Tuesday, October 10, 2023

कचरा आर्ट से बनी कलाकॄति



सबेरे मार्निंग वाकर समूह के साथियों के साथ चाय पीने के बाद सैफ Saif Aslam Khan में साथ उनकी बनाई कलाकृति देखने गए। उनकी मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर।
शाहजहाँपुर आफिसर्स कालोनी की के तिराहे पर बने छुटके पार्क में गांधी जयंती के मौके पर सैफ की डिजाइन की हुई कलाकृति का लोकार्पण हुआ। स्वच्छता ही सेवा अभियान के अंतर्गत छावनी परिषद शाहजहांपुर द्वारा प्लास्टिक की प्रयोग की गई बोतलों को ग्लोब के आकार में जोड़कर इस कलाकॄति का निर्माण किया गया। पुरानी बोतलों से बनाई इस कलाकॄति को 'कचरा आर्ट' नाम दिया गया। प्रयोग की हुई वस्तुओं से बनी कृति को 'कचरा आर्ट' नाम दिया गया। इससे यह भी लगता है कि यह बेकार का काम है। कुछ और बेहतर नाम रखा जा सकता था।
प्लाष्टिक ग्लोब में बोतलें एक गोलाकार जाली से के ऊपर तारों से बंधी थीं। कुल 1032 बोतलों से बना था प्लास्टिक ग्लोब। ग्रीन फ्यूचर कलेक्टिव संस्था और आर्टिस्ट सैफ ने मिलकर इस ग्लोब को बनाया था। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री जी ने इसका लोकार्पण किया था। सैफ के नाम से सैफ गायब था। बोर्ड में उनका नाम असलम खान लिखा था। साथ न होते और बताते नहीं तो हम समझ ही न पाते कि इसके बनाने में सैफ की भी कोई भूमिका है। जल्दबाजी में ऐसे नाम गायब होते हैं।
बाद में छावनी बोर्ड के अधिकारियों से बातचीत करने पर पता चला कि प्लास्टिक ग्लोब की कुल लागत तकरीबन 70-75 हजार रुपये आई।
चंडीगढ़ के राकगार्डन की तर्ज पर बनाये इस प्लास्टिक ग्लोब जैसी अनेक योजनाएं हैं सैफ के पास। एक पत्रिका निकलना भी उनकी योजना में शामिल है। उत्साह भी है। लोग सराहना भी करते हैं। लेकिन योजनाओं में अमल के लिए पैसे की दरकार होती है। उसका इंतजाम शाहजहांपुर में रहते मुश्किल है। लेकिन उम्मीद तो है।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी सैफ शाहजहांपुर आने के पहले दिल्ली में काम करते थे। वहां काम मिल जाता था। आमदनी भी होती थी। शाहजहांपुर में दोनों की किल्लत है। गए साल पिताजी के न रहने से घर संभालने की जिम्मेदारी भी आ गयी है। बहुत कठिनाइयां हैं कला की दुनिया की।
सैफ को अपनी भतीजी को स्कूल छोड़ने के लिए निकलना था। जाने के पहले कुछ फोटो और सेल्फी ली हमने। बाद में स्कूल जाते एक बच्चे को पकड़कर उससे भी फोटो खिंचवाई। इस आस में कि क्या पता कोई फोटो अच्छा आ जाये। बच्चा सेंट पॉल में पढ़ता है। ग्यारह में। चलते-चलते उसने हमारी फोटो खींचकर मोबाइल वापस कर दिया। सैफ अपनी भतीजी की छोड़ने चले गए। अपन पैदल वापस चल दिये।
पैदल वापस आते हुए स्कूल से लाउडस्पीकर पर गाया जाता राष्ट्रगान सुनाई दिया। सुनते ही हम फुटपाथ पर खड़े हो गए। राष्ट्रगान खत्म होने पर आगे बढ़े। आगे बीच सड़क पर दो घोड़े शांत , सावधान मुद्रा में खड़े दिखे। ऐसे जैसे वे भी राष्ट्रगान सुनकर ही सावधान हो गए हों। लेकिन वे बाद में बहुत देर तक उसी मुद्रा में खड़े रहे तो लगा कि वे ऐसे ही निठल्ले खड़े हैं। पोज देने वाली स्टाइल में। उनको देखकर लगा कि जानवर भी इंसानों की तरह अपने निठल्लेपन को अनुशासन बताना सीख गये हैं। संगत का असर ।
हम उनकी बगल से होते हुए निकले, उनकी फोटो खींची तब भी वे ऐसे ही चुपचाप खड़े रहे। इससे लगा कि वे शायद धूप सेंकने के लिए खड़े हो गए हों। टैनिंग के मूड से। उनसे कुछ पूछना ठीक नहीं लगा। किसी की निजता में उल्लंघन क्या करना।
आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए हम मार्निंग वाकर ग्रुप की बेच के बगल से होते हुए वापस गेस्ट हाउस आ गए। अगले दिन फिर गए सुबह तो वहां मिश्र जी ने शेरो-शाइरी भी सुनी गई।

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Sunday, October 08, 2023

प्रोटोकॉल का हल्ला और सुबह की चाय

 



मार्निंग वाकर ग्रूप मतलब ‘सुबह टहलुआ समूह’ के सदस्यों के साथ काफी देर तक बतियाये। गपियाये। कोई भी नया साथी आये उससे नए सिरे से मुलाक़ात। सीतापुर वाले मुंशी जी के बारे में पता चला कि बहुत दिन से दिखे नहीं। चने बेचने वाला बच्चा भी नहीं दिखा।
अपन बेंच नंबर सात वाली फुटपाथ की तरफ थे। सामने की तरफ वाली फुटपाथ पर लगी बेंचों पर लोग बैठे थे। कसरत कर रहे थे। बतिया रहे थे। सड़क पर आते-जाते लोगों को देख रहे थे। बदले में लोग भी उनको देखते हुए गुजर रहे थे। किसी ने कहा भी है –‘आप जो व्यवहार लोगों के साथ करेंगे, लोग भी आपके साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे।‘
कुछ देर बाद तय हुआ कि चाय पी जाए। सबेरे बिना दूध की पी हुई आधी चाय यादों में कसक रही थी। मंदिर के पीछे बनी चाय की दूकान की तरफ जाते हुए तिराहे पर नया खुला ‘भारत ढाबा’ दिखा। लोगों ने बताया कि काफी गुलजार रहता है। लोग आते हैं। बैठते हैं। खाते-पीते हैं। बतियाते हैं। मीटिंग प्वाइंट जैसा कुछ। तिराहे के पास खाली पडी जमीन को जंगले से घेरकर बने ढाबे में मेज-कुर्सी रखी हुई थी। सुबह नहीं खुलता है ढाबा।
ढाबे को देखकर हमको याद आया कि पहले यहां ठेले वाले फल, सब्जी , भुट्टे और तमाम चीजें बेंचा करते थे। अब ढाबा खुल जाने के बाद वे कहाँ खड़े होते होंगे। पहले सुरक्षा कारणों से यहाँ किसी दूकान चलाने की अनुमति देने की बात सोची भी नहीं जाती थी। बदली परिस्थितियों में आमदनी के सभी संभावित मौके भुनाए जाने के समय में जहाँ से भी संभव हो, पैसा आना चाहिए।
चाय की दूकान की तरफ जाते हुए साथ के एक सज्जन ने पूछा –“ढाबे में बैठकर चाय पीने में आपके लिए प्रोटोकाल की कोई समस्या तो नहीं होगी?’
हमने कहा –‘ढाबे में चाय पीने में क्या प्रोटोकाल?’ दोस्तों के साथ ढाबे में बैठकर चाय पीने से भी क्या किसी प्रोटोकाल का उल्लंधन होता है? इंसान के साथ इंसान की मुलाक़ात का भी कोई प्रोटोकाल होता है क्या ?
होता नहीं है लेकिन आधुनिक होते समाज में प्रोटोकाल का हल्ला बड़ी तेजी से बढ़ा है। लोग अपने जनप्रतिनिधियों , बड़े अधिकारियों से सहज रूप में मिल नहीं सकते। यह प्रोटोकाल कभी सुरक्षा कारणों से लगता है और बाकिया पद के चलते। ऊँचे पद के साथ लोगों के यह एहसास होता है कि आम लोगों से मिलने-जुलने से उनके रुतबे में कभी हो जायेगी। अक्सर उनको उनके मातहत अपने साहब को यह एहसास दिलाते हैं कि आम लोगों से मिलने आपका रुआब कम हो जाएगा।
कल भी ऐसा हुआ। शाम को कुछ लोग मिलने आये तो बताया कि वे आ तो पहले गए थे लेकिन दरबान ने बताया कि साहब आराम कर रहे हैं। हमको ताज्जुब हुआ। हम तो दिन भर निठल्ले बैठे थे। न किसी को आने से रोकने के लिए कहा था । न आराम करने की बात । लेकिन मिलने वालों को इन्तजार कराया गया। प्रोटोकाल की महिमा अनंत हैं।
प्रोटोकाल की बात से जावेद अख्तर जी का सुनाया एक संस्मरण याद आया। छात्र जीवन में नेहरु जी उनके संस्थान आये थे। नेहरू जी के विदा होते समय जावेद साहब भागते हुए उनकी कार के फुटरेस्ट पर चढ़ गए और अपनी आटोग्राफ बुक नेहरू जी के सामने करके बोले –‘आटोग्राफ प्लीज।‘ नेहरू जी ने अचकचा कर उनको देखा और उनकी आटोग्राफ बुक में दस्तखत कर दिए। आज के समय दुनिया के किसी भी देश के प्रधानमत्री/राष्ट्रपति से इतनी सुगमता से मिलना और दस्तखत लेने की सोच भी नहीं सकते।
चाय की दूकान चाय आई। ग्लास में दूध की चाय देखकर मन खुश हुआ। खुशी में इजाफा करते हुए पकौड़ियाँ भी आयीं। बतरस के बीच सब चाय और पकौड़ी को आनंद के साथ उदरस्थ किया गया। वहां फोटोग्राफी और विडियोग्राफी भी हुई। वीडियो कमेंट्री के साथ यहाँ लगा है।
चलते समय हमने लपककर चाय के पैसे दे दिए। हिसाब नहीं पूछा इस लिए कि अगर हिसाब पूछेंगे तो फिर पैसे देने से रह जायेंगे। एतराज हुआ भी। चाय वाला भी इधर-उधर ताकता हुआ लेने , न लेने की मुद्रा में खड़ा रहा। हमने जबरियन पैसे उसकी कमीज की ऊपर की जेब में ठूस दिए। जेब में पैसे ठूंसने से नोट थोड़ा भुनभुनाया होगा। थोड़ी सलवटें भी आ गयीं उसके ठूंसे जाने से। उसको अपनी बेइज्जती भी खराब होती लगी होगी कि आज की तारीख में सबसे बड़ा नोट होने के बावजूद उसके साथ सुबह-सुबह इतनी जबरदस्ती हो।
चाय पीने के दौरान दूकान वाले ने बताया कि इसी महीने से किराया बढ़ गया है। पचास रूपया रोज हो गया है। किराए की बढ़ोत्तरी की सूचना देने के साथ ही उसने दूकान की छत से दिखते आसमान को दिखाया। हमने कहा –‘हो जाएगी मरम्मत भी। चिंता न करो।‘ वह कुछ बोला नहीं लेकिन हमारे कहने के बावजूद उसके चेहरे से चिंता के भाव गए नहीं।
चिंता जहाँ भी जाती है, वहां तसल्ली से रहती है। वापस आने की हडबडी नहीं रहती उसको। उसको इस बात की कोई फिकर नहीं रहती कि उसकी रिहायश से किसी को कोई तकलीफ है कि नहीं। चिंता की ख़ासियत है कि वो आती तेज़ी से है लेकिन जाती बहुत धीमे से है।
पैसे देकर अपन दूकान के बाहर आ गए। बाकी पैसे भी –‘चिल्लर धरे रहो’ वाले अंदाज में उससे लिए नहीं।
चाय की दूकान से निकलकर मार्निंग वाकर तो अपने-अपने घरों की तरफ प्रयाण कर गए । अपन सैफ Saif Aslam Khan की मोटर साइकिल पर बैठकर कैंट में पर्यावरण दिवस के मौके पर उनकी बनाई कृति देखने चल दिए ।

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Saturday, October 07, 2023

रागिनी टाइम्स से बातचीत

 कल शाहजहांपुर में Ragini Srivastava , Saif Aslam Khan और Anoop Kumar Adv से मुलाक़ात हुई। सैफ़ से तो सुबह भी मिल चुके थे। रागिनी और अनूप दोपहर बाद सैफ़ के साथ आए मिलने। थोड़ी देर की इधर-उधर की बातचीत के रागिनी ने मोबाइल आन करके सामने बैठे अनूप कुमार को थमा दिया और बातचीत शुरू कर दी। मजाक-मजाक में इंटरव्यू टाइप हो गया। रागिनी ने इस अनौपचारिक इंटरव्यू को आज साझा भी किया।

बताते चलें कि रागिनी शाहजहांपुर की अकेली पंजीकृत महिला पत्रकार हैं । अपना चैनल रागिनी टाइम्स लगभग साल भर पहले शुरू किया था इस चैनल में मुख्य रूप से शाहजहाँपुर के आसपास से जुड़ी खबरें रहती हैं। चैनल से कुछ कमाई भी होने लगी है , ऐसा रागिनी ने बताया। उनके चैनल का लिंक कमेंट बॉक्स में दिया है। उनके चैनल को देखें और सब्सक्राइब करके रागिनी का हौसला आफ़ज़ाई करें। इस बीच हमारी अनौपचारिक बातचीत भी सुनें ।

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Friday, October 06, 2023

विश्व मुस्कान दिवस पर शाहजहांपुर की सुबह

 



सुबह की शुरुआत मज़ेदार रही। साल भर से ऊपर हो चुका था यहाँ से गये। जिस गेस्ट हाउस में रुके हैं वहाँ क़रीब दस महीने रहे थे। कोरोना काल में। उस समय की कड़ी यादें हैं।
जगते ही चाय मंगाई। दूध फट गया था। बिना दूध की चाय आधी पी बाक़ी छोड़ दी। बिना दूध की चाय पीने का शऊर पता नहीं कब आएगा, जबकि आज इसी का चलन है।
बाहर निकले तो तमाम जाने पहचाने चेहरे मिले। मिलते ही सेल्फ़ी और फ़ोटोबाज़ी शुरू हो गई। पहली सेल्फी Ambrish Shukla और Harshit Tiwari के साथ हुई।
आजकल सेल्फ़ी और फ़ोटो का चलन इस कदर बढ़ गया है कि नमस्ते बाद में होता है फ़ोटो पहले।
फोटो का चलन जिस कदर बढ़ रहा है उससे लगता है कि क्या पता आने वाले समय में बिना फ़ोटो, वीडियो, सेल्फ़ी होने वाली मुलाक़ात, घटना , वाक़ये को घटित हुआ माना ही न जाये। ऐसी हर घटना को दुनिया की कार्यवाही से निकला हुआ माना जाये जिसकी फ़ोटो, वीडियो न हो।
कैंट की सड़क पर लोग सुबह की सैर में जुटे थे। मार्निंग वाकर क्लब के सदस्य बेंच नम्बर सात के पास जमा थे। यह बेंच Saif Aslam Khan के स्केचेज का नियमित हिस्सा है। दुनिया की तमाम हस्तियों और घटनाओं को सैफ़ प्रेम पूर्वक और जबरिया यहाँ लाकर उनके स्केच बनाते हैं। हाल यह दुनिया की कोई हस्ती अगर बेंच नम्बर सात पर नहीं आयी तो उसकी प्रसिद्धि में कुछ कमी सी है।
बेंच के पास पहुँचते ही Inderjeet Sachdev जी मिले। कल उनका जन्मदिन था। धूमधाम से मना। आज भी जारी था। बात करते हुए डॉ Anil Trehan जी साइकिलियाते हुए। देखते , मिलते ही अपन पर फूलमाला , गुलदस्ता की बौछार होने लगे। फूलमाला, गुलदस्ता से हमेशा लैश रहती है मार्निंग वाकर ग्रुप की टीम।
इस बीच एक साथी आए जिनका जन्मदिन था आज। उनको जन्मदिन की बधाई दी गई और माला , गुलदस्ता से शुभकामनाएँ।
बेंच नम्बर सात पर बैठकर फ़ोटोबाज़ी हुई। सैंफ़ की बेंच पर बिना उनकी अनुमति फ़ोटो खींचना ठीक नहीं यह मानते हुए इसी बहाने हमने उनको फ़ोन किया कि तुम्हारी बेंच पर फ़ोटो खींचा जा रहा है।पता लगते ही दस मिनट में सैफ़ बेंच पर हाज़िर हो गये। लेकिन तब तक टहलते हुए हम लोग मंदिर के पीछे चाय के ढाबे पर आ गये थे ।विश्व मुस्कान दिवस के मौक़े पर हंसते हुए चाय पीने के लिए।

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Thursday, October 05, 2023

मामा की दुकान पर भतीजे का काम

 



शहर का आख़िरी किनारा जहां से भारतीय देहात का महासागर शुरू होता है ।
कभी भी शहर से बाहर निकलने हैं तो श्रीलाल शुक्ल की रागदरबारी की शुरुआती लाइन याद आ जाती है ।
कानपुर से शाहजहांपुर जाते हुए हरदोई के पास जगदीशपुर में कई लगातार कई दुकाने दिखीं। हर दुकान पर जलेबी छन रही थी। हम लोगों को चाय की दरकार थी। उतर गये गाड़ी से। जलेबी बनते-छनते देख चाय की माँग की।
दुकान वाले ने कहा -‘चाय नहीं बनती यहाँ। ‘ क्यों नहीं बनती पूछने से पहले कारण भी बता दिया -‘बिकती नहीं यहाँ। माँग नहीं है।’ यह भी बता दिया उस दुकान पर मिलती है चाय।
ताज़ी जलेबी देखकर मन ललचा गया। तौला ली सौ ग्राम। एक किताब का पन्ना फाड़कर सौ ग्राम जलेबी थमा दी। किताब का पन्ना किसी गणित की किताब का था। जलेबी के नीचे किसी सिलिंडर का व्यास और ऊँचाई दी थी। आयतन निकालने को कहा गया था। मन किया निकाल के धर दें। लेकिन जलेबी के स्वाद में मन ऐसा रमा कि पन्ना डस्टबीन तक जाने तक याद नहीं आया।
दुकान पर बोर्ड लगा था -‘मामा स्वीट हाऊस।’ कारण पूछने पर बताया कि जिसकी यह दुकान है वो अपना घर छोड़कर अपनी बहन के पास आ गया। सभी लोगों का मामा हो गया। गाँव मामा। चूँकि गाँव में सब मामा कहते थे, बच्चे से बुजुर्ग तक । इसलिए दुकान मामा की दुकान के नाम से चल निकली। नाम हुआ ‘मामा स्वीट हाउस ।’
दुकान पर जलेबी बनाता बच्चा आठवीं के बाद , तीन साल पहले,स्कूल छोड़कर दुकान पर आ गया। कारण बताया -‘ग़रीबी बहुत थी। घर सब लोग काम पर लग गये। अब सब लोग कमाते हैं।’
ग़रीबी दूर हो गई लेकिन पढ़ाई छूट गई।
इससे सिद्ध हुआ कि सब लोग काम पर लग जाते हैं तो ग़रीबी दूर हो जाती है ।
हमने कहा कि अब ग़रीबी दूर हो गई तो फिर स्कूल जाने का मन नहीं करता ?
‘अब काम सीख गये हैं। इसी से कमाई होती है। क्या करेंगे स्कूल जाकर। कौन नौकरी करनी है।’ बालक में जलेबी का घान शीरे से निकाल कर थाल में रखते हुए बताया।
दुकान मामा की है लेकिन वो बच्चे के चाचा हैं। हमने पूछा -‘कुछ पैसा देते हैं चाचा कि मुफ़्त में काम करवाते हैं।’
‘अरे पैसे का क्या । सब तो हमारा ही है ।’ -बालक ने बताया।
दिन भर जलेबी बनती हैं। दिन भर बिकती है। अभी इतनी बनी। शाम फिर बनेंगी। ज़्यादातर ग्राहक आसपास काम करने वाले मजदूर हैं। ले जाते हैं किलो -दो किलो। आगे नवरात्रि भी आ रहे हैं। खूब बिकेंगी जलेबी।
सौ ग्राम जलेबी के दस रुपये हुए। जलेबी के दस रुपये देते हुए स्कूल के दिनों में दस पैसे की जलेबी खाने के दिन याद आए। हम और अप्पू जी Ajay Tiwari आई सी साथ जाते थे। गांधी नगर से। लेनिन पार्क के पास चौराहे पर मिठाई की दुकान पर ताजा बनी जलेबी खाते थे। दस पैसे की जलेबी में खाने का शौक़ पूरा हो जाता था । 45 साल पहले खाई जलेबी की याद आज भी उतनी ही ताजा है।
लेनिन पार्क की बात से याद आया कि हम लेनिन पार्क के पास रहते थे । वहाँ खेलने जाते थे। लेकिन लेनिन के बारे में नहीं जानते थे कि लेनिन कौन थे जिनके नाम पर यह पार्क बना है ।
अपने आसपास की ज़िंदगी से जुड़े तमाम लोगों , जगहों के साथ जीते हुए हम उनके बारे में कितना अनजान रहते हैं।
जलेबी की दुकान से जलेबी खाकर फिर पास की दुकान से चाय भी पी गई। टिक्की भी खाई गई। कोई रोकने वाला नहीं था कि मीठा क्यों खा रहे हो। चाय में चीनी क्यों डलवा रहे।
घर से बाहर निकलना मज़ेदार अनुभव होता होता। यह अलग बात है कि घर से निकलते ही घर याद भी आने लगता है।
घर से बाहर जाता आदमी
घर वापस लौटने के बारे में सोचता है।
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Wednesday, October 04, 2023

जीरो प्वाइंट पर शिलाजीत

 



श्रीनगर से सोनमर्ग में रास्ते में जगह-जगह जवान तैनात दिखे। अमरनाथ यात्रा के कारण कड़ी सुरक्षा थी। सड़क पर खड़े, हथियार लिए, चौकन्ने जवानों की सख्त ड्यूटी।
जीरो प्वाइंट सोनमर्ग का पर्यटन स्थल है। लोग घूमने आते हैं। जहां गाड़ियां रुकती हैं उसके थोड़ा आगे जाने पर जमी हुई बर्फ। लोग ऊपर तक जाकर बर्फ देखते हैं। फोटो खिंचवाते हैं। चले आते हैं।
जहां गाड़ियां रुकती हैं और जहां बर्फ शुरू होती है दोनों के दरम्यान तमाम ढाबे, अस्थाई दुकानें हैं। उनमें चाय-पानी, नाश्ते का सामान और दीगर स्थानीय चीजें मिलती हैं। अलावा इसके तमाम फेरी वाले पहुंचते ही पास आकर चीजें दिखाने लगते हैं। जहाँ आदमी वहां बाजार।
गाडी से उतरकर बर्फ के पास जाते हुए आसमान और आसपास ऊंचे-ऊंचे पेड़ देखते हुए आगे बढ़े। थोड़ी ऊंचाई और चढ़ाई पर जाते हुए ऊंचाई के कारण आक्सीजन की कमी लगी। सांस लेने में तकलीफ भी। हम बर्फ की शुरुआत से करीब बीस-पच्चीस मीटर पहले एक ढाबे पर ही बैठ गए। लोगों को जमी हुई बर्फ पर चढ़ते, उतरते,फिसलते और फोटो खिंचाते देखते रहे। चाय के लिए भी बोल दिया ढाबे वाले को।
जीरो प्वाइंट की बर्फ ऐसी जमी हुई थी मानों उसको पीट-पीट कर जमा किया गया हो। पीटते हुए धमकाया भी गया हो-'खबरदार जो धूप की संगत में पिघलने की कोशिश की।'
स्थानीय लोग इस जमी हुई बर्फ से अपने हिसाब से कमाई कर रहे थे। तमाम लोग स्लेज लिए खड़े थे। स्लेज पर बैठाकर बर्फ में फिसलपट्टी की तरह घुमा रहे थे। कई फोटोग्राफर अपने साथ बढिया कैमरे लिए फोटो, वीडियो बना रहे थे। साधारण सी वेशभूषा में स्थानीय लोग हाई क्वालिटी कैमरे लिए अपने मोबाइल स्टूडियो खोले खड़े थे। दो मिनट में खूबसूरत फोटो, वीडियो बनाकर आपके मोबाइल में दे रहे थे। अकेले और जोड़े में लोगों के पोज भी बना रहे थे। एक फ़ोटोग्राफर ने बर्फवारी का सीन बनाने के लिए नीचे झुककर थोड़ी बर्फ खोदी। फोटो खिंचाने वाले के हाथ में ऱखकर उछालने को कहा। बर्फ उछालते हुए उसका फोटो, वीडियो बनाया। कुछ और पोज में फोटो लिए। थोड़ी देर में प्रोसेस करके, सबका वीडियो बनाकर थमा दिया। सबके हजार या शायद पंद्रह सौ लिए। पचीसो फोटोग्राफर वहां यह काम कर रहे थे।
बर्फ में चलते हुए लोग फिसल भी रहे थे। स्लेज वाले और फोटोग्राफर और साथ के लोग उनको संभालकर नीचे ला रहे रहे थे।
हम ढाबे में एक कुर्सी पर बैठे बर्फबाजी, स्लेजबाजी और फोटोबाजी के कौतुक देख रहे थे। हमको अकेला और शायद थका हुआ बैठा देखकर एक आदमी शिलाजीत बेचने आया। शिलाजीत के फायदे और असली शिलाजीत होने की बात बताते हुए उसने शिलाजीत खरीदने के लिए कहा।
शिलाजीत की तमाम खूबियां होती हैं। लेकिन उसको मर्दानगी से इतना ज्यादा जोड़ा जाता है कि उसके बाकी सब गुण गुमनाम हो जाते हैं। हाल यह है कि इंसान खुले आम शिलाजीत खरीदते हिचकता है। कहीं लोग उसको कममर्द न समझ लें।
शिलाजीत के बाद उसने पेट कम करने की दवा का विज्ञापन शुरू किया। शायद उसको अंदाजा हुआ होगा कि अगला पेट के कारण दमफूल जाने की वजह से यहीं बैठा है। दवा लेते ही पेट आधा हो जाएगा की गारंटी के बावजूद जब वह असफल रहा तो चुपचाप आगे जाकर दूसरे ग्राहक को शिलाजीत और मोटापा कम करने की दवा बेंचने का प्रयास करने लगा।
घूमने की जगहों और खासकर काश्मीर में मैने पाया कि आप जहाँ पहुंचते हैं, बाजार आपके पास पहुंच जाता है। होटल में, पानी में, नदी किनारे, पार्क में। किसी भी जगह पहुंचे नहीं कि बाजार आपकी मिजाज पुर्सी के लिए हाजिर।
घुमाई और फोटोबाजी के बाद चायपानी करके लौटने की बात होने लगी। आहिस्ते-आहिस्ते लौटने का मन बनाते हुए लोग गाड़ियों तक आते गए। पीछे रह गए साथियों का इंतजार करते हुए फिर से प्रकृति को देखते, निहारते और कैमरे में भर्ती करते रहे। सब लोगों के आ जाने के बाद वापस चल दिये।
वापसी में चिंता थी कि कहीं देर न हो जाए और रात सोनमर्ग में ही गुजारनी पड़े। सोनमर्ग और पहलगाम में एक निश्चित समय के बाद वापस नहीं आने देते। सुरक्षा कारणों से।
रास्ते में एक जगह पत्थर गिर जाने के चलते गाड़ियां रुकी हुईं थीं। लम्बी लाइन लाइन। हम भी रुके। देरी होते हुए लगा कि कहीं यहीं न रुकना पड़े। लेकिन थोड़ी देर बाद जाम खुल गया। गाड़ियां तेज भागी। हम कुछ देर में उस जगह पहुंचे जहां हमारी बस खड़ी थी। गाड़ियों से उतरकर बस में पहुंचे। सरपट भागे। देर तक यही सोचते रहे कि कहीं यहीं न रुकना पड़े।
जिस जगह जाने के लिए हम लोग इतने इंतजाम करते हैं, वहीं ' ठहरना न पड़े ' सोचते हुए परेशान होने वाली बात भी मजेदार है। हम चुपचाप बैठे यही सोचते रहे कि शाम होने के पहले निकल जाएं सोनमर्ग से। रुकना न पड़े।
आगे थोड़ी देर बाद हमने पूछा अभी वह जगह कितनी दूर है जहां तक पहुँचने के बाद सोनमर्ग में रुकने की बन्दिश नही होगी। पता लगा कि वह जगह तो निकल गयी। पन्द्रह बीस मिनट पहले। सुनकर हमने जो सांस ली वह बाकी सांसों की तरह सामान्य ही थी लेकिन तसल्ली वाले भाव के चलते लोग उसको संतोष की सांस कहते हैं।
संतोष की सांस लेने के बाद हमने तसल्ली से बस के बाहर देखना शुरू किया। खूबसूरत नजारे देखते हुए श्रीनगर की तरफ़ बढ़ते गए। एक जगह रुककर नाश्ता-पानी किया। इसके बाद फिर बस में बैठकर चले तो अंधेरा होने लगा था। श्रीनगर पहुंचते-पहुंचते रात ने भी ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी।

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Tuesday, October 03, 2023

श्रीनगर से सोनमर्ग



कश्मीर यात्रा के पहले दिन निशात बाग़ और डल झील देखे, घूमे। रात के खाने के दौरान सबसे परिचय, मुलाक़ात हुई| इसके बाद सब सोने चले गए।
अगले दिन सुबह सोनमर्ग जाना था। पिछली कश्मीर यात्रा में सोनमर्ग रह गया था। श्रीनगर से सोनमर्ग करीब 80 किलोमीटर दूर है| दो से ढाई घंटे की दूर। बस से जाना था। ड्राइवर और सहायक मिलाकर कुल 23 लोग।
सोनमर्ग मतलब सोने का घास का मैदान। तमाम जगहें हैं यहाँ देखने को। सबको देखने -घूमने में के लिए तो न जाने कितने दिन लगें लेकिन हम लोग सिर्फ़ एक दिन के लिए आए थे इसे देखने। एक तरह से पाला छूने। ज़्यादातर पर्यटन पाला छूने वाले ही होते हैं। कुछ घंटे के लिए देखी जगहों की यादों को जीवन भर सहेजते हैं। अपने -अपने यादों के हिस्से फ़्रीज करके देखते रहते हैं।
बस सबेरे ही होटल के बाहर लग गयी। सवा आठ बजे बस का फोटो और ड्राइवर का फोन नम्बर व्हाट्अप ग्रुप में आ गया। ड्राइवर का नाम आदिल। खूबसूरत, सुदर्शन जवान, तरासी हुई दाढी। बाद में पता चला कि ड्राइविंग के पहले अपना आर्केस्टा था। सेहत के कारण उसको बंद करके ड्राइविंग शुरू की।
बस भले सवा आठ बजे लग गयी लेकिन निकलते-निकलते दस बज गए। सब लोग चलो,चलो कहते हुए आराम-आराम से बैठे बस में तो पता चला ट्रिप लीडर नदारद।मालूम हुआ कि ट्रिप के एक सदस्य के लिए खाना लेने गए हैं होटल। अनन्य के आने के बाद बस चली सोनमर्ग के लिए।
बस स्टार्ट होते ही टूर भी स्टार्ट हो गया। साथ आये लोगों का आपस में छुटपुट परिचय तो हो गया था लेकिन तसल्ली से , तफसील वाली जानपहचान होनी बाकी थी। अनन्य ने सभी से अपने बारे में बताने को कहा।लोगों ने विस्तार से अपना परिचय दिया। कुछ लोग पहली बार ऐसी किसी यात्रा में निकले थे। उनको उनके बच्चों से जबरियन ठेल कर भेज था। ये बच्चे फिरगुन ट्रेवल्स के टूर का अनुभव ले चुके थे। उनको भरोसा था कि उनके घर वाले आराम से रहेंगे।
परिचय के बाद गानों की अंत्याक्षरी हुई। दो ग्रुप बन गये। गानों पर गाने गूंजते रहे बहुत देर जब तक कि गाने की जगह डांस ने नहीं ले ली। डांस का सिलसिला शुरू हुआ तो चलता ही रहा देर तक। डांस करते लोगों ने दूसरे लोगों को जबरियन उठाकर ठुमके लगवाए। तेजी से लहराती, चलती बस ने भी लोगों को उन लोगों डांस करने में सहयोग किया जिनका हाथ डांस में तंग था। उनके खड़े होते ही बस उनको हिला- डुला देती जिससे उनकी मुद्रा अपने आप डांस मुद्रा में बदल जाती।
दो ढाई घण्टे बाद बस एक जगह रुकी। ढाबे के पास। बस रुकते ही लोग लपकते हुए नीचे उतरे। ढाबे के बगल में ही नदी बह रही थी। लोगों ने बताया सिंधु नदी है। नदी इठलाती हुई अपने में मस्त बह रही थी। उसको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि इतनी दूर से लोग उसके किनारे पर खड़े हुए उसको देखते हुए फोटो खिंचाने , वीडियो बनाने में तल्लीन हैं।
नदी बेपरवाह अंदाज में बह रही थी। उसको इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि लोग उसको देखते हुए, घूरते हुए और उसको तरह-तरह से अपने साथ लेते हुए फोटोबाजी कर रहे थे। सैकड़ों सालों से ऐसे न जाने कितने लोग उसको देखते आ रहे हैं। ऐसे सबको देखे तो बह चुकी नदी।
नदियों के उद्गम छोटे-छोटे सोते जलस्रोत होते हैं। उद्गम से निकलते हुए अनगिनत जलस्रोत नदी के जल में इजाफा करते हैं। इन जलस्रोतों से पानी ग्रहण करती हुई नदी आगे बढ़ती है। सबके सहयोग से नदी समृद्ध होती है। नदी का सौंदर्य सामूहिकता का सौंदर्य होता है।
सोनमर्ग पहुंच कर बस रुकी। आगे की यात्रा स्थानीय गाड़ियों से की जानी थी। गाड़ियों में बैठकर हम लोग आगे बढ़े। करीब घण्टे भर की मोटरबाजी के बाद हम उस जगह पर पहुँचे जिसको देखने तमाम लोग सोनमर्ग आते हैं। इस जगह का नाम ज़ीरो प्वाइंट है।

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Thursday, September 28, 2023

कोलकाता -एक संवेदनशील शहर



कोलकता पहली बार गये थे 40 साल पहले। 1983 में ।साइकिल से। इलाहाबाद से कन्याकुमारी जाते हुए। 9 दिन में पहुँचे थे इलाहाबाद से कलकत्ता। तीन दिन घूमे थे। उसके बाद अनेक बार आना हुआ लेकिन हर बार टुकड़े-टुकड़े ही घूमे। लौट गये यह सोचते हुए कि अगली बार तसल्ली से घूमेंगे।
इस बार जब गये तो दमदम गेस्ट हाउस में काम करने वाले कामगार ने कहा -‘अनेक दिन बाद आये।’ होटल में टिकते तो कौन पूछता -‘अनेक दिन बाद आए।’ होटल में एक तरह की बन्दिस भी लगती ही की पता नहीं कौन चीज के पैसे लग जायें। गेस्ट हाउस में ड्राइवर जितनी बार आया उतनी बार हमने कहा -‘चाय पी लो। खाना खा लो।’ किसी पाँच सितारा होटल में ठहरते तो ख़ुद भी खाना बाहर खाते अगर वह किराए में शामिल नहीं होता।
कामगार ठेके पर काम करता है। न्यूनतम मजदूरी से भी कम मिलता होगा। लेकिन यही सुकून की बात कि पिछले बीस साल से वहीं लगा है। कुछ देर बात करने पर बताया कि इस महीना का पगार अभी नहीं आया। दिहाड़ी पर काम करते कर्मचारी को भुगतान महीने के आख़िरी सप्ताह तक न मिले यह ठेकेदारी प्रथा में सामान्य बात है।
लौटने की फ़्लाइट शाम साढ़े तीन की थी। शाम की फ़्लाइट बुक करते हुए सोचा था कि इस बार कोलकता में कॉलेज स्ट्रीट जाएँगे। हर बार सोचते हैं, हर बार रह जाता था।
कॉलेज स्ट्रीट भारत के साथ-साथ एशिया का सबसे बड़ा पुस्तक बाजार और पूरी दुनिया में सबसे बड़ा सेकेंडहैंड पुस्तक बाजार है। 900 मीटर लंबी इस सड़क को किताबों का मोहल्ला/कालोनी भी कहते हैं (बंगाली में बोई पारा )। इस सड़क पर कोलकाता के कई शिक्षा संस्थान हैं। कॉलेज स्ट्रीट का इतिहास 1817 से मिलता है जब डेविड हेयर ने तत्कालीन हिंदू समुदाय के सदस्यों के बच्चों को उदार शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से द हिंदू कॉलेज की स्थापना की थी।
कॉलेज स्ट्रीट के तमाम क़िस्से सुन रखे थे। सोचा इस बार देख ही लिया जाये।
दस बजे बुलाया ड्राइवर को। लेकिन निकलते-निकलते सवा ग्यारह बज गये। गूगल मैप के हिसाब बारह बजे पहुँच जाना था। लेकिन सड़क पर ट्रॉफ़िक जाम के चलते पहुँचने का समय बढ़ता गया। सड़क पर भीड़ बढ़ते देखकर वहाँ रुकने का समय कम होते -होते शून्य के क़रीब हो गया। यह सोचा कि रुकेंगे नहीं बस पाँव फिराकर चले आयेंगे।
दिन की धूप थी। सड़क पर ट्रैफ़िक होमगार्ड छाता लगाये ट्रैफ़िक नियंत्रण कर रहा था। सड़क पर चलते लोग भी ,ख़ासकर महिलायें ,धूप से बचने के लिए छाता लगाये थी। एक युवा जोड़ा भी छाते के नीचे शायद सवारी के इंतज़ार में खड़ा दिखा। लड़का छाता पकड़े था। लड़की इधर -उधर और फिर लड़के को देखकर उससे बतिया रही थी। जोड़ा जिस तसल्ली से गप्पगुम था उसे देखकर लगा कि उनको कहीं आना जाना नहीं था। वहीं खड़े होकर बतियाना था।
छाते के नीचे जोड़े को देखकर अपन को ख़ुद का लिखा शेर बिना याद किए याद आ गया:
तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
भीग तो पूरा गये पर हौसला बना रहा।
शेर याद तो आ गया लेकिन ‘याद मैनेजर’को हड़काया कि एकदम बाज़ारू हो गये हो। चंट सेल्समैन। बारिश का शेर धूप में ख़पा रहे हो। ‘याद मैनेजर’ ने मुस्कराते हुए कहा कि मौसम कोई हो छाता तो बचाने का ही काम कर रहा है। शेर भी खप जाएगा , आप चिंता न करें।
इस बीच ड्राइवर ने अपने बारे में बता डाला। 2018 में पूजा के दिनों में पिता नहीं रहे। शादी लव मैरिज से बनाया। इंटरकास्ट। बीबी ब्राह्मण ख़ुद अनुसूचित जाति का। लेकिन कोई ज़्यादा लफड़ा नहीं हुआ। बीस साल हो गये शादी को। एक बच्चा है , क्लास फ़ोर में पढ़ता है। बेटे , पत्नी और परिवार के फ़ोटो , विडियो दिखाये। सब ख़ूबसूरत।
‘प्यार की शुरुआत कैसे हुई?’ पूछने पर बताया। पास में रहती थी। अच्छी लगी तो बात का कोशिश किया। थोड़ा डाँटा-फाटा हुआ पहले फिर बात शुरू हुआ और फिर शादी बना लिया। पत्नी को नौकरी भी मिला था , एयरहोस्टेस का आफ़र भी मिला था लेकिन बेटे के कारण छोड़ दिया।
‘लव मैरिज बीस साल पहले हुआ। अब भी प्यार बना है कि नहीं ?’ हमारे इस सवाल के जबाब में ड्राइवर ने कहा -‘अच्छा है। चलता है । नरम गरम तो चलता रहता है।वो थोड़ा ज़िद्दी है। उसके कारण शराब छोड़ दिया। बेटे पर भी असर पड़ेगा न। सब ठीक है। अच्छा है।’
इसी सिलसिले में किसी बात पर उसने कहा -‘ हम उसको आज तक ‘आई लव यू’ तक नहीं बोला।’
हमको हँसी आ गई। हमने कहा -‘कैसी मोहब्बत कि आज तक उसका शुरुआती नारा तक नहीं निकला मुँह से?’
मन किया कि उनको संगत का विश्वनाथ त्रिपाठी का वह इंटरव्यू सुनायें जिसमें वे अपनी दिवंगता जीवनसंगिनी के प्रति प्रेम न प्रकट करने का अफ़सोस करते हैं। लेकिन बात इधर -उधर हो गई।(विश्वनाथ त्रिपाठी जी से Anjum Sharma की बातचीत का लिंक कमेंटबॉक्स में )
रास्ते में जाम के चलते देर होती गई। जब दो किलोमीटर रह गया कॉलेज स्ट्रीट तो जाम जैसे धरने में बदल गया। पूरी सड़क सी ठहर गई।
सड़क के जाम से निर्लिप्त सड़क किनारे एक रिक्शे में बैठे , लेटे, सड़क के जाम से निर्लिप्त दो बुजुर्ग गप्परत थे। कोई मतलब नहीं दीन दुनिया से। एक के सर पर हैट, दूसरे का सर खुला। पैर रिक्शे की रेलिंग पर। रिक्शे के पहिये पर ताला। अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू ऐसा गया कोई बड़े सियासी नेता किसी बहुत बड़ी समस्या पर चर्चा कर रहे हों। ये तो मासूम लोग हैं। किसी रोज़मर्रा की समस्या से निपट रहे होंगे। सड़क के जाम से बेख़बर । वह तो उनके लिये आम बात है ।सियासी लोग भी इसी अन्दाज़ में अपनी योजनाओं पर चर्चा करते होंगे -‘कैसे विरोधी को निपटाया जाये, कैसे चुनाव जीता जाये, कैसे तमाम जगह क़ब्ज़ा जमाया जाये।’ अवाम की तमाम परेशानियाँ उनके लिए रोज़मर्रा की बात होती होगी जिस पर तवोज्जो देना फ़ालतू समय बर्बाद करना लगता होगा। कई समस्याएँ तो उनकी उपेक्षा करने से ही हल हो जाती हैं।
रिक्शे पर बैठे बुजुर्गों को तसल्ली से बतियाते देखकर लगा यह कोलकता की ख़ासियत है। यहाँ जगह लोग बतियाते, अड्डेबाज़ी करते दिख जाते हैं। कई जगह लोग फुटपाथ पर शतरंज , कैरम खेलते दिख जाते हैं।कभी भारत के प्रधान मंत्री जी ने कोकलता को मरता हुआ शहर कहा था। बड़ा बवाल हुआ था। मुझे कोलकाता हमेशा जीवंत, संवेदनशील शहर लगता है जहां कहीं से भी आया गरीब से गरीब इंसान भी इज्जत से जीवन बसर कर सकता है।
थोड़ा आगे ही एक सार्वजनिक शौचालय दिखा। उसकी दीवार पर सुंदर लोकचित्र जहां ख़ुशनुमा लगा वहीं उसके सामने ही सड़क पर उठने के इंतज़ार में पड़ा कूड़ा देखकर लगा कि यहाँ सफ़ाई और गंदगी की गठबंधन सरकार चल रही है ।
इस बीच घड़ी एक बजाने की तरफ़ बड़ी। दो किलोमीटर दूर कॉलेज स्ट्रीट अभी भी बीस मिनट के फ़ासले पर दिख रहा था ।हमें लगा कि देर हुई तो फ़्लाइट छूट जायेगी। हम वापस लौट लिए।
लौटते हुए सड़क किनारे एक टपरी पर चाय पी। बुजुर्ग महिला बांग्ला में बता रही थी कि उसको ब्रेनस्ट्रोक हुआ था। माथा बहुत दर्द करता है। थर्मस से कुल्हड़ में चाय उड़ेलते हुए अपनी कहानी बताती रही। हम कुछ न समझते हुए भी सब बूझते गये। चाय बिस्कुट के बाईस टका हुए। हमारे पास पाँच सौ रुपये का नोट था। उसके पास न चिल्लर थे न फ़ोन पे। पैसे ड्राइवर ने दिये। तीस रुपये। आठ रुपये वापस करने के लिए भी वह इधर-उधर करने लगी। शायद थे नहीं। हमने कहा -‘छोड़ दो।’ ड्राइवर ने छोड़ दिया। बुजुर्ग महिला ने हमको अनेक आशीष दिये।
वहीं खड़े चाय पीते हुये एक रिक्शा वाला और एक आटोवाला वॉकयुद्ध कर रहे थे। बांगला में। पूछा तो पता चला रिक्शा वाला आटनेवाले को हड़का था कि वह यहाँ क्यों खड़ा होता है। उसका सवारी क्यों उठाता है?
आगे फुटपाथ पर एक आदमी लेटा हुआ किसी से बतिया था ।शायद वह वहीं खड़े ट्रक का ड्राइवर था। वहीं पास में बैठा लड़का मोबाइल में मुंडी घुसाये व्यस्त था।
ड्राइवर ने हमको हवाई अड्डे पर छोड़ दिया। हमने चाय के पैसे के साथ कुछ और पैसे उसको दिये। दुनिया में अपनी शर्तों पर आर्थिक सहायता देने वाले संस्थानों की तर्ज़ पर हमने हिदायत दी -‘अपने बेटे के लिए चाकलेट ले जाना और अपनी पत्नी को आई लव यू बोलना।’
हमारी कही बात पर अमल करने को कहकर वह चला गया। हम भी चले आये । पता नहीं उसने हमारी बात पर अमल किया या नहीं। फ़ोन करके पूछते हैं। 😊
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