Thursday, June 19, 2025

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे

 "चच्चा ग़ालिब का खत आया है. लिखा है– "कभी फुरसत में हो तो चले आओ बल्लीमारान मिल–बैठकर आमों का लुत्फ लेंगे. आओ तो केपी (सक्सेना) को भी साथ लेते आना. अरसा हुआ मिर्जा से मिले."

कल Anshumali Rastogiजी ने अपनी वाल पर यह संदेश लिखा।
हमने जवाब में लिखा -“जितनी जल्दी हो मिल आइए। बाजार हटाये जा रहे हैं चाँदनी चौक के। बल्लीमारान का हुलिया बदल जाएगा।"
असल में पिछले दिनों एक खबर छपी थी अख़बार में कि चाँदनी चौक की दुकानें संकरी गलियों में हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री ने एक कार्यक्रम में कहा -"चांदनी चौक बहुत सघन बसा हुआ है। व्यापारिक गतिविधियों के कारण यहां इतनी अधिक भीड़ भाड़ रहती है कि लोगों को खुली हवा में सांस लेने के लिए भी शाम होने का इंतजार करना पड़ता है।" इस बाद चांदनी चौक बाजार के दूसरी जगह स्थापित होने की चर्चा होने लगी।
हमने भी सोचा कि इसके पहले कि चाँदनी चौक का हुलिया बदले, घूम लिया जाये चाँदनी चौक। देख ली जाए ग़ालिब की हवेली। क्या पता ग़ालिब की हवेली को भी कहीं खुले में स्थानांतरित कर दिया जाये।
दोपहर निकले घर से। मेट्रो में भीड़ कम थी लेकिन बैठने के लिए तीन स्टेशन बाद जगह मिली। तब तक मेट्रो की सवारियां और उतरते-चढ़ते लोगों को निहारते रहे। नोयडा सिटी सेंटर मेट्रो से राजीव चौक तक आए, फिर वहाँ से चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन।
चाँदनी चौक से बल्लीमारान का रास्ता एक किमोमीटर से कम दूरी का है। स्टेशन के बाहर ही पूछकर चांदनी चौक की गलियों से टहलते, दुकानों को देखते बल्लीमारान की तरफ़ बढ़े।
चाँदनी चौक को मुग़लबादशाह शाहजहाँ द्वारा 17 वीं शताब्दी में बनवाया गया था, और इसका डिजाइन उनकी बेटी जहांआरा द्वारा तैयार किया गया था।
चाँदनी चौक की संकरीं गलियों में, जहाँ से इंसान का बमुश्किल गुजरता है, इतनी बड़ी-बड़ी दुकानें दिखीं जिनमें कई-कई हाथी आराम से तफ़रीह कर सकें। तरह-तरह के सामानों की दुकानें। एक दुकान पर महिलाओं के कपड़ों के ढेर लगे हुए थे। सैंकड़ों ब्लाउज एक के ऊपर रखे हुए। फोटो लेने की सोची लेकिन फिर लगा कहीं कपड़े बुरा न मान जायें। आगे बढ़ गए।
गलियों से होते हुए में सड़क पर आए। आने-जाने की सड़क अलग-अलग। दोनों सड़क के दोनों तरफ़ पत्थर के बैठने के मूढ़े टाइप रखें हुए थे। यह बात अलग कि उन पर कोई बैठा नहीं था। अलबत्ता दोनों सड़क के बीच की 'नो रोड लैंड' पर तमाम लोग बैठे, सोते, गपियाते, बतियाते दिखे। एक जगह एक परिवार के जैसे लोग ढेर सारी रेजगारी गिन रहा रहा। आदमी गिन रहा था, औरत और बच्चे उसको गिनते देख रहे थे। शायद वो भीख मांगने वाला परिवार रहा होगा।
कुछ रिक्शे वाले सड़क किनारे रिक्शा टिकाए रिक्शों पर टिके सो रहे थे। कुछ लोग बीच की जगह पर खाना पकाते भी दिखे। चाँदनी चौक पर गाड़ियों को सुबह 9 बजे के पहले और रात को 9 बजे आने की मनाही के बोर्ड लगे हैं। पकड़े जाने पर बड़े जुर्माने की सूचना भी लगी है। पता नहीं इस पर कितना अमल होता है।
एक जगह चौराहे पर खड़े होकर हमने वीडियो बनाया और आसपास के इलाक़े को काफ़ी देर तक देखा। कहते हैं यहाँ पर नहर थी जिसका पानी चाँद की रोशनी में चमकता था इसीलिए इस बाजार का नाम चांदनी चौक पड़ा। काश उस समय के वीडियो आज दिखते तो अंदाज़ लगता कैसा दिखता था उस समय चाँदनी चौक।
वहीं एक जगह स्वामी श्रद्धानंद जी की मूर्ति लगी थी। स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती (मुंशीराम विज ; 22 फरवरी, 1856 - 23 दिसम्बर, 1926) भारत के शिक्षाविद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आर्यसमाज के संन्यासी थे जिन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती की शिक्षाओं का प्रसार किया।
चाँदनी चौक की सड़क पर जगह-जगह सूचनाएँ उर्दू में भी लिखी दिखीं। हमने ठहरकर सब सूचनाएं अटक-अटक कर उर्दू में पढ़कर अपने हालिया अर्जित उर्दू की जानकारी का इम्तहान लिया। हर बार कामचलाऊ नंबरों से पास होते रहे।
आगे उर्दू के मशहूर शायद उस्ताद दाग़ के नाम का होलसेल मार्केट का बोर्ड लगा दिखा। बाजारों में अपनी सहज दिलचस्पी के चलते Alok Puranikजी ने अपनी वाक के क़िस्सों में इस मार्केट का जिक्र कई बार किया है। कुछ लोगों हजरत दाग़ को अपने समय के सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक कवियों में से एक माना है। दाग साहब का एक शेर मुझे हमेशा याद आता है :
हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए
और होंगे तिरी महफ़िल से उभरने वाले
दाग साहब माँ को केंद्र में रखकर उर्दू के मशहूर लेखक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब का उपन्यास '‘कई चाँद थे सरे-आसमाँ’' हाल के समय के सबसे पसंदीदा और पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक माना जाता है।
कूँचा हजरत दाग़ के आगे बल्लीमारान की वह गली है जहाँ उर्दू के नामचीन शायर उस्ताद ग़ालिब की हवेली है। गली की शुरुआत में तमाम जूते-चप्पलों की दुकानें हैं। इसके बाद चश्में की दुकानें। पूछते हुए गली में घुसे तो किसी को ग़ालिब की हवेली के बारे में पता था , किसी को नहीं पता था। इस पूछताछ में हवेली से आगे निकल गए। आगे जाकर पूछा तो किसी ने बताया -'पीछे है। तमन्ना गेस्ट हाउस के पास।' हम पलट लिए।
लौटते हुए रास्ते में एक स्कूल के गेट पर चिपकी चेतावनी देखी -"यहाँ गाड़ी खड़ी करना मना है। अगर खड़ी की तो हवा निकाल दी जायेगी। यह स्कूल है रोजाना खुलता है।"
हमारे पार कोई गाड़ी थी नहीं लिहाजा यह चेतावनी हमारे लिए नहीं थी। टहलते हुए हम तमन्ना गेस्ट हाउस तक आए। वहीं पास में ग़ालिब की हवेली थी। हवेली के बाहर लाल पत्थर पर लिखा था -"हवेली मिर्जा ग़ालिब। इस हवेली में वर्ष 1860 से 1869 तक मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने जीवन का अंतिम समय व्यतीत किया।"
हवेली के अंदर जाने पर कुछ और बोर्ड लगे थे। एक में उस्ताद ग़ालिब का परिचय था। इसके बाद और कुछ नहीं था। हवेली शुरू होते ही ख़त्म हो गई। ऊपर एक गेस्ट हाउस था। वहाँ जाते हुए एक जन से पूछा तो उन्होंने बताया -"हवेली मेंटिनेंस के लिए बंद है।" थोड़ी देर बाद वहीं से गुजरते दूसरे आदमी ने बताया -"बीजेपी गवर्नमेंट ने बंद करवा दी हवेली।" हमने पूछा -"क्यों।" इस पर वह -"हमको नहीं पता,क्यों?" कहते हुए हवेली के एक हिस्से में चलता चला गया।
हवेली के फाटक के पास ही दो दरवाजे थे , जो कि बंद थे, उनके अंदर ही मिर्ज़ा ग़ालिब अपने आख़िरी दिनों में रहते थे। हम कुछ देर इधर-उधर ताक कर बाहर आ गए।
बाहर आकर भी कुछ लोगों से ग़ालिब स्मारक बंद होने के बारे में पूछा। अधिकतर लोगों ने -"हमको पता नहीं" बताया। अलबत्ता बगल की एक दुकान पर मौजूद लोगों ने बताया कि मरम्मत के लिए बंद है ग़ालिब की हवेली। 22 जून के बाद खुलेगी। हमको लगा कि ग़ालिब स्मारक से जुड़े लोगों/संस्था को इसकी मरम्मत की सूचना वहाँ लगानी चाहिए। लेकिन किससे, क्या कहते। कोई वहाँ था भी तो नहीं। अपन ग़ालिब का शेर :
"बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे"
(पूरा विश्व बच्चों के छोटे खेल के मैदान की तरह है! हर दिन और रात मेरे सामने एक भ्रम, एक तमाशा घटित होता रहता है!!) दोहराते हुए वापस लौट आए। तसल्ली यही रही कि उस्ताद ग़ालिब की हवेली का मुख्य द्वार देख लिया। जल्द ही पूरी हवेली भी देखेंगे।

https://www.facebook.com/share/v/1BBzrLwiQU/

Wednesday, June 18, 2025

ब्रह्मांड के संरचना

 

पिछले दिनों हमारे कंप्यूटर की सेटिंग गड़बड़ाई रही। जो भी लिखते उसके चारो तरफ़ घेरा बन जाता। बक्से जैसा। मानों हमारे लिखे को सुरक्षा घेरे में ले लिया गया हो। सुरक्षा घेरा एक तरफ़ वीआईपी होने का एहसास है। दूसरी तरफ़ बवाल भी। आपकी हर पल की गतिविधियों का पता सुरक्षा मुहैया कराने वाले को चलता रहता है।

बहरहाल कुछ दिन समस्या झेलने के बाद फेसबुक पर समस्या साझा की। ब्लागिंग घराने के लोगों ने हल बताया। Ashish ने बताया कि समस्या फोकस रिंग की है, Jitendra ने उनकी बात का समर्थन किया। समस्या भी हल हो गई। आनलाइन समस्याओं के हल के लिए सबसे बड़ी सहायता ब्लागिंग के जमाने के दोस्तों से ही मिलती है।
आशीष विज्ञान से संबंधित लेख लिखते रहते हैं।विज्ञान विश्व (। https://vigyanvishwa.in/ ) साइट चलाते हैं। कुछ दिन पहले उनकी पहली किताब आई है -

ब्रह्मांड के संरचना। इस किताब में आशीष ने ब्रह्मांड के बनने से लेकर उसके संभावित अंत के बारे में सरल भाषा में जानकारी दी है ।अरबों -खरबों साल पहले कैसे एक महाविस्फोट से ब्रह्मांड का बनना शुरू हुआ और कैसे आज भी यह फैलता जा रहा है, इसका विवरण किताब में दिया है। 180 पेज की किताब 299 रुपए की है। आनलाइन आर्डर करके मंगा सकते हैं। लिंक टिप्पणी में दिया है।
अरबों-खरबों साल पहले ब्रह्मांड की शुरुआत से अब तक न जाने दुनिया में कितने बदलाव हुए होंगे। न जाने कितने आकाशगंगाएँ, तारे, ग्रह, नक्षत्र पैदा हुए होंगे, ख़त्म हो गए होंगे। न जाने कितनी दुनियायें, बनी होंगी, उजड़ गयीं होंगी। कितनी कहानियाँ बनी होंगी, कितनी सभ्यताएँ शुरू हुई होंगी, ख़त्म हो गई होंगी। इतने बड़े पटल में हमारी धरती की कुल कहानी एक बिंदु भर से बड़ी नहीं होगी। उसमें भी अगर इंसान की कहानी देखी जाये तो वो तो और भी छोटी और लगभग अस्तित्वहीन होगी।
ऐसे समय में आजकल चल रही लड़ाइयाँ के बारे में सोचते हैं तो ब्रह्मांड की तुलना में इसकी कोई गिनती ही नहीं होगी। इराक़ और इजरायल आपस में लड़ने पर आमादा हैं। इसको लड़ाने वाले जमूरे बंदर की तरह कहीं दूर सुरक्षित बैठे दोनों देशों को बिल्लियों की तरह उकसा रहे होंगे- 'चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे राम।'
आज जितने भी देश लड़ाई के लिए आमादा हैं उन सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष अपनी मर्जी को अपने देश मर्जी समझते हुए लड़ाई कर रहे हैं। किसी भी देश के लोग शायद अपनी तरफ़ से लड़ाई नहीं करना चाहते हैं। लेकिन हो रही है लड़ाइयाँ, मर रहे हैं लोग, बन रहे हैं किस्से। लड़ाई से जिन लोगों को फ़ायदा होता है वे लोग अपनी तरफ़ से घी डाल रहे हैं युद्धयज्ञ में।
लड़ाई की रिपोर्टिंग से पता लगाना मुश्किल होता है कि कौन जीत रहा है, कौन हार रहा है। अपन न्यूज चैनल तो देखते नहीं। न्यूज चैनल सबसे अधिक झूठ का प्रचार करने वाले लगते हैं।
यूट्यूब पर खबरें देखते हुए भी असलियत का अंदाज़ नहीं लगता है। एक समाचार में इजरायल हावी दिखता है, उसके बगल की दो खबरें ईरान का पलड़ा हावी बताती हैं। कुछ लोग ईरान की तबाही चाहते हैं, कुछ मनाते हैं इजरायल निपट जाये। सबके अपने-अपने तर्क हैं, अपने-अपने पूर्वाग्रह हैं, अपनी-अपनी जानकारियाँ है। अपने-अपने हिसाब से लोग पोस्ट लिख रहे हैं, वीडियो बना रहे हैं।
कुछ लोग ईरान, इजरायल के अतीत के किस्से बताते अपना पक्ष तय कर रहे हैं। ऐसे लोग अपनी सुविधानुसार पीछे जाते हुए किसी बिंदु पर खड़े होकर उस समय की कहानियाँ सुनाते हुए अपना तर्क पेश करते हैं। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि पीछे जाने की कोई सीमा नहीं होती। पीछे जाते-जाते वहाँ तक पहुँचा जा सकता है जहाँ ब्रह्मांड की शुरुआत हुई थी।
फ़िलहाल यूट्यूब पर उत्तर भारत में बरसात के किस्से आने शुरू हो चुके हैं। इजराइल, ईरान की लड़ाई के किस्से भी चल ही रहे हैं, सोनम और राजा के किससे भी अभी जारी हैं। एयरइंडिया की दुर्घटना की जांच के इतने एंगल सामने आ गए हैं कि दुर्घटना का जो भी कारण जाँच कमेटी बतायेगी उससे अलग ही कहानियाँ बनेंगी। पिछले दिनों एयर इंडिया की उड़ाने वापस हुई हैं, जहाज़ रोके गए हैं। सबको देखकर लगता है कि एयरइंडिया को टाटा वालों को सौंपते समय उनके सिस्टम के काम वाले पुर्जे निकाल लिए गए हों। सरकारी कारखानों की नीलामी वाले मशीनें कबाड़ में बेंचते हुए ऐसा ही किया जाता है।
बात कहाँ से शुरू हुई थी, कहाँ पहुँच गई। मुफ्त के प्लेटफार्म पर लिखने-लिखाने में ऐसा ही होता है।

https://www.facebook.com/share/p/1C2mt6dnim/

नए-नए नजारे

 


आजकल टहलना रोज हो जाता है। जब भी निकलते हैं, नए-नए नजारे दिखते हैं। जिस समय टहल रहे होते हैं, लोगों को टहलते देख तरह-तरह के ख्याल आते हैं। बाद में इधर-उधर हो जाते हैं।

आज टहलते हुए एक सज्जन, औसत से थोड़ा ज्यादा स्वस्थ और साँवले फ़ोन पर किसी से बतियाते हुए कह रहे थे -'वो गरीबी का नाटक करता है। ऐसे तो सब ही गरीब हैं।' अगले चक्कर में बगल से गुजरते हुए सुनाई दिया -'फ़ाइल की भी सेटिंग करानी पड़ती है भाई, ऐसे थोड़ी काम होता है।'
हमारे देखते-देखते एक महिला पार्क के टहल-ट्रैक में दाखिल हुईं। हमसे आगे टहलने लगी । वे एक हाथ में सोने के कड़े पहने हुए थीं, दूसरे में कलावा। जिस हाथ में कड़े पहने थीं मोबाइल भी उसी हाथ में थामें थीं। यह देखकर हमने सोचा एक ही इंसान के अलग-अलग हाथों की आर्थिक हैसियत में कितना अंतर है।
मजे की बात जैसे ही हमने यह सोचा वैसे ही उस महिला ने अपना मोबाइल कलावा वाले हाथ में ले लिया। अब दोनों हाथ में कुछ-कुछ संपत्ति संतुलन हो गया था। टहलते हुए उनकी और हमारी स्पीड लगभग बराबर थे। अपन उनके पीछे ही टहल रहे थे। कुछ देर बाद हमें लगा कि वे यह न समझें कि हम उनका पीछा कर रहे हैं। यह ख्याल लिए थोड़ी देर हम टहलते रहे और फिर ट्रैक पर उल्टी तरफ़ टहलने लगे। कुछ देर बाद वे सामने से आते दिखीं और उनकी टी शर्ट पर लिखा दिखा -I dont know .
हमारा मन किया किया कि उनको Quoted Dhaaga की टी शर्ट के बारे में जानकारी दे दें ताकि वे अपने मनपसंद स्लोगन वाली टी शर्ट बनवा सकें। लेकिन हमने मन को बरज दिया -'इस तरह की फालतू की बात नहीं सोचते।'
एक पेड़ के पास एक बुजुर्ग अपने साथ लाए बिस्कुट्स तोड़-तोड़ कर चीटियों के लिए डाल रहे थे। वे एक पैर से लचक कर चल रहे थे। शायद पैर में कुछ तकलीफ़ रही होगी। हम उनको चीटियों को बिस्कुट डालते देखते हुए आगे बढ़ गए।
एक लड़की पार्क में आते ही फुर्ती से टहलने लगी। वह फ़ोन पर किसी को बता रही थी रोज़ कम से कम सेवेंटीं-एट्टीन थाउसैंड स्टेप्स वाक करती हूँ। शायद वह वजन घटाने के अभियान में मेहनत से जुटी हुई है।
बात करते हुए आजकल लोग कान में ईयर प्लग लगाए रहते हैं। कभी-कभी अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि अगला हमसे बात कर रहा है कि किसी और से।
कुछ लोग पार्क में चटाई पर योगा मैट बिछाये योग कर रहे थे। कुछ बतिया रहे थे। ज्यादातर लोग टहलते हुए मोबाइल देखते जा रहे थे। देखकर ऐसा लग रहा था कि मोबाइल न हो तो उनका टहलना भी स्थगित हो जाये।
एक बिल्ली सामने से आती दिखी। हमको लगा वो हमारा रास्ता न काट जाये। लेकिन वह हमको देखकर ठिठककर रुक गई। उसके चेहरे से लगा कि वह भी डरी हुई थी कि कहीं उसका रास्ता हम न काट जायें। हमारे निकल जाने के बाद वह पलटकर दूसरी तरफ़ भाग गई।
पानी के फ़व्वारे चल रहे थे। यहाँ दोनों पार्कों में फव्वारे लगे हुए हैं। सुबह-शाम चलते हैं। इन फव्वारों को देखकर फ़ैक्ट्री के फ़व्वारे याद आ गए जिनमें इंद्रधनुष दिखता था। यहाँ के फ़व्वारे सुबह दिखते हैं या शाम को। उस समय सूरज उस स्थिति में नहीं होता कि पानी में इंद्र धनुष बना सके।
थोड़ी देर बाद हमारा सुबह टहलने का कोटा पूरा हो गया। हम घर वापस लौट आए।

https://www.facebook.com/share/v/18AiPtj78y/

Sunday, June 15, 2025

'उस तरह' की बातें


 कल डी एल एफ़ माल गए। वहाँ एक खुले कमरे में एक महिला एक मेज पर पत्ते बिछाए बैठी थी। सामने एक दूसरी महिला कुर्सी पर बैठी थी। दोनों ही खूबसूरत । दोनों को खूबसूरत लिखने का कारण यह कि महिलायें या तो ख़ूबसूरत होती हैं या बहुत खूबसूरत। हमने 'खूबसूरत' लिखा , आपका मन करे तो 'बहुत' अपनी तरफ़ से लगा सकते हैं। किसी को बहुत खूबसूरत कहने के लिए उसका सामने होना जरूरी थोड़ी है। वैसे भी लोग कहते हैं कि खूबसूरती तो देखने वाले की आँखों में होती है।

सामने दीवार पर टैरो कार्ड रीडिंग का बोर्ड लगा था। पहले मैंने उसे सिर्फ़ 'रीडिंग' पढ़ा । लगा शायद कुछ पढ़ने-लिखने का अड्डा है। लेकिन फिर 'रीडिंग' के साथ 'टैरो' लगा देखा तो मतलब समझ में आया ।
एक खुले गैरेज नुमा कमरे में टैरो कार्ड बंचवाने के लिए कई महिलायें बैठी थीं, हालांकि वहाँ 'केवल महिलाओं के लिए' जैसा कोई बोर्ड नहीं लगा था। मेरा भी मन किया कि अपन भी पत्ते निकालकर अपना भविष्य बँचवा लें लेकिन फिर नहीं बँचवाया। पता नहीं क्या बताती वो मेरा कार्ड बाँच कर। कुछ अच्छा बता देती तो परेशान हो जाते, कुछ ख़राब बतातीं तो भी सोचते रहते । हम दूसरे काम करके बाहर आ गए।
लौटने के लिए घर का रास्ता सड़क पार से था। पहले सोचा बीच के डिवाइडर 'कनपुरिया' अंदाज में फाँद जाएँ। लेकिन तेज ट्रैफिक और डिवाइडर की ऊँचाई ने शरीफ़ नागरिक बने रहने को मजबूर किया। ट्रैफिक और डिवाइडर की ऊँचाई के अलावा हमने यह भी देखा कि एक कार से किसी ने कोक का टीन का डब्बा फेंका तो उसे उसके पीछे आने वाली कार ने पिचका दिया। उसके बाद आने वाले डीसीएम ट्रक ने उसे और पिचककर सड़क से मिला सा दिया। हमें लगा ज्यादा बहादुरी दिखाई तो हमारे हाल भी कोक के डब्बे की तरह ही हो जाएँगे। हमने सड़क पार करने के लिए ऊपर वाले ब्रिज का सहारा लेने के बारे में सोची।
ब्रिज पार करने के लिए सीढ़ियाँ देखकर लगा कौन चढ़ेगा तेज धूप में इतनी सीढ़ियाँ। हमने फाँदने के मंशा से फिर डिवाइडर की तरफ़ देखा लेकिन इसी बीच हमको पुल के नीचे लिफ्ट दिख गई। हमने वहीं खड़े-खड़े पुल पर चढ़ने के लिए लिफ्ट की व्यवस्था करने वालों की तारीफ़ की और पुल के ऊपर आ गए ।
पुल के ऊपर से ट्रैफिक देखने का अलग ही मजा है। हम देर तक आती-जाती गाड़ियों को देखते रहे। एक तरफ़ सड़क खाली थी , उधर की गाड़ियाँ फर्राटा मारते हुए जा रही थीं। दूसरी तरफ़ भीड़ थी गाड़ियों की इसलिए गाड़ियाँ रेंग सी रही थीं। ऐसा लगा कि डिवाइडर के एक तरफ़ कोई विकसित देश का ट्रैफिक है , दूसरी तरफ़ विकासशील देश का। डिवाइडर के इधर-उधर के ट्रैफ़िक की तुलना के लिए हमने देशों के नाम नहीं लिखे। क्या पता कौन देश बुरा मान जाये। आप अपने मन से रख लो।
लौटने के लिए गाड़ी की तो 15 मिनट दूर बताया। लेकिन ड्राइवर को हमको फ़ोन किया और अपनी स्थिति बताई कि हम कहाँ खड़े हैं तो वह तीन मिनट में ही मेरे पास आ गया। अब ये बारह मिनट का लफड़ा कैसे हुआ , कहाँ ग़ायब हो गए समझ में नहीं आया। मन किया इसकी सीबीआई जाँच की माँग करें लेकिन फिर सोचा कि सोनम -राजा के केस में अभी तक सीबीआई जांच नहीं हुई जिसको पूरा देश जानता है तो हमारे 12 मिनट के घपले की जांच कौन करेगा ?
रास्ते में ड्राइवर ने एक गुरुद्वारा द्वारा संचालित प्याऊ से पानी पिया। हमको लगा कि कितना पुण्य का काम है प्याऊ बनवाना। पहले खूब बनवाते थे लोग प्याऊ। अब इसे पिछड़े जमाने की बात मानकर लोग नहीं बनवाते। रास्ते के नज़ारे देखते हुए घर आ गए।
सड़क के नजारे देखना भी मजेदार काम है। आज सुबह देखा सड़क किनारे फुटपाथ पर 'ओपन एयर सैलून' में एक आदमी कुर्सी पर बैठा दाड़ी बनवा रहा था। पहले सोचा उसका फ़ोटो लें लेकिन फिर उसकी निजता का ख्याल करके इरादा टाल दिया।
सड़क पर एक जगह ठेलिया में एक आदमी तरह-तरह के नमक के ढेले सजाये हुए दिखा। पूछने पर बताया कि कई तरह के नमक के अलावा हींग और दीगर मसाले भी रखें था वह। तरह -तरह के नमक साथ-साथ बिना लड़े-झगड़े बिकने के लिए तैयार थे।
तिराहे पर एक तिकोने चबूतरे पर कबूतर अपना सुबह का नाश्ता कर रहे थे। एक ही जगह पर बिछे दाने के पास अलग-अलग पोज में उछलते हुए वे नाश्ता करने में तल्लीन थे। दो कबूतर एक ट्रे जैसी बिन में बैठकर दाना चुग रहे थे। बीच-बीच में दाना पचाने के लिए वो दो-चार मीटर हवा में उड़कर फिर से दाने के पास आकर बैठ जाते।
कबूतरों के दाना चुगते देखकर तमाम बातें दिमाग़ में आईं लेकिन वो इतनी 'उस तरह' की थीं कि हमने उन बातों को वहीं तिराहे पर ही छोड़ दिया। टहलते हुए घर आ गए।

https://www.facebook.com/share/v/14ZtUQqGQ5D/

Saturday, June 14, 2025

मरता गरीब इंसान ही है

 आज सुबह टहलने निकले। सोसाइटी की तमाम कारों के वाइपर झंडे के डंडे की तरह सलामी मुद्रा में उठे थे। । कार की सफ़ाई करने वाले सामने का शीशा साफ़ करके वाइपर उठा देते हैं। यह इस बात का भी संकेत है कि कार साफ़ की जा चुकी है ।

मेन गेट पर नेकचंद मिले। हाल ही में उनकी पत्नी का निधन हुआ है। पीलिया से। देर में पता लगा इसलिए गंभीर हो गया रोग। बहुत इलाज कराया। देखभाल के लिए बेटे ने नौकरी भी छोड़  दी।इलाज में खर्चे के लिए कर्ज लिया , खेत गिरवी रखें।  लेकिन बची नहीं। बेटे की शादी अगले महीने होने वाली थे। पत्नी के न रहने पर स्थगित हो गई। 

पारिवारिक स्थिति बयान करते हुए नेकचंद ने बताया -"चार बिटिया हतीं। सबकों निकार दओ। बेटा बचो है, उसऊ कि शादी हती  अगले महीना। लेकिन बे रहीं नहीं। आख़िर तक कहती रहीं , बहुरिया क मुँह नाईं देख पाए।" (चार बेटियां थीं। सबकी शादी कर दी। बेटा है , उसकी भी शादी थी अगले महीने। लेकिन वे (पत्नी)  रही नहीं। आख़िरी तक कहती रहीं , बहू का मुँह नहीं देख पाये)। समाज के बड़े वर्ग में अभी भी बेटियों-बेटों की शादी करना सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना जाता है। बेटियों की शादी मतलब उनको घर से निकालना , समाज में लड़कियों के हाल बयान करता है।

22 साल का बेटा अभी घर पर ही रहता है। नौकरी दुबारा मिली नहीं है ।  वह खाना-वाना, चाय तक नहीं बना पता। नेकचंद ही उल्टा-सीधा बनाते हैं। चार बहनों के बीच अकेला भाई वैसे भी दुलारा होता है। कुछ सिखाया नहीं जाता उसको। 

नेकचंद से विदा लेकर आगे बढ़े। सड़क किनारे के झोपड़ियों की दुकानें लगने लगीं थीं। सड़क के दोनों तरफ़ सोसाइटियों की कतार है। एक स्कूल में समर कैंप लगा है। कारों से उतरे बच्चे नेकर-बनियाईन में बेफिक्री से स्कूल की तरफ़ जा रहे हैं। कुछ के माता-पिता भी साथ में हैं। 

सामने से इस्कान संकीर्तन रथ आते दिखा। रथ के साथ कुछ लोगों का जुलूस राम-राम , हरे - हरे  बोलते हुए चल रहा था। सड़क पर आते-जाते लोगों को प्रसाद वितरित करते जा रहे थे। हमें भी ज़बरियन थमा दिया प्रसाद।  रवा का हलवा था प्रसाद में। पीला प्रसाद दोने में । पहले मन किया कि खा लें। लेकिन मीठे से परहेज सोचकर प्रसाद को इज्जत के साथ हाथ में थामे आगे बढ़ गए। सोचा किसी को दे देंगे। 

आगे बढ़ने पर याद आया कि सड़क पर कुत्ता टहलाते हुए एक बच्चा अपने कुत्ते को दोना चटा रहा था। शायद इस्कान समूह के लोगों के द्वारा मिला प्रसाद ही उसने कुत्ते को खिला दिया होगा। इस्कान समूह के बड़े-बड़े मंदिर और सम्पति है दुनिया भर में। तमाम कल्याणकारी काम करते रहते हैं। लेकिन उनके मंदिर और संस्थान संपन्न इलाक़ों में ही मिलते हैं। गरीब बस्तियों में नहीं मिलते इस्कान के मंदिर। 

आगे कई पार्क दिखे। शहरों में जब पार्क ग़ायब होते जा रहे हैं , तब नोयडा में आसपास अच्छे, मेंटेन पार्क देखकर अच्छा लगा। एक जगह सामने से नेकचंद  आते दिखे। अपनी ड्यूटी पूरी करके वे घर वापस जा रहे थे। इस्कान वालों का प्रसाद उनको दे दिया। उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी ले भी लिया। प्रसाद मुक्त होकर हम  टहलते हुए सोसाइटी के पीछे वाले पार्क में पहुँच गए। टहलना शुरू कर दिया। 

पार्क में बने ट्रैक में तमाम लोग टहलते दिखे। कुछ लोग पार्क कसरत करते , बतियाते, गपियाते दिखे। बच्चे उछल-कूद करते  , झूला झूलते दिखे। 

ट्रैक पर  टहलते हुए सामने से एक रोआबदार चेहरे वाले बुजुर्ग फुर्ती से आते दिखे। हमारे बगल से गुजरते हुए उन्होंने अपना  हाथ, जिसमें उन्होंने मोबाइल पकड़ा  था, हमसे दूर कर लिया। शायद उनको लगा होगा , हमारे बगल से गुज़रते हुए कहीं उनके मोबाइल को हमारा मोबाइल छेड़ न दे। 

आगे पार्क में बैठी दो लड़कियां पार्क के पेड़ पर ढेला मारकर कुछ तोड़ते दिखीं। अपने असफल प्रयास पर खिलखिलाते हुए वापस बेंच पर बैठ गयीं। 

चक्कर पूरा होने पर सामने से फिर वही मोबाइल धारी रोआब वाले बुजुर्ग दिखे। इस बार उन्होंने अपना मोबाइल वाला हाथ दूर नहीं किया। शायद इतनी देर में वे आश्वस्त हो गए होंगे कि हमारा मोबाइल शरीफ मोबाइल है। छेड़छाड़ में विश्वास नहीं उसका। 

तीसरे चक्कर में बुजुर्ग के हाथ में मोबाइल की जगह उनका रुमाल था। मोबाइल शायद उन्होंने जेब में रख लिया था। बगल से गुजरते हुए उन्होंने रुमाल वाला हाथ हमसे दूर कर लिया। अब  शायद उनको अपने रुमाल के छेड़ने की चिंता हो रही हो। मुझे लगा अगले चक्कर में शायद वे रूमाल वाले हाथ को हमसे दूर न करें। लेकिन अगले चक्कर में वे दिखे नहीं। शायद अपना टहलने का कोटा पूरा करके घर चले गए हों। 

बगल से गुजरते हुए हाथ दूर कर लेने की बात से लेव टालस्टाय  के संबंध में वर्णित किसी का संस्मरण याद आया । जीने से उतरते हुए सामने से आते किसी को देखकर वे किनारे होकर रुक गए जबकि सीढ़ियों में दोनों के गुजरने की पर्याप्त जगह थी। लेव उस समय 'अन्ना कारनिना' उपन्यास लिख रहे थे। अपने पात्रों के बारे में सोचते रहते। सीढ़ियों से उतरते हुए उनको लगता अन्ना उनके साथ में हैं। दोनों के साथ चलते हुए सामने से आते हुए को रुककर रास्ता दे देते। 

टहलते हुए हमको भी अपना उर्दू का क़ायदा याद आ गया। हम मन ही मन उर्दू के हर्फ़ दोहराते हुए टहलते रहे। 

पार्क में एक आदमी हाथ में चाकू लिए पेड़ के पास टहलता दिखा। मुझे लगा शायद किसी पेड़ की  छाल ले जाने के लिए चाकू लाए हैं। लेकिन थोड़ी देर में  देखा कि वे अपने पास के डब्बे से आटा  चाकू से निकालकर पेड़ों के जड़ों के पास डाल रहे हैं। चाकू को वे चम्मच के तरह प्रयोग कर रहे थे।  आटा चीटियों के लिए डाल रहे थे। याद आया कुछ देर पहले वे कबूतरों के लिए दाना भी डाल रहे थे। 

बुजुर्ग इंसान द्वारा कबूतरों और चीटियों के लिए भोजन का इंतजाम करते देखकर मुझे   इजरायल, गाजा, ईरान, रूस, यूक्रेन में छिड़ी लड़ाइयों के याद आ गई। एक तरफ़ इंसान जानवरों के लिए भोजन का इंतजाम कर रहा है। दूसरी तरफ़ इंसान अपनी ही प्रजाति के लोगों को बर्बाद करने पर आमादा है। दुनिया के बड़े-बड़े देशों के कर्णधार गली-मोहल्ले के लोगों गुंडों की तरह टपोरी टाइप भाषा बोलते हुए गुण्डागिरी पर आमादा हैं। दुनिया एक बड़े शर्मनाक दौर से गुज़र रही है। 

पार्क के  बाहर जूस बेचता  दुकानदार जूस पेरता हुआ अपने ग्राहक से बतियाता हुआ कह रहा था -"लड़ाई कहीं हो लेकिन मरता  गरीब इंसान ही है।"

 एक आदमी चाय की  दुकान पर बैठा अपने मोबाइल को मुँह के आगे ऐसे लगाए था मानों उससे निकलने वाली किसी चीज को पी रहा हो। फिर याद आया मोबाइल का आवाज वाला हिस्सा है वह जिसे मुँह में लगाए हुए वह बात कर रहा था। आगे एक नाला साफ़ करते हुए दो आदमी नाले का कूड़ा निकाल रहे थे। सामने से मोटर साइकिल से पास आकर बोला -"अब शेर और चीता लग गए तो साफ़ ही होकर रहेगा नाला।" हमें लगा बताओ , शेर और चीते अब नाले साफ़ करने में लगे हैं। वैसे कोई बड़ी बात नहीं। ऐसा देश में तमाम जगह हो रहा है। बड़े-बड़े बुद्धिजीवी शेर  राजनीति  से जुड़े सियारों की शादी में बैंड बजाते घूम रहे हैं। 

आगे हमारी सोसाइटी का गेट आ गया। गेट में घुसकर हम अपने घर आ गए। घर  दुनिया में सबसे सुकून की जगह होती है। 











Thursday, June 12, 2025

झाड़े रहो कलट्टरगंज वाया Quoted Dhaaga


 महीने भर पहले Anany -Ashish ने नया काम शुरू किया। कस्टमाइज टी शर्ट का। कोटेड धागा नाम से कंपनी बनाई। टी शर्ट पर अलग-अलग तरह के आकर्षक कोटेशन प्रिंट करवा कर सप्लाई का काम। इस काम में बच्चों को रोज़ अपने काम के लिए रील बनाते, टी शर्ट की डिजाइन करते, प्रिंट कराते, डिस्पैच करते और हर वह काम करते देखा जो एक नया व्यवसाय शुरू करते हुए किया जाता है।

शर्ट पर मनचाहा कोटेशन प्रिंट करवाने की सुविधा देखकर मेरा मन किया कि अपन भी एक टीशर्ट पर अपना मनचाहा कोटेशन छपाकर पहने। यह भी सोचा कि वही टी शर्ट पहनकर यूट्यूब पर वीडियो बाजी करेंगे।
कोटेशन तय समय कई डायलॉग सूझे। यह भी सोचा कि अपनी किताबों के नाम प्रिंट कराकर पहनें। लेकिन अंत में तय हुआ कि पहली शर्ट पर कनपुरिया नारा ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ छपवाया जाये। इस नाम से एक किताब भी है है अपन की तो किताब वाली शर्त भी पूरी हो जाएगी।
आइडिया बताया तो बच्चों ने ख़ुशी से कहा-‘हम आपको गिफ्ट करेंगे, आपको आर्डर करने की जरूरत नहीं।’ लेकिन उनकी बात जुमला ही रही। शर्ट आई नहीं। इससे साबित होता है कि राजनीति ने कितना समाज को कितना प्रभावित किया है।
हफ़्ते भर इंतज़ार करने के बाद हमने आर्डर कर दिया। आर्डर मिलने के बाद बच्चे , ‘अरे आपने आर्डर क्यों किया, हम आपको ऐसे ही गिफ्ट करते’ कहते हुए ख़ुशी-ख़ुशी मेरे लिए टी शर्ट डिजाइन करने लगे। डायलॉग के हिसाब से शहर की कई इमारतें खोजी -लाल इमली, घंटाघर, बिठूर आदि। आख़िर में कानपुर का सेंट्रल स्टेशन फ़ाइनल हुआ।
कल टी शर्ट बनकर आ गई। हमने सोचा पहनकर फ़ोटो खिंचवाया जाये। फ़ोटो देखकर लगा कि अब इनमें से किसी एक को प्रोफ़ाइल पिक्चर बनाया जाएगा। साइकिल के साथ वाली फ़ोटो काफ़ी पुरानी हो गई। फ़ोटो बेटे अनन्य ने खींची है।
आने वाले समय में हो सकता है कि अपन यूट्यूब पर वीडियोबाजी करते हुए पाये जायेंगे। अगर ऐसा कुछ हुआ तो सोचा है यह टी शर्ट पहनकर करने का विचार है। वैसे ‘ झाड़े रहो कलट्टरगंज’ नाम से Shambhunath Shukla जी का यूट्यूब चैनल है। इनके लिए सबसे मुफीद है या टीशर्ट।
यह तो हुई पोस्ट के साथ फ़ोटो की कहानी। दो फ़ोटो यहाँ लगा रहे। इनमें से एक को प्रोफ़ाइल पिक्चर बनायेंगे। आप बताओ कौन सा फ़ोटो आपको पसंद है।’ तुमको जो पसंद है वही बात करेंगे’ की तर्ज पर उसी को प्रोफ़ाइल पिक्चर बना लेंगे।
और हाँ , आपको भी अपने पसंदीदा कोटेशन के साथ टी शर्ट बनवाना हो तो आप भी कोटेड धागा पर आर्डर करके अपना श्लोगन और फ़ोटो भेज दीजिए। वो बना देंगे। एक टी शर्ट की क़ीमत 749/- रुपये है। साइट का पता टिप्पणी में दिया है।
कोटेड धागा का इंस्टाग्राम लिंक भी टिप्पणी में दिया है। इसको देखें और अपने उत्पाद के प्रचार के लिए बनाई गई रील्स का आनंद उठाइये। एक रील में कसरत करने वाले डंबल को माइक की तरह प्रयोग करते देखकर बरबस हँसी छूट गई।
फ़िलहाल इतना ही। बाक़ी फिर कभी। वैसे यह पूछने का मन है कि अगर अपन यूट्यूब चैनल शुरू करते हैं तो आप देखोगे ? लेकिन यह सवाल बेवक़ूफ़ी का है इसलिए इसे यहीं छोड़ते हैं।

https://www.facebook.com/share/p/1DSP8ofp7t/

Wednesday, June 11, 2025

तुर्की में ‘बिस्मिल’ के नाम पर शहर


 [आज प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जी का जन्मदिन है। तुर्की के राष्ट्रपति अतातुर्क कमाल पाशा बिस्मिल की क्रांतिकारी चेतना से इतना प्रभावित थे कि उन्होंने तुर्की में एक बिस्मिल के नाम से बिस्मिल शहर बनाया। इस बारे में प्रसिद्ध लेखक सुधीर विद्यार्थी जी Sudhir Vidyarthi से प्राप्त जानकारी यहाँ पेश है। ]

तुर्की में एक राज्य है दियारबाकिर, जिसका अर्थ होता है 'बागियों का दियार’। हिंदी में इसे विद्रोहियों का इलाका या भूखंड कहा जा सकता है। तुर्की के दक्षिणी-पूर्वी अनातोलिया क्षेत्र के इस दियारबाकिर प्रांत के पूर्व में बिस्मिल के नाम पर एक जिला है। यह वही भारतीय क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ हैं, जिन्हें नौ अगस्त, 1925 के प्रसिद्ध 'काकोरी कांड’ में अपने तीन अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ 19 दिसंबर, 1927 को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी पर चढ़ा दिया था। दियारबाकिर में 'बिस्मिल जिला’ और 'बिस्मिल शहर’ की स्थापना 1936 में अतातुर्क कमाल पाशा ने की थी। बिस्मिल का नाम उनकी शहादत के समय तक हिंदुस्तान में क्रांति का प्रतीक बन चुका था और कमाल पाशा उनसे बहुत प्रभावित थे।
रामप्रसाद 'बिस्मिल’ का क्रांति और कलम से समान रिश्ता था। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं। अपनी शहादत से दो दिन पूर्व तक बिस्मिल गोरखपुर के जेल अधिकारियों की नजर बचाकर जिस आत्मकथा को लिपिबद्ध करते रहे, उसमें कमाल पाशा का बहुत सम्मान के साथ जिक्र है। कमाल पाशा के प्रति बेहद आस्थावान बिस्मिल अपने साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को शायद वैसे ही किसी मुकाम तक ले जाना चाहते थे। 1936 में केन्या से भारी संख्या में तुर्की भाग कर आए कुर्द विस्थापितों को बसाने के लिए जिस जिले को बनाया गया था, उसका नाम बाद में तुर्की के राष्ट्रपति कमाल पाशा ने शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल’ के नाम पर रखा। इस जिले का मुख्यालय बिस्मिल शहर है। यह पहाड़ियों के बीच बसी एक खूबसूरत बस्ती है, जो अपने आकर्षक पार्कों के लिए देश भर में प्रतिष्ठित है। यहां के अधिकांश निवासी कुर्द ही हैं। बिस्मिल शहर की जनसंख्या 60,150 है।
शायद कमाल पाशा का क्रांतिकारी अभियान ही वह बिंदु था, जिसने बिस्मिल को अतातुर्क की ओर आकर्षित किया और वे 'विजयी कमाल पाशा’ के घोर प्रशंसक बन गए। बिस्मिल और अतातुर्क कमाल पाशा का रिश्ता दो देशों की क्रांतिकारी चेतना का अनूठा संगम है, जब इन जमीनों पर साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष जारी थे। मैं बार-बार सोचता हूं कि क्या बिस्मिल कमाल पाशा की तरह साम्राज्यवाद से सशस्त्र संघर्ष करना चाहते थे। मुकदमे के दौरान बिस्मिल की यह आकांक्षा थी कि उन्हें किसी तरह जेल से छुड़ा लिया जाए। उनका हौसला था कि वे कैद से बाहर आकर साम्राज्यवाद से एक बार हथियारबंद संघर्ष करें। तो क्या बिस्मिल कमाल पाशा बनना चाहते थे या उनके भीतर कमाल पाशा बनने की संभावनाएं थीं? हालांकि फांसी के फंदे तक पहुंचने के अंतिम कुछ क्षणों में उन्हें तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के बीच क्रांतिकारी आंदोलन की सफलता पर भी संदेह होने लग गया था। क्रांति के लिए जैसे सहयोग की अपेक्षा उन्होंने अपने समय में नौजवानों से की थी, वह किसी भांति पूरी नहीं हुई।
उत्तर भारत में क्रांतिकारी संगठन के ढांचे को मजबूती से खड़ा करने के लिए उन्होंने बहुत श्रम और शक्ति व्यय की, पर वह बार-बार निराश हुए। ऐसे में उन्हें जनता को शिक्षित बनाने की जरूरत शिद्दत से महसूस होती रही। वह मानने लग गए थे कि शायद शिक्षा के अभाव में उनके क्रांतिकारी प्रयासों को पर्याप्त स्पेस नहीं मिल सका। अपनी इसी सोच के चलते उन्होंने अंत में कहा भी था कि नवयवुकों को मेरा अंतिम संदेश यही है कि वे रिवाल्वर या पिस्तौल अपने पास रखने की इच्छा को त्याग कर सच्चे देशसेवक बनें। पूर्ण स्वाधीनता उनका ध्येय हो और वे वास्तविक साम्यवादी बनने का प्रयत्न करते रहें। बावजूद इसके बिस्मिल धर्म के मामले में कमाल पाशा के निकट नहीं दिखाई पड़ते हैं।
उन्हें अपने विचारों और योजनाओं को अमली जामा पहनाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। कमाल पाशा को हमारे देश के काकोरी कांड के एक क्रांतिकारी सैनिक और नेतृत्वकर्ता ने बेहद प्रभावित किया और वह उस प्रभामंडल की छाया तले तुर्की की धरती पर 'बिस्मिल शहर’ का निर्माण संभव कर पाए। यह एक तरह से बिस्मिल की क्रांतिकारी चेतना का विस्तार भी है।
पिता मुरलीधर और मां मूलमती के बीच खड़े मासूम बालक रामप्रसाद बिस्मिल का एक दुर्लभ चित्र सुधीर विद्यार्थी जी के सौजन्य से।

https://www.facebook.com/share/p/1bRpnXK1AQ/