Friday, March 31, 2023

गरीबी के मारे बुरा हाल है



कल रामनवमी थी। सुबह-सुबह दौड़ा दिए गए जलेबी लेने। छुट्टी के दिन सुबह ज्ल्दी उठने का मन कम करता है। लेकिन मन की बात करने का हक हरेक को
थोड़ी होता है।
पंडित होटल गए। सोचा था जलेबियां निकल रहीं होंगी। लोग लाइन लगाए खड़े होंगे जलेबी के इंतजार में। लेकिन वहाँ बन्द दुकान के बाहर मोबाइल पढ़ता चौकीदार दिखा। आजकल अखबार नहीं पढ़े जाते। मोबाइल पढ़ने का ही चलन है। चौकीदार ने बताया -' 9 बजे खुलेगी दुकान।'
गाड़ी घुमाकर बिरहाना रोड आये। सब मिठाई की दुकाने बन्द दिखीं। तिवारी स्वीट्स, बनारसी मिष्ठान, आर एम बी सबका शटर डाउन। याद आया आगे एक और प्रसिद्द दुकान है। नाम याद नहीं आया। आहिस्ते-आहिस्ते गाड़ी चलाते हुए बढ़े। लेकिन न दुकान दिखी न उसका नाम याद आया। काफी आगे बढ़कर फिर लौट लिए। लौटते में दुकान दिखी -बुधसेन मिष्ठान भंडार। दुकान दिखने के साथ ही नाम भी याद आ गया।
दुकान की तरह लोगों के नाम के साथ भी ऐसा ही होता है। किसी खास समय में कितना भी नाम हो जाये , समय के साथ सब धुंधला जाता है।
लौटते में एक मंदिर के बाहर पूजा करने वालों की भीड़ दिखे। लोग पूजा कर रहे थे। बाहर प्रसाद, फूल-माला, पूजा सामग्री वालों के साथ बड़ी संख्या में मांगने वाले भी मौजूद थे। सब अपने-अपने काम में मशगूल।
लौटकर पंडित होटल के सामने गाड़ी खड़ी कर दी। दुकान के सामने एक रिक्शा वाला अंगड़ाई ले रहा था। हमको देखकर उसने अंगड़ाई लेना स्थगित कर दिया। सावधान मुद्रा में खड़ा हो गया। हमने पूछा -'ये दुकान कित्ते बजे खुलती है?'
वो बोला -'हमका नाय पता। हम हियां नाई रहत हन।'
कोई पुलिसिया जवान होता तो हड़का देता -'यहां नहीं रहता तो फिर यहाँ खड़ा क्यों है?' हम उससे बतियाने लगे। बात की शुरुआत घर कहां है से हुई।
बताया -'हरदोई के रहने वाले हैं। प्रकाश नाम है।'
हरदोई कोई बताता है तो अगला जुमला हमेशा होता है -'हरदोई नहीं हददोई।' हरदोई को हददोई कहने का चलन है। र नहीं बोला जाता। लिखने और औपचारिक बातचीत में भले हरदोई कहा जाए। लेकिन हमने यह जुमला नहीं बोला। बातचीत करते रहे।
प्रकाश के हाथ में कुष्ठ रोग के निशान थे। उंगलियां गली हुई। एक उंगली छिली हुई। बोले -'गिर गए थे हाथ के बल। चोट लग गयी। उसी का घाव बाकी है।'
हरदोई में परिवार है। तीन बच्चे। पत्नी । वहीं रहते हैं। गांव में। जमीन थी वो बिक गई। पुरनिया लोगन बेंच डारिन। घर बचा है गांव में। वहीं रहते हैं बच्चे। महीना, पन्द्रह दिन में आते-जाते रहते हैं।
कानपुर में किराए पर रहते हैं प्रकाश। पडउवा में। शुक्लागंज की तरफ जाने वाले पुल के पास।
घर पास ही है फिर भी यहां रिक्शे पर ही सो गए। शायद नींद आ गयी हो। कमरे और रिक्शे पर सोना बराबर लगा हो। नींद कहीं भी आ जाती है।
रिक्शा रोज पचास रुपए किराए पर है। रिक्शा वाले मालिक के पास सैकड़ों रिक्शे हैं। रिक्शा चलाने के पहले मजदूरी करते थे प्रकाश। मजदूरी और रिक्शे में क्या बढिया लगता है पूछने पर प्रकाश ने बताया -'रिक्शा ठीक है। यहिमा पैसा रोज मिल जात है।' यह भी कि रोज लगभग 300-400 रुपये कमा लेते हैं।
उम्र पूछने पर बोले -'यही कोई 35-40 होई।' हमने कहा -'ठीक उम्र नहीं पता?' तो बोले -'पता है। 40 के हन।' 40 की जगह वो पचास, साठ सत्तर भी कहते तो ताज्जुब नहीं लगता। बल्कि तब ज्यादा सटीक लगती उम्र।
40 के प्रकाश के लगभग सब दाँत गायब थे। बताया कि मुंह के बल गिर गए थे रिक्शे पर तो सब टूट गए। हमने कहा -' बनवा लेव। खाना खाने में परेशानी होती होगी।'
इस पर बोले -'परेशानी तो होती है लेकिन पैसा कहां हैं दांत बनवाने के खातिर।'
गरीबी के मारे बुरा हाल है। हमने यह कहा तो बोले -'हां, गरीबी है तो बहुत।' गरीबी के बारे में बात मौसम की तरह हो रही थी।
बात गांव की होने लगी तो बताया -'वोट देने भी जाते हैं। प्रधानी के वोट , चुनाव के समय वोट।'
वोट की बात चली तो प्रकाश ने बताया कि प्रधानी के चुनाव में पैसा भी चलता है। लोग हर घर के पीछे पांच-पांच हजार रुपया तक देते हैं। जो हार जाते हैं वो भी पैसा देते हैं। हजार-दो हजार। सब उम्मीदवार पैसा देते हैं। चुनाव आम लोगों के लिए त्योहार की तरह आता है। पैसे वाले वोट खरीदते हैं। चुने जाते हैं। वोट के लिए पैसा चाहिये। पैसे से वोट , वोट से पैसा।
लोकतंत्र मेँ जनप्रतिनिधियो के पैसा लेकर पाला और पार्टी बदल लेने की बात कही जाती है। जनप्रतिनिधि अपना खर्च किया हुआ पैसा निकालने के लिये बेताब रहते होंगे। जनता के सेवा के लिये क्या-क्या नहीँ करते हैं लोग।
'हारा हुआ उम्मीदवार पूछता होगा कि पैसा लेने के बाद भी हमको वोट नहीं दिये'-हमने पूछा।
'अरे कोई पीछे थोडी लगा रहता है वोट देते समय। जेहिका मन आवै वहिका वोट देव' -प्रकाश ने बताया।
वोट का गणित बताकर प्रकाश इधर-उधर देखने लगे। हमने उनकी फोटो खींची तो गम्भीर हो गये। सहज बातचीत करता इंसान फोटो मेँ इतना अलग। दुबारा भी वैसा ही। हमने कहा -'थोडा मुस्कराओ।' इस पर वो चुप हो गये। हम भी चुप हो गये। सामने से लोग मंदिर से पूजा करके वापस आ रहे थे। दुकान भी खुल गयी थी। हम दुकान केअंदर दाखिल हो गये।
दुकान के अंदर दो लोग जमीन पर सोये हुये थे। शटर खुलने पर जमीन पर लेटे आदमी ने अंगडाई लेते हुये उठने का उपक्रम किय। हमको बैठने को कह। बगल मेँ रखी चुनौटी से तम्बाकू और चूना निकाला और रगडने लगा। कुछ देर रगडने के बाद बिस्तर सम्भालकर ऊपर चले गये। इस बीच हुई बातचीत से पता चला कि वो बिहार के गया जिला के रहने वाले हैं।
काम की तलाश में बिहार का आदमी कानपुर आकर काम करता है। कानपुर का आदमी कही और काम करता है। आदमी का पेट पूरी दुनिया में विस्थापन का कारण है।
कुछ देर में जलेबी बन गई। हम जलेबी लेकर घर चले आये।
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Thursday, March 23, 2023

गुण गौरव सम्मान


कल नगर की साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्था ‘विकासिका’ द्वारा ‘गुण गौरव’ सम्मान प्रदान किया गया। सम्मान के साथ-साथ मेरे बारे में कई अच्छी-अच्छी बातें भी कहीं गयीं।
कल भारतीय नव वर्ष के अवसर पर संस्था द्वारा सम्मान समारोह आयोजित किया।
51 वर्ष पुरानी संस्था रजिस्टर्ड संस्था विकासिका साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े कार्यक्रम करती है। बीते वर्ष कुल मिलाकर 55 आयोजन किए गए। उनमें काव्य पाठ, सम्मान समारोह, विभिन्न विभूतियों का जन्मदिन , बाल कवि सम्मेलन , ग़ज़ल के कार्यक्रम आदि हुए। एक अनूठा कार्यक्रम ‘इनसे ही मेरी आन बान शान’ बनी है हुआ। इसमें कवि सम्मेलन में भाग लेने वाले कवियों/कवियत्रियों द्वारा अपने जीवन साथियों को सम्मान किया गया।
संस्था के संस्थापक/संयोजक डा विनोद त्रिपाठी जी पिछले 51 वर्षों से इस संस्था का संचालन को सुचारू रूप से चला रहे हैं। अभी तक विभिन्न कार्यक्रम और सैकड़ों लोगों का सम्मान कर चुके हैं। 75 वर्ष की उम्र होने के बावजूद जिस फुर्ती और तत्परता से कार्यक्रम के आयोजन में संलग्न थे उसे देखकर लगा कि सामाजिक रूप से सक्रिय रहना भी अच्छी सेहत का कारक है।
कल कार्यक्रम के दौरान पहले बार संस्था के कार्यकलाप एवं उससे जुड़े लोगों से परिचय हुआ। बहुत सीमित ,लगभग व्यक्तिगत प्रयासों से, संस्था को 51 वर्षों तक अबाध रूप से संचालन ही अपने में स्तुत्य प्रयास है।
संस्था से मेरा कोई पूर्व परिचय नहीं था। इसके बावजूद मुझे सम्मानित करने का कोई कारण मुझे समझ नहीं आया। लेकिन कल कार्यकारिणी की लिस्ट देखी तो उसमें अपने परिचित लोगों का नाम भी दिखा। उन्होंने ही सुझाया होगा। सम्मान के लिए व्यक्तियों का चयन शायद इसी तरह होता है।
51 वर्ष पुरानी संस्था द्वारा गुण गौरव सम्मान से सम्मानित होना अपने आप में सुखद अनुभव रहा। डा विनोद त्रिपाठी जी एवं विकासिका संस्था से जुड़े सभी पदाधिकारियों का धन्यवाद।
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Monday, March 20, 2023

बनारसी टी स्टॉल



'बनारसी टी स्टाल' पर चाय पी गयी कल। कानपुर के 80 फ़ीट रोड पर स्थित है यह टी स्टाल। सड़क का नाम '80 फ़ीट रोड' सड़क की चौड़ाई के हिसाब से प्रचलित है। पता नहीं और किसी सड़क का नाम उसकी चौड़ाई के हिसाब से है या नहीं।
पहले 'बनारसी टी स्टॉल' मोतीझील के पास स्थित थी। शहर में शायद एकमात्र दुकान थी। उस दुकान का कुछ लफड़ा हुआ तो बन्द हो गयी। कई किस्से चलन में हैं उसके बारे में।
एक दुकान बंद हुई तो कई खुल गईं उसी नाम से। एक अस्सी फ़ीट रोड पर, दूसरी माल रोड पर। और भी कहीं होंगी मुझे पता नहीं।
माल रोड वाली दुकान भी खूब चलती थी। लेकिन फिलहाल मेट्रो परियोजना के चलते सिकुड़ सी गयी है। एक दिन संकरी जगह से गुजरते हुए दिखी वो दुकान। अनायास अंदर जाकर बैठ गए और चाय आर्डर कर दी।
चाय आने तक दीवारों में लगे चाय से सम्बंधित सूक्त वाक्य देखते रहे। सबमें चाय की महिमा का बखान था। किसी दिन सबके फोटो लगाएंगे। एक सूक्त वाक्य याद आ रहा -'गर्मी बढ़ने पर जो लोग चाय पीना छोड़ देते हैं, वे किसी भरोसे लायक नहीं होते।'
आशा है सिकुड़ी दुकान फिर पसरेगी और फिर चाय के आशिकों का अड्डा बनेगी।
बात 80 फ़ीट रोड पर स्थित बनारसी टी स्टाल की हो रही थी। रात करीब दस बजे आसपास की सब दुकानें बंद हो चुकीं थी। वैसे भी साप्ताहिक बंदी होती है इतवार की इस इलाके में। केवल बनारसी टी स्टॉल गुलजार था। सड़क चाय की दुकान के घर के आंगन की तरह गुलजार थी। कुछ लोग गाड़ियों में बैठकर चाय का इंतजार कर रहे थे।
चाय वाला हरेक की पसंद के हिसाब से चाय बना रहा था। किसी को बिना चीनी की चाहिए थी, किसी को कम चीनी की, किसी को कम दूध की। सबके लिए अलग कुल्हड़ लगाए जा रहे थे। बिना चीनी वालों को पूछकर सुगर फ्री भी टेबलेट भी डाल दिये गए कुल्हड़ में। करीब बीस पच्चीस कुल्हड़ अलग, अलग तरह की चाय के लिए सज गए।
चाय बनाने की प्रक्रिया में कुल्हड़ में चीनी डाली गई। फिर दूध। दूध और चीनी छटककर चौकोर ट्रे में गिरकर चिपचिपा रहे थे। इसके बाद कोई मसाला छिड़क दिया गया हर कुल्हड़ में। एक लड़का दूध में चीनी मिलाते हुये थोड़ी चिपचिपहट और बढ़ा रहा था। इसके बाद हर कप में चाय डाली गई। हर तरह की चाय अलग-अलग लोगों को दी गयी। कोई चूक नहीं हुई।
चाय के साथ बन मक्खन खाते हुए एक भाई साहब ने बताया कि बहुत दूर आते हैं चाय पीने। जरा सा भी चीनी ज्यादा-कम हो जाती है तो चाय का मजा किरकिरा हो जाता है। कुछ परिवार भी सड़क पर पड़ी कुर्सियों पर बैठे चाय पी रहे थे।
चाय पीने के बाद फोन पे से भुगतान किया गया। एक चाय के 25 रुपये के हिसाब से। भुगतान प्रक्रिया से निर्लिप्त चाय वाले भाई कुल्हड़ सजाते हुए चाय बनाते रहे। भुगतान करने के बाद मोबाइल दिखाया गया यह बताने के लिए देखो भुगतान कर दिए। मोबाइल बिना देखे कुल्हड़ में चीनी डालते हुए भाई साहब बोले-' इसमें हम क्या देखें। हम मोबाइल नहीं देखते। चेहरा देखते हैं।'
मोबाइल बेचारा अपनी बेइज्जती से सुलग गया होगा। लेकिन उसको बुरा नहीं मानना चाहिए। 'बनारसी' नाम जिसके साथ जुड़ा हो उसका ऐसा कहना सहज है। कभी किसी नामचीन बनारसी की कही बात याद आ गई -'Varanasi is a city which have refused to modernize itself' बनारस ऐसा शहर है जिसने खुद आधुनिक बनने से इंकार कर दिया।

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बदलाव की जरूरत

 अगर पिछले लंबे समय से आपने कोई नया रिश्ता नहीं बनाया, पुराने दोस्तों से बात नहीं की, अपनी पसंद का कोई काम नहीं किया या कोई नई रुचि विकसित नहीं की है, तो यह संकेत है कि आप खुद को बेहतर बनाने से रोक रहे हैं।

नई कोशिशें, नए लोगों से मिलना-जुलना हमें इवॉल्व करता है, जो जीवन को विस्तार देता है।
दैनिक हिंदुस्तान के साप्ताहिक स्तंभ 'काम की बात' के अंतर्गत लेख 'आपको जरूरत है बदलाव की' का अंश।

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Sunday, March 19, 2023

सैंट्रो सुंदरी की नम्बर प्लेट



कल सुबह शहर टहलने निकले। कार से। उसमें नई वाली नम्बर प्लेट लगवानी थी।
हफ्ते भर पहले तक हमको पता ही नहीं था कि बिना नई नम्बर प्लेट के चलना 'परिवहन अपराध' है। जुर्माना हो सकता है। वो तो भला हो चौराहे पर मुस्तैद ट्रैफिक सिपाही का जिसने एक दिन गाड़ी किनारे लगाने को कहा। हमने फौरन झल्लाहट बगल में बैठी जीवनसंगिनी पर उतारी -'सीट बेल्ट क्यों नहीं लगाई।'
ट्रैफिक सिपाही के इशारे में ज्यादा जिद नहीं थी। हमने गाड़ी रोकी नहीं। आगे बढ़ लिए कहते हुए -'घर बगल में ही है।' गोया बगल में घर होना कानून के उल्लंघन की छूट देता हो।
सिपाही ने दौड़ा कर गाड़ी रोकी नहीं। बस पीछे से कहा -'नम्बर प्लेट तो बदलवा लो।'
नम्बर प्लेट वाली बात पर ध्यान आया कि नई वाली नम्बर प्लेट लगाने की कोई सूचना आई थी। नेट पर देखा तो उसकी आखिरी तारीख निकल चुकी थी। फौरन नम्बर प्लेट लगवाने की खोज-खबर हुई। आर्डर किया और तय हुआ कि तीन दिन बाद नम्बर प्लेट मिल जाएगी। लग जायेगी। हमने गाड़ी की खड़ा कर दिया। अब नई नम्बर प्लेट के बाद ही चलोगी -' मेरी सेंट्रो सुंदरी।'
यह बताने की बात नहीं कि सीट बेल्ट लगाने के लिए जीवनसंगिनी पर उतरी झल्लाहट काफी देर तक लौट-लौट मुझ तक आती रही।
कल नबंर प्लेट लगवाने के लिए निकले। हर चौराहे पर धड़कन बढ़ जाती। वो शेर भी याद आ गया :
"यूं दिल के धड़कने का कुछ तो है शबब आखिर,
या दर्द ने करवट ली, या तुमने इधर देखा। "
यहां दर्द तो नहीं था बस तुमने इधर देखा वाला मामला ही था। हर पुलिस वाला मुझे अपनी गाड़ी की तरफ देखता लगता। हर चौराहे पर धड़कन बढ़ जाती। लगता किसी भी जगह कोई भी सिपाही कहेगा -'गाड़ी किनारे लगाओ।' सड़क पर गाड़ी किनारे लगाना मतलब कोई न कोई कमी निकल ही जाना। गाड़ी की बुजुर्गियत का भी कोई ख्याल नहीं करते भाई लोग।
सड़क पर चलती हर गाड़ी हमारी सैंट्रो सुंदरी से जूनियर थी लेकिन किसी को अपनी सीनियर की कोई चिंता ही नहीं। यह गाड़ियों में एसीआर लिखने का चलन न होने का साइड इफेक्ट हैं। गाड़ियों के एसीआर लिखे जाते तो सड़क से गुजरती हर गाड़ी हमारी सैंट्रो सुंदरी की मिजाजपुर्सी करती। नमस्ते करती और कहती -'आप बहुत क्यूट लग रही हैं मैडम।'
घर से निकलते समय हल्का पानी बरस रहा था। डर कुछ कम हुआ कि सिपाही सड़क पर नहीं होंगे। लेकिन थोड़ी दूर बाद पानी बन्द हो गया। डर ने वापस ड्यूटी ज्वाइन कर ली।
एक चौराहे से आगे निकले। हमारे आगे एक मोटर साइकिल की पिछली सीट पर बैठी सवारी का कुर्ता पीछे की लाइट को ढंकता हुआ लटक रहा था। हमको लगा कहीं कुर्ता गरम होकर सुलग न जाये। यह भी कि अगले चौराहे पर कोई पुलिस वाला गाड़ी किनारे लगवाकर पूछताछ न करने लगे -'ये लाइट ढंककर क्यों चला रहे गाड़ी?'
आगे एक पैदल सवारी सड़क पार करने के इरादे से किनारे खड़ी थी। वह इधर-उधर देखते हुए सड़क के खाली होने का इंतजार कर रही थी। हमने गाड़ी बीच सड़क धीमी करते हुए रोक दी। उसको सड़क पार करने का इशारा किया। वह थोड़ा झिझकी लेकिन हम गाड़ी खड़े ही किये रहे। गाड़ी भी गर्म हो रही थी। उसको अच्छा नहीं लग रहा था पैदल सवारी को इतना तवज्जो देना । लेकिन हमने सवारी को सड़क पार करवा के ही गाड़ी आगे बढ़ाई। उसके चेहरे पर आभार से अधिक -'अजीब आदमी है जैसे भाव ज्यादा लगे मुझे।
अमेरिका यात्रा के असर के चलते सड़क पर गुजरते हर पैदल सवार को सड़क पार करा कर ही गाड़ी आगे बढाते हैं हम। इस चक्कर में अक्सर सड़क पर पीछे की गाड़ियां हॉर्न बजा-बजा कर सड़क सर पर उठा लेती हैं।
सर्विस सेंटर पहुंचने पर उसने नम्बर प्लेट निकाली। पांच मिनट में नई नम्बर प्लेट लगा दी। हमारा सड़क पर चलने का डर खत्म हों गया। हमारी सैंट्रो सुन्दरी भी खुश हो गयी।
दुकान पर तमाम नम्बर प्लेट इकट्ठा थे। अभी शहर के और भी तमाम लोगों की गाड़ियों में प्लेट बदलने थे। हम ही अकेले थोड़ी थे।
देर से लगी लेकिन नम्बर प्लेट बदल गयी। देर होना कोई नई बात नहीं अपन के साथ। बहुत पहले एक दिन देर से घर आने पर कार के पिछले शीशे पर जमी धूल से लिखा मिला था -' Anup, you are always late. अनूप तुम हमेशा देर कर देते हो।

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Thursday, March 09, 2023

धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले

 



आज सुबह टहलने निकले। घर के बाहर ही एक पेड़ के पास गिलहरी फुदकती हुई दिखी। इधर-उधर फुदकने पर उसकी हिलती पूंछ देखकर किसी बच्ची की हिलती-डुलती चुटिया का ध्यान आया। गिलहरी हमसे बेपरवाह फुदकने में जुटी रही।
पुल पर एक रिक्शा वाला जा रहा था। बिना सवारी। चढ़ाई के कारण पैदल चल रहा था। चढ़ते हुए उसने रिक्शा रोका। नाक को एक तरफ करके ढेर सारी गंदगी पुल पर टोल टैक्स की तरह जमा कर दी। निजी स्वच्छता अभियान के बाद फिर से रिक्शे को थामकर आगे बढ़ा।
पुल से कालोनी के गेट पर होली की शुभकामनाओं के बैनर फड़फड़ा रहे थे। कालोनी के नाम का बोर्ड अलबत्ता बीच से पूरा खाली था। टें बोल चुके एक किनारे पर बस ' टै' चिपका हुआ था। इससे अंदाज लगा कि कालोनी शायद टैगोर जी के नाम पर है।
पुल के नीचे ट्रेन गुजर रही थी। ट्रेन की सवारियां डब्बों की रेलिंग पकड़े बाहर झांक रही थी । ट्रेन के गुजर जाने पर पटरियां तसल्ली से धूप सेंकने लगीं। पटरियों के चेहरे पर पड़ती धूप फेशियल क्रीम की तरह उनका चेहरा चमका रही थी। क्या पता आपस में बतियाते हुए वे पूछ भी रहीं हो -'बता तो कैसी लग रही हूँ? देख कहीं क्रीम ज्यादा तो नहीं लग गयी? '
पुल के नीचे गन्ने के रस वाला अपना ठेला सजा रहा था। पुल के मुहाने पर किसी सत्संग का बड़ा होर्डिग लगा था। सबसे पहले किसी रसिक जी महाराज का फ़ोटो लगा था। इससे अंदाज़ लगा कि आजकल सत्संग में रसिकता बढ़ती जा रही है। साधु जी की जगह रसिक जी महाराज ने ले ली है।
होर्डिंग के बीचोबीच किसी जनप्रतिनिधि का बैनर फटे लंगोट सा लटक रहा था। शायद सत्संग का होर्डिंग लगाने वालों ने बैनर फाड़ दिया हो ताकि रसिक जी महाराज का बोर्ड साफ दिखे। हवाओ का भी सहयोग रहा होगा उनके इस काम में।
पुल पर रेलगाड़ी गुजर रही थी। पूरी पुल की लंबाई बराबर लंबी है ट्रेन। ट्रेन आधी गुजरी थी पुल से कि उधर से दूसरी ट्रेन आती दिखी। जैसे एक ट्रेन की पूंछ से दूसरी ट्रेन की मुंडी निकल रही है। ट्रेन के गुजर जाने पर हमने वीडियो देखना चाहा लेकिन मोबाइल से वीडियो नदारद था। पता चला कि हमने वीडियो वाला बटन दबाया ही नहीं था। सिर्फ फोटो आया ट्रेन का। सारा दृश्य जेहन में सुरक्षित है। वह भी धीरे-धीरे गायब होता जाएगा। दिमाग की भी तो मेमोरी की सीमा होती है।
पुल पर से लोग आते-जाते दिख रहे थे। पैदल, साइकिल, टेम्पो, खड़खड़ा, कार सब एकसाथ चल रहे थे। सहअस्तित्व का भाव।
पुल पर एक लड़का पोज देकर फोटो खिंचवाने में जुटा था। होली का रंग पूरे चेहरे पर लगा था। फोटो खींचने वाली लड़की का चेहरा साफ था। हमने बगल से गुजरते हुए मजे लिए -'तुम्हारा रंग नहीं उतरा। बच्ची का उतर गया।' उसने हंसते हुए कहा -'इसने धो डाला रंग। हमने नहीं धोया।'
पुल के नीचे नदी बह रही थी। आहिस्ते-आहिस्ते। दुबली हो गई थी नदी। पहले जहां पानी था वहां अब बालू दिख रही थी। बालू देखकर लगा नदी की हड्डियां निकल आई हैं। नदी 'जल-दुर्बल' हो गयी है।
दूसरी तरफ सूरज का प्रतिबिम्ब नदी में दिख रहा था। मानो नदी के पानी में सूरज भाई अपना चेहरा दिख रहे हों। ऊपर अपना काम करते हुए भी चेहरा देखने का शौक है मानो सूरज भाई का।
नदी घाट से दूर हो गई थी। नाव घाट से पच्चीस-तीस मीटर दूर लगी थीं। गर्मी बढ़ते हुए और दूर होंगी नाव घाट से।
लौटते हुए पुल पर से गुज़रते ई-रिक्शा में गाना बज रहा था:
हमको किसी का डर नहीं,
कोई जोर जवानी पर नहीं।
हमको गाना सुनकर डर लगा। आजकल यह कहना बड़ा बावलिया काम है कि हम किसी से डरते नहीं। आजकल डर लगे न लगे लेकिन डरने का नाटक करना जरूरी है। लगता है हमारे डर को ई-रिक्शा वाले ने सुन लिया। आगे बोल सुनाई दिए -'धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले।'
पुल पर से वापस लौटते हुए साइकिल सवार साइकिल से उतरकर पुल चढ़ते दिखे। दो महिलाएं लपककर बगल से गुजरते दिखीं। शायद काम पर जा रहीं थीं।
घर के पास सड़क पर एक पिल्ला अपनी पिछली टांग से कान खुजाता दिखा। हमारे देखते-देखते उसकी टांग की गति तेज हो गयी। पिस्टन की तरह टांग तेजी से हिलाते हुए वह कान खुजाता रहा। कान खुजाकर वह आराम से टहलता हुआ चल दिया।
हमने कुत्ते के कान खुजाने का वीडियो बनाया था। लेकिन देखने लगे तो पता चला कि फोटो ही लिया था। एक दिन में ऐसा दूसरी बार हुआ कि वीडियो की जगह फोटो ले ली। दो मजेदार सीन रिकार्ड होने से बच गए।
हम टहलते हुए घर वापस आ गए।

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Tuesday, March 07, 2023

होली की शुभकामनाएँ

 



सुबह-सुबह सूरज भाई आसमान में दिखे। हमको लगा कि रंग के डर से निकलते उचक गये हैं। हमने सोचा कि होली कि शुभकामनाएँ दे दें। देरी करने में क्या पता वो कोई बड़ा सा वीडियो भेज दें जिसको खोलने में ही तमाम डाटा निपट जाए। आजकल त्योहारों पर इतने संदेश हमले होते हैं कि इंसान का सारा त्योहार धन्यवाद , आपको भी मुबारक कहते हुए ही निपट जाता है।
त्योहारों पर शुभकामनाओं का हाल यह है कि अगर अपन लिखें कि अभी जाम में फंसे हैं, पानी नहीं आ रहा है, बिजली गुल है तो भी लोग यही लिखेंगे -‘पावन पर्व की सपरिवार शुभकामनाएँ ।’
सोचा सूरज भाई को सीधे-सीधे ‘होली की शुभकामनाएँ’ कह दें। फिर लगा कि ये तो ‘शुभकामना हमला’ टाइप लगेगा। फिर सोचा होली को ‘पावन पर्व ‘ लिख दें और कह दें -‘होली के पावन पर्व की शुभकामनाएँ।’ लेकिन फिर लगा कि कहीं वो बाल की खाल न निकालने लगें -‘इतनी गंदगी मचाते हो होली में तो काहे का पावन पर्व।’ क्या पता वो यह भी पूछ लें -‘होली पावन पर्व है तो क्या बाक़ी त्योहार अपावन हैं।’
हमने अपने पास कई होली के संदेश देखे। कुछ में लिखा था -‘बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक त्योहार होली की शुभकामनाएँ।’ फिर लगा कि यह देखते ही सूरज भाई मजे लेंगे -‘विजय का प्रतीक मतलब लड़ाई झगड़ा। बिना बुराई-भलाई को लड़वाये त्योहार तक नहीं मना सकते। ये तो एकदम अमेरिका टाइप हरकत हुई। किसी को मिसाइल बेंचों तो उसके पड़ोसी को मिसाइल से बचने के उपाय। और फिर बुराई-भलाई तो सापेक्ष है। जो चीज एक के लिए बुरी है वो दूसरे के लिए अच्छी हो सकती है। न समझ में आये तो पढ़ लो चित्रलेखा भगवतीचरण वर्मा की फिर से। उसमें बताया गया है पाप-पुण्य के बारे में।’
अब हम चित्रलेखा दुबारा क्या पढ़ते? पास में रखी , ख़रीदी तमाम किताबें अनपढ़ी हैं इसी लिए तो पुस्तक मेला नहीं गये। गये होते तो दूसरों की फ़ोटो देखते हुए झूठी तारीफ़ करने की बजाय पाट देते हम भी अपनी दीवार खींची हुई फ़ोटुओं से। अब चित्रलेखा खोजकर दुबारा पढ़ें। कठिन काम।
हम अचकचा गये। बड़ा बवाल है शुभकामना देना भी। इतनी पूछताछ तो कोई जाँच एजेंसी भी न करती होगी त्योहार के मौक़े पर जितना सूरज भाई कर सकते हैं।
हम सोचते ही रह गये और सूरज भाई और ऊपर उचक गये आसमान में। लगता है एकदम आसमान के एवरेस्ट पर चढ़कर ही रुकेंगे।
इस बीच हमारे मोबाइल पर शुभकामनाओं की झड़ी लगी है। कोई शुभकामना लिख रहा है, कोई फ़ोटो संदेश, कोई वीडियो। फ़ोटो और वीडियो सब फ़ारवर्डेड हैं। किसी के पास आया उसने देखा और आगे बढ़ा दिया। त्योहारों में मिले सस्ते उपहारों की तरह। सबके जवाब देने हैं। उधारी की तरह होती हैं इस तरह की शुभकामनाएँ। जितनी जल्दी चुक जायें उतना अच्छा।
इस बीच सूरज भाई का जलवा पूरी कायनात में पसर गया है। वे सबको होली की शुभकामनाएँ दे रहे हैं।लेकिन हमको लग रहा है कि वे ख़ासकर हमारे लिए होली की शुभकामनाएँ दे रहे हैं। सपरिवार दे रहे हैं। अब परिवार में दुनिया शामिल हो जाए तो क्या बुरा।
हम भी सूरज भाई को सपरिवार होली की शुभकामनाएँ भेज रहे हैं। आप भी उनके परिवार में शामिल हैं तो आप तक भी पहुँच ही गई होंगी।
आप सभी को रंगारंग त्योहार होली की बधाई। शुभकामनाएँ।

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Tuesday, February 28, 2023

मोबाइल चोर के बहाने



पिछले हफ्ते शाम को माल रोड से घर लौट रहे थे। पैदल। देखा कि एल आई सी बिल्डिंग के पास भागते हुए एक लड़के को कुछ लोगों ने दबोच लिया और थपड़ियाने लगे। लड़के की उम्र होगी यही कोई 14-15 साल। बाल हल्के भूरे। सीढ़ीदार स्टाइल में कटे। चेहरे से गरीब घर का ही लग रहा था।
गरीबी को इश्तहार की जरूरत नहीं होती। दूर से ही दिख जाती है।
लड़के को एक आदमी गर्दन से पकड़े था। पकड़े हुए थपड़िया रहा था। बाकी अगल-बगल घेरे हुए थे लोग। गाल पर, सर पर, पीठ पर मारते जा रहे थे। हर थप्पड़ पर लड़के की गर्दन हिल जाती थी। वह चुपचाप मार खा रहा था। लोग मार रहे थे।
सड़क पर पिटाई होते देख लोग जमा होते गए। आते-जाते कुछ लोग बिना पूछे और कुछ पूछकर लड़के को एकाध थप्पड़ जमाते जाते।
लड़के की पिटाई से सहमकर हम चुपचाप वहां खड़े हो गए। हिम्मत करके पूछा -'क्या हो गया?'
'ये मोबाइल छीनकर भाग रहा था। बहन जी का था। वो तो कहो पकड़ लिया वरना गया था मोबाइल'-लड़के का गिरेबान पकड़े हुए उसे थपड़ियाते हुए भाई साहब बोले। जबाब देने में लगे समय में जो थप्पड़ कम मार पाए वो उन्होंने बाद में तेजी से थपड़ियाते हुये लगा दिए।
इस बीच एक महिला तेजी से चलते हुए आई और आते ही पूरे गाल पर पूरी हथेली वाला थप्पड़ रसीद किया। लड़के की गर्दन घूम गयी। उन्होंने दो-तीन थप्पड़ और पूरी ताकत से मारे और फिर फोन करके किसी को बुलाने लगीं। पीटने का काम दूसरे लोगों ने संभाल लिया।
सड़क पर आता-जाता हर चौथा-पांचवा आदमी लड़के को पीटता जा रहा था। लड़का पिट रहा था। चुपचाप। कुछ बोलने की कोशिश करता तो अगले थप्पड़ में चुप हो जाता।
लोग पीटते हुए पूछ रहे थे -'साले मोबाइल चुराता है।'
इस बीच किसी ने बताया कि उसका साथी भी पकड़ गया है। उसको भी पकड़कर ला रहे हैं वहीं।
पास ही पुलिस चौकी है। महिला वहां गई। पुलिस वाले खुद वहां टहलते हुए चले आये। उनको पता चल गया कि लड़का मोबाइल चुराकर भागा था। पकड़ गया। इसीलिए लोग पीट रहे हैं।
पुलिस वाला लड़के को पकड़कर चौकी की तरफ ले गया। लोग इधर-उधर हो गए। महिला चौकी में बैठकर अपने जिसको बुलाया था , उसका इंतजार करने लगी। पुलिस कारवाई होने लगी।
पुलिस ने लड़के को एक कोने में बैठा दिया। लड़का सर झुकाए चुपचाप बैठ गया। क्या पता क्या सोच रहा हो। शायद अफसोस कर रहा हो, शायद सोच रहा हो -पकड़ कैसे गए, छूटेंगे कैसे। घर के बारे में सोच रहा हो शायद या कुछ और।
पुलिस वाले ने चौकी का दरवाजा बंद कर लिया। लोग इधर-उधर हो गए। हम भी चले आये।
आगे का किस्सा पता नहीं चला कि क्या हुआ। शायद पुलिस वालों ने पीट-पाटकर लड़के को छोड़ दिया हो। रिपोर्ट लिखी हो। लड़के को जेल भेजा हो या और कोई कार्रवाई की हो।
तीन-चार दिन पहले हुई अपने सामने घटी यह घटना बार-बार याद आ रही है। लड़का मोबाइल छीनकर भागा। पकड़ा गया। चोरी का अपराध है। पता नहीं कितनी सजा तय है इसके लिए। सम्भव है उम्र से नाबालिग हो। बाल सुधार गृह भेज दिया जाए।
सोच यह भी रहा था मैं कि अगर लड़का अदालत में अपनी चोरी कुबूल कर लेता है और कहता है -'मैंने चोरी की उसकी सजा मुझे मंजूर है। लेकिन इन-इन लोगों ने मुझे बेहिसाब पीटा। इनके खिलाफ कार्रवाई करें हुजूर।' तो अदालत क्या करेंगी?
किसी का मोबाइल आजकल बहुत जरूरी और मूल्यवान चीज हो गया है। सब कुछ मोबाइल से सन्चालित होने लगा है। मोबाइल इधर-उधर होते ही लोगों की धड़कने बढ़ जाती हैं। लेकिन उसके चोर के साथ जिस तरह की पिटाई होते देखी उसमें अगर पुलिस न आ जाती वहां तो न जाने क्या गत बनती लड़के की। क्या पता कोई नस फट जाती। बहरा हो जाता या और कोई हादसा हो जाता।
एक मोबाइल किसी की भी जिंदगी से ज्यादा कीमती नहीं होना चाहिए।
आज यह लिखते हुए मुझे ज्यां जेने की किताब ' चोर का रोजनामचा' याद आ रही है।
‘चोर का रोज़नामचा’ ज्याँ जेने की सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तकों में एक है। कथा और आत्मकथा के सटीक मिश्रण से तैयार इस पुस्तक में लेखक ने 1930 के दशक में अपनी यूरोप-यात्रा का वर्णन किया है। भूख, उपेक्षा, थकान और दुराचार को झेलते और चिथड़े पहने उन्होंने स्पेन, इटली, ऑस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, जर्मनी आदि की यात्रा की और तत्कालीन जन-जीवन के एक उपेक्षित पहलू को अपनी भाषा में वाणी दी।
इसी सिलसिले में फिराक साहब से जुड़ा एक किस्सा याद आ गया:
"एक बार फिराक साहब के घर में चोर घुस आया. फिराक साब बैंक रोड पर विश्वविद्यालय के मकान में रहते थे. ऐसा लगता था उन मकानों की बनावट चोरों की सहूलियत के लिए ही हुयी थी, वहां आएदिन चोरियाँ होतीं. फिराक साब को रात में ठीक से नींद नहीं आती थी. आहट से वे जाग गये. चोर इस जगार के लिए तैयार नहीं था. उसने अपने साफे में से चाकू निकाल कर फिराक के आगे घुमाया. फिराक बोले, “तुम चोरी करने आये हो या कत्ल करने. पहले मेरी बात सुन लो.”
चोर ने कहा, “फालतू बात नहीं, माल कहाँ रखा है?”
फिराक बोले, “पहले चक्कू तो हटाओ, तभी तो बताऊंगा.”
फ़िर उन्होंने अपने नौकर पन्ना को आवाज़ दी, “अरे भई पन्ना उठो, देखो मेहमान आये हैं, चाय वाय बनाओ.”
पन्ना नींद में बड़बडाता हुआ उठा, “ये न सोते हैं न सोने देते हैं.”
चोर अब तक काफी शर्मिंदा हो चुका था. घर में एक की जगह दो आदमियों को देखकर उसका हौसला भी पस्त हो गया. वह जाने को हुआ तो फिराक ने कहा, ” दिन निकाल जाए तब जाना, आधी रात में कहाँ हलकान होगे.” चोर को चाय पिलाई गई. फिराक जायज़ा लेने लगे कि इस काम में कितनी कमाई हो जाती है, बाल बच्चों का गुज़ारा होता है कि नहीं. पुलिस कितना हिस्सा लेती है और अब तक कै बार पकड़े गये.
चोर आया था पिछवाड़े से लेकिन फिराक साहब ने उसे सामने के दरवाजे से रवाना किया यह कहते हुए, “अब जान पहचान हो गई है भई आते जाते रहा करो.”
अलग-अलग समय में चोरी से जुड़ी घटनाएं चोर के साथ अलग-अलग अंदाज में बर्ताव करती हैं। एक में जान-पहचान हो जाने पर आते-जाते रहने का निमंत्रण है, दूसरी में बिना जान-पहचान आते-जाते पीटने वाले लोग। यह हमारी मनोवृत्ति पर है कि हम कौन सी नजीर का अनुसरण करते हैं।

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Monday, February 27, 2023

लंच के बहाने



इस महीने की शुरुआत में एक बार फिर आयुध निर्माणी, कानपुर पहुंचे। 35 साल के कैरियर में तीसरी बार। पहली बार 30 मार्च, 1988 को नौकरी ज्वाइन करने पहुंचे थे। फैक्ट्री में काम कर चुके डीडी मिश्र अंकल ज्वाइन कराने साथ गए थे। साइकिल गेट के बाहर खड़ी करके अंदर गए थे। बाद में यहां से उड़ीसा के बोलांगीर गए थे फिर वहां से वापस शाहजहांपुर।
दूसरी बार जनवरी 2001 में आये थे। शाहजहांपुर से। अकेले आये थे। दोपहर का लंच फैक्ट्री के पास स्थित श्री भोजनालय में करते। पैदल चले जाते। बाहर फुटपाथ पर ही बेंच,कुर्सियां लगी थीं। जाते , बैठ जाते। आर्डर देते। अरहर की दाल और रोटी। आठ रुपये की दाल। एक रुपये की रोटी। ग्यारह रुपये में लंच हो जाता। खाकर टहलते हुए वापस आते। सड़क तब भी खूब चलती थी। आहिस्ते से नजारे देखते हुये लौटते। दोपहर के बाद का काम शुरू करते।
महीने भर लंच श्री भोजनालय में लंच किया। घर वाले कहते थे -'मोटा गए हो।'
इस बार फिर गए पहले दिन श्री भोजनालय। 22 साल बाद। भोजनालय में भीड़ थी। इस बीच ऊपर की मंजिल भी बन गयी है। नीचे भीड़ थी। नीचे धूल-धक्कड़ भी थी। हमको ऊपर की मंजिल पर जाने को कहा गया। गए। एक बन्द , कम रोशनी वाले, हाल में कुछ लोग खाना खा रहे थे। हम भी एक मेज के सामने पड़ी कुर्सी में बैठ गए।
मीनू कार्ड मंगाया। सबसे पहले दाल के दाम देखे। आठ रुपये वाली दाल 135 की हो गयी थी। रोटी एक रुपये बढ़कर 15 रुपये पहुंच गई थी। मन नहीं हुआ खाने का। एक मसाला डोसा खाकर चले आये। लंच हो गया।
सर्विस करने वाला बच्चा आठ-दस साल पहले यहां आया था। उसको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि उसके यहां 22 साल पुराना ग्राहक आया है। उसने पूछा -'और कुछ लेंगे या बिल ले आएं।' हमने बिल चुकाया। कुछ टिप और वापस हो लिए।
लौटते में सड़क किनारे एक ठेले पर पराठे बिकते दिखे। दस रुपये का एक पराठा। आलू भरा। दो खा लेते तो पेट भर जाता। श्री भोजनालय के 165 रुपये , ठेले के 20 रूपये के बराबर। तुलना बेमानी है लेकिन मानव का सहज स्वभाव तुलना करने का। जितने की वहाँ टिप दी उतने में यहां आधा लंच हो जाता। यह बात अलग की अलग कि खड़े-खड़े खाना होता। उतना सहज भी नहीं रहते शायद। बाजार आपको कई तरह से प्रभावित करता है। बहुत शातिर होता है। अपने ही खिलाफ भड़काता है।
पराठे बेलते हुए अशोक सिंह ने बताया कि सुबह नौ बजे से दोपहर बाद तीन बजे तक सब सामान बिक जाता है। घर में आठ दस लोग हैं। सबका गुजारा चल जाता है। हमको दोहा याद आ गया:
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय,
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए।
जब यह दोहा लिखा गया होगा तब साधु लोगों की बड़ी इज्जत होती होगी समाज में। आज साधुओं के बारे में कुछ कहने में संकोच होता है। पता नहीं कौन पहुंचा हुआ निकल जाए।
ठेले वाले पराठे स्पेशल थे। दुकान के मालिक अशोक सिंह। मोबाइल नम्बर भी लिखा था। आपको खाना हो तो मंगा सकते हैं।

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Monday, February 20, 2023

मोबाइल मरम्मत की मशक्कत



मोबाइल का कैमरा खराब हो गया है। मोबाइल बेकार लगने लगा। बातचीत के लिए इस्तेमाल होने वाला उपकरण बातचीत के अलावा होने वालों काम के लिए उपयोग इतना अधिक आने लगा है कि जीवन के तमाम कामकाज इस मोबाइल पर निर्भर हो गए हैं। मोबाइल पर निर्भरता इतनी बढ़ गयी है कि इसके बिना काम चलना मुश्किल लगने लगा है।
सर्विस सेंटर में दिखाया। उन्होंने कहा -'कैमरा अभी है नहीं। दस दिन में आने के चांस हैं। तब तक मोबाइल जमा करना होगा।'
हमने कहा -'दस दिन जमा करने के बजाय आप कैमरे के पैसे जमा कर लो। जब कैमरा आएगा, बदलवा लेंगे।'
वो नहीं माने। बोले-'हमारी कम्पनी की पॉलिसी के हिसाब से मोबाइल जमा करना होगा।'
अब बताओ भला अपने प्यारे मोबाइल को दस दिन के लिए अकेले कैसे छोड़ दें। बिना नेट कनेक्शन के, किसी अंधेरे कोने में पड़े-पड़े मोबाइल बेचारे का तो दम घुट जाएगा। इतना इंतजार तो मोहब्बत के मारे भी आजकल नहीं करते। इंतजार बड़ा बवालिया काम है।
हमने यह भी पूछा कि मोबाइल के पार्ट मंगाने में इतना समय क्यों? आप रखते क्यों नहीं साथ में।
वो बोले-'पुराना हो गया मोबाइल। इसकी रिपेयरिंग के पार्ट मुश्किल से मिलते हैं।'
हमको लगा कि इस मामले में मोबाइल और समाज एक जैसे हो गए। जैसे-जैसे पुराने होते जाते हैं उनकी मरम्मत मुश्किल होती जाती है। मरम्मत के पुर्जे बनने बन्द हो जाते हैं। बिना मरम्मत के टूटे-फूटे ही काम चलता रहता है।
हम मोबाइल लिए-लिए बाहर आ गए। सागर मार्केट बगल में है। सागर मार्केट कानपुर में मोबाइल रिपेयर का महासागर है। सैकड़ों दुकानें हैं मोबाइल रिपेयरिंग की, सामान की, एसेसरीज की। हर दुकान का दावा ऐसा कि बस वही सही दुकान है। कानपुर की सबसे सस्ती होलसेल और रिटेल की इलेक्ट्रॉनिक मार्केट है सागर मार्केट।
रास्ते में जगह-जगह मोबाइल रिपेयरिंग और लैपटॉप रिपेयरिंग सिखाने के इश्तहार वाली दुकानें, गुमटियां भी दिखीं। कुल मिलाकर लगा किसी मोबाइल रिपेयरिंग विश्वविद्यालय में टहल रहे हैं। मन किया कि रिपेयरिंग का काम सीखकर यहीं कहीं गुमटी डाल लें और मोबाइल रिपेयरिंग का काम शुरू कर दें। गुमटी को चर्चा में लाने के लिए ऑफर लगा दें -'मोहब्बत करने वालों के मोबाइल की रिपेयरिंग मुफ्त में।' पता चला दुकान में सारा काम मुफ्त का ही आएगा। हर मोबाइल धारी आएगा कहेगा -'मोहब्बत है लेकिन एकतरफा।' कोई कहेगा -'तुम मोबाइल बनाओ यार, हम रिपेयरिंग तक मोह्हबत करके सबूत दिखाएंगे।'
बहरहाल सागर मार्केट में दिखाया फोन तो एक ने दूसरे के पास, दूसरे ने तीसरे के पास भेजा।इस तरह पांचवे तक पहुंचते हुए ज्यादा समय नहीं लगा। अगले ने बताया कि कैमरा रिपेयर हजार रुपये और बदलने के पंद्रह सौ लगेंगे। हमने कहा -'बदल ही दो।'
उसने मोबाइल को गरम किया। खोला। बताया कि इसकी पट्टी भी खराब हो सकती है। कोशिश करते हैं। ठीक होनी चाहिए। अगर ठीक हुई तो चलेगा नहीं तो नहीं। बता दिया पहले इसलिए कि बाद में आप बहस न करें।
हमें लगा कि क्या हो गया है अपने देश को। हर आदमी बहस से कतराने लगा है। बिना बहस कैसे काम चलेगा।
मजबूरी में हमने बात मान ली उसकी। यह सोचते हुए कि बहस करने का मन बनेगा तो करेंगे ही। कौन एस्टेम्प पेपर पर लिख कर दे रहे हैं कि बहस नहीं करेंगे।
मोबाइल खुलने के बाद पता चला कि घन्टा भर लगेगा। हमने कहा -'कोई बात नहीं हम इंतजार करेंगे।'
इंतजार करने में कौन हमारी जेब से कुछ जाता है। इंतजार हमारे खून में है। बेमियादी इंतजार। भले ही लोहिया जी 60 साल पहले कहें हो कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती। लेकिन दुनिया की तमाम कौमें न जाने कब से इंतजार कर रहीं हैं। इंतजार करते-करते न जाने कितनी पीढियां गुजर गयीं। इंतजार जारी है। हम भी करेंगे। डरते थोड़ी हैं इंतजार करने से।
मोबाइल खुला तो उसके अनगिनत पार्ट इधर-उधर जुड़े दिखे। किसके तार किससे जुड़े हैं और उसका काम क्या है , समझना मुश्किल। हमारे लिए तो नामुमकिन। देखते रहे मोबाइल पर चिमटियां चलते।
रिपेयर करने वाले परवेज सागर मार्केट के पहले गुमटी धारकों में से एक हैं। सोलह-सत्रह साल पहले आये थे यहां। तब कुछेक दुकानें ही थीं। अब सैकड़ों दुकानें हो गयीं। शुरआत में मोबाइल मंहगे होते थे। रिपेयर का काम खूब चलता था। अब मोबाइल सस्ते हो गए। काम कम हो गया।
क्राइस्टचर्च से ग्रेजुएट परवेज मोबाइल संभालते हुए बता रहे थे गुमटी का किराया 22 हजार महीना है। कुल जमा दो आदमियों के बैठने की जगह। हर साल किराया बढ़ जाता है। मुश्किल है लेकिन मजबूरी और ज्यादा है। मजबूरी मुश्किल पर हावी है।
घण्टे भर की मेहनत के बाद परवेज ने बोला -'सॉरी, ठीक नहीं हो पाया। पट्टा खराब है।' पट्टा मतलब मोबाइल के कैमरे को सिग्नल देने वाला पट्टा। मोबाइल बांध के हमको थमा दिया। इतनी देर की मजदूरी की भी बात नहीं की।
हमने कहा -'पट्टा मंगवा लो। लगा दो। ठीक करो।'
परवेज ने बात की। दिल्ली। बोले -'मगंल को आएगा पट्टा।' हमने कहा -'कोई बात नहीं। मंगल को आएंगे।'
परवेज ने कहा -'कुछ पैसे एडवान्स जमा करने होंगे।' हमने कर दिए। परवेज ने हमारा नम्बर लेकर हमको व्हाट्सअप पर मेसेज भेजा। इतने रुपये एडवान्स लिए । विजिटिंग कार्ड पर अलग से लिखकर दिया।
हम लौटते हुए सोच रहे थे कि यार हिंदुस्तान में सैकड़ों दुकानें दिखीं रिपेयर की। अमेरिका में एक्को दुकान न दिखी मोबाइल रिपेयर की। वो लोग सिर्फ नया बेंच पाते हैं। पुराना सुधार नहीं पाते।
सुधारने में मेहनत लगती है। अमेरिका में मेहनत की कीमत ज्यादा है। इसीलिए वो लोग मरम्मत पर ज्यादा भरोसा नहीं करते। खराब हुआ बदल डालो।
बहरहाल, अब मंगलवार का इंतजार है।

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