Sunday, April 20, 2025

श्रीलंका के छुटके इंग्लैंड (नुआरा एलिया हिल स्टेशन ) में रावण झरना


 श्रीलंका की याला सफ़ारी से नुआरा एलिया (Nuwara Eliya) तक पहुँचते हुए रात हो गयी थी। नुआरा एलिया श्रीलंका का प्रसिद्ध हिल स्टेशन है। आसपास चाय के बाग़ान होने के कारण कुछ लोग उसे श्रीलंका का उँटी कहते हैं और कुछ लोग लिटिल इंग्लैंड मतलब छुटका इंग्लैंड। नुआरा एलिया नाम का अर्थ है "मैदान पर शहर" या "प्रकाश का शहर"। सुरम्य परिदृश्य और समशीतोष्ण जलवायु के साथ यह शहर नुवारा एलिया जिले की प्रशासनिक राजधानी है।

नुआरा एलिया को को बसाने का श्रेय सैमुआल ब्रेकर (Sir Samuel White Baker) को जाता है। सैमुआल ब्रेकर के बारे में पता किया तो पता चला कि भाई साहब अंग्रेज खोजकर्ता, अधिकारी, प्रकृतिवादी, शिकारी, इंजीनियर, लेखक और (दास प्रथा) उन्मूलनवादी थे । एक इंसान में इतनी क़ाबिलियत एक साथ देखकर ताज्जुब हो सकता है किसी को भी। लेकिन वो ऐसे थे तो थे।
याला से नुआरा एलिया तक तो बस मज़े-मज़े में आई। लेकिन ऊँचाई पर पहुँचते ही हाँफने लगी। हाँफते-हाँफते खड़ी हो गयी। इंजन गरम हो गया था। हम लोगों को लगा कि कहीं उतर का धक्का न लगाना पड़ा। लेकिन कुछ देर बाद स्टार्ट हो गयी बस। धीरे-धीरे चलते हुए आगे बढ़ी बस। एक जगह और रुकी। रुकते-रुकते पहुँच गए होटल।
होटल के कमरे दो मंज़िले थे। नीचे बैठने, चाय-पानी का जुगाड़ ऊपर सोने का हिसाब। बड़ा सा खुला टाइप डाइनिंग हाल ऐसे लग रहा था जैसे शादी का मंडप सजाया गया हो। ठंडा गरम जो खाना मिला खाकर हम लोग सो गए।
सुबह उठे तो पहाड़ की लिटिल इंग्लैंड नुआरा एलिया की ख़ूबसूरती का दीदार हुआ। हिल स्टेशन पर चमकती धूप, साफ़-सुथरी, खिली-खिली धूप देखकर ऐसा लग रहा था मानों किसी ब्यूटी पार्लर से होकर आई हो। मन किया भी कह दें धूप से कि हमसे मिलने के लिए ब्यूटी पार्लर के पैसे खर्च करने की क्या ज़रूरत थी। लेकिन फिर कहा नहीं। कहते तो क्या पता उदास हो जाती। किसी को उदास देखना अच्छा नहीं लगता।
नाश्ता करके होटल छोड़ दिया हमने। पहाड़ी, घुमावदार रास्तों पर आहिस्ते-आहिस्ते चलते , बस में गाना सुनते-सुनाते, सड़क से लोगों को आते-जाते देखते, पहाड़ की ख़ूबसूरती निहारते हम लोग आगे बढ़े।
आगे एक जगह झरना दिखा। झरने का नाम है - रावण झरना (Ravana Falls)। कहा जाता है कि रावण ने राजकुमारी सीता जी का अपहरण कर लिया था, और उसे इस झरने के पीछे की गुफाओं में छिपा दिया था, जिसे अब रावण एला गुफा के रूप में जाना जाता है । उस समय, गुफा जंगल के बीच घने जंगलों से घिरी हुई थी।
25 मीटर ऊँचा रावण झरना श्रीलंका के सबसे चौड़े झरनों में से एक है।
रावण झरना एक खूबसूरत झरना है। झरने के पास रेलिंग लगी हुई है। रेलिंग के साथ खड़े होकर लोग फ़ोटो खिंचा रहे थे। हम लोगों ने भी खिंचाए।
झरने के पास ही रावण की गुफा ( "रावण गुहा" ) है, जहां रावण ने सीता जी को छिपाया था। सड़क से दूर होने के कारण हम लोग इसे देखने नहीं जा पाए।
रावण झरने के पास स्थित दुकानों के नाम भी रावण फल भंडार , रमेश स्टोर, नंदा स्टोर जैसे दिखे। रावण के नाम से कई दुकानें थीं। देखकर ऐसा लगा कि सोने की लंका की के राजा रावण की माली हालत बिगड़ जाने पर गुज़ारे के लिए दुकान खोल ली हो। समय इसी तरह कभी इतिहास में महान लोगों से इसी तरह से मज़े लेता है। कभी बड़े-बड़े तीसमार खां रहे लोगों को उनके नाम की परचून की, पान की, फल की दुकान के गल्ले पर बिठा देता है।
रावण झरने के बाद हम लोग श्रीलंका का प्रसिद्ध नौ मेहराबों वाला रेलवे पुल देखने गए।

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Saturday, April 19, 2025

समुद्र तट से जंगल सफ़ारी होते हुए हिल स्टेशन



 होटल लाँग बीच देखकर ऐसा लगता था कि होटल को एथनिक लुक देकर बनाया गया था। पुराने जमाने के रंग-ढंग में नया होटल। फ़र्नीचर, रखरखाव सब कुछ ऐसा कि देखकर एहसास हो किसी पुराने समय में रह रहे हों।

सुबह हम लोग होटल के पास ही स्थित समुद्र तट घूमने गए। कुछ देर समुद्र किनारे टहलते रहे। फ़ोटो खींची। वीडिओ बनाए। लौट आए।
जब हम होटल से समुद्र तट की तरफ़ जा रहे थे तो पीछे से अनन्य ने अपने कमरे की बालकनी से हम दोनों को समुद्र तट की तरफ़ जाते देखा। उसने हम दोनों को साथ-साथ, पास-पास और हाथ पकड़कर चलने को कहा। हमने वैसा किया। उसने पीछे से फ़ोटो खींची। फ़ोटो में समुद्र तट, नीला आसमान, बालू, नारियल के पेड़ और इन सबके बीच हम दोनों की फ़ोटो है। बहुत ख़ूबसूरत। फ़ोटो हमारे होने की कारण ख़ूबसूरत नहीं है। हमको तो पहचानना भी मुश्किल अगर कोई बताए न। फ़ोटो की ख़ूबसूरती प्रकृति की सुंदरता के कारण है।
सुबह का नाश्ता करने के लिए मेस हाल में गए। सबसे किनारे की मेज़ पर बैठकर समुद्र की लहरें देखते हुए नाश्ता करना अलग ही आनंद देने वाला लगा।
नाश्ता करने के बाद हम लोगों ने होटल छोड़ दिया। हमारी अगली मंज़िल श्रीलंका का याला राष्ट्रीय उद्यान (Yala National Park) थी।
रास्ते में सड़क के दोनों तारफ लगातार समुद्र और होटल दिखाते रहे। बीच-बीच में बस्ती भी। सड़क पर दुपहिया पर चलने वाली सभी सवारियाँ हेलमेट पहने थीं। एक में तो तीन सवारी दिखीं, तीनों हेलमेट पहनें थीं। शराब और बीयर की नामपट्ट वाली दुकाने जगह-जगह दिखीं।
हाईवे डबल लेन वाले दिखे। टोल बूथ पर टोल टैक्स नक़द जमा हो रहा था। अभी फ़ास्टैग की व्यवस्था शायद शुरू नहीं हुई है वहाँ। भारत में टोल टैक्स फ़ास्ट टैग से कटता है, श्रीलंका में नक़द उगाही होती है। अमेरिका में छह साल पहले हमने देखा था कि टोलटैक्स चलती गाड़ी में कट जाता है। गाड़ी रुकने या धीमे होने की ज़रूरत नहीं होती। तकनीक और सेवायें अलग-अलग देशों में अपने -अपने हिसाब से पहुँचतीं है।
याला सफ़ारी के रास्ते में एक जगह बस रुकी। वहाँ से ट्रिप के मुख्य गाइड चनक जुड़े। अपना परिचय देने के बाद उन्होंने बताया कि वे एक दूसरी ट्रिप से आ रहे हैं। वहाँ जुड़े रहने के करना यहाँ आने में देर हुई।
अपना परिचय देने के साथ चनक ने ट्रिप लीडर अनन्य की तारीफ़ की यह कहते हुए -"बाक़ी ट्रिप लीडर लोगों को टूर पर भेज देते हैं। साथ नहीं आते। अनन्य सर खुद आते हैं। लोगों का ख़्याल रखते हैं।"
बाद में चनक ने यह घोषणा की कि अनन्य शादी होने के बाद जब भी श्रीलंका घूमने आएंगे तब उनका पूरा टूर वो स्पांसर करेंगे। उस मौक़े का सबको इंतज़ार है।
याला सफ़ारी में घूमने के की फ़ीस 5000 भारतीय रुपए है। वहाँ प्रवेश के पहले हमारे पासपोर्ट जमा कराए गए। फिर याला सफ़ारी की जीप से हम लोग घूमने निकले। जंगल भ्रमण।
जंगल घूमने पर जगह-जगह जानवर दिखे। घड़ियाल तालाबों किनारे ऊँघते दिखे। मोर, हिरन, गाय, भैंसे, बंदर, हाथी। हम उन जानवरों को देख रहे थे पैसे देकर। जानवर हम लोगों को बिना पैसे के देख रहे थे।
हाथी कई जगह अकेले या परिवार के साथ आते-जाते, खाते-पीते दिखे। जहाँ कोई जानवर दिखता वहाँ सफ़ारी वाला जीप रोक देता और हम लोग जानवर देखते। फ़ोटो खिंचते, वीडियो बनाते।
क़रीब चार घंटे के जंगल भ्रमण के बाद हम वापस आए। रास्ते में एक जगह गायों का झुंड दिखा। शायद वह भी घर वापस लौट रहा था। सफ़ारी जीप ने हमको वहाँ छोड़ दिया जहाँ पर हमारी बसें थीं। हम लोग बस में बैठकर अपनी अगली मंज़िल की तरफ़ चल दिए। हमारी अगली मंज़िल नुआरा एलिया (Nuwara Elliya ) थी। शाम क़रीब साढ़े पाँच बजे हम लोग याला नेशनल पार्क से चले थे। 122 किलोमीटर दूर नुआरा एलिया पहुँचते-पहुँचते रात के साढ़े आठ बज गये थे।
नुआरा एलिया श्रीलंका का हिल स्टेशन है। इस तरह सुबह समुद्र तट से चलकर जंगल होते हुए रात तक हम हिल स्टेशन पहुँच गए। एक दिन में तीन खूबसूरत पड़ाव।

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Friday, April 18, 2025

इंसान कहे जाने वाले, इंसान बहुत कम मिलते हैं


 फ़ेसबुक पर कुछ लोग इतने ग़ुस्से में दिखते हैं कि उनकी पोस्ट पढ़ते हुए सहम जाता हूँ। कभी कभी किसी पोस्ट पर इतनी हड़काऊ टिप्पणियाँ आती हैं कि उनको दुबारा पढ़ते हुए डर लगता है। ऐसी टिप्पणी करने वाले अधिकतर लोगों के प्रोफ़ाइल बंद होते हैं।

जिन पोस्ट्स में धर्म आधारित मसले होते हैं उनमें यदि कोई अल्पसंख्यक समुदाय के पक्ष में अपने तर्क रखता है तो अक्सर बहुसंख्यक समुदाय के कुछ लोग इतनी ग़ुस्से से भरी टिप्पणी करते हैं कि लगता है सामने होते तो पीट ही देते।
ऐसे धर्म के नुमाइंदे अपने धर्म के उदार मूल्यों को एकदम से भूल जाते हैं। "उदारचरितानाम वसुधैव च कुटुमबकम" को अपने जीवन से एकदम से ख़ारिज कर देते हैं।
हाल यह है कि अब तो यह देख कर ताज्जुब भी नहीं होता कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ग़ैर संवैधानिक बातें धड़ल्ले से कहते दिखते हैं। सुप्रीम कोर्ट संविधान प्रदत्त अधिकार के तहत वक़्फ़ बोर्ड के क़ानून की समीक्षा करते हुए कुछ सवाल पूछता है उसको देश के मंत्री और उपमहामहिम सुप्रीम कोर्ट द्वारा कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण बताते हैं। मासूम सी शक्ल वाले भाई साहब इतनी ऊलजलूल हरकतें करते हैं कि ताज्जुब होता है देखकर कि कैसे लोग हमारे देश के उच्च पदों पर विराजमान हैं।
तमाम पढ़े-लिखे, ज़िम्मेदार पदों पर काम कर चुके लोग इतनी बचकानी, घृणित, शर्मनाक बातें लिखते हैं कि उनकी सोच देखकर ताज्जुब होता है। यह कल्पना भयावह लगती है कि उनके अधीन दूसरे धर्म के लोग कैसे काम करते होंगे।
लोग इतना ग़ुस्से में हैं कि अपने आदर्श की छाती की नाप फिर से करने लगते हैं। उनको लगता है कि हमारा आराध्य हमारे ग़ुस्से के अनुसार काम क्यों नहीं कर रहा है। अपना आराध्य तक बदलने की बात करने लगते हैं, ऐसा आराध्य जो उनके ग़ुस्से को बेकार न जाने दे।
वक़्फ़ बोर्ड क़ानून पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सवाल पूछे। उसपर इतना ग़ुस्सा हैं कुछ लोग कि उनकी अपनी कोई अदालत होती तो माननीय सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ ही मुक़दमा कर देते। अवमानना का नोटिस जारी कर देते।
अल्पसंख्यक समुदाय से घृणा करने वाले, उनके बारे में नकारात्मक धारणायें बनाने वाले लोगों में शायद ही कोई उनके साथ कभी रहे हों। शायद ही कभी उनके साथ उनकी दोस्ती रही होगी, मिलना-जुलना, उठना -बैठना रहा हो। अगर रहा होता तो शायद इतना भ्रम नहीं होता एक-दूसरे के बारे में।
आज दुनिया में कट्टरता इतनी हावी है कि उदार, उदात्त, सहज मानवीय मूल्यों की वकालत करने वाले लोगों को देश, दुनिया और समाज का दुश्मन साबित किया जा रहा है। हो भी जा रहा है। पूरा तंत्र सा लगा है इस काम में।
इसका कारण शायद यह भी है ऐसे कट्टरपंथी लोग चिंदीचोरी करके, झूठे वादे करके, भ्रम फैलाकर ताकत में आए हैं। नकारात्मक मूल्यों की स्थापना करके उनके काम बनाते हैं तो उनके प्रसार में लगे रहते हैं।
संविधान के नाम पर शपथ लेकर काम करने करने वाले आए दिन ग़ैर संवैधानिक हरकतें करते हैं। भाषण देते हैं। लोगों को भ्रमित करते हैं। लोग होते भी हैं।
आज देश में किसी भी समुदाय में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी बातें लोग इस कारण सुनते हैं कि वह क़ायदे की बात करता है। धर्मपाल अवस्थी जी की एक कविता याद आती है जिसमें नेताओं को 'औना-पौना-बौना' बताया गया था।
हम जिस भी देश, समाज, धर्म, जाति, समुदाय में पैदा हुए हैं, पले, बढ़े हैं वह सिर्फ़ संयोग है। हम राणा के वंशज हैं या औरंगज़ेब के यह भी संयोग है। अपने संयोग पर गर्व करके और दूसरे के संयोग को नीची नज़र से देखना अपने में बेवकूफ़ी है। किसी भी देश, धर्म, जाति, समुदाय का व्यक्ति होने से पहले हम इंसान हैं। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
इंसानियत की बात से साथ साल पहले भोपाल में हुई बेगसाहब का हुई मुलाकात का क़िस्सा याद आ गया। उन्होंने कहा था :
"'सबसे बड़ा रिश्ता इंसानियत का होता है।' यह बात तो तमाम लोग कहते आये हैं। रोज इंसानियत का अंतिम संस्कार करने वाले तक इंसानियत की बात करते रहते हैं। लेकिन बेग साहब ने इसको एक उदाहरण से समझाया । बोले -' आप किसी जंगल मे अकेले फंस गए हों। जंगल का डर, हौवा आपके जेहन में हावी हो जाएगा। ऐसे में कोई इंसान आपको वहां दिख जाए तो आपका डर फौरन खत्म हो जाता है। भले ही वह आदमी गूंगा-बहरा हो। वह अपने इशारों से आपको जंगल से बाहर ले आएगा। उस समय यह फर्क नहीं पड़ता कि अगला हिन्दू है कि मुसलमान कि ईसाई।
बेग साहब अपने किस्से सुनाते हुए अपनी बात भी कहते गए। बोले -'इंसान जिन लोगों बीच रहता है उनसे ही तौर तरीका सीखता है। इसलिए अपने से अलग कोई अगर व्यवहार करता है तो यह नहीं समझना चाहिए कि वह गलत ही है। उसका नजरिया भी समझना चाहिए। '" (पोस्ट का लिंक टिप्पणी में)
इंसान और इंसानियत यह कविता भी याद आ गयी :
"इंसान कहे जाने वाले, इंसान बहुत कम मिलते हैं
पत्थर तो मंदिर-मंदिर हैं, भगवान बहुत कम मिलते हैं।"
विडम्बना है कि दुनिया की बढ़ती आबादी में इंसानों की संख्या कम होती जा रही है।

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Tuesday, April 15, 2025

होटल में पानी में कूदे- छपाक



 


गैले के क़िले से निकलते-निकलते रात शुरू हो गई थी। हम लोग होटल लाया बीच सुबह छोड़ आए थे। अगला ठिकाना नए होटल में था- होटल लाँग बीच।

रात क़रीब आठ बजे हम लोग होटल पहुँचे। बस से सामान उतरवाया गया। सारे सामान लाबी में लाबी में रखकर होटल लोग अपने-अपने कमरे की तरफ़ जाने लगे। हमारा सामान हमारे कमरे में पहुँच चुका था। हमको भी कमरे में पहुँचना था।
कमरे में पहुँचने से पहले सोचा कि काउंटर से इंटरनेट का वाई-फ़ाई का पासवर्ड ले लिया जाए। बैग हाथ में था। बैग में लैपटाप, चार्जर, मोबाइल और कुछ और काग़ज़ थे। पहले भी कई बार होटल के गेट से काउंटर पर आना-जाना हो चुका था। इस बार भी हुआ लेकिन अलग तरह से हुआ।
हुआ यह कि मुख्य द्वार से काउंटर तक की दूरी तक कई खम्भे थे। हर बार हम खंभों की दाईं तरफ़ से होते हुए काउंटर तक गए। इस बार उधर कुछ लोग खड़े थे। सो हम लपककर बाईं तरफ़ से काउंटर की तरफ़ बढ़े। उधर से काउंटर थोड़ा नज़दीक भी लगा।
लेकिन हम जैसे ही खम्भे की बाईं ओर से होकर आगे बढ़े वैसे ही 'छपाक' की आवाज़ हुई। जब तक हम कुछ समझें तक तक पता चला हम घुटनों तक पानी में थे। बैग और मोबाइल हाथ से छूटा तो नहीं लेकिन पानी में फ़ौरन नहा गया। पता चला कि खम्भे के बग़ल में एक कम गहराई का तालाब था। लेकिन वहाँ कोई रोशनी नहीं थी। इसलिए हमको दिखा नहीं। पानी के ऊपर पाँव रखते ही गुरुत्वाकर्षण के नियम का सम्मान करते हुए हम पानी में धँस गए।
हालाँकि पानी गहरा नहीं था लेकिन तलहटी में पूरा कीचड़ था। उसने हमारे जूते को गले लगाकर स्वागत किया। कपड़े भी भीग ही गए। हालांकि नीचे गिरते ही हम फ़ौरन ऊपर आ गये। बैग और मोबाइल को पोंछा। पानी दोनों के अंदर नहीं गया था लेकिन हमको लगा कि क्या पता मोबाइल का मदरबोर्ड ख़राब हो गया हो। लेकिन बाद में पता चला ऐसा कुछ हुआ नहीं।
शरमाते हुए पानी से बाहर आकर हमने काउंटर पर सलाह दी कि गेट के पास तालाब है तो वहाँ रोशनी का इंतज़ाम तो करना चाहिए। काउंटर वाले ने चुपचाप सुन ली मेरी सलाह। कोई कनपुरिया होता तो पलट के कहता -"रोशनी के इंतज़ाम तो हो जाएगा लेकिन आपको भी देखकर चलना चाहिए।" कानपुर में अपनी गलती मानने की ग़लत रिवाज नहीं है।
कमरे में पहुँचकर कपड़े बदले। कोई चोट न लगने का साइड इफ़ेक्ट यह हुआ कि अगले कई दिनों तक पानी में गिरने से लगे कीचड़ की बदबू की शिकायत कई दिन तक होती रही। देखकर न चलने का इल्ज़ाम लगता रहा सो अलग- "देखकर चलते नहीं , ध्यान तो मोबाइल में रहता है" घराने के मुफ़्त उलाहनों का जुगाड़ हो गया।
अगले दिन सुबह सूरज की रोशनी में तालाब की स्थिति , वहाँ रोशनी जरुरत आदि बताते हुए हमने पूरी कोशिश की हमारी गलती न मानी जाए। लेकिन लापरवाही के जो इल्ज़ाम लग चुके थे उनमें कोई कटौती नहीं हुई।
सुबह देखने पर यह भी पता चला कि पानी में कीचड़ के साथ मछलियाँ भी थीं। रात के समय उनकी नींद में भी ख़लल पड़ा होगा। अचानक पानी में हलचल मचने से इधर-उधर हुईं होंगी। क्या पता उनके अख़बारों में खबर छपी हो -"हमारे इलाक़े में बाहरी हमला।" हो सकता है उनके सोशल मीडिया में मीम्स वग़ैरह बनें हों। किसी ने ट्विट किया हो -"संकट की घड़ी में हम सब साथ हैं।" रात का तो पता नहीं लेकिन सुबह सारी मछलियाँ रात के हादसे को भूलकर मज़े से पानी में तैर रहीं थीं। ।
होटल में पानी में गिरने से हमको कभी अपने ब्लाग फ़ुरसतिया पर गयी तुकबंदी याद आ गई -"मेढक ने पानी में कूदा,छ्पाऽऽऽक।" (तुकबंदी पढ़ने के लिए पोस्ट का लिंक टिप्पणी में )
नहा-धोकर खाने के लिए हम होटल के हाल में पहुँचे। बड़े से हाल में लगी कुर्सी-मेज़ें देखकर लगा किसी कालेज के मेस हाल में आ गए हैं। वेज-नानवेज दोनों तरह का खाना लगा था वहाँ। होटल का आर्केस्टा भी मौजूद था हाल में। गायक लोगों की फरमाइश पर गाने गा रहे थे।
हम लोगों की रुचि गाना सुनने में कम खाने में ज़्यादा थी। वैसे भी गाने या तो स्थानीय भाषा में गाए जा रहे थे या फिर अंग्रेज़ी में। गाने वालों के लहजे के कारण दोनों ही हम लोगों को समान रूप से समझ में नहीं आ रहे थे।
सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक ही बग़ल की टेबल के एक बुजुर्ग खाना परोसने वाले पर चिल्लाने लगे। पहले शायद सिंहली में, फिर अंग्रेज़ी में। इसके बाद सिंहली और अंग्रेज़ी में दोनों में। वेटर ने अपनी सफ़ाई में कुछ कहना शुरू किया तो उन्होंने उस पर निख़ालिश अंग्रेज़ी में हमला कर दिया। वेटर बेचारा चुप हो गया। थोड़ी देर में बुज़ुर्गवार की सारी अंग्रेज़ी खर्च हो गयी और वे चुप हो गए। वेटर चुपचाप दूसरी टेबल पर चला गया। बुज़ुर्गवार को भी उनके साथ के लोग उनकी मिज़ाजपुर्सी सरीखी करते हुए ले गये।
हम लोग भी खाना-पीना निपटाकर कमरे में आ गए।
कमरे में आने पर पता पता चला कि जो स्विच वहाँ दिए थे वे लग तो अपने यहाँ जैसे ही रहे थे लेकिन मोबाइल का चार्जर उनमें घुस नहीं रहा था। यह समस्या श्रीलंका में कई जगह आई। होटल से चार्जर का एडाप्टर लाए। मोबाइल चार्जिंग पर लगाया। वाई-फ़ाई पहले ही कनेक्ट हो चुका था। थोड़ी देर में हम मोबाइल देखते-देखते निद्रागति को प्राप्त हुए।
होटल समुद्र के पास ही था। रात भर समुद्र की लहरें गरजते हुए अपने होने का एहसास करातीं रहीं।

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Monday, April 14, 2025

दिल्ली वाक् -लाल क़िले पर भगवा रंगत


 कल दिल्ली वाक में शामिल हुए। कल की वाक का विषय था -लाल क़िले पर भगवा रंगत। इतिहास की इस क्लास के मास्टर थे आलोक पुराणिक Alok Puranik, मनुकौशल Manu Kaushal और इरा पुराणिक Ira Puranik। तीनों ने दिल्ली की गर्मी में 45 लोगों की खुले में क्लास ली और विषय के बहाने बताया कि दिल्ली में औरंगज़ेब के बाद बादशाहत भले मुग़लों की बनी रही लेकिन उस पर काफ़ी दिनों तक मराठों का प्रभाव बना रहा। सन 1719 से लेकर 1803 दिल्ली पर मराठों का दख़ल बना रहा। मराठों का ध्वज भगवा रंग का था इसीलिए वाक् का विषय रखा गया था - लाल क़िले पर भगवा रंगत।

यह किला मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा 1638 बनवाया गया। किले को "लाल किला", इसकी दीवारों के लाल-लाल रंग के कारण कहा जाता है।
वाक का समय था सबेरे 0730 बजे। बाद में इसे 0745 कर दिया गया। पंद्रह मिनट की देरी जब मास्टरों ने की तो पंद्रह मिनट हमने लेट कर दिए। आठ बजे पहुँचे लालक़िले पर। नोयडा से लालक़िले तक पहुँचे तो आटो वाले ने बिल बताया 420 रुपए। हमको लगा कि लालक़िले पर क़ब्ज़े को लेकर जो घपले हुए उससे लगता है आटो वाला भी परिचित है, भले ही कभी दिल्ली वाक् में न आया हो। राजनीति और चार सौ बीसी का चोली-दामन का साथ है।
हमारे आने तक वाक् में आए हुए लोगों का परिचय शुरू हो चुका था। हमने भी परिचय दिया।45 लोगों में 9 लोग मराठी थे। वैसे तो आलोक पुराणिक जी भी मूलतः मराठी हैं। लेकिन मराठी बोलने में उनका हाथ तंग होने की वजह से वे खुद को फ़र्ज़ी मराठी कहते हैं।
परिचय के बाद लालक़िले के अंदर की तरफ़ गए। वाक् में शामिल लोगों को क़िले की तरफ़ बढ़ते देखकर एकबारगी लगा कि क़िले पर क़ब्ज़े के लिए आलोक पुराणिक की सेना मार्च कर रही थी। क़िले की दीवार और सड़क के बीच की उगी लम्बी घास देखकर अंदाज़ा लगा कि लालक़िला का रखरखाव करने वालों के पास पैसे का अभाव हो गया है। उनके हाल भी बाद के दिनों में पेंशन पर जीते मुग़ल बादशाहों जैसे हो गए हैं।
क़िले के सामने विक्रमादित्य के नाटक के बोर्ड लगे थे। क़िले के मुख्य द्वार के पास वाली दीवार पर प्रधानमंत्री जी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के मुस्कराते हुए बोर्ड लगे थे जिसमें बताया गया था कि कितने करोड़ रुपए उन्होंने किस योजना में खर्च कर दिए।
क़िले में हम लोग लाहौरी दरवाज़े से घुसे। बताया गया कि इसी सीध में जाने पर रास्ता लाहौर की तरफ़ जाता है। हम सीधे बढ़ते चले गए। रास्ते में छत्ता चौक पड़ा। छत्ता चौक मतलब छत वाला बाज़ार। इसे शाहजहाँ ने पेशावर शहर (पाकिस्तान) के "बाजार-ए-मुराव्वक" (मुराव्वक मतलब छत) की तर्ज़ पर बनवाया था। शाहजहाँ के समय में ऊपरी और नीचे के मंज़िल पर दुकाने थीं। इनमें शाही परिवार के लोगों की ज़रूरत की चीजें बिकतीं थी।
सुबह के समय छत्ता चौक की अधिकतर दुकानें बंद थीं । हम छत्ता चौक को पारकर दीवाने आम होते हुए दीवाने ख़ास तक पहुँच गए। लेकिन हमको वहाँ कहीं वाक के साथी नहीं दिखे। फ़ोन किया तो पता चला कि अभी वो लोग लाहौरी गेट पर ही हैं। हम लपकते हुए वापस लाहौरी गेट पहुँचे। वहाँ आलोक पुराणिक जी लालक़िले की शुरुआती कहानी बता रहे थे। वाक् के साथियों के अलावा तीन कुत्ते भी वहाँ तसल्ली से फ़र्श पर ऊँघ रहे थे। जिस तसल्ली से वे कुत्ते वहाँ ऊँघ रहे थे उससे लग रहा था कि उनके मन में दिल्ली सल्तनत का ख़ौफ़ बिल्कुल नहीं था।
लाहौरी द्वार से लालक़िले में दाखिल होकर हम लोग नौबतखाने के सामने इकट्ठा हुए। नौबतखाना या नक्कारखाना महल परिसर के प्रवेशद्वार के रूप में बना हुआ है। मुग़लबादशाहों के गौरवकाल में यहाँ वाद्ययंत्र बजाकर बादशाह या अन्य विशिष्ट पदाधिकारियों के दीवान-ए-आम में आने की सूचना दी जाती थी। चुनिंदा अवसरों पर भी यहाँ संगीत बजाया जाता था।
ऐसा माना जाता है कि परवर्ती मुग़लशासक जहाँदार शाह (1712-13) और फर्रुखसियर (1713-19) की हत्या इसी नौबत खाने में कर दी गयी थी।
राजमहलों में नौबतखानों के महत्व का अन्दाज़ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी की कविता से होता है :
यदि होता किन्नर नरेश मैं
राज महल में रहता,
सोने का सिंहासन होता
सिर पर मुकुट चमकता।
बंदी जन गुण गाते रहते
दरवाजे पर मेरे,
प्रतिदिन नौबत बजती रहती
संध्या और सवेरे।
बाद के दिनों में जब मुग़ल सल्तनत का रुतबा घटा तो पेंशन पर गुज़ारा करने वाले मुग़ल बादशाह नौबत सुनकर ही बादशाहत का अहसास कर लेते थे। शाहआलम II इलाहाबाद क़िले में छह साल रहे । वे अपने लोगों को नौबत बजवाने के लिए कहते थे। अंग्रेज अधिकारी को यह पसंद नहीं था। उसने मना किया। लेकिन शाहआलम II ने बजाने वालों से कहा -"बजाओ।" नौबत बजने पर अबकी अंग्रेज ने कहा -"अब अगर नौबत बजाओगे तो क़िले से नीचे फेंक देंगे।" शाहआलम के कहने पर फिर बजाई गयी नौबत। अंग्रेज अधिकारी उनको क़िले से फेंकने के लिए आया तो नौबत बजाने वाले भाग गए। अंग्रेज ने नौबत ही क़िले के नीचे फेंक दी।
1707 में औरंगज़ेब की मौत के बाद मुग़ल वंशजों में आपस की मारकाट और सत्ता के संघर्ष के चलते मुग़लों की ताक़त कम होती चली गयी। वे निकम्मे बुत सरीखे हो गए जो सिर्फ़ साँस लेना जानते थे। हाल यह हो गए कि अपनी रक्षा के लिए वे उन मराठा ताक़त पर निर्भर हो गये जिनके ख़िलाफ़ लड़ने में औरंगज़ेब के जीवन के आख़िरी 26 साल बीते।
मुग़लों की मराठों से यह संधि 1719 में हुई । "मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा" नाम से मशहूर इस संधि के अनुसार :
-मुग़लों ने मराठों के क़िले वापस कर दिए।
-दक्खन के मुग़लों छह प्रांतों में चौथ और सरदेशमुखी एकत्र करने का अधिकार दिया।
-दिल्ली की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मराठों के हाथ में रहेगी।
दिल्ली में 15000 मराठा सैनिकों के साथ मराठा साम्राज्य के प्रतिनिधि रक्षा के तैनात हो गए। 1719 में मोहम्मद शाह रंगीला मुग़लों के बादशाह बने। वे शाह कम रंगीले ज़्यादा थे। शानशौक़त और रंग रेलियों में मस्त रहे।इन्हें नाच गाने का बड़ा शौक था। उनके समय में ही 1739 में ईरान से नादिरशाह दिल्ली आया। लूटपाट और क़त्लेआम किया और आराम से वापस भी चला गया। जबकि उस समय दिल्ली सल्तनत के पास एक लाख सिपाही थे। मोहम्मद शाह रंगीला का अंत बहुत बुरी तरीके से हुआ। निजाम उल मुल्क जिस पर उसका बहुत भरोसा था उसकी युद्ध मे मौत हो जाने के कारण वह अकेले कमरे में बैठकर चिल्लाया करता थे। और उसका दुख उसे सहन नहीं हुआ और अंत में 1748 में उसकी मौत हो गई।
बाद के दिनों में मुग़ल बादशाह इतने ग़ैरज़िम्मेदार और गफ़लतमंद हो गए थे कि राजकाज का होश-ओ-हवास ही नहीं रहा। एक बार मराठे दिल्ली में गोल मार्केट में पेशवा रोड तक आ गए लेकिन मुग़ल बादशाह को पता ही नहीं चला। पता चलने कुछ लोग भिखारी के वेश में मराठों के शिविरों में भेज गए। शाम को लौटने पर भिखारियों ने अपनी झोली पलटी तो उसमें से रागी (मराठी रोटी का नाम) के टुकड़े मिले। हालाँकि मराठा लोगों के दिल्ली पर क़ब्ज़ा नहीं किया। आगे निकल लिए।
मराठों को दिल्ली आना-जाना पसंद आता था। वे यहाँ कई बार आए, रुके लेकिन दिल्ली की सल्तनत पर क़ब्ज़ा नहीं किया। दिल्ली के बादशाह से उसकी सल्तनत की हिफ़ाज़त के नाम पर पैसे वसूलते रहे। मुग़लों को मराठों से निजात भी चाहिए थी लेकिन उनको मराठों की सुरक्षा भी चाहिए थी।
1750 के बाद मुग़लों की हालत ऐसी हो गयी थी क़ि उनके वज़ीर बादशाहों से ज़्यादा ताकतवर हो गए थे। ऐसी हालत में अपनी हिफ़ाज़त के लिए मुग़लों ने मराठों से अपनी हिफ़ाज़त के करार किए।
मुग़लों ने मराठों से अपनी हिफ़ाज़त के लिए 50 लाख रुपए सालाना करार किया था। इसमें 20 लाख रुपए सिखों और राजपूतों से रक्षा के लिए और 30 लाख रुपए अहमदशाह अब्दाली से बचाव के लिए थे। मुग़लों ने मराठों से यह संधि 23 अप्रैल, 1752 को की थी। इस संधि को 'अहदनामा' के नाम से जाना जाता है।
मुग़लों की मराठों के संधि के फ़ौरन बाद मुग़लों के अहमद शाह अब्दाली से भी संधि कर ली। पता चलने पर मराठों के बहुत बवाल काटा। इस मामले में मुग़ल बादशाह आजकल के राजनीतिज्ञों के रोल माडल थे। जिसको ताकतवर समझते उससे समझौता कर लेते। अपने जीने के लिए वे वसीम बरेलवी के इस शेर के लिखे जाने से पहले ही उस पर अमल करने लगे थे :
"उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए"
मुग़लबादशाहत का हाल दिनों-दिल इस कदर ख़राब होता गया कि शाह आलम के समय फ़ारसी में कहावत बन गयी थी :
"सल्तनत-ए-शाह आलम, अज़ दिल्ली ता पालम , जिसका अर्थ है, 'शाह आलम का साम्राज्य दिल्ली से पालम तक है'"
दिल्ली में क़ब्ज़े के सिलसिले में 7 मार्च 1760 को , अब्दाली ग़ुलाम याकूब को सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में मराठों ने खदेड़ दिया। जिन्होंने इमाद-उल-मुल्क के कठपुतली मुगल सम्राट शाहजहाँ तृतीय को पदच्युत कर दिया और शाह आलम द्वितीय को सही सम्राट (1760 - 1772) के रूप में स्थापित किया।
इस क़ब्ज़े में मराठों का बहुत खर्च हो गया था। जब मराठे लाल क़िले पहुँचे तो देखा ख़ज़ाना ख़ाली था। उन्होंने दीवाने ख़ास की दीवारों में लगी चाँदी को खरोंचकर उतारवाया और उसको गलाकर अपनी सेना के खर्चे की कुछ भरपायी की। दीवाने ख़ास का सोना और हीरे जवाहरात मय तख़्त-ए-ताऊस और कोहिनूर नादिरशाह पहले ही लूट कर के जा चुका था।
अगले साल ही पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) में मराठों की अहमदशाह अब्दाली से बुरी तरह से हार हुई। दोनों तरफ़ के एक लाख से अधिक सिपाही और ग़ैर सिपाही लोग एक दिन में मारे गए। कहते हैं कि एक दिन की लड़ाई में दोनों तरफ़ के इतने लोग कभी नहीं मारे गए। पानीपत की लड़ाई में मराठों के हार के प्रमुख कारणों में कुछ देशी राजाओं द्वारा मराठों को सहयोग न देना, मराठों के सहयोगी राजाओं द्वारा अनमने मन से लड़ना और मराठों को रसद की आपूर्ति न हो पाना रहा।
पानीपत की लड़ाई के बाद मराठों का झंडा उतर गया। मराठा इतिहास में पानीपत की तीसरी लड़ाई एक दुखद अध्याय के रूप में याद की जाती है।
बाद में एक बार फिर से मराठों का वर्चस्व हुआ। संपूर्ण भारत पर एक बार फिर मराठा परचम फैल गया और उन्होंने दिल्ली में फिर से मुगल सम्राट शाह आलम को राजगद्दी पर बैठाया और पूरे भारत पर शासन करना फिर से प्रारंभ कर दिया ।
मुग़लों की रक्षा भले मराठे कर रहे थे लेकिन उनकी खुद की ताक़त दिन पर दिन कम होती जा रही थी। दरबारी और कर्मचारी बादशाहों की हुकुमअदूली करने लगे थे। हाल यहाँ तक बिगड़ गए कि एक दिन सरदार रोहिल्ला गुलाम कादिर, अपने लाव लश्कर के साथ शाह आलम के शाही दरबार पहुंचा। उसने शाह आलम से उसके माल-खजाने का पता ठिकाना पूछा। तो शाह आलम ने उसे कहा था- 'जैसे तैसे गुजर बसर चल रही है। इफरात पैसा नहीं है। जो कुछ यहां से मिल जाता है बस उतना मेरे पास है।'
ये सुनकर आग बबूला हुए गुलाम कादिर ने शाह आलम को जमकर बेइज्जत किया। यहां तक की उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई। भड़के गुलाम ने बादशाह को धक्का देकर गिरा दिया और सिंहासन पर बैठ गया। उसने दरबार में रखे हुक्के का धुआं बादशाह सलामत के मुंह पर छोड़ा तो वह इस तरह रुसवा होने की वजह से ग्लानि से भर उठा।
गुलाम ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं। उसने एक राजा के साथ राजाओं जैसा सलूक नहीं किया। उसने शहंशाह शाह आलम की आंखों में सुई घोंपकर उसकी आंखों की रोशनी छीनकर अंधा बना दिया। इसके बाद गुलाम उसके सीने पर बैठा और अपने औजार से उसकी आंखें निकाल लीं।
इसकी शिकायत शाहआलम ने मराठों से की और माँग की ग़ुलाम क़ादिर की आँखे निकालकर उसके पास भेजी जाएँ। मराठों के लिए यह चुनौती की बात थी कि जिसकी रक्षा का उन्होंने किया था उसकी आँखे कोई निकाल कर ले जाए। मराठों ने 17 दिसम्बर, 1788 को ग़ुलाम क़ादिर की आँखे निकालकर शाहआलम II को भेजीं और ग़ुलाम क़ादिर को मार दिया।
बाद में अंग्रेजों के आगमन के बाद मराठों और अंग्रेजो की लड़ाई हुई। यह एक तरह की ग्लोबल लड़ाई थी। इसमें क़िला मुग़लों का था, ओनरशिप मराठी थी, मराठों की तरफ़ से लड़ाके फ़्रेंच भी थे और लड़ाई अंग्रेजो के ख़िलाफ़ थी। अंतत: मराठे अंग्रेजो से पड़पटगंज के पास हुई लड़ाई में हार गए। दिल्ली पर मराठों का वर्चस्व ख़त्म हुआ। पुणे से शुरू हुआ मराठों के वर्चस्व का सिलसिला पानीपत होते हुए पड़पटगंज पर ख़त्म हुआ।
शाहआलम II ने मराठों की हार के बाद अंग्रेजों का स्वागत किया। जनरल लेक का स्वागत करते हुए शाहआलम II को देखकर एक अंग्रेज इतिहासकार ने लिखा है :
"अकबर महान और बादशाह शाहजहाँ के वंशज इंसानी गरिमा का मज़ाक़ बनकर रह गए"
शाहआलम-II की पेंशन तय हुई 12 लाख रुपए सालाना। शाहआलम -II ने अपनी गद्दी बचाने के लिए किसी के भी साथ जाने से गुरेज़ नहीं किया। इस बात को बताते हुए मनु कौशल जी ने शकील जमाली का शेर सुनाया :
"तबाह कर दिया अहबाब (दोस्त) को सियासत ने
मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है।
जुआरियों का मुक़द्दर ख़राब है शायद
जो चाहिए वही पत्ता नहीं उतरता है।"
मुग़ल बादशाहों की हैसियत भले ही कम होती गयी हो लेकिन मुल्क के आम लोगों में उनकी इज्जत दहशत काफ़ी दिन तक बनी रही। एक अंग्रेज लेखक ने अपने संस्मरण लिखते हुए बताया कि उनको 200 डाकुओं ने घेर लिया। जब उन्होंने डाकुओं को बताया कि उनके साथ पालकी में मुग़ल बादशाहों की बेगमें हैं तो डाकुओं ने उनको छोड़ दिया।
आम जनता में मुग़ल बादशाहों के इसी प्रभाव के कारण ही 1857 में जब सिपाहियों ने विद्रोह किया तो बहादुरशाह ज़फ़र को अपना बादशाह माना जिनकी हुकूमत तब दिल्ली में भी नहीं चलती थी। शायद इसीलिए अंग्रेज बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून ले गए क्योंकि उनको अंदेशा रहा होगा कि हिंदुस्तान में अगर उनके ख़िलाफ़ कुछ किया तो लोग उनके समर्थन में बग़ावत कर सकते हैं।
लालक़िले पर अंग्रेजों का क़ब्ज़ा होने के बाद उन्होंने लालक़िले में काफ़ी निर्माण कराया। क़रीब 40 % इमारतें अंग्रेजों की बनाई है। दिल्ली गेट वाली इमारत पर बने हाथी इस मुग़लों के घुड़सवारों की जगह अंग्रेज़ी (सफ़ेद) हाथियों आने की कहानी है।
अंग्रेजों के दिल्ली में क़ाबिज़ होने के बाद वे अपने तौर तरीक़े से काम करने लगे। लेकिन उनमें से कुछ मुग़लों वाले अन्दाज़ में ही जीते थे। दिल्ली में अंग्रेज अधिकारी डेविड की 13 बेगमें थीं। मुग़लई अन्दाज़ में रहते थे वे।
बाद में दिल्ली गेट वाली इमारत के पास मनु कौशल जी कवि भूषण के स्वरूप में प्रकट हुए। उन्होंने भूषण की कविताओं का ओजपूर्ण तरीक़े से पाठ किया। उनका अर्थ भी बताया। आलोक पुराणिक जी ने मराठी में जो पढ़ा उसका मतलब हिंदी में बताया।
वाक के दौरान वाक् में शामिल कुछ लोग बीत चुके इतिहास के बारे में अपनी राय ज़ाहिर कर रहे थे। आपस की बातचीत में किसी ने कहा -"मराठों को दिल्ली पर क़ब्ज़ा करके इसे हिंदू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए था। सब बवाल निपट जाता।"
मराठों द्वारा दिल्ली पर वर्चस्व के बावजूद क़ब्ज़ा न करने के कई कारण बताए गए हैं। उनमें से एक यह कि पुणे से इतनी दूर आकर सारा ताम-झाम लाने में तमाम बवाल थे। फिर दिल्ली की हालत दिन पर दिन ख़राब हो रहे थे। क़ब्ज़ा करने की हालत में तमाम लोगों की तरफ़ से लगातार चुनौतियाँ मिलतीं रहतीं। पीछे मराठा में भी शासन की समस्याएँ थीं। वैसे भी बीत चुकी घटनाओं पर यह कहना कि ऐसा होता तो वैसा होता कुछ ऐसा है जैसे रघुवीर सहाय की यह कविता :
"अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता?
तोता होता।
होता तो फिर?
होता, ‘फिर’ क्या?
होता क्या? मैं तोता होता।
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीता राम"
वाक् के बाद सबके सम्मिलित फ़ोटो ग्राफ़ हुए। दूर-दूर से आए हुए वाक् से तमाम जानकारी और सबक़ लेकर विदा हुए। सबसे बड़ा सबक़ यह कि इतिहास की तारीख में धर्म और राजनीति कभी अलग नहीं रही।
वाक में हमारे कालेज के दिनों के साथ संजय चांदवानी Sanjay Chandwani भी थे। उनसे काफ़ी दिन बाद मुलाकात हुई। शशि शर्मा Shashi Sharma जी से पहली बार मुलाकात हुई। वे अपनी समधन जी के साथ आईं थीं। उन्होंने मुझे लालक़िले में मौजूद जंगल जलेबी और दो मीठी चिक्की भेंट की। दोनों ही मैं अपने साथ लेकर घर आ गया।
सब लोगों के चले जाने के बाद आलोक पुराणिक और मनुकौशल जी की साथ हम लोगों ने ठेलिया पर चाय पी। इसके बाद हम और आलोक पुराणिक कड़कड़डूमा मेट्रो स्टेशन तक साथ आए। एक कैफ़े में बैठकर फिर चाय पी। फ़ोटो देखकर मनु कौशल जी ने शिकायत की -"नाश्ता तो हम भी नहीं किए थे। हमें चाय पिला दिया सड़क पर और खुद कैफ़े में घुस गए। यह कानपुरी और आगरा की साज़िश हमें मंज़ूर नहीं।"
इस पर आलोक पुराणिक जी ने अर्ज़ किया -"ग़ालिब खाता कहाँ है। वह तो पीता है।"
इस पर ग़ालिब जी (मनु कौशल जी) ने कहा -"पहले खाता है फिर पीता है फिर पीता ही पीता है।"
लाल क़िले की दिल्ली वाक से तमाम जानकारी मिली। जितनी जान रहे हैं उतना लग रहा है कि कितनी कम जानकारी है अपन की। लेकिन इसी बहाने जान तो रहे हैं कुछ।
दिल्ली वाक् के बारे में फ़िलहाल इतना ही। बाक़ी अगली वाक् में।
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