Monday, March 13, 2017

’सब मिले हुये हैं’ -लेखक संतोष त्रिवेदी के कुछ पंच

’सब मिले हुये हैं’ -लेखक संतोष त्रिवेदी के कुछ पंच
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1. लिखे हुये का सम्मानित होना आवश्यक है, अन्यथा लिखना ही वृथा।
2. सम्मानोपरान्त लेखन की अपनी आभा होती है। लेख के बाद कैप्शन में दिया जा सकता है- लेखक फ़लां-फ़लां पुरस्कार से सम्मानित ।
3. वे लिखने से समझौता कर सकते हैं पर सम्मान से नहीं।
4. एक दिन के लिये सेल में आने वाली चीजें ऐसा इम्प्रेशन देती हैं कि यदि उनके साथ थोड़ी भी ढिलाई बरती गयी तो वे आउट ऑफ़ स्टॉक की माला पहन लेंगी।
5. ऑनलाइन शॉपिंग की खूबी है कि कोई जान ही नहीं पाता कि अगले ने कितने का आर्डर किया है।
6. सरकार कई सालों से आम आदमी को नचा रही है पर यह उसका विशेषाधिकार है।
7. जनता की ओपिनियन चुनाव के पहले जाहिर होने से सरकार को चंदे का टोटा भी पड़ जाता है और काफ़ी बड़ा निवेश उसके हाथ से निकल जाता है।
8. हमारे देश में राजा के लिये अलग अलग नियम हैं।
9. ऐसी सरकार या मंत्री ही नाकारा है जो जासूसी के योग्य नहीं हैं।
10. जहां देश गिर रहा है, समाज गिर रहा है, बादल और पहाड़ गिर रहे हैं, रिश्ते-नाते और चरित्र गिर रहा है, इन सबके बीच यदि बेचारा रुपय्या गिर रहा है तो कौन सा पहाड़ टूट जायेगा?
11. जो कुछ नहीं करते वे कमाल करते हैं।
12. लालबत्ती धारी होने से फ़ायदा यह है कि बिना कुछ कहे उनके सारे काम हो जायेंगे।
13. नेता बनने के बाद जो भी काम होते हैं, सब जनता के ही नाम से जाने जाते हैं।
14. पढाना भी कोई नहीं है। पढाई से न तो प्रोडक्टिविटी बढती है और न देश की जीडीपी।
15. जिस चीज के पीछे बाजार हो जाता है, वैसे भी वह सभ्य और सामाजिक ट्रेडमार्क बन जाता है।
16. बाजार ही हमारा सच्चा समाज है- खेल,सिनेमा और मीडिया तो महज अदने से औजार।
17. गरीब वैसे भी हर किसी की भौजाई होता है और भौजाई से फ़ागुन में मजाक तो बनता है।
18. देश आलू-टमाटर से कहीं बड़ा है और उससे भी बड़ा मसला है हमारे गौरव का। बच्चों के लिये स्कूल या अध्यापक भले न हो पर पाठ्य-पुस्तकों में हमारे अतीत का बखान जरूर हो।
19. मंहगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे तो स्वत: निपट जायेंगे जब धर्म और संस्कृति पर खतरा दिखाया जायेगा।
20. चुनाव कई दुश्मनों को दोस्तों में और दोस्तों को दुश्मनों में बदल देता है।
21. (चुनाव में) घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति कट्टर सेकुलर हो जाता है और सेकुलर को अचानक राष्ट्रहित के सारे विकल्प खोजने पढ जाते हैं।
22. गरीबी पर चर्चा पिछड़ेपन की निशानी है, बहस करनी है तो ’डिजिटल इण्डिया’ पर करो। शब्द बदलने चाहिये ताकि उसके अर्थ ढूंढे जा सकें।
23. असल मंजिल वही पाते हैं जो सुविधानुसार अपने रास्ते बदल लेते हैं।
24. शिखर पर वही विराजते हैं जो शरीर ही नहीं आत्मा बदलने की क्षमता रखते हैं।
25. सबके दिन बहुरते हैं। कोई ऊपर-ऊपर बटोर पाता है तो कोई तलहटी से मलाई मार लाता है।
26. भ्रष्टाचार जिस कुर्सी पर बैठता है, वह नैतिकता का पाठ पढने लगती है।
27. हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं।
28. मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं, भक्तों के नहीं। इसलिये वे वहां भरतनाट्यम करें, मल्लयुद्ध करें या माइक उखाड़ें सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है।
29. किसी की खूबसूरती पर पूछकर लिखने से वो मौलिकता और वो भाव नहीं आ सकते जो छुप-छुपकर देखने और चाहने के अनुभव से आते हैं।
30. चुनावी जीत भी चंदेबाजों और धंधेबाजों की होती है।
31. पूरे देश में अब खास नहीं आम होने में रार मची हुई है।

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’सब मिले हुये हैं’ -एक खुरपेंचिया दोस्त की नजर में


गये साल संतोष त्रिवेदी का पहला व्यंग्य संग्रह ’सब मिले हुये हैं’ आया था। पुस्तक मेले के अवसर पर। छपते ही लेखक को मिलने वाली प्रतियों में से एक मास्टर जी ने भेजी थी। उसके बाद पुस्तक मेले में और किताबों के अलावा सुशील सिद्धार्थ जी की ’मालिश महापुराण’ भी खरीदी थी। कुछ दिनों दोनों किताबें मेज पर, यात्रा में , बैग में साथ-साथ रहीं- जैसे उन दिनों दोनों गुरु-चेला (मित्र-मित्र पढें अगर गुरु चेले पर एतराज हो)। एक बार जबलपुर से वाया दिल्ली कलकत्ता जाते हुये दोनों किताबें बाकायदे पेंसिल से निशान लगाते हुये पढीं भी गयीं। सोचा था इनके बारे में विस्तार से लिखेंगे। लेकिन लिख न पाये। मालिश महापुराण पर इसलिये कि उसके बारे में छपी समीक्षाओं का ’गिनीज बुक रिकार्ड’ टाइप बन गया होगा। हमको संकोच हुआ कि सूरज को क्या 20 वाट का बल्ब दिखायें।

संतोष त्रिवेदी के ’सब मिले हुये हैं’ के बारे में लिखने की बात भी आई-गई हो गयी। पूरी किताब एक बार पढकर भी लिखना न हो पाया। बाद में स्थगित होते-होते एकदम टल गया। दोनों किताबें भी दोनों मित्रों की तरह की बदली स्थितियों के अनुसार अलग-अलग कमरों में अलग-अलग अलमारियों में पहुंच गयीं।

’सब मिले हुये हैं’ के अधिकतर लेख अखबारों में छपे हुये हैं। छपने की जल्दी में फ़ौरन फ़ाइनल करके भेजे लेख। अखबार में छप जाने के बाद लेख ऐसे भी किताब में छपने की पात्रता हासिल कर लेता है। उसी पात्रता के तहत किताब में शामिल हुये लेखों में समसामयिक घटनाओं पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। ज्यादातर लेख सरकार के किसी काम या बयान पर जनता के नुमाइन्दे की तीखी प्रतिक्रिया के रूप में हैं। सरोकार के भरपूर। जिधर देखो उधर सरोकार ही सरोकार।

संतोष त्रिवेदी के लेखन का श्रेय केन्द्र की वर्तमान सरकार को भी जाता है। जिस समय उन्होंने अखबार में छपना शुरु किया संयोग से उसी समय वैचारिक रूप से उनके विपरीत मिजाज वाली सरकार सत्ता में आई। लेखन ने जब ’सरकार मुकाबिल हो तो अखबार में लेख निकालो’ पर अमल किया और दनादन लेख लिखे। एक बार जब लेखन और छपन का चस्का लगा और सरकार कोई मुद्दा हासिल नहीं करा पाई तो सामान्य बातों पर भी की बोर्ड खटखटा दिया।

संतोष त्रिवेदी की किताब की भूमिका लिखते हुये सुशील सिद्धार्थ जी ने लिखा है- ’समकालीन व्यंग्य-लेखन के युवा परिदृश्य में संतोष त्रिवेदी एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं।’ हालिया समय की सबसे लोकप्रिय वनलाइनर लिखने वाली रंजना रावत जी ने लिखा -’संतोष जी के व्यंग्यों की विशेषता यह है कि वह हास्य और व्यंग्य का समानुपात रखते हैं।’

हमने आज इस किताब को पंच के लिहाज से दोबारा देखा, पढा। कुल जमा इकत्तीस पंच मिले 127 पेज में छपे 55 लेखों में। मतलब फ़ी लेख लगभग आधा पंच। हो सकता है कोई फ़ड़कता हुआ पंच निगाह से चूक गया हो। दुबारा देखने पर नजर आये।

हम आलोचक नहीं हैं। संतोष त्रिवेदी हमारे मित्र हैं। मित्र की किताब को मित्र नजरिये से ही देखा जाता है। गुस्सा है तो कह देंगे -कूड़ा है। मन खुश तो कह देंगे - कलम तोड़ दी यार तुमने तो।

होली के मौके पर लिखने का फ़ायदा है भी है कि आइंदा कोई बुरी लगने वाली बात भी धड़ल्ले से कही जा सकती है।
इसी बात पर याद आया कि पिछले साल जब हम यह किताब पढ रहे थे और लखीमपुर से कानपुर आते हुये कुछ देर एक कोल्हू पर रुके थे। वहां देखा कि गन्ना पेरने पर सबसे ऊपर की मैल सरीखी परत को बहाने के बाद तब बाकी का गुड़ बनाते हैं। उस समय सोचा था कि जब संतोष की किताब पर लिखेंगे तब यही लिखेंगे कि लेखन की गुड़ की भेली बनने के पहले बहाये शीरे सरीखी है यह किताब। अब यह निकल गयी अब शानदार गुड़ बनाओ। लेकिन अब सोच हैं तो यह बड़ी हल्की बात लगती है। एक मुकम्मल किताब को खारिज करने का इससे घटिया संवाद और क्या होगा?

संतोष के लेख चूंकि तात्कालिक परिस्थितियों पर लिखे गये। जब छपे उसी समय लोग उसको समझ गये होंगे लेकिन समय के साथ प्रसंग भूल जाते हैं। ’काले चश्में का गुनाह’ ’उनकी कैंटीन और हमारी कटिंग चाय’ ,’खटिया के नीचे जासूस’, ’गायब होते देश में’, ’गिरता हुआ रुपय्या’ आदि इसी तरह के लेख हैं। इन लेखों की खासियत है कि लेख विषय पर ही जमा रहता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है कि लेख घूम-घूमकर वहीं ’कदमताल’ करता रहता है। मतलब कहने का लेख इकहरा टाइप बना रहा रहता है।

संतोष और हमारे समेत तमाम साथी जो तकनीक की सुविधाओं के विस्फ़ोट एक मंच पाये अपने को अभिव्यक्त करने का उनके सामने फ़ौरन छपने की सुविधा तो है लेकिन साथ ही खतरा भी है कि हम लोग छपने से ही खुश हो जाने की आदत की गिरफ़्त में आ सकते हैं। संतोष तो खैर उमर से भले ही युवा हैं लेकिन समझ में सिद्ध लेखकों को भी हिदायतें देने की हैसियत रखते हैं। देते भी रहते हैं। लेकिन आज ’सब मिले हुये हैं’ पढते हुये अपने लेखन की तमाम कमियां समझ में आ रही हैं।

आजकल हम पंच संकलन के काम में लगे हुये हैं। इसलिये हर व्यंग्य लेख को पंच के पैमाने से देखते हैं। यहां पंच मेरी समझ में ऐसे वाक्य से है जो लेख से एकदम अलग करके स्वतंत्र रूप में अपने में एक धांसू डायलाग के रूप में प्रयोग किया जा सके। पंच की औकात गठबंधन सरकार में निर्दलीय की तरह होती है। होता भले अकेले हो लेकिन मिलता मंत्री पद है।

पंच के लिहाज से ’हम सब मिले हुये हैं’ में और बेहतरी की गुंजाइश थी। भूमिका लिखने वाले दोनों लेखक सुशील सिद्धार्थ और रंजना रावत दोनों पंच मास्टर हैं। उनसे सीखना चाहिये हम लोगों को। संतोष , सुशील के दीगर व्यवहार पर नजर रखने की बजाय यह देखते कि गुरु जी पंच कैसे लगाते हैं तो पंच दुगुने तो हो ही जाते। कई जगह कोई पंच बनते-बनते रह गया और वाक्य बनकर पैरे से जुड़ा रहा।

संतोष त्रिवेदी का जब यह व्यंग्य संकलन आया था तब से उनकी समझ बहुत परिपक्व हुई है। अध्ययन भी बढा है। अब आगे उनका अगला व्यंग्य संकलन जो आयेगा उसमें आशा है कि और शानदार रचनायें होंगी।

यह लिखना इसलिये कि संतोष त्रिवेदी की भेजी किताब एक जिम्मेदारी के रूप में थी और मन में था कि इसके बारे में लिखना है। यह इस किताब के बारे में अंतिम बयान नहीं है। आज की सोच है मेरी। कल को इसके किसी और पहलू पर भी लिखा जा सकता है। किताबों और लेखक के बारे में विचार तो बदलते रहते हैं।

संतोष त्रिवेदी को उनके पहले व्यंग्य संकलन के लिये पन्द्रह महीने बाद बधाई। होली की शुभकामनायें बधाई के साथ मुफ़्त में। :)
किताब: सब मिले हुये हैं
लेखक: संतोष त्रिवेदी
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
पेज:127
कीमत: 250 रुपये
किताब में आये चुनिन्दा पंच यहां बांचियेhttps://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210820289476768


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Sunday, March 12, 2017

बुरा न मानो होली है



होली के मौके पर टाइटल की पहली किस्त जारी की जा रही है। अपने खास मित्रों के लिये अगली किस्त शेष अगले अंक में । जिनको टाइटल पसंद न आये हों वे बताएं तो उनके टाइटल बदल देंगे। मुफ्त में। :)
1.Gyan Chaturvedi: व्यंग्य के शिखर से ’हम न टरब’।
2. प्रेम जनमेजय: ’व्यंग्य यात्रा’ के लिये व्यंग्य की जमीन जोतता व्यंग्यकार।
3. Harish Naval: बागफ़त के खरबूजे शराफ़त के मारे दिल्ली के कोल्ड स्टोरेज में।
4. Hari Joshi: अमेरिकी सड़कों की तरह सपाट/सर्राट व्यंग्यकार।
5. Anup Srivastava श्रीवास्तव: व्यंग्य की इमारत नींव की ईंट - रोज सरकने पर आमादा।
6. Arvind Tiwari: मैनपुरी चक्कू के व्यंग्य की बेहद तीखी धार,
अभी इतना ही ’शेष अगले अंक में’ यार।
7. Subhash Chander: व्यंग्य के इतिहास में नाम लिखवाने की एकमात्र दुकान।
8. Sushil Siddharth:
 गुरु तो बढिया देव सा, पर चेला मिला फ़िरन्ट,
ठांव, कुठांव देखे नहीं, है आये दिन पटकंत।
वलेसी की आफ़त है जी।
9. Alok Puranik:
हास्य-व्यंग्य संसार में लिये 'बाजार-लुकाठी' हाथ,
जिसको चलने का मन करे, वो चले हमारे साथ।
सरकार (सरोकार नहीं भाई) भी साथ चलेगी।

10. संतोष त्रिवेदी: सरोकारविहीन लेखन और सपाटबयानी ’सब मिले हुये हैं।’
11. Nirmal Gupta: हैंगर पर टंगा एंगर , सूखकर व्यंग्य बनता भयंकर।
12. Lalitya Lalit: हम इनाम लेने का कभी बुरा नहीं मानते।
13. Suresh Kant: उधौ मोहि बब (ब से बैंक) विसरत नाहीं।
14. Alankar Rastogi: ’सभी विकल्प खुले हुये हैं’ बस रॉयल्टी मिल जाये।
15. Anoop Mani Tripathi:होशियार, ख़बरदार 'शो रूम में जननायक' पधार रहा है।
16. DrAtul Chaturvedi: लोग इनाम के लिये जुगाड़ लगाते हैं, अपन का जुगाड़ ऐसा है कि बिना जुगाड़ के मिलता है इनाम।
17. Anshu Mali Rastogi:
हॉट माल हमको मिला, मिली सन्नी लियोनी आय,
सुनत सनाका खा गये, बोली हल्लो भाईजी हाय।
18. Dilip Tetarbe:
गाली की गिनती करने की इतनी बड़ी सजा न दो,
फ़िर से गिनती की है,हमने संख्या पहुंची तीन सौ दो।
19. Shefali Pande: मजे के अर्थशास्त्र के बाद क्या लिखना।
20. अर्चना चतुर्वेदी: ’शराफ़त का टोकरा’ उठाओ भाई ’मर्द शिकार पर हैं’।
21. Indrajeet Kaur: ’ईमानदारी का सीजन’ खत्म हो फ़िर जुगलबंदी में भाग लिया जाये।
22. Arifa Avis: व्यंग्य के बगीचे की ताजा बयार।
23.Udan Tashtari समीरलाल:
व्यंग्य की लाज बचाना बेटा,
आहिस्ते से मैदान में आना बेटा।
ये व्यंग्य के लोग जरा वैसे हैं
यहां फ़ौरन न छा जाना बेटा।
24. राजेश सेन: ऐसा कोई अखबार दिखा नहीं, जिसमें मेरा लेख छपा नहीं।
25.गिरीश पंकज: (व्यंग्य) माफ़िया जिन्दाबाद।
26. Sanjay Jha Mastan: व्यंग्य की जुगलबंदी का मानस पुत्र व्यंग्यकार।
2Anuj Tyagi: डॉ कहो या व्यंग्यकार, आगरे का हूं यार।
28. Govind Gautam: हमने तो राय दे दी, आप मानो न मानो होली है।
29. सुनीता शानू: व्यंग्य के अखाड़े में नवोदित सास।
30. Ramesh Tiwari: उदीयमान, उभरे हुये, स्थापित आल इन वन आलोचक।
31. Ranjana Rawat: कातिलाना वनलाइनर स्थाई अड्डा।
32. Yamini Chaturvedi: वनलाइनर से व्यंग्यकार तक मजेदार सफ़र।
33. एम.एम. चन्द्रा: जुगलबंदी के पहले मेले से बिछुड़ा अकेला व्यंग्यकार।
34. Alok Saxena Satirist: सटायरिस्ट सटा लिया अब लिखें न लिखें सटायरिस्ट तो रहना ही है।
35. Pankaj Prasun: पिछले कवि सम्मेलन से अगले कवि सम्मेलन की यात्रा में लगा व्यंग्यकार।
36 अरविन्द कुमार: जरा दिल बहक गया था वैसे बाकी तबियत ठीक है।
37. ALok Khare: वाह दद्दा, हम को भी नहीं छोड़ोगे?
38. शशिकांत सिंह: प्रजातंत्र के प्रेत के बारे में बतायेंगे।
39. Surjeet Singh: अभी तो हम लिख रहे हैं।
40. Neeraj Badhwar: हम कह चुके हैं ’हम सब फ़ेक हैं।’ पर लोग यकीन नहीं करते। बेवजह जलते हैं।
41. Brajesh Kanungo: कविता, कहानी, व्यंग्य जिस मैदान में चाहो निपट लो।
42. Om Varma: अब बस जमा रहे हैं व्यंग्य। तब तक यह दोहा सुनिये।
43. प्रमोद ताम्बट: व्यंग्यलोक का सरोकारी बासिन्दा।
44. Shashi Pandey: कविता और व्यंग्य की जुगलबंदी।
45. Surendra Mohan Sharma: व्यंग्यकारों पर सतर्क निगाह रखने वाले वकील। सुशील जी और संतोष त्रिवेदी की मोहब्बत के चश्मदीद गवाह।
46. Devendra Kumar Pandey: लोहे के घर का मजबूरन आशिक।
47. Hari Hindaun: टाइटल मिला, मिठाई बांटो।
48. Kush Vaishnav: ब्लॉगरों को झांसा देकर सेलेब्रिटी लेखक बनाता प्रकाशक।
49. सुनीता सनाढ्य पाण्डेय: आग लगाती दिखी फ़ेसबुक लाइव पर।
50.Vivek Srivastava: हमको लड़कियों से बात करने में बड़ी शरम आती है। इसीलिये हम उनसे कोच्चन करने लगते हैं। वो हमको बॉय करके चल देती हैं।
51. अनूप शुक्ल: न धेले भर का सऊर न कौड़ी भर अक्ल
देने चले टाइटल, फ़ुरसतिया अनूप शुक्ल।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210811251450823

Saturday, March 11, 2017

ब्लॉगों पर बिना लाग - लपेट


[आज राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में ’हास्य के बदलते रंग-ढंग’ पर चार पेज के परिषिष्ट में अपन का लेख भी छपा। इसके संयोजक आलोक पुराणिक रहे। लेख छपने की खुशी जो है सो तो है ही सबसे ज्यादा मजे की बात यह है कि इसी बहाने हम युवा लेखक हो गये। टाइपिंग की गलतियां जो रहीं सो रहीं लेकिन सम्पादकीय कतरनी से कई गलतबयानी टाइप भी हो गयीं। ब्लॉगों लेखकों के पंच संतोष त्रिवेदी के खाते में जमा हो गये। अरविन्द जी से तिवारी उड़ गया। नाम तो कई लोगों के छूट गये। जिसके भी छूटे उससे यही कहना है- आपके बारे में अलग से विस्तार से लिखना है इसलिये सबके साथ शामिल नहीं किया। फ़िलहाल बांचिये हमारा लेख। बाकी के भी पोस्ट करते हैं जल्दी ही। ]
आज सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का सबसे शक्तिशाली मंच है। फ़ेसबुक, ट्विटर पर किसी भी समसामयिक घटना पर आम जनता की चुटीली टिप्पणियां देखने को मिलती हैं। पहले यह काम ब्लॉग पर होता था। हिन्दी ब्लॉगिंग की शुरुआती दिनों के लेखन पर टिप्पणी करते हुये कवि, संपादक अनूप सेठी ने जनवरी ,2005 में नया ज्ञानोदय में अपने लेख, ’अभिव्यक्ति का नया चैप्टर-ब्लॉग’ में लिखा था:

“जहां साहित्य के पाठक कपूर की तरह हो गये हैं, लेखक ही लेखक को और संपादक ही संपादक की फिरकी करने में लगा है, वहां इन पढ़े-लिखे नौजवानों का गद्य लिखने में हाथ आजमाना कम आह्लादकारी नहीं है। वह भी मस्त मौला, निर्बंध लेकिन अपनी जड़ों की तलाश करता मुस्कराता, हंसता, खिलखिलाता, जीवन से सराबोर गद्य। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय। लोकल और ग्लोबल। यह गद्य खुद ही खुद का विकास कर रहा है, प्रौद्योगिकी को भी संवार रहा है। यह हिंदी का नया चैप्टर है।”

ब्लॉग ने अनगिनत लोगों को अभिव्यक्ति का मौका दिया है। लेखक और पाठक के बीच से संपादक हट गया। इधर लिखा, उधर छाप दिया। कानपुर से कोई लेख होते ही उधर कुवैत से जीतेन्द्र चौधरी की चुलबुली टिप्पणी पर अनूप शुक्ल मुस्कराते हुये कोई जबाब देने की सोचे तब तक उधर अमेरिका से ई-स्वामी या अतुल अरोरा की फ़ड़कती टिप्पणियां आ गयीं। टिप्पणियों का सिलसिला आगे बढते हुये देखते हैं कि घंटे भर में पोर्टलैंड से इन्द्र अवस्थी जबाबी लेख का लिंक सटा हुआ है। इस लेख अन्त्याक्षरी में रविरतलामी के गजल की तर्ज पर व्यंजल या फ़िर कनाडा से समीर लाल की मुंडलिया भी जुड जाती।

अभिव्यक्ति की सहजता और आजादी ब्लॉगिंग का प्राणतत्व रहा। ब्लॉग की इस खूबी के चलते ही हास्य-व्यंग्य के लेखकों का विस्फ़ोट सा हुआ। कुमायूंनी चेली के नाम से ब्लॉग लिखने वाली शेफ़ाली पाण्डेय ’मजे का अर्थशास्त्र’ की लेखिका बन जाती हैं, ’बैसवारी’ और ’टेड़ी उंगली’ के नाम से ब्लॉगिंग करने वाले संतोष त्रिवेदी ’सब मिले हुये हैं’ छपाकर उदीयमान व्यंग्यकार बनते हैं।

ब्लॉग के माध्यम से जो लेखक सामने आये उनकी अभिव्यक्ति की अनगढ ताजगी गजब की लगती रही। पंच जबरदस्त हैं। 2006 में आवारा आशिका का चित्रण करते हुये निधि श्रीवास्तव लिखती हैं- ’मौसम की तरह कुछ लोग भी चिपचिपे होते हैं ।’ पेशे से चार्टेड एकाउंटेंट शिवकुमार मिश्र ने ’दुर्योधन की डायरियां’ लिखीं। आज घटित हुई किसी घटना को दुर्योधन के नजरिये से देखा। भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर शिवकुमार मिश्र के दुर्योधन अपनी डायरी में लिखते हैं:
“पता नहीं ये किसान क्या चाहते हैं. ये साल भर चिल्लाते रहते हैं कि खेती-बाड़ी से इनका पेट नहीं भरता और जब ज़मीन को रथ उद्योग के लिए ले लिया गया ओ बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं. मैं पूछता हूँ; ऐसी ज़मीन में खेती करने का क्या फायदा जो पेट न भर सके? खेती-बारी से किसानों को ही जब खाने को नहीं मिलता तो ऐसी ज़मीन से मालगुजारी उगाहना राजमहल के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन जाती है. कितना अच्छा होता अगर ये ज़मीन हस्तिनापुर में रह जाती और इन किसानों को ले जाकर किसी सागर को अर्पण कर सकते.”
पढाई से आई.आई.टी. कानपुर से गणित-ग्रेजुएट अभिषेक ओझा अपनी नौकरी में किसी लोन की मंजूरी करने में खतरे की गणना से जब भी मौका पाते हैं अपने पटनिहा किस्से में बदलते समय की दास्तान लिखते हैं:
“माने इतना तेजी से हमेशा बदलाव आता है कि हमीं लोग इतना कुछ देख लिए? पंद्रह पैसा के पोस्ट कार्ड से व्हाट्सऐप तक ! हमको लगता है पहिले ज़माना धीरे धीरे अपडेट होता था. ई फ़ोन के देखिये पता नहीं भीतरे भीतर दिन भर का अपडेट करते रहता है. हमारे खाने पीने के फ्रिकवेंसी से जादे इसका अपडेट होता है. ओहि गति से दुनिया भी अपडेट हो रही है.”
शेफ़ाली पांडेय ’ये क्या लगा रखी है असहिष्णुता, असहिष्णुता ?’ में साहित्यकार के मुंह से कुछ बयान दिलाने के पहले उसका परिचय कराती हैं। देखिये क्या स्तर है पढाई का साहित्यकार का:
“साहित्य क्या होता है यह सवाल आप मुझसे कर रहे हैं मुझसे ? साहित्य के क्षेत्र में मेरा दखल इतना है साहब कि आप सुनेंगे तो चौंक जाएंगे । मैं रोज़ सुबह दो अखबार पढता हूँ । एक - एक खबर को बारीकी पढता हूँ । अपहरण, बलात्कार,छेड़छाड़ और हत्या की सारी ख़बरें मुझे मुंहजबानी याद रहती हैं ।“
बाद में पोस्ट लिखने की और सहजता के चलते हिन्दी ब्लॉगिंग से जुडे लोग फ़ेसबुक से जुड गये। लेखन की आवृत्ति बढी पोस्ट का साइज घटा। लम्बी पोस्टों की जगह छुटकी टिप्पणियों ने ले ली और हास्य व्यंग्य के घराने में वनलाइनर की धमाकेदार इंट्री हुई।
ब्लॉगिग से फ़ेसबुक की तरफ़ आने की प्रक्रिया में हास्य-व्यंग्य लेखकों का महाविस्फ़ोट हुआ। देखा-देखी लोग लेखन के मैदान में आये। साल भर तक पाठक की हैसियत से टिप्पणी करने वाले राजेश सेन धड़ल्ले से अखबारों में छपने लगते हैं। लोग इंतजार करते हैं कि आज रंजना रावत किस विषय पर अपनी चुटीली टिप्पणियां करती हैं या फ़िर अंशुमाली रस्तोगी आज किसकी फ़िरकी लेने वाले हैं।

ये तो कुछ उदाहरण हैं जिनका जिक्र किया यहां मैंने इसके अलावा अनगिनत लेखक प्रतिदिन हास्य-व्यंग्य लिख रहे हैं सोशल मीडिया की सुविधा का उपयोग। हरेक के सैकडों पाठक हैं जो उनके लेख का इंतजार करते हैं। शंखधर दुबे ऐसे ही एक लेखक हैं जो शिक्षा व्यवस्था की राजनीति पर लिख रहे हैं। अब तक सत्तर से ऊपर किस्से लिख चुके हैं। बस पालिश करते ही छपने लायक। आंचलिक तेवर में लिखा गया ’लप्पूझन्ना’ नेट पर मौजूद एक बेहतरीन उपन्यास अनछपा उपन्यास है।
सोशल मीडिया ने नये हास्य-व्यंग्य लेखक को लिखने, छपने का मौका देने के हास्य व्यंग्य के लेखकों को आपस में जोड़ने का काम भी किया है। अरविन्द तिवारी, प्रेम जन्मेजय, सुभाष चन्दर, सुशील सिद्धार्थ, निर्मल गुप्त अर्चना चतुर्वेदी, इन्द्रजीत कौर, अलंकार रस्तोगी, अनूप मणि त्रिपाठी , अभिषेक अवस्थी से लेकर सुरजीत , आरिफ़ा अविस से परिचय ही न हुआ होता अगर इनकी रचनायें फ़ेसबुक पर न पोस्ट हुई होती। यहां लेखकों का जमावड़ा न हुआ होता तो न ’शेष अगले अंक में’ (अरविन्द) और न ही ’ब से बैंक’ (सुरेश कान्त) । न ’नारद की चिन्ता’( सुशील सिद्धार्थ) खरीद पाते न ही हरामी चरित्रों का बेतरतीब कोलाज ’अक्कड़-बक्कड’ (सुभाष चन्दर) से रूपरू हो पाते।
सोशल मीडिया में लेखकों के आपस में जुड़ने के क्रम में तमाम पुराने प्रयोग नये रूप में भी हो रहे हैं। लतीफ़ घोंघी और ईश्वर शर्मा (दोनों दिवंगत) की नब्बे के दशक में की हुई व्यंग्य की जुगलबंदी की तर्ज पर सितम्बर’2016 को शुरु हुई व्यंग्य की जुगलबंदी में अब तक लगभग 200 लेख लिखे जा चुके हैं। इसमें हर रविवार को दिये विषय़ पर व्यंग्य लेख व्यंग्य लेख लिखे जाते हैं। इन लेखकों में पुरानी पीढी के अरविन्द तिवारी से लेकर सबसे नयी पीढी की आरिफ़ा एविस लेख लिखती हैं। देखा देखी तमाम सिद्ध और फ़ेसबुकिया साथी लेखक देवेन्द्र पाण्डेय, राजीव (विवेक) रंजन श्रीवास्तव, मनोज कुमार , कमलेश पाण्डेय आदि भी अपने लेख लिखते हैं। ’व्यंग्य की जुगलबंदी’ का स्तर इस बात से समझा जा सकता है कि हर बार इसमें शामिल कोई न कोई लेख किसी न किसी राष्ट्रीय दैनिक अखबार में किसी न किसी रूप में छपता है।
सोशल मीडिया ने लेखक ही नहीं प्रकाशक भी बनाये हैं। अनूप शुक्ल (फ़ुरसतिया) और पल्लवी त्रिवेदी के हास्य-व्यंग्य पढते-पढते जयपुर के कुश रुझान प्रकाशन बनाकर इनकी किताबें छापते हैं। छह महीने में बिना किसी तामझाम के ’बेवकूफ़ी का सौंदर्य’ और ’अंजाम-ए-गुलिश्तां क्या होगा’ की पंद्रह सौ से ऊपर प्रतियां आनलाइन बेच लेते हैं। दो अनजान से लेखकों को सेलिब्रिटी लेखक टाइप बना देते हैं। फ़िर आज के सबसे लोकप्रिय व्यंग्यकार आलोक पुराणिक का ’कारपोरेट प्रपंचतंत्र’ छापते हैं।
यह सोशल मीडिया पर हास्य-व्यंग्य के लेखन को मिली स्वीकार्यता ही है कि अब ’ईबुक’ और ’प्रिन्ट आन डिमांड’ की सुविधा के बाद तो लेखक अपनी किताब खुद छाप और बेच सकता है। अनूप शुक्ल अपनी पहली किताब ’पुलिया पर दुनिया’ और हाल ही में अलंकार रस्तोगी का दूसरा व्यंग्य संग्रह ’सभी विकल्प खुले हैं’ इस बात का उदाहरण है कि लोग ई-बुक और प्रिंट ऑन डिमांड की किताबें भी खरीदकर बांचते हैं।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें लेखक की रेपुटेशन को नहीं उसके लेखन को भाव मिलता है। नाम नहीं काम चलता है। अगर आप ठीक-ठाक और नियमित लिखते हैं तो आपको देर-सबेर पाठक मिलेंग॥ पाठक जो अपनी टिप्पणियों से आपके लेखन को सराहता तो है ही इशारों ही इशारों आपको ठोंक पीट कर सराहता (संवारता) भी है और अगर जमे रहे और सीखते रहे मजाक-मजाक में आपको अच्छा लेखक भी बना सकता है।
तो सोच क्या रहे हैं? आज से ही लिखना शुरु कीजिए अपना हास्य-व्यंग्य लेखन और शामिल होईये नामचीन लेखकों की कतार में। देखिये अनगिनत पाठकों की टिप्पणियां और पसंद आपके लेख का इंतजार कर रही हैं। आपका समय शुरु होता है अब !

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Tuesday, March 07, 2017

पंचबैंक-4

1.ऐसा लगता है मनुष्य में अपने आप पर हंसने का साहस नहीं रहा। दूसरों पर हंसने में उसे डर लगता है।
2. व्यंग्यकार को जो कुछ कहना होता है वो हंसी-हंसी में इस तरह कह जाता है कि सुनने वाले को भी बहुत बाद में खबर होती है।मैंने कभी किसी ठुके हुए मौलवी और व्यंग्यकार को लिखने-बोलने के कारण जेल में जाते नहीं देखा।
3. बिच्छू का काटा रोता और सांप का काटा सोता है। इंशाजी (इब्ने इंशा)का काटा सोते में मुस्कराता भी है। जिस व्यंग्यकार का लिखा इस कसौटी पर न उतरे उसे यूनिवर्सिटी के कोर्स में सम्मिलित कर देना चाहिए।
4. समाज जब अल्लाह की धरती पर इतरा-इतरा कर चलने लगते हैं तो धरती मुस्कराहट से फट जाती है और सभ्यताएं इसमें समा जाती हैं।
5. मुस्कान से परे वो विपरीतता और व्यंग्य जो सोच-सच्चाई और बुद्धिमत्ता से खाली है, मुंह फाड़ने , फक्कड़पन और ठिठोल से अधिक की सत्ता नहीं रखता।
6. धन, स्त्री और भाषा का संसार एक रस और एक दृष्टि का संसार है, मगर तितली की सैकड़ों आँखे होती हैं और वो उन सबकी सामूहिक मदद से देखती हैं। व्यंग्यकार भी अपने पूरे अस्तित्व से सब कुछ देखता, सुनता, सहता और सराहता चला जाता है। फिर वातावरण में अपने सारे रंग बिखेरकर किसी नए क्षितिज, किसी और रंगीन दिशा की खोज में खो जाता है।
-मुश्ताक़ अहमद युसूफी
अपने उपन्यास 'धन यात्रा' की भूमिका में

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210745146078230

Monday, March 06, 2017

झाड़े रहो कलट्टरगंज -4

इसके पहले का किस्सा बांचने के लिये इधर आयें https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210716067631287
एक तरफ़ जहां सिंघाड़े का सौदा करने वाले जमा थे वहीं एक जगह कुछ औरतें सिंघाड़े बीनने पछोरने का काम कर रही थीं। अलग-अलग साइज के सिंघाडे अलग कर रही थीं। सूप और छलनी लिये काम में चुपचाप जुटी हुईं थीं। उनमें से एक मुझे फ़ोटो खींचते देखकर पास आ खड़ी हुई।
पता चला कि उस महिला का नाम परदेशन है। वह शायद उन कामगार महिलाओं की इंचार्ज थी। बात करने लगी। उसकी बातचीत से पता चला कि वर्षों पहले वह कानपुर आई थी। तबसे यहां काम करती है। पास में ही झोपड़िया है। दिन भर काम करने के बाद शाम को थककर खाना खाकर सो जाती है।
वहीं पर अंदर एक आदमी खाना खा रहा था। बोरों पर बैठे लोगों ने उस आदमी के बारे में मजाकिया लहजे में कुछ कहा। परदेशन से उनको डपट दिया। उसके बारे में कुछ मजाक किया तो परदेशन ने उसको मारने के लिये हाथ उठाया लेकिन मार नहीं। हंसते हुये घुड़ककर छोड़ दिया। मसाला रंगे , धिसे दांत चियारते हुये वह आदमी हल्की हंसी हंसने लगा।
परदेशन मेहनती है। बातचीत और हावभाव से दबंग टाइप। उसके चेहरे पर निराला जी की वह तोड़ती पत्थर का दैन्य नहीं बल्कि एक मेहनती कामगार का आत्मविश्वास है।
फ़ोटो खिचाने की बात पर कई फ़ोटो खिंचाये परदेशन ने। हमने खींचकर दिखाये तो खुश हुई। फ़िर एक फ़ोटो सिंघाड़े के पास बैठकर उस ढेर पर हाथ फ़िराते हुये खिंचाया। देखकर खुश हुई। हमने वादा किया है कि उसको ये फ़ोटो बनवाकर देंगे। अभी इस फ़ोटो को देखते हुये उस वादे की याद आई। उसकी फ़ोटो बनवाकर देनी है।
पास में ही बोरे भरने के बाद सिलने और उस पर नीली/हरी स्याही की सील टाइप लगाने का काम हो रहा था। मुंह भरने के बाद भरे हुये बोरे इस तरह चुपचाप खड़े हो गये थे जैसे किसी तेज-तर्रात बाबू की जेब गरम करने के बाद वह आज्ञाकारी मुद्रा अपना लेता है।
सामने से पल्लेदार एक गोदाम से बोरे निकालते हुये ला रहा था। सिंघाड़े के ढेर में पलटकर फ़िर वापस जा रहा था। ढेर के ऊपर खड़ा दूसरा साथी बोरा पलटवाने में उसका सहयोग कर रहा था। साथी हाथ बढाना मुद्रा में।
पता चला कि साल में करीब आठ महीने काम रहता है। इसके बाद काम कम हो जाता है। जब यह फ़ोटो लिये तब शिवरात्रि आने वाली थी इसीलिये भीड़ जैसी थी वहां पर। दीगर दिनों में कम लोग रहते हैं वहां।
लोगों ने हमको कैमरा लादे देखा तो पूछा भी कि क्या मैं प्रेस से हूं। कौन अखबार में काम करता हूं। हमने जब बताया कि हम ऐसे ही निठल्ले टहल रहे हैं तो उनको काफ़ी देर लगी यह बात मानने में।
लोगों से बतियाये और फ़िर वापस लौटकर आये। आज इसे पोस्ट करते हुये एक बार फ़िर से कह रहे हैं -झाड़े रहो कलट्टरगंज।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210735100907107

पंचबैंक-3

आज कुछ पंच Suresh Kant जी के उपन्यास ’ब से बैंक’ से। उपन्यास के बारे में इस कड़ी पहुंचकर बांच सकते हैं https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10208422208886252
1. इन कुत्तों को देखकर यह निष्कर्ष बडी आसानी से निकाला जा सकता था कि अपने देश में मनुष्यों का जीवन स्तर निम्न और कुत्तों का उच्च है।
2. यों तो गैर-कानूनी काम अपने देश में बुरा नहीं समझा जाता, और फ़लस्वरूप अनेकानेक गैर कानूनी काम यहां बाइज्जत संपन्न किये जाते हैं।
3. दफ़्तर में यूनियन इसलिये होती है कि ज कोई कर्मचारी मैनेजमेंट को गालियां सुना आये तो उसे मैनेजमेंट के षड़यंत्रों से बचाया जा सके।
4. सभ्य आदमियों को घृणा करने का शौक होता है। नित्य प्रति उन्हें कोई न कोई सामग्री ऐसी मिलती रहनी चाहिये, जिससे कि वे घृणा कर सकें, अन्यथा उनका स्वास्थ्य खराब होने का अंदेशा रहता है।
5. और यह सब मैनेजर की नाक के नीचे होता था, जिससे कि अनुमान लगाया जा सकता है कि मैनेजर की नाक कितनी लंबी थी।
6. मैनेजमेंट का जो आदमी फ़ालतू हो जाता है, उसे मैनेजर बना दिया जाता है।
7. मैनेजमेंट की नजरों में वही कर्मचारी ज्यादा काम करता है जो दफ़्तर में देर तक बैठा रहे, फ़िर चाहे वह सारा समय हाथ पर हाथ धरे ही क्यों न बैठा रहे।
8. इतना सब होने के बावजूद वहां कोई फ़्राड नहीं होता था, तो यह ब्रांच के दुर्भाग्य के अलावा अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता था।
9. ईमानदार वे इतने अधिक थे कि अध्यापिकाओं को जितना वेतन देते थे, ठीक उससे दुगुने पर ही हस्ताक्षर करवाते थे।
10. प्रेम खेत में नहीं पैदा होता और न ही ब्लैक में मिलता है। इसे पाने के लिये तो सिर तक देना पड़ता है और यही कारण है कि सच्चे प्रेमी अपनी प्रेमिका को प्राप्त करने के लिये अपनी पत्नी का सिर तक दे डालते हैं।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210737344203188

Saturday, March 04, 2017

पंचबैंक-2


ईमानदार आदमी
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1. ईमानदार आदमी जिस दल में होता है, उसी दल की आलोचना करता है और तब तक करता रहता है जब तक उसे धक्का मारकर पार्टी से निकाल नहीं दिया जाता है।
2. ईमानदार आदमी का स्वागत अगर अफ़सर करता है तो दफ़्तर के प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ती हैं।
3. दफ़्तर हमेशा अफ़सर से बड़ा होता है, जैसे पार्टी हमेशा मुख्यमंत्री से बड़ी होती है।
4. अफ़सर को हमेशा बाबू की टिप्पणियों से संतुष्ट होना पड़ता है। जब कभी कोई अफ़सर बाबू की टिप्पणियों से संतुष्ट नहीं होता तो वह किसी फ़ाइल में फ़ंस जाता है या फ़िर उसका तबादला हो जाता है।
5. मंत्री बेईमान आदमियों को संरक्षण देता है , क्योंकि वे उसे चुनावी चंदा देते हैं। उसके लिये दलाली करते हैं।
6. इस देश में कोई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में फ़ंसे , तो समझ लो उसके स्टॉफ़ में कोई ईमानदार आदमी है।
7. ईमानदार आदमी दूर से पहचाना जा सकता है। जल्दी पहचान होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि ईमानदार आदमी देश में गिने-चुने हैं।
Arvind Tiwari जी के व्यंग्य संग्रह ’मंत्री की बिन्दी’ से|

झाड़े रहो कलट्टरगंज -3


इसके पहले का किस्सा बांचने के लिये इधर आइये:
अहाते के अन्दर घुसते ही मंडी का नजारा दिखा। पल्लेदार बोरे में सिंघाड़े लादे इधर से उधर कर रहे थे। कोई गोदाम से लादकर बाहर खुल्ले में पलट रहा था। कोई बिके हुये माल को उठाकर ले जा रहा था।
पीठ पर बोरा लादे बदन झुकाये पल्लेदार को देखते ही दुष्यन्त कुमार का शेर याद आया:
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा
लगता है दुष्यन्त जी ने यह शेर किसी पल्लेदार को देखकर ही लिखा होगा।
भूरे रंग के सिंघाड़े देखकर लगा कि मानो कत्था बिक रहा हो। एक बार पता लग गया फ़िर भी कई बार यही एहसास हुआ कि कत्थे के ढेर लगे हुये हैं।
वहीं घुसते ही कुछ लोग बोरे के आसनों पर बैठे दिखे। कोई ऊंघ रहा था। कोई चिलम सुलगा रहा था। हमारे हाथ में कैमरा देखकर चिलम वाले ने थोड़ा संकोच सा किया। लेकिन जैसे ही हम बतियाने लगे तो सहज हो गया और दम मारकर चिलम दूसरे को थमा दी। वह भी धुंआ खैंचने लगा। कोई पुडिया फ़ाड़कर मसाले को सीधे मुख-कुंड में हवन सामग्री की तरह डाल रहा था।
पता लगा कि ये लोग पास के गांवों से सिंघाड़े का सौदा करने आये हैं। किसी के कुछ बोरे बिक गये हैं , कुछ का सौदा होना बाकी है। खरीददार के इंतजार में पलक पांवड़े बिछाये हुये हैं।
लोगों ने बताया कि इस बार सिंघाड़े के दाम गिर गये हैं। जिसके दाम पिछले साल 100 रुपये मिले थे उसके इस बार 60 रुपये ही मिल रहे थे। लोगों ने बताया कि नोटबंदी का असर भी रहा किसानों को अपनी उपज के दाम कम मिलने में। लोगों के पास पैसा ही नहीं था मजूरी देने के लिये। इसके अलावा मांग भी कम हो गयी।
सिंघाड़े के लिये तालाब खरीदना, सिंघाड़े लगाना, उसकी रक्षा करना , तोड़ना , सुखाना और फ़िर बाजार तक लाना। बहुत मेहनत का काम है। लेकिन करना पड़ता है भाई। पेट भरने के लिये सब करना पड़ता है।
जहां आदमी इकट्ठा होता है वहीं बाजार लग जाता है। चाय वाले लोगों को चाय बेचने के लिये आ गये। घुमंतू चाय की दुकानें लग गयीं। एक मटर चाट वाला अपना आधे से ज्यादा खोमचा चाट बेंच चुका था। बाकी भी निपटाने ही वाला था। बोला - ’रोज नहीं आते यहां। आज छुट्टी का दिन था इसलिये यहां आ गये। रोज यहां इत्ते ग्राहक नहीं मिलते।’

जारी है किस्सा अगली पोस्ट में

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210716067631287

Friday, March 03, 2017

पंचबैंक-1

1. पालिटिक्स के साये में प्रतिक्रियाएं बदल जाती हैं। मुझे लगता है कि सच्चा नेता बचपन में फेल होने का जिम्मेदार अपनी लफंगई को ना ठहराता होगा, वह कहता होगा कि समाज उसके खिलाफ है।
1. भारतीय समाज में छोड़ने का महत्व बहुत अधिक है।इतना है कि देशहित और तमाम नागरिकों की चिंता का त्याग करने वाला युगप्रवर्तक माना जाता है।भले ही युगप्रवर्तक सबको ऐसा नाच नचाए कि पूरा मुल्क नर्तक बन जाए।
2. फ़कीर बनने के बाद त्याग को रागरुदन में प्रसारित करने का आनंद ही कुछ और है।
3. अच्छे नागरिक की पहचान यह है कि समाज में कोई भी असफल हो,सबकी ज़िम्मेदारी वही ले।
4. लोकतंत्र में उछलने और कूदने,सुलगाने और बुझाने का एक जैसा सम्मान है।
5. बाज़ार का आनंद लेने वाले लोग बाज़ार के ख़िलाफ़ लिखते बोलते रहते हैं।आनंद लेने से व्यक्ति के तौर पर रुतबा बनता है।ख़िलाफ़त करने से बुद्धिजीवी के तौर पर हनक बनती है।आदर्श भारतीय को रुतबा और हनक दोनों की चाहत रहती है।
1. औसत से ज्यादा प्रदर्शन राजनीति में व्यक्ति को अपच का शिकार बना देता है।
2. सत्ता की अपनी मजबूरियां होती हैं और महत्वाकांक्षाओं के अपने अजगर जो अन्दर ही अन्दर करवट लेते रहते हैं।
3. सियासत में किसी दृश्य में रूठना मनाना होता है तो कहीं चरण लोटन। कहीं बेशर्मी से समझौते भी करने पड़ते हैं। असल में यहां स्वाभिमान ताक पर रखने की चीज है और सिद्धान्त खूंटियों पर टंगे लोगों की तरह।
1. जिंदगी के खेल में जीत और हार से भी बढ़कर खिलाडियों की स्किल से इतर स्पोर्ट्समेन स्प्रिट होती है।स्प्रिट घाव पर चुपड़ी जाये या सिप की जाये,उसका मजा अन्तोत्ग्त्वा कमाल करता है।
2. देशभक्त टाइप के लोग दरअसल मूढमति होते हैं।ये हर जरूरी –गैर जरूरी विमर्श में बेवजह ‘भक्ति’ को केंद्र में ले आते हैं।कुछ क्रिकेटर भी अद्भुत प्राणी होते हैं हर तरह के बतंगड को लूज डिलीवरी मान कर अपना बल्ला भांज देते हैं या उसे गेंद समझते हुए डाइव मार देते हैं।
3.विचारक तटस्थ दृष्टा होते हैं।भूगोल की सीमा रेखा से परे विश्व नागरिक।वे गोले बारूद असॉल्ट राइफल मिसाइल आदि से सरकार और सरोकार के खिलाफ़ फ्रेंडली मैच इसलिए खेलते हैं ताकि विवाद की पिच पर उनका नाम बना रहे।
1. बड़ा ही भ्रमित संसार है | यहाँ परोपकार और धंधा दोनों आपस में गलबहियां कर साझा हित साधते हैं |
2.जिसके पास दांत है, उसके पास खाने को चने नहीं | और जिसके पास खाने को चने हैं, उसके पास अपने दांत नहीं | या जिसके पास कंघी है, उसके सिर पर बाल नहीं | और जिसके सिर पर बाल हैं, उसके पास कंधी भले ही हो मगर उसे संवारने के लिए वक्त की कमी है | मतलब यह कि, भाव है तो अभाव की अल्पता है | और अभाव है तो भाव का टोटा है | समय तो अपनी किफ़ायत को लेकर बेजा ही बदनाम है |
3.आज आदमी सरल इसलिए है क्योंकि कठिन होना उसका नैसर्गिक गुण नहीं है | और कठिन इसलिए है क्योंकि सरलता उसका सहज उपार्जित भाजन है |
1. तारीफ़ आदम-जात की जन्मजात कमज़ोरी होती है | ऐसा कोई इंसान नहीं जो तारीफ़ के झुनझुने से न बहलता हो |
2. आत्ममुग्धता के पेड़ पर चढ़े हुए अहंकारी मानव को पेड़ से नीचे उतारने के लिए कई बार पेड़ के नीचे प्रशंसा की एक निरीह बकरी बांधनी होती है | तो कभी-कभी उसे लुभाने के लिए आपको पेड़ के नीचे चापलूसी का अबोध गधा भी बांधना पड़ सकता है |
3.प्रशंसा और चापलूसी के बीच भेद करना बड़ा ही टेढ़ा काम है | दोनों के बीच अंतर की एक बड़ी ही महीन विभाजन रेखा होती है | कब कोई प्रशंसाकार पर-तारीफ़ करते-करते चापलूसी की सरहदों में प्रवेश कर जाता है, ये पता ही नहीं चलता |
4.चापलूसी का अपना निजी हित होता है | अपना स्व-अर्जित और स्वयं-भू हासिल होता है | अपना अ-लिखित वैभवी इतिहास होता है | चापलूसी अक्सर जीत जाती हैं | ‘चापलूसी सर्वत्र विजयेत’ रहती हैं !!!



https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210712574903971

झाड़े रहो कलट्टरगंज-2

पिछली पोस्ट बांचने के लिये इधर आयें
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210706115702495
ऐसा माना जाता है कि कनपुरिया बाई डिफ़ाल्ट मस्त होता, खुराफ़ाती है, हाजिर जवाब होता है।(जिन कनपुरियों को इससे एतराज है वे इसका खंडन कर दें , हम उनको अपवाद मान लेंगे।) मस्ती वाले नये-नये उछालने में इस् शहर का कोई जोड़ नहीं है। गुरू, चिकाई, लौझड़पन और न जाने कितने सहज अनौपचारिक शब्द यहां के माने जाते हैं। मुन्नू गुरू तो नये शब्द गढ़ने के उस्ताद थे। लटरपाल, रेजरहरामी, गौतम बुद्धि जैसे अनगिनत शब्द् उनके नाम से चलते हैं। पिछले दिनों होली पर हुयी एक गोष्ठी में उनको याद करते हुये गीतकार अंसार कम्बरी ने एक गजल ही सुना दी-समुन्दर में सुनामी आ न जाये/ कोई रेजर हरामी आ न जाये।
जैसे पेरिस में फ़ैशन बदलता है, उसके साथ वैसे ही कानपुर में हर साल कोई न कोई मौसम उछलता है वैसे ही कानपुर् में कोई न् कोई जुमला या शब्द् हर साल् उछलता है और कुछ दिन जोर दिखा के अगले को सत्ता सौंप देता है। कुछ साल पहले नवा है का बे का इत्ता जोर रहा कि कहीं-कहीं मारपीट और स्थिति तनावपूर्ण किंतु नियंत्रण में है तक पहुंच गयी।
कानपुर के ठग्गू के लडडू की दुकानदारी उनके लड्डुऒं और् कुल्फ़ी के कारण् जितनी चलती है उससे ज्यादा उनके डायलागों के कारण चलती है-
ठग्गू के लड्डू
1.ऐसा कोई सगा नहीं
जिसको हमने ठगा नहीं
2.दुकान बेटे की गारंटी बाप की
3.मेहमान को मत खिलाना
वर्ना टिक जायेगा.
4.बदनाम कुल्फी —
जिसे खाते ही
जुबां और जेब की गर्मी गायब
5.विदेसी पीते बरसों बीते
आज देसी पी लो–
शराब नहीं ,जलजीरा.
दो दिन पहले अगड़म-बगड़म शैली के लेखक Alok Puranik अपने कानपुर् के अनुभव सुना रहे थे। बोले -कनपुरिये किसी को भी काम् से लगा देते हैं। मुझे लगता है कि अगर वे रोज-रोज नयी-नयी चिकाई कर लेते हैं तो इसका कारण उनका कानपुर में रहना रहा है। राजू श्रीवास्तव के गजोधर भैया कनपुरिया हैं इसीलिये इतने बिंदास अंदाज में हर चैनेल पर छाये रहते हैं।
कानपुर में मौज-मजे की परम्परा के ही चलते भडौआ साहित्य का चलन हुआ जिसमें नये-नये अंदा़ज में पैरोडियों के माध्यम से स्थापित लोगों की खिंचाई का पुण्य काम शुरू हुआ। आज किसी एक् शहर के सर्वाधिक सक्रिय ब्लागर की गिनती की जाये तो वे कानपुर के ही निकलेंगे। यह भी कि इनमें से ज्यादातर मौज-मजे वाले मूड में ही रहते हैं(अभय तिवारीजी संगति दोष :) के चलते कभी-कभी भावुक हो जाते हैं) ।दिल्ली वाले इसका बुरा न मानें क्योंकि किसी शहर में जीने-खाने के लिये बस जाने से उसका मायका नहीं बदल जाता।
तमाम जुमलों और शब्द-समूहों के बीच एक जुमले की बादशाहत कानपुर में लगातार सालों से बनी हुयी है। किसी ठेठ् कानपुरिया का यह मिजाज होता है। इसके लिये कहा जाता है- झाड़े रहो कलट्टर गंज। यह अधूरा जुमला है। लोग आलस वश आधा ही कहते हैं। पूरा है- झाड़े रहो कलट्टरगंज, मण्डी खुली बजाजा बंद।
आलोक जी ने इस झन्नाटेदार डायलाग का मलतब पूछा था कि इसके पीछे की कहानी क्या है!
दो साल पहले जब मैं अतुल अरोरा के पिताजी ,श्रीनाथ अरोरा जी, से मिला था तब उन्होंने इसके पीछे का किस्सा सुनाया था जिसे उनको कानपुर् के सांसद-साहित्यकार स्व.नरेश चंद्र चतुर्वेदीजी ने बताया था। श्रीनाथजी कानपुर के जाने-माने जनवादी साहित्यकार हैं। इसकी कहानी सिलबिल्लो मेरी पसंदीदा कहानियों में से एक है। कनपुरिया जुमले का किस्सा यहां पेश है।
कानपुर में गल्ले की बहुत बड़ी मण्डी है। जिसका नाम कलट्टरगंज है। यहां आसपास के गांवों से अनाज बिकने के लिये आता है। ढेर सारे गेहूं के बोरों को उतरवाने के लिये तमाम मजूर लगे रहते हैं। इन लोगों को पल्लेदार कहते हैं।
पल्लेदार शायद् इसलिये कहा जाता हो कि जो बोरे उतरवाने-चढ़वाने का काम ये करते थे उसके टुकड़ों को पल्ली कहते हैं। शायद उसी से पल्लेदार बना हो या फिर शायद पालियों में काम करने के कारण उनको पल्लेदार कहा जाता हो।
उन दिनों पल्लेदारों को उनकी मजूरी के अलावा जो अनाज बोरों से गिर जाता था उसे भी दे दिया जाता था। दिन भर जो अनाज गिरता था उसे शाम को झाड़ के पल्लेदार ले जाते थे।
ऐसे ही एक पल्लेदार था। उसकी एक आंख खराब थी। वह् पल्लेदारी जरूर करता था लेकिन शौकीन मिजाज भी था। हफ़्ते भर पल्लेदारी करने के बाद जो गेहूं झाड़ के लाता उसको बेंचकर पैसा बनाता और इसके अलावा मिली मजूरी भी रहती थी उसके उसके पास।
शौकीन मिजाज होने के चलते वह अक्सर कानपुर में मूलगंज ,जहां तवायफ़ों का अड्डा था, गाना सुनने जाता था। वहां उसे कोई पल्लेदार न समझ ले इसलिये वह बनठन के जाता था। अपनी रईसी दिखाने के मौके भी खोजता रहता ताकि लोग उसे शौकीन मिजाज पैसे वाला ही समझें।
ऐसे ही एक दिन किसी अड्डे पर जब वह पल्लेदार गया तो उसने अड्डे के बाहर पान वाले से ठसक के साथ पान लगाने के लिये कहा। ऐसे इलाकों में दाम अपने आप बढ़ जाते हैं लेकिन उसने मंहगा वाला पान लगाने को कहा।
पान वाला उसकी असलियत जानता था कि यह् पल्लेदार है और इसकी एक आंख खराब है। उसने मौज लेते हुये जुमला कसा- झाड़े रहो कलट्टगंज, मंडी खुली बजाजा बंद।
झाड़े रहो से उसका मतलब- पल्लेदार के पेशे से था कि हमें पता है तुम पल्लेदारी करते हो और् अनाज झाड़ के बेंचते हो। मंडी खुली बजाजा बंद मतलब एक आंख (मंडी -कलट्टरगंज) खुली है, ठीक है। दूसरी बजाजा (जहां महिलाओं के साज-श्रंगार का सामान मिलता है) बंद है, खराब है।
इस तरह यह एक व्यंग्य था पल्लेदार पर जो पानवाले ने उस पर किया कि हमसे न ऐंठों हमें तुम्हारी असलियत औकात पता है। पल्लेदारी करते हो, एक आंख खराब है और यहां नबाबी दिखा रहे हो।
यह एक तरह से उस समय के मिजाज को बताता है। अपनी औकात से ज्यादा ऐश करने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य है-घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने। एक आंख से हीन पर दो आंखों वाले का कटाक्ष है। एक दुकानदार का अपने ग्राहक से मौज लेने का भाव है। यह अनौपचारिकता अब दुर्लभ है। अब तो हर व्यक्ति येन-केन-प्रकारेण बिकने-बेचने पर तुला है।
बहरहाल, आप इस सब पचड़े में न पडें। हम तो आपसे यही कहेंगे- झाड़े रहो कलट्टरगंज, मण्डी खुली बजाजा बंद।
दस साल पहले लिखी पोस्ट http://fursatiya.blogspot.in/2007/07/blog-post_20.html

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