कोलंबो के मॉल से लौटकर हम लोगों ने होटल में खाना खाया। सुबह उठकर पास ही स्थित माउंट लाविनिया बीच देखने गए। श्रीलंका के गवर्नर रहे मेटलैंड के साथ श्रीलंका की लाविनिया की प्रेमकहानी के कारण इस बीच का नाम लाविनिया बीच पड़ा।
माउंट लाविनिया बीच घूमते समय याद आया कि तीन साल पहले वहाँ की अराजक स्थिति के बारे में सोचते हुए लगा कि क्या हाल रहे होंगे उस समय। माउंट लाविनिया बीच पर ही स्थित एक पूर्व मंत्री का घर जला दिया गया था। उस समय के समाचारों के विवरण बताती एक पोस्ट से वहाँ के हाल का अंदाजा लगाया जा सकता है :
"श्रीलंका (Sri Lanka) में अब सेना भी स्थिति नहीं सम्भाल पा रही। कोई प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहता। आर्थिक संकट, बेतहाशा महंगाई, लोगों का जीवन नारकीय बना रही थी।"
लोकतंत्र में जब जनता शासक के ख़िलाफ़ होती है तो ऐसे ही हाल होते हैं।
बहरहाल, माउंट लाविनिया बीच से लौटकर होटल में नाश्ता करने के बाद हम स्थानीय पेट्टा (Pettah) बाजार घूमने गए। बाजार ले जाते समय ऑटो गुहान ने चालक ने अपने जीवन के रोचक किस्से सुनाये। (पोस्ट का लिंक टिप्पणी में)
गुहान को विदा करने के बाद हम लोग पेट्टा मार्केट घूमें। पेट्टा कोलंबो का प्रसिद्ध बाज़ार है। तमिल में पेट्टा क़िले के आसपास बने/बसे बाजार कहते हैं। कोलंबो क़िले के पीछे बसा है। शहर के कई प्रसिद्ध प्रतिष्ठान यहाँ मौजूद हैं।
पेट्टा बाजार को एक विशाल क्रॉसवर्ड पहेली की तरह डिजाइन किया गया है, जहां कोई व्यक्ति सुबह से शाम तक पूरे बाजार में घूम सकता है, लेकिन इसके हर हिस्से को पूरी तरह से कवर नहीं कर सकता है।
बाजार में टहलते हुए हमने तरह-तरह की दुकानें देखीं। परचून के सामान से लेकर इलेक्ट्रानिक का बाज़ार। चश्मे की दुकान के डॉक्टर की दुकान। किसी आम भारतीय बाजार जैसा ही भीड़-भाड़, चहल-पहल भरा बाजार।
एक चीज ने हम लोगों को आकर्षित किया वह यह कि ठेले पर फल बेचने वाले सामानों के आगे उसके दाम लगाए हुए थे। फ़रवरी के महीने में टमाटर 150 रुपये किलो थे तो मुसम्मी 200 रुपए किलो। भारत के हिसाब से लगभग 50/66 रुपए किलो। नारंगी जैसा और एक फल 300 रुपए किलो बिकता दिखा।
एक जौहरी और घड़ी के डीलर की दुकान का स्थापना वर्ष 1902 लिखा दिखा। सड़क के दूसरी तरफ़ स्थित उस बुजुर्ग दुकान को हमने दूर से प्रणाम निवेदित किया। दुकान के संचालकों की कम से कम पाँच पीढ़ियाँ यहाँ बैठकर चली गयीं होंगी।
सड़क किनारे तख्त में रखे सामान,जूते-चप्पल आदि, उसी तरह बिक रहे थे जैसे कानपुर के मेस्टन रोड या पी रोड में बिकते हैं।
एक बड़े शेड के नीचे कई तरह की दुकानें लगीं थीं। छोटे-छोटे रोज़मर्रा के काम आने वाले सामान बिकते दिखे वाहन।
AYSHA मोबाइल ग्लोबल देखकर कानपुर की मोबाइल दुकानें याद आ गयीं। एक दुकान पर बांबे स्वीट्स लिखा देखकर हमें याद आया कि अब तो बांबे का मुंबई हो गया है। भाषा और शहर के नाम पर हल्ला मचाने वाले मराठी वीर अब तक ख़ामोश क्यों हैं? अभी तक श्रीलंका की दुकान का नाम बदलवाने के लिए कोई हल्ला-गुल्ला नहीं किया। ऐसे कैसे चलेगा भाई?
एक ऑटो पर लिखा दिखा -Proud to be a Srilankan. अच्छा लगा देखकर। लेकिन ड्राइवर नदारद था ऑटो से। शायद श्रीलंका पर ख़ुद गर्व करने के बाद दूसरे लोगों को गर्व कराने गया हो।
लंदन शूटिंग की दुकान भी दिखी वहाँ। ऊपर DFCC बैंक के विज्ञापन स्थानीय भाषा में लिखे थे। पढ़ नहीं पाये।
पेट्टा बाजार घूमते हुए एक शानदार, चमकती हुई मस्जिद भी दिखी। जमीउल अल्फ़र ( Jami Ul-Alfar) मस्जिद थी वह। 1908 में बनी। यह कोलंबो की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक है । मस्जिद के बारे में विवरण पढ़ते हुए पता चला कि मस्जिद के डिजाइनर और निर्माता हबीबू लेब्बे साइबू लेब्बे (एक अनपढ़ वास्तुकार) थे। उनको दक्षिण भारतीय व्यापारियों ने कहीं देखी गई मस्जिद के हिसाब से नक्शा दिया कि ऐसे बनाओ मस्जिद। हबीबू लेब्बे साइबू लेब्बे ने बना दी। मस्जिद में क़रीब 1500 लोग एक साथ नमाज़ पढ़ सकते हैं।
पेट्टा बाजार में घूमते हुए हमने और भी कई इमारतें और दुकानें देखीं। जितना देख पाये उतना देखने के बाद बाजार के बारे में मशहूर बात (जहां कोई व्यक्ति सुबह से शाम तक पूरे बाजार में घूम सकता है, लेकिन इसके हर हिस्से को पूरी तरह से कवर नहीं कर सकता है) की इज्जत रखने के लिहाज से बाक़ी बचा हुआ बाज़ार दूसरों के देखने के लिए छोड़कर पास ही स्थित डच हास्पिटल देखने चल दिए।
करीब दो घंटे घंटे बाज़ार में घूमने टहलने के बावजूद हमने वहाँ से कोई ख़रीदारी नहीं की। बाजार से गुजरने और कुछ न ख़रीदने के अपराध बोध से बचने के लिए हमारे पास महान बहाना पहले से ही मौजूद था -"बाजार से गुजरा हूँ, ख़रीदार नहीं हूँ।"
नोट : माउंट लाविनिया बीच और ऑटो ड्राईवर गुहान से जुड़ी पोस्ट के लिंक टिप्पणी में।
#श्रीलंका, #shrilanka -39
https://www.facebook.com/share/p/1AjeJuBtsj/

No comments:
Post a Comment