Friday, August 25, 2006

वो तो अपनी कहानी ले बैठा…

http://web.archive.org/web/20111108114935/http://hindini.com/fursatiya/archives/179

वो तो अपनी कहानी ले बैठा…

जून में फिराक़ गोरखपुरी के बारे में लिखे लेख पर टिप्पणी करते हुये राजीव खरे जी ने लिखा है:-
एक अच्छे ज्ञानवर्धक लेख के लिए धन्यवाद |
वैसे तो फ़िराक साहब के हजारों अच्छे शेर हैं , पर एक शेर याद आता है जिसे एक बार आई के गुजराल जो समय प्रधानमंत्री थे ने संसद में सुनाया था
“तुम मुखातिब भी हो करीब भी हो ,
तुमको देखूँ कि तुमसे बात करुँ ”

मुझे अगर ये पूरी नज्म अगर मिल सके तो बड़ी मेहरबानी होगी |
यह देखते ही मैं अपने पास उपलब्ध किताबों में फिराक़ साहब की गजल खोजने में जुट गया। बहुत खोजने पर यह गजल नहीं मिली। इससे मिलते जुलते शेर समेटे एक गजल दिखी। मिलता-जुलता शेर था:-
हम उसको देख के भी आह किस तरह देखें,
नजारा-ए-रुख़े-जानाँ हुआ,हुआ भी नहीं ।
पहले तो हमें लगा कि शायद इसी गज़ल फरमाइश है लेकिन जब फिर मैंने फरमाइशी शेर देखा तो हमें अपना विचार बदलना पड़ा। बाद में फिराक़ साहब के बारे में जो किताब मेरे पास है उसमें आखिरी में उन शेरों की लिस्ट दी थी जो उसमें संकलित नहीं हैं। उसमें यह शेर भी था:-
तुम मुखातिब भी हो करीब भी हो ,
तुमको देखूँ कि तुमसे बात करुँ

शेर फिर से पढ़कर पुरी गज़ल पाने की इच्छा तेज हो गई। हमने फिर शाहजहाँपुर फोन किया। मैं वहाँ २००१ तक रहा करीब आठ साल। तमाम शायर दोस्त मेरे परिचित हैं वहाँ। उनमें से एक अख्तर ‘शाहजहाँपुरी’ भी हैं। करीब पैंसठ साल के अख्तर साहब नौकरी से रिटायर होकर नये सिरे से जवान हो रहे हैं तथा खूब लिखने में जुटे हैं। उनकी दो किताबें छप चुकी हैं। मैं जब शाहजहाँपुर में था तब तक एक छपी थी। दूसरी अभी १३ अगस्त को लोकार्पित हुई है।
मैंने जब फोन किया तो लाइन पर अख्तर साहब ही थे। हमने दुआ-सलाम,खैरियत-वैरियत के बाद फिराक़ साहब की ग़ज़ल की बात की तो बताया कि दो दिन में खोजकर वे हमें बतायेंगे। लिहाजा भाई राजीव खरे को दो दिन इंतजार करना पड़ेगा अपनी पसंदीदा ग़ज़ल पढ़ने के लिये।
फिराक साहब को किनारे करके अख्‍़तर साहब अपने किस्से सुनाने लगे। बताया कि कैसे विमोचन हुआ ,कहाँ हुआ,कौन आया था आदि-इत्यादि।पता चला कि विमोचन गाँधी लाइब्रेरी में हुआ था।
शाहजहाँपुर में गांधी लाइब्रेरी वहाँ की साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र है।
यह लाइब्रेरी चौक मुहल्ले में है। बगल में ही हृदयेशजी का घर है जो कि अक्सर टहलते हुये वहाँ आ जाते हैं जहाँ उनको चच्चा कहने वाले अरविंद मिश्र के अलावा तमाम लोग मिलते हैं।लाइब्रेरी के सचिव अजय गुप्त जी बहुत अच्छे गीतकार हैं। उनके दो गीतों की पंक्तियाँ मुझे अक्सर याद आती हैं:-
१.वामन हुये विराट चलो वंदना करें
ज़र्रे हैं शैलराट चलो वंदना करे ।


२. सूर्य जब-जब थका हारा मुझे ताल के तट पर मिला,
सच कहूँ मुझे वो बेटियों के बाप सा लगा।

गांधी लाइब्रेरी में अक्सर कवि-गोष्ठियाँ तथा अन्य साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। अपनी कुल जमा दो-तीन कविताओं के कारण मुझे लोग वहाँ ‘शाहजहाँपुर का गुलेरी’कहते थे।
बहरहाल,अख्‍तर साहब अपने पूरे मूड में थे। सो किस्सा-ए-लोकार्पण तफसील से सुनाते रहे। फिर उन्होंने टेप चालू कर दिया जिसमें उनकी ग़ज़ल को वहीं के एक शायर राशिद नदीम ने तरन्नुम में पढ़ा था। मैंने एक बार सुनकर उसे लिख लिया फिर दुबारा फोन पर माइक लगाकर लैपटाप में भी टेप कर ली। गज़ल यहाँ पेश है:-
किसके हाथों के हैं खिलौने हम,
बात ये आजतक न समझे हम।
वो तो अपनी कहानी ले बैठा,
दास्ताँ अपनी क्या सुनाते हम।
शामियाने धूप के हरसू हैं,
ढूँढ लाये कहीं से साये हम।
चाँद-तारों की हमसरीखी है,
जर्रा होकर भी खूब चमके हम।
पैरहन तीरगी(अंधेरे)का बक्सा
चाहते थे मगर उजाले हम।
दो कदम रह गयी है बस मंजिल
पाँव के गिन रहे हैं छाले हम।
अपने माँझी को भूलकर ‘अख्तर
हो गये हैं कहानी किस्से हम।
ग़ज़ल के बाद अख्‍़तर साहब ने फिर वह तक़रीर भी सुनाई सो विमोचन के अवसर पर अध्यक्ष महोदय ने उनके सम्मान में पढ़ी थी। हमें लगा कि हमारी बातचीत में ग़ज़ल का दूसरा शेर बिल्कुल फिट बैठ रहा था:-

वो तो अपनी कहानी ले बैठा,
दास्ताँ अपनी क्या सुनाते हम।

खैर, यह तय हुआ कि एक-दो दिन में अख्‍तर साहब मुझे फिराक़ गोरखपुरी की फरमाइशी ग़ज़ल नोट करायेंगे।
इसके बाद मैं अपने पास उपलब्ध एक पत्रिका शब्दयोग के पन्ने पलटने लगा। उसमें ग्वालियर के कवि पवन करण की कुछ प्रेम कवितायें पढ़ीं। उनमें से एक जो मुझे कुछ ज्यादा जमीं वो यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ। इस कविता में देखा जाये कि प्रेमिका की आकांक्षायें किस भावभूमि की हैं। उस पर प्रेम पुष्टि के सिनेमाई फार्रमूले किस तरह अनजाने में हावी हो गये हैं:-
तुम अपने आपको समझते क्या हो
पीछे से कमर को जोर से पकड़ते हुये उसने पूछा
मैंने उत्तर दिया तुम्हारा प्रेमी।

नहीं नहीं तुम मुझे सच-सच बताओ
तुम अपने आपको समझते क्या हो
कहा न तुम्हारा प्रेमी,मैंने दोहराया।
कैसे मान लूँ तुम मेरे प्रेमी हो
मुझे सच्चा प्रेम करते हो
बात खींचते हुये उसने कहा
मैंने कहा ,अच्छा तुम्ही बताओ मैं तुम्हें
किस तरह बताऊँ कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ?
मैं नहीं मानती कि तुम मुझे प्रेम करते हो
अच्छा एक काम है जिसे तुम इसी वक्त कर सको
तो मुझे लगेगा कि तुम मुझे प्रेम करते हो
मैंने कहा बताओ,मुझे क्या करना है।
तुम इसी तरह मोटर साइकिल को चलाते हुये
पीछे मेरे होंठों को चूमकर दिखाओ तब मानूंगी
मैंने कहा नहीं ऐसा नहीं हो सकता
उसने कहा ठीक,गाड़ी रोको,मुझे उतारो।
मैंने कहा ठीक चलो कोशिश करके देखता हूँ
फिर मैंने जैसे ही उसके होंठ चूमने के लिये
अपने सिर को घुमाया पीछे की तरफ
वह चीखते हुये बोली क्या करते हो
मरना चाहते हो क्या,क्या मेरे कहने पर कुयें में कूद जाओगे
कोई जरूरत नहीं कुछ करने की
मैं जानती हूँ तुम मुझे बेहद प्यार करते हो।

पुनश्च: अनूप भार्गव जी ने पवन करण की कविताओं के बारे में बताया है कि उनकी कुछ कवितायें प्रसिद्ध पत्रिका कृत्या में उपलब्ध हैं।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

7 responses to “वो तो अपनी कहानी ले बैठा…”

  1. ई-छाया
    गुस्ताखी माफ पर आखिरी कविता की आगे की कुछ लाइने इस प्रकार की हो सकती थी।
    करें क्या मगर तब तक देर हो चुकी थी बडी
    मोटर साइकिल लहराई और जोरों से गिर पडी
    प्रेम का इम्तहान क्या जान देकर ही होता है
    टूटी गाडी लहूलुहान हम थे और बगल में थी वो पडी।
  2. Anoop Bhargava
    लेख अच्छा लगा , फ़िराक साहब की गज़ल का इन्तज़ार रहेगा ।
    पवन करण जी की कविताएं कुछ दिन पहले ‘कृत्या’ में पढी थीं । बेहद ताजगी और ‘नयापन’ लिये । उन की और कविताएं यहाँ पढी जा सकती हैं :
    http://www.kritya.in/08/hn/poetry_at_our_time2.html
  3. Tarun
    हमने शुरू में सोचा कि आप अख्‍़तर साहब के लिये कह रहे हैं कि वो अपनी कहानी ले बैठा बाद में पता चला कि ये तो अख्‍़तर साहब कह रहे हैं…:) अनुपजी धन्यवाद अच्छे अच्छे शेरों के लिये।
  4. Pramendra Pratap Singh
    फिराक जी बारे बताने अर्थात लिंक देने के लिये लिये धन्‍यवाद
  5. समीर लाल
    शाहजहाँपुर का गुलेरी जी,
    राजीव खरे जी को जवाब मिले ना मिले, हमे तो बढ़िया मसौदा पढ़ने मिल गया. आपके कलम की रफ़्तार बनी रहे, बस यही कामना है.
    -समीर लाल
  6. रेल्गाड़ी
    साहित्य परिचय के मामले में आपके लेख अत्यन्त की महत्वपूर्ण हैं।
  7. रेलगाड़ी
    साहित्य-परिचय की दृष्टि से आपके लेख अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं।

Wednesday, August 23, 2006

मेरे पिया गये रंगून

http://web.archive.org/web/20110904090426/http://hindini.com/fursatiya/archives/178

मेरे पिया गये रंगून

जब मुझसे विदेश में बसे भारत वासियों के बारे में लिखने के लिये कहा गया तो अचानक बहुत पुराना गाना याद आ गया:-


मेरे पिया गये रंगून
किया है वहाँ से टेलीफून
तुम्हारी याद सताती है।

मैं कभी विदेश में रहा नहीं । मैंने विदेश को हमेशा दूसरों के माध्यम से जाना लेकिन यह जानना अंधों के हाथी के बारे में जानने की तरह है। कौतूहल बना ही रहता है। कुछ-कुछ बच्चन के गीत की तरह:-
इस पार प्रिये तुम हो मधु है,
उस पार न जाने क्या होगा!
जहाँ गया नहीं वहाँ के बारे में टिप्पणी कैसे करूँ। कैसे प्रवास का दुख बखान करूँ? काफी दिन से मैं सोच रहा हूँ कि प्रवासी क्या केवल वही लोग हैं जो विदेश चले गये। वहाँ बस गये ?मुझे तो लगता है कि प्रवास एक अनवरत प्रक्रिया है। पैदा होने से लेकर मरने तक आदमी एक जगह से दूसरी जगह ,दूसरी से तीसरे जगह भटकता रहता है। माँ के पेट से घर,घर से स्कूल,स्कूल से कालेज,कालेज से नौकरी,एक शहर से दूसरे ,दूसरे से तीसरे और देश विदेश भटकना । सब प्रवास ही तो है।
यह अलग बात है कि परदेश जाना पक्का प्रवास माना जाता है।बाकी टुटपुंजिया प्रवास। पक्के प्रवास के दुख भी पक्के होते हैं। ज्यादा महत्वपूर्ण,ज्यादा चमकदार!
मेरी समझ में जितने लोग अपने यहाँ से परदेश जाते हैं वे बेहतर जिंदगी की तलाश में जाते हैं। यह बात अलग है कि कुछ लोग अपनी जान हथेली पर रखकर ‘कबूतर’ बनकर जाते हैं -चोरी-चोरी,चुपके-चुपके। बाकी लोग शानदार तरीके से एअरपोर्ट पर फोटो खिंचवाते हुये जाते हैं।
कुछ लोग यहाँ से किसी कंपनी के माध्यम से निर्यात किये जाते हैं । वहाँ जाकर कुछ दिन कंपनी के साथ रहते हुये मामला सूँघते हैं। फिर अपने पहले आये हुये लोगों के दिये गुरुमंत्र के सहारे कंपनी को छोड़कर दूसरी कंपनियाँ ज्वाइन कर लेते हैं। ऐसे भगोड़े प्रतिभाशाली प्रवासी अपनी पहचान बहुत दिन तक छिपाते रहते हैं।
जब भी मैं घर से बाहर किसी काम से दूसरे शहर जाता हूँ अचानक घर के प्रति मेरा प्रेम बढ़ जाता है। फोन पर बच्चे की पढ़ाई,पत्नी के हालचाल,मां की तबियत सब इतना ज्यादा पूछता हूँ जितना घर में रहते हुये नहीं पूछता। यही शायद प्रवासियों के साथ होता है। वह अचानक देशभक्त हो जाता है। जिस राजनीति के बारे में कभी उसने देश में रहकर कोई बात नहीं सोची वह अचानक उसका विशेषज्ञ बन जाता है।
अपने वतन से दूरी के ये अपरिहार्य उत्पाद हैं।
मेरे घर से मेरा गाँव कुल तीस किलोमीटर है। जाने में अधिक से अधिक से एक घंटा लगता है। लेकिन मैं पिछले साल भर में नहीं गया कभी। लेकिन मेरे पास गाँव वालों को उपदेश देने के लिये पचास योजनायें हैं। अमल में लायें तो वे सुखी हो जायेंगे लेकिन मेरे पास उनको समझाने का समय नहीं है। अब हर आदमी कैफी आज़मी तो होता नहीं जो बंबई छोड़कर अपने गाँव आये तथा लकवा ग्रस्त शरीर के बावजूद अपने गाँव में बिजली,पानी,सड़क,रेलवे स्टेशन के लिये जूझता रहे।
यही हाल तमाम प्रवासियों का होता है। देश से दूर रहकर देश के बारे में सोचने से अधिक कोई भी क्या कर सकता है!
मुझे जितना समझ में आता है कि विदेश जाने वाले अधिक मध्यमदर्जे की प्रतिभा वाले,पढ़ाकू,अनुशासित तथा सुरक्षित जीवन जीने का सपना देखने वाले नवजवान होते हैं। अधिकतर अपनी खानदान के इतिहास में पहली बार विदेश जाते हैं। विदेश गमन उनके परिवार के लिये उपलब्धि होता है। अक्सर इन लोगों के माता-पिता मध्यम दर्जे आर्थिक स्थिति वाले होते हैं जिनको अपने बच्चों को बाहर भेजने की हैसियत दिखाने के लिये अपनी पासबुक में हेरा-फेरी भी करनी पड़ती है ।कुछ दिन के लिये पैसा उधार लेकर अपने खाते में रखना होता है।
इन हालात से अलग भी कुछ लोगों के हालात होते हैं लेकिन वे अपवाद उसी तरह के होंगे जिस तरह अपवाद स्वरूप यह सच है कि अभी भी तमाम सरकारी अधिकारी बेईमानी के अवसर होने पर भी ईंमानदार बने रहते हैं।घूस को आकर्षक प्रस्ताव को ठुकरा कर अपनी तनख्वाह में गुजारा करने का प्रयास करते हैं।
विदेश में खासकर पश्चिम के देशों में पैसा है,चकाचौंध है,आराम है। कुछ दिन वहाँ की दौड़-धूप में परेशान रहने के बाद वहाँ की आदत बन जाती है। बच्चे बड़े होने पर वापस आने की संभावनायें कम होती जाती हैं। बच्चों के लिये वहीं स्वदेश हो जाता है।
जितना मैं समझता हूँ विदेश में तमाम परेशानियाँ झेलनी पड़तीं हैं। ‘नौकर विहीन’ समाज में पैसा कमाने के बाद भी सारा काम खुद करना। अक्सर पहचान का संकट झेलना। जिन कामों को करना देश में हेठी समझा जाता हो वे भी करना। वहाँ के समाज से जुड़ने में भले ही समय लगता हो लेकिन अपने देश से एक बार जाकर फिर वापस आना बहुत जल्द कठिन होता जाता है।
मध्यमवर्गीय परिवारिक संस्कार वाले बच्चे इतना संकट उठाकर वापस आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि नये सिरे से जिंदगी शुरू कर सकें। अब हर आदमी डा.नारायण मूर्ति तो होता नहीं।
विदेश में रहने वाले कोई आसमान से नहीं टपकते। हालात,स्वभाव के अनुसार उनके व्यवहार होते हैं। वे भी उतने ही देशभक्त होते हैं जितने यहाँ रहने वाले तथा उनके बीच भी उतने ही ‘बांगड़ू’ लोग पाये जाते हैं जितने सिरफिरे यहाँ होते हैं।आर्थिक रूप से समृद्ध होने के नाते देश में उससे जुड़े लोगों में कुछ आर्थिक अपेक्षायें भी होती होगीं जो कि सहज स्वाभाविक हैं।
कुछ प्रवासी लोग अक्सर यह कहते पाये जाते हैं कि वे देश को बहुत याद करते हैं ,बहुत प्यार करते हैं,बहुत पैसा भेजते हैं। उससे देश के हालात सुधरते हैं।
मेरा यह मानना है कि यह करके वे कोई देश पर अहसान नहीं करते। यह विकल्प हीनता में करना पड़ता है उनको। कल को कोई बेहतर उपाय होंगे पैसे बचाने ,रखने के वे उनको काम में लायेंगे। जिससे बचपन जवानी में जुड़े रहे उसको याद करना उस पर अहसान करना नहीं होता।
और बहुत कुछ है मेरे मन में लेकिन उसका कोई महत्व नहीं है।इस बारे में अनूप भार्गव ने मेरे मन की सारी बातें कह दीं।
प्रवासियों का सबसे बड़ा दुख है अपने देश से दूर रहने की टीस। घर में रहते हुये भले दीवाली न मनायें ,होली न खेंले लेकिन घर से दूर इसका अभाव खलता है। लेकिन यह मजबूरी है। जैसा अनूप भार्गव ने कहा -हमने अपनी नियति खुद चुनी होती है।
हमारे एक मित्र हैं। पिछले पांच छह सालों से लंदन में हैं। पहले करीब दस साल भारत में एच.सी.एल. में नौकरी करते रहे। बेहतर अवसर की तलाश में लंदन में हैं। परिवार भारत में हैं। पैसा मिल रहा है लेकिन उसकी कीमत क्या है? परिवार से दूर रहकर अकेले रोटी ठोकना। कम से कम दस साल अपनी अहम उमर ,जीवन का सबसे हसीन हिस्सा परिवार से दूर रहकर गुजारना बेहतर है या कुछ कम में साथ रहकर खुशी तलाशना यह चुनाव खुद को करना पड़ता है। कोई दूसरा नहीं तय कर सकता इसे। जैसा कि अनूप भार्गव ने कहा भी है :-

ज़िन्दगी में अधिकांश चीज़ें A La Carte नहीं ‘पैकेज़ डील’ की तरह मिलती हैं । विदेश में रहने का निर्णय भी कुछ इसी तरह की बात है । इस ‘पैकेज़ डील’ में कई बातें साथ साथ आती हैं , कुछ अच्छी – कुछ बुरी । अब क्यों कि उन बातों का मूल्य हम सब अलग-अलग, अपनें आप लगाते हैं इसलिये हम सब का ‘सच’ भी अलग होता है । जो मेरे लिये बेह्तर विकल्प है , वो ज़रूरी नहीं कि आप के लिये भी बेहतर हो ।

कभी-कभी यह सोचकर अजीब सा लगता है कि जितने भी दोस्त मेरे बाहर हैं वे अधिक से अधिक ,अगर साल में एक बार का औसत रख लें,इस जीवन में चालीस-पचास बार भारत आ पायेंगे।
न ही मैं किसी से वापस आने के लिये कहता हूँ न ही यह कि वे वहीं बस जायें लेकिन कभी कभी लगता है:-
ये दुनिया बड़ी तेज चलती है,
बस जीने की खातिर मरती है।
पता नहीं कहाँ पहुँचेगी,
वहाँ पहुँचकर क्या कर लेगी।
प्रवासी विषय पर मैंने यह विचार मानसी का आदेश मानते हुये लिखे। यह मेरे वे विचार जैसा कि मैं सोचता हूँ।सहमत होने न होने का आपको पूरा अधिकार है।
मेरी पसंद
चौंको मत मेरे दोस्त
अब जमीन किसी का इंतजार नहीं करती।
पांच साल का रहा होऊँगा मैं,
जब मैंने चलती हुई रेलगाड़ी पर से
ज़मीन को दूर-दूर तक कई रफ्तारों में सरकते हुये देखकर
अपने जवान पिता से सवाल किया था
कि पिताजी पेड़ पीछे क्यों भाग रहे हैं?
हमारे साथ क्यों नहीं चलते?
जवाब में मैंने देखा था कि
मेरे पिताजी की आँखें चमकी थीं।
और वे मुस्करा कर बोले थे,बेटा!
पेड़ अपनी जमीन नहीं छोड़ते।
और तब मेरे बालमन में एक दूसरा सवाल उछला था
कि पेड़ ज़मीन को नहीं छोड़ते
या ज़मीन उन्हें नहीं छोड़ती?
सवाल बस सवाल बना रह गया था,
और मैं जवाब पाये बगैर
खिड़की से बाहर
तार के खंभों को पास आते और सर्र से पीछे
सरक जाते देखने में डूब गया था।
तब शायद यह पता नहीं था
कि पेड़ पीछे भले छूट जायेंगे
सवाल से पीछा नहीं छूट पायेगा।
हर नयी यात्रा में अपने को दुहरायेग।
बूढ़े होते होते मेरे पिता ने
एक बार,
मुझसे और कहा था कि
बेटा ,मैंने अपने जीवन भर
अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी
हो सके तो तुम भी न छोड़ना।
और इस बार चमक मेरी आँखों में थी
जिसे मेरे पिता ने देखा था।
रफ्तार की उस पहली साक्षी से लेकर
इन पचास सालों के बीच की यात्राओं में
मैंने हजा़रों किलोमीटर ज़मीन अपने पैरों
के नीचे से सरकते देखी है।
हवा-पानी के रास्तों से चलते दूर,
ज़मीन का दामन थामकर दौड़ते हुए भी
अपनी यात्रा के हर पड़ाव पर नयी ज़मीन से ही पड़ा है पाला
ज़मीन जिसे अपनी कह सकें,
उसने कोई रास्ता नहीं निकाला।
कैसे कहूँ कि
विरसे में मैंने यात्राएँ ही पाया है
और पिता का वचन जब-जब मुझे याद आया है
मैंने अपनी जमीन के मोह में सहा है
वापसी यात्राओं का दर्द।
और देखा
कि अपनी बाँह पर
लिखा हुआ अपना नाम अजनबी की तरह
मुझे घूरने लगा,
अपनी ही नसों का खून
मुझे ही शक्ति से देने से इंकार करने लगा।
तब पाया
कि निर्रथक गयीं वे सारी यात्राएँ।
अनेक बार बिखरे हैं ज़मीन से जुड़े रहने के सपने
और जब भी वहाँ से लौटा हूँ,
हाथों में अपना चूरा बटोर कर लौटा हूँ!
सुनकर चौंको मत मेरे दोस्त!
अब ज़मीन किसी का इंतज़ार नहीं करती।
खुद बखुद खिसक जाने के इंतज़ार में रहती है
ज़मीन की इयत्ता अब इसी में सिमट गयी है
कि कैसे वह
पैरों के नीचे से खिसके
ज़मीन अब टिकाऊ नहीं
बिकाऊ हो गयी है!
टिकाऊ रह गयी है
ज़मीन से जुड़ने की टीस
टिकाऊ रह गयी हैं
केवल यात्राएँ…
यात्राएँ…
और यात्राएँ…!
-कन्हैयालाल नंदन

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

21 responses to “मेरे पिया गये रंगून”

  1. निधि
    बहुत सुंदर आलेख। मेरे भी बहुत से मित्र विदेशों में हैं। उनके और पति के अनुभवों से ही मैनें प्रवास की पीड़ा को महसूस किया है। आपके विचारों से मैं सहमत भी हूँ। आखिर प्रवासी यह राह ख़ुद ही तो चुनते हैं। हाँ उनकी बात और है जिनके लिये प्रवास मजबूरी हो। कन्हैया लाल नंदन की कविता बहुत सुंदर लगी।
  2. ई-छाया
    मै इस विषय पर पहले ही लिख चुका हूं। अगर कभी वक्त मिले तो नज़र डाल लीजियेगा।
  3. Tarun
    लिखा तो सही है आपने हर जगह के अपने फायदे और नुकसान होते हैं, अब घर अगर जम्मू हो और काम कोई कन्याकुमारी करे तो उसके लिये भी कुछ कुछ ऐसा ही होगा शायद। हम अपने घर में भी घुमक्कड़ थे और यहाँ विदेश में भी
    अपनी मर्जी से कहाँ, इस सफर के हम हैं
    रूख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।
    सैर कर दुनिया की गालिब, जिन्दगानी फिर कहाँ
    जिन्दगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ।
  4. रेल्गाड़ी
    नमस्कार!
    बहुत सही लिखा है! आगे भी ऐसे ही लिखते रहिये!
  5. समीर लाल
    बहुत सही लिखें हैं, हमारी सलाह आपसे प्रभावित हो कर यहां पढ़ॆं….
    http://udantashtari.blogspot.com/2006/08/blog-post_22.html
  6. आशीष
    प्रवासी होना इक्कीसवी सदी की नियती है, इससे बचना आसान नही है। लेकिन ये कटू सत्य है
    जैसा अनूप भार्गव ने कहा -हमने अपनी नियति खुद चुनी होती है।
    मैने विदेश यात्राये की है, खूब की है ! सबसे लम्बा प्रवास लगभग १ १/२ साल का रहा है। मैने भी यह महसूस किया है कि विदेश मे मिलने वाली सुविधाओ का मोह वहां से वापिस आने से रोकता है।
    घर से दूर रहने की टीस, संसकृति से दूर रहने का दर्द यह सब कहने सुनने के लिये ही ठीक लगता है, डालर की चकाचौंध और सुविधायें इन सभी पर भारी पढ जाती है। क्यो अधिकतर प्रवासी वहां पहुचने के साथ हरे पत्ते के जुगाड मे लग जाते है ?
    रहा पैसो का भारत भेजना, यह भारत पर कोई ऐहसान तो बिल्कुल नही है, ये सिर्फ अपने लाभ के लिये ही होता है। और ये अपने लाभ के लिये ना भी हो तो भारत सरकार द्वारा उनकी शिक्षा पर किये गये गये खर्च की भरपाई से ज्यादा कुछ नही है।
    मै काफी दिनो से अमरीका(विदेश) और भारत पर लिखने से बच रहा था, अब लगता है लिखना पढेगा….
  7. प्रत्यक्षा
    कविता बहुत अच्छी लगी । अनूप भार्गव की बात बेहद सटीक !
  8. जीतू
    फुरसतिया जी, लेख सुन्दर लेख लिखे हो। आपका लेख पढकर आज दो लेख याद आ गया पहला राजेश प्रियदर्शी का लेख , सपने, संताप और सवाल और दूसरा एक प्रवासी का दर्द दर्शाती अचला शर्मा का जो ना लौट सके । हमने भी कभी कोशिश की थी, इस बारे में लिखने की। उस बारे मे फिर कभी।
  9. सागर चन्द नाहर
    कि पेड़ ज़मीन को नहीं छोड़ते
    या ज़मीन उन्हें नहीं छोड़ती?

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ है। इन सवालों का जवाब में भी कई वर्षों से खोज रहा हुँ, अब तक नहीं मिला।
  10. Hindi Blogger
    बहुत बढ़िया.
    आप बार-बार प्रवासी जीवन की बात छेड़ न सिर्फ़ दर्जन भर टिप्पणियाँ बटोर जाते हैं, बल्कि कुछेक नए लेख भी लिखवा देते हैं. याद करें, कलकत्ता प्रवास पर गए बिहारियों को लेकर भोजपुरी लोकसाहित्य किस क़दर समृद्ध हुआ है, ख़ासकर प्यार और करुणा से भरपूर हज़ारों विरह गीत लिखे गए हैं.
    आम प्रवासियों की स्थिति(आर्थिक नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से) आम स्थानिकों के मुक़ाबले बेहतर कभी नहीं कही जा सकती. ये बात क्षेत्रीय प्रवास(दरभंगा से मुंबई, या दागेस्तान से मॉस्को) और अंतरराष्ट्रीय प्रवास(लुधियाना से मैनचेस्टर, या बोस्टन से पेरिस) दोनों पर लागू होती है.
    गर्व की अनुभूति होती है जब भारतीय प्रवासियों को लेकर अच्छी ख़बरें आती हैं. इसी हफ़्ते इंदिरा नूयी के पेप्सीको का प्रमुख बनाए जाने की ख़बर आई, तो आज ही भारतीय मूल के आनंद सत्यानंद के न्यूज़ीलैंड का गवर्नर जनरल बनने की ख़बर आई है.
    विदेशों में भारत का नाम रोशन करने वालों को सलाम!
  11. अतुल
    लेख हमेशा पढ़ता हूँ, पर साफगोई से स्वीकारता हूँ कि कविता हमेशा नही पढ़ता (समझ नही आती इसीलिये), पिछली बार धूमिल की पढ़ी थी दिल से , आज यह वाली पढ़ कर एक कविता याद आ गई।
    उसका शीर्षक है “अमेरिका सुविधायें देकर हड्डियों मे बस जाता है” वेब दुनिया पर देखी थी बरसो पहले। अब ढूढ़े नही मिलती। शायद डा. सुमन राजे ने लिखी है।
  12. हिमांशु
    हर व्यक्ति कुछ बेहतर की चाह में गाँव से छोटे शहर और फिर बडे शहर और फिर महानगर और फिर विदेश की और खिंचता रहता है। माँ-बाप इस चाह में बच्चों को ढकेलते रहते हैं कि जो वो ना कर पाये, बच्चे करें। बाकी सब शब्दों के खेल हैं और सब के पास इतना दिमाग है कि जब चाहा अपना नया ‘सच’ बना लें।
    अब जब से दिमाग ने कुछ सोचना-समझना प्रारम्भ किया है मेरी सोच बदली है। आगे पढें…
    मेरा ये सोचना है कि, अगर मैं जिस ज़मीं पर पैदा हुआ, पला-बढा पर उसे भूल जाऊं तो यह अहसान-फ़रमोशी होगी। मनुष्य भी किसी जगह के प्राकृतिक उत्पाद है, फल, अनाज, पानी, खनिज की तरह। मेरा अनुभव है कि उस जगह की प्रगति में योगदान आवश्यक ही नहीं वरन एक ऐसा कार्य है जो ऐकाकी/स्वार्थी जीवन की नीरसता को तोडता है और तनाव घटाता है।
    भारत पैसा भेजने के बारे में: हाँ, गत एक वर्ष से मैं जो भी पैसा-धेला कमाता हूं उसका २-३% नि:स्वार्थ समाज के लिये होता है, मुख्यत: भारत के उस स्थान के लिये जहाँ मैं पला-बढा। सर्वमान्य ग्रन्धों मे और सन्त-जनों/बुद्धिजीवियों की बातों में ऐसा करना जरूरी बताया गया है।
    साथ ही मेरे समय का २-३% (जो हुआ १ घण्टा हर सप्ताह) भी सामजिक कार्यों को जाता है। अमरीका में साल में २००० घण्टों का कार्य समय माना जाता है।
    दूरी सिर्फ़ दिलों में होती है। ” वसुधैव कुटुम्बकम ” भूल गये? वेदों में मैंने पढा है कि शिक्षित लोगों को यात्राओं से परहेज नहीं करना चाहिये। मैं मानता हूं कि यात्रा और नई जगहों पर रहने के कारण मैंने बहुत कुछ सीखा है और अपने आप को कर्म-योगी बना पाने की दिशा में कुछ कर पाया हूँ जो मैं एक जगह पर रहकर कभी नहीं कर पाता।
  13. राकेश खंडेलवाल
    याद है
    तुमने कहा था
    घाटियों के पार
    सूरज की किरन का देश है
    और मैं
    रब से यह सोच रहा हूँ
    कि मैं
    घाटियों के
    इस पार हूँ या उस पार
  14. राकेश खंडेलवाल
    अतुलजी की टिप्पणी में जिस कविता का जिक्र है वह न्यूयार्क में रहने वाली
    डा० अंजना संधीर की लिखी हुई रचना है अगर आप चाहें तो यह आपको उपलब्ध कराई जा सकती है
  15. जीतू
    [blockquote]अतुलजी की टिप्पणी में जिस कविता का जिक्र है वह न्यूयार्क में रहने वाली डा० अंजना संधीर की लिखी हुई रचना है अगर आप चाहें तो यह आपको उपलब्ध कराई जा सकती है -राकेश खंडेलवाल [/blockquote]
    राकेश भाई, नेकी और पूछ पूछ, यार चिपका दो, यहाँ या फिर अपने ब्लॉग पर। अतुल के साथ साथ बाकी लोग भी पढकर खुश हो लेंगे।
  16. अतुल
    राकेश जी, नेकी और पूछ पूछ!
  17. अनूप भार्गव
    एक संतुलित लेख के लिये बधाई । नन्दन जी की कविता बहुत गहराई लिये है ।
    कुछ और विचार हैं इस विषय में, कभी फ़ुरसत से लिखेंगे।
    प्रवासी पीड़ा/दुविधा पर मेरी दो प्रिय कविताएं हैं । एक तो अंजना संधीर जी कि ” अमेरिका हड्डियों में जम जाता है” जिस के विषय में अतुल और राकेश जी नें लिखा । दूसरी कविता डा. विनोद तिवारी जी की है जो आप काव्यालय पर पढ सकते हैं :
    http://manaskriti.com/kaavyaalaya/pravaasee_geet.stm
    मेरे पास ये दोनों कविताएं कवियों की स्वयं की आवाज़ में हैं (MP3 format) , अगर ज्ञानी जन मुझे बता सकें कि उसे किस तरह सब के साथ बाँटा जा सकता है तो मैं खुशी के साथ वह करनें को तैय्यार हूँ ।
  18. फ़ुरसतिया » अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है
    [...] [अतुल ने प्रवासी जीवन के बारे में लिखी मेरी पोस्ट में डा.अंजना संधीर की कविता ,अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है, का जिक्र किया था। इस कविता का अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुका है। अनूप भार्गव जी ने वह कविता मुझे भेजी है। मैं यहाँ पर डा. अंजना संधीर की कविता पोस्ट कर रहा हूँ-डा. अंजना संधीर तथा अनूप भार्गव जी को धन्यवाद देते हुये।] वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत हाई-वे, जिन पर चलती हैं कारें, तेज रफ्तार से कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते, टेलीफोन करते, दूर-दूर कारों में रोमांस करते, अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है। [...]
  19. A beautiful hindi poem « From Thoughts To Words
    [...] courtsey : http://www.hindini.com/fursatiya/?p=178   [...]
  20. भोला नाथ उपाध्याय
    विदेश प्रवास पर एक गम्भीर एवं विचार परक लेख लिखने के लिये कोटि कोटि साधुवाद स्वीकार करें ।
  21. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 13. हरिशंकर परसाई- विनम्र श्रद्धांजलि 14. मेरे पिया गये रंगून 15. वो तो अपनी कहानी ले बैठा… [...]

Tuesday, August 22, 2006

हरिशंकर परसाई- विनम्र श्रद्धांजलि

http://web.archive.org/web/20140420082228/http://hindini.com/fursatiya/archives/177

हरिशंकर परसाई- विनम्र श्रद्धांजलि

हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई
करीब १५ साल पहले की बात है। मैं किसी काम से जबलपुर गया था। मुझे याद आया कि परसाईजी तो जबलपुर में ही रहते हैं। मैंने उन दिनों तक उनका लिखा बहुत कम पढ़ा था लेकिन जितना पढ़ा था उतने से वे मेरे पसंदीदा लेखक बन गये थे। मुझे उनके घर का पता नहीं मालूम था लेकिन यह पता था कि वे नेपियर टाउन में रहते थे।
मैं खमरिया से नेपियर टाउन आया तथा खोजते-खोजते उनके घर पहुँच गया। शाम का समय था वे बरामदे में तखत पर लेटे थे। साफ-सफेद कुर्ता-पायजामा पहने। लेटे-लेटे ही करीब एक घंटा बातें करते रहे। यह मुझे बाद में पता चला कि वे सालों से बिस्तर तक ही सीमित थे। बातचीत के दौरान उन्होंने एक भी शब्द अपनी बीमारी-परेशानी के बारे में नहीं कहा। न कुछ अपने साहित्य के बारे में बोले। मैं उन दिनों उड़ीसा के पिछड़े इलाके बालासोर में तैनात था। वे वहाँ के आदिवासियों के बारे में बातें करते रहे।
मैं उनसे मिलकर चला आया। बाद में जब धीरे-धीरे उनके साहित्य से परिचित होता गया तो उनका महत्व मुझे पता चला। तब मुझे पता चला कि मैं जिस व्यक्ति से मिलकर आया हूँ उनके साहित्य और व्यक्तित्व की क्या ऊँचाई है।
जब उनकी मृत्यु हुई तब मैंने जनसत्ता में प्रभास जोशी का सम्पादकीय पढ़ा। सम्पादकीय पढ़कर मुझे लगा जैसे कि परसाई जी ने जितना ज्यादा लेखन किया है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण काम शराब का किया है। यह हमारे देश की महानता है कि हर प्रतिमा पर कालिख पोतने को तत्पर रहते हैं। पूरा प्रयास करते हैं कि जितनी जल्दी हो सके दूसरे को नंगा करके तनावमुक्त हुआ जा सके।
धीरे-धीरे करके मैं उनके सारे साहित्य से परिचित होता गया। उनके लगभग सारा छपा हुआ साहित्य मेरे पास है और यह मेरे पुस्तक संग्रह की सबसे कीमती चीज है।उनके लेखन से पता चलता है कि परसाईजी की दृष्टि कितनी साफ थी। वे चीजों के आर-पार देखते थे।उनकी निगाह स्थानीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर रहती थी।
व्यंग्य लेखन में वे किसी को भी बख्सते नहीं थे। उनका व्यंग्य तिलमिला देने वाला होता था। उनके व्यंग्य से ही तिलमिला कर लोगों ने उनकी पिटाई भी कर दी। वे अस्पताल गये तथा लेख लिखा-मेरा लिखना सार्थक हुआ।
परसाईजी ने व्यंग्य को हिंदी लेखन में प्रतिष्ठा दिलाई।उनका लेखन समसामयिक घटनाओं पर आधारित रहता था । कुछ लोग इसे तात्कालिक लेखन मानते थे और कहते थे कि परसाई जी को कुछ ‘कालजयी’ लिखना चाहिये।शाश्वत साहित्य। इस पर परसाईजी का कहना था-


मैं शाश्वत साहित्य रचने का संकल्प लेकर लिखने नहीं बैठता। जो अपने युग के प्रति ईमानदार नहीं रहता ,वह अनन्तकाल के प्रति कैसे हो लेता है,मेरी समझ से परे है।
परसाईजी ने अपनी लगी लगाई नौकरी छोड़कर लिखना शुरू किया। नौकरी छोड़ते ही तमाम परेशानियाँ आईं लेकिन वे विचलित नहीं हुये। लिखते रहे। फिर तो ऐसा हुआ कि जिस अखबार ,पत्रिका में लिखा उसका सर्कुलेशन बढ़ गया।परसाई जी जबलपुर रायपुर से निकलने वाले अखबार देशबंधु में पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। स्तम्भ का नाम था-पूछिये परसाई से। पहले हल्के इश्किया और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे । धीरे-धीरे परसाईजी ने लोगों को गम्भीर सामाजिक-राजनैतिक प्रश्नों की ओर प्रवृत्त किया। दायरा अंतर्राष्ट्रीय हो गया। यह सहज जन शिक्षा थी।लोग उनके सवाल-जवाब पढ़ने के लिये अखबार का इंतजार करते थे।
परसाईजी कहते थे कि मैं सुधार के लिये नहीं बदलने के लिये लिखता हूँ। वे यह भी मानते थे कि सिर्फ लेखन से क्रांति नहीं होती हाँ उसकी भावभूमि जरूर बन सकती है। वे कहते थे कि मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती। नवजवानों को सम्बोधित करते हुये उन्होंने लिखा है:-


मेरे बाद की और उसके भी बाद की ताजा,ओजस्वी,तरूण पीढ़ी से भी मेरे संबंध हैं।नये से नये लेखक से मेरी दोस्ती है। मैं जानता हूँ ,इनमें से कुछ काफी हाउस में बैठकर काफी के कप में सिगरेट बुझाते हुये कविता और कविता की बात करते हैं। मैं इन तरुणों से कहता हूँ कि अपने बुजुर्गों की तरह अपनी दुनिया को छोटी मत करो। यह मत भूलो कि इन बुजुर्ग साहित्यकारों में अनेक ने अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे वर्ष जेल में गुजारे । बालकृष्ण शर्मा’नवीन’,माखनलाल चतुर्वेदी और दर्जनों ऐसे कवि हैं। वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़े।रामप्रसाद’बिस्मिल’ और अशफाक उल्ला खाँ ,जो फाँसी चढ़े,कवि थे। लेखक को कुछ हद तक एक्टिविस्ट होना चाहिये। सुब्रह्‌मण्यम भारती कवि और ‘एक्टिविस्ट’ थे। दूसरी बात यह है कि कितने ही अंतर्विरोधों से ग्रस्त है यह विशाल देश,और कोई देश अब अकेले अपनी नियति नहीं तय कर सकता। सब कुछ अंतर्राष्ट्रीय हो गया है। ऐसे में देश और दुनिया से जुड़े बिना ,एक कोने में बैठे कविता और कहानी में ही डूबे रहोगे ,तो निकम्मे,घोंचू और बौड़म हो जाओगे।
परसाईजी अकेले ऐसे रचनाकार थे जिनकी रचनावली का प्रकाशन उनके जीवित रहते हुआ। उन्होंने लिखा:-


रचनावली का प्रकाशन लेखक की मृत्यु के बाद ही ठीक रहता है। एक तो लेखक हस्तक्षेप करने के लिये नहीं होता,वह रचनाओं का चुनाव नहीं कर सकता और वे बाध्यतायें नहीं रहतीं जो ‘मुंहदेखी’ के कारण पैदा होतीं हैं। पुराने मित्रों में मैं स्वामीजी ‘कहलाता’ हूँ। परम्परा है कि सन्यासी अपना श्राद्ध स्वयं करके मरता है। तो रचनावली मेरा अपना श्राद्धकर्म है,जो कर दे रहा हूँ। वैसे मैं अभी जवान हूँ,मगर श्राद्ध अभी कर दे रहा हूँ।

परसाईजी लेखन मेरे लिये सदैव मार्ग दर्शक रहा। आज परसाईजी का जन्मदिन है। इस अवसर मैं उनके प्रति विनम्र श्रद्धांजलि प्रकट करता हूँ।
मेरी पसंद
1.इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं,पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.
2.जो कौम भूखी मारे जाने पर सिनेमा में जाकर बैठ जाये ,वह अपने दिन कैसे बदलेगी!
3.अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिये.जरूरत पडी तब फैलाकर बैठ गये,नहीं तो मोडकर कोने से टिका दिया.
4.अद्भुत सहनशीलता और भयावह तटस्थता है इस देश के आदमी में.कोई उसे पीटकर पैसे छीन ले तो वह दान का मंत्र पढने लगता है.
5.अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है.
6.चीनी नेता लडकों के हुल्लड को सांस्कृतिक क्रान्ति कहते हैं,तो पिटने वाला नागरिक सोचता है मैं सुसंस्कृत हो रहा हूं.
7.इस कौम की आधी ताकत लडकियों की शादी करने में जा रही है.
8.अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.
9.जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का खून बिना छना पी जाते हैं .
10.नशे के मामले में हम बहुत ऊंचे हैं.दो नशे खास हैं–हीनता का नशा और उच्चता का नशा,जो बारी-बारी से चढते रहते हैं.
11.शासन का घूंसा किसी बडी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बडी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूंसा पड जाता है.
12.मैदान से भागकर शिविर में आ बैठने की सुखद मजबूरी का नाम इज्जत है.इज्जतदार आदमी ऊंचे झाड की ऊंची टहनी पर दूसरे के बनाये घोसले में अंडे देता है.
13.बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है.
14.मानवीयता उन पर रम के किक की तरह चढती – उतरती है,उन्हें मानवीयता के फिट आते हैं.
15.कैसी अद्भुत एकता है.पंजाब का गेहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है और मध्यप्रदेश का चावल कलकत्ता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है.देश एक है.कानपुर का ठग मदुरई में ठगी करता है,हिन्दी भाषी जेबकतरा तमिलभाषी की जेब काटता है और रामेश्वरम का भक्त बद्रीनाथ का सोना चुराने चल पडा है.सब सीमायें टूट गयीं.
16.रेडियो टिप्पणीकार कहता है–’घोर करतल ध्वनि हो रही है.’मैं देख रहा हूं,नहीं हो रही है.हम सब लोग तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं.बाहर निकालने का जी नहीं होत.हाथ अकड जायेंगे.लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं फिर भी तालियां बज रही हैं.मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं ,जिनके पास हाथ गरमाने को कोट नहीं हैं.लगता है गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है.गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की तालियां मिलती हैं,जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा नहीं है.
17.मौसम की मेहरवानी का इन्तजार करेंगे,तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी.मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होता.वसंत अपने आप नहीं आता,उसे लाना पडता है.सहज आने वाला तो पतझड होता है,वसंत नहीं.अपने आप तो पत्ते झडते हैं.नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं.वसंत यों नहीं आता.शीत और गरमी के बीच जो जितना वसंत निकाल सके,निकाल ले.दो पाटों के बीच में फंसा है देश वसंत.पाट और आगे खिसक रहे हैं.वसंत को बचाना है तो जोर लगाकर इन दो पाटों को पीचे ढकेलो–इधर शीत को उधर गरमी को .तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसंत.
18.सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं.एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की.उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है.चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है.पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं.वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं.हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है.
19.एक और बडे लोगों के क्लब में भाषण दे रहा था.मैं देश की गिरती हालत,मंहगाई ,गरीबी,बेकारी,भ्रष्टाचारपर बोल रहा था और खूब बोल रहा था.मैं पूरी पीडा से,गहरे आक्रोश से बोल रहा था .पर जब मैं ज्यादा मर्मिक हो जाता ,वे लोग तालियां पीटने लगते थे.मैंने कहा हम बहुत पतित हैं,तो वे लोग तालियां पीटने लगे.और मैं समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसे,उसमे क्या कभी कोई क्रन्तिकारी हो सकता है?होगा शायद पर तभी होगा जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबडे टूटेंगे .
20.निन्दा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं.निन्दा खून साफ करती है,पाचन क्रिया ठीक करती है,बल और स्फूर्ति देती है.निन्दा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं.निन्दा पयरिया का तो सफल इलाज है.सन्तों को परनिन्दा की मनाही है,इसलिये वे स्वनिन्दा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं.
21.मैं बैठा-बैठा सोच रहा हूं कि इस सडक में से किसका बंगला बन जायेगा?…बडी इमारतों के पेट से बंगले पैदा होते मैंने देखे हैं.दशरथ की रानियों को यज्ञ की खीर खाने से पुत्र हो गये थे.पुण्य का प्रताप अपार है.अनाथालय से हवेली पैदा हो जाती है.
-हरिशंकर परसाई

13 responses to “हरिशंकर परसाई- विनम्र श्रद्धांजलि”

  1. आशीष
    परसाई जी मेरे भी पसंदीदा व्यंगयकारो मे रहे है। मुझे उनका एक व्यंग्य “दो नाक वाले लोग” काफी पसंद रहा है।
    इसी व्यंग्य की कुछ पंक्तिया (स्मृती के आधार पर)
    “कुछ लोगो की नाक कलमदार होती है। जैसे ही खुशबू कम होने लगी कलम करवा ली।”
    “जैसे कीसी लडकी को छेड दिया और जुते खा गये। जुते खा गये अजब मुहावरा है, जुते तो मारे जाते है खाये कैसे जाते है ? मगर भारतवासी इतना भूखमरा है कि जुते भी खा जाता है”
    “चोरी की इलजाम मे पकडे गये हौ और बाजार से हथकडी लगा के ले जाये जा रहे है। इनकी नाक तो इनकी तिजोरी मे है, जेल से छुटने के बाद फिर पहन लेंगे”
  2. ई-छाया
    वाह वाह। आपने जो इक्कीस उक्तियां उद्धृत की हैं उनका तो जवाब नही है। कई कई बार पढा। आर पार चीर देने वाली सच्चाई से ओत प्रोत। बहुत उम्दा।
    परसाई जी को मेरी भी विनम्र श्रद्धांजलि।
  3. भारत भूषण तिवारी
    श्रद्धांजलि में दो पुष्प हमारी ओर से.परसाई जी का काफ़ी सारा साहित्य मैंने भी पढा और पढवाया है. इतना ही नहीं, पढने वालों में ‘बदलाव’ (‘सुधार’ नहीं) भी महसूस किया है. लेखन को ‘स्वांत: सुखाय’ के दायरे से निकालकर उसे उसके सामाजिक दायित्व के प्रति सचेत करने वाले साहित्यकारों में परसाई जी का नाम अग्रगण्य है.
    इन सारे लेखों के लिए फिर एक बार धन्यवाद!
  4. रवि
    ..उनके लगभग सारा छपा हुआ साहित्य मेरे पास है और यह मेरे पुस्तक संग्रह की सबसे कीमती चीज है…
    तब तो आपके संग्रह-दर्शन हेतु शीघ्र प्रबंध करना होगा:)
    …7.इस कौम की आधी ताकत लडकियों की शादी करने में जा रही है. …
    और बाकी बची आधी – धर्म-कर्म और पाखण्डों में !
  5. समीर लाल
    परसाई जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
    आशा है आप परसाई जी का साहित्य पूर्व की तरह ही आगे भी समय समय पर हम सबको पढ़वाते रहेंगे.
  6. anunad
    इस छोटी सी बानगी को पढ़कर ही उस गहराई का अन्दाजा लग जाता है जहां तक परसाई जी का चिन्तन पहुचा हुआ था।
  7. Hindi Blogger
    परसाई जी के रचना-संसार से 21 बेशकीमती मोती चुन कर लाने के लिए धन्यवाद!
  8. abhishek
    dhaynbad ,
  9. Anonymous
    परसाई जी मेरे भी पसंदीदा व्यंगयकारो मे रहे है।
    परसाईजी ने व्यंग्य को हिंदी लेखन में प्रतिष्ठा दिलाई।उनका लेखन समसामयिक घटनाओं पर आधारित रहता था । कुछ लोग इसे तात्कालिक लेखन मानते थे और कहते थे कि परसाई जी को कुछ ‘कालजयी’ लिखना चाहिये।शाश्वत साहित्य। इस पर परसाईजी का कहना था-
    मैं शाश्वत साहित्य रचने का संकल्प लेकर लिखने नहीं बैठता। जो अपने युग के प्रति ईमानदार नहीं रहता ,वह अनन्तकाल के प्रति कैसे हो लेता है,मेरी समझ से परे है।
    परसाई जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
  10. हरिशंकर परसाई के जन्मदिन के मौके पर
    [...] हरिशंकर परसाई- विनम्र श्रद्धांजलि करीब १५ साल पहले की बात है। मैं किसी काम से जबलपुर गया था। मुझे याद आया कि परसाईजी तो जबलपुर में ही रहते हैं। मैंने उन दिनों तक उनका लिखा बहुत कम पढ़ा था लेकिन जितना पढ़ा था उतने से वे मेरे पसंदीदा लेखक बन गये थे। मुझे उनके घर का पता नहीं मालूम था लेकिन यह पता था कि वे नेपियर टाउन में रहते थे। [...]
  11. atul joshi
    हरिशंकर परसाई बहुत ही अच्छे व्यंगकार हैं. उनकी सरलता ही उनकी रचना की विशेषता है . मैं विज्ञानं का स्टुडेंट हूँ फिर भी दुनिया की धोखेबाजी से परेशां हो जाता हूँ तो उनकी रचना मेरे मन को एक अद्भुत शांति देती है साथ में मेरे साथ मिलकर एक विरोध भी करती है. परसाई जी हमेशा अपनी रचनाओ के साथ जिंदा रहेंगे .धन्यवाद इस सुंदर अवसर के लिए..!
  12. swarnim
    हरिशंकर परसाई बहुत ही अच्छे व्यंगकार हैं. उनकी सरलता ही उनकी रचना की विशेषता है . मैं विज्ञानं का स्टुडेंट हूँ फिर भी दुनिया की धोखेबाजी से परेशां हो जाता हूँ तो उनकी रचना मेरे मन को एक अद्भुत शांति देती है साथ में मेरे साथ मिलकर एक विरोध भी करती है. परसाई जी हमेशा अपनी रचनाओ के साथ जिंदा रहेंगे .धन्यवाद इस सुंदर अवसर के लिए..!
  13. swati
    नमस्कार!!!!!!….परसाई जी की रचनाएँ पढने के बाद मैं सोच में पड़ जाती हूँ
    की कैसे कोई व्यक्ति कभी टौर्च वाला बन कर सीधा सदा सा प्रश्न पूछता है …..”कैसे “???????……..फिर वाही फाइल में भोलाराम का जिव बन कर पूछता है ….”क्यों “????…….ऐसा क्यों ….क्या आम आदमी का अपना सा दिखने वाला आम पर विचित्र रचनाकार हैं हरिशंकर परसाई ……