Wednesday, June 18, 2025

नए-नए नजारे

 


आजकल टहलना रोज हो जाता है। जब भी निकलते हैं, नए-नए नजारे दिखते हैं। जिस समय टहल रहे होते हैं, लोगों को टहलते देख तरह-तरह के ख्याल आते हैं। बाद में इधर-उधर हो जाते हैं।

आज टहलते हुए एक सज्जन, औसत से थोड़ा ज्यादा स्वस्थ और साँवले फ़ोन पर किसी से बतियाते हुए कह रहे थे -'वो गरीबी का नाटक करता है। ऐसे तो सब ही गरीब हैं।' अगले चक्कर में बगल से गुजरते हुए सुनाई दिया -'फ़ाइल की भी सेटिंग करानी पड़ती है भाई, ऐसे थोड़ी काम होता है।'
हमारे देखते-देखते एक महिला पार्क के टहल-ट्रैक में दाखिल हुईं। हमसे आगे टहलने लगी । वे एक हाथ में सोने के कड़े पहने हुए थीं, दूसरे में कलावा। जिस हाथ में कड़े पहने थीं मोबाइल भी उसी हाथ में थामें थीं। यह देखकर हमने सोचा एक ही इंसान के अलग-अलग हाथों की आर्थिक हैसियत में कितना अंतर है।
मजे की बात जैसे ही हमने यह सोचा वैसे ही उस महिला ने अपना मोबाइल कलावा वाले हाथ में ले लिया। अब दोनों हाथ में कुछ-कुछ संपत्ति संतुलन हो गया था। टहलते हुए उनकी और हमारी स्पीड लगभग बराबर थे। अपन उनके पीछे ही टहल रहे थे। कुछ देर बाद हमें लगा कि वे यह न समझें कि हम उनका पीछा कर रहे हैं। यह ख्याल लिए थोड़ी देर हम टहलते रहे और फिर ट्रैक पर उल्टी तरफ़ टहलने लगे। कुछ देर बाद वे सामने से आते दिखीं और उनकी टी शर्ट पर लिखा दिखा -I dont know .
हमारा मन किया किया कि उनको Quoted Dhaaga की टी शर्ट के बारे में जानकारी दे दें ताकि वे अपने मनपसंद स्लोगन वाली टी शर्ट बनवा सकें। लेकिन हमने मन को बरज दिया -'इस तरह की फालतू की बात नहीं सोचते।'
एक पेड़ के पास एक बुजुर्ग अपने साथ लाए बिस्कुट्स तोड़-तोड़ कर चीटियों के लिए डाल रहे थे। वे एक पैर से लचक कर चल रहे थे। शायद पैर में कुछ तकलीफ़ रही होगी। हम उनको चीटियों को बिस्कुट डालते देखते हुए आगे बढ़ गए।
एक लड़की पार्क में आते ही फुर्ती से टहलने लगी। वह फ़ोन पर किसी को बता रही थी रोज़ कम से कम सेवेंटीं-एट्टीन थाउसैंड स्टेप्स वाक करती हूँ। शायद वह वजन घटाने के अभियान में मेहनत से जुटी हुई है।
बात करते हुए आजकल लोग कान में ईयर प्लग लगाए रहते हैं। कभी-कभी अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि अगला हमसे बात कर रहा है कि किसी और से।
कुछ लोग पार्क में चटाई पर योगा मैट बिछाये योग कर रहे थे। कुछ बतिया रहे थे। ज्यादातर लोग टहलते हुए मोबाइल देखते जा रहे थे। देखकर ऐसा लग रहा था कि मोबाइल न हो तो उनका टहलना भी स्थगित हो जाये।
एक बिल्ली सामने से आती दिखी। हमको लगा वो हमारा रास्ता न काट जाये। लेकिन वह हमको देखकर ठिठककर रुक गई। उसके चेहरे से लगा कि वह भी डरी हुई थी कि कहीं उसका रास्ता हम न काट जायें। हमारे निकल जाने के बाद वह पलटकर दूसरी तरफ़ भाग गई।
पानी के फ़व्वारे चल रहे थे। यहाँ दोनों पार्कों में फव्वारे लगे हुए हैं। सुबह-शाम चलते हैं। इन फव्वारों को देखकर फ़ैक्ट्री के फ़व्वारे याद आ गए जिनमें इंद्रधनुष दिखता था। यहाँ के फ़व्वारे सुबह दिखते हैं या शाम को। उस समय सूरज उस स्थिति में नहीं होता कि पानी में इंद्र धनुष बना सके।
थोड़ी देर बाद हमारा सुबह टहलने का कोटा पूरा हो गया। हम घर वापस लौट आए।

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