Saturday, April 13, 2019

जो सीधे-सीधे लिखा जाये वह साहित्य नहीं होता- मनोहर श्याम जोशी

 मनोहर श्याम जोशी जी हमारे पसंदीदा लेखकों में हैं। बहुतों के होंगे। उनका लिखा अधिकतर पढ चुके हैं। फ़िर-फ़िर पढते हैं। पिछले दिनों प्रभात रंजन की जोशी पर संस्मरणात्मक पुस्तिका आई - ’पालतू बोहेमियन’। जिस दिन आन लाइन खरीद का लिंक मिला उसी दिन खरीदने का मन किया। लेकिन रह गया। शायद नेट धीमा था और भुगतान तक पहुंचते-पहुंचते थक गया।

एक बार टल गया तो फ़िर काफ़ी दिन टला रहा मामला। लेकिन इस बीच प्रभात रंजन जी Prabhat Ranjan जोशी जी के बारे में संस्मरण पोस्ट करते रहे। ऐसे ही एक दिन संस्मरण पढते हुये फ़िर खरीद ही डाली किताब। जब एक बार खरीदने बैठे तो 10-15 और भी किताबें आर्डर कर दीं। इनमें से अधिकतर किताबें वे थीं जिनको लेना पहले से तय था। कुछ दूसरी भी। कल किताबें पहुंची घर तो सारी देख डालीं। उलटी-पलटी। लेकिन पढने के लिये पहले जोशी जी पर लिखी किताब लपकी।
किताब का आकार देखकर थोड़ा अफ़सोस हुआ। इतनी पतली किताब। इसमें क्या होगा। ऐसा लगा कि किसी बहुत भूखे को बहुत कम खाना मिला हो और वह देखकर उदास हो जाये। जोशी जी के बारे में कुल जमा 136 पेज की किताब। बस्स।
बहरहाल कल और आज सुबह आहिस्ते-आहिस्ते पढी किताब। कल पुष्पेश पंत जी द्वारा लिखी प्रस्तावना पढी। आज प्रभात रंजन लिखित संस्मरण। बहुत अच्छा लगा।
किताब इस मायने में भी अच्छी लगी कि इसमें आगे पढी जाने वाली किताबों की लिस्ट भी बन गयी। उनमें से सबसे पहले ’ऑंट जूलिया एंड द स्क्रिप्ट राइटर’ जुगाड़नी है। इसमें लेखक और उससे बड़ी उम्र की आंटी की प्रेम कहानी है। 19 साल की उम्र में भागकर उसने अपनी आंटी से शादी कर ली। प्रभात रंजन इसे कई बार पढ चुके हैं। हम भी पढेंगे।
किताब में जोशी जी से जुड़े कई आत्मीय संस्मरण हैं । जोशी जी की रचना प्रक्रिया, सोच , अध्ययनशीलता आदि के कई किस्से हैं। उनका जिक्र करके किताब का सार -संक्षेप बताना ठीक नहीं। आप खुद पढिये मजा आयेगा।
इस किताब को पढते हुये चाय पीने का एक नया तरीका पता चला। जोशी जी फ़ीकी चाय के साथ गुड़ का टुकड़ा दांत से काटकर खाते थे। हम भी चाय पीने का यह अंदाज आजमायेंगे।
प्रभात रंजन जी ने बताया कि जोशी जी बहुत चिढ जाने पर चश्मा उतारकर आंख मलने लगते थे। हमें लगा इस तरह भी चिढकर देखा जायेगा कभी।
पसंदीदा 100 किताबों की लिस्ट बनाने वाली अच्छी लगी। बार पढने की बात भी। देखिये कितना सफ़ल होते हैं।
जोशी जी के बारे में लिखते हुये प्रभात रंजन ने उनके तमाम अनगिनत उपन्यासों के बारे में लिखा है। उनको पूरा करने की दिशा में कुछ किया जाये प्रभात रंजन जी। न् हो तो अधूरे ही प्रकाशित किये जायें।
किताब में एक जगह जिक्र है -उन्हीं दिनों राजकमल प्रकाशन के मालिक श्री अशोक माहेश्वरी ने मुझे ’ऐन फ़्रैंक की डायरी’ पुस्तक अनुवाद के लिये दी और उसका अच्छा भुगतान भी किया।
संयोग कि मंगवाई गयी किताबों में यह डायरी भी शामिल है। हालांकि आर्डर करते समय पता नहीं था कि इसका अनुवाद प्रभात रंजन ने किया है। जल्दी ही उसका भी पाठ होगा।
भुगतान से याद आया कि राजकमल की साइट से किताबें बुक कराते हुये दो बार पैसे कटे। लेकिन दोनों बार 'पेमेंट इरर' बताते हुये मामला खत्म हो गया। तीसरी बार फ़िर और नुकसान झेलने का मन नहीं हुआ। बाद में एक भुगतान की किताबें तो आ गयीं। दूसरे भुगतान का अभी पता करना है। इस मामले में हिन्दी के प्रकाशनों की भुगतान व्यवस्था बहुत ’गरीब’ है। कभी भुगतान होगा नहीं। कभी हो जायेगा तो इरर बतायेगा। जबकि अमेजन से किताब मंगवाने पर इस तरह की समस्या नहीं आती।
राजकमल की बात चल रही है तो एक कमी और उनके यहां की। मैं राजकमल की पुस्तक मित्र योजना का सदस्य हूं। इसमें 1000 /- देकर सदस्य बने थे। 25 % डिस्काउंट मिलता इस योजना के अन्तर्गत। लेकिन आनलाइन खरीद में इस सुविधा का कोई लिंक नहीं है। क्या राजकमल वाले इसे देखेंगे?
बहरहाल बात जोशी जी की किताब की। एक बहुत प्यारी किताब लिखी है प्रभात रंजन ने। एक बेहतरीन संस्मरण किताब लिखने की उनको बधाई ।
प्रभात जी से कहने का मन है वे जोशी जी के बारे में और लिखें। लोगों से लिखवायें। जोशी जी के अधूरे काम पूरे करवायें। उनके लिखे के बारे में लोगों को बतायें। अपने गुरु जी का कायदे से ’उद्धार’ करें।
यह भी कि प्रभात जी को अगर पता हो तो जोशी जी के फ़ार्मूला 99 में तीसरी कैटेगरी की किताबों की लिस्ट बतायें।
किताब के कुछ अंश जो मैंने पढते हुये रेखांकित किये।
1.हमें हमारे गुरुओं ने समझाया था कि किसी लेखक की रचनाओं पर शोध करना असल में उस लेखक का कल्याण करना होता है। कुछ-कुछ अहसान सरीखा या उद्दार करना समझ लीजिये।
2. गम्भीरता की धूल झाड़ने वाली अपनी जिस शैली के कारण मनोहर श्याम जोशी पाठकों के प्रिय बने , लेखक समाज से उसी वजह से हमेशा ’आउट ऑफ़ कोर्स’ बने रहे।
3. जनता छाप और इंटेलेक्चुअल छाप , दोनों चीजें पढने और लिखने में मुझे रस आता है। यों इसके चलते मेरी जनता छाप कृतियों में भी थोड़ी बहुत साहित्यिकता है और साहित्यिक कृतियों में भी इस माने में जनता छाप हैं कि अपनी तमाम इंटेलकचुअलता (नागर जी का दिया शब्द) पठनीय हैं।
4. जीवन में संयोग भी होते हैं।
5. तुम हिन्दी पट्टी वाले अपनी अंग्रेजी ठीक करने के लिये तो डिक्शनरी देखते हो लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि हिन्दी भाषा ठीक करने के लिये भी कोश देखना चाहिये।
6. जो सीधे-सीधे लिखा जाये वह साहित्य नहीं होता, वह किसी मुदर्रिस के नोट्स की तरह होता है।
7. “उन्होंने जमकर लिखने का मूड बनाने के लिये फ़ार्मूला ९९ आजमाने की सोची।’ इसके अन्तर्गत वे एक आध्यात्मिक, एक किसी शास्त्र-विज्ञान सम्बन्धी और एक हल्की सी अश्लील –तीन पुस्तकों का लगभग समान्तर पारायण करते थे और अक्सर यह देखा गया कि इस पुस्तक अनुष्ठान में तीसरी पुस्तक को बराबर प्राथमिकता मिलती रहती थी।
8. जितना जरूरी सही समय पर गुरु बनाना होता है , उतना ही जरूरी यह भी होता है कि सही समय पर उस गुरु को लात मार दें।
9. कोई आदमी किस तरह का है, इसका पता इससे चल जाता है कि उर्दू शेरों का उसका जौक कैसा है यानी वह किस तरह के शेरों को पसन्द करता है।
10. हिन्दू धर्म को इसका जाति-विभाजन ही ले डूबेगा। अलग-अलग जातियां अपनी-अपनी पहचान को लेकर मुखर होती जायेंगीए और हिन्दू धर्म कमजोर पड़ता जायेगा।
11. किसी भी बड़े लेखक की आलोचना करने से अधिक उनसे कुछ सीखने का प्रयास करना चाहिये।
12. उसने (हेमिंग्वे ने) कहानियों में एक ऐसी तकनीक विकसित की जिसमें जो बात कही नहीं जाती , वही सबसे महत्वपूर्ण हो जाती । इसको आलोचकों ने ’हिडेन फ़ैक्ट’ का नाम दिया। हिन्दी में निर्मल वर्मा की कहानियों में यह तकनीक अपने सबसे अच्छे रूप में दिखाई देती है।
13. उन्होंने अपना चश्मा उतारा और अपनी आंखों को मलने लगे। बाद में मुझे समझ में आया कि जब वे बहुत चिढ जाते थे तो ऐसा करने लगते थे।
14. आदमी को अपने जीवन में १०० किताबों की सूची बना लेनी चाहिये और बार-बार उनका ही अध्ययन करना चाहिये। जीवन और लेखन के बहुत सूत्र हाथ आते हैं।
15. हमारे भीतर पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था ने इतनी तार्किकता भर दी है कि हम संकेतों को देखते हुये भी नहीं देखने के आदी हो गये हैं। उनको समझते हुये भी न समझने के आदी हो चुके हैं।
16. हिन्दी के लेखकों का सारा संघर्ष नौकरी पाने तक ही होता है।
17. कहकर उन्होंने चाय की एक घूंट ली और गुड़ का एक छोटा सा दांतों से टुकड़ा काट लिया।
18. विस्थापन २० वीं शताब्दी की सबसे बड़ी पीड़ा थी और अविकसित माने जाने वाले समाजों के लोग रोजी-रोटी के लिये विकसित माने जाने वाले समाजों की तरफ़ जाते रहे, इसलिये इस विषय पर चाहे जिस समाज का लेखक लिखे , यह सुपर हिट विषय है।
19. अगर अच्छा लिखोगे तो सभी लेखक तुम्हारा नाम लेंगे।
20. जोशी जी लगातार कुछ लिखने के लिये कहते रहते थे।
21. किसी की जीवनी लिखने का मतलब है कि आप उस व्यक्ति की सात पीढियों की कथा लिखें। क्योंकि कहते हैं , किसी व्यक्ति में उसकी सात पीढियों के गुण अवगुण झलक जाते हैं।
22. ’मेरे लिये मुश्किल यह नहीं है कि मैं क्या लिखूं, क्या प्रकाशित करवाऊं। मुश्किल यह है कि मैं अपने मानकों पर खरा नहीं उतर पा रहा हूं। मेरे सभी उपन्यास अलग-अलग शैली के लिये जाने गये लेकिन अब मैं कोई नया लहजा नहीं बना पा रहा हूं। मुझे लगता है कि एक लेखक को सबसे ज्यादा तकलीफ़ इस बात से होती होगी जब वह अपने आप को दोहराने लगता है। आखिर हिन्दी के लेखक को पाठकों के प्यार के अलावा मिलता ही क्या है जो वह बेस्टसेलर लेखक के रूप में अपने को दोहराता रहे? उपलब्धियों का तो पता नहीं , लेकिन मुझे लेखक के रूप में अपने मानकों पर खरा न उतर पाने का बहुत अफ़सोस है।’
23. आने वाले समय में हिन्दी का बाजार बहुत बढने वाला है। चूंकि इस बाजार को भरने के लिये हिन्दी में उत्कृष्ट लेखन है नहीं , इसलिये अंग्रेजी के माध्यम से अनुवाद का बाजार बहुत तेजी से बढने वाला है। इसमें घुस जाओ।
24. हर बार एक ज्युरी बैठती है और अपनी पसन्द के किसी लेखक को पुरस्कार दे देती है। इस बार संयोग से ऐसी ज्यूरी जो मुझे पसन्द करती थी। हिन्दी में पुरस्कारों का यही हाल है।
25. हिन्दी लेखक को सम्मान से अधिक कुछ नहीं मिलता।
26. लेखक को अपना लेखन ईमानदारी से करना चाहिये। लिखने से अधिक पीआर करने वाले लोग कहीं के नहीं रहते।
पुस्तक का नाम: पालतू बोहेमियन मनोहर श्याम जोशी
लेखक: प्रभात रंजन
प्रश्तावना: पुष्पेश पंत
किताब की कीमत: 125 रुपये मिली 113 रुपये में
किताब के कुल जमा पन्ने- 136
किताब की खरीद का लिंक:

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Friday, April 12, 2019

हवा में जूता उर्फ़ जूतिकल स्ट्राइक

आजकल ’सर्जिकल स्ट्राइक’ का बड़ा हल्ला है। अपने जहाज पड़ोस में बमबारी कर गये। अगले ने पड़ोसी धर्म निभाते हुये अपने जहाज भी उड़ाये। मीडिया, अखबार, सोशल मीडिया सब जगह ’सर्जिकल स्ट्राइक’ का कब्जा हो गया।

’सर्जिकल स्ट्राइक’ भ्रम पैदा करने वाला है। ’सर्जिकल’ से लगता है कोई सर्जरी का मामला है- स्वास्थ्य से संबंधित। ’स्ट्राइक’ मतलब हड़ताल। सब काम ठप्प। न काम करेंगे, न करने देंगे वाला माहौल ! इस लिहाज से ’सर्जिकल स्ट्राइक’ मतलब हुआ – ’सर्जरी वाली हड़ताल !’ मतलब टोटल निठल्लापन ! लेकिन ’सर्जिकल स्ट्राइक ’का असली मतलब ही अलग। जब तक दुश्मन को पता चले, तब तक मारकर फ़ूट लो।
कुछ लोगों को ’सर्जिकल स्ट्राइक’ पर शक हुआ। उन्होंने सबूत मांगे। नेति-नेति कहा। अविश्वास किया इस पर। मामला एकदम हिन्दुस्तान- पाकिस्तान टाइप हो गया। विश्वासी लोग हिन्दुस्तान हो गये। अविश्वासी पाकिस्तान। हिन्दुस्तानियों ने पाकिस्तानियों पर आरोपों की ’सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी। देशभक्ति के बमों मिसायलों से हमले कर दिये। पूरा पाकिस्तान धुंआ-धुंआ हो गया। देशभक्तों ने नारा लगाया-’ जो अपने देश से करे प्यार, वो सर्जिकल से कैसे करे इंकार।’
यह तो हुई ऊंची समझ और ऊंची पसंद वाले लोगों की बात। इसके अलावा गरीबी, भुखमरी , बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसी समस्यायों के शाश्वत हमले झेलती आम आबादी को समझ ही नहीं आया कि ’सर्जिकल स्ट्राइक’ होती क्या है? उनको समझ ही नहीं आ रहा कि यह कोई नई समस्या है या उनकी समस्याओं का कोई इलाज! यह कोई नया बवाल है या फ़िर कोई ’जो बोले सो निहाल !’
जब तक पहली ’सर्जिकल स्ट्राइक’ का मामला समझ में आये तब तक एक और हो गयी। एक जनसेवक ने दूसरे को भरी सभा में जुतिया दिया। दे दनादन। शायद उसने अपनी आम जनता को समझाने के लिये ऐसा किया हो। जनता को शिक्षित और दीक्षित करने की जिम्मा भी तो जनप्रतिनिधि का ही होता है। उदाहरण पेश करके समझा दिया अगले ने – “ये देक्खो ऐसे होती है ’सर्जिकल स्ट्राइक।’ “
कुछ लोगों ने इस जूतमपैजार और हाथापाई का बुरा माना। घटना की ’निंदा’ की । कुछ ने ’कड़ी निंदा’ भी की। ’निंदा’ और ’कड़ी निंदा’ के बारे में आपको पता ही होगा कि सर्जिकल स्ट्राइक के पहले इन्हीं से हमले किये जाते थे दुश्मन देशों पर। 'निंदा' और 'कड़ी निंदा' दोनो हथियार एक ही घराने के हैं। बस अंतर कड़ेपन का होता है। पानी और बर्फ़ के अंतर की तरह। किसी ग्लास में रखा हुआ पानी चार हाथ दूर तक फ़ेंककर मारा जा सकता है लेकिन उसी की जमी हुई बर्फ़ फ़ेंककर चालीस हाथ दूर तक चोट पहुंचा सकती है। इससे लगता है कि जो 'निंदा' दूर तक मार करती है वह ’कड़ी निंदा’ होती है।
जो लोग कड़ी निंदा की ताकत को कम करके आंकते हैं उनको वीर रस के कवियों को सुनना चाहिये। जिस तरह से वीर रस के कवि माइक पर पाकिस्तान को हड़काते हैं उससे लगता है कि अगर माइक लगाकर सीमा रेखा पर रस का कवि सम्मेलन करवा दिया जाये तो पाकिस्तान अपने फ़ौज-फ़ाटे समेत रोज सौ मीटर पीछे खिसकता चला जाये।
जिन लोगों ने इस जूतमपैजार का बुरा माना वे इस घटना के उजले पहलुओं की अनदेखी कर रहे हैं। जनसेवकों पर अक्सर उनकी कथनी और करनी में अंतर होने का आरोप लगाया जाता है। सरेआम जूतम पैजार और मार कुटाई करके जनसेवकों ने अपने व्यवहार की कथनी और करनी का अन्तर मिटाने का प्रयास किया है। गुंडागर्दी और जनसेवा में कितनी निकटता है यह बताने की कोशिश की है। उन्होंने यह बताने की भी कोशिश की है कि अपनी गुंडागर्दी के लिये शरमाने की बजाये उस पर गर्व करना चाहिये। अपनी समाज विरोधी हरकतों के उजागर होने के डर से अपने को मुक्त किया है। ’डर के आगे जीत है’ के हिसाब से अपनी भविष्य की विजय सुनिश्चित की है।
हमारे एक मित्र का मानना है कि जूता चलाने वाले जनसेवक तबियत से थोड़ा शायराना हैं। उनकों पापुलर मेरठी का यह शेर बहुत पसन्द है:
’न देखा करो मवालियों को हिकारत से,
न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाए ।’
यह शेर उनके जेहन पर इस कदर सवार हो गया कि वे वजीर बनने का रास्ता गुंडागर्दी को मानने लगे। इस के असर में आकर उन्होंने जूतेबाजी कर दी।
यह कतिपय विडम्बनाओं के मूर्तिमान होने का सर्जिकल उदाहरण है।
हमारे एक मित्र मानते हैं कि गुंडागर्दी आज की राजनीति का सहज स्वीकार्य तत्व है। जूतम पैजार और हाथापाई गुंडों के सहज आभूषण हैं। जूतम पैजार के साथ हाथापाई भी स्वाभाविक है। इसलिये जो हुआ उसमें कोई बुरा नहीं है। बल्कि इस घटना से राजनीति में पारदर्शिता के नये आयाम खुले हैं।
हमारे दूसरे देशभक्त मित्र मानते हैं कि राजनीति में गुंडागर्दी कोई खराबी नहीं है। गुंडई आज की राजनीति का प्राणतत्व है। ताकत है। देशसेवा के चक्कर में कोई अपनी ताकत को कब तक छिपाता रहेगा। देशसेवा में इतनी बदतमीजी तो चलती है। बल्कि बिना बदतमीजी के जनसेवकों को अब लोग अपना नुमाइंदा मानने से इंकार कर देते हैं। लेकिन इन जनसेवकों से बड़ी चूक यह हुई कि उन्होंने गुंडागर्दी के साथ देशभक्ति का कोई नारा नहीं लगाया। न ’भारतमाता की जय’ कहा न ही ’इंकलाब जिन्दाबाद’। कुछ न कहते तो ’वंदेमातरम’ का नारा तो लगा ही सकते थे। अगर वे ऐसा करते तो उनकी सारी हरकत देशसेवा साबित हो जाती फ़िर किसी की उनकी निन्दा करने की किसी की हिम्मत न होती।
अपने मित्र की बात को गलत कहने की सोच ही रहे थे कि हमें उनके बिना जूते के फ़ीते दिख गये। मित्र की बात का विरोध करने पर की ’जूतिकल स्ट्राइक’ सम्भावित आशंका ने हमें चुप कर दिया। एक हाथ अपने सर पर रखकर दूसरे से मुट्ठी भींचते हुये हमने जोर से ’ जयहिंद’ बोला तो मित्र मुस्कराते हुये बोले-’अब जय एयर इंडिया के होस्टेज की तरह जयहिंद बोला ही है तो चाय ही पिला दो।
’भारतमाता की जय’ बोलते हुये हमने चाय का पानी चढा दिया। दूध-चीनी के साथ ’इंकलाब जिन्दाबाद’ बोल दिया। मित्र ने शाबासी देते हुये बयान जारी किया- ’अब तुम सच्चे देशभक्त हो गये।’
हमारे मित्र हमारे घर में घुसकर हमारी चाय पीते हुये हमको देशभक्ति का प्रमाणपत्र दे रहे हैं। हमारे पास उनको धन्यवाद देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
अट्टहास के अप्रैल , 2019 अंक में प्रकाशित। शीर्षक सौजन्य से Alok Puranik

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Thursday, April 11, 2019

सड़क पर जाम मतलब दुनिया आबाद

 


सबेरे सड़क पर भीड़ है। बच्चे स्कूल की तरफ चले जा रहे हैं। रिक्शे , साइकिल, ऑटो, कार, स्कूटर मने जिसको जो सवारी मिली उसी पर चढ़ा चला जा रहा है। वैन का ड्राइवर बच्चों को छोड़ने के बाद गाड़ी की खिड़की पर हाथ रखे बीड़ी पी रहा है।

अधबने पुल के आगे गिट्टी का ढेर पड़ा है। न जाने कब बनेगा पुल। बगलिया के निकलते हैं लोग। हरेक को जल्दी है। कोई गाड़ी मुड़ने की कोशिश करती है तो मुड़ नहीं पाती। जरा सी जगह मिलते ही लोग उस जगह से निकलने की कोशिश करते हैं। जहां सायकिल निकलना मुश्किल वहां लोग मोटर साइकिल अड़ा देते हैं। विश्वास है कि जगह कभी न कभी तो निकल ही जाएगी। विश्वास बड़ी चीज है। जाम तो लगता रहता है। जाम लग रहा है मतलब दुनिया चल रही है। सड़क पर जाम मतलब दुनिया आबाद।
गिट्टी के ढेर पर एक कुत्ता आगे की टांगे फैलाकर वर्जिश टाइप कर रहा है। अभी उठा लग रहा है। हो तो यह भी सकता है कि 'मार्निंग भौंक' के बाद अलसा गया हो। उसके बाद अभी फिर जगकर टांगे सीधी कर रहा हो। क्या पता उसके डॉक्टरों ने उसे इस कसरत की सलाह दी हो। सेहत के प्रति जागरूक लगा कुत्ता। हमने उसकी फोटो लेनी चाही तो वह कसरत बन्द करके गिट्टी के ढेर से नीचे उतर आया। दिखावा पसन्द नहीं शायद उसको। कुत्ते और इंसान में शायद यही फर्क होता है। ठीक भी है। कौन उसको कोई चुनाव लड़ना है। किस बात का दिखावा करे। गबरू जवान है। कोई बूढा थोड़ी हो गया जो बुजुर्ग नेताओं की तरह फ़ोटो सेशन करते घूमे यह दिखाने के लिए कि -'अभी तो मैं जवान हूँ।'

सड़क पर एक रिक्शा वाला अपने रिक्शे पर दूसरा रिक्शा लादे लिए जा रहा है। शायद दूसरा रिक्शा घायल हो गया है। उसको अपने कंधे पर लादकर 'रिक्शा अस्पताल' लिए जा रहा है। लेकिन पीछे वाला रिक्शा जिस सरपट गति से साथ पीछे चल रहा है उससे लगता नहीं कि उसमें कोई खराबी है। शायद रिक्शा ढोने के लिए यह तरीका अपनाया हो रिक्शे वाले ने।
थोड़ी दूर पर रेलगाड़ी गुजर रही है। पुल पर गुजरते हुये उसकी आवाज बदलती है। बगल के स्कूल से सुबह की प्रार्थना की आवाज आ रही है। प्रार्थना के बाद राष्ट्रगान बजता है। असहज हो जाते हैं। 100 मीटर दूर बजता राष्ट्रगान सावधान कर देता है। फिर लगता है प्रार्थना , राष्ट्रगान लाउडस्पीकर बजाकर क्यों होते हैं?
राष्ट्रगान से अमेरिका के एक चोर का किस्सा याद आता है। चोर चोरी करके भाग रहा होता है उसी समय कहीं बजते राष्ट्रगान की आवाज सुनकर खड़ा हो जाता है। पकड़ा जाता है। बाद में उसकी राष्ट्रगान के प्रति सम्मान की भावना को देखते हुए उसकी चोरी की सजा माफ कर दी जाती है।
पता नहीं सच क्या था। क्या पता पकड़े जाने पर उसने ऐसा कहा बताया हो। लेकिन देश-दुनिया में अनगिनत लोग तमाम देशभक्ति के नारे लगाते हुए तरह-तरह के भ्रष्टाचार करते हैं। देशभक्ति का नारा लगाते हुए गड़बड़ करने वाले को टोंकने की जल्दी किसी की हिम्मत नहीं होती।
आसमान में सूरज भाई चमक रहे हैं। हम उनसे पूछना चाहते हैं कि क्या आपने यहां देशभक्ति का चलन है धरती की तरह? क्या आपके यहाँ भी कोई रोशनी घोटाला या अंधकार घपला होता है? आपके यहां भी चुनाव होते हैं क्या ? अगर हां तो मुद्दे क्या होते हैं चुनाव के ?
लेकिन सूरज भाई फिलहाल कुछ बताने के मूड में नहीं हैं। उनको चमकने से ही फुरसत नहीं।

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Monday, April 08, 2019

गधे (घोड़े) ने की इंसान की तरह हरकत




पढा लिखा लगता है। लेकिन ताज्जुब की बात यह कि गधा (जानवर) होने के बावजूद इंसानों की तरह झांसे में आ गये भाईजी। मेगा माल में 2500 की खरीद पर 5 किलो चावल की स्कीम का इश्तहार देखकर रुक गए। इंतजार कर रहे हैं कि कोई 2500 की खरीद करे तो 5 किलो चावल इनकी ठेलिया में आ गिरे। इसके बाद ये आगे बढ़ें।
इनका धैर्य देखकर लगता है कि बेवकूफी और उम्मीद पर दुनिया कायम है।

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नशे में सीटों का तालमेल


नशा चढ़कर बोलता है। दो रिक्शेवाले भाई इतनी गम्भीरता से बतिया रहे थे देखकर लगा कि किसी राजनैतिक पार्टी के मुखिया सीटों के तालमेल पर 'मिस्कौट' कर रहे हों।
पास खड़े होकर हमने सुनना चाहा तो कुछ समझ नहीं आया। मुंह से निकले शब्द गड्डमड्ड, टूटे-फूटे। हल्की बू के अलावा कोई सुराग न मिला। पास में शराब का ठेका देखकर अंदाज लगा कि इस बू की स्रोत वही दुकान है।
हमको पास खड़े देखकर अगले ने हमको भी आधी सीट उदारता पूर्वक ऑफर कर दी। ऐसे जैसे अपने संभावित गठबंधन में शामिल होने का न्योता दे दिया। हमने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं अपन की।
परसाई जी कहते हैं जो लोग राजनीति से अलग रहने की बात करते हैं वे सबसे बड़े राजनीति करने वाले होते हैं। इस लिहाज से तो समूचा समाज राजनीति करने वाला हुआ ठहरा।
हाथ में सुलगती बीड़ी पकड़े दोनों लोग बतियाते रहे। हम चले आये।

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Thursday, April 04, 2019

परदेसियों से न अखियां लड़ाना

 

सूरज भाई भन्नाए हुए हैं। कुछ किरणें अभी तक धरती पर नहीं पहुंचीं हैं। सज-संवर रही हैं। इठलाती हुई एक-दूसरे से 'देख री, कैसी लग रही हूँ' पूछते हुए फिर-फिर तैयार हो रही हैं। दूसरी भी बिना उनकी तरफ देखे -'जम रही है, एकदम बिंदास' कहते हुए तैयार हो रही है।
सूरज भाई किरणों की लेट लतीफी से सुलग रहे हैं। धरती पर गर्मी बढ़ रही है। एक बच्ची किरण फूल तैयार है। मुंह फुलाये हुए कोने में बैठी है। सूरज भाई की लाड़ली है। वह गुस्सा है कि जिस फूल पर बैठने के लिए वह जाने वाली थी आज वह उसको एलॉट नहीं हुआ है। सूरज भाई उसको मना रहे हैं लेकिन वह मान नहीं रही। मनौना ले रही है।
असल में बच्ची किरण का फूल से 'वो' टाइप का हो गया है। कल दिन भर फूल ने हवा के सहारे हिल-हिलकर झूला झुलाया था। किरण का मन गुदगुदा गया। आज फिर वह उसी फूल पर जाना चाहती है। लेकिन सूरज भाई ने जब उसको कोई दूसरी जगह एलॉट की तो वह बमक गयी। मनमाफिक सीट न मिलने पर चुनाव न लड़ने की धमकी देते जनप्रतिनिधियों की तरह हरकतें कर रहीं। अब सूरज भाई कोई हाईकमान तो हैं नहीं जो बच्ची पर अनुशासन की कार्यवाही कर दें। बाप हैं बच्ची के। प्यार करते हैं अपनी लाड़ली को। प्यार मजबूत बनाता है तो मजबूर भी करता है।
सूरज भाई बच्ची किरण को समझाने में जुट गए। बताया ''जिस फूल पर जाने की तू बात कर रही उसको कल बंदरों ने नोच कर फेंक दिया। इसीलिए दूसरी जगह एलॉट की है तुझे।"
बच्ची किरण सूरज भाई की बात मान नहीं रही। उसका दिल 'टूट' टाइप का गया है। वह बिफर गयी-"आप झूठ बोल रहे हैं। वह वहीं होगा। कल विदा किया था उसने मुझे हिल-हिलकर। मुझे जाना है उसके पास। नहीं जाऊंगी तो वह मुझे बेवफा समझेगा। मैंने उससे प्रॉमिस किया था। मैं कोई नेता थोड़ी हूँ जो वादा करके मुकर जाऊं। मुझे जाना है उसके पास। वह मेरा इंतजार कर रहा होगा। "
सूरज भाई मजबूरन बच्ची किरण को साथ लेकर आये। वह जगह दिखाई जहां कल फूल खिला था। आज उसकी जगह एकाध पत्तियां थीं। फूल को बंदरों ने नोच डाला था। किरण दुखी हो गयी। कुछ देर गुमसुम खड़ी रही। फिर पास में खिली कली को गले प्यार करती हुई फूल के साथ बिताए समय को याद करती रही। रेडियो पर गाना बज रहा है -'परदेशियों से न अखियां मिलाना।'
किरण का मन किया रेडियो को उठाकर पटक दे। थूर दे बदमाश को जो ऐसा फालतू गाना बजा रहा है। परदेशी बता रहा है फूल को। बदनाम कर रहा उसको। लेकिन जगह छोड़कर जाने का मन नहीं हुआ उसका। कली को गले लगाए वहीं रही वह।
हमारे साथ चाय पीते किरण को कली के साथ खेलते देख सूरज भाई ने सुकून की सांस ली। सारा किस्सा सुनाया मुझे। हम लोग बातों में मशगूल थे इस बीच एक बंदर आया और चुपके से मेज पर रखा बिस्कुट का पैकेट उठा ले गया। एकदम सर्जिकल टाइप। सिर्फ पैकेट उठाया। चाय का कप हिला तक नहीं। हमने दौड़ाया तो आंखे दिखाने लगा।
एक हाथ में बिस्कुट का पैकेट लिए दूसरे हाथ से वह दूसरे बंदरो को भगाने में लगा था। बाकी के बंदर भी उस पर झपट पड़े। सब एक-दूसरे पर राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं की तरफ खौखियाने लगे। अंततः बन्दर के हाथ से बिस्कुट का पैकेट छूट गया। उस पर दूसरे मुस्टंडे बन्दर का कब्जा हो गया। वैसे ही जैसे एक पार्टी के एजेंडे को दूसरी शातिर पार्टी अपना बना लेती हैं।
कुछ देर बाद बंदरों के दोनों गुट चले गए। क्या पता दोनों गुट सारी घटना का वीडियो बनाकर अपने-अपने हिसाब से अपने लोगों में दिखाएं। अपने को दूसरे से बेहतर बताएं। उनके यहाँ भी चुनाव होते हों तो क्या पता इसी आधार पर वोट भी मांगे जाए । आखिर हमारे पूर्वज हैं वो। हमारी ही तरह तो हरकतें करेंगे।
बंदरों के ऊधम से कुचली हुई घास अपने जख्म पर सूरज की किरणों का मरहम लगा रही है। रिक्शे में बैठा हुआ रिक्शेवाला अखबार में चुनाव की खबरें पढ़ रहा है। उससे उतरकर बच्ची स्कूल जा रही है। सूरज भाई चाय खत्म करके वापस चमकने लगे।
सुबह हो गयी है।


Wednesday, April 03, 2019

फुटपाथ पर अंगौछे




इतवार को फुटपाथ पर अंगौछे दिखे। फुटपाथ पर नहीं पेड़ पर लटकते। दिहाड़ी दुकानदार पेड़ की टहनियों पर अंगौछे लटका रहा था। प्राकृतिक शो रूम। टहनियों में लटके अंगौछे हवा की संगत पाकर इठला रहे थे। लहरा रहे थे। बक्से से आजाद होने की खुशी उनके पूरे बदन को हिलाए डाल रही थी।
पेड़ की टहनी से लटके नागिन डांस टाइप कर रहे थे अंगौछे। वे बिकने के लिए लटक गए थे। अपने खरीददार के इंतजार में थे। सब अपने-अपने। भाग्य फल देखकर आये थे। किसी को पसीना पोंछने का संयोग बताया गया था, किसी को नहाने के बाद बदन पोंछने का। एक के भाग्य फल में दूध का छन्ना बनने का संयोग बताया गया था। उसका मूड भन्नाया हुआ था। बचपन से उसकी दिली तमन्ना किसी सद्यस्नाता स्त्री पदार्थ के गीले जूड़े में लिपटने की थी। लेकिन सबका मनचाहा कहाँ होता है।
आगे वाला अंगौछा सफेद रंग का। बाकी रंग-बिरंगे। सफेद वाला बाकी के मुकाबले शरीफ लग रहा था। गुंडों से लबरेज राजनीतिक पार्टियों में दिखावे के लिए साफ-सुथरे को आगे करके वोट मांगने वाले अंदाज में सफेद अंगौछा सबसे आगे लटका था।
ऐसा लगा की रंगीन तबियत लोगों ने अपनी नुमाइंदगी के लिए साफ सुथरे लगने वाले को चुना है। जैसे तमाम घपले-घोटाले वाली बहीखाते पर सिंदूरी कपड़े की जिल्द चढ़ी होती है। जैसे अवैध शराब के ठेके थानों के आसपास चलते हैं। जैसे ज्यादातर लेनदेन 'घूस लेना अपराध है' लगे साइनबोर्ड के नीचे होता है। जैसे सबसे ज्यादा गन्दगी उस नुक्कड़ पर होती है जहां दीवार पर लिखा होता है -'आप द्वारा फैलाई गंदगी को आप जैसा ही आदमी साफ करता है।'
उत्सुकता से हमने दाम पूछे। सफेद वाला 70 रुपये का था, रंगीन वाले 50 के। सफेदी और शराफत के 20 रुपये। दुकान वाला थोड़ी नाराजगी में हमें देखता रहा। निगाह में जबान होती तो मुझे सुनाई पड़ता -'लेना देना कुछ है नहीं, खाली दाम पूछ रहे।'
उसकी निगाह ने हमको घायल कर दिया। मन किया एक खरीद लें और गले मे लपेट के एक ठो फोटो खींचकर डीपी बनाये। 100 लाइक और पचास कमेंट आएंगे कम से कम। 'अंगौछा गुरु' कहेगा कोई। कोई कुछ और मजे लेगा। लेकिन तब तक व्यवहारिक बुद्धि ने हमला कर दिया -'फालतू की खरीदारी की क्या जरूरत?'
व्यवहारिक बुद्धि के हमले से अकबकाये हम लौट आये। घर ही आये। आपको तो पता ही है कि लौट के कौन आता है घर। ज्यादा क्या बताएं आपको। आप खुद ही समझदार हैं।

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Tuesday, April 02, 2019

क्रासिंग पर कड़क्को


क्रासिंग पर गाड़ियां रुकते ही बच्चे लपकते हैं। रुकी हुई गाड़ियों के शीशे साफ करने लगते हैं। कुछ लोग बच्चों को घुड़क देते हैं। कुछ चुपचाप साफ करने देते हैं। कुछ लोग कुछ दे देते हैं। ज्यादातर चुपचाप बिना कुछ दिए आगे चल देते हैं।

क्रासिंग पर लालबत्ती बच्चों के लिए कमाई की संभावना हैं। ज्यादातर लोग बिना दिए ही आगे बढ़ जाते हैं। हम भी उनमें ही हैं। 'किसी को मुफ्त पैसा देना ठीक नहीं' वाले तर्क से अपने को बचाते हैं। लेकिन अपन गाड़ी साफ भी नहीं कराते। बच्चे लपकते हैं तो उनको मना कर देते हैं। बच्चे भी अब पहचान गये हैं। दूसरी गाड़ी की तरफ बढ़ जाते हैं। न जाने बत्ती कब हरी हो जाये।
क्रासिंग की तरफ बढ़ती हर गाड़ी बच्चों के लिए रोजगार का एक संभावित अवसर है।
कल बच्चे क्रासिंग के पास सड़क पर कड़क्को खेल रहे थे। सड़क पर गेरू से खांचे खींचकर। खेलते हुये ’ घर’ बसा रहे हैं। दूसरे के ’घर’ में जगह साझा कर रहे थे। भीड़ वाली क्रासिंग है यह। लेकिन बच्चे एकदम बगल से गुजरती गाड़ियों से बेपरवाह उछलते हुए खेल रहे हैं। बहुत 'डेयरिंग'।
हमने कड़क्को खेलते बच्चों का फोटो लेने के लिए मोबाइल आन किया तो एक बच्ची बोली -'पुलिस को देओगे? हमको पकड़वाओगे?' उसके पूछने में डर नहीं है, चुनौती है। फ़ोटो खींचकर क्या बिगाड़ लोगे?
मांगने वाले बच्चों को लगता है कि उनकी फोटो खींचकर पुलिस में देंगे तो पुलिस उनको पकड़ेगी। आमतौर पर भीख मांगते बच्चे कैमरा दिखाते ही फुट लेते हैं।
हमने कहा नहीं। हम पुलिस में नहीं देंगे। वे मेरे आश्वासन से बेपरवाह फिर वहीं खेलने लगे। एक बच्ची खम्भे में टायर लटकाए उस पर झूला झूल रही थी।
शहर की सबसे भीड़ भरी क्रासिंग के पास बच्चे सड़क पर लाइन खींचकर कड़क्को खेलते हुए भीख मांग रहे हैं। भीख मांगते हुये खेलना या फ़िर खेलते हुये मांगना। ’वर्कफ़्राम होम’ घराने की सुविधा। ’बेग एंड प्ले’ या फ़िर ’प्ले एंड बेग’ । इस समस्या का किसी के पास इसका इलाज नहीं है।
वैसे इलाज कोई मुश्किल नहीं है। लेकिन क्या है न कि दशकों से देश की सारी ताकत विकास में लगी है। आम जनता की तरफ देखने की किसी को फुरसत नहीं मिल रही। जैसे ही फुरसत मिलेगी तो कोई ऐसी मिसाइल बनेंगी जो गरीबी, भुखमरी, दरिद्रता को उसके घर में घुसकर मारेगी। उसकी हिम्मत नहीं होगी कि इस तरह क्रासिंग पर बच्चों के बहाने सरेआम अपनी हरकतें दिखाए।
क्रासिंग पर भीख मांगते हुए खेलते बच्चों की संख्या बढ़ रही है। शायद कुछ दिन में ये भी बड़ा वोट बैंक बन जाएंगे। फिर इनके लिए सहूलियत की बात चलेगी। भीख मांगने में होने वाली परेशानियों को दूर करने के वादे होंगे। क्रासिंग पर छतरी और पानी की व्यवस्था होगी ताकि गर्मी में मांगने में आसानी रहे। लाल बत्ती का समय बढ़ाये जाने का आश्वासन होगा।
फिलहाल तो ऐसे ही चलेगा जी।

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Saturday, March 30, 2019

नींद

 

चाहे सृजन की हो

चाहे भजन की हो
थकन की नींद एक है।
किसी को कुछ दोष क्या
किसी को कुछ होश क्या
अभी तो और थकना है।

-स्व रमानाथ अवस्थी





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Friday, March 29, 2019

एक का मलबा दूसरे के नींव



सुबह की बात ही कुछ और होती है। शहर अंगड़ाई लेते हुए उठ गया। बच्चे स्कूल की तरफ लपक लिए। बड़े दिहाडी कमाने निकल लिए।
एक बुजुर्ग रिक्शे वाला एक महिला को ले जा रहा है। महिला अकड़ के साथ बैठी है। रिक्शा वाला सर झुकाए रिक्शा खींच रहा है। दोनों की आर्थिक स्थिति एक जैसी है। लेकिन बैठने और खींचने की स्थिति ने दोनों की मुखमुद्रा अलग कर दी।
नुक्कड़ पर नाई अपने ग्राहक की दाढ़ी गीली कर रहा है।गाल सहलाते हुए पहले पानी से । फिर से साबुन से। इसके बाद छीलेगा। सहलाने, गीला करने के बाद छीलने में दर्द नहीं होता। बाजार की ताकतें ग्राहकों को इसी तरह छीलती हैं।
सड़क पार दो पिल्ले एक कपड़े के चिथड़े को मुंह में दबाए एक -दूसरे से छीनने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों के दांत शायद अभी दूध के हैं। इसलिए कपड़ा फटा नहीं है। दोनों पिल्ले कपड़ा अपनी-अपनी तरफ खींच रहे हैं। कुछ देर में एक पिल्ला कपड़ा छोड़कर फूट लिया। कपड़ा दूसरे के दांत में लत्ते की तरह लटक गया। वह भी उस लत्ते को वहीं छोड़ इधर-उधर लोटने लगा।

पिल्लों की हरकतें प्राइम टाइम के बहसवीरों जैसी लगीं। कुछ देर एक मुद्दे पर को अलग-अलग खींचना। बहस बाद मुद्दे को लत्ते की तरह छोड़कर नई बहस के लिए निकल लेना।
बगल में एक बच्चा ऊपर कमीज पहने और नीचे से दिगम्बर पिल्लों की कुश्ती कौतूहल से देख रहा था। अधनंगा बच्चा चुनाव के समय दो धुर विरोधी पार्टियों के गठबंधन सरीखा लग रहा था। जैसे एक कपड़े वाली पार्टी ने किसी दिगम्बर दल से गठबंधन करके अधनंगा गठबंधन कर लिया है।
कुछ बच्चे सीवर लाइन का ढक्कन खोले उसमें से गंदगी फावड़े से निकालकर सड़क पर जमा कर रहे थे। सीवर बजबजा रहा था। जाम सीवर को चालू करने की कोशिश कर रहे थे बच्चे। आगे देखा कई जगह ऐसे सीवर खुले पड़े थे।
बजबजाते सीवर के बगल की चाय की दुकान में एक आदमी चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहा था।भारत ने अंतरिक्ष में अपना उपग्रह मार गिराया।

सुरेश अपनी दुकान पर टहल रहे थे। कई रिक्शे खड़े थे। बताया कि रिक्शेवाले होली में घर गये हैं। छुट्टी बाद आएंगे तब रिक्शे चलेंगे।
गुप्ता जी सड़क पर बैठे ग्लास की चाय में डबल रोटी भिगोकर खा रहे थे। चश्मा बनवा लिया है। ढाई सौ का बना। तबियत के बारे में बताया -'जिंदा हैं। हर बीमारी से बच जाते हैं। लगता है अभी और जीना है।'
गुप्ता जी का बच्चा साइकिल की दुकान छोड़कर अभी ककड़ी-खीरा बेंच रहा है।
गंगा पुल से देखा सूरज भाई चमक रहे थे। देखते-देखते गंगा में कूद गए। नहाकर हर हर गंगे कहते हुए निकलेंगे।नदी में नावें सामान इधर-उधर कर रहीं थीं। नदी का पानी हिलते-डुलते नाव को टाटा कर रहा है। हैप्पी जर्नी बोल रहा है।
सामने एक खड़खड़े में किसी मकान का मलवा लेकर लड़का शुक्लागंज की तरफ जा रहा था। किसे गिरे हुए मकान का मलवा किसी दूसरे मकान की नींव में लगे। एक के मलवे से दूसरे के लिए नींव बनता है।
सुबह हो गयी।

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Thursday, March 28, 2019

तन पर नहीं लत्ता-पान खाएं अलबत्ता


रिक्शे वाले घर गए हैं। होली पर। त्योहार मनाने। अगले हफ्ते आएंगे। रिक्शा मालिक सुरेश ने जानकारी दी।

रिक्शे भी आराम फरमा हैं। तसल्ली से धूप सेंकते हुए। शरीफ बच्चों की तरह दीवार की तरफ मुंह कोई लाइन से खड़े हैं। जिन रिक्शों के पुर्जे ढीले हैं, जिनकी बियरिंग घिसी हुई है वे खुश टाइप दिख रहे हैं। कुछ तो आराम मिला खटर-पटर-खट से।
एक रिक्शे अलग दिखने की कोशिश में चलने की मुद्रा में खड़ा है। शायद नाटक कर रहा कि छुट्टी है लेकिन चलने को तैयार है। बदमाश है। रंगमंच दिवस था कल। लगता इस पर भी नाटक का नशा चर्राया है। अपने को बड़ा खलीफा समझ रहा। भले साल भर बाद पुर्जे-पुर्जे हो जाये। लेकिन अभी चरस बोए पड़े हैं।
कहावत है न -तन पर नहीं लत्ता, पान खाएं अलबत्ता।

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