Sunday, February 19, 2017

'व्यंग्य श्री सम्मान -2017' रपट -4



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कार्यक्रम की शुरुआत हुई। गोविन्द व्यास जी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। रोचक अंदाज में सबके बारे में जानकारी देते हुये फ़ूल-माला पहनवाये। पुष्पगुच्छ दिये। सबसे अंत में नीरज बधवार को गुलदस्ता देते हुये मंच के संचालन की जिम्मेदारी सौंप दी।
Neeraj Badhwar ने कार्यक्रम का शानदार संचालन किया। मजे भी लिये सबसे। सबसे अच्छा पुण्य का काम किया कि श्रीमती आलोक पुराणिक ( Aparna Puranik ) और श्रीमती ज्ञान चतुर्वेदी जी को मंच के पास बुलाकर पुष्पगुच्छ दिलाये ( मंच पर बुलाकर देते तो और अच्छा रहता)। इसके बाद नीरज ने आलोक पुराणिक की माता जी श्रीमती रजनी पुराणिक के सम्मान में श्रोताओं से तालियां बजवाईं। आलोक पुराणिक की माता जी आ नहीं पाईं थीं। आलोक जी के व्यक्तित्व निर्माण में उनका बहुत बड़ा योगदान है। अपना पहला व्यंग्य संकलन ’नेकी कर अखबार में डाल’ आलोक जी ने अपनी माताजी को ही समर्पित किया है।
नीरज बधवार ने बताया कि जब आलोक पुराणिक मात्र आठ वर्ष के थे तब उनके पिताजी विदा हो गये थे। मुझे आलोक पुराणिक के पिता जी के कम उमर में निधन की बात पता थी। इसके अलावा जानकारी नहीं थी। लिखत-पढत की दुनिया में वर्षों तक जुड़े रहने के बाद भी हम लोग एक-दूसरे के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कितना कम जानकारी रखते हैं।
आलोक पुराणिक के इस बारे में बात करते हुये पता चला कि उनके पिता श्री शंकर पुराणिक बहुत मस्त तबियत के इंसान थे। सेना में शार्ट सर्विस कमीशन वाली नौकरी से रिटायर होने के बाद सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी करते थे। वायलिन और बांसुरी बजाने का शौक था। (शायद सेना में नौकरी के चलते) सिगरेट पीने का शौक था। चेन स्मोकर थे। मात्र 36 साल की उमर में दिल के दौरे से आगरा में निधन हो गया।
पिता के निधन के बाद माता जी को उनकी जगह बैंक में नौकरी मिल गई। उन्होंने आलोक पुराणिक और उनकी दीदी को पाल-पोसकर बड़ा किया। मात्र आठ साल की उमर में पिता को खो देने वाले आलोक पुराणिक का शुरुआती जीवन कैसा संघर्षमय रहा होगा इसका अंदाज लगाया जा सकता है।
पिता के कम उमर में दिल के दौरे के निधन की याद आलोक जी के मन में इतनी गहरी है कि वे स्वास्थ्य के प्रति बेहद सजग हैं। पिछले साल अपना वजन 20-25 किलो कम किया। अब भी जब कभी बात होती है तो अक्सर पार्क में टहलते हुये पाये जाते हैं।
मुझे याद है जब करीब छह-सात साल पहले पहली मुलाकात हुई थी हमारी कानपुर में आलोक पुराणिक से। वे अपना शायद जागरण संस्थान में व्यंग्य पाठ करने आये थे। कार्यक्रम के बाद हम उनको उठाकर घर ले आये। घर आते हुये कुछ समस्या लगी तो हम लोग घर आने के पहले अपने अस्पताल पहुंचे। ईसीजी-फ़ीसीजी हुआ। हार्ट-टेस्टिंग-ओके के बाद घर आये। उस समय अम्मा थीं। बाद में जब भी बात हुई तो आलोक पुराणिक ने माताजी के बनाये लड्डू के स्वाद का जिक्र अवश्य किया।
आलोक पुराणिक के लेखन पर फ़िदा होने वाले साथियों को उनकी स्वास्थ्य के प्रति सजगता से भी सीख लेनी चाहिये।
अगली पोस्ट में संबोधन सुभाष चन्दर जी का Subhash Chander

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Saturday, February 18, 2017

'व्यंग्य श्री सम्मान-2017' की रिपोर्ट-3


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इस बीच और लोग आते रहे। आलोक पुराणिक सबसे लपककर मिलते रहे। पता चला ज्ञान जी भी आ गये। आकर ज्ञान जी चाय के कंटेनर के पास खड़े होकर लोगों से बतियाने लगे। सब लोग उनके साथ फ़ोटो खिंचवाने के लिये और हो सके तो बतियाने के लिये लपके।
आलोक पुराणिक मिले ज्ञानजी से तो जुड़े हुये हाथ ज्ञानजी की तरफ़ करके कई बार हिलाये। जैसे बड़े-बड़े लोग हाथ मिलाते हुये काफ़ी देरतक हिलाते रहते हैं ताकि फ़ोटो ग्राफ़र लोग फ़ोटो खैंच लें। लेकिन हम इस बीच उधर से लपककर आते सुभाष चंदर जी को आते हुये और सीधे अन्दर हाल में गोली की तरह (बेहतर होगा लिखना -व्यंग्य में पंच की तरह) घुसते हुये देखने में व्यस्त हो गये। सुभाष जी घुसते हुये सर पर हाथ फ़ेरते जा रहे थे। शायद सर के बचे बालों को प्यार से सहलाते हुये कह रहे हों -अबे जरा आराम से रहना। फ़ोटो का मामला है।
अन्दर जिस मंशा से गये होंगे शायद वह पूरी न हो पायी इसलिये जितनी तेजी से गये थे अन्दर उससे दोगुनी तेजी से आलोक जी बाहर आये। चाय और नाश्ते के पैकेट पर कब्जा किया और हम लोगों के साथ जुड़ गये।
इस बीच हरीश नवल जी भी धीर-गम्भीर चाल से चलते हुये वहीं आ गये। सबके साथ फ़ोटो खिंचवाते हुये वे ज्ञानजी के गले मिले। हमें लगा कि कुछ देर में शायद प्रेमजी भी आयेंगे। लेकिन बाद में पता चला कि अपने एक मित्र के गम्भीर रूप से बीमार होने और अस्पताल में भर्ती होने के चलते वे आ न पाये।
हरीश नवल जी ने फ़ुल मोहब्बत से हमारे द्वारा लिये आलोक पुराणिक के इंटरव्यू की बड़ी सी तारीफ़ करते हुये हम लोगों से कहा - ’जो तारीफ़ की हमने टिप्पणी में वो आपस में बराबर-बराबर बांट लेना।’ 
व्यंग्य जगत के सिद्ध लेखकों से बतियाते हुये फ़ोटोग्राफ़ी भी होती रही। हमने संतोष त्रिवेदी के कुछ फ़ोटो खैंचे तो उन्होंने मेरे से कैमरा खींचकर मेरे भी फ़ोटो खैंचकर बदला चुकाया। मेरे फ़ोटो अच्छे नहीं आये। इस तरह संतोष त्रिवेदी ने फ़ोटोग्राफ़ी के मामले में भी मेरे विश्वास की रक्षा की। एक तरह से उन्होंने साबित भी कर दिया कि फ़ोटोग्राफ़ी और लेखन में उनका समान अधिकार है।
इस बीच ज्ञान जी ने बातचीत करते हुये हमारे अट्टहास में छपे लेख की तारीफ़ की। मोबाइल पर आधारित उस लेख की तारीफ़ सुनकर बहुत अच्छा लगा। ज्ञानजी की तारीफ़ किया हुआ लेख समझ सकते हैं कितना अच्छा होगा। 
उनकी तारीफ़ सुनकर मन किया कैमरा छोड़कर सबसे पहले यही स्टेटस लगायें फ़ेसबुक पर कि ज्ञानजी ने हमारे लेख की तारीफ़ करी है। लेकिन फ़िर लगा फ़ोटोग्राफ़ी रह जायेगी। आलोक पुराणिक बुरा मान जायेंगे। इसलिये दिल पर पत्थर रख लिया।
हमने ज्ञान जी से उनके नये उपन्यास ’पागलखाना’ के बारे में पूछा -’आपका उपन्यास पागलखाना कब तक आयेगा?’
इस पर ज्ञानजी ने,- ’( हिन्दी वर्णमाला के मासूम अक्षरों च, त, य और प के साथ समुचित मात्राओं के गठबंधन से बनने वाले शब्द को उच्चरित करते हुये जिसका शरीफ़ मतलब चकल्लस होता है) कहा अगर इसी तरह के चकल्लस में पड़े रहे तो कभी नहीं आयेगा।’
यह कहते हुये ज्ञानजी अपनी जीभ हल्के से दांत से दबा ली। हमारा मन हुआ कि कहें कि हम व्यंग्य यात्रा में अभी तक लिखते नहीं और आपके बारे में संस्मरण तो सुशील जी लिख रहे हैं। इसलिये आप समझिये हमने कुछ सुना नहीं। लेकिन हमें यह लगा कि कहीं बेचारे आयोजन के दूल्हा आलोक ने यह न सुना/देखा हो। बेचारे सदमें मे आ जाते। लेकिन आलोक पुराणिक को हम लोगों से एक फ़ुट की दूरी पर लोगों को मुस्कराते हुये नमस्ते करते देखकर आश्वस्त हो गये।
पता नहीं कहां से बात चली शायद संतोष त्रिवेदी ने छेड़ी या मैंने पर ज्ञानजी ने कहा- ’हम जल्दी ही एक लेख लिखेंगे जिसका शीर्षक होगा -देवता होने के खतरे।’
ज्ञानजी को हमारे कुछ साथी व्यंग्य का देवता मानते हैं और प्रचारित भी करते हैं। ज्ञानजी अक्सर ही चुप रहते हैं। अपने प्रति लोगों का प्रेमप्रदर्शन मानकर। लेकिन अपन इस अभियान के सख्त खिलाफ़ हैं क्योंकि जबसे हमने परसाईजी को पढा है तब से देवताओं के बारे में बड़ी खराब धारणा बन गयी है। बकौल परसाई जी - ’देवताओं का काम निठल्ले पड़े रहना और मौके-बेमौके पुष्पवर्षा करना है। जय-जयकार करना हैं।’ लेकिन अपने ज्ञानजी तो ऐसे कत्तई नहीं हैं। ज्ञानजी तो हमारे समय के सबसे कर्मठ और सर्वेश्रेष्ठ व्यंग्यकार हैं। आलोक पुराणिक तो 1990 के बाद के व्यंग्य को ’ज्ञान चतुर्वेदी युग’ बताते हैं। यह काम देवताओं का नहीं है। इसलिये हम हमेशा इस मुहिम के खिलाफ़ आवाज भी उठाते हैं क्योंकि हमें लगता ज्ञान जी देवता के रूप में पूजे जाने की वस्तु नहीं हैं। सबके प्यार और सम्मान के हकदार हैं।
देवताओं के हाल क्या होते हैं यह नंदन जी एक कविता के अंश में देखिये:
"दुनिया बड़ी माहिर है
आदमी को पत्थर बनाने में
अजब अजब तरकीबें हैं उसके पास
जो चारणी प्रशस्ति गान से
आराधना तक जाती हैं
उसे पत्थर बना कर पूजती हैं
और पत्थर की तरह सदियों जीने का
सिलसिला बनाकर छोड़ जाती हैं।
अगर कुबूल हो आदमी को
पत्थर बनकर
सदियों तक जीने का दर्द सहना
बेहिस,
संवेदनहीन,
निष्पंद……
बड़े से बड़े हादसे पर
समरस बने रहना
सिर्फ देखना और कुछ न कहना
ओह कितनी बड़ी सज़ा है
ऐसा ईश्वर बनकर रहना!"
बहरहाल यह सब बस ऐसे ही लिखा। ज्ञान जी ने अपने वक्तव्य में कहा था -"अगर आप व्यंग्यकार हैं तो आप में सच बोलने की कुटेव तो होगी। आप ठकुर सुहाती नहीं कर सकते।"
तो हम भले ही व्यंग्यकार न माने जाते हों लेकिन कुछ सच बोलने की कुटेव तो अपन में है।
सुभाष जी ने भी इस बतकही के मजे लिये। बतियाते हुये कार्यक्रम का समय हो गया तो सभी हाल की तरफ़ गम्यमान हुये।
आगे के किस्से अगली पोस्ट में
संबंधित कड़ियां:
1. ज्ञान जी का वक्तव्य https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210583105987329
2. आलोक पुराणिक का इंटरव्यूhttps://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210543919247685


https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210598254646036

'व्यंग्य श्री सम्मान-2017' की रपट-2

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जैसे-जैसे समय होता गया लोग आते गये। हाल के बाहर की जगह भरती गयी। लोग चाय-नाश्ता करते हुये सम्मान समारोह शुरु होने का इंतजार करते रहे। आलोक पुराणिक लोगों से मिलकर उनके आने का शुक्रिया और इनाम मिलने में उनकी शुभकामनाओं का शुक्रिया अदा करते रहे। जो लोग आते रहे उनसे और लोगों को भी मिलवाते रहे। कुछ इस लिये कि लोग जान लें एक दूसरे को लेकिन बहुत कुछ यह दिखाने के लिये कि -- ’देख लो तुम्हीं एक अकेले नहीं हो। इत्ते बड़े-बड़े लोग आये हैं बधाई देने के लिये।’
पता चला सन्नी लियोनी, राखी सावंत और मल्लिकाजी का भी आने का था लेकिन वे सब सूटिंग में व्यस्त होने के चलते नहीं आ पाईं। उन्होंने यह भी कहा-’आलोक जी आप तो एक बार में ही लेख फ़ाइनल कर लेते हो लेकिन यहां ये डायरेक्टर लोग बार-बार रिटेक करवाते हैं। भले ही फ़ाइनल पहली वाली शूटिंग ही करें। बहुत बदमाश हैं सब। लेकिन क्या करें, करना पड़ता है। पेट के लिये सब करना पड़ता है।’
वहीं समान्तर कोश के रचायिता Arvind Kumar जी से भी मिलने का सुयोग हुआ। समान्तर कोश हिन्दी का पहला थिसारस है। थिसारस भी एक तरह का शब्दकोश होता है क्योंकि इसमें शब्दों का संकलन होता है। वास्तव में थिसारस या समांतर कोश और शब्दकोश एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हैं। किसी शब्द का अर्थ जानने के लिये हम शब्दकोश का सहारा लेते हैं। लेकिन जब बात कहने के लिये हमें किसी शब्द की तलाश होती है, तो लाख शब्दों के समाए होने के बावजूद शब्दकोश हमें वह शब्द नहीं दे सकता, जब कि थिसारस यह काम बड़ी आसानी से कर सकता है।
हिन्दी में पहला थिसारस अरविन्द कुमार जी और उनकी पत्नी कुसुम कुमार जी ने मिलकर बनाया। इस काम के लिये माधुरी के सम्पादक की नौकरी छोड़ी। 20 साल काम किया। अपने साधनों से काम करने लेखकद्वय के पास न तो कम्प्यूटर खरीदने के पैसे थे, न उस पर काम के लिये पेशेवर प्रोग्रामरों से प्रोग्राम लिखवा पाने के। इनके बेटे सुमीत ने पेशे से शल्यचिकित्स्क होते हुये भी अपने माता-पिता के उद्देश्य के प्रति निष्ठा से प्रभावित होकर इस कार्य में सहयोग के लिये कम्प्यूट्रर प्रोग्रामिंग सीखी, कंप्यूट्रर खरीदवाया, काम की कार्यविधि ( प्रोग्राम) लिखी, उसे चलाने के लिये आर्थिक संसाधन जुटाये और अंत में डाटा को पाठ में परिवर्तित करने की पेचीदा प्रक्रिया का विशिष्ट समाधान भी निकाला। बिना कंप्यूटरीकरण के समांतर कोश का बनना शायद संभव नहीं हो पाता।
20 वर्षों के अनथक प्रयासों और समर्पण से अंतत: समांतर कोश का निर्माण संभव हुआ और स्वतंत्रता दिवस की स्वर्णजयंती के अवसर पर प्रकाशित हुआ।
समान्तर कोश के बारे में और जानने के लिये मेरा 11 साल पहले लिखा गया लेख बांचिये इस कड़ी पर पहुंचकर http://www.nirantar.org/1006-nidhi-samantar-kosh
समान्तर कोश के रचयिता से मिलने का यह पहला मौका था। उनसे मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई। आलोक पुराणिक के लाख टके के इनाम मिलने के मौके पर मुझे भी लाख टके का सुख अरविन्द जी से मिलने का मिल गया। पता चला कि आलोक पुराणिक के घर के पास ही रहते हैं अरविन्द जी। 87 साल की उमर में उनकी चुस्ती-फ़ुर्ती और सक्रियता देखकर ताज्जुब होता है। फ़ेसबुक पर भी नित नयी जानकरी भरी पोस्ट लिखते रहते हैं। उनसे मिलने का भी तय हुआ।
वहीं कार्टूनिस्ट इरफ़ान (Cartoonist Irfan) से भी मिलना हुआ। इरफ़ान जी से पहली मुलाकात जबलपुर में हुई थी। दिल्ली मेले में मिले थे लेकिन दौड़ते-भागते। उनकी पत्रिका ’तीखी-मिर्च’ की सदस्यता लेने से रह गये थे दिल्ली में। यहां मिलते ही सबसे पहला काम हमने सदस्यता शुल्क देने का किया। पहले दो साल का और फ़िर ताव आ गया तो चार साल का सदस्यता शुल्क थमा दिया। लेकिन बाद में सोचा कि यार कहीं ये ’तीखी मिर्च’ पहले ही बन्द हो गयी तो गये काम से। व्यक्तिगत प्रयासों से निकलने वाली पत्रिकायें आर्थिक अभाव के चलते कब बन्द हों जाये पता नहीं लगता। जबलपुर में Rajesh Kumar Dubeyने कार्टून लीला निकाली थी। कुछ महीने निकली भी। फ़िर बन्द हो गयी। कारणों में एक कारण यह भी रहा शायद कि उसमें से कुछ के सम्पादकीय हमने भी लिखे थे। लेकिन फ़िर सोचा कि अब जो हुआ सो हुआ। मुझे इरफ़ान भाई की मेहनत और हुनर पर पूरा भरोसा है कि वे किताब निकालते रहेंगे( अब भरोसा रखने के अलावा और किया भी क्या जा सकता है)
जैसा हमको पता है कि तीखी मिर्च में कार्टून और व्यंग्य लेख निकलते हैं। अभी इन्तजार है। लेकिन पत्रिका तो तब आयेगी जब हम पता भेजेंगे इरफ़ान को। भेजते हैं आज ही।
मिलते-जुलते, लोगों के फ़ोटो लेते हुये हमारी निगाह आलोक पुराणिक पर भी बनी रही। जैसे ही हम किसी को आलोक जी से जरा सा भी ज्यादा मोहब्बत से मिलते देखते फ़ौरन घटनास्थल और मिलनस्थल पर पहुंचकर सीधा-टेढा करके फ़ोटो खैंचने लगते। इसी बहाने जो फ़ोटो जमा हुये कैमरे में वो यहां देखिये तब तक हम अगला किस्सा लिखते हैं:
जारी है अगले अंक में

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Friday, February 17, 2017

आपका( आलोक पुराणिक) लेखन हमें निरन्तर आशान्वित करता हैं- ज्ञान चतुर्वेदी


[13 फ़रवरी को नई दिल्ली के हिन्दी भवन सभागार में Alok Puranik जी को वर्ष -2017 के पंडित गोपालव्यास जी स्मृति में दिये जाने वाले ’व्यंग्य श्री’ सम्मान से सम्मानित किया गया। इस मौके पर हिन्दी के शीर्ष व्यंग्यकार Gyan Chaturvedi जी ने आलोक पुराणिक के बारे में और समसामयिक हिन्दी व्यंग्य पर अपनी बात कही। यह बातचीत संतोष त्रिवेदीके सहयोग से यहां पेश कर रहे हैं। कार्यक्रम की रिपोर्ट भी आयेगी जल्दी ही]
......इसी चक्कर में हम जैसे लोगों को मुख्य अतिथि बना दिया जाता है। वर्ना अच्छे लेखकों को कौन पूछता है आजकल? गये जमाने। देखिये गोविन्द जी मैं आपसे कहूंगा कि यह पुरस्कार आपके हाथ एक ऐसा चमत्कारी डंडा है जिसके सहारे आप चाहें तो इस डंडे में अपना झंडा लगाकर पूरे देश में आप व्यंग्यकारों का एक अश्वमेघ यज्ञ कर सकते हैं। छोटे-छोटे पुरस्कार देकर, छोटी-छोटी मैगजीन में अपना उल्लेखकरके , किताब की समीक्षा करके बहुत सारे मठाधीश कोशिश करते रहते हैं। पता नहीं आपने मठाधीशी क्यों नहीं सीखी? यह आपके खून की खराबी है। क्या करें ? आप अभी भी ऐसे ना शुकरे संतान हैं अपने पिता की। शायद गोपाल प्रसाद व्यास जी की आत्मा को आप आज भी अपने आसपास महसूस करते हैं कि आपकी हिम्मत नहीं पड़ती कि आज के दौर के हिसाब से कुछ चीजें बदलने की कोशिश करें। एक महापुरुष की सन्तान होना एक बहुत बड़ी चुनौती है। बहुत कठिनाई है। बहुत परेशानियां पड़ती हैं। आप गान्धीजी की सन्तान से लेकर अमिताभ बच्चन तक देख लीजिये। बहुत कठिनाइयां होती हैं। आपने कैसे निभाया? इसीलिये आपने इतने सालों तक (तीस साल से चल रहा है) इस सम्मान की साख को आजतक बचाकर रखा है। यह बहुत चमत्कारी बात है। बहुत अभिनन्दनीय बात है। मैं आपको बधाई देता हूं।
मैं आलोक के लेखन के बारे में नहीं कहना चाहता था। सुभाष जी ने मेरी बहुत सारी बातें कह दी हैं। मैं मात्र यह कहना चाहूंगा कि इस पुरस्कार का प्रस्तावक और एक निर्णायक मैं भी था। तो कुछ तो बात होगी आपके लेखन में। बल्कि आपको(आलोक को) याद हो तो मैंने आपका डेट ऑफ़ बर्थ भी पूछा था। क्योंकि एक आब्जेक्शन यह भी था कि बड़ा यंग है। फ़ार्चुनेटली अभी इसने पचास साल क्रास ही किया था। हमारे यहां भोपाल में एक पुरस्कार है जो साठ साल के बाद दिया जाता है। जब आप साठ साल के हो जायें तो पुरस्कार दिया जाता है। ’अक्षर आदित्य’ सम्मान ऐसा कुछ। जब मुझसे कुछ बोलने को कहा गया तो मैंने कहा था- देखिये मेरे ऊपर दोहरी जिम्मेदारी है कि मैं अच्छा भी लिखूं और कहीं साठ से पहले मर न जाऊं। नहीं तो ’अक्षर आदित्य’ चूक जायेगा। क्योंकि वहां पर आदमी अपना एक्सरसाइज करे, खान-पान का ख्याल रखे। लिखने-विखने का भी चलता रहे। पर अगर आप साठ के के पहले चले गये तो अक्षर अमूल्य लेखन तो चूक जायेगा। पर हमारे यहां बहुत सारी चीजें हैं। जैसा सुभाष ने कहा - ’हम तो समझते थे कि आप उम्र में इनसे छोटे-बड़े हैं पर आपने इनके (अशोक चक्रधर जी के) पैर छू लिये।’ उम्र भी है एक क्राइटेरिया पैर छूने का। पर मेरी नजर में पैर छूने के बहुत सारे और क्राइटेरिया हैं। जिनमें आप जिसका सम्मान करते हैं वह भी और जुगाड़ में पैर तो छुये ही जाते हैं। अब आप तय करिये कि हमने किस चक्कर में पैर छुये होंगे। जुगाड़ की गुंजाइश बची नहीं जिन्दगी में बहुत। तो अशोक चक्रधर का कोई पैर छुये तो इसमें आश्चर्य तो नहीं होना चाहिये किसी को और न ही इसमें कोई जुगाड़ ढूंढना चाहिये। मुझे नहीं लगता कि अशोक चक्रधर कुछ दिलवा देंगे मेरे को। जो दिलवाना था वो दिलवा चुके। कभी आपने मुझे दिलवाया था दिल्ली अकाड़मी का सम्मान। और उसकी याद में कोई नहीं पैर छूता। अगर आप सोच रहे कि उसकी याद में हम आज पैर छू रहे तो यह गलत है। आपके लिये सम्मान है इसलिये पैर छुये।
मैं आलोक को बहुत स्नेह और आदर और सम्मान के साथ याद करता हूं हमेशा। मुलाकात शायद मेरी एक या दो बार हुई है। एकाध बार उसी मंच से मैंने रचना पाठ किया है जिससे आलोक ने किया है। आज भी शायद दूसरा ऐसा दूसरा अवसर आयेगा क्योंकि मुझसे कहा गया है रचना पाठ के लिये। इसलिये कि एक खर्च में दो काम क्यों नहीं करवा लेते। तो ज्ञान से एक रचना भी पढ़वा ली जाये तो कैसा रहेगा। देखिये क्या है कि आपसे मैं प्यार इसलिये करता हूं ,सम्मान इसलिये करता हूं कि हिन्दी व्यंग्य में अगर कोई भी, कुछ भी अच्छा कर रहा हो तो मेरा दिल जुड़ा जाता है। एक शब्द है दिल जुड़ा जाना। मजा आ जाता है। दिल भर जाता है। यह आदमी है। कौन है उसको ढूंढना, उससे मिलना , उसके बारे में जानना यह आपका कर्तव्य है। क्योंकि हिन्दी व्यंग्य में ढूंढे नहीं मिलते न लोग। जिसको पढकर आपका दिल जुड़ा जाये। ऐसा एक लेखक आलोक हैं। और आपका लेखन हमें निरन्तर आशान्वित करता है। आपके पास भाषा जो है जिस प्रयोग धर्मिता की बात करते हैं जो लोक भाषा होती है तो एक लोक हमारे शहर का भी है। एक लोक हमारे युवाओं का भी है। जैसे आपका लेख ’पापा रिस्टार्ट नहीं हुये’। इसमें गांवों की एक लोकभाषा है। रेणु जिस तरह से प्रयोग कर रहे थे अपनी रचनाओं में लोकभाषा का यह आज के लोक की भाषा का आलोक जो इस्तेमाल कर रहे हैं यह कहीं से उससे कमतर काम नहीं है। मैं यह कहना चाहता हूं। बहुत बड़ा काम है। उस भाषा को पकड़कर और उस भाषा सही जगह को सही तौर पर इस्तेमाल करना खाला का घर नहीं है। बहुत कठिन चीज है। इतनी आसानी से होता नहीं।
देखिये आप लाख हंसी कर लें, लाख बातें कर लें व्यंग्य के सौंदर्य शास्त्र की जो समझ आपकी है उसको बरतने का जो सलीका आपमें है वह मुझे बहुत भरोसा देता है। आप कुछ न कुछ नया करने की , देखिये जब आप कुछ नया करेंगे तो आपको फ़िसलने का खतरा रहता है हो सकता है आपसे कुछ गलत भी हो जाये। हो सकता है जैसा सोचा था वैसा न हो पाये। ऐसा भी होता है, ऐसा हुआ भी है, जैसा सोचा था वैसा नहीं हुआ पर उससे फ़रक नहीं पड़ता आप जो कोशिशें करते हैं जैसे आपने अभी फ़ोटो व्यंग्य की बात की उसमें व्यंग्य कैसे ढूंढेंगे (आलोक मे मुझे भेजा भी था एक बीबीसी से प्रसारित हुआ था) जैसे अब इसके हाथ में कैमरा आ गया। कैमरा भी एक बहुत बड़ा इन्स्ट्रूमेन्ट है। एक बेहद क्रियेटिव कला आपके हाथ में अगर आपके अन्दर उस तरह के विजन हैं जिससे आप व्यंग्य तलाश सक्ते हैं तो एक बहुत बड़ी नयी चीज कर रहे हैं सबसे बड़ी बात इसीलिये मैं आपका सम्मान करता हूं कि आप लकीर के फ़कीर नहीं हैं चाहे उस फ़कीरी की मजार का कितना भी बड़ा हो पर आप उस लकीर के फ़कीर बनने की कोशिश भी नहीं करते। नित्य खुद से बाहर निकलने की जो कोशिश है आप डेली कॉलम लिखते हैं उसमें रोज अपने आप को अतिक्रमण करके बाहर जाना बहुत कठिन काम है। बहुत बड़ी चुनौती है। यह तब होता है जब व्यंग्य में ही जीने लगते हैं। लगातार व्यंग्य में जीना (इतनी तारीफ़ कर दी गला सूख गया।) आपने और इसको आपको बहुत सीरियसली लेना पड़ेगा और आपको व्यंग्य का पुरस्कार जब व्यंग्य श्री दे रहे हैं तो इसके पीछे हमारी यह भावना भी है और यह हिन्दी भवन की भावना है कि आपमें एक बड़े लेखक बनने के सारे गुण हैं। गुण हैं। पोटेन्शियल है। आप बन नहीं गये हैं। आपमें एक बड़े लेखक बनने के सारे गुण हैं। और यह बहुत बड़ी बात है कि इस हिन्दी भवन ने आपके इस गुण को पहचानकर आपको पुन: याद दिलाया है कि आप उन गुणों का न तो दुरुपयोग करना और न उन गुणों को भूल जाना। यह बहुत महत्वपूर्ण है ।
हम आपको हनुमान जी की तरह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आप यह समुद्र लांघ सकते हैं। आपकी शक्ति का एहसास दिलाने के लिये यह पुरस्कार आपको दिया जा रहा है कि आप समझें कि आपमें क्या है और क्या आपमें अनयूज्ड पड़ा है जिसका अपने अभी इस्तेमाल ही नहीं किया। तो हम तो इस पुरस्कार के साथ जो आपको लाख टके का जो चेक मिला है उसके साथ एक लाख टके की एडवाइस मेरी है मेरा कहना आपसे यह है अब आपको एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आपको यह भवन आपको सौंप रहा है। आप भूल जायें हम तभी सन्तुष्ट होंगे( हो सकता है जब तक आप बड़े लेखक बनें तब तक हम मर मरा जायें) लेकिन हम वहां से संतुष्ट होंगे देखकर आपको कि आपने वो किया जो इस हिन्दी भवन ने आपमें देखा था। वहां तक आप पहुंचे। देखिये शिखर पर जाने का रास्ता बेहद कठिन है। याद रखिये। एक पठार चलता है। फ़िर थोड़ी चढाई आती है फ़िर अचानक बहुत बड़ी चढाई आ जाती है। या तो आप यहीं रुक जाइये यहीं पर एक तम्बू गाड़ लीजिये और यहीं पर रहकर आप काम करते रहिये। जितने आप शिखर की तरफ़ जाते हैं अकेलापन बढता है। आप अकेले होते हैं शिखर पर। हवायें बड़ी तेज चलती हैं। पैर टिकते नहीं। आंधियां होती हैं शिखर पर। उनके बीच टिके रहकर अपने शिखर की तरफ़ जाते रहना बस वह मैंने आपमें देखा इसलिये आपका मैंने नाम प्रस्तावित किया। मुझे लगा था कि आप यह काम कर सकते हैं। अभी जो लोग लिख रहे हैं उनके बीच में आप सबसे बेहतर हैं। मैं अपने दिल की बात कह रहा हूं। तो मैं यह चाहूंगा कि आप शिखर पर जाने की यात्रा की तैयारी करें। आप कर सकते हैं। बहुत सारे काम कर सकते हैं।
बाजार की आपने जहां तक बात की मैं निवेदन करूंगा बल्कि निवेदन क्या करूंगा बाजार का जमाना है तो मैं भी अपनी थोड़ी मार्केटिंग कर लूं अपने नये उपन्यास की। मैं अपना नया उपन्यास बाजार पर ही लिख रहा हूं। वह बाजारवाद के खिलाफ़ है और इसी बात के खिलाफ़ है कि जब जीवन की हर शै बाजार तय करने लगता है। जब आप मोहब्बत कैसे करेंगे। मोहब्बत को प्रकट कैसे करेंगे और सैंया जी से ब्रेक अप हो गया उसको कैसे सेलिब्रेट करेंगे यहां तक जायेंगे तो सबंधों में, सबमें, फ़ादर्स डे, मदर्स डे से लेकर सबमें बाजार आ गया तो यह बाजारवाद है। बाजार की आवश्यकता सब को है। किसको नहीं है बाजार की आवश्यकता, सबको है। पर जब बाजार आप पर इस कदर हावी हो जाये कि आपकी हर सोच को अब बाजार ही तय करेगा उस पर हमने एक उपन्यास करना शुरु किया। पागलखाना। एक विराट पागलखाना। जिसमें यह चल रहा है। हम भी पीछे-पीछे आपके हैं। बाजार पर हम भी कोई बड़ा काम कर रहे हैं। कोशिश कर रहे हैं यह मैं कहना चाहता था।
एक और यहां बैठे हुये थे मित्र वे सोच रहे होंगे कि मौका मिलेगा तो मैं हिन्दी व्यंग्य के वर्तमान परिदृश्य पर अपनी चिन्ता कहीं प्रकट न कर डालूं। क्योंकि आजकल आप कहीं कोई चिन्ता प्रकट करते हैं तो लगता है हमारे बारे में ही कह रहे हैं। हमारे एक प्रोफ़ेसर थे वो बहुत खराब पढाते थे और कहीं कोई हंसे कहीं चार लड़के खड़े होकर हंस रहे हैं तो बुलाकर पकड़कर डांटते थे कि साले मुझपे क्यों हंस रहे हो? क्योंकि उनको था, उनको था यह कि जब मैं यहां हूं तो साला कोई किसी और पर हंस कैसे सकता है? तो जब आप यूं ही बात भी करते हो तो कुछ हिन्दी के व्यंग्य लेखक तड़प जाते हैं कि शायद उसके बारे में बात की जा रही है। हमारे बारे में बात की जा रही है।
तो यह मत सोचिये। आज मैं व्यंग्य पर कुछ भी अपनी चिंता व्यक्त नहीं करूंगा। पर बात तो जरूर है कि अगर आप व्यंग्यकार हैं तो आप में सच बोलने की कुटेव तो होगी। आप ठकुर सुहाती नहीं कर सकते। आप चेहरा देखकर बातें नहीं कर सकते। अगर आप अच्छे हैं तो अच्छे हैं अगर आप खराब हैं तो मुझसे अच्छे कहते नहीं बनेगा। यह पक्का है। अगर कोई स्थिति गड़बड़ है तो मैं बोलूंगा। अभी किसी ने बीच में आवाज दी जब इन्होंने कहा कि ज्ञान चतुर्वेदी खुद कभी विवादों में नहीं पड़ते तो किसी ने कहा -ज्ञान चतुर्वेदी सुपारी देते हैं। किसी न कहा था। तो ज्ञान चतुर्वेदी के लिये बहुत सारे लोग सुपारी ले सकते हैं। ज्ञान चतुर्वदी क्या सुपारी देंगे किसी के लिये? इतना क्या है हमारे पास जो हम आपको दे देंगे। कि मेरे से सुपारी लेकर कोई महान बन जायेगा। तो ऐसा मत समझिये।
मैं क्रियेटिविटी पर जरूर बात करना चाहूंगा कि हम लगातार क्रियेटिव कैसे हों। रचना पाठ तो होते रहते हैं। यह बात जरूरी है जो मुझे लगता है कही जानी चाहिये। आपको लगातार क्रियेटिव क्या चीज बनाती है। दो ही चीज आपको लगातार क्रियेटिव बनाती हैं यह है मेरे अन्दर है। बिल्कुल है। मैं मानूंगा और मैंने कई बार कहा है और मेरे मित्र शुक्ल जी (अनूप शुक्ल) यहां बैठे हैं उन्होंने कहा था कि आप बयानों की कदमताल क्यों करते हो। तो यह बयानों की कदमताल भी मान पर यह महत्वपूर्ण है। कई बातें बार-बार कहनी पड़ती हैं। कुछ चिन्तायें जैसे बेटे के बारे में है, घर के बारे में है, आपकी चिन्तायें बार-बार आती हैं। उनको आप कहें कि चिन्ताओं को बार-बार रिपीट करके कुछ कदमताल कर रहे हैं तो यह गलत है। क्योंकि यह बात तो आयेगी जब आयेगी। क्रियेटिविटी में मेरे को सबसे बड़ी शर्त यह लगती है कि मैंने आज लिखा तो मैं कल उसको जरूर भूल जाता हूं। मेरी आजतक किसी किताब का विमोचन नहीं हुआ। मैंने किसी किताब की कोई समीक्षा नहीं लिखवाई। कोई आज कह दे कि मैंने कभी किसी से कहा हो कि मेरी किताब की समीक्षा छाप दीजिये। मैं भूल ही जाता हूं। आप उसे भूलते जाइये जो करते हैं तभी तो नई जगह बनेगी। कचरा तो हटाइये। यह सोचकर दिमाग के अन्दर से पुरानी सब रचनायें निकाल दी। तब आप निरन्तर कुछ नया करने की स्थिति में होंगे। न तो आप आत्ममोह में हैं कि मैंने क्या -क्या कर दिया। न ही पुरानी चीजों की छाया रहती है। वर्ना आप वहां से निकलकर यहां (अब जो लिखने की कोशिश कर रहे हैं बाजारवाद पर) बाजारवाद तक न पहुंचते। एक ग्राहक बैठा हुआ है।
आप क्यों नहीं बारामासी रिपीट करते। क्यों हम न मरब को रिपीट करते। आपका परिवेश है, आपके पास चरित्र हैं। बनाइये एक और रचना, एक और रचना, एक और रचना। पर ऐसा नहीं होता। आपको निरन्तरता कायम रखना है तो जीवन से निरन्तरता सीखना है। उसको आप अपने व्यंग्य लेखन में लायें। मैं सोचता हूं कि यही एकमात्र सिद्धांत है। यह कभी मत सोंचे कि आपने बहुत सारा कर डाला।
बातें तो बहुत सारी हैं पर मैं इस बार यह सोचकर आया था कि आखिरी बार मैं कह रहा हूं कि बाजार की समझ नहीं है लोगों को जो लोग बाजार पर लिख रहे हैं। व्यंग्य लिख रहे हैं। आपका इंटरव्यू पढ रहा था मैं आज। बहुत मह्त्वपूर्ण है कि जो लोग लिख रहे हैं उनको अपने इतिहास का बोध हो, अपने सामाजिक परिवेश का ज्ञान हो, समाज की समझ हो, मुझे बाजार की समझ हो मुझे इकोनामिक्स की समझ हो, मुझे विचार धारायें पता हो, मुझे दर्शन शास्त्र की जानकारी हो। दूसरी विधाओं में क्या हो रहा है, कविता में क्या हो रहा है, कहानी में क्या हो रहा है यह मुझे मुझे फ़िर अपनी विधा की संभावनाओं का अन्दाजा हो तभी जाकर आप एक अच्छा व्यंग्यकार बन सकते हैं। तब जब आपकी क्रियेटिविटी वहां पहुंचती है जिसकी आप बात कर रहे हैं। केवल व्यंग्य व्यंग्य और व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता। पूरे समाज को देखकर समझने की दृष्टि होनी चाहिये। फ़िर आप लिखें उसमें इन सारी चीजों का मिश्रण होना चाहिये।
[इसके बाद ज्ञानजी ने अपनी व्यंग्य रचना जंगल का शेर बनाम सर्कस का शेर का का पाठ किया]
संबंधित लिंक: 1. राज्यसभा टीवी पर शख्सियत कार्यक्रम में ज्ञानजी के बारे में कार्यक्रम की कड़ी https://www.youtube.com/watch…
इसमें Subhash ChanderSushil Siddharth और ज्ञानजी से जुड़े लोगों के उनके बारे में विचार हैं। ज्ञानजी की जीवन, साहित्य और अन्य पहलुओं पर राय।
2. https://www.facebook.com/sushilsiddharth/posts/1253065881427940 ( Sushil Siddharth जी की ज्ञान जी के बारे में लिखी पोस्ट पर अनूप शुक्ल की कदमताल वाली टीप)
3. आलोक पुराणिक का इंटरव्यू जिसका जिक्र ज्ञान जी ने कियाhttps://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210543919247685
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210583105987329

व्यंग्य श्री सम्मान-2017 की रपट -1


पिछले साल के आखिरी दिन सुबह-सुबह फ़ोन पर बतियाते हुये साल का आखिरी धमाका टाइप करते हुये Alok Puranik ने उनको ’व्यंग्य श्री सम्मान’ से सम्मानित होने की सूचना दी। सुनकर हमें कोई ताज्जुब नहीं हुआ। इंसान की करनी का फ़ल उसको कभी न कभी तो भोगना ही पड़ता है। किसी को देर में मिलता है किसी को जल्दी। आलोक पुराणिक को जल्दी भुगतना पड़ा। आलोक पुराणिक के व्यंग्य लेखन पर फ़िदा होते हुये पंडित गोपाल प्रसाद व्यास जी की स्मृति में दिया जाने वाला व्यंग्य के क्षेत्र का सम्मानीय पुरस्कार ’व्यंग्य श्री सम्मान’ देने का निर्णय लिया गया। करमगति टारे नाहिं टरी।
खबर मिलते ही हमने फ़ोन रखकर सबसे पहले चाय मंगाई और पीते हुये खबर छाप दी देखिये लिंक [ https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210133472866782 ]
हमने यह भी लिखा था :
" आम तौर पर वरिष्ठ नागरिक की उम्र के आसपास पहुंचने पर दिये जाने वाले इस इनाम को आलोक पुराणिक ने पचास साल की 'बाली उमर' में ही झटक लिया। इतनी कम उमर में यह इनाम आज तक किसी को नहीं मिला।
आलोक पुराणिक द्वारा व्यंग्य के क्षेत्र में नित नये प्रयोग करने की भी इस इनाम के निर्धारण में भूमिका रही होगी। "
पिछले वर्ष यह सम्मान Subhash Chander जी को मिला था। जब सुभाष जी ने इस इनाम को मिलने की सूचना दी थी तब हम जबलपुर जाने के लिये गोविन्दपुरी स्टेशन पर चित्रकूट एक्सप्रेस पर चढ रहे थे। एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में वीआईपी वाला झोला लटकाये हाल यह था कि जरा सा और चूकते तो हैंडल हाथ से उसी तरह छूट जाता जैसे हर साल तमाम लोगों के हाथ आते-आते व्यंग्यश्री रह जाता है। सुभाष जी की पिछले साल की व्यंग्यश्री की मिठाई अभी तक बकाया है। वो हम लेकर रहेंगे।
सम्मान की तारीख 13 फ़रवरी तय हुई थी। हमने ट्रेन में फ़ौरन रिजर्वेशन कराया और निकल लिये सुबह-सुबह 13 को। निकले ही दो हसीन हादसे हुये जिसमें एक का संबंध दिल्ली पहुंचने से था और दूसरे का वापस लौटने से। लेकिन उसका किस्सा फ़िर कभी तफ़सील से। अभी बात सम्मान समारोह की।
ट्रेन , फ़िर मेट्रो और फ़िर आटो रिक्शे से होते हुये हम ठीक पांच बजे हिन्दी भवन पहुंचे। पहुंचते ही एक तरफ़ से संतोष त्रिवेदी और दूसरी तरफ़ से अर्चना चतुर्वेदी दिखीं। साथ में Alok Saxena Satirist और सुनीता शानू। संतोष त्रिवेदी ने देखते ही हमारा बैग झपटने की कोशिश की। बोले - ’झोला हम उठायेंगे।’ लेकिन हमने उनकी कोशिश को सफ़ल नहीं होने दिया। संतोष ने लगभग छीनने की कोशिश की। सच्चा व्यंग्य लेखक जैसे अपने सरोकार नहीं छोड़ता वैसे ही अपना बैग छोड़ा नहीं। संतोष तो खैर अपने दोस्त हैं लेकिन हमारे जीवन का अनुभव है कि झोला उठवाने वाले का मुंह अंतत: खाली झोले जैसा ही लटक जाता है। इसीलिये अपन अपना झोला खुद ही उठाते रहे हैं हमेशा।
इस मामले में संतोष का रिकार्ड और भी शानदार है। जिसको उन्होंने उठाया है या जिसका भी झोला उठाया उससे बाद में बोलचाल के सम्बन्ध भी न रहे। हम उनके प्रेम से वंचित नहीं होना चाहते इसलिये हम अपना झोला अपनी इज्जत की तरह खुद थामे रहे।
ऊपर सभा स्थल के बाहर बरामदे में आलोक पुराणिक के प्रसंशकों का जमावड़ा दिखा। दिल्ली के लगभग सभी परिचित व्यंग्यकार साथी वहां मौजूद थे। जितने परिचित थे उससे कहीं ज्यादा अपरिचित लोग दिखे मुझे वहां। सभी के भाव से लगा आलोक उनके खास हैं। आलोक पुराणिक की लोकप्रियता का नमूना दिखा ।
ऊपर पहुंचते ही आलोक पुराणिक की बिटिया और श्रीमती जी दिखीं। वे इनाम में मिलने वाले चेक को सुरक्षित घर लेकर जाने के लिये आयीं थीं। आर्थिक विषयों पर व्यंग्य लिखने वाले की आर्थिक हरकतों पर घरवालों की इतनी पैनी नजर देखकर सुकून हुआ।
वहां चाय और एक पैकेट में कुछ नमकीन टाइप बंट रहा था। हमने चाय का कप कब्जे में किया और चाय पीते हुये इधर-उधर आलोक पुराणिक को ताकने लगे। पूछा - दूल्हा किधर है। पता लगा आ रहा है दूल्हा। जरा सजने गया है।
आलोक पुराणिक आये और आते ही सबसे मिलने लगे। उनको सबसे इतनी विनम्रता से मिलते देखकर लगा कि अगले को डर लगा है कोई भी एक नाराज हुआ तो गया इनाम हाथ से।
हमने चाय आधी ही पी थी कि याद आया कि हम कैमरा भी लाये हैं। हमने आधी चाय कुर्बान करते हुये थर्मोकोल का ग्लास फ़ेंका और कैमरा चकमाने लगे। फ़िर तो हम एकदम पक्के फ़ोटोग्राफ़र में बन गये। जैसे शादी व्याह में फ़ोटू खैंचने वाले दूल्हा-दुल्हन के तमाम जरूरी-गैरजरूरी फ़ोटो खैंचने के लिये जोड़े को इधर-उधर खैंचते रहते हैं वैसे हमने तमाम लोगों को इधर-उधर करते हुये फ़ोटोबाजी की।
फ़ोटो ग्राफ़ी के उस जुलूस में कई लोग हर फ़ोटो में अपने आप आकर खड़े होते गये। हमने भी मना नहीं किया काहे से कि हम पता था कि कैमरा वाले फ़ोटो में ’क्राप’ का विकल्प मौजूद है।
संतोष अपने आईपैड के साथ इधर-उधर फ़ोटो खैंचते जा रहे थे। जो भी आये उसके साथ सेल्फ़ी खींचते हुये या फ़िर बगल में खड़े होकर हमसे खिंचवाते हुये।
इस बीच हमने आलोक पुराणिक के घर वालों बिना मांगे वाली सलाह दे डाली कि मिलने वाले -111111/- रुपये में कुछ पैसे आलोक पुराणिक से लेकर रकम कम से कम 112000/- करके अपने कब्जे में कर लें। इसको सभी लोगों ने फ़ौरन स्वीकार कर लिया।
रपट अभी जारी है .....

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Tuesday, February 14, 2017

रेल की पटरी के किनारे वैलेन्टाइन




शहर पहुंचने के पहले ट्रेन के धीमे होते ही शहर ने उसको चारो तरफ़ से घेर लिया। पटरी के दोनों तरफ़ विज्ञापनों के सिपाही तैनात। दीवारों पर अंग्रेजी सिखाने और नामर्दी दूर करने के इश्तहार दिखने लगे। पैसे की चिन्ता दूर करने के लिये का फ़ंदा भी चिपका हुआ था। सबमें मोबाइल नंबर भी दिया था। बस इधर घंटी बजाओ, उधर समस्या भगाओ। पुरानी फ़ुटाओ, नई लाओ।
खरामा-खरामा चलती ट्रेन एक जगह रुक गयी। ट्रेन रुकते ही पटरी के पास निपटता आदमी झाडियों के बीच खड़ा होकर बकौल शुक्लजी गार्ड ऑफ़ ऑनर टाइप देने लगा। ट्रेन कुछ देर तक खड़ी रही। वह बोर होकर सावधान मुद्रा से विश्राम मुद्रा में आया। पास की अपेक्षाकृत घनी झाडी की आड़ में बैठकर निपटने लगा।
मन किया बच्चन साहब को फ़ोन करके कहें -देखिये साहब ये लोग आपके रोज फ़ोन करने के बावजूद खुले में ही जा रहे हैं।
आगे पटरी के किनारे पक्के में दो लोग अपनी मुंडी झुकाये दाढी बना रहे थे। एक घर के सामने जमीन से जरा ऊंचे बैठा एक बकरी को दुलरा रहा था। दूसरी बकरी पास ही एक नाद टाइप बरतन में मुंह घुसाये सुबह का नाश्ता टाइप कर रही थी। उनके बीच एक बकरी की बछिया निर्लिप्त भाव से ऊपर मुंह उठाये शायद देश के हाल पर चिंतित हो रही थी।
आठ दस घर मे बीच कुछ भुजिया के पैकेट लटके हुये उसके दुकान होने का मौन नगाड़ा बजा रहे थे। आगे पटरी के किनारे एक बुजुर्ग पान मसाले की कुछ पुडिया और अपना चेहरा लटकाये -ग्राहक और मौत कभी भी टपक/टपका सकते हैं, की शाश्वत मुनादी कर रहे थे।
रेल की पटरी किनारे मसाले की दुकान देखकर लगा कि जहां भी किसी इंसान के पहुंचने की संभावना होती है वहां बाजार पहले अपना अंगौछा रखकर दुकान खोल लेता है। इस हिसाब से मुहावरों में बदलाव लाना चाहिये। कवि-रवि की जगह अब हल्ला मचना चाहिये- ’जहां न पहुंचा व्यंग्यकार, वहां पहुंच गया बाजार।’ बाजार सर्वव्यापी है, सर्वभूतान्तरात्मा है।
एक बच्ची हैंडपम्प के हैंडलपर उछलती हुयी पानी निकालने की कोशिश में लगी हुई थी। पानी तो निकल नहीं रहा था लेकिन उसका बिनाटिकट झूला झूलने का काम पूरा हो रहा था। हैंडपाइप के सामने बहता पानी आगे एक सीवर तक पहुंचते हुये सूख जाने के बावजूद अपने होने का संदेशा शायद सीवर को दे देता होगा। क्या पता सीवर दुष्यन्त कुमार को शेर को अपने हिसाब से पढता हो-
यहां तक आते-आते निपट जाती है सारी गंदगी
मुझे मालूम है गंदा पानी कहां ठहरा हुआ होगा।
आगे एक झोपड़ी के बाहर एक महिला बर्तन मांजती और राख युक्त पानी को सामने के गढहे में गिराते हुये उसके तालाब बनने की संभावनायें बढा रही थी। क्या पता कल किसी रोजगार योजना वाले इस तालाब की फ़ोटो खैंचकर रोजगार योजना के खाते से पैसा भी खैंचने लगें।
वहीं एक सुअर तालाब के पानी में मंझाता हुआ आगे चला जा रहा था। बीच तालाब में गर्वोन्नत मुद्रा में झूमते, चलते ’वीर सुअर’ को देखकर ऐसा लगा कि शायद वह सुबह-सुबह ही किसी ’सुअर-बाला’ को वैलेंटाइन दिवस की बधाई देने के पक्का इरादा करके निकला है। तालाब से निकले कीचड़ का श्रंगार किये सुअर के शरीर पर गिरती सूरज की किरणें उसके सौंदर्य को बहुगुणित कर रहीं थीं। उसकी भाव भंगिमा से देखकर लग रहा था कि चाहे कुछ भी हो जाये लेकिन वह बिना सुअर सुन्दरी से भेंट किये वह वापस नहीं आने वाला।
मन किया एक कविता खैंच दें - ’एक महिला द्वारा बरतन मांजते हुये बने तालाब में ऐश करता हुआ सुअर जनसेवकों या फ़िर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों सरीखा दिख रहा है।’ लेकिन फ़िर अलसा गये। कविता संभावित क्रांति की तरह स्थगित हो गयी।
सूरज की किरणों को देखकर हमने सूरज भाई को वैलेन्टाइन डे की बधाई देने की सोची। फ़ोन इंगेज्ड जा रहा था। कुछ देर बाद पलट के फोन किया #सूरज भाई ने। बोले जरा आराम से आयेंगे आज। ये किरणें, उजाला, रश्मियां , प्रकाश , रोशनी सब कह रहे हैं -"पापा जरा सबको 'वैलेंटाइन डे ' विश कर दें तब चलें। "
सूरज भाई बताने लगे -- "यहां सब तरफ़ रोशनी के पटाखे छूट रहे हैं। तारे एक दूसरे को मुस्कराते हुये देख रहे हैं। आकाश गंगायें इठला रहीं हैं। एक ब्लैक होल ने ऊर्जा और प्रकाश को धृतराष्ट्र की तरह जकड़ लिया है और फ़ुल बेशर्मी उनको "हैप्पी वेलेंटाइन डे" बोल रहे हैं। ऊर्जा को ब्लैक होल की जकड़ में कसमसाते देख आकाशगंगा ने एक बड़ा तारा फ़ेंककर ब्लैकहोल को मार दिया। उसके कई, अनगिन टुकड़े हो गये। ब्लैक होल का पांखड खंड-खंड हो गया है। अनगिनत रोशनी मुक्त होकर चहकने लगी है। क्या तो सीन है भाई! काश हम तुमको इसका वीडियो दिखा पाते।"
हमने कहा - ’सूरज भाई , हमको ये वीडियो न दिखाओ। हमको तो बस इतना बताओ कि ये जो तमाम लोग जीने के लिये रोज मरते दिखे आज सुबह-सुबह इनकी जिन्दगी में कभी कोई वैलेन्टाइन डे आयेगा क्या? ये भी कभी शान से रोशनी की किरणों सरीखे चमक सकेंगे क्या?’
इस पर सूरज भाई बिना कुछ कहे बादलों की ओट में चले गये। शायद उनके पास इसका कोई जबाब नहीं रहा होगा। आपके पास है क्या कौनौ जबाब ? बताइये?
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210557405144824

Monday, February 13, 2017

मेरी रुचि विवाद से ज्यादा रचनात्मक प्रक्रियाओं में है- आलोक पुराणिक



आज नई दिल्ली के हिन्दी भवन सभागार में हिन्दी व्यंग्य के सबसे सक्रिय और सर्वप्रिय व्यंग्य लेखक आलोक पुराणिक को हिन्दी व्यंग्य का प्रतिष्ठित ’व्यंग्य श्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया जायेगा। इस मौके पर उनसे समसामयिपक हिन्दी व्यंग्य के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत सवाल-जबाब के रूप में यहां पेश है।
सवाल 1- ’व्यंग्य श्री’ सम्मान मिलने की बधाई। कैसा एहसास हो रहा है आपको ?
जवाब-जी प्रीतिकर आश्चर्य हो रहा है। आम तौर पर यह सम्मान बुजुर्ग रचनाकारों को दिया जाता रहा है, मैं उतना बुजुर्ग नहीं हूं। फिर भी इस सम्मान के लिए चुना गया। पंडित गोपालप्रसाद व्यास जी के नाम पर स्थापित इस सम्मान को प्राप्त करके गौरव की अनुभूति हो रही है।
सवाल 2-लिखते हुये आपको करीब 35 साल हुये। इन सालों में व्यंग्य लेखन में क्या बदलाव आये?
जवाब-व्यंग्य लिखते हुए करीब दो दशक से से ज्यादा हुए, आर्थिक पत्रकारिता करते हुए तीस सालों से ज्यादा हुए। व्यंग्य लेखन बहुत बदला पर काफी कुछ नहीं बदला। पहले सरकार राजनीति केंद्र में थी अब बाजार का स्पेस बढ़ गया है। बाजार नयी सत्ता है। व्यंग्य के फार्मेट में बदलाव आये। पहले डेढ़ हजार शब्दों के व्यंग्य को भी जगह मिलती थी अखबारों में, अब छोटा व्यंग्य चाहिए। तकनीक, व्हाट्सअप, फेसबुक, इस सब पर भी व्यंग्य अब आ रहे हैं। बहुत कुछ बदला है, पर बहुत कुछ नहीं बदला है दुनिया में, जो कभी नहीं बदलता-ईर्ष्या, खुद को श्रेष्ठ साबित करने का अहंकार, मौका-मुकाम देखकर दूसरे के इस्तेमाल की प्रवृत्ति, मौका मिलते ही दूसरे के शोषण का हुनर। इस पर व्यंग्य लगातार होना चाहिए और हो रहा है।
सवाल 3-आपके खुद के लेखन में क्या परिवर्तन आपने महसूस किये?
जवाब-जी रोज, रोज नयी तकनीक आयी देखा समझा और जानने की कोशिश की यहां विसंगतियां क्या क्या हैं। कोशिश रोज चल रही है। बदलती तकनीक, बदलती दुनिया ने रोज नये परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है। छोटे में बड़ा कैसे कहा जाये, ऐसा भाव लगातार प्रबल हुआ है।
सवाल 4- जिन लेखकों के साथ आप लिखते थे अखबारों में नियमित उनमें सबसे ज्यादा आप किस लेखक से प्रभावित थे? क्यों?
जवाब-किट्टू जी,जिनका नाम आज की नयी पीढ़ी शायद जानती भी नहीं है, एक वक्त अखबारों, पत्रिकाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण रचनाकार थे। उन्हे पढ़कर मैं चकित रहता था कि कैसे यह बात ऐसे कही जा सकती है। स्वर्गीय किट्टूजी की एक ही किताब छपी है, भावना प्रकाशन से। किट्टूजी बहुत सीनियर थे मुझसे पर, उनके कालम और मेरे कालम एक ही अखबार में छपा करते थे। स्वर्गीय के पी सक्सेनाजी की संवाद-शैली भी बहुत असरदार लगी। शरद जोशीजी तो मेरे व्यंग्य लेखन की शुरुआत से पांच साल पहले स्वर्ग सिधार चुके थे। बतौर स्तंभकार शरद जोशीजी कमाल हैं, इंगलिश में बहराम कांट्रेक्टर, दोनों स्वर्गीय हैं अब।
सवाल 5- अपने लेखन में अभी क्या कमी देखते हैं आप?
जवाब-इतिहास,वेद, पुराण का विधिवत अध्ययन नहीं है मेरे पास, होना चाहिए। कबीर, मीरा, तुलसीदास का विस्तृत अध्ययन नहीं मेरे पास। मुगल इतिहास का व्यापक अध्ययन नहीं है मेरे पास। यूरोपीय इतिहास का व्यापक अध्ययन नहीं है मेरे पास। इसलिए उनके संदर्भ मैं उस तरह से नहीं दे पाता, जिस तरह से दिये जाने चाहिए। अध्ययन की इस कमी को मैं आगे पूरा करुंगा।
सवाल 6-लेखन की आपकी कई स्टाइल हैं छात्र की कापी वाली, फ़ोन सेवा वाली, सवाल-जबाब वाली और भी कई। इनमें से कोई स्टाइल आपको लगता आपकी अपनी इजाद की हुई है?
जवाब -मुझे पता नहीं है मैंने क्या ईजाद क्या, क्या नहीं, जो समझा, जो शैली समझ में आयी, प्रयोग किये। प्रयोगों से मुझे कभी डर नहीं लगता। बहुतेरे प्रयोग किये हैं आगे भी करुंगा। ये नहीं पता कि मैं क्या पहली बार कर रहा हूं और क्या मुझसे पहले कोई कर चुका है।
सवाल 7-आपके बारे में आपके प्रेमी पाठक यह भी कहते हैं कि आप बहुत लिखने के चक्कर में बाजारू लेखक हो गये हैं मतलब लेखन के स्तर से समझौता करते हैं आप। आपको अब स्तरीय लेखन करना चाहिये। इस बारे में आपका क्या कहना है?
जवाब-हरेक को राय रखने का हक है। लेखन का स्तर बहुत सब्जेक्टिव विषय है। स्तरीय लेखन क्या है, यह भी सब्जेक्टिव विषय है। मेरी राय यह है कि जो मैं भी कर रहा हूं, उसमें भरसक प्रयास करता हूं कि स्तरहीन ना हो।

सवाल 8- भाषा के स्तर पर आपने तमाम प्रयोग किये। चलताऊ भाषा का प्रयोग नयी पीढी को आसानी से समझ में आने वाली भाषा का प्रयोग है कि आप इसी में अपने को सहज पाते हैं?
जवाब-भाषा के मसले पर मैं आपसे कहूं कि व्यंग्य की भाषा को संवादपरक होना चाहिए। व्यंग्य को अपने टीले से उतरकर सड़क पर, पब्लिक में, हर तरह की पब्लिक के बीच जाना होगा और उनकी बोलचाल सुननी चाहिए, मैं सुनता हूं और कोशिश करता हूं कि भाषा वह रहे, जिसमें लोग सहज महसूस करें।
सवाल 9-आपके प्रेमी पाठक सुरेन्द्र मोहन शर्मा का कहना है- ’आलोक पुराणिक बहुत लिखते हैं, बढिया लेखक हैं लेकिन हमें लगता है कि उनको सरकार के खिलाफ़ भी लिखना चाहिये। व्यंग्यकार हमेशा सत्ता के खिलाफ़ भले न लिखे लेकिन कभी-कभी तो लिखना चाहिये।’ आपका इस बारे में क्या कहना है?
जवाब-प्रेमी पाठक सुरेंद्र मोहन शर्मा का धन्यवाद,सत्ताओं का अर्थ सिर्फ सरकार नहीं है। बाजार अब सबसे बड़ी सत्ता है। अपनी समझ के हिसाब से मैंने कोशिश की है कि जहां विसंगति है, उन्हे चिन्हित किया जाये, जो सत्ता उसके लिए जिम्मेदार है, उसे इंगित किया जाये। शर्माजी के सुझाव पर विचार करुंगा।
सवाल 10-अब तो आप खुद अपने में एक स्थापित लेखक हो गये। तमाम लोग आपके जैसा लिखने की कामना करते होंगे। लेकिन जब आपने लिखना शुरु किया तब आप किस व्यंग्य लेखक जैसा लिखने की कामना करते थे? अब भी किसी लेखक जैसा लिखने की तमन्ना है?
जवाब-ना, ना, ना, ना, ना, ना, रचनाकार कभी स्थापित ना होता, वह स्थापित होता लग सकता है। पर होता नहीं है, इतना कुछ है करने के लिए। फोटो आधारित व्यंग्य निबंधों पर सोच रहा हूं, काम कर रहा हूं उन पर, कुछेक छपे भी हैं बीबीसीहिंदी में, दैनिक जागरण में। स्थापित बिलकुल नहीं हूं, अभी बहुत काम करना है। व्यंग्य लेखन की शुरुआत में किट्टूजी चकित करते थे, उन जैसा लिखने की इच्छा होती थी। किसी लेखक जैसा बनने की इच्छा नहीं है, आलोक पुराणिक ही और रचनात्मक बनें, यही इच्छा है।
सवाल 11-अपनी कोई एक रचना आपको अचानक ध्यान में आती है जिसको आप सबसे ज्यादा पसंद करते हों?
जवाब-फेयर एंड हैंडसम प्रश्नोत्तरी इसमें पुरुषों को गोरा बनानेवाली क्रीम के बहाने व्यंग्य किया गया है।
सवाल 12- हमेशा से सबसे ज्यादा व्यंग्य राजनीतिज्ञों पर लिखे जाते हैं। उनको गरियाया जाता है। जबकि राजनीति समाज का बहुत छोटा अंग है। बाजार इसको प्रभावित करता है जो स्वयं समाज की इकाई है। क्या ऐसा नहीं लगता है कि राजनीतिज्ञ ऐसा दिहाड़ी का नौकर जिसे समाज ने अपनी बुराई ढंकने के उद्धेश्य से गरियाने के लिये रख लिया है।
जवाब-1991 के बाद सीन बदला है। 1991 से पहले हमारी तमाम परेशानियों की वजह सरकार होती थी, आप याद कीजिये, जसपाल भट्टी का उल्टा पुल्टा शो, उसमें ठप्प फोन पर व्यंग्य होता था, सरकार पर व्यंग्य होता था। सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों पर व्यंग्य होता था। पर 1991 के उदारीकरण के दौर पर बाजार का स्पेस बढ़ा। अब वोडाफोन एयरटेल परेशान कर रहा है, बीएसएनएल और एमटीएनएल ही नहीं हैं परेशान करने के लिए। बल्कि सरकारी टेलीफोन कंपनियों का स्पेस आनुपातिक तौर पर कम हुआ। बाजार बहुत महीन किस्म का शोषक है। बहुत ही महीन, इसे समझना इस पर लगातार व्यंग्य करना, बाजार की न्यूनतम समझ की मांग करता है। बाजार पर 1991 से पहले भी व्यंग्य हुए हैं। पर राजनीति पर व्यंग्य करना अपेक्षाकृत आसान जान पड़ता है। आसान काम करने का अपना आकर्षण होता है। पर नये लोग तकनीक, बाजार, इश्तिहार, कस्टमर केयर पर खूब व्यंग्य लिख रहे हैं। साठ के उस पार के व्यंग्यकारों की नजर बाजार पर उतनी नहीं गयी है। पर बिना बाजार को समझे वर्तमान में व्यंग्य रच पाना असंभव है।
सवाल 13- अपने देश में तमाम ऊर्जा और संभावनाओं के बावजूद आम आदमी के हाल बेहाल होते जा रहे हैं। क्या कभी इसमें सुधार की गुंजाइश और व्यापक सुधार की संभावना देखते हैं आप?
जवाब-देखिये आम आदमी के हाल बेहाल होते जा रहे हैं-आपका यह बयान एक सरलीकृत बयान है। हाल बेहाल भी हुए हैं, खुशहाल भी हुए हैं। उस गति से खुशहाल नहीं हुए, जिस गति से नेता-ठेकेदार-भ्रष्ट अफसर के होते हैं। इस मुल्क में करीब 100 करोड़ मोबाइल फोन हैं, 127 करोड़ की जनसंख्या में। तीस साल पहले फोन उच्चवर्गीय आइटम होता था। भूख से मरने की रिपोर्टें पहले के मुकाबले कम आती हैं। बीस साल पहले कालाहांडी भूख का मुहावरा था। अब बीस साल के बच्चे को कालाहांडी का वह संदर्भ पता नहीं होगा, क्योंकि उसने कालाहांडी की दुर्दशा अपने चैतन्यकाल में नहीं देखी सुनी। पर इसका मतलब यह नहीं है कि देश एकदम खुशहाल है। इस महादेश में तीन देश बसते हैं, एक करीब 5 करोड़ का अमेरिका-एकदम उच्चर्गीय सिविल लाइंस, नारीमन पाइंटवाला, बीच का करीब 35 करोड़ मध्यवर्गीय मान लें, मलेशिया मान लें इसे, खाने पीने ठीकठाक इंतजाम हैं, बच्चे ठीक ठाक कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। करीब 85 करोड़ का भारत यहां युगांडा या बंगलादेश है। तीन देश आर्थिक तौर पर हैं इस देश में। सबकी अपनी विसंगतियां हैं। पर हालत पहले के मुकाबले खराब हैं, यह बात अतिरेक है। हां हालत उस गति से आम आदमी के नहीं सुधरे जिस गति से उद्योगपतियों के सुधरे, नेता के सुधरे, यह बात एकदम सही है। भारत का कल आज के मुकाबले बेहतर होगा, ऐसा मैं विश्वास करता हूं। पर सुधार की दर तेज नहीं होगी। धीमी गति का समाचार होगा सुधार।
सवाल 14- श्रीलाल शुक्ल जी ने एक बार मुझसे कहा था- ’ इस देश के आदमी में विपरीत परिस्थितियां झेलते हुये जीने की अद्भुत क्षमता है। इसलिये अपने यहां बहुत बदलाव की संभावना मैं नहीं देखता।’ आपका क्या सोचना है इस बारे में?
जवाब-श्रीलाल शुक्लजी ने देश के मिजाज को भांपकर ही कहा कि विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए जीने की अद्भुत क्षमता है। कैसे भी हाल में बंदा एडजस्ट कर लेता है, इसलिए इस देश में बहुत गहरे असंतोष, बहुत ही इंटेस किस्म के हिंसक आंदोलनों की आशंका कम है। पर बदलाव की संभावनाएं हैं पूरी हैं। समय बहुत लगना है। एक दो साल में कुछ ना होना। बड़े बदलावों के लिए दशक चाहिए। उत्तर भारत, पूर्वी भारत में बदलाव की रफ्तार बहुत धीमी है। पश्चिम और दक्षिण भारत में बदलाव तेज है।
सवाल 15- आज सोशल मीडिया के चलते व्यंग्य लेखन का विस्फ़ोट सा हो रखा है। आम आदमी लिखने और छपने लगा है। कुछ पुराने , सिद्ध लेखक इसको व्यंग्य लेखन के लिये ठीक नहीं मानते। उनका कहना है कि लिखास और छपास की कामना के चलते व्यंग्य लेखन का स्तर गिरा है। आपका क्या मानना है इस बारे में।
जवाब-आपका सवाल बहुआयामी है। व्यंग्य लेखन का नहीं, हर किस्म के लेखन का विस्फोट हो गया है। सोशल मीडिया खुला मीडिया है, असंपादित मीडिया है। यही इसकी ताकत है और यही इसकी कमजोरी है। ताकत यह है कि अगर आपके पास कुछ कहने के लिए है, तो अपनी फेसबुक वाल पर, ट्विटर पर कह दीजिये। वह लोगों तक पहुंच जायेगी। किसी संपादक की चिरौरी करने की जरुरत नहीं है, प्लीज छाप दीजिये। अब उलटा हो रहा है, आप के कहने में दम है, तो मुख्यधारा के अखबार आपके कटेंट, आपके ट्वीट को उठाकर अपने अखबार में ले जायेंगे। आप देख सकते हैं, यामिनी चतुर्वेदीजी, रंजना रावतजी, सोमी पांडेयजी के कंटेट को मुख्यधारा के अखबारों में जगह मिली है। कई नये रचनाकार इस माध्यम से व्यंग्य जगत को मिले हैं। ये वो लोग हैं, जो कभी किसी अखबार-पत्रिका के दफ्तर में अपनी रचनाएं ना भेजते। पर इन लोगों के काम में दम है, तो मुख्यधारा का मीडिया इन्हे जगह दे रहा है। पर, पर इसका दूसरा आयाम यह है कि सोशल मीडिया असंपादित मीडिया है। जिसका जो मन करे, जैसा मन करे, लिख जाये। मुख्यधारा की अखबार-पत्रिकाओं में संपादन के बगैर कुछ ना छपता, तो वहां जो छपता है उसमें एक न्यूनतम जिम्मेदारी सुनिश्चित मानी जा सकती है। ऐसा सोशल मीडिया के बारे में नहीं कहा जा सकता कि वहां जो कुछ भी छपता है, जिम्मेदारीपूर्ण कंटेट होता है। सिर्फ सोशल मीडिया के लेखकों के दिक्कत यह है कि वह 1000 लाइक के आधार पर खुद को परसाई, शरद जोशी घोषित कर सकते हैं क्योंकि इन्हे तो कभी ऐसे लाइक ना मिले थे। तो यह जिम्मेदारी है सोशल मीडिया के लेखक की वह समग्रता में देखे चीजों को, परंपरा का विधिवत अध्ययन करे। गाली-गलौच से बचे। पर कई सिद्ध बड़े लेखक सोशल मीडिया के लेखन को दूसरी वजहों से खारिज करते हैं। जैसे किसी ने एक मठ बनाया, एक पत्रिका बनायी, कुछ चेले पाले, कुछ को यह पुरस्कार दिलाया, कुछ को वो सम्मान दिलाया, फिर अपने मठानुकूल बनाकर नाम प्रसिद्धि दिलायी। उन्हे लगता है कि अरे सोशल मीडिया के कई लेखक लेखिकाओं को बिना हमारे मठ में आये, बिना हमें नमस्ते किये हुए सब कुछ मिल रहा है। उन्हे अपने मठ का, अपनी पत्रिका का, सुतनादेवी पुरस्कार जो चेलों को दिलवाया था, एकदम व्यर्थ जान पड़ता है। अपना निवेश उन्हे एकदम चौपट दिखायी देता है। तो वह फिर नयों को कोसते हैं, फेसबुक को कोसते हैं। कोसने की वजहें दूसरी हैं, बताते हैं कि व्यंग्य का नुकसान हो रहा है, जैसे पत्रिकाओं में छपे हर व्यंग्य से व्यंग्य का भला ही हो रहा हो। जैसे किताबों में छपे हर व्यंग्य से व्यंग्य उन्न्त ही हो रहा हो। मठाधीशी पर सीधी चोट करता है सोशल मीडिया, इसलिए मठाधीशों को सोशल मीडिया खराब लगता है। उसकी समस्याएं हैं, पर मठाधीशों के हमले की वजहें दूसरी हैं। व्यंग्य की गुणवत्ता से ज्यादा उन्हे उन्हे अपने मठों की चिंताएं हैं। नयी पीढ़ी ज्यादा लिहाज नहीं करती। सामने मुंह पर टिका देती है जवाब। यह बात परंपरागत मठाधीशों को बुरी लगती है, उन्होने झोला थामे चेले देखे हैं यहां आपका झोला छीनकर ले जानेवाले वीर हैं सोशल मीडिया पर। सोशल मीडिया को माध्यम मानें , जैसे किताब, अखबार , पत्रिका में छपी हर बात से व्यंग्य का भला नहीं होता, वही बात सोशल मीडिया पर लागू होती है। सोशल मीडिया को मठाधीशी पर चोट के लिए गरियाना सिर्फ निहित स्वार्थ है।
सवाल 16- अखबारों ने आज अपने फ़ार्मेट बदल दिये हैं। व्यंग्य 400 शब्दों तक सिमट गया है। व्यंग्य शुरु होते ही खत्म हो जाता है। पत्रिकायें जिनमें लंबे व्यंग्य छप सकते हैं उनका सर्कुलेशन बहुत कम है। क्या यह स्थिति व्यंग्य के लिये घातक नहीं है?
जवाब-देखिये ऐसा नहीं है, इस दौर में भी लंबे उपन्यासों के पाठक भी तो हैं ना। नये फार्मेट आयेंगे, नयी चुनौतियां आयेंगी। सुनील गावस्कर ने टेस्ट खेले, सचिन तेंदुलकर ने टेस्ट, वन डे, 20-20 सब खेले। अब गावस्कर कहें कि मैं सचिन को क्रिकेटर नहीं मानता कि वह 20-20 खेलते हैं, तो यह गलत होगा। अखबार साहित्यकारों के लिए, व्यंग्यकारों के लिए नहीं निकल रहे हैं, वहां व्यंग्य को जगह इसलिए मिल रही है, वह पब्लिक पढ़ती है। लंबे व्यंग्य छापनेवाली साहित्यिक पत्रिकाएं नहीं छप रही हैं तो क्या इसकी वजह यह नहीं है कि उन पत्रिकाओं को पढ़नेवाले कम हो रहे हैं। हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाएं कईयोँ के लिए यश, रोजगार का साधन हैं, उन्हे अपनी चिंता है, जो अफसर मेरे गेस्ट हाऊस, दारु के खर्चों को वहन कर ले, उसे मैं टाप साहित्यकार मान सकता हूं। चुबेर नगर कमोड मैन्युफेक्चरर एसोसियेशन मुझे सम्मानित कर दे, तो उस सम्मान के संयोजक को मैं महान व्यंग्यकार मान सकता हूं, इस भाव से आप साहित्यिक पत्रकारिता करेंगे और उम्मीद करेंगे कि आम पाठक आप के काम में दिलचस्पी ले, तो यह ठीक नहीं है। आपका निवेश हैं, आप समझें। साहित्यिक पत्रकारिता अब निवेश है और उसके करनेवाले पर्याप्त स्मार्ट धंधेबाज हैं। निवेश से अधिक ही उनको मिल रहा है, तब ही वह चला रहे हैं। उनमें व्यंग्य वगैरह का भला, साहित्य का भला देखना उनके निवेश के साथ अन्याय है। मुख्य धारा का अखबार अपने लाभ के लिए सन्नी लियोनी की फोटू लगा रहा है, तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक धनलाभ-यशलाभ-पुरस्कारलाभ के चुबेरनगर कमोड मैन्युफेक्चरर एसोसियेशन के संयोजक को महान व्यंग्यकार मान रहे हैं। दोनों में खास फर्क नहीं है, निवेश और प्रतिफल के मसले हैं यह। इंटरनेट ने काफी हद तक राह आसान कर दी है, अब कम लागत में गुणवत्ता वाले काम किये जा सकते हैं, बिना चुबेरनगर.. के संयोजक को महान माने। हां सम्मानजनक अपवाद हैं साहित्यिक पत्रकारिता में, पर वे इतने अपवाद हैं कि कहीं भी उनका जिक्र-फिक्र नहीं है।

सवाल 17- लोग कहते हैं कि व्यंग्य में ’पंच’ व्यंग्य लेखन की आत्मा टाइप होता है। लेकिन व्यंग्य कहानियों में पंच के अवसर कुछ कम टाइप होते हैं। तो क्या व्यंग्य कहानियों में व्यंग्य की आत्मा कम टाइप होती है?
जवाब-सवाल है पंच क्या है, पंच तिरछत्व से परिपूर्ण एक भंगिमा, एक बयान है। तिरछत्व लंबा नहीं चल सकता है, पंच लंबा बहुत लंबा नहीं हो सकता है। यह व्यंग्य-लेख की आत्मा है। कहानी का फार्मेट अलग है, कहानी सीक्वेंस में आगे बढ़ती है। कहानी का तत्व उत्सुकता है अब क्या होगा, अब क्या होगा। व्यंग्य लेख का तत्व पंच है, घूंसा है, जल्दी पड़ना चाहिए। हरेक का अपना टेस्ट है, अपनी क्षमताएं हैं, कहानी लेखन अलग किस्म के शिल्प की मांग करता है, व्यंग्य लेख का शिल्प अलग है। जिससे जो सध जाये, साध ले।
सवाल 18-व्यंग्य लेखन में आम तौर पर व्यंग्य की स्थिति पर चिंता व्यक्त करने वाले लोग नये-नये बयान जारी करते रहते हैं। सपाटबयानी सम्प्रदाय, गालीगलौज सम्प्रदाय, कूड़ा लेखन आदि। इस स्थिति को आप किस तरह देखते हैं।
जवाब-देखिये, रचनात्मक लेखन के मूल्यांकन की प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया है। जो आपको कूड़ा दिखाये दे, उसमें दूसरे को नगीने दिखायी पड़ सकते हैं। मोटे तौर पर यह मानना चाहिए कि समय और पाठक-यह फैसला करते हैं कि रचना है क्या। हरेक को अपनी रचना को महानतम मानने का हक है, बस यह हक नहीं है कि वह औरों से भी इसे मनवाने पर तुल जाये। रचना का मूल्यांकन फीता लेकर, तराजू लेकर नहीं हो सकता। मेरा मानना है कि लेखक को क्रियेटिव फ्रीडम होनी चाहिए कि वह क्या करे, फिर पाठक को भी फ्रीडम है कि वह क्या करे-पढ़े या ना पढ़े। दोनों की स्वतंत्रताओं का हनन नहीं होना चाहिए। मोटे तौर पर असरदार लेखन अपने पाठक देर-सबेर तलाश लेता है और पाठकों के बड़े हिस्से का प्यार भी हासिल कर लेता है। अब जैसे आप ज्ञान चतुर्वेदीजी को देखें। कमोबेश सहमति है कि उनका लेखन इस समय हिंदी व्यंग्य में प्रतिमान है। मैं व्यक्तिगत तौर पर 1991 के बाद के वक्त के व्यंग्य-समय को ज्ञान चतुर्वैदी युग मानता हूं। ज्ञानजी गोष्ठीबाज, पुरस्कारबाज, चुबेरनगर संयोजक-सम्मानित व्यंग्यकार नहीं हैं, पर दिल्ली से बहुत दूर रहकर, हिंदी व्यंग्य को जितना उन्होने प्रभावित किया है, उतना किसी भी समकालीन ने नहीं, तो यह काम की ताकत है ना, कमोबेश एक सर्वानुमति उभरती है ज्ञानजी को लेकर। तो पाठकों का प्यार और समय की छलनी, ये दो महत्वपूर्ण मसले हैं। समय की छलनी के पार कौन सा लेखन जाता है, सिर्फ गाली-गलौज के कारण कोई रचना बड़ी नहीं हो जाती। हम गौर से देखें, विश्व साहित्य में भी, जो गाली-गलौचयुक्त रचनाएं हैं, या अश्लील मानेजानेवाले संवादों से युक्त रचनाएं हैं, क्या सिर्फ गाली-गलौच के कारण बड़ी रचनाएं हैं, नहीं। गालिब अपने वक्त में सुपर फ्लाप शायर थे, अब गालिब की मौत के करीब 150 सालों बाद गालिब उन शायरों से बहुत आगे हैं, जो उनके जमाने में बहुत कामयाब माने जाते थे। तो मेरा मानना है कि आप काम करें, बाकी पाठकों और समय पर छोड़ दें।
सवाल 19- आप आम तौर पर व्यंग्य लेखन के विवादों से दूर रहते हैं। तटस्थ टाइप। दिनकर जी ने लिखा है ’जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध’। तो भविष्य में अपराधी ठहराये जाने से डर नहीं लगता ?
जवाब-जी विवादप्रियता में रस नहीं आता। देखिये समय बहुत कम है करने के लिए बहुत रचनात्मक काम हैं, बात प्राथमिकताओं की है। इतना तो है पढ़ने के लिए, इतना तो है करने के लिए। अभी फोटोग्राफी में रुचि पैदा हुई है,लगता है कि इसे सीखने में एक जन्म निकल जायेगा। तटस्थ मूलत फर्जी शब्द है, हरेक के तट अलग हैं, हरेक की गति अलग है। तटस्थ कोई हो नहीं सकता, हरेक की रचनाएं साफ करती हैं कि वह कहां है। कोई सिर्फ विवाद में ही रस लेता है। कोई थोड़ा रस लेता है। मेरी रुचि विवाद से ज्यादा रचनात्मक प्रक्रियाओं में है। हर रचनाकार से कुछ सीखने के लिए है, हर रचनाकार के पास कुछ है, जो खास है, मेरी दिलचस्पी इस में है। हर रचनाकार में उसकी खासियत, उसकी खूबी देखना चाहता हूं, सीखना चाहता हूं। सिर्फ व्यंग्य में नहीं, कथा में, उपन्यास में, पेंटिंग में, फोटोग्राफी में, मूर्तिकला में, संगीत में, सब तरफ से। मेरी इच्छा है कि एक ऐसा काम हो, जिसमें हर रचनाकार के लिखे में जो मुझे असरदार लगा, उसका एक कोश बनाऊं। समय-साध्य काम है, पता नहीं इस जन्म में कर पाऊंगा या नहीं।
सवाल 20-रागदरबारी और खोयापानी की तुलना करने को आपसे कहा जाये तो आप क्या कहेंगे?
जवाब-दोनों अलग रेंज के रचनाकारों का काम है। राग दरबारी के श्रीलाल शुक्ल गहरे पालिटिकल हैं, खोयापानी के मुश्ताक साहब मूलत पालिटिकल नहीं हैं। रागदरबारी में कथात्मकता का प्रवाह है, मुश्ताक साहब कथात्मकता के नहीं रोचक किस्सों के खिलाड़ी हैं। कथात्मकता का तकाजा है कि वह कहीं पहुंचाये आपको, किस्सों पे यह फर्ज नहीं है कि वो कहीं पहुंचायें, रोचक सी बात थी, बता दी, खेल खत्म पैसा हजम। खोया पानी समेत मुश्ताक साहब का लगभग सारा काम किस्सागोई है। पर राग दरबारी हमें कहीं पहुंचाता है, भले ही नैराश्य के एक भाव तक। मुश्ताक साहब के किस्सों के अंत अलग तरह से होते हैं, आम तौर पर सुखांत होते हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि मुश्ताक साहब श्रीलाल शुक्ल से छोटे रचनाकार हैं। मुश्ताक साहब दर्शन के गहरे व्याख्याता हैं व्यंग्य की भाषा में, यह कमाल है। व्यंग्य में दर्शन समझाना लगभग असंभव काम है। मुश्ताक साहब इस काम को बहुत ही असरदार तरीके से करते हैं। मौत के जैसे खिलंदड़े मंजर आपको मुश्ताक साहब के यहां मिलते हैं, वो अनूठे हैं। दर्शन खालिस दर्शन है वह। तो मोटा-मोटा यह समझ सकते हैं कि श्रीलाल शुक्लजी मूलत पालिटिकल हैं, मुश्ताक साहब मूलत किस्सेबाज दार्शनिक हैं। दोनों ही महान हैं, बेशक।
सवाल 21-परसाई जी के लेखन में विसंगति का वर्णन करने के साथ कहीं न कहीं बदलाव का भी आह्वान दिखता था। आज के समय के व्यंग्य लेखन में विसंगति वर्णन तक ही रह गया है मामला। इस बारे में क्या कहना है आपका?
जवाब-परसाईजी की राजनीति का फ्रेम एकदम साफ है, विसंगति यह है, बदलाव ऐसे हो, ऐसे आह्वान वहां साफ दिखायी पड़ जाते हैं। पर मसला यह है कि परसाईजी के जीवनकाल में ही उस राजनीति की सफलता-विफलता को लेकर डिबेट शुरु हो गयी थी। पूरे विश्व में उस राजनीति की विफलताओं की लंबी डिबेट चली। पर विचारधारा का अपना महत्व होता है। परसाईजी के लिए आसान था कि विसंगति को चिन्हित करके उस विचारधारा से संपुष्ट बदलाव का आह्वान कर सकें। अब मामला बहुत कनफ्यूजन का है। आप देखें नब्बे के दशक तक, सोवियत संघ के विघटन से पहले चीजें एकदम साफ थीं, आप इस तरफ हैं या उस तरफ हैं। पर अब मामला बहुत कनफ्यूजन का है, इसमें समस्या है, पर इसके विकल्प के तौर पर जो हल बताये जा रहे हैं, उसमें भी कम समस्याएं नहीं हैं। तो अब विसंगतियां दिखायी पड़ती हैं, पर उनके सुधार के लिए संभावित हल को लेकर भी एकदम पक्के तौर पर आश्वस्ति का भाव नहीं है। आप जितना समझेंगे, जितना पढ़ेंगे, जितना जानेंगे उतना संदेह गहरा होता जाता है कि यह प्रस्तावित हल काम करेगा भी कि नहीं। तो व्यंग्य लेखक अब विसंगतियों का वर्णन कर ले, यह भी कम नहीं है।
सवाल 22- व्यंग्य का विपुल लेखन करने वालों की किताबें आते-आते लेखक बुढा जाता है। किताब छपती भी है तो अधिकतर प्रकाशक पैसा लेकर छापते हैं। उनका लेखन लोगों तक पहुंच नहीं पाता। इस स्थिति को कैसे देखते हैं आप?
जवाब-यह पुराना सवाल है। लेखन लोगों तक पहुंचे, इसके लिए अब तो फेसबुक भी है, ट्विटर भी है। प्रकाशक की अपनी समस्याएं हैं। अब तो खुद भी प्रकाशक बनना मुश्किल नहीं है। थोड़ा तकनीकी ज्ञान हो, तो लोगों तक अपनी बात पहुंचाना मुश्किल नहीं है। अब लेखक को तकनीकी तौर पर खुद सक्षम होकर अपनी बात सीधे तौर पर पाठकों तक पहुंचानी चाहिए।
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