Thursday, February 28, 2019

बम का व्यास



तीस सेंटीमीटर था बम का व्यास
और इसका प्रभाव पडता था सात मीटर तक
चार लोग मारे गए ग्यारह घायल हुए
इनके चारों तरफ एक और बड़ा घेरा है - दर्द और समय का ।
दो हस्पताल और एक कब्रिस्तान तबाह हुए
लेकिन वह जवान औरत जो दफ़नाई गई शहर में
वह रहने वाली थी सौ किलोमीटर दूर आगे कहीं की
वह बना देती है घेरे को और बड़ा।
और वह अकेला शख़्स जो समुन्दर पार किसी देश के सुदूर किनारों पर
उसकी मृत्यु का शोक कर रह था - समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में।
और मैं अनाथ बच्चों के उस रूदन का ज़िक्र तक नहीं करूंगा
जो पहुँचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक
और उससे भी आगे
और जो एक घेरा बनाता है
बिना अंत और बिना ईश्वर का ।
रचनाकार -यहूदा आमिखाई
अनुवाद :Ashok Pande

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Wednesday, February 27, 2019

तुम्हारी याद गुनगुनी धूप सी पसरी है



आज दरवज्जा खोला तो देखा बाहर सूरज भाई जलवा नशीन हैं।
चारो तरफ़ धूप नहीं है लेकिन उजाला फ़ैला है। मानो सूरज भाई किरणों को छानकर कायनात में फ़ैला रहे हैं। छानने से धूप छन गयी है ,सूरज के पास रह गयी है । नीचे सिर्फ़ उजाला दिख रहा है। जैसे दूध से क्रीम छानकर बिना क्रीम का दूध सप्लाई करते हैं वैसे।
कमरे के दीवार पर रोशनी का एक टुकड़ा सटा हुआ है। मानो सूरज की मोहर हो और इस बात की पुष्टि कि उसने रोशनी सप्लाई कर दी है कमरे में। कमरे की दीवार जैसे सूरज भाई का हाजिरी रजिस्टर हो और सूरज भाई ने आते ही हाजिरी रजिस्टर पर अपनी ’चिडिया’ बैठा दी हो।
चिडिया से याद आया कि बरामदे के बाहर रेलिंग पर पिछले साल मिट्टी के दो बर्तन लाकर रखे हैं। उनमें पानी भर कर रख दिया है कि पक्षी आकर पियेंगे लेकिन जब से बर्तन रखा है आजतक कोई चिडिया नहीं दिखी बर्तन के पास। लगता है उनको पता नहीं कि यहां भी पानी मिलता है। शायद मुझे बरतन रखने के पहले उद्घाटन करना चाहिये। या फ़िर पानी के साथ-साथ कुछ दाना भी रखना चाहिये बर्तन के पास।
चाय की चुस्की लेते हुये सूरज भाई से मजे लेते हुये हमने कहा - भाई जी आप भी अपने आने-जाने की सूचना एस.एम.एस. से दिया करो न! सूरज भाई ठहाका मारकर हंसने लगे। बोले -हम क्या कोई आर्यावर्त की ट्रेन हैं जिनका आना-जाना अनिश्चित हो। हम तो रोज समय से आते हैं। तुम्हारे ही यहां कभी कोहरे का , कभी बादल का पर्दा पड़ा रहता है इसलिये तुम मुझे देख नहीं पाते हो और बातें बनाते हो। तुम अपनी जिन्दगी बहानेबाजी में ही गुजार देते हो।
मेरे साथ चाय पीते हुये सूरज भाई अपनी किरणों के कौतुक देख रहे थे। एक किरण बार-बार एक फ़ूल पर अलसाई ओस की बूंद के गोले पर सवारी करने की कोशिश कर रही थी। ओस की बूंद बार-बार हिल जा रही थी और किरण धप्प से फ़ूल की गोद पर गिर जा रही थी। ओस की बूंद खिलखिलाकर हंसने लगती और किरण के धप्प से गिरने से फ़ूल थोड़ा हिल जा रहा था। किरण फ़िर से ओस की बूंद पर सवार होने की कोशिश करने लगती।
कुछ देर बाद ओस की बूंद और किरण दोनों गायब हो गयीं। फ़ूल की पत्तियां शायद उनको कहीं जाता देख रही हों इसलिये हाथ हिलाकर टाटा सा करती दिखीं उनको।
देखते-देखते उजाले की जगह धूप पसर गयी है दसों दिशाओं में। हमने मौका देखकर सूरज भाई को अपनी कविता सुना दी:
तुम्हारी याद
गुनगुनी धूप सी पसरी है
मेरे चारो तरफ़।
कोहरा तुम्हारी अनुपस्थिति की तरह
उदासी सा फ़ैला है।
धीरे-धीरे
धूप फ़ैलती जा रही है
कोहरा छंटता जा रहा है।
सूरज भाई कविता सुनते ही छिटककर आसमान पर विराजने लगे और किरणों का डायरेक्शन संभाल लिया।
सुबह हो गयी।

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Sunday, February 24, 2019

राष्ट्रीय सहारा में (पंच) बैंक घोटाले साल भर पहले

 

1. सरकार तब सामने आती है,जब घोटालेबाज विदेश जा चुका होता है।सरकार के हाथ में भागते भूत की लँगोटी की तरह पासपोर्ट बचता है। -
2. हमारे देश में बैंक चुनाव जिताने के काम आते हैं।इंदिरा जी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके चुनाव जीतीं। नरेंद्र मोदी जी ने नोटबन्दी करके यू पी जीत ली। देखना होगा नीरव मोदी किसे चुनाव जिताते हैं। -अरविंद तिवारी
3. वीर भोग्या वसुंधरा औऱ चोर भोग्या बैंका। - Alok Puranik
4. आम मध्यवर्गीय चोरी औऱ ईमानदारी के मामले में भी मध्य में ही होता है। इतना वीर ना होता कि चोरी कर गुजरे और इतना ईमानदार ना होता कि चोरी न करने पर खुद को पुण्यवान महसूस करे। - आलोक पुराणिक
5. सिर्फ ईमान से तो आदमी ईमानदारी के संस्मरण भर इकठ्ठे कर पाता है जबकि माल्या के हुनर से तो बंदा कई पीढ़ियों का इंतजाम करता है। -आलोक पुराणिक
6. जिस तरह आत्मा नश्वर शरीर को त्याग करके परमात्मा में विलीन होती है वैसे ही बैंकों के बड़े लोन बैंक की देहरी लांघकर दूर देश में विलीन हो जाते हैं।
बैंकिंग घोटालों की प्रकृति सनातन भारतीय संस्कृति के अनुरूप है.. अनूप शुक्ल
7. प्रधानमंत्री का मानना है घोटालेबाजों के लिए इस देश में कोई जगह नहीं इसलिए विदेश भगाकर उन्हें कड़ी सज़ा दे रहे हैं । - Ranjana Rawat
8. नई स्कैम मशीन निकली है
उधर UPA से घोटाला अंदर डालो इधर NDA से घोटालेबाज बाहर - रंजना रावत
9. ज़मीं पे देश के खाने के हम नहीं क़ायल
जब विदेशों में न पहुंचा वो घोटाला क्या है। - Kamlesh Pandey
10. भारत एकमात्र ऐसा मुल्क है, जहां 'लोन' लेने के बाद चुकाने के 'लोड' से 'स्वतः मुक्ति' मिल जाती है। --Anshu Mali Rastogi
11. घोटाले न हों ऐसा भी तो नहीं हो सकता न। दुनिया में आए हैं तो बिन कांड किए तो जा नहीं सकते। --Anshu Mali Rastogi
12. अमीर होते होते आदमी एकदिन इतना अमीर हो लेता कि अपनी अमीरी बचाने के लिए घोटाले करने लगता है- अभिषेक अवस्थी
13. इधर हम खाते ही लिंक कराते रहे उधर बैंक ही लीक हो गया।- Anup Srivastava
14. हमें पैसा कमाने में डर नहीं लगता लेकिन पैसा बैंक में जमा कराने में डर लगता है। देर सबेर सारा गंवाया हुआ पैसा बैंक हम गरीबों से ही वसूल लेगा। - Anup Srivastava
15. देखो जी, घोटाले सब तो कांग्रेस के राज में होते हैं। हम लोग तो विदेश जाने का टिकट और वीजा देते हैं बस -Subhash Chander
16. हमारे मोहल्ले का चौकीदार,
रात को ज़ोर-ज़ोर से 'जागते रहो' कहता रहता है,
मानो कह रहा हो कि न सोउंगा न सोने दूंगा ...Kajal Kumar
17. घोटाला या गबन या डाका या भ्रष्टाचार कुछ भी कह लो, जनता को बेवकूफ़ बनाने के तरीके हैं. Samiksha Telang
18. कोई हवाई जहाज़ उड़ाए या मालपुए बनाये ,जिसके पास उचित रसूख,व्यापारिक कौशल और खनखनाते चांदी के जूते हैं,उनके लिए बैंक के स्ट्रांग रूम के रास्ते हमेशा खुले रहते हैं।बाकी लोगों के लिए सदाशयता के प्रमाण के लिए रस्सी से बंधा दो रूपये कीमत वाला बालपेन है ही। - Nirmal Gupta
19. अब विदेश जाकर बसने के लिए एक ही रास्ता बच रहेगा और वो होगा हमारे देशी नारे के साथ...मेक इन इण्डिया वाले का...कि बस भारत में इत्ते बड़े डिफॉल्टर बन जाओ..कि विदेश में आकर आराम फरमाओ..और खुद को मेड इन इण्डिया डिफॉल्टर का खिताब पहनाओ!! - Udan Tashtari
20. घोटालों का सबसे बड़ा फायदा राजनीतिक पार्टियों के बीच सद्भाइवपुर्ण माहौल विकसित करने के रूप में भी होता है। चूँकि सभी किसी न किसी घोटाले में फँसी होती हैं इसलिए अंदर से सभी एक दूसरे को नैतिक बल प्रदान करती रहती हैं। सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
21. चमड़ी से चांदी झरे, दमड़ी एक न जाय।
मीठी वाणी बोलिए, बैंक कोई फंस जाय।
कर्जा दे चकाचक। ...Devendra Kumar Pandey
22. ये भी कोई घोटाला है ...इतने रुपये का तो हम कनपुरिया साल भर में गुटखा थूक कर सड़क को गेरुआ किये रहते हैं। - Anita Misra
23. बैंकिंग पर ऐसे ऐसे लोग राय रख रहे हैं, जिन्हे सेविग बैंक खाते और चालू खाते का फर्क ना पता। - alok Puranik
24. विराट कोहली को वित्तमंत्री और बना के देख लो क्या पता अर्थव्यवस्था में जान आ जाए। अब सिर्फ टोटके ही बचे है बॉस - Anil Upadhyay
25. घोटाले हमारे देश में प्रतिस्पर्धा को बढावा देने का एक महत्वपूर्ण औजार है… हर बार एक नया चैलेंज सामने आता है कि पिछला लाख करोड़ का था तो अगला इस का दस गुना-बीस गुना होना चाहिये. -शिवकुमार मिश्र
26. घपले और घोटाले देश का सामान्य ज्ञान बढ़ाने में सहायक होते हैं। लोगों की उदासीनता तोड़कर चीजों को जानने की इच्छा पैदा करने के लिये घोटालों से बढ़कर कोई और चीज आज के जमाने में नहीं हो सकती।- अनूप शुक्ल
27. घोटालों के लिये कड़ी निन्दा काफ़ी नहीं है क्या ? -Shashi Pandey
28. वैसे देखा जाय तो जनता नेताओं से ज्यादा भ्रष्ट होती है । वो देखती है कौन पार्टी उसे ज्यादा “झांसा” दे रही है वो उसी के पाले जाती है । -Shashi Pandey
29. फेसबुक प्रोफाइल पर अपने आप को रुआब से बैंक अफसर लिखने वाले मित्र अब अपना जॉब स्टेटस बदलते नजर आ रहे हैं । Surendra Mohan Sharma
अखबार में बांचने के लिये नीचे दिये लिंक पर पेज 4 पर जायें http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx?queryed=17
संकलन- अनूप शुक्ल

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Monday, February 18, 2019

डिक्टेटर

 जैसे-जैसे साम्राज्य पर अहंकार और हवस बढ़ती जाती है डिक्टेटर अपने निजी विरोधियों को ईश्वर का विरोधी और अपने चाकर-टोले को बुरा बताने वालों को देशद्रोही बताता है। जो उसके कदमों में नहीं लोटते, उन पर ईश्वर की धरती का अन्न, उसकी छांव और चांदनी हराम कर देता है। लेखकों, कवियों को शाही बिरयानी खिलाकर ये बताता है कि लिखने वाले के क्या कर्तव्य हैं और नमकहरामी किसे कहते हैं।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
’खोया पानी ’

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बुढ़ापा

 जब मनुष्य को वर्तमान से अतीत अधिक सुंदर दिखाई देने लगे और भविष्य दिखाई देना बंद हो जाये तो समझ लेना चाहिए कि वो बूढ़ा हो गया है। यह भी याद रहे कि बुढ़ापे का जवानीलेवा हमला किसी भी उम्र में... विशेष रूप से जवानी में हो सकता है। अगर अफीम या हेरोइन उपलब्ध न हो तो उसे अतीत की याद और फैंटेसी में, जो थके- हारों का अंतिम आश्रय-स्थल है, खुशी महसूस होती है। जैसे कुछ बहादुर और कड़ियल लोग अपनी भुजाओं की शक्ति से अपना भविष्य आप बनाते हैं, इसी तरह वो अपने विचारों की शक्ति से अपना अतीत आप बना लेता है।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
’खोया पानी ’

इतिहास को तोड़ा नहीं जा सकता केवल समझा जा सकता है


हंगरी में मैंने योरोपीय ज्ञान, उदारता , दक्षता और प्रोफ़ेशनलिज्म को देखा और जाना जिसकी धाक पूरी दुनिया में जमी हुई है। हंगेरियन हालांकि अपने को पूरा योरोपियन नहीं मानते पर फ़िर भी जर्मनी के बहुत निकट रहने के कारण वे पूरी तरह योरोपियन हो गये है। कुछ रोचक प्रसंग हैं जिनके माध्यम से हंगरी के समाज को थोड़ा बहुत समझा जा सकता है। सन 1988-89 में जब पूर्वी और केन्द्रीय योरोप रूस के प्रभाव और समाजवादी सत्ता से बाहर निकला तो बहुतेरे देशों के शहरों में जो कम्युनिस्ट समय के नेताओं और विचारकों की मूर्तियां आदि लगी थीं उन्हें तोड़ दिया गया था। लेकिन हंगरी में ऐसा नहीं किया गया। हंगेरियन लोगों ने शहरों के केन्द्रों या अन्य स्थानों पर लगी कम्युनिस्ट युग की मूर्तियों को उखाड़ा और बुदापैश्त के बाहर एक मूर्ति पार्क बनाकर उन सब मूर्तियों को वहां लगा दिया। इसी तरह बुदापैश्त के पुराने के पुराने गिरजाघर की पुताई करने के सिलसिले में जब पिछली पुताई की परतें साफ़ की जा रही थी तो अचानक गिरजाघर के मुख्य भाग की दीवार पर कुरान की आयतें लिखी मिलीं। तुर्की ने हंगरी पर लगभग 200 साल शासन किया था और गिरजाघरों को मस्जिदें बना दिया था। तुर्की का शासन खत्म होने के बाद मस्जिदें पुन: गिरिजाघर बन गई थीं। इस गिरिजाघर में भी कभी मस्जिद थी। इसी कारण कुरान की आयतें लिखीं मिल गईं थी। गिरिजाघर में लिखी, कुरान की आयतों को मिटाया नहीं गया बल्कि वह जगह उसी तरह छोड़ दी गई।
हंगेरियन मानते हैं कि इतिहास को तोड़ा नहीं जा सकता केवल समझा जा सकता है।
असगर वजाहत Asghar Wajahat के लेख शहर फ़िर शहर है’ से

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Monday, February 11, 2019

बसन्तपंचमी का उरस



शाम को सड़क पर टहलने निकले। घर के पास की सड़क पूरी भरी। इंसानों की भीड़ से गदराई सड़क। सड़क भरी-पूरी ही जमती है। खूबसूरत लगती है।
भीड़ दरगाह के पास थी। मुझे लगा मुस्लिमों का कोई त्योहार हैं। अपनी अज्ञानता पर गुस्सा भी आया कि हमको त्योहार के बारे में पता नहीं। त्योहार पर भी झल्लाहट कि बिना हमको बताये मन रहा है।
चौराहे पर खड़ी एक महिला से पूछा-' कौन त्योहार है आज?'
'बसंत पंचमी का उरस है आज। उसई का मेला है।'-उसने बताया।
हमें लगा बसन्त पंचमी के साथ उर्स भी है कोई। लेकिन जब पूछा तो पता चला कि दरगाह में बसन्त पंचमी के दिन मेला लगता है। लोग घरों से खाना लेकर आते हैं। वंचितों को बांटते हैं। एक बुजुर्ग ने बताया -'जमाने से होता आ रहा है बसन्त पंचमी का मेला। पचास साल तो हमको देखते हो गए।'
दरगाह के बाहर भीड़ थी। ज्यादातर मुस्लिम महिलाएं, बच्चे दरगाह की तरफ जा रहे थे। कई तरह की दुकाने ठेलियों पर लग गई थीं। छोटे गमलों में गेंदे के पौधे बिक रहे थे।
कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए सिपाही चौराहे पर तैनात थे। उनसे पूछा तो उन्होंने इसे कोई 'मुस्लिमों का त्योहार बताया।' बसंत पंचमी से सम्बंध काट दिया। जानकारी नहीं होगी।
बहरहाल यह जानकर अच्छा लगा कि दरगाह जो आमतौर पर मुस्लिमों से जुड़ी मानी जाती है में, चाहे जिस रूप में हो, बसन्त पंचमी मन रही थी। खराब यह लगा कि इतनी पास होती घटना की खबर अपन को नहीं। यह आमतौर पर अपने शहरी होते समाज का सच है। दूसरी दुनिया की अफवाहें हौलनाक उस तक तेजी से पहुंचती है, सुकून देने वाली खुशनुमा खबर घोंघे की रफ्तार से पहुंचती है।
सड़क पर दो बच्चे एक दूसरे की गलबहियां किये टहल रहे थे। एक जगह दो बच्चे मोटर साइकिल को शायद मोबाइल से चार्ज करने की कोशिश कर रहे थे। मोटर साइकिल को टांग के बीच दाबे चैट टाइप कुछ कर रहे थे।
शाम होते होते मेला खत्म होने लगा- 'बसंत पंचमी का उरस का मेला।'

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Tuesday, February 05, 2019

रिश्तेदारी में फ़ंस गये

शाम टहलने निकले। अधबने पुल के बगल की संकरी सड़क को रौंदते हुये निकल रहे थे। धूल-गिट्टीलुहान सड़क उस सरकारी दफ़्तर के कर्मचारी सरीखी हो रही थी जहां लोग रिटायर होते जा रहे हों और काम बढता जा रहा हो! पुराना और नया काम दोनों बचे हुये लोगों पर लादा जा रहा हो।

पुराने लोगों के रिटायर होने और उनकी जगह नए लोगों के न आने से दफ़्तरों की कार्यक्षमता और कामचोरी की काबिलियत दोनों में बढोत्तरी की संभावनायें रहती हैं। लोग काम करने वाले हुये तो कार्यक्षमता बढती लगती है। कामचोरी करने वाले लोग हुये तो कम लोग ज्यादा लोगों का काम टाल सकते हैं।
सड़क पर एक सांड खरामा-खरामा टहल रहा था। आती-जाती भीड़ से बेपरवाह। उसको देखकर लगा गोया किसी लोकतंत्र में भ्रष्टाचार , कानून व्यवस्था से बेपरवाह, तसल्ली से टहल रहा हो। सांड की पूंछ गोबर से सनी हुई थी- शहर के स्वच्छता अभियान को ठेंगा दिखाती हुई। सांड़ की पीठ पर परिवार नियोजन की चिन्ह की तरह बने छोटे तिकोन से खून निकल रहा था। किसी ने अपने चाकू या त्रिशूल की हो शायद।
तिराहे पर रिक्शे से एक सवारी उतरी। सड़क पर उतरकर लड़खड़ाई। सर सड़क की तरह झुक गया। हमे लगा नागिन डांस करेगा। लेकिन सड़क पर कोई बैंड नहीं था। लिहाजा वह सड़क को प्रणाम करने की मुद्रा में सर झुका। सर झुका तो बाकी का शरीर भी सड़क की तरफ़ झुक गया। अंतत: पूरा शरीर ही सड़क से जुड़ गया। चारो खाने चित्त। पीठ सड़क से जुड़ी, पेट आसमान की तरफ़।
कुछ देर बाद उसने उठने की कोशिश की। लड़खड़ाया , भहराकर गिर गया। फ़िर कोशिश की। फ़िर धराशायी हुआ। फ़िर उठने की कोशिश की। लगता है बचपन में पढी हुई कविता उसके दिमाग में बार-बार हल्ला मचा रही थी:
"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।"
गिरते हुये उठने की कोशिश में बार-बार हाथ किसी सहारे की तलाश वाली मुद्रा में रहता। चुनावी मौसम में टुटपुंजिया पार्टियों के नेता जिस तरह किसी गठबंधन के लिये बेकरार रहते हैं वैसे ही वह बार-बार किसी सहारे की तलाश में था। हम कुछ देर तक बगल में खड़े उसका सागर की लहरों की तरह गिरना-उठना-गिरना देखते हुये बोर से हो गये। बोरियत दूर करने के लिये उसके उठे हुये हाथ को थाम लिया।
हमारे हाथ थामते ही उसने उठने की कोशिश बन्द कर दी। उठाने का कम हमको सौंप दिया। हम उसको उठाने की कोशिश करें तो वह बार-बार गिरने लगा। अंतत: हमारे साथ कुछ और हाथ जुड़े और उसको खड़ा कर दिया। हमारी कोशिश का विरोध वह बार-बार टेढा होकर गिरने की कोशिश करके करने लगा। लेकिन बहुमत के आगे उसकी एक न चली। उसको खड़ा होना पड़ा।
गिरे हुये आदमी को खड़े करते ही हमने उससे सवाल पूछने का अधिकार बिना बताये हासिल कर लिया। तथाकथित भलाई करने वाले भलाई करने के बाद आमतौर पर बहुत बुरा सलूक करते हैं। जिसके साथ भलाई करते हैं उसको पूरी तरह अपने कब्जे में लेने की फ़िराक में रहते हैं।
हमने सीधे-सीधे पूछा- ’इतनी क्यों पी लेते हो कि सड़क पर चल नहीं पा रहे।’ उसने मेरे सवाल की मासूमियत पर फ़िदा हुये बिना जबाब दिया-’ मैं पीता नहीं हूं लेकिन आज रिश्तेदारी के चक्कर में फ़ंस गया।’
’मैं पीता नहीं हूं , पिलाई गयी है।’ घराने का जबाब सुनकर हमारे पास कुछ करने को नहीं था। दारू पिये हुये आदमी के साथ जो दंगा न कर रहा हो कुछ किया भी तो नहीं जा सकता है। वैसे भी किसी को दारू पीने से रोकना मतलब गाय सेस कम करना है। गो सेवा में बाधा पहुंचाना है। कौन बबाल मोल ले।
हमारा हाथ थामे-थामे उसने पूछा -’इस समय मैं कहां हूं? यह कौन जगह है?’
हमने बताया तो उसने हमारा हाथ थामे थामे कहा- ’हमको जयपुरिया क्रासिंग के पास हमारे घर पहुंचा दो।’
हमारे हाथ में उसकी पकड़ मजबूत होती जा रही थी। हमने कई रिक्शे रोके। कोई रुका नहीं। सबको अपने अड्डे पहुंचने की जल्दी थी। आखिर में एक भला रिक्शेवाला रुका। उसने उसको लादा। चला गया।
आदमी तो लद गया। बैठ गया सीधे। लेकिन उसके भीतर की दारू ने उसको बताया कि सीधे क्यों बैठे हैं जहांपनाह? शहंशाह की तरह तख्तनशीं होइये। सीधे बैठने से लोगों में आपका रुआब कम होगा। अंदर की दारू की बात मानकर वह रिक्शे की सीट को पर उसी अंदाज में पसर गया जिस अंदाज में कभी तख्तेताउस शहंशाह लोग पसरते होंगे।
लौटकर घर आते हुए सोच रहे थे कि गरीब आदमी के रिश्तेदार कितने भले होते हैं जिनके चक्कर में फंसकर आदमी दारू पीता है जिसके सेस से गायों की रक्षा होती है। देश में पी हुई दारू देश की ही सड़कों पर उलट देते हैं। अमीरों के रिश्तेदार तो लूटपाट कर फूटफाट लेते हैं। देश में लूटा हुआ पैसा विदेश में फूंकते हैं। सफेद दूधिया पैसे को काला कलूटा बना देते हैं।
सुबह देखा एक कुतिया अपने बच्चों को दूध पिला रही थी। ये पिल्ले हमारे लिए चाहे जो हों , उसके तो नजदीकी रिश्तेदार हैं।

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Saturday, February 02, 2019

बजट पर विनम्र गदहे की प्रतिक्रिया

 

ये भाई साहब ऐसे खड़े थे धूप में मानो बजट पर प्रतिक्रिया देने के लिए शेर गढ़ रहे हों मन में। हो तो यह भी सकता है कि प्रतिक्रिया दे भी चुके हों -'हमको ई सब गदहपचीसी के लफ़ड़े में मत फ़ंसाओ। पहले हमारे लिए बजट में क्या रखा है ये बताओ।'
कोई कह रहा था कि जबसे इनके कुनबे के लौंडों (युवा गदहों) ने इनको मागदर्शक बताते इनकी इज्जत करनी शुरू कर दी है तबसे गुमसुम हो गए हैं।
धूप भाईसाहब के पूरे शरीर पर कबड्डी खेलती रही। लेकिन उसका कतई बुरा नहीं माना अगले ने।

विनम्रता गदहों का मौलिक गुण है। 🙂

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मसिजीवी से मुलाकात



आज मसिजीवी Vijender Masijeevi से मुलाकात हुई। 'घटनास्थल'बारादेवी के पास एक चाय की दुकान। पिछली मुलाकात इलाहाबाद के ब्लागर सम्मेलन की थी जिसमें खूब फोटोबाजी और बयानबाजी हुई थी। उसके पहले हमारी बिटिया स्वाति की शादी में आना हुआ था मसिजीवी का।
ब्लागिंग के पुराने साथी मसिजीवी ने ब्लागिग में भी खूब गुल खिलाये थे। चिट्ठाचर्चा भी की। अभिव्यक्ति की आजादी के विकट समर्थक मसिजीवी ब्लागिंग के दिनों में अनाम लेखन के समर्थक थे। इस बारे में उन्होंने एक पोस्ट भी। लिखी थी -'......मुखौटा मुझे आजाद करता है।' 15 मार्च, 2007 की इस पोस्ट में मसिजीवी ने छद्म नामों से ब्लाग लिखने वालों की तरफदारी करते हुए लिखा था:
"आलोचक, धुरविरोधी, मसिजीवी ही नहीं वे भी जो अपने नामों से चिट्ठाकारी करते हैं एक झीना मुखौटा पहनते हैं जो चिट्ठाकारी की जान है। उसे मत नोचो- ये हम मुक्त करता है।"

उनकी बात का समर्थन करते हुए नीलिमा Neelima Chauhan ने लिखा था -" ब्लागिंग एक अलग मिजाज की लेखन दुनिया है जहां मुखौटे लगाकर लेखक अपने व्यक्तित्व के बोझ से अपने लेखन को मुक्त करता है इसी वजह से वह सच का बयान कर पाता है, सच का बयान करने के लिए यह जरूरी भी है।"
अब यह अलग बात है कि बाद में शायद फेसबुक की शर्तों के चलते मसिजीवी के पहले विजेंदर जुड़ गया और शायद इसीलिए मसिजीवी की अभिव्यक्ति बाधित हुई। 🙂 हालांकि नीलिमा ने 'पतनशील पत्नियों के नोट्स' बिना कोई मुखौटा लगाए अपने नाम से लिखे।
मसिजीवी ने हमसे बिना किसी भूमिका के पूछ लिया -'सूरज की मिस्ड कॉल' पर इनाम कैसे मिल गया। हमने सच बताया -'हमको कुछ पता नहीं। किताब भेज दी। इनाम मिल गया। शायद इस कैटेगरी में और कोई किताब न आई हो।'

हमारे ईमानदार जबाब से खुश होकर मसिजीवी ने हमारे लिए चाय मंगा ली। हमने उनसे भी किताब लिखने के लिए कहा। मसिजीवी ने पूछा -'सब लोग लेखक बन जाएंगे तो पढेंगा कौन?' मतलब जनता की भलाई की कामना से लेखक बनना स्थगित रखा है मसिजीवी ने।
ब्लागिंग के दिनों से शुरू के दिनों की अनगिनत यादें घण्टे-डेढ़ घण्टे में जितनी दोहराई जा सकती थी उतनी दोहरा ली गयीं। जिम्मेदार नागरिक होने के नाते थोड़ी देश की स्थिति पर भी चरचा हो गयी। कुल छह चाय शहीद हो गईं इस बतकही में।
मसिजीवी की पोस्ट का लिंक यह रहा
मसिजीवी से पहली मुलाकात के किस्से

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Wednesday, January 30, 2019

पेंशन कोचिंग सेंटर


सूरज भाई ने पिल्लों को सड़क पर टहलते देखा तो धूप-छांह की कुछ लाइने बना दीं। बोले ये धूप वाले भाग का क्षेत्रफल निकालो।

पिल्ले आपस में ' मिसकौट' करने लगे। कैसे निकलता है बे क्षेत्रफल। एक बोला -'गूगल कर बे। गूगल सब जानता है। बता देगा। आजकल दुनिया में सब सवाल के हल गूगल ही जानता है।'
दूसरा पिल्ला बोला -'अबे गूगल कैसे करें। नेटवर्क ही नहीं आ रहा है। हिल रहा है गोला स्क्रीन पर। बदलना पड़ेगा सर्विस प्रोवाइडर। '
तीसरा तब तक बगल की घास पर लोटपोट होने चला गया। इसके बाद पेड़ के पास टेड़ा होकर जमीन को सींच आया। सिंचाई के पैसे नहीं चार्ज किये उसने। गूगल से कम दरियादिल थोड़ी है।
चौथा इन सब से निर्लिप्त धूप स्नान कर रहा था। आँख मूंद कर। जबसे उसने नई 'शरीफ पेंशन स्कीम' की खबर सुनी है तब से वह शरीफ बनने में लग गया है। बिना किसी को बताये 'पेंशन कोचिंग सेंटर' ज्वाइन कर लिया है। रोज शाम को जाता हैं। अभी मौन रहना और आंख मूंदना सिखाया है। एक दिन आंख मूंदकर सो गया। जागने पर गुरु जी ने पीठ ठोंकी और कहा -'तू बहुत तेजी से सीख रहा है। जल्दी से सच्चा शरीफ बनेगा।'
साथ के पिल्ले उसकी मजाक उड़ाते हैं। कहते हैं -'देख बेट्टा कहीं शरीफ बनने के चक्कर में नवाज शरीफ न बन जाना। मौन रहना सीख गया तो कोई पिंजड़ें के अंदर कर देगा। भौंकना भूल कर सिर्फ पूंछ हिलाता रह जायेगा। कुत्तों की पहचान उनके भौंकने में है। मौन रहना तो गधों का काम है।'
लेकिन वह मन से कोचिंग में लगा है। मौन रहने पर कोई टोंकता है तो पूछता है -'दुनिया भर के तमाम लफड़े देखते हुए भी उनको अनदेखा करके जीने वाले लोग क्या गधे हैं?'
किसी के पास कोई जबाब नहीं पाकर वह अपने को सही मान लेता है। भौंकना भूलकर मौन रहना सीख रहा है।
गुरु जी ने उसको कोचिंग क्लास का मॉनिटर बना दिया। वह तबसे किसी पिल्ले के कोचिंग ज्वाइन करने की राह देख रहा है जिस पर वह मॉनिटरी झाड़ सके।
आगे क्या हुआ पता नहीं चला। लौटकर पूँछेगे।

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Tuesday, January 29, 2019

ओस के कपड़े पहने धूप में नहाती पत्ती

सबेरे की चाय पी रहे थे। बगल में मेज पर रखा मोबाइल नागिन डांस टाइप करने लगा। लगा कोई गड़बड़ डाटा खा गया है। हाजमा खराब हो गया है। ऐंठ रहा है पेट। मोबाइल पर हम वैसे ही खफ़ा रहते हैं आजकल। काफ़ी टाइम खा जाता है। उसको ऐंठते देख खुश टाइप होने का मन किया। लेकिन हुए नहीं। केवल अनदेखा कर दिया।

मोबाइल को अनदेखा करके चुस्कियाते हुये लैपटॉप में घुस गये। मोबाइल फ़िर डांस करते हुये अकड़ने लगा। ज्यादा अकड़ा और आवाज भी तेज तो हाथ बढाकर उठाये। देखा सूरज भाई का कॉल था। हेल्लो, गुडमार्निंग के बाद मजाक का सिलसिला शुरु हुआ। हम बोले-’ भाई जी राशिफ़ल आ रहा है। अपनी राशि बताओ तो आज का भाग्यफ़ल बतायें।’
सूरज भाई भन्नाये हुये थे। बोले - ’यार, ये तुमको राशिफ़ल की पड़ी है। यहां धरती के ऊपर कोहरे के बादल सुरक्षा गार्डों की तरह खड़े हैं। आने नहीं दे रहे हमारी किरण बच्चियों। कह रहे हैं अपना पासवर्ड बताओ। टोकन दिखाओ। अजब-अजब तमाशा करते हैं ये धरती के चौकीदार। मन किया पूरी धरती को गर्मा के खल्लास कर दें। लेकिन फ़िर तुम्हारा ध्यान आ गया तो छोड़ दिये। तुम्हारी चाय का लिहाज कर गये।’
हमने फ़ौरन कोहरे को हड़काया। कोहरा ऐसे फ़ूटा जैसे सरकारें बदलते ही नए बने माननीयों के तमाम आपराधिक मुकदमें फ़ूट लेते हैं। सूरज भाई साथ में बैठकर चुस्कियाने लगे। बहुत दिन बाद साथ चाय पी रहे थे। चीनी कम होने के बावजूद चाय मीठी लग रही थी। सूरज भाई कहने लगे -’तुम और कुछ भले न जानते हो लेकिन चाय अच्छी बनाते हो।’
हमको कुछ समझ में नहीं आया तो मुस्करा दिए। कुछ समझ में न आने पर मुस्करा देना सबसे सुरक्षित रहता है। थोड़ी बेवकूफी मिला दो मुस्कान में तो और सुरक्षित। मुस्कान और मूर्खता का गठबंधन सबसे घातक होता है।
सूरज भाई ने अपनी रोशनी के थान के थान हमारे लॉन में बिछा दिये। सारी घास चमकने लगी। ओस की बूंदे मोतियों की तरह चमकने लगी। किरणों की चमक और घास का बिस्तरा देखकर पास के पेड़ की एक पत्ती पेड़ से कूदकर घास पर बिना पैराशूट उतर गयी। पत्ती घास के बिस्तर पर लेट गयी- दिगंबर। धूप में मजा आने लगा तो वह उलटपुलट कर पूरी तरह धूप में नहाने लगी।
घास पर पसरी ओस की बूंदे उसके ’ओस मसाज’ जैसा करने लगी। पत्ती के पूरे बदन पर ओस की मालिश हो गयी। ऐसा लगा कि पत्ती ओस के स्किन टाइट कपड़े पहने हुये बगीचे की घास पर पसरी धूप स्नान कर रही हो। पत्ती का आत्मविश्वास और खिलंदड़ापन देखकर लग रहा है उसके पास मोबाइल होता तो पक्का सेल्फ़ी फ़ेसबुक पर अपलोड करके ’चैलेन्ज एक्सेप्टेड’ हैसटैग के घोड़े हांक चुकी होती।
बगीचे में क्यारियों लगे पौधे धूप की सप्लाई पाकर बौरा गये। उनके हाल ऐसे हो गये एक ही सेठ से ’चुनाव चंदा’ पाये दो नेता आपस में एक-दूसरे के खिलाफ़ बयानबाजी करते हुये गदर काटते हैं। दोनों को एक दूसरे की अलग-अलग दिशा में झुके हुये देखकर लगा एक ही ठेके की दारू पीकर निकले हुये दारूबाज सड़क के अलग-अलग किनारों पर टुन्न पड़े हों। कुछ पौधे बीच की स्थिति इधर गिरें या उधर गिरें जैसी बातें सोचते हुये अनिर्णय की स्थिति में थे। वे बहुमत की तरफ गिरने की सोचते हुए दोनों तरफ गिरने वाले पौधों की गिनती कर रहे थे।
चाय की अन्तिम बूंद पीने के बाद सूरज भाई ने चल दिये। चलते हुये टीवी पर भाग्यफ़ल बता रहा था- ’आपका आज का दिन अच्छा है। किसी भले आदमी से मुलाकात होने का सुयोग है।’ वे चलते हुये मुस्कराये और हमको देखकर मुस्कराते हुये -’ अब तुमको भी भला आदमी बताने की साजिश हो रही है। बच के रहो।’
हम भी मुस्करा दिये। बगीचे में देखा कि धूप में अलसाई सी आरामफ़र्मा पत्ती के आसपास तमाम पत्ते और कुछ और पत्तियां भी पसर गये थे। लगता है सबने वाकई चुनौती स्वीकार ली हो।
आप क्या कर रहे हैं? । निकल्लीजिये। नहाइये धूप में। अभी धूप मुफ्त है। क्या पता कल इस पर भी कोई सेस लग जाये। वह मॉल्स में बोतलों में बिकने लगे। एक पैकेट के साथ दो मुफ्त के ऑफर के साथ। इससे पहले कि सूरज की रोशनी पर कोई टैक्स लगे नहा लीजिये धूप में जी भर कर। जी लीजिये मन भर।

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Tuesday, January 22, 2019

पुस्तक मेले के किस्से-5


पुस्तक मेले में कई मित्रों से मुलाकात हुई। कई मित्रों ने किताबें खरीदकर ऑटोग्राफ़ लिये। कुछ मित्र तो खासकर मिलने और किताब लेने आने आये। मिनी सेलेब्रिटी का एहसास सा कराते। दोस्तों से पहली बार मिलने के बावजूद पुरानी जान-पहचान का एहसास हुआ।

शाम को सुभाष जी की ’हंसती हुई कहानियां’ का विमोचन हुआ। हम खरीद चुके थे। उस पर सुभाष जी के दस्तखत भी ले लिये थे। शाम को विमोचन के समय हमको भी बैठा दिया सुभाष जी ने कुर्सी में। बोले –बैठो। हम बैठ गये। सुभाष जी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल के अनुसार 47 किताबों के लेखक हैं सुभाष जी। बस तीन कम पचास किताब। अपन की कुल जमा 5 किताबें आई हैं। 5 किताबों का लेखक 46 किताबों के महालेखक की किताब का विमोचन करे। हम सकुचाये बैठे रहे।
कार्यक्रम शुरु हुआ। संचालक ने बोलने के लिये बोला- हमने मना किया। लेकिन सुभाष जी बोले- ’अनूप शुक्ल भी बोलेंगे।’ बोलना पड़ा। अशोक चक्रधर जी, प्रेम जन्मेजय जी, आलोक पुराणिक जी , खुद सुभाष जी भी बोले। अच्छा बोले। अशोक चक्रधर जी ने हंसती हुई कहानियां को हंसी से जोड़ते हुये अपनी कविता भी सुना दी:
“हंसी आती है
तो आती है,
नहीं आती तो नहीं आती।“
बाद में हमको लगा कि मौका चूक गये। अपन भी हंसी पर लिखी कविता सुना देते:
“हंसी का भी बहुत बड़ा परिवार है
कई बहने है जिनके नाम है-
सजीली,कंटीली,चटकीली,मटकीली
नखरीली और ये देखो आ गई टिलीलिली,
हंसी का सिर्फ एक भाई है
जिसका नाम है ठहाका
टनाटन हेल्थ है छोरा है बांका
हंसी के मां-बाप ने
एक लड़के की चाह में
इतनी लड़कियां पैदा की
परिवार नियोजन कार्यक्रम की
ऐसी-तैसी कर दी।
हंसी की एक बच्ची है
जिसका नाम मुस्कान है
अब यह अलग बात कि उसमें
हंसी से कहीं ज्यादा जान है।“
लेकिन अब समय चूकि पुनि का पछताने। दिन भर कई किताबों के विमोचन करवाने वाले सुभाष जी अब खुद अपनी किताब का विमोचन करवा रहे थे। जैसे कोई पण्डित जी कई शादियां करवाने के बाद अपने लिये मण्डप में बैठ जाये। विमोचन के बाद विमोचित किताब साथ विमोचन करने वाले को भेंट की गयी। विमोचन मेहनताना। हमको पहले किताब खरीदने का अफ़सोस हुआ। लेकिन अब जो हुआ सो हुआ। विमोचन की खबर सुभाष जी की फ़ेसबुक वाल से ही :

“ हास्य कहानी संग्रह 'हँसती हुई कहानियां' का विमोचन प्रभात प्रकाशन के स्टाल पर हुआ।संग्रह का लोकार्पण करते हुए प्रो.अशोक चक्रधर ने कहा कि हास्य मनुष्य को बेहतर बनाने में मदद करता है। वह मनुष्य को आईना दिखाने का काम भी करता है। सुभाष चन्दर ने व्यंग्य के साथ हास्य पर भी उल्लेखनीय काम किया है। उनका हास्य अधरों को ऊर्ध्व बनाने का काम करता है।इसका सबूत उनका यह तीसरा हास्य कथा संग्रह है। इस अवसर पर डॉ प्रेम जनमेजय ने कहा कि सुभाष चन्दर को चुनौतियों को स्वीकार करना अच्छा लगता है। व्यंग्य का इतिहास नहीं था ,उन्होंने व्यंग्य का इतिहास लिख दिया।हिंदी में हास्य कथाओं पर काम नही हो रहा था।उन्होंने तीन हास्य संग्रह दे दिए।आलोक पुराणिक ने कहा कि सुभाष चंदर जी जैसे बड़े लेखक जब हास्य के क्षेत्र में उतरते हैं तो व्यंग्य के मठाधीश भी हास्य को नकारने का साहस नहीं जुटा पाते।कानपुर से पधारे व्यंग्यकार अनूप शुक्ल ने कहा कि हास्य के क्षेत्र में यह बड़ा काम है। सुभाष चंदर ने कहा कि पाठक हास्य पढ़ना चाहता पर आलोचक उस पर बात नहीं करना चाहता।उसे लगभग अश्लील और दोयम दर्ज़े का मानकर चलता है।इस प्रवृत्ति से बचने की जरूरत है। इस अवसर पर श्रवण कुमार उर्मलिया,कमलेश पांडे,संतराम पांडे,डॉ पवन विजय,डॉ. अनीस अहमद,सुनील जैन राही,नीतू सिंह राय,अनिता यादव, अनिल मीत,अमित शर्मा,राजीव तनेजा,फ़ारूक़ आफरीदी,प्रवीन कुमार,सत्यदीप कुमार,निर्मल गुप्त,अर्चना चतुर्वेदी,सरिता भाटिया,संगीता कुमारी,अलंकार रस्तोगी,तरुणा मिश्र,बलराम अग्रवाल,दीपशिखा,आरके मिश्र,शंखधर दुबे,संदीप तोमर,सुनील चतुर्वेदी,छत्र छाजेड़, पंकज शर्मा,संजीव,अतुल चतुर्वेदी,समीक्षा तेलंग,शशि पांडे,सुनीता शानू ,एम एम एम.एम. चन्द्राआदि उपस्थित थे।संचालन प्रभात प्रकाशन के व्यवस्थापक प्रभात शर्मा ने किया।“
इस संग्रह की कुछ कहानियां हमने पढी हैं। सुभाष जी ने आम जिन्दगी से जुड़े मजेदार किस्से इसमें लिखे हैं। किताब के बारे में अलग से लिखा जायेगा।
पुस्तक मेले के दौरान खूब सारे लेख लिखे गये। अभी भी लिखे जा रहे हैं। कईयों में विमोचनातुर वरिष्ठों के मजे लिये गये हैं। चुटकुले भी बने। लेकिन विमोचन करने वाले वरिष्ठ लोगों का पक्ष रखने वाले लेख नहीं आये। लोग विमोचन करवाना भी चाहते हैं और विमोचन करने वाले के मजे भी लेना चाहते हैं। इस बारे में श्रीलाल शुक्ल जी के एक लेख का अंश देखिये:
“लिखने का एक कारण मुरव्वत भी है। आपने गांव की सुन्दरी की कहानी सुनी होगी। उसकी बदचलनी के किस्सों से आजिज आकर उसकी सहेली ने जब उसे फ़टकार लगाई तो उसने धीरे समझाया कि ” क्या करूं बहन, लोग जब इतनी खुशामद करते हैं और हाथ पकड़ लेते हैं तो मारे मुरव्वत के मुझसे ‘नहीं’ नहीं कहते बनती।” तो बहुत सा लेखन इसी मुरव्वत का नतीजा है- कम से कम , यह टिप्पणी तो है ही! उनके सहयोगी और सम्पादक जब रचना का आग्रह करने लगते हैं तो कागज पर अच्छी रचना भले ही न उतरे, वहां मुरव्वत की स्याही तो फ़ैलती ही है।“
कवि यहां यह कहना चाहता है कि अधिकतर विमोचन , भूमिका लेखन मुरव्वत का नतीजा होता है। कोई मुरव्वत के चलते आपकी किताब की भूमिका लिख रहा है, विमोचन करने आ रहा तो यह उसकी भलमनसाहत भी है। इसकी तारीफ़ भी होनी चाहिये। सिर्फ मजे लेना बहुत नाइन्साफी है।
भलमनसाहत से याद आया कि पुस्तक मेले में प्रेम जनमेजय जी और Subhash Chander जी की भलमनसाहत का नाजायज फ़ायदा उठाते हुये हमने अपनी साल भर पहले आई किताबों के फ़िर से विमोचन करवा लिये। तारीफ़ भी झटक ली। प्रेम जी ने कहा कि अनूप शुक्ल बिना लाग लपेट के अपनी बात कह लेते हैं । सुभाष जी ने बताया कि अनूप शुक्ल को पढने में मजा आता है। इन वक्तव्यों के वीडियो अलग से।
हमने तारीफ़ तो करवा ली अपनी किताबों की लेकिन बाद में अपराध बोध भी हुआ कि जबरियन तारीफ़ करवा ली। कित्ती खराब बात है। लेकिन अब जो हुआ सो हुआ। उदारमना प्रेम जी और सुभाष जी इसके लिये माफ़ कर देंगे।
पुस्तक मेले के किस्से और भी हैं। वे सब अब फ़िर कभी फ़ुटकर तरीके से आयेंगे। एक बेहतरीन अनुभव रहा यह मेला।

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