Sunday, May 12, 2024

गाड़ी की सर्विसिंग के बहाने मटरगस्ती

  


कल शहर जाना हुआ। गाडी की सर्विसिंग करानी थी। सर्विस सेंटर में काम करने वाले एक गोल घेरे में खडे हुये सुबह की सभा जैसी कर रहे थे। क्रिकेट मैदान में खिलाडी मैच की शुरुआत में एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर टीम भावना का प्रदर्शन करते हुये खडे होते हैं। बराबरी का मामला रहता है वहां। इसलिये गले मिलते हैं। यहां बॉस और अधींनस्थ का हिसाब था इसलिये एहतियातन इस तरह खडे थे लोग कि कहीं कोई किसी को छू न जाये। कोरोना का प्रोटोकाल चल रहा हो मानो। बॉस से सुरक्षित दूरी ,है नौकरी के लिये जरूरी।
सर्विस वाले ने पटापट गाडी के ढेर सारे फोटो अपने टैब में ले डाले। गाडी भी नयी माडल की तरह खडे-खडे पोज देती रही। फोटू देखने पर पता चला कि एक चिडिया के पंख इंजन में फंसे हुये थे। शायद नीचे से घुसी होगी छिपने के लिये जब गाडी खडी रही होगी। फिर इंजन में फंस गयी होगी। उसकी ह्ड्डियां तक सूख गयीं थीं। चिडिया के घरवालों को पता भी न चला होगा कि कहां गयी। कोई खबर भी न छ्पी होगी किसी अखबार में। एक जीवन का गुमनाम अंत। दुनिया में ऐसे न जाने कितने लोग रोज गुमनामी की मौत मर जाते होंगे।
गाडी के सर्विसिंग में करीब तीन घंटे लगने थे। वहीँ बैठे-बैठे इंतजार करने के बजाय मैंने सोचा मेट्रोबाजी की जाये। मोतीझील मेट्रो स्टेशन करीब डेढ किलोमीटर दूर था। चल दिये। पैदल।
रास्ते में सडक के सहज नजारे देखते हुये आगे बढे। एक किनारे दो लडकियां सडक किनारे जमीन पर अपनी चाय की दुकान जमाये थीं। छुटका सिलिंडर धरे एक भगौने में चाय बनाते हुये आपस में बतिय-खिलखिला रहीं थी। बगल में तीसरी लडकी मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां चलाती हुई ‘रील दर्शन’ करते हुये मुस्करा रही थी। ग्राहक शायद चाय का इंतजार कर रहे थे। बैठे थे।
एक साइकिल वाला साइकिल पर तीन गैस सिलेंडर लादे चला जा रहा था। सिलेंडर के वजन और चढाई के कारण वह साइकिल पर एकदम झुककर ,जोर लगाकर साइकिल खींच रहा था। सिलेंडर कैरियर पर जिस तरह रखे हुये थे उससे लगा कि विजय का उल्टा वाला निशान बना रहे हों। साइकिल सवार की असलियत बयान कर रहे हों।
गूगल जो रास्ता बता रहा था हम उससे अलग दूसरी गली में मुड गये। यह वीरता दिखाते हुये हमको कानपुर के भगवती प्रसाद दीक्षित ’घोडे वाले’ की कही बात याद आयी :
“चलो न मिटते पद चिन्हों पर
अपने रस्ते आप बनाओ।“
अपने रास्ते पर जाने का फायदा भी हुआ। आगे हमको शानदार स्पोर्ट्स क्लब दिखा। यह हमने पहली बार देखा था। तमाम खेल की ट्रेनिग का जिक्र था। कई गेट दिखे। विवरण पता करने पर दरबान ने बताया कि उसको कुछ पता नहीं क्लब के बारे में। उसको तो बस चौकीदारी से मतलब। दुनिया के तमाम चौकीदार ऐसे ही बिना कुछ जाने तमाम पैसेवालों के दिहाडी के नौकर बने हुये हैं।
आगे एक एक बुजुर्ग व्हील चेयर पर गोद में पतंग लिये बैठे थे। हमने पूछा-‘पतंग उडाओगे क्या?’ वो बोले-‘ चलने-फिरने से मोहताज हम क्या पतंग उडायेंगे? एक भाई जी दे गये हैं । किसी बच्चे को दे देंगे।‘ पतंग में कई चिप्पियां लगी हुई थीं। सेलो टेप की। कोई बच्चा उस पतंग को उडा रहा होगा कहीं।
बेनाझाबर के पास मोड के पास एक बच्ची अपनी छुटकी साइकिल के साथ दौडती दिखी। हमारे देखते-देखते उसने साइकिल नुक्कड पर एक साइकिल बनाने वाले की दुकान पर लिटा दी। साइकिल की चैन उतर गयी थी। उलझी हुई ,उतरी चैन को चढाना नही आता होगा बच्ची को। साइकिल लिटाकर वह खडी होकर सुस्ताने लगी। साइकिल वाले ने चुपचाप उसकी साइकिल को हाथ में ले लिया और चैन चढाने लगा।
आगे एक चाइनीज रेस्तरा दिखा। आजकल जब चीनी कब्जे के किस्से चलन में हैं तब शहर में खाने-पीने की नयी दुकाने चीनी नाम से खुले यह मजेदार है। मेट्रो स्टेशन के नीचे भी कई चमकते-दमकते खाने के अड्डे दिखे।
मेट्रो स्टेशन पर भीड बिल्कुल नहीं थी। अपन अकेले टिकट लेने वाले। तीस रुपये का टिकट मोतीझील से आई.आई.टी. तक का। काउंटर बालिका हमको टिकट देकर वापस ‘मोबाइल समुद्र’ में गोता लगाने लगी। सुरक्षा से गुजरकर स्टेशन पर आये। मेट्रो भी आ गयी कुछ देर में। बैठ गये। चल दी मेट्रो। कुल जमा तीन यात्री थे मेट्रो में। ट्रेन चली भी नहीं थी कि अगला स्टापेज आ गया। गाडी कुछ देर खडी रही। फिर चल दी।
ट्रेन की खिड्की से शहर का नजारा देखते रहे। एक जगह खूबसूरत मंदिरनुमा आकृति वाली इमारत दिखी। हमने सोचा कि यह मंदिर कब बना ? बाद में पता चला कि यह तो अपना जे.के.मंदिर है। तमाम छतों पर सोलर पैनल दिखे एंटीना की तरह।
आई.आई.टी. स्टेशन पर मेट्रो रुकी तो हम उतरे। लिफ्ट से। साथ में ट्रेन की ड्राइवर बालिका थी। एक छुटका सा सूटकेस लिये वह नीचे रेस्ट रूम में जा रही थी। बताया उसने की चालीस मिनट का रेस्ट मिलता है हर ट्रिप के बाद। उतनी देर वह सुस्ता लेती है। ट्रेन में भीड नहीं है के जवाब में उसने बताया कि जब सेंट्रल तक जाने लगेगी मेट्रो तब यात्री बढेंगे।
स्टेशन पर उतरकर एक दुकान पर बैठकर लस्सी पी। जब आर्डर दिया था तो सोचा था हुंडे में आयेगी। मलाई ऊपर होगी। लेकिन लस्सी आई ग्लास में। चुसनी पाइप के साथ। तमाम बर्फ के टुकडे सहित। साथ में लाल मीठा रस। आहिस्ते-आहिस्ते लस्सी पी। दुकान में भीड नही थी। शाम को होती है लडकों की जमघट।
वापसी में देखा कि एस्केलटर बंद था। सूचना लगी थी बिजली बचाने के लिये एस्केलेटर बंद है। सीढियों से या लिफ्ट से जायें। हमको लगा कि कहीं मेट्रो वाले अपने स्टेशन पर न लिख दें –‘ बिजली की खपत कम करने के लिये मेट्रो सेवायें स्थगित हैं। आप कृपया आटो/ओला/उबर से निकल लें।‘
ट्रेन में बैठते हुये देखा वही बालिका मेट्रो ड्राइवर अपना सूटकेस लुढकाते हुये इंजन की तरफ चली जा रही थी। इस बार थोडे यात्री थे ट्रेन में। सामने की सीट पर दो लडकियां किसी बच्चे से मोबाइल पर विडियो काल करते हुये अपना वात्सल्य उडेल रही थीं।
मोतीझील स्टेशन पर उतरे तो यहां भी बिजली की बचत के चलते स्वचालित सीढियां बंद थीं। लिफ्ट की तरफ बढे तो लिफ्ट में वही दो बच्चियां दिखीं जो मेट्रो में मिली थी। लिफ्ट चलने वाली थी। हमको लिफ्ट की तरफ आता देखकर एक बच्ची ने अपना हाथ लिफ्ट के बाहर कर दिया। ऐसा लगा मानो लिफ्ट के बाहर खडे इंसान से हाथ मिलाने का आह्वान कर रही हो। लिफ्ट उसके हाथ बाहर करते ही थम गयी। हम लिफ्टायमान हुये। लिफ्ट चलने के पहले हमने बच्ची को धन्यवाद बोल दिया।
लिफ्ट में कोरोना काल के अवशेष के रूप में केवल दो व्यक्तियों के खडे होने के लिये चौकोर खाने बने हुये थे। बहुत दिन लगेंगे उन यादों को विसराने में।
स्टेशन पर किताबों की दुकान है। वहां रखी किताबों को देखते हुये वापस चल दिये। पैदल ही।
रास्ते में एक मुल्लाजी जनरल स्टोर दिखा। बोर्ड के ऊपर ‘ अमूल गाय दूध’ भी लिखा था। दुकान पर मौजूद बच्चे ने बताया –‘यह नाम लोगों ने दिया है। इसलिये बोर्ड भी उसी तरह का लगा।‘ वैसे मुल्ला जी का नाम मकसूद है। बेटा जो दुकान पर था उसका नाम ताहिर। बीकाम की पढाई कर रहा है। पिता जी बाजार गये हैं, कालेज अभी बंद है, इसलिये दुकान पर बैठे हैं ताहिर।
सर्विस स्टेशन के पास एक खाने-पीने के दुकान का नाम दिखा –‘फूड कैसीनो’ मने खाने का जुआघर। दीवार पर ताश के पत्ते वाले चिडी के बादशाह की फोटो लगी है।
फोटो देखकर लगा कि दुनिया में आजकल खाना मिल जाना भी एक जुआ ही है। जुये में एक जीतता है, हजार लोग लुट जाते हैं। खाने के भी वही हाल हैं। हजारों की रोटियां चंद लोग खा जाते हैं। कुछ लोग मुटाते हैं,हजारों भूखे रह जाते हैं।
सर्विस सेंटर पहुंचकर पता चला कि गाडी की सर्विसिंग हो गयी है। अपन भुगतान करके, गाडी उठाकर घर आ गये।
गाड़ी की सर्विसिंग के बहाने रिटायरमेंट के बाद पहली मटरगस्ती हुई ।
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Wednesday, May 08, 2024

यादों के बगीचे में



आज सुबह टहलने निकले। घर से निकलकर मैत्री नगर की तरफ गये। मैत्री नगर का हीरक जयंती उद्यान हमारा पसंदीदा पार्क है। 2001 से 2007 तक ओएफसी में काम किया। कुछ दिन इस्टेट आफिस में रहे। उसी दौरान मैत्री नगर पार्क के रख रखाव में काफी रुचि ली। झूले लगवाये। पार्क के बीच में फव्वारा लगवाया। शाम को रंग-बिरंगा फव्वारा चलता तो देखने में बहुत अच्छा लगता। खूब सारे फूल-पौधे लगे।
पार्क के रख रखाव में रुचि का आलम यह था कि दिन में कम से कम एक बार पार्क का राउंड जरुर लेते। कोई झूला टूट जाता तो उसी दिन ठीक करवाते। आसपास से तमाम लोग आते घूमने। उस समय के हमारे वरिष्ठ महाप्रबंधक श्री एस के शर्मा जी ने लोकार्पण किया था। संयोग कि पार्क का लोकार्पण 30 अप्रैल, 2006 को हुआ था। हमारे रिटायरमेंट के दिन ठीक 18 साल पहले।
आज पार्क के हाल उतने अच्छे नहीं हैं। समय के साथ संस्थानों और उनसे जुडे लोगों की प्राथमिकतायें बदल जाती हैं।
शर्मा सर के साथ की अनेक बहुत प्यारी यादें हैं।
शर्मा सर जब इस्टेट राउंड करने आते तो उनको आर्मापुर इस्टेट गेट तक छोडने जाते। वहां याद आने पर कहते-'अरे सर, चाय तो रह गयी। चलिये पी लीजिए।' शर्मा सर,अगर कोई जरूरी मीटिंग न होती तो गेट से लौटकर हमारे दफतर वापस आते। चाय पीते। फिर वापस जाते।
इसी तरह की तमाम अनगिनत यादें सेवाकाल की हैं। सीनियर, साथ के और जूनियर लोगों की।
रिटायर हुये हफ्ते से ऊपर हो चुका है। विदाई पार्टियों का दौर उतार पर है। ज्यादातर निपट चुकीं। कुछेक बाकी हैं। सभी की फोटो वीडियो देख देखकर वापस पुराने दौर में लौट जाते हैं। यादें बहुत भटकऊआ होती हैं। न जाने कहां-कहां टहलाती हैं।
हमको विदा करने के लिये शाहजहांपुर से और हजरतपुर से साथी लोग आये। शाहजहांपुर के कुछ साथी तो बडा वाला माला लेकर आये थे जिसको पहनकर नेता लोग मंच पर भाषणबाजी करते हैं। इतनी दूर कोई साथी और माला पहनाकर ,मिठाई खिलाकर चला जाये यह बिना अपनापे के भाव के सम्भव नहीं है। मुझे इस बात की खुशी है कि मुझे अपने तमाम साथियों से मोहब्बत बेपनाह मिली है।
मेरे बेटे अनन्य ने विदाई पार्टी का संचालन करते हुये कहा-" एट द एंड ऑफ कैरियर, एट द ऐंड ऑफ लाइफ सबसे ज्यादा यही मैटर करता है कि आफ इंसान कैसे थे। इट विल नाट मैटर टु एनीवन कि आपने कितने पैसे कमाये, कितना फेमस हो गये। एंड में यही मैटर करता है कि लोग आपको कैसे जानते थे,आपसे कैसे मिलते थे। वह सिर्फ सिर्फ आपके नेचर से डिसाइड होता है। वो चीज पापा आपमें बहुत ज्यादा है। जिस तरह के आप इंसान हैं। जिस तरह यहां इतने लोग आये हैं,आपको जानते है इससे पता चलता है कि लोग इसलिये आपकी इज्जत करते हैं। उससे हम आपको बहुत प्यार करते हैंं। हमें नहीं फर्क पडता कि आप कितने पैसे कमा रहे हैं आप हमारे लिये, क्या कर रहे हैं जिस तरह के आप इंसान हैं वह हमारे साथ हमेशा रहता है।"
बच्चे अगर आपने पिता को अच्छा इंसान समझें तो समझो बुज़ुर्गियत के दिन अच्छे कटने की संभावना है।
36 साल की सेवा की अनगिनत यादे हैं। विदाई पार्टी के तमाम फोटो,वीडियो हैं। वे सब एक-एक करके अपनी यादें सुरक्षित करने की मंशा से यहां साझा करते रहेंगे। ये ऐसी यादें हैं जिनको बार-बार देखने का मन होता है। खुशी होती है। अपनी खुशी के लिये ऐसा करेंगे। आत्मनस्तु वै कामाय सर्वम प्रियम भवति।
पिछ्ली पोस्ट में मित्रों ने मेरी सेवानिवृति पर बधाई दीं, आगामी जीवन के लिये शुभकामनायें दीं। मेरी तारीफ की। इस प्यार और उदारता के लिये सभी का धन्यवाद। आभार।

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Tuesday, May 07, 2024

सरकारी सेवा से रिटायरमेंट

 और अंतत: अपन भी सरकारी सेवा से रिटायर हुए ।

30 अप्रैल, 2024 दिन मंगलवार दफ़्तरी लिहाज से साठ साल की उम्र पूरी होने के बाद दफ्तर वालों ने इज्जत के साथ विदा कर दिया। इज्जत की बात हम सोच रहे हैं। उनके मन में क्या भाव होंगे, वे ही जानते होंगे। अपन तो इसी भरम से विदा हुए।
24 साल से कुछ कम की की बाली उमर में आयुध निर्माणियों में दाखिल हुए थे। तारीख थी 30 मार्च, 1988 दिन वुधवार। आयुध निर्माणी कानपुर में पुरानी साइकिल पर आये थे ज्वाइन करने। आदरणीय मिश्रा जी D.d. Mishra साथ आये थे ज्वाइन कराने। साइकिल गेट पर खड़ी करवा ली गयी थी। अफसर तो तब माने जायेंगे, जब घुसेंगे फैक्ट्री में।
हमारे साथ उस साल आठ लोगों ने ज्वाइन किया था। आदित्यानन्द श्रीवास्तव (AN) और हमने एक ही दिन ज्वाइन किया था। बाद में दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव (DC) , राजेश अग्रवाल, अखिलेश कुमार मौर्य, दामिनी पासबोला और अमिताभ ने ज्वाइन किया। इनमें अमिताभ बाद में रेलवे में चले गए। दामिनी अमेरिका। बाकी बचे छह लोगो ने आयुध निर्माणियों में सेवा की। सभी लोग आयुध निर्माणियों से उच्चतम पदों तक पहुंचे। AN एक शानदार कैरियर के बाद गत वर्ष लम्बी बीमारी के बाद नहीं रहे। आज के दिन अखिलेश कुमार मौर्य को छोड़कर बाकी सभी रिटायर हो चुके हैं।
आयुध निर्माणी कानपुर (OFC) में कुछ दिन रहने के बाद बोलांगीर गए हम। एक ही ट्रक में हमारा, AN और नन्द किशोर गुप्ता जी जो स्माल आर्म्स फैक्टरी (SAF) में हमारे साथी थे, का सामान साथ गया। बोलांगीर के बाद अपन आयुध निर्माणी, शाहजहांपुर (OCFS) रहे आठ साल। फिर कानपुर आये। आयुध निर्माणी कानपुर (OFC) में करीब सात साल रहने के बाद बगल की फैक्ट्री स्माल आर्म्स फैक्ट्री में करीब चार साल रहे। फिर वाहन निर्माणी फैक्ट्री जबलपुर (VFJ) में करीब चार साल रहे। मई , 2016 में पैराशूट फैक्ट्री, कानपुर (OPF) आये। यहां से नवम्बर, 2019 के अंत में तबादलित हुए और 3 दिसम्बर, 2019 को आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर (OCFS) के महाप्रबंधक बने। करीब दो साल सात महीने की महाप्रबंधकी के बाद वापस कानपुर आये जुलाई ,2022 में। छह महीने ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड (TCL) में रहने के बाद फील्ड यूनिट कानपुर (DFU Kanpur) आये फरवरी ,2023 में। यहीं से विदा हुए इसी 30 अप्रैल , 2024 को।
इस दौर की अनगिनत यादें हैं। ज्यादातर खुशनुमा कुछ कम खुशनुमा। कड़वी यादें भी कुछ रहीं लेकिन उनको हमने खाने में स्वाद बढाने वाले मसालों की तरह ही ग्रहण किया। उन तमाम यादों को कभी तरतीब से लिखने की कोशिश करेंगे।
फील्ड यूनिट कानपुर में विभिन्न निर्माणियों से आये हुए लोग थे। निर्माणियों ने अपने ‘छंटे हुए’ लोगों को फील्ड यूनिट को उपहार स्वरूप दिया था। हमारे पूर्ववर्ती अजय सिंह जी ने इसको बड़ी मेहनत संवारा और स्थापित किया। बाद में अपन ने मजे –मजे में काम किया। अपने साथियों के विविधता पूर्ण गुणों के कारण हम अपनी यूनिट को ‘शंकर जी की बरात’ कहा करते थे। बिना किसी जानकारी के तमाम काम निपटते रहे। बाद में एक मीटिंग के दौरान हमारे एक साथी ने अपने लोगों के बीच प्रचलित हमारा मजे का नाम बताया –“आपको हम लोग महादेव कहते हैं।“ इसका कारण उन्होंने यह बताया-“ आपके पास जो भी आता है आप उसके काम के लिए तथास्तु कह देते हैं और करने का पूरा प्रयास करते हैं।“
यह बात सुनकर हमको अपना अपना वर्षो पुराना लेख याद आया – ‘शंकर जी बोले –तथास्तु’। इस लेख के देवांशु Devanshu बड़े मुरीद हैं।
विदाई के मौके पर साथियों और मित्रों ने खूब उदार होकर तारीफ़ की। लगा कि देश में अमृत काल की तर्ज पर उस दिन तारीफ़ का अतिशयोक्ति काल चल रहा है। हमें लगा कि किसी और की तारीफ़ कर रहे हैं लोग मेरे नाम पर। एक जगह हमने कहा भी कि अब मैं रिटायर हो चुका हूँ वरना अपने खिलाफ गुणों से अधिक तारीफ़ के लिए जांच बिठा देता। सहजता , सरलता और सर्वसुलभ होने की तारीफ़ तो लोगों ने की ही। किसी ने स्थितिप्रज्ञ कहा किसी ने भलाइयों का देवता। एक मित्र ने अजातशत्रु भी कहा। अजातशत्रु वाली बात को मेरे एक दूसरे मित्र ने दिल पर ले लिया और अगले दिन छांट के हमको व्हास्सेप सन्देश भेजा – ‘If no one hates you, you are doing something boring’ अगर आपको कोई घृणा नहीं करता तो आप कोई बोरिंग काम कर रहे हैं।
हम यह तय करने की जहमत में नहीं पड़े कि इस सन्देश के माध्यम से हमारे प्रिय मित्र हमारे अजातुशत्र होने वाली बात पर वीटो लगा रहे हैं या कहना चाह रहे हैं कि हम बोरिंग इन्सान हैं । यह भी हो सकता है कि वे बता रहे हैं कि देखो हमने जिन्दगी में बोरियत से कैसे अपनी रक्षा की। इसी बहाने हमको समझ में आया कि दुनिया में तमाम घृणा बोरियत से बचने का उपाय है।
विदा करने के लिए दफ्तर के तमाम साथी फैक्ट्री के गेट तक आये। बाहर से भी कुछ साथी आये थे। रोज अकेले निकलते थे, 30 तारीख को सब लोग आये। शायद यह सुनिश्चित करने के लिए कि अगर घर जाने में आनाकानी करे तो धकिया के बाहर कर दिया जाए बाहर से भी कुछ साथी आये थे। कुछ लोगों को गाडी में बैठाकर लोग रस्से से गाडी खींचकर बाहर ले जाते हैं । रिटायर होने वाले लोग उसे अपनी लोकप्रियता समझते हैं । मेरी समझ में यह विदा होने वाले को घसीटकर बाहर करना होता है । एक बार किसी को घसीटकर बाहर कर दिया जाए तो वह दोबारा वापस आने की नहीं सोचेगा ।
बहरहाल 36 और एक माह की सरकारी सेवा के बाद पेंशनयाफ्ता होकर अकबर इलाहाबादी का शेर याद आ रहा है :
‘बीए किया नौकर हुए,
पेंशन मिली और मर गए।‘
अब जब इस शेर के तीन काम साथ साल की उमर तक पूरे हुए तो समानुपात के नियम से अगर किसी ने भांजी नहीं मारी तो आख़िरी काम पूरा होने तक कम से कम बीस साल तो मिलेंगे ही। इन सालों में क्या करेंगे आगे यह तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन फिलहाल खूब पढ़ने, घुमने-फिरने और यथासंभव लिखने का मन है। देखिये कितना कर पाते हैं।
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Monday, April 29, 2024

ओरछा में मंदिर दर्शन



ओरछा में सभी पर्यटन स्थल आसपास ही हैं। एक दिन में पांव फिराते हुए सब देखे जा सकते हैं। वैसे भी लोग घूमते हुए इमारतों को 'मौका मुआयना' वाले अंदाज में देख लेते हैं। जिन इमारतों को बनने में वर्षों लगे उनको मिनटों में निपटा देते हैं।
हम भी कोई अलग थोड़ी हैं। सुबह से शाम होने तक सारे मंदिर, महल और दीगर पर्यटन स्थल निपटा डाले।
सबसे पहले चतुर्भुज मंदिर देखा। मंदिर का निर्माण की शुरुआत बुंदेल राजा मधुकर शाह (1554 -1593 ई) ने अपनी रानी गणेश कुंवरि के आग्रह पर, रानी के आराध्य देव राजा राम की स्थापना के लिए शुरू किया था। पश्चिमी बुंदेलखंड पर मुगल आक्रमण और राजकुमार होरलदेव की मृत्यु के कारण यह पूरा नहीं हो सका। उस समय अकबर मुगलों का बादशाह था। रानी ने राजा राम की प्रतिमा अपने ही महल में स्थापित कर ली। मंदिर का निर्माण दूसरे चरण में महाराज वीरसिंह देव (1605-1627 ई) के शासन काल में हुआ।
मंदिर में भगवान विष्णु का प्रतिमा है। 105 मीटर ऊंचा मंदिर 4.5 मीटर नींव पर बना है। लगभग पांच सौ साल पुराने मंदिर की भव्यता देखकर अचरज और कौतूहल होता है कि कैसे इतने विशाल मंदिर बनाये गए होंगे।
मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए एक परिवार फोटो खिंचाते हुए दिखा। बीच की उम्र की एक महिला अलग-अलग पोज देते हुए फोटो खिंचा रही थी। उसके साथ चल रही लड़की ने मजे लेते हुए कहा -" लगता है मामी अपनी फ़ोटो खिंचाने की सारी हसरतें आज ही पूरी कर लेंगी।"
मामी कुछ बोली नहीं। हंसते हुए फोटो खिंचाती रहीं।
मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति के पास बैठे पुजारी जी ने बताया कि छह पीढ़ियों से उनका परिवार यहाँ के पुजारी का काम देख रहा है। पीछे लगी एक महिला की फ़ोटो दिखाते हुए बताया इन्होंने (शायद पुजारी जी की माँ) ने वर्षों पुजारी का काम किया।
भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने ओरछा का राजमहल है। तकरीबन 200 मीटर की हवाई दूरी होगी। रानी ने प्रतिमा की स्थापना इस तरह कराई थी कि महल के अपने कक्ष से भगवान के दर्शन कर सकें। पूजारी जी इसे रानी के घमंड के रूप में देखते है कि अपने कमरे में बैठे-बैठे कोई भगवान के दर्शन करना चाहे।
बाद में महल में स्थित रानी के कक्ष के झरोखे से देखा तो वहां से मंदिर की प्रतिमा साफ दिख रही थी। पांच सौ वर्ष पहले के साधनों से इतनी उत्कृष्टता से निर्माण कार्य जिन लोगों ने किया होगा वे कितने कुशल कारीगर रहे होंगे। अफसोस उनके बारे में आज कोई जानकारी नहीं।
चतुर्भुज मंदिर से राजाराम मंदिर की तरफ आये। यह मंदिर रानी गणेश कुंवरि के आग्रह पर बनवाया गया। कहानी प्रचलित है कि रानी अपने आराध्य देव भगवान राम को लेने अयोध्या गयी। उनको लाने के लिए वहां तपस्या की। भगवान प्रकट नहीं हुए तो सरयू में कूद गईं। इस पर भगवान राम प्रकट हुए और रानी के साथ ओरछा चलने को राजी हुए लेकिन शर्तो के साथ :
1. रानी उनको अपने साथ ले चलेंगी।
2. वे ओरछा के राजा होंगे।
3. एक बार जहां उनको रख दिया गया वे वहीं स्थापित हो जाएंगे।
रानी ने अपने आराध्य की तीनों शर्ते मान लीं। उनको अयोध्या से ओरछा लाईं। तब तक मंदिर पूरा नहीं बना था तो प्रतिमा को अपने महल में रख लिया कि जब मंदिर बनेगा तो वहां स्थापना होगी। लेकिन बाद में कहते हैं कि मूर्ति इतनी भारी हो गई कि यहां से हटी नहीं। मजबूरन महल को ही मंदिर बनाना पड़ा।
रानी ने अपने आराध्य की दूसरी शर्त के अनुसार भगवान राम को ओरछा का राजा घोषित करवाया होगा। यह राम जी का अकेला मंदिर है जहां वे भगवान और राजा के रुप मे माने जाते हैं। भगवान के रूप में पूजा होती है। राजा के रूप में रोज सलामी जी जाती है।
मंदिर के प्रांगण में तमाम नवदम्पति अपने परिजनों के साथ पूजा करने आये थे। यहां की परंपरा है नए दूल्हे-दुल्हन पूजा करते हैं। थापे लगाते हैं। इसके बाद उनका दाम्पत्य जीवन आरंभ होता होगा। शायद भगवान के राजा स्वरूप के कारण इस प्रथा की शुरुआत हुई हो।
हमारे देखते-देखते एक नवयुगल अपने परिवार के साथ पूजा करने आया वहां। परिवार के लोग डांस भी कर रहे थे। सबसे ज्यादा उत्साह से दुल्हन डांस कर रही थी। सर पर मुकुट और उसके नीचे लम्बा घूंघट। घूंघट के अंदर होने के कारण चेहरा नहीं दिख रहा था दुल्हन का लेकिन उसका उल्लास और उत्साह उसके डांस से प्रकट हो रहा था। साथ में चलता हुआ दूल्हा सकुचाया सा मटकने की कोशिश करते हुए अपनी दुल्हिन को डांस करते हुए देख रहा था ऐसे जैसे अपन अपनी श्रीमती जी को घर-परिवार के कार्यक्रमों में डांस करते हुए देखते रहते हैं।
मंदिर में प्रांगण में भजन मंडली ढोलक की थाप पर अल्हैत वाले अंदाज में भजन गा रही थी। दूल्हा-दुल्हन उसके सामने ही डांस कर रहे थे। वहीं मंदिर परिसर में मौजूद एक बाबाजी भी साथ में ही मटक रहे थे। दूल्हे-दुल्हन के परिजन उनको कुछ भेंट देते जा रहे थे। इन सब को पीछे से देखते हुये भगवान राम अपना आशीष दे रहे होंगे।
मंदिर परिसर में फोटोबाजी मना थी फिर भी नवयुगल और उनके परिवारी जन को डांस करते देखकर और लोगों की देखादेखी कुछ फोटो वीडियो बना लिये। हड़बड़ी और डर में खींचे फोटो और वीडियो भी डर के मारे टेढ़े-मेढ़े हो गए हैं। लेकिन देखने पर अंदाज लग सकता है कि कैसे माहौल रहा होगा उस समय।
मंदिर से निकलकर राजमहल देखने के लिए आगे बढ़े। सामने एक पुरानी इमारत दिखी। उसमें लिखा था -टकसाल भवन। 17 वीं शताब्दी का टकसाल भवन आज बुजुर्ग और जर्जर हाल में है। कभी यहाँ कड़ा पहरा रहता होगा। आज कोई जाता नहीं।
टकसाल भवन के सामने ही तमाम तरह के सामान की भी कुछ दुकानें थी। एक में सामने नीचे तसलों में अलग-अलग आकार की सिलमें रखीं थी। पता चला कि सीकर में बनती हैं ये चिलम। पास बैठे कुछ लोग अलग-अलग अंदाज में चिलमों को टटोलते हुए मोलतोल कर रहे थे।
आगे एक जगह बोर्ड लगा था -"धीमे वाहन चलाओ, जानवरों की जान बचाओ।" हेल्प डाग सेन्टर की तरफ से लगाया गया यह बोर्ड जिस सड़क के बीच लगा था वह इतनी कम चौड़ी थी कि वहां तेज गाड़ी चलाने की गुंजाइश कम ही थी। लेकिन कम से कम इसे पढ़कर ही लोग जानवरों के बारे में कुछ दयालु हो सकें।
आगे सड़क पर दुकानें खुल गईं थीं। धूप तेज हो गयी थी। अपन ओरछा का राजमहल, जहांगीर महल और शीश महल देखने के लिए चल दिये।

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Saturday, April 27, 2024

कानपुर वाले भैया



ओरछा के जिस राजमहल में शादी के कार्यक्रम हुए मुझे लगा वह बहुत पुराना होगा जिसे शादी के लिए किराए पर उठाने लगे होंगे। लेकिन जानकारी ली तो पता हुआ कि तथाकथित राजमहल दस साल पुराना है। मतलब होटल ही समझिए। होटल को राजमहल के रूप में बनवा कर किराए पर उठाया जाता है। लोगों को यहां आकर राजसी एहसास होता होगा। लाख-दस लाख खर्च करके राजा बन जाएं तो क्या बुराई। आजकल तो लोग राजा-महाराजा से बढ़कर अपने को भगवान साबित करने में अरबों-खरबों खर्च करने में लगे हैं।
शादी में भी आजकल दूल्हे जिस तरह सजते हैं उससे दूल्हा कई शताब्दियों की गठबंधन सरकार लगता है। इस पर पहले कभी लिखा था:
" जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में।दिग्विजय के लिये निकले बारहवीं सदी के किसी योद्धा की तरह घोड़े पर सवार।कमर में तलवार। किसी मुगलिया राजकुमार की तरह मस्तक पर सुशोभित ताज (मौर)। आंखों के आगे बुरकेनुमा फूलों की लड़ी-जिससे यह पता लगाना मुश्किल कि घोड़े पर सवार शख्स रजिया सुल्तान हैं या वीर शिवाजी ।पैरों में बिच्छू के डंकनुमा नुकीलापन लिये राजपूती जूते। इक्कीसवीं सदी के डिजाइनर सूट के कपड़े की बनी वाजिदअलीशाह नुमा पोशाक। गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव बांगड़ू कोलाज चला आ रहा है।"
विवाह कार्यक्रम के अगले दिन हम फिर ओरछा गए घूमने। ओरछा में सभी दर्शनीय स्थल आसपास ही हैं। दो-तीन किलोमीटर के दायरे में।
सबसे पहले राजाराम मंदिर देखने गए। यह अकेला मंदिर है जिसमे भगवान राम की पूजा राजा के रूप में होती है। मंदिर के रास्ते मे तमाम मिठाई/प्रसाद की दुकानें हैं लाइन से। दुकानों में पेड़े बर्फी धूप, धूल का मुकाबला करते हुए प्रसाद के रूप में बिकने का इंतजार कर रहे थे।
लगभग सभी दुकानों में देखा कि कुछ पेड़े एक के ऊपर एक रखे थे। उसके अलावा तमाम पेड़े खड़े-खड़े लगे थे। चुस्त-सतर्क जवानों की तरह। दुकानों के आगे से गुजरते हुए दुकानदार प्रसाद खरीदने का आग्रह करते लेकिन जबरदस्ती टाइप नहीं कर रहा था कोई। हम आगे बढ़ते गए।
राम मंदिर के पास कई बच्चे-बच्चियां एक डब्बे में चंदन का घोल लिए और दूसरे हाथ में 'राम' की मोहर लिए दिखे। आने-जाने वाले लोगों के माथे, गालों पर राम नाम की मोहर लगा रहे थे। तमाम लोगों के गाल और माथे पर राम नाम की मोहर लगी दिखी।
मंदिर की तरफ बढ़ते हुए एक महिला दिखी। किनारे बैठे एक कटोरा सामने रखे। कटोरे में कुछ सिक्के रखे थे। उसकी आंखे की जगह पलकों का पर्दा सा पड़ा था। आंखों को स्थायी रूप से ढंक दिया गया हो जैसे।
पूछा तो बताया कि :
"जब हम छोटे हते तो माता आई हतीं। उसई में आँखी चली गईं। हमाई अम्मा ने सबहन दिखाओ। कहां-कहां नहीं कोशिश करी। भीख तलक मांगी कि भगवान आँखी ठीक कर देंय। लेकिन नाई ठीक भई। अब तौ बेऊ नाई हैं। कउनउ नाइ है। हीनइँ माँगत खात हैं। जैसी भगवान की इच्छा।"
हमने कुछ पैसे उसकी कटोरी में डाले। तो पूछा उसने -"भैया पैसा दए?"
हमने हमारे हां कहने पर पूछा -"कितै ते आये भैया?"
हमने बताया कानपुर से आये हैं तो उसने कहा -"खूब भला करे भगवान तुम्हारा।"
थोड़ी देर और बात करने पर मुन्नी ने कहा -"कानपुर वाले भैया, नेक गन्ना का रस पिवाय देते। पूड़ी लाय देते।"
कानपुर वाले भैया वापस लौटकर गन्ने का रस लेने गए। रस दस रुपये और बीस रुपये के ग्लास मिल रहे थे। हमने सोचा दस रुपये वाला ले लें। लेकिन आर्डर करने तक परसाई जी का लेख -'सड़ी सुपाड़ी की संस्कृति याद आ गया।' इस लेख में परसाई जी ने उन लोगों की लानत-मलानत की है जो पूजा, दान आदि में दोयम दर्जे की चीजें चढ़ाते हैं।
परसाई जी से डर के हमने बड़े वाले ग्लास में गन्ने का रस लिया और वापस आये। मुन्नी को दिया तो बोली -"कानपुर वाले भैया हौ आप न?"
हमने कही -"हौ।"
गन्ने के रस का ग्लास पकड़कर मुन्नी ने फिर पूड़ी खाने की इच्छा जताई। तो हमने कहा अभी आते। इसके बाद हम इधर उधर टहलने लगे।
मंदिर के सामने कड़ी धूप थी। दो बच्चियां कड़ी धूप में एक दुपट्टे को साझे रूप में सर के ऊपर ओढ़े हुए मंदिर के सामने खड़ी थीं। दुपट्टे से उनके ऊपर पड़ने वाली धूप से कोई बचाव नहीं हो पा रहा था। दुपट्टा उन बच्चियों के धूप से बचाव से ज्यादा उनका आपस में पक्की सहेलियों, गुइयाँपने के उद्घोष की तरह लग रहा था।
बच्चियों से बातचीत करने के लालच में और पूछकर फोटो लेने की मंशा से मैने उनसे कहा -"बहुत अच्छी लग रही तो बिटिया लोग।"
हमारी बात सुनकर एक बच्ची तमतमा के बोली -"अच्छे लग रहे हैं तो तुम्हे का करने?"
हम चुपचाप आगे बढ़ गए। सामने एक दुकान में पूड़ी बिक रही थी। सामने तिवारी की कुटिया के नाम की दुकान थी। दुकान में खाने-पीने का सामान बिक रहा था। कुछ लोग बैठकर खा रहे थे।
तिवारी जी की दुकान से चार पूड़ी ली। तिवारी जी अपनी गद्दी पर बैठे अपनी दाईं कलाई एक कपड़े की थैली में डाले पैसे का लेन-देन करते जा रहे थे। लेन-देन के साथ-साथ दायां हाथ भी इधर-उधर हो रहा था।
हमने कहा -"काम के साथ माला भी जपी जा रही है। कमाई और पूजा साथ-साथ।"
तिवारी जी मुस्कराते हुए बोले -"कोशिश है। यह भी एक धोखा है तो अपने को दे रहे हैं। दिखावा है, कर रहे हैं। लेकिन मुक्ति का इंतजाम करने का प्रयास चल रहा है।"
मुक्ति का प्रयास के बारे में बताया कि बेटा अभी 13 साल का है। बड़ा हो जाएगा तो उसको दुकान सौंपकर फिर भगवद्भजन करेंगे बिना नाटक और दिखावे के। कुछ और दुनिया-जहान की बाते करते हुए हम वापस लौटे।
पूड़ी दी मुन्नी को तो वो फिर बोली -"कानपुर वाले भैया हौ?" पूड़ी लेकर पूछा -"अचार नाई लाए? आचार ला देते तो पूड़ी खा लेते उसई के संग।"
पलट के तिवारी जी की दुकान से अचार लाये। मुन्नी खुश हुई और प्रेम से आभार व्यक्त किया। इस बीच उनके पास ही सीढ़ियों पर एक आदमी बैठ गया था आकर। उसने मुन्नी के बारे में कुछ कहा तो मुन्नी ने पूछा -"कौन सुरेश?"
सुरेश ने मुन्नी के बारे में बताना शुरु किया -"इनकी भीतर की आंखे बहुत तेज हैं। एक जन का लड़का खो गया था। महीनों खोजते रहे। नहीं मिला। फिर मुन्नी के पास आये। मुन्नी ने बताया -"बेतवा किनारे फलानी जगह जाओ। मिल जाएगा। गए। वहीं मिला।"
आगे और जोड़ते हुए सुरेश ने बताया कि यहां जिस दुकान वाले के बारे में मुन्नी कह देती हैं कि आज इत्ती कमाई होगी तुम्हारी तो समझ लेव उत्ती होती ही है कमाई।
अपनी तारीफ सुनकर मुन्नी चमक गई। उनकी बिना रोशनी वाली आंखे फड़कने लगी। उनकी दीनता तिरोहित हो गयी। वे भी अपनी तारीफ में जुट गईं। कई किस्से सुना डाले अपने। हर किस्से का उपसंहार करते हुए वे मानो कह रही थी -"ये मुन्नी की गारंटी है। जो कह देती हूँ ,पूरी होती है।"
इस बीच सुरेश ने बताया कि वे जिस जगह पर बैठे थे वहीं के पुजारी जी से अपने पैसे लेने आये थे। पुजारी जी ने उनसे मूर्ति लेकर राममंदिर के पास ही एक छुटका मंदिर डाल लिया था। मंदिर के लिए मूर्ति सुरेश से ली थी। छह महीने हो गए। मंदिर में चढ़ावा आने लगा था ये तो नहीं पता लेकिन तमाम तकादे के बावजूद अभी तक पुजारी जी ने मूर्ति के पैसे नहीं दिए थे। एक बार फिर तकादे के लिए सुरेश सीढ़ियों पर बैठे थे।
मुन्नी से और बात हुई तो पता चला कि उनकी उम्र चालीस के करीब है। मंदिर के ही आसपास रहती हैं। वहीं के लोग खिला-पिला देते है। गुजारा होता रहता है।
बातचीत के दौरान जब पता लगा कि हम कानपुर से गाड़ी से आये हैं तो हम "कानपुर वाले भैया से गाड़ी वाले भैया हो गए।"
मुन्नी के हाथ में पुड़िया देखकर हमने पूछा -"ये पुड़िया काहे खाती?"
मुन्नी ने बताया -"भैया ये दांत बहुत पिरात हैं। तम्बाकू खा लेत हैं तौ आराम मिल जात है।"
हमको अनायास अपनी अम्मा याद आईं। उनको भी चूने वाली तंबाकू की आदत इसी तरह पड़ी थी। तमाम लोग इसी तरह के बहानों सहारे अपनी तमाम लतों का बचाव करते हैं। व्यक्ति से आगे बढ़कर देश/समाज भी अपनी तमाम खराबियों की रक्षा इसी तरह के शुतुरमुर्गी तर्कों से करते हैं।
मुन्नी से फिर आने की बात कहकर हम आगे बढ़े।

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Friday, April 26, 2024

न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाये

  


पिछले दिनों एक शादी में जाना हुआ। दोस्त के बेटे की शादी। ओरछा नाम सुना था। जाना पहली बार हुआ। ओरछा मध्यप्रदेश में है। लगता है बहुत दूर होगा। लेकिन निकला झांसी से मात्र 15 किलोमीटर दूर।
गाड़ी से गए थे। रस्ते में एक जगह खाना खाया। हमने और ड्राइवर ने। एक दाल, एक सब्जी और पांच रोटी का कुल बिल हुआ 205 रुपये। सस्ते ने निपटे।
झांसी में पहुंचकर एक एटीएम से पैसे निकाले। कुछ भेंट देने के लिए। पांच सौ रुपये के नोट तो निकल आये। लेकिन सौ का नोट कोई था नहीं पास में। सौ का नोट भेंट में पायलट गाड़ी की तरह होता है। उसके बिना व्यवहार की गाड़ी स्टार्ट नहीं होती। पहले यह काम एक रुपये का सिक्का करता था जब 11, 51, 101 के व्यवहार चलते थे। आज भी चलता होगा कहीं।
एक मेडिकल स्टोर से 200 रुपये के फुटकर कराए। दे दिए उसने। बातचीत हुई। बोली बुंदेली हो गईं थी। इतै ते चले जाओ, उतई है होटल।
ठहरने का इंतजाम होटल में था। सामान उठाने के लिए सहायक आया। हमने खुद पकड़ा था सूटकेस लेकिन उसने अनुरोध करके ले लिए। हमने भी दे दिया। बड़े होटल में ठहरने जाते ही लोग परावलम्बी हो जाते हैं। यही हाल दफ्तरों में बड़े साहबों का होता है। अटेंडेंट, चपरासी साहब को बैग तक नहीं उठाने देते। उनका बस चले तो साहब को भी गाड़ी से उठा कर कुर्सी पर धर दें। दफ्तर अपने साहबों को अपाहिज बनाने के शानदार उदाहरण होते हैं।
सुदर्शन अटेंडेंट से हमने कुछ पूछा तो बोला नहीं। दुबारा पूछा तो उसने मुस्कराते हुए सीने पर जेब के ऊपर लगे बैज की तरफ इशारा किया। पता चला कि अटेंडेंट मूक/बधिर था। उसके बैज में लिखा था कि ये सुन/बोल नहीं पाता है। कोई निर्देश देना हो तो लिखकर दें।
बाद में पता चला कि होटल में 15% स्टाफ इसी तरह दिव्यांग कैटेगरी के लोग हैं। अगले दिन नाश्ता करते हुए देखा कि कुछ वेटर भी अपने सीने में वैसा ही बैज लगाए थे। होटल की यह पॉलिसी बहुत मानवीय और अच्छी लगी।
कमरे में सामान रखकर वाशरूम गए। वहां फ्लस के एकदम बगल में लगे एक स्टिकर में लिखा था -'एवरी सिंगल ड्राप काउंट्स'। हर बूंद कीमती है। हमारे खुराफाती दिमाग ने सोचा -' वाकई है तो। समस्त सृष्टि का कारोबार बूंदों की ही करामात है।'
बाद में ध्यान से पढ़ा तो देखा कि वह स्टिकर पानी की बचत के लिए था। चादर न धुलाओ तो 70 लीटर पानी बचता है। एक इंसान के महीने भर के पानी पीने की जरूरत के बराबर।
होटल वाले इस तरह पानी की बचत का आह्वान कर रहे थे। बेहतर होता कि वो चादर न धुलवाने के लिए किराए में कुछ कमी का प्लान बताते तो बिना चादर बदलवाए ही हफ्तों पड़े रहते होटल में।
मन किया कि अरविंद तिवारी जी Arvind Tiwari को होटल का यह किस्सा बताएं। उनका होटल वाला उपन्यास पूरा करने की हम जब भी बात कहते हैं वो उलाहना देते हैं -'आप कोई किस्सा बताते नहीं होटल का, कैसे पूरा हो उपन्यास।' घुमाफिराकर क्या वो सीधे-सीधे यही कहना चाहते हैं कि मित्रों में असहयोग में चलते उनका उपन्यास अटका है।
विवाह कार्यक्रम ओरछा में एक राजमहल से होना था। आजकल सारे राजमहल विवाह स्थल बन गए हैं। शादी व्याह इंसान राजा-महाराजों की तरह करता है भले ही बाद में कंगाली भुगते। परसाई जी ने इसी लिए लिखा है न -'देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी में जा रही है।'
बहरहाल कार्यक्रम स्थल पहुंचे। राजमहल जाने वाली सड़क के बराबर सड़क से भी ज्यादा चौड़ा नाला बह रहा था। सड़क पर समृद्धि, बगल में गंदगी। समृध्दि और गंदगी का सहअस्तित्व देखते हुए राजमहल के मुख्य द्वार पर पहुंचे।
गाड़ी से उतरते ही एक पुलिस की वर्दी में खड़े इंसान ने हमको देखकर कड़क सैल्यूट मारा। तगड़े सैल्यूट से हम अचकचा गए। अचकचा क्या सहम से गए। हमको लगा कि यह सलामी किस लिए?
बाद में पता लगा कि उसने हमको कुर्ता पैजामा और सदरी में झंडे लगी गाड़ी से उतरते देखकर हमको कोई मंत्री जी समझा और देखते ही कड़क सलाम झोंक दिया।
हमने वर्दी पुरुष को बताया कि हम वो न हैं जो वो हमको समझ रहे हैं। अब सलाम तो वापस नहीं हो सकता लेकिन हम उनसे गले मिलकर बराबर हो गए।
बाद में हमको यह भी लगा कि क्या पता उसने हमको देखने के पहले पापुलर मेरठी का शेर पढा हो :
'मवालियों को न देखा करो हिकारत से
न जाने कौन सा गुंडा वजीर हो जाये।'
शेर पढ़कर उसने शक्ल से संभावित वजीर समझकर 'सलाम निवेश' कर दिया हो। आज की दुनिया की तमाम राजनीति का यही चलन है। पैसे वाले मवालियों पर पैसा लगाकर उनको वजीर बनाने में सहयोग करते हैं और फिर द्वारा उचित माध्यम चांदी, सोना, हीरा जवाहरात काटते हैं।
मुझे पुलिस वाले कि बेबसी पर भी तरस आया। अगर कहीं मेरी जगह सही में कोई मंत्री जी होते और वह सलाम करने से चूक जाता तो लाइन हाजिर हो जाता।
बाद में अगले दिन पता चला कि एक हरियाणा के ट्रक वाले से नाके पर मौजूद लोगों ने उसके कागजों में कमी बताकर पांच हजार वसूल लिए। चालान करने के बीस हजार बताए और फिर पांच हजार में छोड़ दिया।
एक जगह बेबस हुआ इंसान दूसरी जगह निर्दयी बन जाता है। जो डरता है वही डराता है।

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Tuesday, April 09, 2024

खोखली हेकड़ी


 

जो फ़ेसबुक पर है वह खोखली हेकड़ी में रहता है और मानता है मैं तो बहुत बड़ा कम्युनिकेटर हूँ।

फ़ेसबुक इमोशनल होने की जगह नहीं है। इसे मजे में रखें और मज़ा लें, दिल पर मत ले यार। वरना मनोरोग हो जाएगा।
जगदीश्वर चतुर्वेदी जी बात से मिलती जुलती बात मैंने कभी ब्लागिंग के दिनों में लिखी थी :
“जिन लोगों को यह लगता है कि उनका ब्लॉग पढ़े बिना दुनिया के लोगों को खाना हज़म नहीं होता उनको अगली साँस लेने से पहले अपना ब्लॉग डिलीट कर देना चाहिये। उनकी मानसिक सेहत के लिए यह बहुत ज़रूरी है।”
यह बात ध्यान आने के बाद अपन ने आज पोस्ट लिखना स्थगित कर दिया।
ठीक किया न ❤️
फ़ोटो नेपाल के भ्रमण के समय की जिसके बारे में लिखना बाक़ी है। आपके आसपास भी इतनी तसल्ली से लोग शतरंज खेलते दिखते हैं ?

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