Monday, July 31, 2023

सैकड़ो सालों का इतिहास समेटे क़ुतुब परिसर में कुछ घंटे



कल दिल्ली वाक में शामिल हुए। आलोक पुराणिक जी और मनु कौशल जी ने लोगों को पिछले कुछ दिनों से दिल्ली घुमाना शुरू किया है। बकौल आलोक पुराणिक उनको इसकी प्रेरणा उनकी बिटिया इरा पुराणिक से मिली है जो लगभग हर इतवार को बस्ता पैक करके निकल जाती थी। बिटिया से सीखकर पिताजी ने भी शुरू किया दिल्ली टहलना। इस काम में उनके साथ मनु कौशल जी भी जुड़े हैं जिनके अंदर गालिब की आत्मा ने स्थायी रूप से डेरा जमाया हुआ है। पुरानी दिल्ली, लाल किला की घुमाई के बाद अब कुतुब परिसर नया ठिकाना है आवारगी की चाहत रखने वाले आलोक पुराणिक जी का।
इतवार की वाक में हम भी शामिल हुए। हमारे साथ तकरीबन 30 लोग और थे। टिकट के दाम आलोक जी ने पहले ही धरा लिए थे। 400 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से। कामर्स के मास्टर होने की आड़ में उनका कहना है -'कोई काम मुफ्त में करना आर्थिक अपराध है।'
35 रुपये का टिकट भारतीयों के लिए है। परदेशियों के लिए टिकट के दाम ज्यादा हैं- शायद 500 रुपये। देशी होने का फायदा तो ठीक लेकिन परदेश के लोगों से भी ज्यादा पैसे लेना जमा नहीं। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के विपरीत काम है।
बहरहाल अंदर प्रवेश करने के बाद आलोक पुराणिक और मनु कौशल जी ने एंकरिंग शुरू की। शुरुआत में सबके परिचय हुए। कुछ वरिष्ठ नागरिक भी थे। बच्चे भी थे। टूर शुरू हुआ।
कुतुब परिसर का इतिहास कुतुबुद्दीन ऐबक से शुरू हुआ। कुतुबुद्दीन ऐबक मोहम्मद गोरी का गुलाम था। गोरी ने तराई की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया और अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का कामकाज सौंप कर वापस लौट गया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतुबमीनार की शुरुआत करवाई जिसे बाद में उनके दामाद एल्तुतमिस ने पूरा करवाया। इल्तुतमिश के बाद उसकी बेटी रजिया सुल्तान गद्दी नशीन हुई। वह पहली महिला सुल्तान थी जिसके बारे में कहा गया कि रजिया में सिवाय औरत होने के कोई ऐब नहीं था। ऐसे समय में जब महिला होना अपने आप में ऐब माना जाता हो इल्तुतमिश ने अपनी बेटी को सुल्तान बनाया। कितनी आधुनिक सोच रही होगी गुलाम वंश के दूसरे शासक की।
गुलाम वंश के बाद खिलजी वंश की पारी शुरु हुई। अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी को ठिकाने लगाकर अलाउद्दीन गद्दीनशीन हुआ। मजे की बाद जलालुद्दीन अपने भतीजे को बेटे से ज्यादा चाहता था और बेटा भी अपने चाचा को बाप से ज्यादा इज्जत देता था। लेकिन मौका पाते ही अपने चाचा को निपटाकर अलाउद्दीन सुल्तान बन गया। इतिहास में हर तरह तरह के धतकरम हो चुके हैं।
खिलजी चाचा भतीजे की कहानी सुनते हुए मुझको पड़ोसी पाकिस्तान के किस्से याद आये जहां भुट्टो ने कई सीनियरों को नजरअंदाज करके जियाउलहक को सेना की कमान सौंपी थी। जियाउलहक भुट्टो से इतना डरता था कि एक बार सिगरेट पीते हुए भुट्टो के सामने पड़ने पर सिगरेट जेब में डाल ली। पैंट सुलग गयी लेकिन बोला नहीं। भुट्टो उसको अपना बंदर कहते थे। बाद में उसी बंदर ने उनकी गर्दन पर उस्तरा चला दिया और भुट्टो को निपटा दिया।
कहने का मतलब कि बहुत चापलूसी करने वाले, विनयवनत रहने वाले मुलाजिमों से सावधान रहने की जरूरत है।
बहरहाल बात हो रही थी कतुबपरिसर की। कुतुब परिसर की घुमाई शुरुआत अलाई मीनार से। अलाई मीनार की शुरुआत अलाउद्दीन खिलजी के समय हुई। सुल्तान की तमन्ना कुतुबमीनार से ऊंची और बुलंद मीनार बनवाने की थी। शुरुआत हुई। उनकी शान में कसीदे पढ़ने वालों ने लिखा -'मीनार के बनाने में सारे ग्रह लग गए।'
हिंदी साहित्य के इतिहास में वीरगाथा काल में कवियों को अपने आश्रयदाता राजाओं की तारीफ़ में अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन की बात कही गई है। लेकिन यह काम उनके बहुत पहले शुरू हो गया था। अमीर ख़ुसरो बेहतरीन प्रतिभा से युक्त थे। वे अपने समय सात सुल्तानों के अजीज शायर रहे। उनकी सफलता में उनके द्वारा सुल्तानों की उदार तारीफ और बेहिसाब शाब्दिक चापलूसी का भी योगदान रहा होगा। हर सुल्तान की जी खोलकर तारीफ।
अलाई मीनार की शुरुआत तो हुई लेकिन मुकम्मल नहीं हो पाई और अलाउद्दीन मुकम्मल हो गए। बाद के सुल्तानों ने भी इरादा किया इसे बनवाने का लेकिन फिर लोगों की समझाइश पर हाथ खींच लिए।
इसी बहाने मोहम्मद बिन तुगलक की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए आलोक पुराणिक जी ने उनको बहुत बेवकूफ किस्म का जीनियस और जीनियस किस्म का बेवकूफ बताते हुए उनकी बेवकूफी के कई किस्से भी बयान किये यह कहते हुए कि इसको किसी से जोड़कर न देखा जाए। उनको पूरा भरोसा था कि यह कहने के बाद तुगलक के किस्सों से लोग आज के किस्से जरूर जोड़ लेंगे।
अलाई मीनार के बाद कुव्वतुल मस्जिद , लौह स्तम्भ, इल्तुमिश का मकबरा, अलाउद्दीन का मकबरा , उस समय के क्लासरूम और अलाई दरवाजा वगैरह देखना हुआ। इसी क्रम में शब्दों के सफर के लेखक पत्रकार अजित वडनेकर जी के हवाले से आलोक पुराणिक जी ने बताया कि महरौली नाम वराह मिहिर के मिहिर और पंक्ति माने कतार से पड़ा।
कुतुब पसिसर की मस्जिद कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद वहां मौजूद जैन मंदिरों के मलबे से बनाई गईं। इस बार का उल्लेख वहां के लेख में है।
परिसर में मौजूद लौह स्तम्भ चौथी शताब्दी का बताया जाता है। इस तरह कुतुब परिसर में चौथी सदी से लेकर आज तक का इतिहास आरामफरमा है। दुनिया में किसी एक जगह इतने लंबे समय की ऐतिहासिक इमारतें शायद ही मौजूद हों।
कुतुबुमीनार सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर बनवाई बताई जाती है। लेकिन इसके पीछे की एक कहानी यह भी है कि वहीं पास में रहने वाले एक फकीर के नाम पर इसका निर्माण हुआ।
इल्तुतमिश की कब्र के बारे में बताने का काम आलोक पुराणिक जी ने बिटिया इरा पुराणिक को सौंप दिया। इल्तुतमिश ने अपनी सल्तनत अपनी काबिल बेटी रजिया को सौंपी इधर एंकरिंग का काम आलोक पुराणिक जी ने बिटिया को थमाया। इरा ने यह काम बखूबी पूरा किया।
अलाऊद्दीन खिलजी के मकबरे में उनकी कब्र बनी है। एक चबूतरा है। इसके किस्से सुनाते हुए आलोक पुराणिक जी ने उस पर कुत्ते के टहलने और एक कन्या द्वारा उस पर डांस करते हुए रील बनाने के किस्से सुनाए। अगर अलाउद्दीन इसको देखते सुनते तो कैसा महसूस करते , कहना मुश्किल है।
अलाऊद्दीन खिलजी की कब्र के बाद वहां बने क्लास रूम देखे गए जहां कभी लोग पढ़ाई करते होंगे। इसके बाद खुले में विस्तार से खुसरो पर चर्चा हुई।
खुसरो की काबिलयत, उनकी भाषाई पकड़ और आशुकवित्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए आलोक पुराणिक जी ने उनके परम चापलूस और काम भर के छिछोरेपन का भी हसरत वाले अंदाज में कई बार उल्लेख किया इस अंदाज में गोया वह यह स्थापित करना चाहते हैं कि सदियों तक मशहूर होने वाला काम करने के लिए चापलूसी और थोड़ा छिछोरापन भी चाहिए होता है। इसी सिलसिले में ग़ालिब जी की बात भी चली जो मुगलों से वजीफे लेने के बाद उनके दुश्मन रहे अंग्रेजों से पेंसन हासिल कर ली। इसमें उनकी काबिलियत के साथ मिजाजपुर्सी का हाथ भी रहा। आजकल के मैनेजमेंट में तो मिजाजपुर्सी और चापलूसी भी काबिलियत में शुमार है।
खुले में क्लास लगी में अमीर खुसरो के चर्चे हुए। अपने हुनर और काबिलियत से सात सुल्तानों के प्रिय रहे खुसरो साहब। उनकी कविता, प्रतिभा के साथ उनकी पहेलियों के चर्चे भी हुए। सही हल बताने वाले को चॉकलेट मिली। हमको भी एक बार मिलीं। एक साथ तीन छुटकी चाकलेट। हमने मिलबांट कर खा लीं।
कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद का जिक्र करते हुए अपनी बात कहने के लिये लाल कपड़े में आने वाली फ़रियादिन का जिक्र भी हुआ। उसके तार रामायण काल के कोपभवन तक खिंचे। और भी न जाने कहाँ-कहाँ के किस्से टहलते हुए बिना टिकट इस घुमाई के दौरान बतकही में शामिल होते गए और किस्सा बनते गए। चौथी सदी से शुरु हुई कहानी का सिलसिला 21 वीं सदी तक चला।
आखिर में मामला अलाई दरवाजा पर निपटा। बुलंद दरवाजा बनने तक यह अपने यहाँ का सबसे बड़ा दरवाजा था। वहां सबके फोटो हुए। फोटो के साथ delhi walk का पोस्टर भी लगा पहले उल्टा फिर सीधा। इसके बाद सब लोग निकल लिए एक-एक करके।
करीब ढाई घण्टे के वाक के संक्षेप में किस्से यहां बयान हुए। बाकी फोटो और वीडियो नीचे लगाए जा रहे हैं। वीडियो देखकर आप दिल्ली से बाहर रहते हुए भी इस वॉक में शामिल हो सकते हैं। लेकिन अगर दिल्ली में हैं अगले इतवार को 6 अगस्त को कुतुब परिसर की वाक में शामिल हो सकते हैं। मजे की पूरी गारंटी। मजा न आने पर पैसे वापस लेकिन इसके लिए मजा न आने का सबूत पेश करना होगा। मुझे पूरा यक़ीन हैं कि आप सबूत पेश न कर पाएंगे। यकीन तो यह भी है कि अगर यहाँ के इतिहास में शामिल बुज़ुर्गवारों को भी मौका मिलता तो वे भी इस वॉक में शामिल होते। अमीर खुसरो भी अपनी पहेलियों के हल बताकर चाकलेट लूट रहे होते।
वीडियो कुछ यहां लग पाए। बाकी जो नहीं लग पाए वो अगली पोस्ट में।

https://www.facebook.com/share/p/SWx6ZvVL7DTt7tQ4/

Wednesday, July 19, 2023

बहुत उलझने हैं जिंदगी में



सुबह चाय की दुकान पर भट्टी सुलगनी शुरू हो गयी। पहले धुंआ उड़ता रहा। फिर आग जली। चाय बनने लगी। लोग इंतजार में हैं।
एक बुजुर्ग दुकान के बाहर रखी बेंच पर बीड़ी पी रहे हैं। बीड़ी पीते हुए धुंआ उड़ा रहे हैं। धुंए को उड़ते हुए धुंए के पार देख रहे हैं। नजरे दूर टिकी हुई हैं। क्षितिज को ताक रहे हैं। शायद सोच रहे हैं -'धुंआ वहां तक जाएगा। लेकिन धुंआ मुंह के पास ही थक कर हवा में ही बैठ गया है शायद। संभावनाएं इसी तरह दम तोड़ देती हैं।'
बुजुर्ग जिस तरह चुपचाप बैठे बीड़ी पी रहे हैं उससे लग रहा है कि कुछ सोच रहे हैं। सोच मतलब चिंता। गरीब आदमी जब सोचता है तो उसको चिंतन कहा जाता है। यही काम जब सम्पन्न करता है तो उसे चिंतन का नाम दिया जाता है। आजकल तो चिंतन शिविरों का हल्ला है।
जो काम एक गरीब आदमी बीड़ी पीकर कर लेता है उसी काम के लिये लाखों फुंक जाते हैं चिंतन शिविरों में।
एक बीच की उमर का आदमी टहलते हुए दुकान में घुसा। बोला-'माचिस है किसी के पास?'
किसी के पास से माचिस अपने आप उसतक पहुंच गयी। बीड़ी सुलगाते हुए बोला-'बहुत उलझने हैं जिंदगी में। दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। समझ में नहीं आ रहा कैसे निपटा जाए इनसे।'
कोई कुछ बोलता नहीं हैं। वह चुपचाप बीड़ी पीने लगता है। साथ के लोगों से बातचीत करने लगा। पता चला -'ऑटो चलाता है। फजलगंज से सवारी लेकर आया है।'
चाय बन गयी। दुकान वाला कागज के ग्लास से नापकर एक पन्नी में चाय भरने लगा। पांच ग्लास चाय बांधकर उसने पन्नी का मुंह बंद कर दिया। ग्राहक को थमा दिया।
हमने कुल्हड़ में चाय मांगी। उसने चुपचाप केतली से चाय डाल दी कुल्हड़ में। कुछ चाय कुल्हड़ की दीवार को भिगो गयी। चाय पीते हुए अपनी बनाई चाय से तुलना करने लगे। हमको लगा हम भी चाय बढिया बना लेते हैं। मन किया कि खोल लें चाय की दुकान। जितनी देर बैठें , लोगों की गप्पाष्टक सुनते रहें। लिखते रहें। सीरीज बने -'चाय की दुकान से।' या ऐसा ही कुछ।
दस रुपये की है चाय। पहली बार चाय पी थी दुकान से तीस पैसे की। 42 साल में 300 गुना बढ़ गए हैं चाय के दाम। और भी न जाने कितना बदला है इस दरम्यान। बदलाव ही शाश्वत है दुनिया में।
इस तरह के अनगिनत आइडिए आते हैं दिन भर। लेकिन जितनी जल्दी आते हैं, उससे भी जल्दी फूट भी लेते हैं। सबके साथ होता होगा। हमारे दिमाग ऐसी सड़क की तरह होते हैं जिनमें दिन भर तरह-तरह के विचार गाड़ियों की तरह गुज़रते रहते हैं। कोई टिककर नहीं बैठता।
गाड़ी आ गई। लोग बाहर आने लगे। ऑटो वाले सवारियों को अपने कब्जे में लेने की कोशिश करने लगे-'आइए कल्याणपुर, आइए विजयनगर, आइए रावतपुर।' बीच में ऑटो वालों में आपस में कहा-सुनी भी हो गयी। मां-बहन भी हुई। लेकिन सवारियां आते ही लोग लड़ाई स्थगित करके उनकी तरफ मुड़ गए। इससे लगा कि गाली-गलौज, लड़ाई-झगड़ा खाली समय और दिमाग की उपज है।
एक सवारी को एक ऑटो वाले ने लपक लिया। सवारी ने पूछा -'कितने पैसे लोगे?'
ऑटो वाले ने बोला-'उतने ही जितने पिछली बार लिए थे।' सवारी उसके साथ हो ली। उसके बेटे ने पूछा-'आपने कैसे पहचाना कि यह ऑटो वाला वही है जो पिछली बार ले गया था।' सवारी ने कोई जवाब नहीं दिया। मुस्करा कर ऑटो वाले के पीछे चल दी।
स्टेशन से लौटते हुए लगा शहर कितना बदल गया है। पहचान में नहीं आता। जो जगहें दिमाग में बसी हई हैं वो इतनी बदल गयी हैं कि पहचानी नहीं जाती। उनके आसपास इतनी जगहें पैदा हो गई हैं कि लगता है नई जगह पर आ गए-'हम कहाँ आ गए हैं, तेरे साथ चलते-चलते।'
इस्टेट में एक आदमी सामने से भागता आ रहा है। कसरत कर रहा है। दूसरा आदमी पीछे की तरफ चलता हुआ सड़क पर चल रहा है। उसके पीछे आंख नहीं है। बिना देखे पीछे चल रहा है। कोई गड्ढा पड़ गया तो उसमें लुढ़क सकता है। लेकिन अगला इससे बेपरवाह पीछे की तरफ चल रहा है।
दुनिया में कई समाज भी तो इसी तरह बिना सोचे पीछे की तरफ चल रहे हैं। उनको किसी गड्ढे में गिरने की चिंता नहीं।
आसमान में सूरज भाई मुस्कराकर गुड मॉर्निंग कर रहे हैं।

https://www.facebook.com/share/p/RmYjji4Un4d2xfAF/

Thursday, July 13, 2023

स्कूल चलें



 स्कूल चलें। बेटी अनन्या और बेटे आर्यन को स्कूल भेजने के लिए जाते दीपक। साथ में बच्चों की माँ सावित्री। सावित्री की शिकायत है -‘अंकल जी हमने आपको तीन बार नमस्ते किया , आपने जवाब नहीं दिया।’

क्या कहते। हम देख रहें होंगे कोई पोस्ट या अख़बार पढ़ रहे होंगे। रह गया होगा।
घर के लोगों ने बताया कि सावित्री मिमिक्री बहुत अच्छी करती है। एक दिन हमारी मिमिक्री की , हूबहू। देखकर लोग लहालोट हो गए।
हमने पूछा तो सावित्री ने कहा -'क्या आंटी जी, आप अंकल जी को बता दीं।'
अच्छा हुआ कोई रील नहीं बनाई गई। बनी होती तो वायरल हो गई होती अबतक। 🙂


https://www.facebook.com/share/p/1HYr3JQCUV/

Monday, July 10, 2023

लेखकों के खतों पर बातचीत

 लेखकों के खतों पर बातचीत। लेखक की कोई निजता नहीं होती।

सदियों-दशकों पहले कुछ रोशनियाँ लिफ़ाफ़ों में बंद कर प्रियजनों को भेजी गईं थीं, जो रविवार शाम मर्चेंट चेम्बर हाल के पहले तल पर शहर के साहित्यप्रेमियों की मौजूदगी में चमक उठीं। यह कुछ चुनिंदा ख़तों की ख़ुशबू थी, जिसका सुरूर क़रीब चार घंटे श्रोताओं पर तारी रहा। वक्ताओं के ख़ास अन्दाज़-ए-बयां ने ख़ुशबू और रोशनी की जुगलबंदी में रंग भर दिए। साहित्यिक संस्था अनुष्टुप की ‘लिफ़ाफ़े में कुछ रोशनी भेज दे’ शीर्षक से तीसरी गिरिराज किशोर स्मृति व्याख्यानमाला यादगार बन गई।
इस मौक़े पर पहला व्याख्यान प्रख्यात लेखक प्रियंवद का था। उन्होंने कहा कि मेरे विचार में लेखक की कोई निजता नहीं होती। वह कथा, उपन्यास, इंटरव्यू, संस्मरण, आत्मकथा, जीवनी आदि में खुद को ही तो खोलता है। ऐसे में उसके जीवन का सब कुछ सार्वजनिक होना चाहिए। यह एक तरह का साहित्य ही है। ख़त हर समय और समाज की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने माँ को लिखे जेम्स जायस के पत्र,भाई थियो को लिखे चित्रकार वान गाग के पत्र, मित्र सुरेंद्रनाथ को लिखे शरतचंद्र के पत्रों के अंश सुनाए और कहा कि इनसे साहित्य की बेहतर समझ विकसित होती है। बताया कि पहला गिरमिटिया समेत कई चर्चित क्रतियो के लेखक स्व.गिरिराज किशोर और अन्य लेखकों में हुए पत्राचार को किताब की शक्ल में लाने का काम वह पिछले दो साल से कर रहे थे। यह काम पूरा हो चुका है। किताब के पहले खंड की पहली प्रति उन्होंने गिरिराज किशोर की पुत्री शिवा को सौंपी। किताब दो खण्डों में आएगी। हलीम मुस्लिम पी जी कालेज में उर्दू के प्रोफ़ेसर खान अहमद फ़ारुक ने अदबी खतूत के सफ़र पर कहा कि उर्दू अदीबों के ख़त भी मशहूर रहे हैं। इनमें ग़ालिब, अबुल कलाम आज़ाद, मोहम्मद अली रूदौलवी के खतूत ख़ास तौर पर मशहूर रहे हैं, क्योंकि वे आम रविश से हटकर लिखे गए हैं। अगर ग़ालिब के खतों पर बात की जाए तो उनकी ज़िंदगी, उनकी शायरी से कहीं बेहतर ढंग से उनके खतूत में नुमाया हुई है। साहित्यसुधी मनोचिकित्सक डा आलोक बाजपेई ने दिलचस्प अन्दाज़ में ख़त-ओ-किताबत की पुरानी दुनिया से लेकर मौजूदा वक्त में सोशल मीडिया के ज़रिए होने वाली बातचीत के अंतर को पेश किया। कार्यक्रम की शुरुआत लेखिका अनीता मिश्रा के स्वागत वक्तव्य से हुई। संचालन कर रहे डा आनंद शुक्ल ने मुक्तिबोध के खतों का ज़िक्र करते हुए ख़ूबसूरती से कार्यक्रम को गति दी। लेखक गिरिराज किशोर की बेटी शिवा ने अनुष्टुप परिवार व उपस्थित श्रोताओं को धन्यवाद दिया। कार्यक्रम में भावना मिश्रा, पंकज चतुर्वेदी, संध्या त्रिपाठी, सईद नकवी, प्रताप साहनी, मौलि सेठ आदि रहे।
दुनिया में केवल उसने मुझे पहचाना:
————————————-
मेरा 24 घंटे का साथी भेलू। इस दुनिया में केवल उसने मुझे पहचाना था। जब उसने मुझे काटा, तब सब लोग डर गए थे। उस वक्त रवि बाबू की पंक्तियाँ याद आई ‘तोमार प्रेम आघात, आछे नाइक अवहेला’ उसका प्रेम आघात था,पर अवहेला नहीं था। उसके पूर्व कभी इतना दर्द मुझे नहीं मिला। डाक्टर इलाज कर रहे हैं। पागल कुत्ते के काटने पर जो करना चाहिए,वही। 28 इंजेक्शन, जिनमें आजतक 10 लग चुके हैं, अब 18 बाक़ी रहे। इंसान को ज़िंदा रहना है,कारण -योर लाइफ़ इज टू वैलुएबल। बहरहाल, यह भी देख लिया जाए कि आख़िर कहाँ तक क्या होता है।
(मित्र सुरेंद्रनाथ को 25.04.1925 को लिखे लेखक शरतचंद्र का लिखा पत्र)
इंतज़ार है ….मुझसे क्या कहा जाएगा :
—————————————
मैं और कुछ नहीं कर सकता था। मैंने वही किया जो मेरे हाथ करना पसंद करते थे। मेरा ख़याल है बिना शब्दों के भी मुझे समझा जाना चाहिए। मैं उस दूसरी औरत को नहीं भूला जिसके लिए मेरा दिल धड़कता था, लेकिन वह दूर थी और उसने मुझे मिलने से इंकार कर दिया था, और यह औरत सर्दी में सड़कों पर बीमार, गर्भवती, भूखी भटक रही थी। …. तुम्हारे हाथों में मेरी रोटी है। क्या तुम इसे छीन लोगे और मुझसे मुँह मोड़ लोगे? मैंने सब कह दिया है। इंतज़ार है कि मुझसे आगे क्या कहा जाएगा?
( नीदरलैंड में जन्मे मशहूर चित्रकार वान गाग द्वारा मई 1882 को अपने भाई को थियो को लिखा पत्र)

https://www.facebook.com/share/p/rHHDqmaTg2UdD1es/

Wednesday, May 17, 2023

आज चाय मंहगी पड़ गयी

 


आज बेटे अनन्य Anany को स्टेशन छोड़ने गए। कल से उसकी https://www.facebook.com/firguntravels ट्रिप शुरू होनी है। मनाली जाना है उसको। उसकी दिल्ली की ट्रेन सुबह 6 बजे थी। अलार्म लगाया था साढ़े चार का। सोचा था कि सुबह पांच बजे चलकर आराम से समय पर स्टेशन पहुंच जाएंगे। गाड़ी के लिए ड्राईवर को बोल दिया था। सुबह आ जायेगा पांच बजे। उसने भी कहा था -'हम पांच के पहले ही आ जाएंगे।'
पहली बार नींद खुली। समय देखा। रात के साढ़े तीन बजे थे। पलट के सो गए। सोचा अलार्म बजेगा तब उठेंगे।
दूसरी बार जब नींद खुली तो साढ़े पांच बजने वाले थे। अलार्म पता नहीं बजा कि नहीं। लेकिन उसके लिए जांच कमेटी बैठाने का समय नहीं था। झटके से उठे। दो मिनट में तैयार हो गए। बेटा भी सूटकेस बन्द करके तैयार हो गया।
ड्राइवर को फोन किया। वह नींद के चपेटे में था। बोला -'आंख लग गयी थी। उठ नहीं पाए। अभी आते हैं।'
हमको पहले से ही आशंका थी कि ड्राइवर देर कर सकता है। उसने मेरे विश्वास की रक्षा की।
ड्राइवर के समय पर न आने से उपजा गुस्सा और उसके समय पर न आने से हुई मेरे विश्वास की रक्षा से मिली खुशी में मुकाबला शुरू हो गया। किसका पलड़ा भारी रहा, कहना मुश्किल।
समय कम था। 'सैंट्रो सुन्दरी' की शरण में गए। बुजुर्ग गाड़ी बिना नखरे के तुरंत स्टार्ट हो गयी। चल दिये स्टेशन। आधे घण्टे में आर्मापुर से सेंट्रलन पहुंचना था।
जल्दी पहुंचने की मंशा से गाड़ी तेज चलाई। कालपी रोड के स्पीड ब्रेकर पर गाड़ी जिस तरह उछाल मार रही थी उससे लगा वह ऊंची कूद में भाग ले रही थी। बेटे ने टोंका -'आराम से चलिए, बीस मिनट में पहुंच जाएंगे। अभी आधा घन्टा बाकी है छह बजने में।'
फजलगंज पहुंचने पर ड्राइवर का फोन आया। वह घर आ गया था। बेटे ने बात की। ड्राइवर देर से आने के लिए अफसोस जताते हुए सफाई दे रहा था। बेटे ने आराम से कह दिया -'कोई बात नहीं अब आफिस के समय घर पहुंच जाइयेगा।'
अच्छा हुआ मुझसे बात नहीं हुई। होती तो बिना गुस्से के भी ढेर सारा गुस्सा निकल जाता। आजकल के समय में लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। मौका मिलते ही और कुछ तो बिना मौके के ही लोग गुस्सा करने लगते हैं।
हमको लगा जैसे हमारी आंख लग गई वैसे ही उसकी भी लग गई होगी। लेकिन सहज सोच के हिसाब से हमारी बात और ड्राइवर की बात और। ड्राइवर को उसकी आंख लगने का हक थोड़ी है।
संयोग कि जरीब चौकी क्रासिंग खुली मिली, टाटमिल चौराहा पर भी रुकना नहीं पड़ा। नतीजतन जब स्टेशन पहुंचे तो घड़ी में समय 0547 हो रहा था। मतलब 17 मिनट में पहुंच गए घर से स्टेशन।
रास्ते में एक गुब्बारे वाला अपने पूरे शरीर को गुब्बारे से ढंके गुब्बारे बेच रहा था। गुब्बारे उसके शरीर को इस कदर घेरे हुए थे जैसे वह गुब्बारे के कपड़े पहने हो। मन किया रुककर उसका फोटो खींचें। लेकिन स्टेशन पहुंचने की जल्दी में चलते गए।
अनन्य को छोड़कर वापस लौटे तो अनवरगंज के पास पंकज बाजपेयी दिख गए सड़क पर। गाड़ी किनारे खड़ी करके उनसे मिले। पंकज जी ने देखते ही ' दूर-प्रणाम' किया। उनका हाथ इस कदर झुका हुआ जैसे पेट्रोल पम्प में पाइप से पेट्रोल भरते हैं। वो झुके हुए हाथ से हमारे चरणों में प्रणाम भर रहे थे।
प्रणाम के बाद कहा पंकज जी ने -'अबकी बहुत दिन बाद आये।'
इसके बाद बोले -'अबकी तुमको नई चप्पल दिलाएंगे।' फिर इधर-उधर की बातें। जैसे:
*मैसूर में गर्मी बहुत है
*जलेबी-समोसा-दही कहाँ है।
*अबकी बार सौ रुपये लेंगे।
*दोपहर को गर्मी बहुत पड़ती है। घर चले जाते हैं।
*बहन जी तुमको देखकर बहुत खुश होंगी।
*सुबह जल्दी आ जाते हैं यहां।
चाय पीने के लिए मामा की दुकान गए। पंकज ने अपने कप में चाय डलवाई आए टहलते हुए अपने ठीहे पर आ गए। वहां मौजूद लोगों ने भी बहुत दिन बाद आने की बात कही। एक ने मजे भी लिए -'अंकल , आपकी गाड़ी नो पार्किंग जोन में खड़ी है। चालान आता होगा। देखिए मोबाइल में आ गया होगा।'
हमने कहा -'जो होगा। देखा जाएगा।'
कहने को तो मैंने कह दिया -'जो होगा। देखा जाएगा।' लेकिन मन में बहस शुरू हो गयी कि यह मजाक है या सच। मजाक कहीं सच न साबित हो जाये। यह सोचते हुए मुस्ताक युसूफी साहब का जुमला भी याद आ गया -'पाकिस्तान में अफवाहों की सबसे बड़ी खराबी यह होती है कि वे सच साबित होती हैं।'
मजाक की बात पर अफवाह की बात याद आना भी यह बताता है कि अपने यहां भी अब मजाक की जगह अफवाहों का चलन हावी हो गया है। हंसी-मजाक गए जमाने की बात हो गयी।
चाय पीकर गाड़ी खोलने के लिए चाबी के लिए जेब में हाथ डाला तो चाबी नदारद। देखा चाबी गाड़ी में लटक रही थी। सारे दरवाजे बंद। बहुत दिनों बाद फिर ऐसा हुआ था।
हमको वहां रुका देखकर लोग वहां आ गए। गाड़ी खोलने के तरीके बताने लगे। एक ने कहा -'शीशा तोड़ दें। 200 रुपये में बन जायेगा।'
हमने लोगों से कहा -'कोई लंबी पत्ती या बड़ा स्केल मिल जाये तो खुल जाएगी गाड़ी।'
लोग खोजने लगे। कोई छोटी पत्ती लाया कोई कुछ। लेकिन उससे काम बना नहीं। फिर जिसने हमारी गाड़ी के चालान के मजे लिए थे उसने कहा -'अंकल, यहाँ एक जन हीटर बनाने का काम करते हैं। उनके पास मिल जाएगा। देखते हैं।'
गए। रास्ते में लोगों में टीन-टप्पर देखते गए। शायद कहीं पत्ती मिल जाये। लोग स्टेशन की तरफ के लिए लपकते हुए चले जा रहे थे। उनको भी गाड़ी पकड़नी थी। उनकी भी आंख लग गयी थी।
हीटर वाले के घर पहुंचे। उन्होंने दो फूटा स्टील का स्केल निकाल के दिखाया। पूछा -'इससे काम चल जाएगा। हमने कहा -'हां।' उसने स्केल दे दिया। साथ में आया भी। रास्ते में बोला -'इससे न काम चले तो एक तीन फुट का भी है।'
हमने कहा-'नहीं, इससे हो जाएगा।'
गाड़ी के पास और लोग भी छोटे-बड़े स्केल, पत्ती लेकर आये थे। लेकिन उसकी कोई जरूरत नहीं थी।
हमने स्ट्रिप हटाई। स्केल से गाड़ी के लॉक को दबाया। लॉक खुल गया। साथ आये लड़के ने फिर मजे लिए -'अंकल, यही काम करते थे क्या?'
हमने बताया -'पच्चीसवीं बार खोल रहे होंगे ऐसे ताला।'
फिर उसने कहा -'चाय तो हो जाये इसी खुशी में।'
हम फिर आये चाय की दुकान में। फिर से चाय पी गयी। पिक्कू ने मजे लेते हुए कहा -'अंकल की आज की चाय महंगी पड़ गयी।'
हमने कहा -'अभी तो चालान भी झेलना है।'
पिक्कू ने कहा -'अरे, वो तो हम मजाक कर रहे थे।'
पंकज इस सब घटनाक्रम से निर्लिप्त वहीं टहल रहे थे। चलते हुए बोले -'अबकी आना तब तुमको चप्पल दिलाएंगे।'

https://www.facebook.com/share/p/wCLA2efvpV6zMafZ/

Tuesday, May 16, 2023

नौकर की क़मीज़

 *घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है।

*शेर से ज्यादा वह मालिक से डरता था।
*हैसियत के अनुसार नियत डोलने की सीमा निर्धारित होती है।
*हम लोगों की सारी तकलीफ उन लोगों की होशियारी और चालाकी के कारण थीं जो बहुत मजे में थे और जिनसे हमारा परिचय नहीं था। इस सबके बीच जिंदगी का मकसद ढूंढना मुश्किल काम नहीं था।
*भीख मांगने वाले और रईस कोई काम नहीं करते।
*ऐसी अक्लमंदी किस काम की कि हर आने वाला दुख पहले से बड़ा होता चला जाए और बीते दुख का संतोष हो कि बड़ा नहीं था।
*जिंदा रहना और दुख सहना दोनों की शक्ल इतनी मिलती- जुलती थी , जैसे जुड़वा हों।
*यदि एकबारगी कोई गर्दन काटने के लिए आए तो जान बचाने के लिए जी-जान से लड़ाई होती। इसलिये एकदम से गर्दन काटने कोई नहीं आता। पीढ़ियों से गर्दन धीरे-धीरे कटती है। इसलिए खास तकलीफ नहीं होती और गरीबी पैदाइशी रहती है।
*मेरा वेतन एक कटघरा था, जिसे तोड़ना मेरे बस में नहीं था। यह कटघरा मुझमें कमीज की तरह फिट था। और मैं अपनी पूरी ताकत से कमजोर होने की हद तक अपना वेतन पा रहा था।
*आदमी के विचार तेजी से बदल रहे थे। लेकिन उतनी ही तेजी से रद्दीपन इकट्ठा हो रहा था। रद्दीपन देर तक ताजा रहेगा, अच्छाई तुरंत सड़ जाती थी।
*जिंदगी जितनी खराब लगती है, उतनी खराब नहीं है।
- विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ' नौकर की कमीज' से

https://www.facebook.com/share/p/1AUhSxMJcU/

Sunday, May 14, 2023

जोश मलीहाबादी और नेहरू जी

 जोश मलीहाबादी जी के नेहरू जी से दोस्ताना और आत्मीय रिश्ते थे। जोश मलीहाबादी द्वारा नेहरू जी पर रेखाचित्र का एक अंश यहाँ पेश है।

अब चंद घटनाएँ उनकी अदबनवाजी, उनकी ग़ैरमामूली शराफ़त और उनकी बेनजीर नाज़बरदारी की भी सुन लीजिए।
जब केंद्रीय सरकार के सूचना विभाग में मेरी नियुक्ति सरकारी रिसाले 'आजकल' में हो गई तो मैंने उन्हें ख़त लिखा कि मेरे पर्चे के वास्ते अपना पैग़ाम जल्द भेज दीजिए। अगर आपने सुस्ती से काम लिया तो मेरी आपसे ज़बरदस्त जंग हो जाएगी। एक हफ़्ते के अंदर उनका पैग़ाम आ गया। अपने पैग़ाम के आख़िर में उन्होंने यह भी लिखा मैं जल्दी में पैग़ाम इसलिए भेज रहा हूँ कि जोश साहब ने मुझे धमकी दी है कि अगर देर हो गयी तो वह मुझसे लड़ पड़ेंगे। जब मैंने पैग़ाम के शुक्रिये में उन्हें ख़त लिखा तो दबी ज़बान से यह शिकायत भी कर दी की कि आपने मेरे ख़त का जबाब खुद अपने हाथ से लिखने के एवज़ सेक्रेटरी से लिखवाया है। मेरे साथ आपको यह बरताव नहीं करना चाहिए था।
उनकी शराफ़त देखिए कि मेरी इस शिकायत पर खुद अपने हाथ से मुझे यह लिखा कि अधिक व्यस्तता के कारण मैं सेक्रेटरी से ख़त लिखवाने पर मजबूर हो गया। आप मेरी इस गलती को गलती को माफ़ करें।
एक बार मैं उनके यहाँ पहुँचा तो देखा वह दरवाज़े पर खड़े किदवई साहब से बातें कर रहे हैं। लेकिन जैसे ही मैंने बरामदे में कदम रखा और उन से आँखें चार हुईं तो वह एक सेकेंड के अंदर ग़ायब हो गए।
मैंने किदवई साहब से कहा कि मैं तो अब यहाँ नहीं ठहरूँगा। आप पंडित जी से कह दीजिएगा कि लीडरी और प्राइममिनिस्ट्री को लीडरी और प्राइममिनिस्ट्री तक सीमित रखें। और उसे इस क़दर न बढ़ाएँ कि वह मोनार्की बादशाही से टक्कर लेने लगे। किदवई साहब ने मुस्कराकर पूछा कि आप किस बात पर इस क़दर बिगड़ गए? मैंने कहा,"अरे आप अभी तो खुद देख चुके हैं कि मेरे आते ही वह ग़ायब हो गए। मिज़ाजपुरसी तो बड़ी चीज़ है, उन्होंने मुझसे साहब सलामत तक नहीं की।"
इतने में जवाहरलाल आ गए। मैं मुँह मोड़कर खड़ा हो गया। उन्होंने कहा, "जोश साहब, मामला क्या है?"
किदवई साहब ने सारा माजरा बयान कर दिया। वह मेरे क़रीब आए और मेरे कान में कहा,"मुझे इस क़दर ज़ोर से पेशाब आ गया था कि अगर एक मिनट की भी देर होती तो पायजामे ही में निकल जाता।"
यह बहाना सुनकर मैंने उन्हें गले लगा लिया।
उर्दू के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी की बहुचर्चित आत्मकथा 'यादों की बारात' से। किताब ख़रीदने का लिंक कमेंट बाक़्स में।

https://www.facebook.com/share/p/SucYb4U1V1t4kip1/

Friday, May 12, 2023

यादों की बारात -जोश मलीहाबादी

 

पिछले दिनों कई किताबें पढ़ीं। उनमें से एक उर्दू के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी की बहुचर्चित आत्मकथा 'यादों की बरात' भी थी।
जोश साहब ने अपने बारे में और अपने समय के बारे में रोचक और बेबाक अंदाज में लिखा है।
अपनी खूबियों-खामियों के बारे में बेहिचक लिखी आत्मकथा का अंदाज-ए-बयाँ इतना शानदार है कि पूरी आत्मकथा एक दिन में पढ़ गए।
अपने गुस्से का जिक्र करते हुए हुए उन्होंने बताया कि अपने एक नौकर को बचपन में उन्होंने इसलिए पीट दिया था क्योंकि वह उनको सलाम करना भूल गया था। वहीं दरियादिली भी ऐसी की एक नौकर की आर्थिक सहायता के लिए अपनी मां के गहने चुपचाप उसको दे दिए।
अपने समय के ख्यातनाम लीडरों से जोश साहब की व्यक्तिगत जान-पहचान थी। नेहरू जी उनमें से खास थे। इसके बावजूद वे उर्दू के मसले पर नेहरू जी नाइत्तफाकी रखते हुए आजादी के बाद सन 1956 में पाकिस्तान चले गए। बाद बाकी वहां उनके साथ जो सलूक हुआ उसके चलते उनके निर्णय पर पछतावा भी हुआ। नेहरू जी ने उनको वापस आने का निमंत्रण भी दिया लेकिन उनका वापस आना हुआ नहीं।
अपने समय की महिलाओं की स्थिति का जोश जी ने जिस तरह चित्रण किया है उसको पढ़कर लगता है कि सौ साल पहले महिलाएं किस तरह की पाबन्दियों में जीने को मजबूर थीं। उनकी आत्मकथा का एक अंश यहां पेश है:
"नवाब साहब की बेगम हों या बैरिस्टर साहब की बेटर हाफ (better half) दोनों बड़ी सख्ती के साथ पर्दे की पाबंद थीं। डोली और पालकी के सिवा कोई बीबी घर के बाहर कदम नहीं रखती थीं। और तो और , औरतों की आवाजें और उनका वजन भी पर्दा नशीन था। यानी कोई बीबी इस कदर जोर से नहीं बोलती थी कि मर्दांने तक उनकी आवाज जा सके। और जब कोई औरत पालकी में सवार होती थी तो पत्थर का टुकड़ा या सिल पालकी में रख दी जाती थी ताकि कहारों को उनके जिस्म का सही अंदाजा न हो सके। बीबियाँ तो बीबियाँ, मामाएँ, असीलें और लौंडियाँ तक पर्दे की पाबंद थीं।
जनाने में आने-जाने वाले बाहर के बच्चों से भी, जबकि वे दस -ग्यारह बरस के हो जाते थे, पर्दा शुरू कर दिया जाता था। और तो और , बाप, दादा , नाना, चाचा, फूफा के सामने भी औरतें सरों पर पल्लू डालकर जाया करतीं थीं और किसी औरत की यह मजाल नहीं थी कि वह अपने बुजुर्गों की मौजूदगी में अपने बच्चे को गोद में ले ले।
जनाने मकान की फिजा को पवित्र रखने का यहां तक ख्याल किया जाता था कि किसी तरकारी वाली को यह इजाजत नहीं थी कि वह लंबी-लंबी तरकारियाँ जैसे लौकी, तुरई, केले, चचेंड़े टुकड़े-टुकड़े किये बगैर सालम (साबुत) हालत में अंदर ले जाये, इसलिए कि सूरत के लिहाज से इन तरकारियों की 'अश्लील' तरकारी ख्याल किया जाता था।
अपने लड़कपन का एक वाकया बयान करता हूँ। मलीहाबाद के एक लड़के का शादी में नाच हो रहा था कि बालाखाने से एक औरत झांककर इधर देखने लगी और साहबाने-महफ़िल में से एक साहब ने उसे बंदूक मार दी। साहबे-खाना देंगों के हल्के में खड़े थे कि उन्होंने गोली चलने की आवाज सुनी और दौड़े हुए महफ़िल में आये। गोली मारने वाले खां साहब ने उनसे कहा , "भाई आपकी बीबी ऊपर से झांक रही थीं। मुझसे यह बेहयाई बर्दाश्त नहीं हुई, मैंने गोली मार दी।" साहबे-खाना ने उसकी पीठ ठोंककर कहा,"बहुत अच्छा किया आपने।" वह तुरन्त अंदर चले गए। थोड़ी देर में एक लाश खींचते हुए आये और कहा," भाइयों, देख लीजिए मेरी बीबी नहीं लौंडी झांक रही थी। अल्लाह ने मेरी आबरू और मेरी जान दोनों चीजें बचा लीं।""
जोश मलीहाबादी की आत्मकथा -"यादों की बरात" से। किताब ख़रीदने का लिंक कमेंट बाक्स में।

https://www.facebook.com/share/p/K2xxs4a2a9CoEZhY/

Wednesday, May 10, 2023

वृद्धाश्रम में कुछ घण्टे



इतवार को स्वराज वृद्धाश्रम गए। सात साल पहले कई बार गए थे। दिलीप घोष और कई लोगों से मिले थे। दिलीप घोष से बतकही की तमाम यादें जेहन में थीं।
पनकी पावर हाउस के बगल से होकर रास्ता है वृद्धाश्रम का। पावर हाउस की ऊंची चिमनी के बगल में खड़ा हरा पेड़ मानो चिमनी से निकलने वाले प्रदूषण को ललकार रहा हो। चिमनी से निकलने वाला प्रदूषण भी ऊपर-ऊपर बगलिया के निकल जाता है। वह भी पेड़ से डरता है।
रास्ते के मकान सात साल पहले बनने शुरू हुए थे, बन गए थे। उनमें लोग रहने भी लगे थे।।मकानों के प्लास्टर झड़ से गए थे। खराब क्वालिटी के बने मकान कुपोषित बच्चों से लगे जो बचपन से ही बूढ़े लगने लगते हैं।
वृद्धाश्रम के अंदर पहुंचते ही लालचंद से मुलाकात हुई। मुंह गुटके से लैस। तीन साल पहले आये यहां। एक एक्सीडेंट में पैर टूट गया। ऑपरेशन हुआ तो एक पैर छोटा हो गया। डॉक्टरों की महिमा। ऊंचाई बराबर करने के लिए छोटे पैर पर ऊंची हील की चप्पल पहनते हैं।
लालचंद डब्बा बनाने का काम भी करते हैं। हर तरह का डब्बा बना लेते हैं। आर्डर मिलने पर बनाते हैं। पचास साथ रुपये कमा लेते हैं। लेकिन जितना कमाते हैं, उससे ज्यादा गुटके पर खर्च कर देते हैं। चिंता की बात भी नहीं, वृद्धाश्रम देखभाल करता ही है।
दिलीप घोष के बारे में पूछा तो पता चला -'घोष दादा तीन साल पहले गुजर गए। काफी दिन बीमार रहे।'
दिलीप घोष जी अनोखे व्यक्तित्व के इंसान थे। उनके बहुत पढ़े-लिखे होने के तमाम किस्से थे। विदेश में प्रोफेसर, आई.आई.टी. के बच्चों को पढ़ाने के और शेक्सपियर साहित्य के मर्मज्ञ होने के किस्से वो खुद सुनाते थे। उनके सुनाने का अंदाज ऐसा होता था कि सुनने वाला बिना प्रभावित हुए रह नहीं सकता था।
बाद में पता चला कि उनके तमाम किस्से मनगढ़ंत थे। कितना सच, कितना गप्प अब तो जानना भी मुश्किल। लेकिन यह तय है कि उनकी जानकारी का स्तर ऊंचा था और अंदाज-ए-बयान दिलचस्प।
घोष जी से जुड़ी बातें याद करते हुए याद आया कि उन्होंने मुझसे अपने बचपन से जुड़ी यादें और फोटो भी साझा की थी। अपने एकतरफा रोमांस की कहानी भी बयान की थी। अब सब एक कहानी हो गयी।
चौधरी जी से बात हुई। आफिस में थे। आयुध निर्माणी खमरिया से 1978 में त्यागपत्र देकर एलिम्को ज्वाइन किया था। उनके पेंशन के सिलसिले में कोशिश की थी। लेकिन कामयाब नहीं हुए। इतने पुराने कागजात खोजने मुश्किल। इस बीच उनकी पेंशन के लिए कोशिश करने वाले तिवारी जी भी नहीं रहे।
चौधरी जी 82 साल के करीब उम्र के हैं। चुस्त, दुरुस्त। घर में बच्चे हैं लेकिन उनको लगता है कि यहाँ वे बेहतर स्थिति में हैं।
वृद्धाश्रम में 28 पुरुष और 32 महिलाएं हैं। सबके एक बार के खाने का करीब 6500 खर्च आता है। लोग अलग-अलग तरह से स्पॉन्सर करते हैं।
पिछली बार आये थे तो एक महिला लगातार चिल्लाती रहती थीं। उनके बारे में पूछा तो बताया, खराब निकल गईं। बार-बार आश्रम से निकल जाती थीं। किसी-किसी के साथ रहती थीं। आखिर में निकल गईं आश्रम से।
जब गए थे तो कीर्तन हो रहा था। घोष जी के कमरे में तीन महिलाएं रहती हैं अब। कमला, सनेही, रीता चड्ढा। सब ने अपने-अपने किस्से बताए। किसी का आदमी खराब निकल गया, किसी का रहा नहीं। किसी के बच्चे नशा करते हैं, किसी को घर से निकाल दिया गया। भले ही यहां रहते हैं लेकिन घर वालों से सम्बंध हैं। घर वाले आते-जाते रहते हैं। यहां हर तरह से सुरक्षित हैं और आराम से भी। खाने-पीने की कोई चिंता नहीं। कोई यहाँ से जाना नहीं चाहता।
वृद्धाश्रम को शुरू करने में मधु भाटिया जी का योगदान था। कुछ दिन पहले उनका निधन हुआ। जब तक वे जीवित रहीं, लगातार जुड़ी रहीं यहां से। हफ्ते में तीन-चार दिन जरूर आती थीं। सबकी समस्यायों का निराकरण करती थीं। दिलीप घोष उनको मम्मी कहते थे। सब लोग उनकी याद करते हैं।
चलते समय सभी ने कहा-'फिर आना। आते रहना।' कमला, सनेही और रीता चड्ढा ने परिवार सहित आने को कहा। महिलाओं का परिवार से जुड़ाव बना ही रहता है।
लौटते हुए प्रार्थना हाल में एक बुजुर्ग वाकर के सहारे चलते दिखे। पूछने पर पता चला कि सनेही के पति हैं। सनेही अपने पति की चुपचाप जाते देखती रहीं, चुपचाप। दोनों में शायद अबोला है।
लालचंद मोबाइल में लूडो खेल रहे थे। एक क्लिक पर पासा आया और उन्होंने गोटी बढ़ा दी।
हम भी बाहर की तरफ बढ़ गए।
(दिलीप घोष और चौधरी जी से जुड़ी पोस्ट कमेंट बॉक्स में)

https://www.facebook.com/share/p/8EstEYAFLmzZGkr1/

Saturday, May 06, 2023

लिखना खुद को अभिव्यक्त करना है - मनोहर श्याम जोशी

 


मेरी तमाम ऐसी 'रचनाएं' भी हैं, जो मैं अपने मानस पटल पर ही लिखकर खुश हो गया, कागज पर उतारी नहीं। एक जमाना था कि इस तरह सोची हुई रचनाएं भी बोलकर सुना डालता था। खैर, अब तो आलम यह है कि बात करते-करते यह भी भूल जाता हूँ कि बात किस प्रसंग से शुरू की थी और उसे किस ओर ले जाना चाहता था। जो रचनाएं मैंने शुरू भी कीं, उनमें से भी ढेरों ऐसी हैं , जिन्हें मेरी अन्य व्यस्तताओं ने या मेरे भीतर बैठे आलोचक ने पूरा होने ही नहीं दिया।


मैंने अभी अन्य व्यस्तताओं का जिक्र किया, उनमें से अधिकतर व्यवसायिक लेखन से जुड़ी हुईं थीं और लुत्फ की
बात यह है कि इस तरह के लेखन में भी मैं काटता-जोड़ता रहा हूँ।

मैं जब सम्पादक था , मेरी इसी संसोधन वृत्ति से परेशान प्रेस फोरमैन मुझे अपने लिखे हुए का प्रूफ एक बार से ज्यादा पढ़ने नहीं देता था कि ये तो हर बार बदलते ही चले जायेंगे।

तो मेरे हिस्से सन्तोष नहीं,खाली संशय पड़ा है। तो मेरे पास गिनाने को मेरी एक भी उपलब्धि नहीं है। अलबत्ता अफसोस अनेक हैं, जिन्हें बहानों की संज्ञा भी दी जा सकती है। गनीमत इतनी ही है कि ये बहाने कुछ ठोस और महत्वपूर्ण न लिख पाने के हैं।

कहा जाता है कि रचनात्मक तेवर दो तरह के होते हैं -एक रूमानी दूसरा क्लासिकी। मुझे खुशफहमी रही है कि मैं अपने गुरु नागर जी की तरह क्लासिकी तेवर का धनी हूँ। और अपने दूसरे गुरु अज्ञेय जी की तरह रोमांटिक नहीं। लेकिन क्लासिकी तेवर साध लेने पर भी कोई रचनाकार अपनी रचना में अपने मन का उल्लंघन नहीं कर सकता। यह क्या है कि लेखन अंततः और मूलतः आत्माभिव्यक्ति ही है। जिसे आत्म या सेल्फ कहा जाता है वह आध्यात्म और विज्ञान , दोनों के पंडितों के लिए खासी रहस्यमयी चीज रही है।

आद्यात्म और मष्तिष्क विज्ञान दोनों का ही विद्यार्थी न होने के कारण मैं उस रहस्यवादी आयाम में जा सकने की योग्यता नहीं रखता। लेकिन मुझे इसमें संदेह नहीं कि लिखना खुद को अभिव्यक्त करना है और कि स्वयं से किसी भी लेखक के लिए मुक्ति सम्भव नहीं।

आप विश्वास कीजिये मैने किशोरावस्था से अब तक कुछ और हो जाने का यत्न किया है। जैसे स्कूल में, जब मैंने पाया कि हीरो का दर्जा मुझे ज्यादा पढ़ाकू लड़के नहीं , खिलाड़ी लड़के पाते हैं , तब मैंने किसी खेल की टीम में जगह पाकर अपनी जय बुलवाने की जी-तोड़ कोशिश की। और लड़कों की अपेक्षा काया में कमजोर तथा उम्र में छोटा होने के कारण मेरी खेल के मैदान में एक न चली।

यह कमी पूरी करने के लिए मैं हर खेल के बारे में अपना।किताबी ज्ञान बढ़ाता चला गया, ताकि खिलाड़ियों के बीच उठ बैठ सकूं। अपने को कुछ और बना सकने के क्रम में मैंने अपने को स्वयं अपने लिए हास्यास्पद बनाया। उच्चतर शिक्षा के दौरान चाहा कि बहुत बड़ा वैज्ञानिक बन सकूं। मुझे ' कल का वैज्ञानिक' की उपाधि भी मिली, लेकिन मैं वैज्ञानिक न बन सका। नियति ने मुझे इतना ही धैर्य और इतनी ही समझ दी थी कि विभिन्न विषयों की सतही जानकारी हासिल कर सकूं और उनपर पत्रकार की हैसियत से कलम चला सकूं।

तो मैं तमाम कोशिशों के बाद मैं ही रह गया - एक अदद कायर, कमजोर और रोंदू किस्म का इंसान, जो अपनी कातर भावुकता , हर नए उत्साह के 'पर' नोच डालने वाली अपनी उद्दत उदासी और संसार तथा स्वयं पर उठते नपुंसक आक्रोश की पर्दादारी करने के लिए व्यंग्य- विनोद, आत्म व्यंग्य और विडम्बना की शरण लेता रहा है।

- स्व. मनोहरश्याम जोशी
आज के अमर उजाला से साभार


https://www.facebook.com/share/p/18G3aKwqe3/