Wednesday, May 14, 2025

डॉ निरुपमा अशोक के काव्य संग्रह 'वसंत में बारिश' का विमोचन



 "एक नज़र से देखने पर लगता है कि कवितायें गहन चिंतन से उपजी और बड़े उद्धेश्य को समर्पित कविताएँ हैं।" वरिष्ठ आलोचक Virendra Yadav जी ने Nirupma Ashok जी के दूसरे काव्य संग्रह 'वसंत में बारिश' के लोकार्पण के मौक़े पर अपने विचार व्यक्त करते हुए यह बात कही।

निरुपमा दीदी के पहले कविता संग्रह 'वसंत है' का लोकार्पण पिछले वर्ष जून माह में लखनऊ के शीरोज कैफ़े में हुआ था। साल भर से भी कम के अंतराल में दूसरा कविता संग्रह आना उनकी सृजन क्षमता का परिचायक है। कविता संग्रह छप तो जनवरी में ही गया था लेकिन उनकी अमेरिका यात्रा के कारण उसका लोकार्पण स्थगित रहा। जो उनके अमेरिका से वापस लौटने पर कल हुआ।
अमेरिका यात्रा के दौरान यात्रा वृत्तांत भी लिखने शुरू किया हैं दीदी ने। कविता से गद्य की ओर की उनकी यात्रा का स्वागत करते हुए वीरेंद्र यादव जी ने आशा व्यक्त की कि आने वाले समय में कि वे गद्य लेखन की तरफ़ भी अग्रसर होंगी।
कविता संग्रह का लोकार्पण इंदिरा नगर स्थित दीदी के आवास में हुआ। नज़दीकी इष्ट मित्र शामिल हुए। कुछ लोग आ पाए , कुछ लोग नहीं आ पाए। 'वसंत है ' का विमोचन शीरोज कैफ़े में हुआ था। तमाम लोग शामिल हुए थे उसमें। 'वसंत में बारिश' का विमोचन घर में हुआ।
कार्यक्रम के पहले लोगों का इंतज़ार करते हुए वीरेंद्र यादव जी के हाल में संगत -94 में हुए साक्षात्कार पर चर्चा होती रही। हम लोगों का विचार था कि वीरेंद्र यादव जी सवाल तो खूब हुए जिनके उन्होंने बखूबी जवाब दिए लेकिन इस चक्कर में वीरेंद्र यादव जी के लेखन और व्यक्तित्व पर चर्चा कम हो पायी। वीरेंद्र यादव जी ने Anjum Sharma के व्यवहार और उनके अध्ययन और मेहनत की तारीफ़ भी की। अंजुम शर्मा की खूबियों को स्वीकार करते हुए मित्रों का मानना था कि साक्षात्कार में वीरेंद्र जी को घेरने का प्रयास दिखा जिससे वे सहज रहते हुए बिना आपा खोए बाहर निकले।
लोगों के आने का बाद कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए Ashok Kumar Avasthi भाई साहब ने ने इस कविता संग्रह की छपाई में अपने योगदान को नकारने की कोशिश करते हुए अतिथियों का स्वागत किया। लेकिन बाद में उनके योगदान की असलियत का बखान करते हुए दीदी ने बताया कि किस तरह उनकी सारी लिखाई को देर तक मेहनत करते हुए भाई साहब ने फ़ेसबुक पर पोस्ट किया और फिर किताब छपाने में मेहनत की।
किताब के लोकार्पण के बाद लोगों ने कविता संग्रह पर अपने विचार व्यक्त की। दीदी की छात्रा रही अवंतिका सिंह जी ने दीदी के साथ की याद करते हुए बताया कि किस तरह दीदी उनके लिए शिक्षिका से बढ़कर आदरणीय व्यक्तित्व बन गयीं।
अवंतिका सिंह जी के साथ उनके पति अशोक वर्मा, पूर्व पुलिस अधीक्षक गोंडा, ने भी निरुपमा दीदी के कालेज के प्रधानाचार्य रहते हुए उनकी गतिविधियों की चर्चा करते हुए बताया कि लखीमपुर जैसी जगह में कालेज का अनुशासन बनाए रखकर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अनुपम योगदान दिया।
आयुध निर्माणियों के भूतपूर्व उप महानिदेशक Niraj Kela जी ने ' वसंत में बारिश' की कविताओं पर चर्चा करते हुए काव्य संग्रह की कविता 'ग्रीष्म' को पढ़ते हुए निराला जी की कविता 'वह तोड़ती पत्थर' से जोड़ते हुए उनकी कविता का पाठ भी किया। कविता के एक अंश :
ये दुपहरिया जेठ की
खून पसीना एकाकार करती
हड्डी चटकाती
चुह चुह कर
उन्हीं का पसीना बहाती
काल बनती दिखती
प्रचंड जानलेवा बनती
यह दुपहरिया जेठ की !!!
नीरज केला के साथ उनकी जीवन रेखा जीवन संगिनी Renu Kela जी भी अपनी सदाबहार मुस्कान के साथ कार्यक्रम में मौजूद रहीं।
Avdhesh Nigam जी कालेज के दिनों से निरुपमा दीदी से जुड़े रहे हैं। उन्होंने पुराने दिनों की याद करते हुए बताया कि कैसे उनकी रचना यात्रा एक साथ शुरू हुई थी। कैसे Jai Narain Budhwar और निरुपमा दीदी के साथ उनका साझा कविता संग्रह 'शीर्षक नहीं' प्रकाशित हुआ था। दीदी की रचना यात्रा के फिर से शुरू होने पर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए उन्होंने आशा व्यक्त की कि आगे भी उनका सृजन कार्य चलता रहेगा।
निरुपमा दीदी के साथ आर्यकन्या डिग्री कालेज में अध्यापन करने वाली गुरूमीत कलसी दीदी ने अपने कालेज के दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे उन दोनों ने चुनौतियों के दिन साथ रहते हुए, गाते-गुनगुनाते साथ बिताये है।
निरुपमा जी के पड़ोसी पुनीता सिंघल जी और दीपक सिंघल जी ने उनके साथ जुड़ी यादों की चर्चा की।
अनूप शुक्ल ने निरुपमा दीदी के शुरुआती दिनों की रचना यात्रा फिर से शुरू होने पर बधाई देते हुए आशा ज़ाहिर की यह यात्रा और आगे बढ़ेगी। उनकी नयी कृतियाँ आएँगी। साथ ही यह भी आशा की भई भाई साहब भी अपना लेखन कार्य फिर से शुरू करेंगे। उन्होंने दीदी की कविता स्त्री का पाठ भी किया :
"स्त्री-मन
शब्द बहुत कम
भावुकता के मोती ज़्यादा !
स्त्री-मन
स्वप्न बहुत कम
आभासी सुख का मृग जल ज़्यादा! "
अपनी बात कहते हुए निरुपमा जी ने अपनी साहित्यिक रुचियों का श्रेय अपने माता-पिता को देते हुए बताया कि किस तरह उनके पापा जी ने उनका नाम निराला जी के उपन्यास' निरुपमा' पर रखा था। अपनी मम्मी को याद करते हुए उनके संघर्षों के दौर में भी संवेदना बनाए हुए साहित्यिक संस्कार दिए। उन्होंने अपनी रचना यात्रा में अपने पति प्रोफ़ेसर अशोक अवस्थी जी के सहयोग और योगदान की चर्चा करते हुए कहा -'यह कहावत अधूरी है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का सहयोग होता है। किसी महिला की सफलता के पीछे उसके पति का योगदान होता है।' यह बात सुनकर फ़ौरन सर्वसम्मति से यह बयान लिंग निरपेक्ष बयान जारी हुआ-' हर इंसान की सफलता के पीछे उसके जीवन साथी का हाथ होता है।' यहाँ जीवन साथी व्यापक अर्थ में है वह इंसान जो किसी के जीवन में साथ रहा हो। जीवन साथी के लिए पति/पत्नी होना ज़रूरी नहीं है।
अपने कविता 'वसंत में बारिश' की रचना प्रक्रिया की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे वसंत के मौक़े हुई अनायास बारिश में उनके देखते-देखते पेड़ के सारे फूल तेज बारिश के आघात से झर गए:
"अकाल बारिश वसंत की
झर झर झर गयीं पत्तियाँ पीली
झर गए लाल पीले धवल फूल
कमजोर शाखें टूट टूट हो गयीं भूलूँठित
तूफ़ानी झोंको से -
आम्र मंजरियों के गुच्छ-दर-गुच्छ
मटियारे-हरित-पीत यों बिखरे
नन्हे नन्हें बिखरे हों मोती जैसे
पानी और तूफ़ानी हवा की साँय-साँय संग
वसंत और बारिश ने
सपनों का रचा उजाड़ दिया संसार। "
इसी कविता के आख़िर में कहतीं हैं:
" अतिरेक के बावजूद/फिर भी
करो प्रतीक्षा वसंत की।।
तांडव की उमर लम्बी कब हुई ?
अंधेरा अनंत नहीं होता
वसंत के पहले
और बाद बहुत कुछ होता है.....!
निरुपमा दीदी ने अपनी रचना यात्रा और लिखने के विविध अनुभवों का ज़िक्र करते हुए ख़ुशी ज़ाहिर की उनका लिखना फिर से शुरू हुआ। उन्होंने वहाँ मौजूद सभी अतिथियों भी किया कि वे लोग आए और इस कार्यक्रम को सफल बनाया।
वीरेन्द्र यादव जी ने अपने सम्बोधन के अशोक अवस्थी जी से लम्बे जुड़ाव की याद से बात शुरू की। यह बताया कि वे लोग 1972 से इस कालोनी में साथ रह रहे हैं। उनके लम्बे साथ की तमाम ख़ुशनुमा यादें हैं।
कविता संग्रह की कविताओं पर बात करते हुए वीरेंद्र यादव जी ने कहा कि एक नज़र से देखने पर लगता है कि कवितायें गहन चिंतन से उपजी और बड़े उद्धेश्य को समर्पित कविताएँ हैं। इनमें जीवन के विविध पहलुओं पर लिखे विचार हैं। इनमें प्रेम है, प्रकृति है, संवेदना है, युद्ध की विभीषिका की वर्णन है। सभी कवितायें अपने से आगे बढ़कर समाज की चिता की कवितायें हैं।
वीरेंद्र यादव जी निरुपमा जी हाल में लिखे यात्रा संस्मरणो का स्वागत करते हुए कहा -'यह ख़ुशी की बात है। कविता स्वतःस्फूर्त होती है। भावआधारित होती है। गद्य जीवन संघर्ष की कहानी कहता है। निरुपमा जी को गद्य लेखन में सक्रिय होना चाहिए।
वीरेंद्र जी ने आज के समय में, जब मिलना जुलना कम होता जा रहा है, ऐसी गोष्ठी के आयोजन को सुखद अनुभव बताते हुए आशा की ऐसे आयोजन और होते रहने चाहिए।
कार्यक्रम में उपस्थिति सभी लोगों के यही विचार थे कि मिलना-जुलना होता रहना चाहिए।
कार्यक्रम के बाद और बीच में भी फ़ोटोग्राफ़ी होती रही। चाय-नाश्ता भी। Suman -दीप्ति की जोड़ी सारे इंतज़ाम देखती रही। रेशमा, दिलीप और प्रदीप जिन्होंने कोई कविता नहीं पढ़ी है दीदी के कार्यक्रम में सक्रिय सहयोग करते रहे।
कार्यक्रम के अधिकतर फ़ोटो दीप्ति Deepti ने खींचे। बाद में अनौपचारिक बातचीत में दीप्ति ने कहा दीदी की कवितायें ध्यान से पढ़नी पड़ती हैं। दो बार पढ़कर समझती हैं। मौक़े का फ़ायदा उठाते उन्होंने यह भी कहा- अनूप जीजा के लेख समझने के लिए दो-तीन बार पढ़ने पड़ते हैं। इस पर देर तक चर्चा होती रही कि दीप्ति के इस बयान को अनूप शुक्ल की तारीफ़ समझा जाए या उन पर व्यंग्य।
लखनऊ में विधि के प्रोफ़ेसर डा मनोज पांडेय, अमर उजाला से सम्बद्ध रहे संजय त्रिपाठी, नीरज मिश्रा-रेनु मिश्रा अपनी बिटिया शक्ति के साथ भी कार्यक्रम में उपस्थित थीं। नीरज दीदी निरुपमा के पहले काव्य संग्रह के विमोचन में भी उपस्थित थे। उनकी बिटिया शक्ति हाल ही में अपने टेनिस प्रशिक्षण के लिए तीन माह के लिए अमेरिका रहकर वापस आई हैं। बाक़ी के विवरण फ़ोटो और वीडियो में देख सकते हैं।
कुल मिलाकर एक ख़ुशनुमा अनुभव रहा 'वसंत में बारिश' के विमोचन का।

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Tuesday, May 13, 2025

भारत-पाकिस्तान के बीच हुई झड़प के बीच शायरी

 हाल में भारत-पाकिस्तान के बीच हुई झड़प में तमाम कविताएँ/शायरी फिर से साझा हुई। लोगों द्वारा साझा की गयी पंक्तियों से उनकी तरफ़दारी पता चलती है। इसके अलावा भी लोगों ने खुद या दूसरों की लिखी आशु कविताएँ भी साझा कीं। यह साहित्य की सार्वभौमिक ताक़त को बयान करता है। कुछ कविताएँ यहाँ पेश हैं:

1. तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे- शहाब जाफ़री
2. जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध - दिनकर
3. क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो। - दिनकर
4. याचना नहीं, अब रण होगा,जीवन-जय या कि मरण होगा।- दिनकर
5. विनय न मानत जलधि जड़ , गए तीन दिन बीत
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत - तुलसीदास
'विनय न मानत जलधि जड़' सेना के एक अधिकारी ने अपने वक्तव्य में प्रयोग की। उसमें दो शब्द इधर-उधर हो गए। जिन लोगों को यह दोहा याद होगा वो शायद सोचें कि देखकर रिकार्डिंग करते तो बेहतर होता। कोई कहेगा कि भाव देखिए शब्द नहीं।
इस सारे मसले पर सीजफ़ायर होने के बाद ख़ालिस कनपुरिया टिप्पणी का लिंक कमेंट में दिया है। देखकर आप भी कहेंगे - झाड़े रहो कलट्टरगंज।

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Monday, May 12, 2025

नयी पीढ़ी कितनी बदतमीज़ है

 "अरे पापा फ़ेसबुक पर डेंचर (नक़ली दांत का सेट) निकाल कर ज़ाया करिए। आप लिखते हुए दांत पीस रहे हैं, डेंचर क्रैक हो गया तो हफ़्ते भर बनेगा नहीं। रोटी चबाने को मोहताज हो जाएँगे। "

बेटे की बात सुनकर पापा ने कम्प्यूटर बंद किया और चुपचाप लेट गए।सोचते रहे कि नयी पीढ़ी कितनी बदतमीज़ है। देशप्रेम के रास्ते में भी बाधा पैदा करती है।

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कुलच्छनी बुड्ढे

 रागदरबारी उपन्यास में अपने पहलवान पिता कुसहर परसाद का चरित्र चित्रण करते हुए उनके काबिल बेटे छोटे पहलवान कहते हैं :

“यह बुढ्ढा बड़ा कुलच्छनी है। इसके मारे कहारिन ने घर में पानी भरना बन्द कर दिया है। और भी बताऊं? अब क्या बताऊं, कहते जीभ गंधाती है।“
1968 में प्रकाशित इस उपन्यास के बुड्ढे आज अलग अंदाज़ में मौजूद हैं। आप अपने हिसाब से देख सकते हैं उनकी हरकतें लेकिन उनके ख़िलाफ़ कुछ कह कहने की कोशिश न करें। आज बुड्ढे भूतपूर्व पहलवान की तरह अकेले नहीं हैं। उनके पास उनकी सेनायें हैं। उनके एक इशारे पर टूट पड़ने वाली सेनायें। जब उनकी सेनायें आप पर हमलावर होंगीं उसी समय वे कुलच्छनी बुड्ढे विश्व शांति और वसुधैव कुटुम्बकम की बात कर रहे होंगे।

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Saturday, May 10, 2025

हिंदुस्तान -पाकिस्तान

 1947 में जब देश की धरती का बंटवारा हो गया तो उसी समय दिल्ली में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमें इसी विषय पर कविता पढ़नी थी। गीतकार रमानाथ अवस्थी जी ने पढ़ा:-

धरती तो बंट जायेगी
पर नीलगगन का क्या होगा?
हम तुम ऐसे बिछड़ेंगे
तो महामिलन का क्या होगा?
कविता को सुनकर , कहते हैं , मंच पर अनेक लोगों की आंखे भर आयी थीं,खासकर पाकिस्तान से आये शायरों की।
उस समय बंटवारे की घटना ताजा थी। जो लोग इससे प्रभावित हुए उनको इसका अफ़सोस रहा होगा। कुछ लोग वर्षों तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान की साझा विरासत की बात करते। देश के तमाम लोगों का विचार था कि भारत-पाकिस्तान को साझा गठबंधन में रहना चाहिए। देश की आजादी में योगदान देने वाले कई महापुरुष दोनों देशों से अनुराग रखते थे। गांधी जी तो पाकिस्तान जाना भी चाहते थे लेकिन उनकी हत्या हो गई।
भारत-पाकिस्तान महासंघ के बड़े हिमायतियों में लोहिया जी प्रमुख थे। उनका मानना था कि देश का विभाजन साम्राज्यवादी ताकतों की साजिश के तहत हुआ था। भारत पाक महासंघ के रूप में उनका प्रस्ताव था कि दोनों देश अपने-अपने संविधान के अनुरूप काम करें। लेकिन रक्षा , विदेश नीति और आर्थिक नीतियों जैसे मुद्दों पर निर्णय महासंघ करे। जयप्रकाश नारायण जी के भी कुछ ऐसे ही विचार थे।
कुछ लेखक, संस्कृति कर्मियों और सामाजिक जीवन से जुड़े लोग भी भारत पाकिस्तान के बीच महासंघ जैसे प्रस्ताव के बारे में कल्पना करते थे। इनमें कुलदीप नैयर, खुशवंत सिंह जैसे नामचीन लोग भी शामिल थे।
लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, पाकिस्तान फौज के नियंत्रण में आता गया भारत-पाकिस्तान महासंघ का सपना ख़त्म होता गया। छिटपुट नियमित झड़पों के अलावा तीन बड़ी लड़ाइयाँ हो चुकी हैं दोनों देशों के बीच। अब चौथी की तैयारी है। दोनों देशों की सेनायें अपने-अपने हिसाब से लड़ाई के लिए तैयार हैं। लड़ना शुरू भी कर दिया है। अब निकट भविष्य में दोनों देशों के महासंघ की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती।
कट्टरपंथ, सेना के नियंत्रण और तमाम दूसरे कारणों से पाकिस्तान के हाल बेहद ख़राब बताये जाते हैं। पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। आजादी के 78 साल के बाद एक साथ आजाद हुए दो देशों के बीच इतना अंतर आ चुका है कि कल्पना करना मुश्किल है कि कभी दोनों एक ही देश थे।
दोनों देशों के बीच एकता , मिलन के न जाने कितने कितने किस्से चले होंगे। न जाने कितनी कविताएँ लिखीं गईं होंगी। इनमें कुछ साझा होकर मिल जाने की होंगी, कुछ पाकिस्तान को मिटाकर हिंदुस्तान में शामिल करने की रही होंगी। हिंदुस्तान के वीर रस के कवियों की तो रोज़ी-रोटी ही पाकिस्तान विरोध की कविताएँ हालत चलती रही।
इन लोगों से मज़े लेते हुए शाहजहांपुर के ख्यालबाज लल्लन ने लिखा था:
फूंक देंगें पाक़िस्तान लल्लन ,
दो सौ ग्राम पीकर देखो ।
आज दोनों देशों के हाल ऐसे हैं कि उनके बीच एकता और भाईचारे की बात करने वालों को, दोनों देशों के युध्दातुर वीरबांकुरे, कायर और अपने वीरता के आनंद में ख़लल डालने वाला मानते हैं। पाकिस्तान का तो पता नहीं लेकिन हिंदुस्तान में कई लोग तो इस इंतज़ार में हैं कि कब लाहौर में चाय पियें, कब मिठाई खायें।
पाकिस्तान को अपने कब्जे में लेकर उसको बर्बाद करने वाले कुछ लोग तो देवताओं पर विजय के बाद इंद्राणी से मिलने के लिए ऋषियों की पालकी में सवार राजा ययाति की तरह व्यग्र हो रहे हैं। बड़ी बात नहीं कल को ये लोग लाहौर, रावलपिंडी , इस्लामाबाद , पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जे में हो रही देरी के लिए देश की सेना को धिक्कारने लगें जिस तरह ययाति ने पालकी लेकर धीमी चाल से चलते ऋषि अगस्त्य को धिक्कारा था।
जिस पीढ़ी ने प्रत्यक्ष युद्ध नहीं देखा और जिसने कभी युद्ध की त्रासदी नहीं झेली वह युद्ध के लिए इतनी उतावली है कि देरी उससे बर्दास्त नहीं हो रही है। आने वाले समय में क्या होगा आने वाले दिनों में ही पता चलेगा।
भारत-पाक महासंघ की अवधारणा फ़िलहाल तो गए जमाने की बात हो चुकी। आगे भी कभी दोनों साझा विरासत, साझा इतिहास वाले देश नजदीक आ सकेंगे इसकी भी संभावना कम ही है फ़िलहाल। अभी तो दोनों देश कट्टर दुश्मनी की स्थिति में हैं। आगे कभी मिल सकेंगे क्या दोनों देश ?
दुश्मनी पर बशीर बद्र का शेर है :
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे ,
फिर कभी जी दोस्त बन जायें तो शर्मिंदा न हों।
दुनिया में ऐसी कुछ मिसालें हैं जहाँ दो कट्टर दुश्मन देश बाद में एक हो गए। पूर्वी जर्मनी -पश्चिमी जर्मनी , उत्तरी वियतनाम-दक्षिणी वियतनाम दो उदाहरण तो याद आते हैं। इनमें दोनों देश कुछ समय अलग रहने के बाद एक हो गए। बर्लिन की दीवार तोड़कर जर्मनी एक हुए, अलगाव की दीवार पर ढहाकर वियतनाम एक हो गए।
इन दोनों उदाहरणों में दो देशों के बीच अलगाव का कारण विचारधारा रही थी। विचारधारा कमजोर पड़ी , कम्युनिष्ट खेमा ढीला पड़ा इसके बाद दो देश एक हो गए। लेकिन भारत पाकिस्तान के बीच ऐसा होना संभव नहीं दीखता क्योंकि अलगाव का कारण विचरधारा नहीं थी। दोनों के अलगाव में धर्म एक प्रमुख कारण (घोषित कारण ) रहा। जर्मनी और वियतनाम के अलगाव का कारण विचारधाराएँ थीं जो कुछ दशक पुरानी ही थीं। भारत-पाकिस्तान के विभाजन का कारण सैकड़ो सालों पुराने धर्म हैं। शायद इसीलिए इनका मिलना अभी तक नहीं हो पाया।
आगे भी कभी भारत-पाकिस्तान पास आ सकेंगे क्या ? यह कहना मुश्किल है। आ सकते हैं बशर्ते पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाल हो , सेना का नियंत्रण ख़त्म हो उदार लोग जो सत्ता लोलुप न हों और भारत में भी ग़ैर साम्प्रदायिक सोच के उदार लोगों का वर्चस्व हो। दोनों देशों की आम जनता तो शायद पास आने के लिए उतावली है। लेकिन देशों के निर्णय जिन लोगों के हाथ में होते हैं वे इतने भले और भोले नहीं होते।
अभी तो दोनों देश युद्ध के मुहाने पर हैं। देखिए कबतक स्थितियां सामान्य होती हैं। दोनों देश के हाल युद्ध के बाद कैसे रहते हैं। फिलहाल तो अभी कोई मिलना -जुलना संभव नहीं। लेकिन आगे कभी नहीं मिलेंगे यह भी कहना थीं नहीं। इतिहास अपने हिसाब से चलता है। जिन मराठों से लड़ते हुए मुगल सम्राट औरंगजेब बूढ़ा होकर मर गया उसी मुगल साम्राज्य की रखवाली और सुरक्षा का इंतज़ाम मराठा लोग अगले कई दशक करते रहे।
हिंदुस्तान -पाकिस्तान आज भले लड़ रहे हैं लेकिन हमेशा लड़ते ही रहेंगे यह सोचना ठीक नहीं लगता।
यह मेरा अपना सोचना है। आपका सोचना अलग हो सकता है।
संयोग यह भी कि आज दस मई है आज के ही दिन आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम की शूरुआत हुई थी जिसमें आज के हिंदुस्तान और पाकिस्तान के पूर्वज मिलकर लड़े थे।

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Thursday, May 08, 2025

युद्ध की घटनाओं में मनोरंजन खोजना अमानवीय है

 1990-91 में अमेरिका ने इराक़ पर हमला किया था। अमेरिकी सेना इराक़ पर पैट्रियट मिसाइल दाग रही थी। हमले की खबरें टेलिविज़न पर दिखाई जा रहीं थीं। कुछ अमेरिकी अपने घरों में बैठे, काफ़ी,कोक, दारू पीते हुए दगती मिसाइलों को उल्लास भाव से देखते हुए दिखाए गए थे। हर गिरती मिसाइल के साथ खुश होते उल्लसित अमेरिकी दिखाए गए थे।

मिसाइल अटैक के आनलाइन प्रसारण के पीछे अमेरिका की मंशा बताई गयी थी कि वह अपनी मिसाइल का प्रचार भी करता जा रहा है। दुनिया को दिखाते हुए कि ये देखो हमारे पास है ये मिसाइल। खरीद लो अगर अगर ख़रीदना हो।
अमेरिका-इराक़ युद्द के प्रसारण से युद्द के मनोरंजन में तब्दील होना भी देखा दुनिया ने। अमेरिकी और दुनिया भर के लोग इस घटना को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई पतंगबाज़ी का शो देख रहे हों।
इस युद्द में 25000 से 50000 हज़ार इराक़ी सैनिक मारे गए थे। कुछ हज़ार से लेकर एक लाख तक इराक़ी नागरिक हताहत हुए थे। अच्छा खासा सम्पन्न देश इराक़ बर्बादी के कगार पर पहुँच गया । 383 अमेरिकी भी मारे गए थे। मारे गए परिवारों के लिए युद्ध की याद अभी भी एक भयावह याद की तरह होगी।
पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना के बाद भारत की सेना ने आपरेशन सिंदूर शुरू किया। पाकिस्तान के कई आतंकवादी अड्डे तबाह कर दिए। आपरेशन की खबरें आते ही भारत की सेना के पराक्रम की खबरें मीडिया और सोशल मीडिया में छा गयीं। अनगिनत लोगों ने पलपल की कमेंट्री सोशल मीडिया में साझा की। जिस अन्दाज़ में खबरें पोस्ट की लोगों ने उसको देखकर ऐसा लगा कि फ़ौजों ने अपने एक्शन की रिपोर्ट सबसे पहले उनको भेजी इसके बाद अपने अपने कमांडर को बताया।
लोग हमले की खबरें आई पी एल के साथ देख रहे हैं। मनोरंजन होता रहना चाहिए। घर में बैठकर चाय, काफ़ी पीते हुए युद्ध की खबरें देखते हुए लोग खुश हो रहे हैं और कह रहे हैं पाकिस्तान को घुस कर मारा। आह्वान कर रहे है -'तबाह कर दो। क़ब्ज़ा कर लो। नाम-ओ-निशान मिटा दो। हास्य कवि की चिरकुट तुकबंदियाँ करने वाले वीर रस में शिफ़्ट हो गए हैं। जो खुद तुकबंदियाँ नहीं कर पा रहे हैं वो पुरानी ओज कविताएँ खोजकर ला रहे हैं।
पढ़े-लिखे अनुभवी बुजुर्ग पत्रकार -सम्पादक लोग भी अपनी टिप्पणियाँ करते हुए बयानों की मिसाइलें दागते दिख रहे हैं। कुछ लोगों ने तो अपनी भाषा का स्तर इतना नीचा कर लिया है जिसे देखकर लगता है कि उनको डर है कि कहीं इसके बिना लोग उनको कम देश भक्त न समझ लें।
देश की सेना ने अपनी ब्रीफ़िंग में संयत भाषा में अपनी कार्यवाही की जानकारी दी। लोगों ने उसकी तारीफ़ की।
ऐसे समय में सोशल मीडिया पर अपनी जान जोखिम में डालने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं जो युद्ध को दोनों देशों के लिए ख़राब बताते हुए इसके फ़ौरन ख़ात्मे की बात कर रहे है। ऐसे लोगों की या तो लोग अनदेखी कर रहे हैं या उनको जमकर गरिया रहे हैं। भयंकर युद्द उन्माद में हैं लोग। युद्ध रोकने की अपील करने वाले और लोगों से सवाल करने वाले देश में छिपे हुए ग़द्दार भी बताती हुई भी कुछ पोस्ट्स आईं।
ऐसे समय में जब हमले में जब देश को एकजुट रहने की ज़रूरत है, कुछ लोग पाकिस्तान पर हमले के साथ-साथ देश के अल्पसंख्यक समुदाय पर सीधे या तिरछे वाचिक हमले करते जा रहे हैं।
युद्द और हमले की सही-ग़लत रिपोर्टिंग को अपने खाते से पोस्ट करने वाले लोग तरह-तरह के मीम, कार्टून, उपहास वाले डायलाग पोस्ट कर रहे है। ऐसा लग रहा है युद्द ने उनको ऐसा मौक़ा मुहैया कराया है जिसका पूरा मज़ा न लिया तो जन्म बेकार चला जाएगा।
इस बीच पाकिस्तान के जवाबी हमले में अपने देश के भी मारे जाने की खबरें भी आनी शुरू हुई हैं। मरने वालों में सेना के जवान, नाबालिग बच्चे और महिलाएँ भी हैं। हिंदू भी हैं मुसलमान भी।दीगर समुदाय के लोग भी होंगे। गोला-बारूद साम्प्रदायिक नहीं होते। वे जाति-धर्म पूछकर जान नहीं लेते। उनकी जद में जो आता है, मारा जाता है।
युद्द किसी भी समाज के लिए घातक और खतरनाक होता है। कहीं गिरती मिसाइलों, कहीं मरते लोग, कहीं ढहती इमारतें, कहीं बरबाद होते लोगों को देखकर खुश होंने से पहले यह सोचना चाहिए कि बरबादी की जद में अगर हम या हमारा परिवार या हमारे जानने वाले होते तो भी क्या हम इसी तरह खुश हो रहे होते।
फ़िलहाल कमान सेना के हाथ में है। उसको अपना काम करने दें। उसको सहयोग दें। लेकिन युद्ध की घटनाओं को मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करने से बचें। युद्ध किसी मसले को निपटाने का आख़िरी विकल्प होता है तो युद्ध की घटनाओं में मनोरंजन खोजना अमानवीय है।
यह मेरी सोच है। आपकी अपनी सोच अलग हो सकती है।

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