Thursday, July 11, 2024

शाहजहाँपुर में

 कल शाहजहांपुर आना हुआ। सुबह टहलने निकले। सड़क पर लोग कम थे। शायद जल्दी हो अभी। साढ़े पांच ही तो बजे थे।

कई परिचित मिले। कुछ फैक्ट्री के , कुछ शहर के। कुछ लोगों ने कहा-'आप अब यहीं आ जाईये फिर से।' उनको पता नहीं था अपन रिटायर हो दो महीने पहले।
लोगों से मिलते ,हाल-चाल पूछते बताते सड़क पर टहलते रहे कुछ देर। सामने से शाहजहाँपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप के Inderjeet Sachdev जी आते दिखे। बाद में Dr Anil Trehan त्रेहन जी भी साइकिल पर आते दिखे। ये दोनों बुजुर्ग युवाओ वाले जोश से शाहजहांपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप को लगातार सक्रिय और उत्साह से लबरेज रखते हैं। खुशी और उत्साह के किसी भी मौके को बिना सेलिब्रेट किये जाने नहीं देते। तय हुआ कि उनसे उनके ठीहे पर मुलाकात होगी।
आगे जाकर लौट लिए। एक बेंच पर बैठा एक आदमी आत्मालाप कर रहा था। रुककर सुना तो कह रहा था -'औरत के लिए उसका आदमी बिंदी, लिपिस्टिक, आलता लाता है। उनके टिकुली सिंगार के खर्च उठाता है। खिलाता पिलाता है। इसलिए औरतों को अपने आदमियों को पतिपरमेश्वर मानना चाहिए। '
हमने रुककर उसकी बात सुनी तो हमसे अपनी बात के समर्थन की अपेक्षा की उसने। हमको श्रोता समझकर उसने 'उनकी' ही तरह पूछा भी -"मानना चाहिए कि नहीं ?"
हमें लगा कि अगर हम रुके तो मनवा के ही छोड़ेगा। अपन बिना समर्थन दिए आगे बढ़ गए।
मैदान में पानी और पिछले दिनों हुई प्रदर्शनी का कचरा जमा था। बीच में घास भी दिख रही थी। साफ होगा धीरे-धीरे। कभी हमने यहां पुस्तक मेला लगवाने की सोची थी। लेकिन पहले कोरोना ने समय खा लिया और बाद में दीगर कामों में उलझ गए।
मार्निंग वाकर्स ग्रुप के ठीहे पर पहुंचे तो साथी लोग माला, शाल, पटका ले आये थे। हमको पकड़कर माला पहना दी, पटका पहना दिया और सभी के साथ फोटो भी हो गयी। जो बाद में आया उसने भी पहनी माला के साथ फोटो खिंचाई। अपन गर्दन झुकाए खड़े रहे। माला पहनने में गर्दन झुक ही जाती है।
सामने Saif Aslam Khan की बेंच नम्बर सात पर बैठे दो आदमी एक-दूसरे की तरफ झुके बतियाने में मशगूल थे।
शाहजहांपुर मार्निंग वाकर्स ग्रुप के साथी हमेशा सम्मान करने वाले समानों से लैस रहते हैं। कोई भी खुशी का अवसर मिला, सम्बंधित सदस्य को सम्मानित करने का अवसर नहीं चूकते।
फोटोबाजी के बाद वक्तव्य भी हुए एक-एक मिनट के। किसी ने नाम गलत बोल दिया तो रिकार्डिंग दुबारा हुई।
बाढ़ आई हुई है शहर में आजकल। शहर के कई इलाके पानी में डूबे हैं। शारदा डैम का पानी छोड़ा गया है। लोगों के घरों में पानी भरा है। लोग बाढ़ से और चोरों से अपने घर का सामान बचाने की जुगत में लगे हैं। पता चला आज कुछ पानी कम हुआ है।
'जस की तस धर दीन चदरिया' की तर्ज पर सम्मान -सामान वहीं छोड़कर वापस आ गए। चाय पीते हुए पानी बरसने की आवाज सुनाई दी। बाहर निकलकर देखा तो सड़क भीग रही है। मैदान भीग रहा है। बिल्डिंग भीग रही हैं। जहाँ तक देखो सब भीगता दिखा।
भीगने से याद आया कि पिछले दिनों 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' शीर्षक से बहुत कुछ लिखा गया। फ़ोटो सहित। हम उस बारे में कुछ न लिखेंगे।
फिलहाल हमको तो सामने की भीगती सड़क पर साइकिल पर भीगता जाता इंसान दिख रहा है। भीगने के नाम पर शेर भी याद आ गया। मुलाहिजा फरमाएं :
"तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
भीग तो पूरा गए, पर हौसला बना रहा। "
आपको भी कोई शेर याद आ रहा तो सुना दीजिए। इरशाद कह रहे हैं।

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Sunday, July 07, 2024

चलो थोड़ा दूर जाते हैं



चलते हैं दूर सभी सवालों से
ख्यालों से भी दूर हो के आते हैं,
आवाज देकर जहां से कोई बुला न सके,
शोर न सुनाई दे किसी का,
वहां तक होकर आते हैं...
समझना और समझाना ,
इस सब के थोड़ा पार जाते हैं,
थोड़ा ही सही , खुद से मिलकर आते हैं,
जहां से मेरी चीख किसी को न सुनाई दे,
वहां तक होकर आते हैं...
उलझे हुए हैं सभी यहां,
सबसे दूर कुछ देर खुद को सुलझाकर आते हैं,
जहां यह भारी मन हल्का महसूस करे,
वहां तक होकर आते हैं...
जिस जगह पर रोज जितना न पड़े,
मन है इस बार, थोड़ा हारकर आते हैं,
जहां तक जाने पर बैठ सकूं थोड़ा,
इस बार वहां तक होकर आते हैं...
चलो , थोड़ा दूर जाते है....
थोड़ा दूर जाने की बात हमारे छोटे बेटे अनन्य Anany Shukla ने यात्रा से वापस आकर की।
अनन्य पिछले तीन वर्षों से घुमक्कड़ी में जुटे हैं। तीन वर्ष पहले कारपोरेट की सर्विस छोड़कर घूमने-घुमाने का काम कर रहे हैं। अपनी ट्रेवल कम्पनी फिरगुन ट्रैवल्स Firgun Travels के माध्यम से देश विदेश की 41 ट्रिप लीड कर चुके हैं।
पिछले दिनों मंडी, हिमाचल प्रदेश में मंडी के पास 17345 फुट ऊँची फ्रेंडशिप पीक की ट्रेकिंग की। उस दौरान हर तरह के सम्पर्क से दूर रहे। मोबाइल बंद। हर शाम केवल सूचना मिलती थी, सब ठीक है।
फ्रेंडशिप पीक की ट्रैकिंग जरुर कठिन रही होगी। शायद इसीलिए आधे लोग ही पीक तक पहुंच सके। बाकी रुक गए रास्ते में। बिना शिखर तक पहुंचे लौट आए।
ऐसी किसी यात्रा पर निकलने और यात्रा के दौरान उठने वाले भाव लिखे अनन्य ने, यात्रा से लौट कर।
सफ़र की कुछ फ़ोटुएँ देखकर एहसास होता है कि ट्रैक कितना चुनौती भरा रहा होगा।
अनन्य की कम्पनी फिरगुन ट्रेवल्स को पिछले दिनों एक संस्था ट्रिप एडवाइजर ने अच्छी 10% ट्रेवल कम्पनियों में होने का प्रमाणपत्र दिया। यह प्रमाणपत्र ट्रिप में गये लोगों के फीडबैक के आधार पर दिया गया है।
घूमने-घुमाने का काम भी अनूठा है। ' सैर कर दुनिया की गाफिल' तो बचपन से सुनते आए हैं। अनन्य का कहना है -'निकल बेवजह।'(वीडियो का लिंक कमेंट में। अनन्य का लिखा यह गीत उनके दोस्त अरिजित आनंद ने गाया है)
तो कब निकल रहे हैं घूमने के लिए?

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Thursday, July 04, 2024

फ़िलहाल इतना ही



फ़ेसबुक पर अक्सर ही कुछ न कुछ लिखना होता है। जिस दिन न लिखो, लगता है आज का दिन बेकार गया। जो लोग नियमित लिखते हैं उन सभी के साथ ऐसा होता होगा। मुझे ऐसा लगता है। हो सकता है कुछ अलग भी लगता हो।
लिखने का मतलब कोई काम की बात लिखना ही नहीं होता। बस लिखना ही होता है। वैसे भी काम की बातें करने के लिए काम भर की जानकारी भी होनी चाहिए। कभी-कभी यही लिखकर पोस्ट कर देते हैं -'बोर हो रहे हैं। आप भी साथ में बोर होना चाहते हैं तो आएँ।' या फिर -'चाय बनाने जा रहे हैं। जिसको पीना हो बताए।'
ऐसी पोस्ट्स पर आमतौर पर हाथों-हाथ ली जाती हैं। क्लिक दर क्लिक उछलती है। देखते-देखते तमाम लाइक्स मिल जाते हैं। कमेंट भी आ जाते हैं। दिल ख़ुश हो जाता है।
ऐसी हल्की-फ़ुल्की पोस्ट कार्नफलेक्स की तरफ़ होती हैं जिनको सिनेमा हाल में बैठे-बैठे खाते जाओ, खाते जाओ पता नहीं चलता। सोशल मीडिया भी ऐसी हल्की-फ़ुल्की पोस्टों को उछालता रहता है। लोगों की निगाहों में लाता रहता है। देखो-देखो। इसको देखो। ऐसी पोस्ट्स अक्सर 'चू कित क़ित कित' की तरह वायरल होने की सम्भावना से भरी होती हैं।
इस तरह की पोस्ट लिखना और पढ़ना भी जाड़े के मौसम में रज़ाई बैठकर चटपटे नमक के साथ मूँगफली चबाना जैसा होता है। इस स्थिति के बारे में मुस्ताक अहमद युसुफ़ी साहब लिख ही गए हैं -'मूँगफली और आवरगी में ख़राबी यह है कि आदमी एक बार शुरू कर दे तो समझ में नहीं आता,ख़त्म कैसे करे।'
इसके विपरीत लम्बी और तथाकथित गम्भीर पोस्ट को फ़ेसबुक आमतौर पर धीमा कर देता है शायद। शायद न करता हो लेकिन ऐसा लगता है।तीन घंटे की मेहनत के बाद लिखी पोस्ट पर तीन -चार कमेंट और दस-बीस लाइक्स आते हैं। फ़ेसबुक का हाज़मा लम्बी पोस्ट्स से ख़राब सा हो जाता है।
पहले सोचते थे कि कोई बेवक़ूफ़ी की बात लिख दें। इस तरह की बातों को लोग अक्सर काफ़ी पसंद करते हैं। उनको लगता है किसी हमअक़्ल ने कुछ लिखा है। लेकिन आजकल तो बेवक़ूफ़ी की बातें लिखते हुए भी डर लगता है कि कहीं माननीय का नोटिस न आ जाए -'तुम संसद के बाहर कैसे असंसदीय बातें कर रहे हो?'
यह डर हमेशा लगा रहता है कि कहीं बिना सांसदी के ही न संसद से निलम्बन हो जाए।
ज़्यादा फ़ोटो वीडियो लगी फ़ोटो से भी लगता है फ़ेसबुक झल्ला जाता होगा। कहता होगा हमको कोई 'फ़ोटो कुली' समझा है क्या जो तुम्हारा डिजिटल कूड़ा लादे-लादे सबको दिखाते रहें।
पहले हम जब ब्लाग पर लिखते थे। उसमें पोस्ट्स का टैग करने की सुविधा होती थी। फ़ेसबुक में यह सुविधा जटिल है। किसी पोस्ट का लिंक लगाओ, फ़ेसबुक रोक देगा। कमेंट में लिंक लगाओ, लोग देख नहीं पाते।
इधर बीच पढ़ने पर ध्यान ज़्यादा है। आजकल कई किताबें एकसाथ खुली रहती हैं। कभी इसको बांचते हैं कभी उसको खोल लेते हैं। पिछले हफ़्ते से चे ग्वारा की 'मोटरसाइकिल डायरीज' पढ़ रहे हैं। सैर के रोज़मर्रा के किस्से। अक्सर बेचारे की मोटरसाइकिल पंक्चर हो जाती है। कभी टूट-फूट हो जाती है। मुझे अपनी साइकिल यात्रा याद आती है। उसके किस्से लिखते तो शायद इसी तरह रोचक होते।
चे ग्वारा ने उन लोगों का भी ज़िक्र किया है जिन्होंने उनको रास्ते में रोककर खाना खिलाया। हमारी तीन महीने की यात्रा में भी लोगों ने खूब आव-भगत की।खिलाया-पिलाया।
बीच में मैंने सोचा था कि यू-ट्यूब चैनल भी शुरू किया । लेकिन उसके लफड़े इतने कि सोच भी स्थगित कर दी।
रोज़ की मुलाक़ात के किस्से लिखने का मन होता है। जिस दिन का क़िस्सा होता है उसी दिन न लिख पाए तो ऐसा लगता है कि क़िस्सा एक्सपायर हो गया। किस्से के पाँच ग़ायब हो जाते हैं।बाद में लगता है हम अनजान 'क़िस्सा-हत्या' के अपराधी हैं।
इतना लिखने के बाद तमाम किस्से याद आ रहे हैं। हर क़िस्सा हल्ला मचा रहा है -'हमको लाँच कर दो, हमको मौक़ा दे दो, हम एक्सपायर होने वाले हैं।' लेकिन हम किसी एक की सुनेंगे तो बाक़ी सारे किस्से हमको दौड़ा लेंगे। समानता के अधिकार उल्लंघन होगा।
ऊपर युसुफ़ी साहब की आवरगी और मूँगफली की बात लिखी। हमारे साथ यह सिलसिला तो हर पोस्ट में होता है कि समझ में नहीं आता कि इसे ख़त्म कैसे करें। इसी चक्कर में पोस्ट भी लम्बी हो जाती है।
लेकिन आज समझ में आया कि जब कुछ न समझ आए तो लिख दो -' फ़िलहाल इतना ही।'
लिहाज़ा लिख रहे हैं आज के लिए फ़िलहाल वही जो ऊपर लिखा -'फ़िलहाल इतना ही।'

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Wednesday, July 03, 2024

हर कश्मीर वासी अपने कश्मीर का 'ब्रांड एंबेसडर' है



आज अपने कनपुरिया साथी अतुल अरोरा Atul Arora की पोस्ट में नियाग्रा फाल के फ़ोटो देखे। सात साल पुराने। फ़ोटो देखकर हमको अपने कश्मीर के नियाग्रा फाल की याद आ गयी। पिछले साल कश्मीर यात्रा के दौरान देखा था यह झरना। यात्रा अपने बेटे अनन्य Anany Shukla के Firgun Travels के सौजन्य से की गयी थी। इसमें चालीस साल से ऊपर की उम्र के 'युवा' शामिल थे। इसके कुछ किस्से हमने पिछले साल लिखे थे। बाक़ी के आलस्य के चलते यादों के तहख़ाने में जमा हो गए थे। अब उनको निकालकर, धो-पोंछ कर पेश किया जा रहा है।
पिछली रात सोनमर्ग से लौटते हुए देर हो गयी। खा-पीकर , यादें साझा करते हुए अपने-अपने हिसाब से सो गए। ( पोस्ट का लिंक टिप्पणी में ) सुबह जल्दी निकलने का निर्देश था। लेकिन सुबह कौन जल्दी निकलता है। नाश्ता करते, सामान लादते, बस में बैठते और निकलते क़रीब दस बज गए। हमारी मंज़िल थी अहरबाल झरना ।
श्रीनगर से क़रीब दो घंटे की दूरी पर स्थित कुलगाम ज़िले में स्थित है। बस में बैठे तो सभी यात्रियों के गाने-डांस और अंत्याक्षरी का समा बंध गया। कुछ देर की मौज-मस्ती के बाद एक जगह बस रुकी। यह एक केसर की दुकान थी। सभी लोग बस से उतरकर केसर, कहवा, मेवों वग़ैरह की ख़रीदारी में जुट गए। दुकान वाले मुफ़्त कहवा पिलाकर ख़रीदारों का स्वागत कर रहे थे। लोग देखादेखी ख़रीदारी करते जा रहे थे। दुकान पर केसर के तमाम लाभों की फ़ेहरिस्त लगी थी।
जब लोग ख़रीदारी में जुटे थे अपन बाहर सड़क का मुआयना करने निकल आए।अमरनाथ यात्रा के चलते सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम थे। जवान बख़्तरबंद गाड़ियों के साथ रास्ते की निगरानी कर रहे थे। कई बख़्तरबंद वाहन हमारी संस्थान वीएफजे में बने थे। संस्थान की पट्टी वाहनों पर लगी थी।
ख़रीदारी से निपटकर लोग फिर बस में आए। आगे की यात्रा शुरू हुई। कुछ देर बाद बस मुख्य सड़क छोड़कर क़स्बे की पतली सड़क पर आ गयी। वहाँ भी बस्ती में कुछ-कुछ जगहों पर बख़्तरबंद गाड़ियों में जवान सुरक्षा में मुस्तैद थे।
बस पतली सड़कों पर बलखाती हुई, धीरे-धीरे लहराती, नख़रीले जैसे अन्दाज़ में मटकती हुई अहरबाल झरने के पास पहुँची। नीचे उतरकर हम लोगों ने बदन तोड़ अंगड़ाई लेकर पैर सीधे किए और झरने की तरफ़ बढ़े। झरने के पास तक जाने के लिए टिकट लेना था।नैसर्गिक सौंदर्य को देखने के लिए भी पैसे देने पड़े यह अपने आप में विडम्बना है। लेकिन है तो है।
मुझे डर है कि कहीं आगे चलकर धूप, हवा और बारिश जैसी प्राकृतिक और सहज सुलभ सुविधाओं का उपयोग करने पर भी कोई टिकट न लग जाए। इससे पहले कि ऐसा हो, अधिक से अधिक जगहें घूम ली जाएँ।
अहरबाल झरना झेलम की सहायक नदी वेशा नदी पर स्थित है। इसकी ऊँचाई २२६६ मीटर ऊँचाई है। अपनी ख़ूबसूरती के कारण इसकी तुलना नियाग्रा के जलप्रपात से की जाती है। जिस ऊँचाई और मात्रा में इससे पानी गिरता है उससे १०० मेगावाट बिजली बन सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह जगह जीवाश्म जैव विविधता से भरपूर है और विशिष्ट स्थानों पर घने जीवाश्म नमूनों से भरा है। 488 से 354 मिलियन वर्ष पुराना हो सकता है। मतलब लगभग 488 से 364 लाख पीढ़ी पहले के लोग। उस समय फेसबुक रहा नहीं होगा वरना कोई लिखता इसके भी किस्से।
जैसे-जैसे झरने के पास जाते गए, ख़ूबसूरती में इज़ाफ़ा होता गया। झरने की तरफ़ सुरक्षा के लिहाज़ से रेलिंग और तार लगे हुए हैं। सबसे नीचे पहुँचकर झरने के एकदम पास तक पहुँचे। रेलिंग के पीछे से झरने की ख़ूबसूरती निहारते रहे, देखते रहे, सौंदर्य-चकित होते रहे। पास से देखा फिर थोड़ी दूर से देखा। हर तरफ़ से अनोखे सौंदर्य के दर्शन हुए।
झरने में बहता पानी बहुत खूबसूरत लग रहा था। ऐसी ख़ूबसूरती को सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है, बयान करना नामुमकिन है। कर भी दिया जाए तो उसे उसी रूप में महसूस करने की कोशिश में इतना 'सौंदर्य-नुक़सान' होगा जिसकी क्षतिपूर्ति असम्भव है।
एक जगह खड़े होकर देखने पर झरने के मुहाने पर ऐसा लगा मानो पानी की एक लहर इठलाती हुई एक तरफ़ से आई , एक लहर दूसरी तरफ़ से मटकती हुई आई और मुहाने पर दोनों का गठबंधन हो गया। मानों दो लहरों का गठबँधन हो गया हो मुहाने पर और वे आगे गृहस्थ के रूप में बहने लगे हों।
मेरे बेटे अनन्य ने झरने के पास लगे कँटीले तार को देखकर उसको फ़ोटो खींचते हुए कहा - ' beauty in cage पहरे में ख़ूबसूरती।'
कहने को तो कश्मीर के बारे में यह भी कहा जाता है -'एक दिल है कश्मीर सा, खूबसूरत मगर तबाह।' लेकिन हम तो इसकी ख़ूबसूरती पर ही फ़िदा हैं।
बहुत देर तक झरने के किनारे खड़े हम लोग अलग-अलग ग्रुप में फ़ोटो खिंचाते रहे। हर कदम पर झरने की ख़ूबसूरती अलग तरह से दिखती रही। फिर-फिर लौटकर आगे-पीछे देखते रहे।
लौटते समय एक जगह कश्मीर के कुछ लोग बैठे दिखे। उनसे बातचीत शुरू हुई तो उसने पूछा -' कश्मीर मोहब्बत से भरा हुआ है। आप ही बताओ आपको कश्मीर कैसा लगा?'
हमने कहा -'बहुत ख़ूबसूरत। बहुत अच्छे लोग हैं यहाँ के। '
उसने कहा -'मैंने खुद पढ़ाई की है वहाँ।बाहर। मगर मुझे कश्मीर से अच्छा कोई प्लेस नहीं लगा। कश्मीर एक तरह से जन्नत है।'
कश्मीर के बारे में पूछने वाले यह पहले कश्मीरी नहीं थे। मुझसे कश्मीर से जुड़े तमाम लोगों ने कश्मीर के बारे में पूछा है -'आपको कश्मीर कैसा लगा?'
हमारे यह कहने पर कि कश्मीर बहुत अछा लगा उनके चेहरे पर संतुष्टि भरे भाव के बाद अक्सर यह सवाल भी होता है -'फिर कश्मीर के बारे में लोग ख़राब बातें क्यों कहते हैं?'
मेरे पास इसका कोई मुकम्मल जबाब नहीं होता लेकिन अक्सर यही कहते रहे कि लोगों को यहाँ के बारे में पता नहीं। वे यहाँ आए बिना सुनी-सुनाई बातों के आधार पर अपनी राय बना लेते हैं। कश्मीर वाक़ई बहुत खूबसूरत है। यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं।
कश्मीर के बारे में कश्मीर के लोग जब पूछते हैं तो उनके चेहरे पर जो भाव होता है वह उसी तरह के होते हैं जैसे कोई अपनी सबसे बेहतरीन चीज़ उपलब्धि दिखाते हुए किसी की राय पूछे -'आपको यह देखकर कैसा लगा?'
यह सवाल मुझसे कश्मीर के लोगों ने कश्मीर में भी पूछा, कश्मीर से दूर पांडीचेरी में भी पूछा। स्कूल जाती मेडिकल की तैयारी करती लड़की ने भी पूछा, नौकरी करते युवा ने पूछा, आटो चलाते हुए चालक ने पूछा और झरने किनारे अपने बच्चे के साथ बैठे पिता ने भी पूछा। सबके सवालों में यह कोशिश दिखी कि लोग कश्मीर को उसी तरह खूबसूरत और मोहब्बत वाली जगह समझें जैसी वह है, जैसी कश्मीर के लोग मानते हैं।
इस लिहाज़ से हर कश्मीर निवासी चाहे, वह जहां भी हो, कश्मीर का 'ब्रांड एंबेसडर' है। वह भरसक प्रयास करता है कि लोग कश्मीर की अच्छाई और मोहब्बत के पैग़ाम को समझें।
विदा होते समय उसने हमको अपने घर खाने के लिए निमंत्रित भी किया। हमने बताया कि हम तमाम लोग हैं ,आगे जाना है हमको।
उसने 'तमाम लोग' वाली बात को पकड़ कर कहा -'कितने भी लोग होंगे, सबका इंतज़ाम हम करेंगे।'
हमने दरियादिल प्रस्ताव के आभार व्यक्त करते हुए आगे जाने की बात का हवाला देकर उससे विदा ली।

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Tuesday, July 02, 2024

आफ़्टर ए लाँग टाईम



पिछले दिनों पंकज बाजपेयी से मुलाक़ात हुई। बहुत दिन बाद। वहीं मामा चाय वाले की दुकान के पास टहल रहे थे। गाड़ी से उतरकर हमने हाथ हिलाया तो लपककर पास आए। बोले -'आफ़्टर के लाँग टाईम यू हैव कम।'
हमने सोचा कहीं 'कारण बताओ नोटिस' न जारी कर दें इसलिए बात घुमाने के लिए पूछा -'क्या हाल हैं?'
आजकल तो कहीं से भी कोई भी नोटिस जारी कर देता है। क्या पता कि कहीं इस बात का नोटिस न जारी हो जाए -'आपने पिछले मिनट में बहत्तर की बजाए छिहत्तर बार साँस ली। चार अतिरिक्त साँसों के लिए 'साँसकर' जमा कीजिए। आप पिछले तीन दिनों से दिन में पाँच दिन की सीमा से अधिक मुस्करा रहे हैं। क्यों न आपके ख़िलाफ़ मुस्कान विधेयक के अंतर्गत कार्यवाही की जाए?' लेकिन पंकज बाजपेयी ने ऐसा कुछ नहीं किया। एक इंसान और सत्ता में यही फ़र्क़ होता है।
पंकज बाज़पेयी बोले-'बढ़िया है।'
इस बीच गाड़ी का ना 'नज़र मुआइना' करते हुए बोले-'गाड़ी बढ़िया है।' इसके बाद कोई डिवाइस लगवाने की सलाह देते हुए बोले -'दिल्ली से लगवाना। वहाँ बढ़िया मिलता है।'
हमको पता भी नहीं था कि किस डिवाइस की बात कर रहे थे पंकज । अब तो याद भी नहीं कि दोस्तों से पूछ लें -'ये डिवाइस लगवाने के बारे में बारे में आपका क्या विचार है?'
आजकल घर परिवार की तमाम चीजें, ख़ासकर इलेक्ट्रानिक सामान, के बारे में लोग सोशल मीडिया पर राय पूछते हैं। क्या पता कल को धनिया/मिर्च के ब्रांड पर भी लोग राय माँगते हुए पूछें - 'ये रंगा/बिल्ला चाय किसी ने इस्तेमाल की है? कैसा स्वाद है?'
बहरहाल पंकज बाजपेयी से हाल-चाल के फ़ौरन बाद उन्होंने फ़रमाइश की -'आज नोट जलाने के लिए दे जाना। हम तुमको नंबर देंगे। बदल लेना। नए नोट मिलेंगे।'
पहले जब पंकज नोट जलाने की बात करते थे तो मुझे लगता था कि ऐसे ही उल्टी -सीधी बातों का सिलसिला है। लेकिन बाद में एहसास हुआ कि यह उनका पैसे माँगने का अन्दाज़ है। पहले तो देते भी नहीं थे। लेकिन बाद में मुलाक़ातों का सिलसिला बढ़ा, नियमित हुआ तो कुछ न कुछ ले ही लेते हैं नोट -'जलाने के लिए।'
यह बीते छह-सात की जानपहचान के कारण है। उनसे अपनापा हो गया है। इसलिए कुछ पैसे दे देना ऐसा लगता है मानो कोई परिचित अपना हक़ माँग रहा है। अनजान लोगों को अभी भी कुछ मुफ़्त देने में संकोच रहता है। किसी को कुछ टिप दे देना, ज़रूरत मंद को अपनी तरफ़ से देना अलग बात।
ऐसे ही एक दिन दवा लेने गए। दुकान के बाहर एक बच्चा, जिसके होंठ ऐसे लाल थे मानो गुलाबी लिपस्टिक लगी हो, मिला।हमने साइकिल खड़ी की। मुझे देखते ही बोला -'बीस रुपए दे दो। टिक्की खानी है।'
बच्चा देखने में बच्ची सरीखा भी लग रहा था। उसके पैसे माँगने पर मैंने दिए नहीं। दवा लेकर बाहर आया तो बच्चा वहीं टहल रहा था। हमने उससे पूछा -'कहाँ रहते हो? घर में कौन है? यहाँ पैसे क्यों माँग रहे हो?'
लेकिन बच्चे ने कोई जबाब नहीं दिया। चुपचाप इधर-उधर चला गया। लेकिन हमको रास्ते भर यह लगता रहा कि उसको पैसे न देते लेकिन टिक्की खिला देते। वहीं पास ही दुकान है। यह बात अगले दिन तक ध्यान रही।
दो दिन बाद फिर दवा लेने उसी दुकान गए। बच्चा वहीं टहल रहा था। लेकिन वह कुछ बोला नहीं। हमने दुकान वाले से पूछा कि यह बच्चा कौन है ? वह बोला -'ऐसे ही घूमता रहता है। मुझे पता नहीं।'
दुकान से निकलकर बच्चे दिखा तो मैंने उससे पूछा -'कहाँ रहते हो यहाँ?'
उसने चिढ़कर जबाब दिया -'तुमसे क्या मतलब? '
यह कहकर वह इधर-उधर हो गया। हम चुपचाप साइकिल स्टार्ट करके चले आए। रास्ते में और अभी भी सोच रहे हैं कि उसके बारे में जानकारी लिए बिना उसको चुपचाप टिक्की खिला देनी चाहिए। अब तय किया कि अगली बार बच्चा मिला तो उसके बारे में बिना कोई सवाल किए अगर वो कहेगा तो टिक्की खिला देंगे।
बहरहाल बात पंकज बाजपेयी की हो रही थी। वो जहां घूमते-टहलते हैं वहाँ उनको लोग अच्छे से जानते हैं। उसके बारे में अच्छी राय रखते हैं। पंकज भी हर गुजरने वाले से नहीं माँगते। उनका अपना स्टेटस है। उनको देने वाले नियत हैं। आसपास के लोगों ने बताया कि दस-बीस लोग उनको कुछ न कुछ दे जाते हैं। उनको देखते ही पंकज लपककर उनसे मिलते हैं और अपना हक़ लेकर वापस अपने ठीहे पर वापस आ जाते हैं।
पहले जब मैं मिला था उनसे तो सोचता था कि उनका इलाज करवाना चाहिए। लेकिन अब लगता है ये ऐसे ही ठीक हैं। इलाज के बाद अगर ठीक हो गए तो इनका जीना मुहाल हो जाएगा।
साथ चाय पी मामा की दुकान पर पंकज ने। अपने थैले में रखे बड़े कप में चाय लेकर पंकज वहीं टहलते हुए चाय पीने लगे। मामा चाय वाले और अग़ल-बग़ल के लोग पंकज बाजपेयी से चुहल करते रहे। वैसे तो मामा चाय वाले पंकज को चाय मुफ़्त पिलाते हैं लेकिन हमारे साथ पी पंकज की चाय के पैसे मुझसे ही लिए उन्होंने।
पंकज बाजपेयी ने शिकायत की मुझसे -'माल नहीं लाए इस बार भी।'
माल मतलब दही, जलेबी,समोसा। पहले जब कैंट से जाते थे तो ले जाते थे -'तिवारी स्वीट हाउस से।' रास्ते में पड़ती थी दुकान। अब जाते हैं तो ध्यान से उतर जाता है।कोई दुकान भी नहीं मिलती। अगली बार ले जाएँगे।
चलते समय बग़ल की मिठाई की दुकान पर बैठने वाले नीरज की शिकायत की पंकज ने -'ये हमको मिठाई नहीं देते।इनसे कह दो दे दिया करें।'
नीरज के बग़ल की दुकान पर 'कनपुरिया चाय वाला' का बोर्ड लग गया था। कानपुर के नाम पर तमाम दुकाने होंगी कानपुर। हर शहर तरह-तरह से लोगों के पेट पालने में सहयोग करता है। कुछ दुकाने कानपुर के परिवहन के कोड ( 78) के नाम हैं। तमाम किताबें, लेख के शीर्षक कनपुरिया जुमले 'झाड़े रहो कलट्टरगंज' के नाम हैं। मेरी भी एक किताब का नाम है -'झाड़े रहो कलट्टरगंज'। Shambhunath Shukla जी ने भी अपने चैनल का नाम 'झाड़े रहो कलट्टरगंज' रखा है।
किसी शहर का नाम और उससे जुड़े जुमलों/क़िस्सों का कोई कापी राइट नहीं होता। हर शहर अपने लोगों के लिए माँ के आँचल की तरह होता है जिससे उसके रहने वाले सहज रूप से जुड़ना चाहते हैं।
नीरज की और मामा की दुकान के बीच में अनवरगंज स्टेशन को जाने वाली सड़क है। बचपन में अपन इस स्टेशन से ही गाँव जाने के लिए ट्रेन पकड़ते थे। अब तो वर्षों हुए यहाँ आए। बाहर से ही देख लेटे हैं। आना-जाना तो गाड़ी से होता है।
कोहली के बारे में पूछा।कोहली नाम न जाने कैसे पंकज के दिमाग़ में समाया हुआ है। वे अक्सर कहते हैं -'कोहली बच्चा पकड़कर ले जाता है। लड़कियों के साथ गंदा काम करता है। कोहली को पकड़वाओ।'
पंकज ने अपने हाथ में पहनी प्लास्टिक की अंगूठी भी दिखाई। अंगूठी में दिल का आकार बना था।
चलते समय पंकज को 'जलाने के लिए कुछ नोट' नोट दिए।अगली बार जल्दी आने का वायदा किया और चल दिये।

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Sunday, June 30, 2024

लखनऊ के शीरोज़ कैफ़े में ‘वसंत है’ का विमोचन


परसों एक बार फिर लखनऊ में शीरोज कैफे जाना हुआ । अवसर था निरुपमा दीदी Nirupma Ashok के काव्य संग्रह -'वसंत है' के विमोचन का। पहली बार भी पुस्तक विमोचन के सिलसिले में ही आना हुआ था। पूरे आठ साल आठ दिन पहले। पल्लवी त्रिवेदी Pallavi Trivedi i की किताब 'अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा' और मेरी पुस्तक 'बेवकूफी का सौन्दर्य' का साझा विमोचन हुआ था। उस समय कुश Kush Vaishnav नए-नए प्रकाशक बने थे। अपने नए शुरू किये ( रुझान प्रकाशन) से प्रकाशित किताबों की पहली खेप का धूमधाम से विज्ञापन और विमोचन किया था।
निरुपमा दीदी हिन्दी की प्राध्यापिका रहीं हैं। लखीमपुर के भगवानदीन आर्य कन्या डिग्री कालेज के प्राचार्या पद पर कई वर्ष काम किया। पठन-पाठन में रूचि के कारण प्राचार्या पद के बाद भी अध्यापन का कार्य जारी रखा। उनकी अनेक शिष्याएं भी कल कार्यक्रम में उपस्थित थीं।
जिस शिद्दत से वे अपने कालेज में दीदी के क्लास के दिनों की याद कर रहीं थीं उससे अंदाज लगाया जा सकता है कि वे कितनी लोकप्रिय शिक्षिका रहीं हैं।
निरुपमा दीदी ने भले ही अपना शोध प्रबंध 'कहानी'(हिन्दी नयी कहानी में आंचलिक तत्व) पर लिखा हो और भले ही उनके शुरुआती प्रकाशन कहानी के रहे हों लेकिन उनका मन सहज रूप में कविता में रमता है।
पिछले कुछ समय से अभिव्यक्ति के नए माध्यम फेसबुक पर उनकी कवितायें नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं। रिटायरमेंट पहले तक , दैनंदिन जीवन की आपाधापी और प्रशासनिक व्यस्तता के चलते उनका सृजन कार्य सारगर्भित वक्तव्यों, समय-समय पर लिखे जाने वाले लेखों और विभिन्न अवसरानुकूल लिखे जाने संदेशो के आसपास ही बना रहा । किसी संस्था की जिम्मेदारी व्यक्तिगत सृजन को प्रभावित तो करती ही हैं। यह सुखद बात है कि तमाम प्रशासकीय जिम्मेदारियों से मुक्त होने का बाद दीदी का नियमित लेखन शुरू हुआ है।
'वसंत है' की कवितायें पांच भागों -प्रकृति, प्रेम, स्त्री ,कोरोना काल और काल चिन्तन में विभाजित हैं।
कविता संग्रह का नाम 'वसंत है' पढ़कर बचपन में पढी बात सहज रूप से याद आ गयी -'वनन में , बागन में बगरयो वसंत है'।
'वसंत है' के अनुसार वसंत कहाँ है देखिये:
"पेड़ की प्रतीक्षा में ही
वसंत है
झर-झर झरता
वसंत है।"
संग्रह की कवितायें लगभग एक स्ट्रोक में बनाए गए किसी कलाकार के चित्र सरीखी हैं। कविता कोई हो लेकिन हरेक के मर्म में मूल संवेदना 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' की भावना से संचालित उद्दात जीवन मूल्यों के प्रति सहज आग्रह है। अपनी कविता संदेश में लिखती हैं :
"तुम रहो सदा पावन तन मन,
दिल में करुणा-सागर लहराता हो!
सेवा,उत्सर्ग,आशीष अग्रजों का,
ताना-बाना बुनते नित जीवन-चादर का!
तुम बाँटो मुस्कान सदा अविरल,
मोती-सी हँसी लुटा डालो!
विहरो तितली बन जग-कानन में,
ख़ुशबू बन महको हवा के आँचल में!"
संग्रह में शामिल कई कविताएँ दीदी के फेसबुक वाल पर मौजूद हैं। वहां पहुंचकर पढ़ सकते हैं।
कार्यक्रम में निरुपमा दीदी और Ashok Kumar Avasthi भाई साहब के कई इष्टमित्र, आत्मीय स्वजन ,बचपन के, युवावस्था के , कालेज ,विश्वविद्यालय जीवन से जुड़े लोग विद्यार्थी ,संबंधी मौजूद थे।
कार्यक्रम में शिक्षा जगत , प्रशासनिक और पुलिस महकमे से जुड़े लोग भी थे। दूर-दूर से लोग आये थे। कानपुर से अपन भी थे। मुख्य अतिथि पूर्व कुलपति कानपुर विश्विद्यालय जेवी वैशम्पायनजी के अलावा सबसे उल्लेखनीय उपस्थिति दीदी के सहपाठी रहे जय नारायण बुधवार जी Jai Narain Budhwar और अवधेश निगम जी Avdhesh Nigam की थी। दोनों ने अपनी पुरानी यादों को साझा किया जब तीनों का साझा कहानी संग्रह तब प्रकाशित हुआ था जब ये सभी साथी लिखना शुरू कर रहे थे।
कार्यक्रम का संचालन अशोक अवस्थी भाई साहब ने किया। भाई साहब लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि विभाग में प्रोफ़ेसर , विभागाध्यक्ष और विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहे। भारतीय संविधान से सम्बंधित अनेक लेख पत्र-पत्रिकाओं में लिखे। उनका विपुल पाठक वर्ग है। वर्षों तक अपने ब्लॉग 'विधिचर्चा' पर लेख लिखते रहे। काफी समय से स्थगित यह रचनात्मक कार्य फिर से शुरू होने की आशा है।
कार्यक्रम शीरोज कैफे में हुआ जहां लोगों के बैठने की व्यस्वथा है। लोग आते गए, ,कार्यक्रम से जुड़ते गए। यादें ताजा होती रहीं। साझा होती रहीं। लगभग सभी ने दीदी से जुडी अपनी यादें साझा की। कविता संग्रह पर बात कम हुई।
दीदी के सहपाठी रहे जय नारायण बुधवार जी ने दीदी के रचना कर्म पर बात करते हुए अपनी राय जाहिर की कि उनकी कुछ संस्कृत निष्ठ कवितायें पाठक से अधिक ध्यान और मेहनत की मांग करती हैं।
जयनारायण वुधवार जी अपनी साहित्यिक पत्रिका 'कल के लिए' के माध्यम से साहित्य जगत में सार्थक हस्तक्षेप और योगदान देते रहे हैं।
कुछ श्रोताओं ने दीदी के कविताओं का पाठ भी किया। हमने भी ओपन बुक एक्जाम की तरह संग्रह से दो कविताओं के अंश पढ़कर अपने काव्यानुराग का परिचय दिया। मेरा उल्लेख करते हुए दीदी ने लिखा है :
"प्रिय अनूप का काव्यनुराग विशेष रूप से प्रेरणादायी रहा। मेरी उन्हें अनंत शुभकामनाएं। काव्यानुराग ने उन्हें कवि से कब प्रख्यात व्यंग्यकार बना दिया , कह नहीं सकती।"
बहरहाल एक जांच का विषय भी मिल गया कविता संग्रह के बहाने। कवि से व्यंग्यकार बनने और प्रख्यात होने के मामले की जांच कराई जाए। मुझे पक्का पता है कि हमको अच्छे से जानने वाले मित्र कहेंगे कि ये न तो कवि रहे, न व्यंग्यकार और प्रख्यात तो कभी हुए ही नही। लेकिन किसी के कहने से क्या होता है ? किताब में लिखा है वह सच माना जाएगा।
कविता संग्रह में सभी भागों के खूबसूरत चित्र प्रख्यात कलाविद डा अवधेश मिश्र ने बनाए हैं। उनकी तूलिका ने 'वसंत है' का श्रृंगार किया है।
दीदी ने अपने कविता संग्रह का समर्पण 'संभावनाओं के अंकुर अनय (दीदी की बिटिया Anvita Bhuvan Mishra और दामाद Saurabh Mishra का बेटा) और मिहिका ( दीदी के पुत्र Apoorva Bhumesh और बहू Madhavi Khare की बिटिया) को' किया है। दोनों अभी तक अपने बचपने और खेल-कूद की दुनिया में मगन हैं । फिलहाल हिन्दी और कविताओं से कोई नाता नहीं। अनय तो अमेरिका में है फिलहाल। मिहिका जरुर वहीं खेल रही थी जब उसकी दादी की किताब का लोकार्पण हो रहा था। शायद ये दोनों नवांकुर नरेश सक्सेना जी Naresh Saxena जी की कविता की भावना के मुताबिक़ इन कविताओं को सबसे अच्छे से समझेंगे:
शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है,
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है ।
समझता है सबकी मुस्कान
सभी के अल्ले ले ले ले,
तुम्हारे वेद पुराण कुरान
अभी वह व्यर्थ समझता है ।
अभी वह अर्थ समझता है ।
समझने में उसको, तुम हो
कितने असमर्थ, समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
उसी से है, जो है आशा ।
लोकार्पण की तैयारियों को देखकर मिहिका कह रही था -'आज दादी का बर्थडे है'।
एक तरह से सही ही है उसकी बात। एक रचनाकार के लिए उसकी रचना उसका जन्म होना ही है।
कविताओं के प्रथम पाठक और फ़ेसबुक पर पोस्टकर्ता अशोक भाई साहब रहे जिनके प्रति आभार की बात को दीदी ने 'शब्दों से परे' कहकर टरका दिया । दीदी के दामाद सौरभ मिश्रा ने दीदी के अमेरिका प्रवास के दौरान टाइपिंग का काम किया। प्रकाशन में मेहनत अपूर्व-माधवी और भाई साहब ने की।
दीदी को उनके कविता संग्रह के प्रकाशन और लोकार्पण की बधाई और शुभकामनाएँ। पूरा विश्वास है कि एक बार फिर शुरू हुआ उनका रचनाकर्म अनवरत जारी रहेगा और शीघ्र ही हमें नई कृतियों के लोकार्पण का गवाह होने का मौक़ा मिलेगा।
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