को सेवा का मौका दे देती है। चिरकुट से चिरकुट को देश की बागडोर सौंपने में नहीं हिचकती अपनी पब्लिक-“लो बेटा तुम भी कर लो सेवा। तुम भी क्या याद करोगे। फ़िर न कहना मौका नहीं दिया सेवा का।“
जाहिलों और काहिलों तक से सेवा करवा लेती है देश की जनता। सेवा करवाने के के मामले में देश का आत्मविश्वास चरमतम है। अईसी कान्फ़िडेंट डेमोक्रेसी और कहां? बड़ा झन्नाटेदार है अपना लोकतंत्र।
पहले के जनसेवक जनता की सेवा का काम चुपचाप करते थे। जनता उनके काम देखकर सेवा का काम सौंप देती थी उनको। जिसको चुना जाता था वो सेवा काम में लग जाता था। सेवा में चूक होने पर कोई बता देता था तो ’सेवा सुधार’ हो जाता था। तब लोगों को ’सेवा करने से मेवा’ मिलने वाली बात पता नहीं थी। लोग अपने संतोष के लिये सेवा करते थे।
लेकिन जब से लोगों को यह पता चला है कि सेवा करने से मेवा मिलती है तबसे जनसेवा के काम में गजब कम्पटीशन हो गया है। जिसे देखो वो मुंडी उठाये देशसेवा के मैदान की तरफ़ भागता दिखता है। पहले लोग अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिये उनको वकील-डाक्टर-इंजीनियर बनाते की कोशिश करते थे। आजकल देशसेवा का धंधा टॉप पर है। हाल यह है कि लोग अब अपने बच्चों को नाड़ा बांधना सिखाने के पहले ही देशसेवा का ककहरा सिखाने लगते हैं।
पहले सेवा काम निस्वार्थ होता था। फ़िर ’सेवा से मेवा’ का चलन शुरु हुआ तो लोग मेवा के लालच में सेवा करने लगे। आज के समय में ’मेवा के लिये सेवा’ की स्कीम लागू है राजनीति में। फ़ायदे का धंधा हो गयी है जनसेवा। फ़ायदे के धंधे से बाजार कैसे दूर हो रह सकता है भला। जैसे बाजार फ़ायदे के लिये नये-नये उत्पाद उतारता है वैसे ही चुनाव में भी बाजार अपने प्रतिनिधि उतारता है। उन पर पैसा लगाता है। चुनाव जीता हुआ आइटम भी बाजार का होता है, हारा हुआ भी नमूना भी उसी का। जीते हुये प्रतिनिधि के माध्यम से बाजार अपना लगाया हुआ पैसा कई गुना करके वसूल लेता है।
अब हाल यह है जनसेवा का काम एकदम दंगल सरीखा हो गया है। बिना दूसरे जनसेवक को चुनाव के अखाड़े में पटके सेवा का काम नहीं मिलता। रोम में सामन्त लोग अपने मनोरंजन के लिये दो गुलाम ग्लैडियेटरों को तब तक लड़ाते थे जब तक दोनों में से एक ग्लैडियेटर मर नहीं जाता था। वैसे ही सेवा के काम से मिलने वाली मेवा के लालच में जनसेवा का अधिकार पाने के लिये कटा-जुज्झ मचाये रहते हैं।

चुनाव के मौसम में भाई-भाई, चाचा-भतीजा, बाप-बेटा जनता की सेवा का अधिकार पाने के लिये जानी दुश्मन बन जाते हैं। एक ही स्थान विशेष से प्रात:कालीन उठते ही किया जाने वाला कर्म विशेष करने वाले लोग तक पार्टी पर कब्जे के लिये लड़ने लगते हैं। कुर्सी, पार्टी, चुनाव चिन्ह के लिये बाप-बेटे एक-दूसरे के रकीब बन जाते हैं। बाप से सीखे हुये दांव से ही बाप को पटकनी देकर बेटा चुनाव लड़ना चाहता है। श्रवणकुमार बनकर बाप को जबरियन तीर्थयात्रा कराना चाहता है। लेकिन बाप को लगता अभी तो वो जवान है। उसके लिये पागल जहान है। दंगल चलता रहता है।
जनता अपनी सेवा के लिये हुड़कते, आपस में लड़ते हुये लोगों को देखती है। कभी-कभी कहती भी है कि भाई तुम लोग मिलकर सेवा कर लो। हम तो सेवा कराने के लिये अभिशप्त हैं। कोई भी सेवा करेगा तो दुर्दशा हमारी ही होनी है। तुम क्यों लड़े-मरे जा रहे हो आपस में।
इस पर दोनों शायद जनता को घुड़क देते होंगे। तू जनता है। जनता की तरह चुपचाप रह। ज्यादा चूं-चपड़ मत कर। सेवा तो तेरी होनी ही है। कहां तक बचेगी? किस-किस सेवक से बचेगी? सेवा तो तुझे करानी ही होगी। बस जरा तय हो जाये कि तेरा असली सेवक कौन है। यही तय करने के लिये यह दंगल हो रहा है। इसे तू मनोरंजन समझकर देख। इससे ज्यादा मत समझ।
जनता बेचारी अपने सेवकों के बीच होते हुये दंगल को सहमी हुई देख रही है। वह दंगल खत्म होने का इंतजार कर रही है। दंगल में जीतने वाले पहलवान को उसी अपनी सेवा की विजयमाला पहनानी है। सहमते हुये अपनी सेवा का अधिकार देना है। इसके बाद अपने काम में जुट जाना है- लुटने, पिटने, हत्या-बलात्कार का शिकार होने, दंगे-भूख-ठंड-बाढ़-सूखे-आपदा-दुर्घटना में मरने खपने के शाश्वत काम में।

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Thursday, January 05, 2017

जो भरा नहीं है भावों से


आजकल कोहरे का जलवा है। चप्पे-चप्पे पर कब्जा किये रहता है। सड़क पर जाते हर राहगीर को ऐसे घेर लेता है जैसे वीआईपी लोगों को सुरक्षा सिपाही घेरे रहते हैं।
कल घर से दफ़्तर जाने के लिये निकले तो एक महिला सड़क पर जाती दिखी। कोहरे की नदी में हाथ चप्पू की तरह चलाते हुये तेजी से चली जा रही थी महिला। दोनों हाथों से कोहरे को पीछे ठकेलती हुई आगे बढ रही थी। जित्ता कोहरा पीछे ढकेल देती उत्ता कोहरा खाली जगह पर कब्जा करने के लिये लपकता। महिला फ़िर कोहरा ठकेलकर आगे बढती जाती।
आगे बढने की लिये रास्तें में वाली तमाम चीजों को पीछे ठकेलना पड़ना है।
सामने से स्कूटर आता दिखता है। स्कूटर की हेडलाइट की अंधेरे में लाइटहाउस की रोशनी की तरह चमक रही थी।
रास्ते में जगह लोग कूड़ा-करकट जलाते हुये उकडू बैठे अलाव ताप रहे थे।
पंकज बाजपेयी जी अपने मोर्चे पर खड़े हुये थे। सर्दी को गार्ड ऑफ़ आनर सरीखा देने के लिये अपनी जगह पर चुस्तैद। जाड़े के कारण कम बोलते हैं। पिछले दिनों उनके कहे कुछ वाक्य :
*कोहली को पकड़वाइये। वह बच्चा उठाने आता है।
*आपका डुप्लीकेट बनकर कोहली गलत काम करता है। पुलिस में उसका *एफ़आईआर कराइये।
*कल हमारे यहां डकैती डालने आये थे लोग। सब सामान लूटने की कोशिश की।
*जाडा बहुत है।
चाय पी चुके होते हैं अक्सर मेरे उनके पास से निकलते समय। डिवाइडर पर खड़े होते हैं । निकलते समय उनसे एकाध वाक्य में बात होती है। जब कभी घर से निकलने में देरी होती है तो बीच सड़क से ही हार्न बजाकर उनका ध्यान अपनी तरफ़ खींचकर ’मौन नमस्कार’ हो जाता है।
पता नहीं पंकज बाजपेयी जी को पता है कि नहीं कि उत्तर प्रदेश में चुनाव घोषित हो चुके हैं। नोटबंदी पर भी उन्होंने कोई बयान जारी नहीं किया अब तक। उनकी दुनिया और हमारी दुनिया एकदम अलग ही दुनिया है शायद।
आजकल शाम को आर्मापुर बाजार में सब्जी लेने जाते हैं तो सब्जी बाजार के बाहर एक व्यक्ति बैठा दिखता है। एक खराब है शायद। खूब गुस्से में कुछ न कुछ बोलता रहता है। आते-जाते सुनते हैं। बोलचाल का अंदाज शायराना है। कल एक कुत्ते को डांटते हुये कह रहे थे:
"तू कुत्ता है। तुझे सिर्फ़ सूंघना आता है।सूंधने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकता तू। सूंघ तू सूंघ। सड़ी-गली चीजों को सूंघ।"
शायद अपने भाई से कुछ नाराजगी है उनकी। भाई का नाम लेकर गुस्साते रहते हैं। एक दिन कहते हुये सुना:
"मैं किसी से भी बात कर सकता हूं लेकिन तेरे से बात नहीं कर सकता। तू मेरा भाई है लेकिन बात करने लायक नहीं है। बात करने के लिये आदमीं कुछ अच्छाइयां होनी चाहिये। कुछ भाव होने चाहिये:
जो भरा नहीं है भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।"
बचपन में यह कविता पंक्ति देशप्रेम निबंध में लिखते थे अपन। सुनकर लगा कि यह आदमी देशप्रेमी है। पागल नहीं है। वैसे भी देशप्रेम की आड़ में लोग तमाम तरह की पागलपन की बात करते रहते हैं। भारतमाता की जय बोलकर बड़े-बड़े समाज विरोधी काम अंजाम करते रहते हैं। हम उनका कुछ कर नहीं पाते। हम भी वन्देमातरम कहते हुये विनम्र भाव से उनकी हरकतों को देखते रहते हैं। यह सब सोचते हुये मुझे यह आदमी बड़ा भला टाइप लगने लगता है।
कल शाम को दफ़्तर से लौटते समय एक जूस की दुकन से जूस लेने के लिये रुके। चार बच्चे वहां अलाव ताप रहे थे। चार में से तीन बच्चे उसी जूस की दुकान पर काम करते हैं। चौथा बच्चा पास के ’गुरु चश्मे’ की दुकान पर काम करता है। मैंने कहा कि यार तुम्हारी दुकान सड़क से तो दिखती नहीं। चलती कैसी है?
वह बोला- ’लोग जानते हैं दुकान के बारे में। सामने ट्रान्सफ़ार्मर लग गया है लेकिन 24 साल पुरानी दुकान है। लोग आते हैं चश्मा बनवाने।’
तब तक बच्चे का जूस का ग्लास आ गया। वह पीने लगा। हम भी अपना जूस लेकर चले आयेे। आने के पहले जो फ़ोटो खैंचे थे उनको दिखाये। उन्होंने जिस फ़ोटो को सबसे अच्छा बताया था उसको लगा रहे हैं। यह भी सोच रहे हैं कि अपने सहज बचपन को स्थगित करते हुये ये बच्चे रात तक दुकानों में काम करते हुये जीने को अभिशप्त हैं।
सुबह आज भी कोहरे भरी है। लेकिन आज छुट्टी है सो टीवी देखते हुये स्टेटसिया रहे हैं। टीवी पर ’बेबी को बेस पसंदा है’ गाने की पैरोडी पर ’ सबको तो कैशलेस पसंद है’ बज रही है।
आपको क्या पसंद है आप जानो। अपन को तो जाड़े में चाय पसंद है। आ भी रही है बनकर फ़िर से। तब तक इसको अपलोड कर देते हैं। 

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Sunday, January 01, 2017

नया साल, नये सवाल


पिछले साल मतलब पिछली रात सोते ही ’सपन परियां’ आकर हमको स्वप्नलोक ले गयीं। जाड़े में घर और रजाई छोड़कर हमको कहीं जाना पसन्द नहीं। लेकिन वो हमको इत्ती शिद्दत से ले गयीं कि हम मना भी न कर पाये। आपको कैसे बतायें बस आप यह समझ लीजिये कि जैसे वो फ़ोन पर लोन दिलाने वाली जी मनुहार करती हैं न लोन के लिये अप्लाई करने के लिये उससे भी ज्यादा मनुहार करते हुये ले गयीं। बोली- ’आपके लिये ’स्पेशल सपने’ का ऑफ़र है। न्यू इयर की स्कीम चल रही है। आखिरी सपना बचा है। चलिये देख लीजिये।’
हम मना नहीं किये। कर भी नहीं पाये। हम क्या कोई भी कैसे मना कैसे कर पाता? आप भी नहीं कर पाते।
सपना देखने वाले की मजबूरी होती है कि जो दिखाया जाये उसे वह चुपचाप देख ले। सपनों में चुनाव नहीं होता।’मिड डे मील की तरह होते हैं’ सपने। जो परसा जाता है वो खाते हैं बच्चे। सपने में भी जो दिखाया जाता है वही देखना पड़ता है। सपने देखते हुये ही जिन्दगी गुजर जाती है जनता की। सपने न देखे, दिखायें जायें तो जीना दूभर हो जाये।
हम सोचे कोई मल्टीकलर मने बहुरंगी सपना होगा। चुनावी घोषणाओं जैसी अच्छी-अच्छी बातें होंगी। सपन सुन्दरियों के ठुमकेदार डांस-फ़ांस होंगे। हम आंखे मिच-मिचाते होते हुये सपने का इंतजार करने लगे। कुछ ऐसे जैसे तमाम जनता आज तक अच्छे दिन के इंतजार में पलक पांवड़े बिछाये बैठी है।
लेकिन सपना चालू होते ही हम सनाका खा जाये। हमारे हाल ऐसे हो गये जैसे ट्रम्प को जीतते देख हिलेरी समर्थकों के हुये होंगे। देखते क्या हैं कि हम फ़िर से कालेज पहुंच गये हैं। इम्तहान के दिन आ गये हैं। हम तैयारी में जुटे हुये हैं। तब तक पता चला कि एक विषय का इम्तहान तो हफ़्ते भर पहले ही हो गया। वह भी इतवार के दिन। मतलब उस विषय में फ़ेल होने के सुनहरे अवसर। हमारे हाल वैसे ही हो गये जैसे नोटबंदी में उप्र में तमाम राजनीतिक पार्टियों के हुये होंगे।
अब सपने में कुछ कर तो सकते नहीं। चुपचाप देखा पूरा सपना। जब जगे तो ’सपना घोटाला’ याद आया। मन किया कि सपने में वापस जायें। ’सर्जिकल सपना स्ट्राइक’ करते हुये ’सपन सुन्दरी’ को हड़कायें और कहें कोई बढिया सपना दिखाओ। वो वाला दिखाओ जो झील सी गहरी आंखों में देखा जाता है।
सुबह जब जगे तो बहुत देर सपने के फ़ेल होने के सदमें में बने रहे। फ़िर सुकून आया कि सच्ची में फ़ेल होने से बच गए। फ़ेल होने से बाल-बाल बचने से इत्ता सुकून मिला कि मन किया पनकी के हनुमान मन्दिर में जाकर प्रसाद चढा आयें। जैसे राजनीति में बातें भले ही विकास, काम-काज और अच्छे कामों की हो लेकिन चुनाव जीतने के लिये पैसा, बाहुबल और जाति समीकरण ही काम आता है वैसे ही विद्या की देवी भले ही सरस्वती मानी जायें लेकिन इम्तहान में पास कराने का काम बजरंगबली ही करते हैं।
प्रसाद चढाने की बात आते ही यह सवाल उठा कि सपने वाले इम्तहान में पास होने के लिये वास्तव में प्रसाद चढाना मान्य होगा क्या? क्या सपने यह भी कि 2016 के इम्तहान में पास होने के लिये 2017 में प्रसाद चलेगा क्या? सपने में कैशलेस चलता है कि सवा रुपये तकिये के नीचे धरकर सोयें आज?
अभी सोचे ही थे कि फ़िर नये साल के ’शुभकामना भंवर’ में ऐसा उलझे कि प्रसाद की बात भूल गये। प्राइम टाइम की बहस के बयानों की तरह हर तरफ़ से शुभकामनायें उमड़ी पड़ रहीं थी। शुभकामनाओं की बौछार में प्रसाद की बात ऐसे भूल गये जैसे मीडिया में छाये रहने वाले किसी मुद्दे को दूसरा मुद्दा उखाड़ फ़ेंकता है।
इस बीच टेलिविजन खुल गया। समाजवादी दंगल चल रहा है। पता लगा कि जिसको बचाना है उस पर कब्जा करना जरूरी होता है। यहां बचाने का मलतब बर्बाद करना भी होता है। यह बात महिलाओं, पार्टी और देश पर लागू होते दीखती है।
इस दंगल को देखते हुये लगा कि राजनीतिक नौटंकियों का उपयोग व्यवहारिक शिक्षा के लिये किया जाना चाहिये। समाजवादी पार्टी में लोगों को निकालने फ़िर वापस लेने के उदाहरण से प्रत्यावर्ती धारा को समझाया जा सकता है। नोटबंदी के द्वारा शून्य विस्थापन को समझाया जा सकता है।
नये साल में संकल्प लेने का काम भी करते हैं लोग। हमने पिछले सालों में जित्ते भी संकल्प लिये वे कभी पूरे नहीं हुये। इसलिये हमने इस बार कोई संकल्प नहीं लिया। वैसे सोचा यह भी कि कोई बेवकूफ़ी का काम करने का संकल्प ले लिया जाये। लेकिन फ़िर नहीं लिये इस डर से कि कहीं संकल्प पूरा हो गया तो मुंह दिखाने लायक न रहेंगे। कहीं कोई ऊंचनीच न हो जाये इसी डर से कोई संकल्प नहीं लिये। इसीलिये नये साल का पहला दिन बहुत चकाचक बीता।
अब रही बात नये साल में नये सवाल की तो सवाल ढेरों हैं। जैसे कि अच्छे दिन आने में कितने दिन बचे हैं, नोटबंदी के बाद देश के क्या हाल होंगे, एटीएम में पैसे कब आयेंगे, जाड़े में कितने लोग सर्दी से मरेंगे, कोहरे के चलते गाड़ियां कितनी देरी से चलेंगी, दिल्ली सरकार के नये राज्यपाल से सबंध कैसे रहेंगे आदि-इत्यादि।
सबसे ताजा सवाल तो यह है कि समाजवादी पार्टी में कल कौन कितने साल के लिये निकाला जायेगा?
लेकिन साल का सबसे बड़ा सवाल इस साल भी वही रहेगा जो पिछले साल था यानि कि कटप्पा ने बाहुबाली को क्यों मारा?
ये तो रहे हमारे हाल। आपके कैसे रहे हाल नये साल में?

Sunday, December 25, 2016

कमलेश पांडेय और उनका आत्मालाप हमारी नजर में



......और ये निपट गयी ’आत्मालाप’ भी।
साल के शुरु में 16 जनवरी, 16 को दिल्ली के पुस्तक मेले से खरीदी थी किताब। लेखक कमलेश पाण्डेय संग थे तो उनसे ’प्रिय बंधु अनूप शुक्ल जी को बहुत आदर के साथ’ लिखकर दस्तखत भी किये थे किताब में। वह हमारी पहली मुलाकात थी कमलेश जी से। शुरु-शुरु में आदमी मिलता है तो औपचारिकता में आदर करता ही है। बाद में असलियत जानकर व्यवहार करता है।
हमने सोचा था और ऐसी आशा भी की गयी थी हमसे कि हम जल्दी ही इसके बारे में कुछ लिखेंगे। लेकिन हम अभी तक इसे पूरी बांच ही न पाये थे तो लिखते क्या?
यह हमारी किताबों को पढ़ पाने की घटती गति को बताता है। कभी वे भी दिन थे कि किराये की दुकान से रोज एक किताब (छुटके उपन्यास) लाकर अगले दिन बदल लाते थे। आज हाल यह हैं कि 143 पेज की ’आत्मालाप’ बांचने में महीनों लग जाते हैं। वह भी तब जब इसे पूरा पढ़ने का पूरा मन हो। कभी-कभी लगता है कि महीने भर की छुट्टी लेकर कम से कम मित्रों की लिखी किताबें तो बांच लूं।
किताब के साथ मजेदार वाकये भी हुये। रोज साथ दफ़्तर ले जाते थे। एक दिन निकालकर कम्प्यूटर वाली मेज में धर ली। सोचा लंच-ब्रेक में पढेंगे। लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि न पढ पाये उस दिन। फ़िर सामने न दिखी तो पढी न गयी। फ़िर अभी दो-तीन दिन पहले सोचा कि आज तो पूरी बांचकर ही सोयेंगे। लेकिन किताब मिली नहीं। हम सब जगह खोजे लेकिन नदारद। फ़िर याद आया कि दफ़्तर की कम्प्यूटर की मेज पर धरी थी। परसों देखे तो वहीं बेचारी नीचे उल्टे मुंह औंधे पड़ी थी। भौत गुस्सा आया खुद पर कि मुफ़्त में मिली हो तब तो कोई बात नहीं लेकिन खरीदी हुई किताब की इत्ती बेइज्जती तो ठीक बात नहीं न !
कल गाड़ी का बम्पर बनवाना था। किताब साथ में ले गये। गैरेज में पता चला कि पुराना बम्पर भी लाना होना होगा। हम घर आये। बम्पर ले गये। करीब घंटा भर लगा इस सबमें। फ़िर याद आया कि किताब तो गैरेज के शो रूम की मेज पर ही धरकर भूल गये। देखा तो किताब मेज पर जस की तस धरी थी। मतलब किसी ने उसको उलटकर देखा भी न था।
ये जो किताब पढने में हीला-हवाली का हम इत्मिनान से वर्णन कर रहे हैं न उसको अब सोचते हैं उपयोग भी कर लें। तो हम यह कहना चाहते हैं कि कमलेश पांडेय व्यंग्य लेखक कैसे हैं उस पर अपना मत बतायेंगे ही लेकिन उनकी किताब बांचकर यह कहने में कोई संकोच नहीं कि वे बहुत आलसी लेखक हैं। आलोक पुराणिक जैसे ’व्यंग्य के आधुनिक कारखाने’ कि संगत में रहते हुये भी उनके व्यंग्य लेखन की गति कुटीर उद्योग से भी कम है। वो तो भला हो कि ’व्यंग्य विधा’ का कोई सर्वमान्य अखाड़ा होता तो हम उनकी इस लेखन कंजूसी की शिकायत करके उनके खिलाफ़ हफ़्ते में कम से कम एक व्यंग्य लेख का फ़तवा तो जारी करवा ही लेते।
काबिलियत होते हुये भी अल्प लेखन से इस बात का सुराग मिलता है कि बंदे का जीवन (पारिवारिक और व्यक्तिगत) खुशहाल टाइप है और बंदा बेचैन तो कत्तई न है!
’आत्मालाप’ तीसरा व्यंग्य संग्रह है कमलेश जी का। भावना प्रकाशन से आया 2016 में। इसके पहले बाइसवीं सदी का विश्वविद्यालय(1999) और तुम कब आओगे अतिथि (2011) प्रकाशित हो चुके हैं। वे दोनों ही हमने बांचे नहीं हैं। अब जुगाड़ेंगे अगले साल में बांचने के लिये।
सुशील सिद्धार्थ और सुभाष चंदर की भूमिका और फ़्लैप टिप्पणी सहित ’आत्मालाप’ में कुल जमा 32 लेख हैं। अधिकतर लेख तसल्ली वाली मनस्थिति में लिखे हुये हैं। दो चार व्यंग्य लेख हालिया तरह अखबारी आपाधापी लेखन के आकार में हैं। शुरुआती लेख पढने पर मुझे लगा कि कमलेश पाण्डेय का व्यंग्य लेखन जुमले फ़ेंककर फ़ूट लेने वाली मुद्रा से मुक्त लेखन है। पहले हमने इसे धारणा भी बनाई कि अरे इनके लेखन में ’पंच’ तो अल्पसंख्यक हैं। जब मैंने यह सोचा उसी के आसपास मेरी मुंड़ी पर यह विचार हावी था कि व्यंग्य लेखन में पंच में कमी उसके कमजोर होने की निशानी है। लेकिन जब बाद के लेख पढे तो पंच भी मिले और खूब मिले।
कमलेश पांडेय का व्यंग्य लेखन कथा तत्व से भरपूर है। जबरियन पंच भर्ती करने के लिये उसमें कथात्मकता से छेड़छाड़ नहीं की गयी। भाषा के लिहाज से पढे-लिखे होने का सबूत देती हुई प्रांजल भाषा। शुद्ध । तत्सम ! ज्ञान जी की ’मरीचिका’ घराने की । विषय आसपास के रोजमर्रा के जीवन में होने वाली घटनाओं से लिये हुये। अंदाज-ए-बयां भले धीर-गंभार टाइप दिखे और लगे कि बन्दा अधुनिक जीवन की घपलेबाजी से परिचित न होगा लेकिन यह भ्रम धारण करने वाला जब उनके लेख बांचता है तो उसको इहलाम होता है जिस स्कूल में उसने पढाई की है उसके हेडमास्टर रह चुके हैं व्यंग्यकार महोदय।
लफ़्ज पत्रिका (और बाद में साहित्यम) के संपादक मंडल से जुड़े रहने के चलते हुये अनुभवों की बानगी उनकी लेखकों से जुड़े व्यंग्यों में मिलती है जिनमें उन्होंने पूरी इज्जत के साथ इस प्रवृत्ति की छीछालेदर की है।
’मुक्ति’ में उन्होंने आज के समय में किताबों की स्थिति पर खूबसूरत चर्चा की है।
’आत्महत्या’ जैसे विषय पर व्यंग्य लेखन हिम्मत का काम है। इसमें लिखते हैं कमलेश जी:
“आत्महत्या के प्रेरक तत्वों पर ध्यान दें तो हमारे देश की हर संस्था में वे भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं. इस प्रेरणा का ऊर्जा-केंद्र देश की समृद्ध राजनीतिक परंपरा में मौजूद है. जब भी आपकी श्रद्धा हो इस ज्योति-पुंज से प्रेरणा लेकर एक अदद सुसाईड नोट तैयार करें और आत्महत्या संपन्न कर लें. ध्यान रखें कि ये मात्र प्रयास न हो, क्योंकि अगर चूक हुई तो भारतीय दंड विधान में लपेटे जायेंगे जो आत्महत्या से ज़्यादा कठिन सिद्ध होगा.”
आत्महत्या के लिये प्रेरित करने वाले तत्वों को पहचानने के बाद वे आह्वान करते हैं-”अपनी हत्या स्वयं सम्पन्न करने की बजाय आपकी हत्या का षडयन्त्र कर रही शक्तियों के सुराग ढूंढें , उन्हें बेनकाब करें और बस में हो तो स्वयं की जगह उन्हें ही फ़ांसी पर लटकायें।“
शिक्षा व्यवस्था, मिड डे मील और इसी तरह की घाल मेल वाली योजनाओं की झांकी संस्कृतनिष्ठ भाषा में दिखाते हुये अपने लेख ’काग चेष्टा, बको ध्यानं, बैल प्रवृत्ति’ में लिखते हैं:
“कल ही आये नये आदेश में तो अति है। ग्राम में कितने तड़ाग हैं और कितनी पगडंडियां ? यों नियमित चल रही ढोर-डंगरों की की गणना में भी क्या तर्क संगत है। क्या पशुओं से जिज्ञासा करते फ़िरें कि तुम्हारे सींग कितने हैं, और दिन भर में कितना गोबर करते हो? कभी आर्थिक जनगणना और तो कभी बौद्धिक, कभी मूढमतियों की गणना तो कभी मति-भ्रष्टों की, समझ में नहीं आता कि सम्राट चाहते क्या हैं? और चाहते भी हैं तो हम शिक्षकों से ही क्यों चाहते हैं -निहिरानंद किसी मधुमक्खी की तरह भुनभुनाये।“
’डीडी त्रिशंकु पर’ पढते समय यह एहसास लगातार बना रहा कि यह परसाई जी की रचना ’इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ से प्रभावित होकर लिखी गयी लेकिन कुछ पंच बहुत धांसू हैं:
“कैडर प्रशासन की वह दीक्षा है जो एक सरकारी नौकर को आदमी का चोला उतारकर सच्चा प्रसाशनिक अधिकारी बनाती है।“
इससे अपनी नौकरशाही शामिल होते ही आदमी में होने वाले बदलाव की झांकी दिखाई गयी है। लेखक जब यह लिखता है तो बता देता है कि विकास के ताम-झाम की असलियत उसको पता है:
“विकास की खासियत ही है उसका होना किसी की नजर में न आये, जिसका होना बाकी है वो भी सर खुजाये और जिसका हो चुका वह भी। इस बीच विकास प्रोजेक्ट में लगे लोगों का विकास अपने आप हो जाये।“
”प्रोत्साहित होती हिन्दी’ में जब कमलेश पाण्डेय लिखते हैं, “इस युग में किताबें पढी जाकर नहीं बल्कि अपना मूल्य दूना-चौगुना पाकर सार्थक होती हैं।“ तो यह बात उनकी किताब के दाम के संबंध में लागू होती है जिसकी 143 पेज की कीमत 350 रुपये रखे हैं प्रकाशक ने। मतलब लेखक सच कहने में खुद को भी नहीं बख्शता है। बहुत निर्मम व्यंग्य लेखक है भाई !
’आत्ममुग्ध हम’ में कवितागीरी, गद्यगीरी करते हुये व्यंग्य के आंगन में फ़ांद पड़ने वाले लेखक सजीव वर्णन पढकर लगता है कि कमलेश पांडेय जितने शरीफ़ दिखते हैं खुराफ़ाती भी उससे कम नहीं हैं। व्यंग्य लेखन से जुड़े हुये जिस लेखक का नाम जेहन उभरता है उसको लिखकर कमलेश जी से पूछने का मन है कि क्या उनके ही बारे में लिखा है?
’आत्मालाप’ लेख जो कि इस व्यंग्य संग्रह का शीर्षक भी है में एकदम अलग तरह की भाषा प्रयोग की गयी है। प्रवाहयुक्त मने फ़र्राटेदार हिन्दी। मुझे लगता है कि यही भाषा कमलेश जी को आगे भी प्रयोग करनी चाहिये।
’मेरी राजनीतिक समझ’ में जब वे लिखते हैं:
“यहां बताता चलूं कि मैं बिहार से हूं जहां तन पर लंगोट ही भर हो तो भी उसमें राजनीति की पुडिया बांधे रहता है। बल्कि मुंह में हमेशा एक मुस्तैद जुबां भी रखता है जिसको धार देती हुई एक चुटकी राजनीति अगल-बगल ही खैनी की तरह दबी रहती है। आप पूछ भर तो कि मुद्दा क्या है?”
तब लगता है कि वे यह बात अपने व्यंग्य लेखन के बारे में भी अनजाने में लिख रहे हैं। व्यंग्य लेखन के हल्ला मचाऊ और इनाम झपटाऊ दौर में कमलेश पांडेय सब पहलवानों की गतिविधियों पर चुपचाप लेकिन सटीक नजर रखते हुये तसल्ली वाले ’मृदु मंद-मंद मंथर मंथर’ लेखन में अपने सहज आलस्य की मधुर तान के साथ जुटे रहते हैं।
जब मैंने आत्मालाप बांचना शुरु किया था तब तक मुझे लगता था कि ऐसे-वैसे टाइप के ही लेखक हैं कमलेश पांडेय जिनकी तीन किताबें आ चुकी हैं। लेकिन किताब को एक बार बांचकर खतम करने के बाद उनकी लेखकीय इमेज में गुणात्मक सुधार हुआ और हमको पता लगा कि कमलेश पाण्डेय बढिया इंसान ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन व्यंग्यकार भी हैं।
इस बढिया इंसान और बेहतरीन व्यंग्यकार के ’काम्बो पैकेज’ में एक खामी है तो यह कि वे नियमित लेखन से परहेज करते हैं। यह अच्छी बात नहीं है। ऐसा करके वे अपने साथ और व्यंग्य लेखन के साथ भी अन्याय करते हैं। आशा है कि वे अपने द्वारा किये जा रहे इस अल्प लेखन की शिकायत को दूर करेंगे और विपुल व्यंग्य लेखन करेंगे।
कमलेश जी को खूब सारी शुभकामनायें देते हुये कामना करता हूं कि ’आत्मालाप’ के अपने परिचय में उन्होंने पुरस्कार या सम्मान के आगे जो ’कोई नहीं’ लिखा है आने वाले समय में इस ’कोई नहीं’ की जगह कई इनामों का जिक्र हो। वे इसके सर्वथा काबिल पात्र हैं यह कहने में मुझे कत्तई संकोच नहीं।

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दिसंबर में देश

दिसम्बर के महीने में कम्बल में बैठे-बैठे देश के हाल बयान करना ऐसा ही है जैसा दिल्ली में खड़े-खड़े कन्याकुमारी के सूर्योदय की रनिंग कमेंट्री करना। लेकिन जब बयाना लिया है तो बयान तो करना ही पड़ेगा न!
दिसम्बर का महीना आ गया। साल बीतने को आया। सर्दी भी पड़ने लगी। जगह-जगह मूंगफ़ली के ठेले लग गये। कहीं-कहीं फ़ुटपाथ पर मूंगफ़ली के पिरामिड बने दिख रहे हैं। उन पिरामिडों के पीछे आलथी-पालथी मारे बैठा दुकानदार ग्राहक के इंतजार में पलक पांवड़े बिछाये बैठा है। बोहनी का इंतजार है उसको। अभी तक कैशमशीन नहीं लगवाई है अगले ने।
घरों में चाय की खपत बढ गयी है। बाहर से घर के अन्दर घुसता हुआ हर शख्स रजाई की तरफ़ लपकता हुआ ’जन्नत अगर है कहीं तो यहीं है, यहीं है, यहीं है’ का चलता फ़िरता इश्तहार लगता है।
कोहरे का जलवा बढ रहा है। पहाड़ पर तापमान शून्य के नीचे गुलाटियां खा रहा है। कानपुर में उतरने वाला हवाई जहाज लखनऊ में उतरता है। ऐसे जैसे कि अफ़गानिस्तान में अमेरिकी के ड्रोन भटककर निशाने से मीलों दूर गिरते थे । अंधेरे में दिखा नहीं होगा। भौत तेज स्पीड से उतरा होगा। कानपुर में रुकते-रुकते राजधानी पहुंच गया। “भैंस बियानी में गढ़ महुबे में पड़वा गिरा कनौजे जाय” की तरह ।
कोहरे के कारण ही शायद रिजर्व बैंक से निकले नोट भटककर एटीएम की जगह लोगों की तिजोरियों , तहखानों में पहुंच गये। दोष बेचारे बैंकरों और बिचौलियों को दिया जा रहा है।
ट्रेनें एक दिन बाद स्टेशन पहुंच रही हैं। पहिये को पटरी सूझती नहीं होगी। टटोल-टटोलकर आगे बढती होगी रेल पटरी पर। सड़कों पर गाड़ियां कोहरे के झांसे में आकर गले मिल रही हैं।
वैसे तो दिसम्बर हर साल आता है लेकिन इस बार कुछ अलग ही तरह आया है। नोटबंदी ने आम आदमी का ’नोटों से ब्रेकअप’ के कराकर बवालों से ’हुकअप’ करा दिया है। हर समस्या की गाड़ी नोटबंदी की पार्किंग में जाकर खड़ी हो जाती है। नोटबंदी की आफ़त के चलते ही सर्दी भी शायद अभी तक अपने साथ केवल कोहरे को साथ लेकर आई है। ठिठुरन, गलन, मरन, शीतलहरी आदि को छोड़ आई आई है। पता नहीं क्या बवाल हो जाये बिना नोटों के।
कोहरे की आड़ में नकली नोट असली नोटों के गले में हाथ डालकर रिजर्व बैंक में जमा हो गये हैं। काला धन और काला होकर नोटों के बीच मुंड़ी घुसाकर छिप गया है। नकली नोट असली नोटों के साथ इस कदर गड्ड-मड्ड हो गये हैं जैसे ईमानदारी के साथ काहिली और गैरजिम्मेदारी। दोनों को अलग करना मुश्किल हो गया है।
सांता बेचारे के बुरे हाल हैं सर्दी में। नोटबंदी के चलते लोगों को बांटने के लिये उपहार खरीदने में समस्या हो रही है उसको । उसके पास रखे सारे पुराने नोट कागज के टुकड़े में बदल गये। दुनिया भर के लोगों को दो हजार रुपये में कित्ते उपहार बांटेगा भाई कोई।
लेकिन सुबह होते ही सूरज भाई ने कोहरे का सर्जिकल करके उसको तिड़ी-बिड़ी कर दिया है। सूरज की किरणें चप्पे-चप्पे पर पसर गयीं हैं। मौसम किसी नोट भरे एटीएम सा सुहाना हो गया है। साल का आखिरी इतवार इस दुविधा में आधा बीत गया है कि पहले साल की यादों का हिसाब करें कि नये साल के संकल्प का चुनाव किया जाये। दोनों एक-दूसरे पहले आप, पहले आप कहते हुये समय को मूंगफ़ली की तरह टूंगते हुये बिता रहे हैं।
हम दिसम्बर में देश के हाल देखने के लिये सड़क पर आते हैं। एक आदमी बीच सड़क लम्बवत लेटा हुआ है। धूप-छांह की सीमा रेखा पर लेटा हुआ आदमी नशे में है। उसको उठाने की जो भी कोशिश करता है उसको वो गरियाने लगता है। दरबानों को गरियाते , मां-बहन की गालियां देते हुये हड़काता है- ’तमीज से बात करो, तुम पब्लिक सर्वेंट हो।’ गालियों में वजन लाने के लिये देश के प्रधानमंत्री को भी शामिल कर लेता है। दरबान हंसते हुये उसके नशे के उतरने का इंतजार करते हैं। कहते हैं -’इसका तो रोज का यही धंधा है।’
हर समस्या की एक सेल्फ़ लाइफ़ होती है। उसके बाद समस्या अपने-आप खत्म हो जाती है। नयी समस्या को जगह देने के लिये दुकान बढाकर चल देती। देश की हर बड़ी समस्या का इलाज इसी अचूक मंत्र से संभव है !
वहीं मैदान पर दूर तमाम पेड़ कोहरे की चादर ओढे खड़े हुये हैं। झाड़ियों-झंकाड़ के बीच बाकी बचे मैदान में पसरी हुई धूप में टेंट हाउस के रंग-बिरंगे शामियाने सूख रहे हैं। अनगिनत रंग बिखरे हैं कायनात में। इन जैसे ही रंगों को मिलाकर देश का रंग बन रहा है। अपन के इधर तो ’दिसम्बर में देश’ ऐसा ही बहुरंगी धज में दिख रहा है।
आपके उधर कैसा दिख रहा है 'दिसम्बर में देश'?

Saturday, December 24, 2016

सड़क पर सांड़

ये फोटो विजयनगर का है। सड़क के दोनों तरफ फल की दुकानें हैं। 'अतिक्रमण हटाओ' के चलने पर फुटपाथ दिखने लगती है। दुकाने हट जाती हैं।
ये सांड भाई अपनी मुंडी प्लास्टिक की डलिया में घुसाये कुछ खा रहे हैं। शायद कुछ फल हों और उसके छिलके भी। क्या पता प्लास्टिक भी उदरस्थ कर रहें हो कुछ अनजाने में। मुफ़्त के माल में वायरस तो आएगा ही न।
सांड की फोटो खींचते हुए देखे वहीं पर एक ठेलिया पर फल बेचने वाला नोट गिन रहा था। नोटबंदी के समय खुलेआम , सरे-सड़क किसी का नोट गिनना अपने में दुर्लभ घटना है। लेकिन उसका फोटो हम लिए नहीं। क्या पता कोई छापा मारने पहुंच जाए कि इत्ते नोट आये कहां से।
वहीँ दो बच्चियां एक-दूसरे के कन्धे में हाथ धरे 'पक्की सहेली-मुद्रा' में सामने से आती दिखीं। हमने उनका फोटो लेना चाहा तो दोनों बड़ी तेज भागी। ऐसे जैसे जरीबचौकी क्रासिंग पर माँगने वाले बच्चे मोबाईल कैमरा देखकर तिड़ी-बिड़ी हो जाते हैं। भागकर दूर से वे हमको छिपकर देखती रहीं। गोया हम कोई 'खतरा टाइप' आइटम हों।
उनको ऐसे हमसे बचते देखकर ख्याल आया कि क्या पता कल कोई जनप्रतिनिधि किसी गाँव जाए और जनता उसको देखकर अपने गाँव से भागकर ऊसर-बीहड़ में छिप जाए कि कहीं नेता कुछ भला न कर जाए। कोई समाज सेवा न कर डाले। हो तो खैर इसका उल्टा भी सकता है कि जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की जनता को देखकर फूट ले कि कहीं जनता उसके कामों का हिसाब न माँगने लगे।
है कि नहीं ?