आज कमलेश पांडेय को वलेस घराने का तीसरा ज्ञान चतुर्वेदी मिलना है। महाकाल की नगरी उज्जैन में। इसके साथ ही कमलेश जी वरिष्ठ व्यंग्यकार भी हो गए। इस सम्मान के लिए कमलेश जी को बधाई।
लेबल
Saturday, October 12, 2019
कमलेश पांडेय को ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान की बधाई
Tuesday, October 08, 2019
मस्जिद की दीवार पर संस्कृत
Saturday, October 05, 2019
बर्फ़ सड़क खा जाती है
भारत के आखिरी गांव थांग से लौटते हुये शाम हो गयी थी। तसल्ली से आराम किये। गेस्ट हाउस में खान-पान का चौकस इंतजामा। मौसम खुशनुमा।
सुबह पैंगोंग लेक जाना तय था। ड्राइवर ने जल्दी निकल लेने की बात कही। देर होने पर सूरज की रोशनी में बर्फ़ पिघलकर सड़क खा जाती है। रास्ता रुक सकता है। पानी के बहाव से सडक कट जाने की बात तो सुनी थी। लेकिन पिघली हुई बर्फ़ द्वारा सड़क खा जाने की बात पहली बार सुनी। रास्ते में कई जगह देखा भी। पिघली हुई बर्फ़ सड़क खा गई थी। बगल के रास्ते से पत्थरों के बीच से आगे निकले।
मुरमुथ दर्शन के बाद हम लोग पैंगोंग झील की तरफ़ बढे। कुछ देर में पहुंच भी गये वहां। भारत, तिब्बत और चीन के बीच पसरी हुई लेक झील लगभग 134 किमी लम्बी है। जाड़े में झील जम जाती है। झील का पानी एकदम साफ़ । सर्फ़ एक्सेल से धुला हुआ सा। अपनी खूबसूरती का एहसास था शायद पानी को। इसीलिये वह इठलाते हुये झील में लहरा रहा था।
Saturday, September 21, 2019
'घुमक्कड़ी की दिहाड़ी' को वर्ष 2018 का गुलाब राय सर्जना पुरस्कार
मेरी किताब 'घुमक्कड़ी की दिहाड़ी' को उप्र हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2018 के गुलाब राय सर्जना पुरस्कार के लिए चयनित होने की सूचना मिली। इस पर 40000/- का इनाम मिलेगा। यह पुरस्कार निबन्ध विधा में है।
Saturday, September 14, 2019
हिन्दी दिवस के कुछ अनुभवों से
Thursday, September 12, 2019
बस निकल लो गुरु आगे जो होगा देखा जाएगा
लेह से भारत के आखिरी गांव थांग तक के रास्ते में कई बाइकर्स मिले। मोटरसाइकिल पर धड़धड़ाते जाते। खरदुंगला पास पर भी कई टोलियां मिलीं। उनमें कुछ लड़कियां भी थीं। इन बाइकर्स को देखकर लगा कि यही असल जिंदगी यही है, घूमना। यायावरी, घुमक्कड़ी। बाकी तो सब ऐं-वैं ही है।
मंडी हाउस की चाय और व्यंग्य का महाउपन्यास
आज दिल्ली में Subhash Chander जी से मिलना हुआ। जगह मंडी हाउस। व्यंग्य के प्रकांड पंडित सुभाष जी के लिए सितम्बर का महीना ' सहालग' का महीना होता है। कहीं मुख्य अतिथि तो कहीं विशिष्ट वक्ता। कहीं विषय प्रवर्तक तो कहीं उपसंहार कर्ता। पूरे महीने कहीं से आ रहे होते हैं या कहीं जा रहे होते हैं।
आधे घण्टे की यात्रा करके आये सुभाष जी से दस मिनट की मुलाकात हुई । इस बीच उन्होंने अपने दो अधूरे उपन्यासों का हवाला दिया। झटके में 30-35 पेज लिखे गए। फिर थम गए। फोन पर बातचीत में Shashi Pandey जी ने भी अपने उपन्यास के दस पेज के बाद ठहराव की बात बताई। Arvind Tiwari जी भी एक उपन्यास में ठहरे हुए हैं। गरज यह कि हिंदी व्यंग्य में जिस भी लेखक से बात की जाए तो पता चलता है कि उसका कोई उपन्यास कहीं ठहरा हुआ है। इस लिहाज से यह भी माना जा सकता है कि सच्चा व्यंग्य लेखक वही है जिसका कम से कम एक उपन्यास ठहरा हुआ है। उसी कड़ी में यह तय किया जा सकता है कि जिसके सबसे ज्यादा अधूरे उपन्यास हैं वह उतना बड़ा लेखक।
Tuesday, September 10, 2019
जो कुछ मिलना है अपनी क्षमताओं से, अपने संघर्ष से और अपने धैर्य से ही मिलना है -आलोक पुराणिक
[इंसान के व्यक्तित्व निर्माण में उसके बचपन का बड़ा हाथ होता है। आलोक पुराणिक के साथ भी अलग नहीं हुआ। कम उमर में पिता के न रहने पर बकौल आलोक पुराणिक ही
सन्तोष की सांस
कल घर से निकलते समय हमने अपनी गाड़ी का मुखड़ा देखा। दफ़्तर से लौटते समय एक आटो अनजान तरीके से मेरी गाड़ी को रगड़ता चला गया था कुछ ऐसे जैसे भीड़ भरी बसों में मर्दाने लोग जनानी सवारियों पर हाथ/बदन साफ़ करते चलते हैं। मेरी गाड़ी सही सलामत थी। मैंने ईश्वर को लाख-लाख शुक्रिया दिया। लेकिन फ़िर याद आया कि शुक्रिया तो खुदा को दिया जाता है। ईश्वर तो धन्यवाद ग्रहण करते हैं। भन्ना न गये हों कहीं धन्यवाद की जगह शुक्रिया देखकर। हमने फ़ौरन ईश्वर को डेढ-डेढ लाख धन्यवाद रवाना किया और अनुरोध किया कि हमारे शुक्रिया वापस कर दें ताकि हम उनको खुदा के हवाले कर दें। लेकिन शुक्रिया वापस आया नहीं। जमा हो गया होगा कहीं गुप्त खाते में ईश्वर के। बहुत गड़बड़झाला है ऊपर वाले के यहां।









