Friday, December 06, 2019

हमको हल्के में न लेना



 हमने अमेरिका जाने का प्रोगाम झटके में बनाया था। इधर वीजा हुआ , उधर टिकट खरीद लिया। २० दिन बाद का। कोई तैयारी नहीं। अनुमति वगैरह के लफ़ड़े तो थे ही इसके अलावा भी तमाम तैयारी करनी थी। दिन कम। सबसे बड़ा काम जो बचा था वह लोगों को बताने का था –’अमेरिका जा रहे हैं। हल्के में मत लेना।’

लोगों को बताने का काम शुरु किया तो एक दिन में ही सबको पता चल गया। कोई और बचा ही नहीं बताने को। लेकिन हमको लगे कि अभी सबको बताया नहीं। इस चक्कर में कुछ लोगों को कई-कई बार बताया। लोग झेल गये। इसके बाद लोगों ने भी कायदे से बदला चुकाया। हम किसी को काम बताते अगला पूछता –’साहब, अमेरिका कब जा रहे हैं?’ किसी को पूछते –’काम कब तक हो जायेगा?’ अगला कहता –’आपके अमेरिका जाने/लौटने से पहले हो जायेगा।’ हाल यह कि हमारी अमेरिका यात्रा ग्रीन विच मीन टाइम हो गयी। कोई काम या तो हमारे अमेरिका जाने के पहले पूरा हो जायेगा या वहां से वापस लौटने पर।
बात यहीं तक रहती तो ठीक था। बाद में हाल यह हुआ कि हम किसी की गलती पर उसको हड़काने की सोचते तो अगला बिना हड़के हमसे पूछ लेता –’साहब, अमेरिका कब जा रहे हैं?’ हमारे गुस्से की मिसाइल पर को अपने सवाल की एंटी निसाइल से ध्वस्त कर देता। हाल यह हुआ कि हर आने-जाने को देखते ही हम डर लगता कि कहीं यह पूछ न ले –’साहब, अमेरिका कब जा रहे हैं।’
अमेरिका यात्रा हमारे लिये बवाल हो गयी।
बहरहाल, जब प्लान बन गया तो तैयारी भी हो ही गयी। लेकिन इस बीच लोगों ने डराया बहुत- ’बहुत सर्दी पड़ेगी इस मौसम में वहां। यह ठीक मौसम नहीं है।’ लेकिन डेढ लाख की टिकट खरीद कर बैठा इन्सान इन बातों से चाहने के बावजूद भी विचलित होने की विलासिता नहीं कर सकता।
लेकिन मेहरबानी रही सूरज भाई कि हम जहां-जहां रहे वहां-वहां रोशनी और गर्मी का पक्का जुगाड़ करते रहे। हवाओं ने ठंड फ़ैलाने की कोशिश की तो हडका दिया –’औकात में रहो।’ कुल मिलाकर मौसम आशिकाना ही रहा।’ जलवे का हिसाब यह समझा जाये कि हमारे न्यूयार्क छोड़ते ही मौसम ठंडा हो गया। बर्फ़ गिरने लगी।
हां तो बात फ़िर न्यूयार्क की। दो दिन देखने के बाद भी बहुत कुछ बचा था देखने को। हम निकल लिये। घरैतिन आराम के मूड में थीं उस दिन। हमको अकेले जाने की अनुमति मिल गयी। जाओ देख लो जी भर के। कोई अरमान बाकी न रहें। हम भी निकल्लिये। पहुंच गये न्यूयार्क।
स्टेशन से ही हमने फ़ोनियाया अभिषेक ओझा को। बोले –’बस अभी पहुंचते न्यूयार्क। मिलते हैं।’ बलियाटिक अभिषेक के गणित के किस्से और पटनिहा प्यार के किस्सों के हम मुरीद हैं। कानपुर आई.आई.टी. से बीटेक करने के बाद कुछ दिन एक बड़ी कम्पनी में काम किया। इसके बाद अपने दोस्तों के साथ खुद का काम शुरु किया।
अभिषेक के आने तक अपन ने बाकी बचा हुआ न्यूयार्क देख डाला। फ़ोटो खैंच डालीं। बुलन्द इमारतों निहार डाला। एकाध से कहा भी – ’कानपुर में होती तो तुम्हारी दीवारों पर पीक-श्रंगार भी हुआ होता। यहां तुम खड़ी हो अकेली खूबसूरती समेटे।’ इमारतों की दीवारें कुछ बोलीं नहीं। लगता है यहां की दीवारों के कान नहीं होते या वे कुछ ऊंचा सुनती हैं।
कुछ देर पैदल टहलने के बाद अपन ने बस पकड़ी। पैसा दिये थे तो वसूल भी लें वाली गरज भी हावी थी। राकफ़ेलर सेंटर पर उतर गये ।
राकफ़ेलर सेंटर में न्यूयार्क की 48 वीं गली से 51 वीं गली के बीच बने कई कामर्शियल इमारते हैं। सन 1950 से 1961 के मंदी के दौर में बनी ये इमारतें अपने समय की सबसे बड़ी परियोजना थी। इमारतें अपनी कला, मजबूत नींव और क्रिसमस ट्री के लिये प्रसिद्ध हैं।
राकफ़ेलर सेंटर पर पहुंचे तो देखा कि खूब ऊंचा ढांचा बन रहा था जैसे कोई शादी का बड़ा सा मंडप बन रहा हो। लेकिन उंचाई देखकर लगा कि शादी का मंडप इत्ता ऊंचा नहीं होता। यह तो किसी बिजलीघर का व्यायलर हाउस जैसा बन रहा। खुटुर-खुटुर जारी थी। क्रेन भी लगी थी। पता चला कि ऊंचा क्रिसमस ट्री बन रहा है।
वहीं सेंटर पर ही बर्फ़ का स्केटिंग रिंग बना था। लोग स्केटिंग कर रहे थे। काश हम भी कर पाते। स्केटिंग भी साइकिल सीखने जैसा ही जटिल काम है। शुरु में सीख ले तो ठीक वर्ना फ़िर न हो पाता। हमारे दोस्त सुरेन्द्र सिंह सावन्त माउथ आर्गन बजाते हुये स्केटिंग करते थे। उनका चेहरा और याद बिना वीजा, पासपोर्ट और टिकट के सामने आकर खड़ी हो गयी। देरतक खड़ी रही फ़िर अभिषेक आ गये तो याद वापस चली गयी।
राकेफ़ेलर सेंटर पर काफ़ी देर खड़े रहने के बतियाने के बाद हम सड़क पर टहलने निकले। एक आदमी स्टील कलर की कपड़ों और पेंट में मूर्ति की तरह खड़ा था। पैसे लेकर साथ में फ़ोटो खिंचाने की अनुमति दे रहा था। हमने भी खिंचाई। सोचा भी कि अमेरिका में मांगने वालों के भी जलवे हैं।
एक बड़ी इमारत के पास कुछ पुलिस के सिपाही खड़े थे। स्मार्ट, हीरो टाइप। उनके पास अपनी पुलिस की तरह डंडा नहीं था लिहाजा चेहरे से रुआब और आतंक वाला भाव भी नदारत। डंडा अपनी पुलिस की ताकत है। उसके पास फ़टकते हुये भी आम आदमी डरता है। डंडा-विहीन अमेरिका पुलिस का सिपाही माई डियर टाइप लग रहा था। उसका ’माईडियरपना’ तब और बढ गया जब उसने साथ खड़े होकर मुस्कराते हुये फ़ोटो खिंचाई।
पास ही ट्रम्प टावर है। उसे भी देखने गये। ट्रम्प टावर का ऊपरी मंजिल पर ट्रम्प का एक घर है। बाकी में होटल, रेस्तरां। अन्दर जाने का कोई टिकट नहीं सो हम घुस गये। नीचे काउंटर पर ही ट्रम्प और उनसे जुड़ी चीजें बिक रही थीं। कैप, टी-शर्ट, बैज आदि। अमेरिका के लोग बेंचना अच्छी तरह से जानते हैं।
ऊपर पहुंचकर अपन ने लाटे टी पी। कुछ देर आते-जाते लोगों को ताका। कुछ को नहीं ताक पाये तो बाकी लोगों के लिये छोड़ दिया। रेस्टरूम का उपयोग किया। कोई कहे तो बातचीत में शेखी मार सकते हैं-’ हमको हल्के में न लेना, ट्रम्प टावर में निपट के आये हैं।’
ट्रम्प टावर पर ट्रम्प का घर होने के बावजूद पुलिस बहुत कम थी। दस-बारह लोग। टावर के बाहर ही एक आदमी ट्रम्प की शक्ल बनाये टहल रहा था। उनकी ही तरह हरकतें करता। उंगली उठाता, मुंह बनाता। लोग उसको देखते मजे ले रहे थे जैसे दुनिया ट्रम्प की अदाओं के मजे लेती है। ट्रम्प का हमशक्ल भी लोगों की प्रतिक्रियाओं से बेखबर अपनी अदायें जारी रखे था –ट्रम्प की तरह। ’आई डोंट केयर’ के भाव का झंडा अपने चेहरे पर फ़हराते हुये।
ट्रम्प टावर को देखने के बाद हम बाकी बचा हुआ न्यूयार्क देखने के लिये बढ गये।

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Thursday, December 05, 2019

हम जहां हैं , वहीं से आगे बढ़ेंगे

 


मैंने मांगी दुआएं दुआएं मिली
अब दुआओं पे उनका असर चाहिए।
जबसे कानपुर से शाहजहांपुर आकर यहां आयुध निर्माणी, शाहजहाँपुर के महाप्रबन्धक का कार्यभार संभाला है नन्दन जी की यह कविता लगातार याद आ रही है। अनगिनत लोगों की शुभकामनाओं और प्यार के कारण यह जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिला। मुझसे जुड़े लोगों की दुआएं मेरे साथ हैं। उनका असर भी जरूर होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
शाहजहांपुर में तैनाती मेरे लिए घर वापसी जैसी है। अपने लोगों के बीच लौटना है। पहले भी यहां रह चुका हूँ। यहां की अनगिनत खुशनुमा यादें है। उम्मीद है कि और भी तमाम अच्छी यादें जुड़ेंगी।
इसके पहले कानपुर रहा साढ़े तीन साल। वहां से तमाम अच्छी यादों के साथ विदा हुआ। बहुत कुछ सीखा। साथियों का अद्भुत सहयोग , आदर, स्नेह मिला। उसके प्रति आभार व्यक्त करके किसी को नाराज करना ठीक नहीं होगा। उनके स्नेह, आदर का पात्र बने रह सकने लायक काम कर सकूं यही प्रयास रहेगा।
कानपुर से विदा होते समय तमाम मित्रों को उपहार में मैंने किताबें दीं (अपनी कोई नहीं)। जिसको जो पसंद हो , ले ले वाली अंदाज में। इस इस्कीम के साथ कि जो अपने किसी दोस्त से एक्सचेंज करके दो किताबें पढ़कर उसके बारे में बताएगा उसको एक किताब और मिलेगी। अभी तक किसी ने किताब पढ़े जाने की सूचना नहीं दी है।
कुछ लोगों ने अपनापे भरी गुंडागर्दी दिखाते हुए दो-तीन किताबें जबरियन हासिल की। बाकयदा हमसे दस्तखत कराकर। यह अपनापा अपन के जीवन की नियमित संजीवनी है।
एक साथी ने दो किताबें लेते हुए पूरी मासूमियत से सवाल किया -'आपको ये किताबें कहीं से मिलीं थी क्या जो इस तरह सबको बांट रहे हैं।' सवाल सुनकर हमारे खर्च हुए हज्ज़ारो रुपये मुंह छिपाकर हंसने लगे। मुझको अपने तमाम डॉक्टर दोस्त याद आये जो मेडिकल रिप्रेसेंटेव से नमूने के तौर पर मुफ्त में मिली दवाइयां परिचितों को बांटते हैं।
वैसे किताबें भी दवाइयां ही हैं। तमाम अलाय-बलाय से बचाती हैं किताबें।
शाहजहाँपुर बलिदानी शहर है। गर्रा और खन्नौत नदियों की बाहों के घेरे में बसा शहर क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खां और रोशनसिंह की जन्मभूमि है। वीर रस के कवि स्व. राजबहादुर विकल कहते थे :
पांव के बल मत चलो अपमान होगा,
सर शहीदों के यहां बोए हुए हैं।
निर्माणी के साथियों की आत्मीयता से अविभूत हूँ। तमाम लोगों ने अलग-अलग तरह यादे संजोई हैं। कल एक बुजुर्ग टेलर ने हमारे पुराने साथी मरहूम साथी अब्दुल नवी की याद दिलाते हुए बताया -'हमको याद है कि नबी साहब की मय्यत में आप गए थे तो सबसे आखिर में वापस लौटे थे।'
अब्दुल नबी साहब मेरे अब तक के जीवन में मिले सबसे बेहतरीन इंसानों ने सबसे अव्वल लोगों में थे। जितना मुझे उनकी असमय मौत का अफसोस है उतना किसी और की मौत का नही हुआ। उनको जब भी याद करता हूँ रोना आता है। अभी भी आंसू आ गए उनको याद करते हुए।
वापस लौटने पर अरविंद मिश्र के न होने का भी बेइंतहा अफसोस है। पूरे शहर के साहित्यिक-सांस्कृतिक हलचल की धुरी थे अरविंद मिश्र। उनके न रहने से शहर की साहित्यिक रौनक कम हो गयी। सबसे मिलकर रहना। आगे बढ़कर जिम्मेदारी से काम करना। बिंदास , बेलौस अंदाज में कविता, व्यंग्य औऱ संचालन। बहुत याद आएंगे , हर आयोजन में।
और तमाम लोग हैं यहां अभी भी। सबसे फिर से मिलना होगा। नई यादें जुड़ेंगी।
चुनौतियां बहुत हैं। कठिनाइयों भरी जिम्मेदारी। पूरा भरोसा है कि जो जिम्मेदारी मिली है उसे अपनी मेहनत और सबके सहयोग से निभा सकूंगा। अपने दोस्त राजेश की कविता के संकल्प के साथ:
हम जहां हैं,
वहीं से, आगे बढ़ेंगे।
है अगर यदि भीड़ में भी हम खड़े तो,
है यकीं कि, हम नहीं,
पीछे हटेंगे।
देश के बंजर समय के बांझपन में,
या कि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में,
पंथ, खुद अपना चुनेंगे।
या अगर है हम
परिस्थितियां की तलहटी में,
तो
वहीं से,
बादलों के रूप में, ऊपर उठेंगे।

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Wednesday, December 04, 2019

ब्रुकलिन ब्रिज पर टहलते हुए

 



न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज के सांड को देखते हुए शाम हो गयी थी। सूरज भाई अपना शटर गिराकर निकल लिए थे। बत्तियां जल गयीं थी। हम आगे बढ़े। हमारी अगली मंजिल 'ब्रुकलिन ब्रिज' थी।
'ब्रुकलिन ब्रिज' न्यूयार्क के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल है। कहते हैं जिन्होंने 'ब्रुकलिन ब्रिज' नहीं देखा उन्होंने न्यूयार्क नहीं देखा। मैनहट्टन और ब्रुकलिन के बीच ईस्ट रिवर बना यह पुल दुनिया के सबसे प्रसिद्द पुलों में शामिल है। दुनिया का पहला लटकता ब्रिज था। 1869 में बनना शुरू होकर 1883 में पूरा हो गया।
पुल बनने के पहले ब्रुकलिन और न्यूयार्क में आवाजाही फेरी से होती थी। पुल बनने की बात सन 1800 से सोची जा रही थी। सोच को अमल में लाने में 83 साल लग गए।
ब्रुकलिन पुल को बनाने की संकल्पना 1852 में जर्मनी से अमेरिका आये इंजीनियर जान अगस्त रोबलिंग ने की थी। पुल बनने के दौरान एक जंग लगी पिन चुभ जाने से पैदा टिटनेस से 1869 में जान अगस्त रोबलिंग की मौत हो गयी। उनके निधन के बाद उनके बेटे वासिंगटन रोबलिंग ने काम संभाला। वासिंगटन को भी पैरालिसिस हो गया। उनका चलना-फिरना दूभर हो गया। इसके बाद कमान संभाली उसकी पत्नी एमली वारेन रोबलिंग ने। वासिंगटन घर में काम करते, एमली उसको इंजीनियरों तक पहुंचाती।
11 साल तक यह सिलसिला चला। पुल बनकर तैयार हुआ तो 24 अगस्त, 1883 को । एमली वारेन रोबलिंग ने सबसे पहले चलकर पुल पार किया। चलने-फिरने में असमर्थ वासिंगटन रोबलिंग ने घर में गुलदस्ता ग्रहण करके पुल की शुरुआत का उत्सव मनाया। ब्रुकलिन पुल के निर्माण में रोबलिंग परिवार का अहम योगदान था। पहले दिन 1800 गाड़ियां और 150,300 लोग गुजरे पुल से।
जब बना था पुल तब इस पर घोडेगाड़ियाँ और ट्रेन चलती थीं। आज के दिन गाड़ियां, साइकिल और पैदल यात्रियों के लिए है यह पुल।
'ब्रुकलिन ब्रिज' हम टैक्सी से गये। उसका भी मजेदार किस्सा। पहले हमने टैक्सी बुक करने में होशियारी दिखाई। पैसे कम लगेंगे यह सोचकर साझे की टैक्सी की। सूचना आई कि 4 मिनट में टैक्सी फलानी जगह पहुंचेगी। हम वह जगह तलाशते रहे। लेकिन जगह जिंदगी में सुकून की तरह दिखी नहीं।इस बीच सूचना भी आ गयी कि टैक्सी का समय हो गया। वह चली गयी। 5 डॉलर जुर्माना ठोंक कर। होशियारी की हवा निकल गयी।
होशियारी की हवा निकलने के बाद अपन ने समझदारी का दामन थामा। जिस जगह खड़े थे वहां आने के लिए पूरी टैक्सी की। टैक्सी आई । बैठने के बाद याद आया कि अपन को ब्रुकलिन ब्रिज के पार तक जाने की टैक्सी करनी थी ताकि उधर से इधर आने के दौरान खूबसूरत रोशनी का दीदार कर सकें। सोचा कि टैक्सी वाले को कहेंगे कि भईया उधर उतार देव। जो पैसा लगेंगे देंगे। लेकिन सोच को अमल में लाने के लिए जब तक अंग्रेजी बनाएं तब तक ड्रॉइवर न गाड़ी 'ब्रुकलिन ब्रिज' के सामने गाड़ी खड़ी कर दी।
मन की बात को हिंदी से अंग्रेजी में करने में हुई देरी की सजा हमको पुल पर देर तक पैदल चलने के रूप में मिली। हिंदी से अंग्रेजी के चक्कर पूरा देश न जाने कब से सजा भुगत रहा है। ऐसे में अपना रोना रोना ठीक नहीं।
पुल पर पहुंचते ही तेज ठंडी हवाओं ने कंटाप मारते हुए हमको देरी से आने की सजा सुनाई। हमने कनटोप लगाकर सजा का प्रभाव कम करने की कोशिश की। लेकिन ठंड पूर्ण बहुमत की सरकार की तरह मनमानी पर उतारू थी।
जैसे बिना ड्राइविंग लाइसेंस गाड़ी चलाते बपकड़े जाने पर बच्चे पुलिस और ट्रांसपोर्ट के अपने अंकल का हवाला देकर जुर्माने से बचने की कोशिश करते हैं उसी तर्ज पर सोचा कि बता दें कि सूरज जी हमारे भाई हैं। लेकिन यह सोच जितनी तेजी से हमारे दिमाग में आई , उससे दूनी तेजी से हमने उसे दबा दिया। डर था कि ठंड कहीं विरोधी पार्टी से सम्बन्ध सोचकर और प्रताड़ित न करने लगे।
ब्रुकलिज ब्रिज की शुरुआत में जमीन पर कई तरह का सामान बेंचते लोग देखकर लगा कि हमारा कानपुर बिना पासपोर्ट, वीसा, टिकट खाली अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करके न्यूयार्क आ गया है।
बीहड़ ठंड और तेज हवाओं के बावजूद सैलानी पुल पर आ रहे थे। तरह-तरह से फोटो खिंचाने में लगे थे। जगमगाती यादों को कैमरे में कैद कर रहे थे। हमने भी खूब फोटो खींची। अकेले खींची, सेल्फ़ियाये और वहां गुजरते लोगों से भी खिंचाए।
लोगों से फोटो खिंचाने के बाद मोबाइल वापस लेने से पहले ही जोर से 'थैंक्यू वेरी मच' भी बोला। इसमें हमने कब्भी कोई कंजूसी नहीं की। बिना शार्टकट के पूरा 'थैंक्यू वेरी मच' बोला। यह नहीं कि काम निकल जाने के बाद अद्धे-गुममें की तरह , मुंह फेरते हुए, थैंक्स बोलकर फूट लें। विश्वास न होय तो किसी भी अमेरिकी को रोक के पूछ लो।
हमारे जोर से 'थैंक्यू वेरी मच' को हवाओं न अपने लिए भी समझ लिया। उनकी ठंडक कम सी हो गयी। लेकिन जहां हम देर तक सर खोलते, हाथ बाहर करते हवाएं टोंक देतीं-'सर ढंक लो, हाथ अंदर करो। '
पुल पर चलते हुए बीच तक गए हम। नदी में नावें , छोटे जहाज तैर रहे थे। नीचे गाड़ियां धड़ाधड़ गुजर रहीं थीं। सबको घर वापस जाने की जल्दी। हमको याद आई अपनी कविता पंक्तियां :
घर से बाहर जाता आदमी
घर वापस लौटने के बारे में सोचता है।
यहां लोग सोच ही नहीं रहे थे, घर वापस जा भी रहे थे। दूर दिखती सड़क पर ट्रैफिक किसी जगमगाती नदी सा बह रहा था। अंगड़ाई लेते हुए , इठलाता , इतराता मोटरों का काफिला शायद मुस्कराता हुआ भी गुजर रहा हो।
न्यूयार्क की इमारतें रोशनी में चमचमा रहीं थी। हमको देखकर शायद और जगमगाने लगी होंगी। मन किया कि कह दें कि भाई हम ऐसे ही प्रभावित हैं काहे को वाटेज फूंक रहे हो। लेकिन मन की बात कहने में फिर अंग्रेजी का अनुवाद आड़े आ गया। नहीं कह पाए। मन तो यह भी किया कि न्यूयार्क की तमाम जगर-मगर का कुछ हिस्सा चुराकर कानपुर लें आएं और उन इलाकों में फैला दें जहां अभी भी अंधेरा है। लेकिन इम्मीग्रेशन में पकड़े जाने के डर से हमने इरादा फौरन मुल्तवी कर दिया।
पुल से गुजरते हुए हर अगला मोड़ पिछले से ज्यादा क्यूट, स्वीट और खूबसूरत तथा आकर्षक लगता। इतना कि पुल को 'लव यू' बोलने का मन किया। लेकिन फिर सोचा कि बवाल होगा। रोशनी बोलेगी हमको क्यों नहीं बोला, हवाएं बोलेंगे -क्या हम इत्ते बुरे हैं,नदी अलग भन्नायेगी। इसके अलावा न जाने कौन बुरा मान जाए। मुंह फुला ले। अबोला हो जाये। पता ही न चले। पता चलने पर तो मना भी सकते हैं लेकिन कोई मौन हो जाये तो कैसे मनाया जाए।
लेकिन अब लग रहा कि सबको बोल देना चाहिए। जिसका नाम याद आये उसको नाम लेकर, जो न याद आये उसको बिना नाम लिए। अब तो लौट आये। यही कह सकते हैं जो नहीं कहा वह कहा हुआ समझना। खूब खुश रहना।
ब्रुकलिन पुल से गुजरते हुए हमको नरेश सक्सेना जी याद आये:
पुल पार करने से
पुल पार होता है
पुल पार करने से नदी नहीं पार होती।
नदी तो नहीं पार हुई लेकिन ब्रुकलिन ब्रिज से गुजरते हुए 1800 से लेकर 2019 के बीच के 219 साल कल्पनाओं में गुजर गए। जबसे पुल की कल्पना हुई तब से बनने और आज तक के बीच का समय इंसान की कल्पना को अमल में लाने की कहानी है।
लौटते हुए रात हो गयी थी। पुल से उतरते हुए टैक्सी करने के पहले ही एक बस दिख गयी। उसी में बैठकर लौट लिए। उसकी कहानी पहले ही बता चुके हैं।
स्टेशन लौटकर ट्रेन पकड़ी। घर आये। न्यूयार्क में घुमाई का यह हमारा दूसरा दिन था।

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Monday, December 02, 2019

वाल स्ट्रीट पर नथुने फड़काता सांड




वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को निपटाकर हम आगे बढ़े। पेड़ों पर पीली पत्तियां माहौल को खूबसूरत बना रहीं थीं। गली-गली होते हुए हम मुख्य सड़क पर आए। हमारी अगली मंजिल वाल स्ट्रीट पर स्थित मशहूर सांड था।
सड़क पर भीड़ थी। फुटपाथ पर भी चहल-पहल थी। हमको लगा कि वो सांड न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज पर होगा। पूछते हुए वहां पहुंचे तो दूर तक सांड दिखा नहीं। पता किया तो एक न बताया कि उधर है 'उधर है चार्जिंग बुल।'
फुटपाथ पर चलते हुए हम 'उधर' की तरफ बढ़े। बढ़ते हुए हमें एक बार फिर लगा कि अमेरिका में फुटपाथ पर उनके मूल मालिकों -'पैदल यात्रियों' का ही कब्जा है। कोनों पर कहीं कुछ छुटपुट अस्थाई दुकानें भले दिखीं लेकिन फुटपाथ पैदल यात्रियों के लिए ही सुरक्षित है।
एक बात और जो हमें दिखी वहां वह यह कि हर फुटपाथ के कोने सड़क से इस तरह जुड़े थे कि कोई दिव्यांग व्हील चेयर से सड़क से फुटपाथ पर आ जा सके। ऐसा पूरे अमेरिका की फुटपाथों पर होगा शायद। अपने प्रवास के दौरान मैंने एक भी फुटपाथ ऐसा नहीं देखा जिसके कोने व्हीलचेयर की आवाजाही की सुविधा से युक्त न हों। फुटपाथ पर उखड़ी ईंट और बहती पाइपलाइन देखने को भी तरस गए अपन अमेरिका में।
'चार्जिंग बुल' के चारों तरफ लोगों की भीड़ थी। लोग उसको देखते हुए उसके साथ फोटो खिंचाने में लगे थे। जयमाल के बाद जैसे लोग दूल्हे-दुल्हन के साथ, आगे-पीछे अगल-बगल खड़े होकर, ताकि सनद रहे वाली मंशा से फोटो खिंचा रहे थे ।
'चार्जिंग बुल' मतलब नथुने फड़काता , बलबलाता सांड। कांसे की करीब साढ़े तीन टन की इस मूर्ति का निर्माण प्रसिद्द मूर्तिकार द मोदिका ने किया था। द मोदिका 1970 में न्यूयार्क आये थे तो उनके पास एक चवन्नी तक नहीं थी। खाली जेब थे वो। बाद में इस शहर ने उनको पहचान दी। वे प्रसिध्द हुए। पैसे भी कमाए होंगे। इससे न्यूयार्क के प्रति उनके मन में 'आभार भाव' रहा होगा।
1987 में काले सोमवार को स्टॉक मार्केट धड़ाम हो गया था। लोगों के वैसे और हौसले डूब गए थे। इससे निराश हुए लोगों की हौसला अफजाई के लिए मोदिका ने इस सांड की मूर्ति की परिकल्पना की। बेदी मक्की आर्ट फाउंडेशन ब्रूकलिन ने उनकी कल्पना को मूर्ति में ढाला। मूर्ति बनने के बाद एक ट्रक में लादकर 14 दिसम्बर , 1989 को अवैध रूप से मैनहट्टन की फुटपाथ पर छोड़ गए जैसे रात के अंधेरे लोग अपने घर का कूड़ा दूसरे के दरवज्जे छोड़ जाते हैं।
3.6 लाख डॉलर की कीमत के सांड को फ्री फंड में छोड़ दिया अगले ने। ऐसे जैसे सांता क्लॉज गरीबों के घरों की खिड़कियों से उपहार गिरा जाता है। यह शहर के प्रति प्रेम के साथ-साथ अपनी कला के प्रदर्शन की ललक भी रही होगी। लोगों की भीड़ जुट गई इसे देखने के लिए। लेकिन इस तरह जमीन पर मूर्ति छोड़ देना अवैध है वहां भी लिहाजा सांड की मूर्ति हटा दी गयी। लेकिन फिर लोगों की इच्छा के चलते इसको दुबारा लगाया गया। लोग इसे देखने के लिए आने लगे। यह एक चर्चित स्थल बन गया।
खुल्ले में खड़ा नथुने फड़काता सांड खराब से खराब समय में भी हौसला बनाये रखने की भावना का संचार करता है। एक इंटरव्यू में शिल्पकार मोदिका न बताया- 'मैं लोगों को बताना चाहता था कि अगर आप अपने सबसे खराब समय में भी कुछ करना चाहते हैं तो उसे कर सकते हैं। आप उसे खुद कर सकते हैं। मेरे कहने का मतलब है कि आपको मजबूत होना चाहिए।'
स्टॉक मार्केट की ऊर्जा, ताकत और अनिश्चितता का प्रतीक है यह नथुने फड़काता खड़ा सांड।
बाद में मूर्ति में कुछ टूट-फूट हुई तो उसको भी आकर ठीक किया मूर्तिकार ने। मालिकाना हक भी लफड़े वाला है मूर्तिकार का। पहले तो चुपके से धर गया मूर्तिकार। बाद में इसके चित्रों के उपयोग पर पाबंदी लगा दी अगले ने। इस सांड की नीलामी भी करने की बात की मूर्तिकार ने इस शर्त के साथ कि मूर्ति वहीं रहेगी जहां है।
पूंजीवाद के विरोध के प्रतीक के रूप में भी इस मूर्ति का प्रयोग 'ऑक्युपाई वाल स्ट्रीट' आंदोलन में हुआ।
लोग सांड की मूर्ति के पास खड़े होकर, उसको छूकर, कुछ लोग तो उस पर चढ़कर फोटो खिंचा रहे थे। नथुने फड़काता यह सांड अगर जीवित सांड होता तो लोग इसके पास तक नहीं फटकते। छिटककर दूर भागते। लेकिन मूर्ति बन जाने पर लोग इसके ऊपर सवारी करते हुए फोटोबाजी कर रहे थे।
महापुरुषों के मूर्तियों में बदल जाने पर भी उनके साथ यही सुलूक होता है।
कोई चीज प्रसिद्ध हो जाने पर उसके साथ मिथक भी जुड़ते हैं। कांसे के इस चार्जिंग बुल के साथ भी यह मान्यता जुड़ गयी कि इसके नथुने, सींग और अंडकोष छूना भाग्यशाली होता है।
लोग मूर्ति के साथ खड़े होकर फोटो खिंचा रहे थे। कुछ उसकी पीठ पर चढ़कर सींग पकड़े हुए थे। कोई नथुने छू रहा था। झुकझुककर सांड के अंडकोष छूते,सहलाते दिखे लोग।
एक बुजुर्ग अपनी जीवन संगिनी को व्हील चेयर पर साथ लाकर फोटो खिंचा रहे थे। एक स्कूली बच्चा बहुत आहिस्ते से सांड की पीठ सहलाते हुए खड़ा था। बाद में पता चला कि बच्चा दृष्टिबाधित था। बिना आंख की रोशनी के वह विश्व की सर्वाधिक प्रसिद्द मूर्तियों में से एक को देख रहा था।
पास में ही न्यूयार्क फ़िल्म सिटी का आफिस था। अपन को शूटिंग में तो भाग नहीं लेना था इसलिए मूर्ति को देख-दाख कर निकल लिए।

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Tuesday, November 26, 2019

.....और यह एक और छक्का।

हमारे छोटे साहब जादे Anany इंजीनियरिंग की पढ़ाई किये हैं। बैंकिग का काम करने वाली कम्पनी गोल्डमैन सैक्स में काम करते हैं। इसके अलावा कविता तो लिखते ही हैं। उनके कविता पढ़ने के अंदाज को देखकर हमारे कुछ मित्र हमसे कहते भी हैं - सीखो कुछ अनन्य से। 🙂
पिछले हफ्ते अनन्य के यहां क्रिकेट टूर्नामेंट हुआ। करीब 700 लोग शामिल हुए अलग-अलग टीमों से। इस टूर्नामेंट में अनन्य को सर्वाधिक रन बनाने के लिए 'बेस्ट बॉट्समैन' की ट्राफी मिली। रन बनाने में अहम भूमिका अनन्य की जांघ की पेशी में खिंचाव की रही । दर्द की वजह से दौड़ना मुश्किल इसलिए छक्कों से रन बनाने पड़े। 🙂
अब इस बात का कोई मतलब थोड़ी है कि मैच टेनिस बॉल से खेले गए। ट्राफी तो चमकदार है।
बहुत बहुत
बधाई
अनन्य बेटा। बहुत-बहुत प्यार। 🙂






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Monday, November 25, 2019

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर – गिरा हुआ और नया वाला

पहले दिन की घुमाई में अपन ने न्यूयार्क की सड़कें, इमारतें, गाड़ियां देखीं। टाइम्स स्क्वायर और एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग देखी।

न्यूयार्क में कई जगहें देखनी थीं। दिन कम थे, देखना ज्यादा था। सड़क पर चलते-चलते थक गये। दोस्तों ने सुझाया कि हमको वहां किसी बस सेवा की शरण में चला जाना चाहिये।
न्यूयार्क में घूमने के लिये Hop on Hop off बस सेवा उपलब्ध हैं। Hop on Hop off मतलब जहां मन आये चढ जाओ, जहां मन आये उतर जाओ। न्यूयार्क की प्रसिद्द इमारतों, स्मारकों के पास से होकर यह बस सेवा गुजरती है। कई बस कम्पनियां हैं वहां। न्यूयार्क पहुंचते ही एजेन्ट बस सेवा के बारे में बताने के लिये लपकते हैं। अधिकतर एजेंट , महिला और पुरुष दोनों, ब्लैक समुदाय के दिखे।
हमने टॉप व्यू की Hop on Hop off बस सेवा ले ली। 55 डालर में 5 दिन। मतलब 11 डालर एक दिन के एक जन के। कुल 110 डालर मतलब 7700 रुपये शहर की सडकों में घूमने के। बस सेवा की तर्ज पर अपन ने ट्रेन सेवा का भी हफ़्ता वाला पास खरीदने की बात सोची। लेकिन काउंटर बालिका ने बताया कि हफ़्ते के बीच खरीदने से कोई फ़ायदा नहीं। पास लिया जायेगा हफ़्ते भर का। सेवा मिलेगी दो दिन। हमने ट्रेन पास लेने का इरादा त्याग दिया।

अगले दिन जब न्यूयार्क पहुंचे तो देखने की हमारी लिस्ट में सबसे ऊपर ’वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ था। ’वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ के ट्विन टावर दुनिया में सबसे अधिक चर्चा में तब आये जब 11 सितम्बर , 2001 को अलकायदा के आतंकवादियों ने दो विमान अपहरण करके एक के बाद एक टकराकर दोनों टावर उड़ा दिया। दुनिया में यह घटना 9/11 घटना के रूप में जानी जाती है। टावर उड़ाये जाने के पहले दुनिया की सबसे ऊंची इमारत थे। इसके पहले यह दर्जा एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग को मिला था। टावर उड़ा दिये जाने के बाद एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग फ़िर कुछ दिन दुनिया की सबसे ऊंची इमारत रही।
टावरों का आतंकवादियों द्वारा उड़ाया जाने की घटना से अमेरिका दहल गया था। इस घटना के बाद अमेरिका में सुरक्षा में बहुत कड़ाई हुई। कई किस्से हैं इसके। शक होने पर किसी को रोक लेना। वापस कर लेना आदि।
ट्विन टावर उड़ने की घटना की दुनिया भर में अलग-अलग प्रतिक्रियायें हुईं थीं।अमेरिका उस समय इतना बौखलाया हुआ था कि कहने लगा -’जो हमारे साथ नहीं वह आतंकवादियों के साथ है।’
प्रख्यात साहित्यकार गिरिराज किशोर जी मैंने इस बारे में एक सवाल किया था-
“जब आपने अमेरिकन टावरों पर हमला होते देखा टीवी पर तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
इस पर गिरिराज जी का जबाब था -
"हालांकि मैं हिंसा का हिमायती नहीं हूं पर मैंने इस बारे में 'अकार' के संपादकीय में लिखा था -ऐसा लगा जैसे किसी साम्राज्ञी को भरी सभा में निर्वस्त्र कर दिया गया हो।सारे देशों के महानायक उसे शर्मसार होने से बचाने के लिये समर्थनों की वस्त्रांजलियां लेकर दौड़ पड़े हों। उसके बाद हमें यह भी दिखा कि कितने डरपोंक हैं अमेरिकन।मरने से कितना डरते हैं वे। मुझे लगता है कि अगर एकाध बम वहां गिर जाते तो आधे लोग तो डर से मर जाते।वे।पाउडर के डर से हफ्तों कारोबार ठप्प रहा वहां। “

इस घटना के 18 साल बाद हम उस स्थल पर थे। ट्विन टावर जिस जगह पर था अब वहां पक्के, गहरे तालाब जैसे बने थे। उनमें लगातार पानी बह रहा था। तालाब के चारों तरह उन लोगों के नाम लिखे थे जो इस घटना में मारे गये थे। इस हमले में उन इमारतों और उनके आसपास रहने वाले कुल 2,606 लोग मारे गये थे। इसके अलावा विमानों में सवार 157 लोग भी मारे गये। आसपास की अनेक इमारतें पूर्णत: या फ़िर आंशिक रूप से बरबाद हो गयीं थीं। आठ महीने लग गये थे इन इमारतों का मलबा हटने में।
ट्विन टावरों को देखने के लिये दुनिया भर के लोग आये हुये थे। दुर्घटना में मारे गये एक व्यक्ति के परिवार के लोग वहां उनका जन्मदिन मनाने आये हुये थे। उनकी पत्नी , बच्चे और मित्र मौजूद थे। मारे गये व्यक्ति के बारे में बताते हुये उसको याद कर रहे थे। वहां उपस्थित लोगों से गले मिल रहे थे। हम भी गले मिले उन लोगों से।
उस जगह पर तरह-तरह के फ़ूल लगाये गये थे। घास पर चलने की मनाही थी। वहां तैनात सुरक्षा कर्मी इमारतों के अवशेष पर पैर रखने, बैठने से टोक रहे थे।
एक गिलहरी घास पर तसल्ली से फ़ुदक रही थी। गिलहरी इतनी स्वस्थ थी कि उसकी तुलना में अपने यहां की गिलहरियां बच्ची लगें। अमेरिका खाता-पीता देश है। आम तौर पर हर चीज बड़ी उधर। वहां के प्याज देखकर भी मुझे अपने यहां के प्याज उसके मुकाबले में नाबालिग से लगे।
ध्वस्त वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की याद में वहां म्यूजियम बनाया गया है। उसको देखने की भी लम्बी लाइन लगी थी। लेकिन हम लोग उसे देखने नहीं गये। समय कम था हमारे पास, फ़ीस ज्यादा थी उसकी। समय और फ़ीस के तालमेल के अभाव में म्यूजियम देखना स्थगित हो गया।
पुराने ट्रेड सेंटर के बगल ही नई इमारत बन गयी है। इस इमारत में तमाम दुकाने हैं, आफ़िस हैं। कैफ़ेटेरिया हैं और भी न जाने क्या-क्या हैं। अपन नीचे की मंजिल ही देख पाये। इतने में ही बहुत समय खर्च हो गया।
इमारत के नीचे वाली मंजिल में कुछ कला संबंधी चीजें भी रखीं थीं प्रदर्शनी के लिये। सब कुछ इतना चकाचौंध भरा कि देखें तो बस देखते ही रह जायें।
ट्रेड सेंटर में इधर-उधर घूमते रहने के बाद स्टारबक्स की एक दुकान में चाय पी गयी।
बाहर निकलकर भी फ़ोटो खिंचाई। एक-दूसरे की फ़ोटो खिंचाते और सेल्फ़ियाते हुये बोर हो जाने के बाद अपन ने वहां हम दोनों की साझा फ़ोटो खिंचाने के लिये वहां तफ़री कर रहे एक नौजवान से अनुरोध किया। फ़ोटो खिंचाने के बाद पता चला कि बच्चा डेहरी आन सोन का था। न्यूयार्क में घूमने आया था। दोस्तों के साथ। दस साल से टहल रहा है अमेरिका में।
ट्विन टावर और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से निकलकर हम न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज की तरफ़ बढ गये।

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Sunday, November 24, 2019

एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग- दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में एक

 


’टाइम्स स्क्वायर’ घूमते हुये भूख लग आई। नेट पर भारतीय होटल खोजे गये। कई मिले। लेकिन जब उनको खोजने निकलते भटक जाते। इस चक्कर में टहलाई काफ़ी हो गयी। भटकने के बाद अंदाज हुआ कि कैसे सही जगह पहुंचा जाता है। बाद में स्ट्रीट और एवेन्यू का गणित भी समझ आ गया।

खाने का जुगाड़ खोजने के दौरान कई नुक्कड़ों पर पूछा लेकिन पक्का पता नहीं चला। एक नुक्कड़ की गुमटी पर अपनी दुकान पर बैठे एक भले मानुष बंगाली में फ़ोन पर किसी से बतिया रहे थे। हमारे पूछने पर बात करना स्थगित करके हमको जबाब दिया – ’आई डोंट नो।’ ’आमि जानि न’ की जगह ’आई डोंट नो’ सुनकर सांस्कृतिक झटका सा लगा लेकिन उतने से झटके से हम उससे उबर भी गये।
बहरहाल काफ़ी भटकने के बाद एक हिन्दुस्तानी होटल मिला। डेढ खाने की मेज की चौड़ाई और करीब सात-आठ मेज की लम्बाई वाला होटल। काउंटर पर पंजाबी अंग्रेजी बोलती महिला। लगा पंजाब के किसी ढाबे में पहुंच गये। ढोसा आर्डर किया। आठ डालर का एक ढोसा। जब तक ढोसा आता तब तक मोबाइल चार्ज कर लिया उसी दुकान से। मोबाइल चार्जिंग ढाबे के मीनू में था नहीं सलिये उसके पैसे नहीं पड़े।

डोसे आये। मुलायम और बेस्वाद। एक तो काफ़ी जल भी गया था गोया किसी नौसिखिये न मजबूरी में सेंका हो।
पेट भरने के बाद अपन आगे बढे। पास ही एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग थी। 102 मंजिल की इमारत है यह इमारत। 1931 से 1970 तक दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में शुमार यह बिल्डिंग सामान्य ज्ञान की किताबों में किसी न किसी रूप में मौजूद रही। बाद में दूसरी इमारतें इससे भी ऊंची बनीं लेकिन जितनी प्रसिद्ध यह इमारत हुई उतनी शायद दूसरी नहीं। अमेरिकन लोग इस इमारत को दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक मानते हैं।
बिल्डिंग देखने गये। नीचे पूरी इमारत का माडल लगा बना हुआ था। माडल देखते ही मन ललच गया। ऊपर चल के भी देखा जाये। पता किया कि ऊपर की मंजिल तक जाने फ़ीस 65 डालर है। डालर ज्यादा नहीं लगे सुनने में। लेकिन उसको रुपये में
बदलते ही होश उड़ गये। 4500 रुपये फ़ीस इमारत देखने के। दोनों को मिलाकर 9000 रुपये। इत्ता मंहगा एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग दर्शन। लेकिन इमारत देखने के उत्साही जोश ने उड़े हुये होश को जल्द ही काबू में कर लिया। टिकट खरीद के लाइन में लग गये ।

इमारत में जैसे-जैसे ऊपर पहुंचते गये वैसे-वैसे उसके निर्माण से जुड़ी बातें पता चलती गयीं। बनाने वालों ने इमारत बनाई साथ में उसका निर्माण इतिहास भी लगभग जैसे का तैसा फ़ोटो/वीडियो के सहारे संरक्षित किया है। गजब की कलाकारी। 17 मार्च 1930 को शुरु करके 102 मंजिल की इमारत साढे तेरह महीने 1 मई 1931 को बनकर तैयार हो गयी। मतलब हर महीने लगभग साढे सात मंजिल।
एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग की निर्माण प्रक्रिया देखते हुये हमें अपने यहां का सीओडी ओवरब्रिज याद आया जो बेचारा 14 साल से भी अधिक हुये अपने पूरे होने की राह ताक रहा है। यह भी अपनी तरह का एक रिकार्ड ही है।
इमारत के निर्माण की प्रक्रिया के वीडियो और फ़ोटो देखकर ताज्जुब भी हुआ। साथ ही ’ कोई काम नहीं है जब मुश्किल , जब किया इरादा पक्का’ वाला भाव भी फ़िर महसूस हुआ। एक वीडियो में दिखाया कि इमारत की रिबेटिंग करते समय कैसे गर्म रिबेट उछालकर बाल्टी जैसे कन्टेनर में फ़ेंक कर पकड़ाये जा रहे हैं।



इमारत के निर्माण में लगभग 3500 कामगार रोज काम पर लगते थे। इनमें से अधिकतर आयलैंड और इटली से आये प्रवासी मजदूर थे। काम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इमारत के निर्माण में लगभग 200 ट्रक निर्माण सामग्री रोज लगती थी। इमारत में लोहे का काम करने वालों के लिये न्यूयार्क टाइम्स मैगजीन ने लिखा – ’मजदूर लोहे का जाल बुनने वाले मकड़ी की तरह इमारत बना रहे थे।’
इमारत के किस्से बयान करते हुए उसके निर्माण में जिनका योगदान रहा उनके किस्से तफ़सील से बयान किये गए थे। कामगारों की मूर्तियां भी बनी थीं जिनके बगल में बैठकर हमने फोटोबाजी भी की।
वहीं मौजूद म्यूजियम के बगल में बीहड़ वीडियो भी थे। उनसे भयंकर आकृतियां बन रहीं थीं जिनके साथ लोग फोटो खिंचा रहे थे। हमने भी खींचे।

सबसे ऊपर 102 वीं मंजिल पर पहुंचते हुये रात हो गयी थी। चारो तरफ़ अंधेरा हो गया था। आसपास की इमारतें रोशनी में चमक रहीं थीं। तेज हवा चल रही थी। पानी बरसने लगा था। लगा कि न्यूयार्क हमको एम्पायर इस्टेट बिल्डिंग पर पाकर भावुक हो गया हो।
बाहर निकलते हुए इमारत के जिस हिस्से से निकले वहां तमाम यादगार के लिए मॉडल मिल रहे थे। लेकिन उनकी कीमत देखकर हम बिना उनकी तरफ देखे बाहर निकल आये। हमारे होश ने अब जोश पर कब्जा कर लिया था।
लौटते हुये रात हो गयी थी। बारिश में भीगते हुये , भागते हुये स्टेशन पहुंचे। वापसी का टिकट सुबह ही ले लिया था। थोड़ी देर बाद ही ट्रेन भी आ गयी।
ट्रेन पकड़कर घर आ गये। स्टेशन पर सौरभ आ गये थे हमको लेने के लिये। न्यूयार्क की तरह न्यूजर्सी भी ठंडा रहा था। घर पर गर्मागर्म चाय हमारा इंतजार कर रही थी। यह हमारा अमेरिका में तीसरा दिन था।

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Saturday, November 23, 2019

टाइम्स स्क्वायर -दुनिया की सबसे भीड़ भरी जगह

 



अमेरिका पहुंचकर पहले दिन तो आराम किया गया। 'जेट लैग'की इज्जत भी करनी थी न । दूसरे दिन स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी देखने गए। फिर तीसरे दिन न्यूयार्क पर धावा बोला गया।
न्यूजर्सी से न्यूयार्क ट्रेन से गये। ' न्यू ब्रानस्विक स्टेशन' घर से करीब 10 मिनट की दूरी पर है। हमारे दामाद सौरभ Saurabh रोज स्टेशन छोड़ देते। हालांकि छूट्टी उन्होंने अपने बच्चे की देखभाल के लिए ली थी। लेकिन हमारे वहां पहुंच जाने पर हमारी भी देखभाल उनके जिम्मे आ गयी।
ट्रेन में टीटी हमारा टिकट लेने के बाद उसको अपने पास धर लेते थे। टिकट के बाद वो अपने यहां रोडवेज बसों में मिलने वाली चौकोर लम्बी टिकट जैसी पर्ची पंच करके हमारी सीट पर फंसा देते। कुछ देर बाद वह पर्ची भी अपने साथ ले जाते। हमको बार-बार लगता कि हमारी टिकट भी इनके पास, उनकी लगाई पर्ची भी उनके पास। अगर कहीं कोई पूछता तो हमारे पास तो टिकट का कोई सबूत नहीं । कोई बेटिकट साबित करके जुर्माना ठोंक देता। बड़ी बेइज्जती ख़राब होती परदेश में।
मामला कुछ समझ में नहीं आया। न हम टीटी से पूछ ही पाए। लेकिन हम टिकट खरीदने की रसीद अपने साथ रखे रहते। कोई पूछेगा तो दिखा देंगे। लेकिन किसी ने पूछा नहीं।
घण्टे भर बाद न्यूयार्क स्टेशन आ गया। न्यूयार्क पेन स्टेशन।
न्यूयार्क शहर बारे में हमने किताबों में पढ़ा था, ऊंची इमारतों वाला शहर, कभी न सोने वाला शहर, वैभव सम्पन्नता और चकाचौंध के लिए विख्यात शहर। मारियो पूजा के उपन्यास ’गाडफ़ादर’ में अमेरिकी जीवन के अपराध के किस्से भी न्यूयार्क के इलाके के हैं। मैनहट्टन इलाके में दुनिया भर की कम्पनियों के ऑफिस हैं। अमेरिकी किताबों-फिल्मों के अनगिनत किस्सों की गवाह हैं न्यूयार्क की गलियां। उसी न्यूयार्क को पास से देखने पहुँचे हम।
न्यूयार्क एवेन्यू और स्ट्रीट में बंटा हुआ शहर है। किसी एक्सेल शीट के कालम और रो की तरह यहां की गलियां और एवेन्यू क्रम से पूरे शहर को तरतीब से रखे हैं। सब कुछ बढ़ते , घटते क्रम में। यह नहीं कि सत्तावनवी गली के बगल में इकसठवी गली अपना डेरा डाल ले। सब कुछ तरतीब से।
स्टेशन से निकल कर सड़क का ट्रैफिक देखा। कार, बस की भीड़ थी सड़क पर। किनारे साइकिल सवारों की लेन। साइकिलें धड़ल्ले से चल रही थीं। जगह-जगह किराये की साइकिल भी खड़ीं थीं फुटपाथ में। सिटी बाइक की। जहां से मन आये उठा लो। इसके बाद जहां मन आये धर दो। हमारा भी मन हुआ कि चलाएं साइकिल हम भी। लेकिन रजिस्ट्रेशन के झमेले के चलते चलाये नहीं । अलबत्ता एक जगह साइकिल पर खड़े होकर फोटो जरूर खिंचा लिए।
सड़क पर पैदल चलने वालों की बड़ी इज्जत दिखी। पैदल यात्रियों के सड़क पार करते समय गाड़ियां रुकी रहतीं। पैदल यात्रियों के भी पार करने के सिग्नल बने होते हैं। यह नहीं कि जब मन आये सड़क पार कर लो। एक और बात यह कि पैदल यात्री सड़क की शुरुआत में बने पैदल पार पथ से ही सड़क पार करते। यह नहीं कि जहां मन आया सड़क को फलांग गए।
वहीं सड़क पार न्यूयार्क टाइम्स अखबार का दफ्तर दिखा। मन किया जाएं अखबार के सम्पादक से मिलें । कहे कि भारत का पेज देखने वाले संवाददाता से कहें कि भाई हमारा इंटरव्यू ले लेव। छाप देव, वायरल हुई जइहै। बात होती तो हम भी पूछते कि तुम्हारे यहां मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू है कि तुम लोग भी भारतीय पत्रकारों की तरह लिखकर दे दिए हो -'हमको नहीं चाहिए मजीठिया आयोग।'
लेकिन यह सोचकर कि दिन बीत जाएगा इस बवाल में हम न्यूयार्क टाइम्स के सामने सड़क पार से ही फोटो खिंचाकर आगे बढ़ गए। हमारा अगला पड़ाव था टाइम्स स्क्वायर !
टाइम्स स्क्वायर दुनिया के सबसे भीड़ वाले इलाकों में गिना जाता है। लगभग 3.5 लाख रोज यहां से गुजरते हैं। मतलब 13 करोड़ लोग साल भर में ! मतलब पांच आस्ट्रेलिया साल भर में न्यूयार्क स्क्वायर से टहल जाते हैं।
पहले टाइम्स स्क्वायर का नाम Longacre Square था। 1904 में न्यूयार्क टाइम्स के इमारत इधर बनी तो इसका नाम भी टाइम्स स्क्वायर पड़ गया। क्रासवर्ड आफ़ द वर्ल्ड, हार्ट आफ़ द वर्ल्ड , सेंटर आफ़ युनिवर्स जैसे नामों से मशहूर टाइम्स स्क्वायर नाम से मशहूर टाइम्स स्क्वायर दुनिया की तमाम चहल-पहल भरी गतिविधियों और घटनाओं का केन्द्र है।
जब हम पहुंचे टाइम्स स्क्वायर तो वहां लोगों की भीड़ जमा थी। फ़ुटपाथ पर बनी सीढियों बैठकर, लेटकर फ़ोटो खिंचा रहे थे। सेल्फ़िया रहे थे। Father Duffy Square के आसपास भी फ़ोटोबाजी हो रही थी। लोग दूसरों की फ़ोटो खींचने में सहयोग कर रहे थे। थैंक्यू वेरी मच, हैव अ नाइस डे की बौछार हो रही थी।
चारों तरफ़ मकान-मकान भर ऊंचाई के इलेक्ट्रानिक विज्ञापन चल रहे थे। सारा इलाका रोशनी से गुलजार। हम तो इत्ती रोशनी देखकर हक्का-बक्का सा होने को हुये लेकिन फ़िर आंख मूंदकर संभाल लिये खुद को।
वहीं कुछ लोग तालियां बजाते हुये डांस कर रहे थे। उनको देखते हुये हमने वीडियो बनाया। डांस खत्म होने के बाद एक लड़के ने जिमनास्ट की फ़ुथपाथ पर कलाबाजी खाते हुये डांस किया। एक के बाद दूसरे हाथ पर पूरे शरीर को टिकाते हुये डांस किया। डांस खत्म होने पर देर तक तालियां बजती रहीं।
डांस खत्म होने के बाद अपन ने मोबाइल कैमरा दूसरी तरफ़ घुमाया। कैमरे की जद में सड़क पर मार्च करती हुयी कुछ लड़कियां थीं। भयंकर सर्दी में जबकि हम जैकेट में भी ठिठुर रहे थे, वे लड़कियां केवल रंगबिरंगी शर्ट और चड्ढी पहने टहल रहीं थीं। उनके हाथ में कोई तख्ती भी थीं। जुलूस जैसा निकाल रहीं थीं वे। कुछ ही देर में उनका जुलूस आगे बढ गया। हम लोग ’टाइम्स स्क्वायर’ के बाकी हिस्से देखते रहे। फ़ोटो खींचते रहे। वीडियो बनाते रहे।
काफ़ी देर तक हमने जी भरकर जितना देख सकते थे उतना टाइम्स स्क्वायर देखा। इसके बाद बचा हुआ ’टाइम्स स्क्वायर’ बाकी लोगों के देखने के लिये छोड़ कर आगे बढ गये।
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