Sunday, June 15, 2025

'उस तरह' की बातें


 कल डी एल एफ़ माल गए। वहाँ एक खुले कमरे में एक महिला एक मेज पर पत्ते बिछाए बैठी थी। सामने एक दूसरी महिला कुर्सी पर बैठी थी। दोनों ही खूबसूरत । दोनों को खूबसूरत लिखने का कारण यह कि महिलायें या तो ख़ूबसूरत होती हैं या बहुत खूबसूरत। हमने 'खूबसूरत' लिखा , आपका मन करे तो 'बहुत' अपनी तरफ़ से लगा सकते हैं। किसी को बहुत खूबसूरत कहने के लिए उसका सामने होना जरूरी थोड़ी है। वैसे भी लोग कहते हैं कि खूबसूरती तो देखने वाले की आँखों में होती है।

सामने दीवार पर टैरो कार्ड रीडिंग का बोर्ड लगा था। पहले मैंने उसे सिर्फ़ 'रीडिंग' पढ़ा । लगा शायद कुछ पढ़ने-लिखने का अड्डा है। लेकिन फिर 'रीडिंग' के साथ 'टैरो' लगा देखा तो मतलब समझ में आया ।
एक खुले गैरेज नुमा कमरे में टैरो कार्ड बंचवाने के लिए कई महिलायें बैठी थीं, हालांकि वहाँ 'केवल महिलाओं के लिए' जैसा कोई बोर्ड नहीं लगा था। मेरा भी मन किया कि अपन भी पत्ते निकालकर अपना भविष्य बँचवा लें लेकिन फिर नहीं बँचवाया। पता नहीं क्या बताती वो मेरा कार्ड बाँच कर। कुछ अच्छा बता देती तो परेशान हो जाते, कुछ ख़राब बतातीं तो भी सोचते रहते । हम दूसरे काम करके बाहर आ गए।
लौटने के लिए घर का रास्ता सड़क पार से था। पहले सोचा बीच के डिवाइडर 'कनपुरिया' अंदाज में फाँद जाएँ। लेकिन तेज ट्रैफिक और डिवाइडर की ऊँचाई ने शरीफ़ नागरिक बने रहने को मजबूर किया। ट्रैफिक और डिवाइडर की ऊँचाई के अलावा हमने यह भी देखा कि एक कार से किसी ने कोक का टीन का डब्बा फेंका तो उसे उसके पीछे आने वाली कार ने पिचका दिया। उसके बाद आने वाले डीसीएम ट्रक ने उसे और पिचककर सड़क से मिला सा दिया। हमें लगा ज्यादा बहादुरी दिखाई तो हमारे हाल भी कोक के डब्बे की तरह ही हो जाएँगे। हमने सड़क पार करने के लिए ऊपर वाले ब्रिज का सहारा लेने के बारे में सोची।
ब्रिज पार करने के लिए सीढ़ियाँ देखकर लगा कौन चढ़ेगा तेज धूप में इतनी सीढ़ियाँ। हमने फाँदने के मंशा से फिर डिवाइडर की तरफ़ देखा लेकिन इसी बीच हमको पुल के नीचे लिफ्ट दिख गई। हमने वहीं खड़े-खड़े पुल पर चढ़ने के लिए लिफ्ट की व्यवस्था करने वालों की तारीफ़ की और पुल के ऊपर आ गए ।
पुल के ऊपर से ट्रैफिक देखने का अलग ही मजा है। हम देर तक आती-जाती गाड़ियों को देखते रहे। एक तरफ़ सड़क खाली थी , उधर की गाड़ियाँ फर्राटा मारते हुए जा रही थीं। दूसरी तरफ़ भीड़ थी गाड़ियों की इसलिए गाड़ियाँ रेंग सी रही थीं। ऐसा लगा कि डिवाइडर के एक तरफ़ कोई विकसित देश का ट्रैफिक है , दूसरी तरफ़ विकासशील देश का। डिवाइडर के इधर-उधर के ट्रैफ़िक की तुलना के लिए हमने देशों के नाम नहीं लिखे। क्या पता कौन देश बुरा मान जाये। आप अपने मन से रख लो।
लौटने के लिए गाड़ी की तो 15 मिनट दूर बताया। लेकिन ड्राइवर को हमको फ़ोन किया और अपनी स्थिति बताई कि हम कहाँ खड़े हैं तो वह तीन मिनट में ही मेरे पास आ गया। अब ये बारह मिनट का लफड़ा कैसे हुआ , कहाँ ग़ायब हो गए समझ में नहीं आया। मन किया इसकी सीबीआई जाँच की माँग करें लेकिन फिर सोचा कि सोनम -राजा के केस में अभी तक सीबीआई जांच नहीं हुई जिसको पूरा देश जानता है तो हमारे 12 मिनट के घपले की जांच कौन करेगा ?
रास्ते में ड्राइवर ने एक गुरुद्वारा द्वारा संचालित प्याऊ से पानी पिया। हमको लगा कि कितना पुण्य का काम है प्याऊ बनवाना। पहले खूब बनवाते थे लोग प्याऊ। अब इसे पिछड़े जमाने की बात मानकर लोग नहीं बनवाते। रास्ते के नज़ारे देखते हुए घर आ गए।
सड़क के नजारे देखना भी मजेदार काम है। आज सुबह देखा सड़क किनारे फुटपाथ पर 'ओपन एयर सैलून' में एक आदमी कुर्सी पर बैठा दाड़ी बनवा रहा था। पहले सोचा उसका फ़ोटो लें लेकिन फिर उसकी निजता का ख्याल करके इरादा टाल दिया।
सड़क पर एक जगह ठेलिया में एक आदमी तरह-तरह के नमक के ढेले सजाये हुए दिखा। पूछने पर बताया कि कई तरह के नमक के अलावा हींग और दीगर मसाले भी रखें था वह। तरह -तरह के नमक साथ-साथ बिना लड़े-झगड़े बिकने के लिए तैयार थे।
तिराहे पर एक तिकोने चबूतरे पर कबूतर अपना सुबह का नाश्ता कर रहे थे। एक ही जगह पर बिछे दाने के पास अलग-अलग पोज में उछलते हुए वे नाश्ता करने में तल्लीन थे। दो कबूतर एक ट्रे जैसी बिन में बैठकर दाना चुग रहे थे। बीच-बीच में दाना पचाने के लिए वो दो-चार मीटर हवा में उड़कर फिर से दाने के पास आकर बैठ जाते।
कबूतरों के दाना चुगते देखकर तमाम बातें दिमाग़ में आईं लेकिन वो इतनी 'उस तरह' की थीं कि हमने उन बातों को वहीं तिराहे पर ही छोड़ दिया। टहलते हुए घर आ गए।

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