Thursday, August 28, 2025

कोलंबो के जुआघर में



 2022 में नेपाल यात्रा के दौरान जिस होटल में हम ठहरे थे वहाँ जुआघर भी था। जुआघर मतलब कैसीनो। कैसीनो का नाम तो बहुत सुना था लेकिन वहाँ जुआ कैसे होता है यह कभी देखा नहीं था। हमने अंदर जाने के बारे में पूछा तो सुरक्षा गार्ड ने कहा -"अपना पासपोर्ट नंबर लिखकर चले जाइए।"

मुझे लगा कहीं बाद में कोई सरकारी दौरे के दौरान जुआघर में दौरे की शिकायत न हो जाये। इसी डर के कारण हम कैसीनो दर्शन की तमन्ना मन में लिए वापस अपने कमरे में चले गए।
कैसीनो देखने की इच्छा तीन साल बाद पूरी हुई श्रीलंका यात्रा के दौरान। सरकारी सेवा से साल भर पहले रिटायर हो चुके थे। रास्ते में एक जगह कैसीनो दिखा तो अनन्य ने कहा -"मैं थोड़ी देर कैसीनो होकर आता हूँ।" हमने कहा हम भी चलेंगे। अनन्य ने कहा -"चलिए।"
पिछली यात्रा के दौरान भी अनन्य कैसीनो आ चुके थे। उसका विवरण वहाँ दर्ज था। नंबर बताने पर वेरिफाई करके हम लोगों को अंदर आने दिया गया।
कैसीनो में तमाम लोग अलग-अलग टेबल में बैठे लोग दाँव लगा रहे थे। खेलने का तरीका यह कि पैसों से टोकन ख़रीदे जाते। अलग-अलग नम्बर पर लोग दांव लगाते। सब लोगों के दाँव लगाने के बाद एक काँच की गोली एक नंबर प्लेट पर घुमाई जाती। गोली जिस नंबर पर रुक जाती उस नम्बर जिन लोगों ने दांव लगाए होते वो लोग जीत जाते। बाकी लोग अपना दाँव हार जाते। मेज पर जितने लोग जीतते वो ख़ुश हो जाते। जीते-हारे दोनों ही लोग नए सिरे से दाँव लगाते।
हम जिस हिस्से में थे उस हिस्से से अलग भी लोग जुआँ खेल रहे थे। पता चला वहाँ और बड़े दांव लगाए जा रहे थे।
कैसीनो में खाने-पीने की मुफ्त व्यवस्था थी। जो मन आए, जितना मन आए खाते जाओ। दाँव लगाते जाओ। तरह-तरह के व्यंजन और पेय। लोग अपनी टेबल पर बैठे, खेलते हुए खाने का आर्डर करते। वेटर सर्व करते जाते। लोग खाते-पीते जाते। खेलते जाते। हारते-जीतते जाते।
हर टेबल पर कुल कितने का खेल हुआ इसका विवरण भी चलता जाता।
जिस टेबल पर हम थे उसी टेबल पर एक और लड़का खेल रहा था। बातचीत के दौरान उसने बताया कि वह भोपाल से आया है।
भोपाल से आना तो कोई बात नहीं। लेकिन उसने आने के बारे में जो क़िस्सा बताया उससे कैसीनो के जुआ खिलाने के एक और तरीक़े के बारे में पता चला।
बालक ने बताया कि वह भोपल से पाँच लाख का जुआँ खेलने आया है। तीन-चार दिन रहना है उसे। उसने पाँच लाख रुपए जुएँ के लिए जमा किए थे भोपाल में। भोपाल से कोलंबो तक का आने-जाने का टिकट, कोलंबो में फाइव स्टार होटल में रहने और गाड़ी का इंतज़ाम कैसीनो वालों ने किया है। उसको सिर्फ़ यहाँ तीन-चार दिन रहने के दौरान पाँच लाख का जुआ खेलना है। हारे या जीते इससे कैसीनो वालों को मतलब नहीं।
बालक ने बताया कि पिछले दो दिनों में वह पाँच लाख से अधिक जीत चुका है। एक दिन और रहकर वह वापस भोपाल चला जाएगा। जितना पैसा खर्च किया उसने उससे अधिक जीतकर और कोलंबो में मुफ्त आने-जाने-रहने-घूमने का आनंद उठाकर वह भोपाल वापस लौट जाएगा।
मेरे लिए यह आश्चर्य की बात थी की जुआघर वाले दूसरे देश से लोगों को जुआ खेलने के लिए बुलायें। रहने-घूमने का बंदोबस्त करें। जीतो या हारो बस उतने पैसे का जुआ खेल लो जितने कैसीनो को दिए हैं। बाकी सारा इंतजाम कैसीनो का।
बालक ने बताया कि वह अक्सर इसी तरह के 'कैसीनो पर्यटन ' के लिए कोलंबो आता है। खेलता है, रहता,घूमता है वापस चला जाता है। कुल मिलाकर कभी घाटे में नहीं रहता।
पैसे का लेनदेन कैसे होता है इसके बारे में जो बताया बालक ने उससे लगा की शायद कुछ हवाला टाइप का हिसाब होगा। पैसे कैसे आए, कहाँ से आए, कहाँ चले गए यह बाद शायद किसी को नहीं पता होगी। पैसा किन-किन गलियों में टहलता रहता है यह पैसे को भी नहीं पता होगा।
करीब दो-तीन घंटे कैसीनो में दांव लगाने के बाद हम लोग वापस लौटे। बेटे ने बताया कि इस बार थोड़ा नुकसान हुआ है। पिछली बार फ़ायदे में रहे थे। इस बात तसल्ली से दाँव नहीं लगाए। अप्रत्यक्ष रूप से शायद वह हमें दोषी ठहरा रहा था कि हमारे कारण उसका ध्यान भंग हुआ।
कैसीनो से होटल जाने के लिए गाड़ी कैसीनो वालों ने उपलब्ध करायी। होटल वापस आकर हम देर तक जुआघरों की व्यवस्था के बारे में सोचते रहे। लेकिन जितना सोचते जाते उतना उलझते जाते।
जिस कैसीनो में हम लोग गए थे (bellagio) उसके दुनिया भर में कई जगह जुआघर हैं। कोलंबो, लास बेगास आदि। इटली में भी bellagio नाम का शहर है। नेट पर bellagio खोजकर इस कैसीनो के बारे में जान सकते हैं। भारत में तो आनलाइन गेमिंग बंद हो गई लेकिन इंटरनेट के ज़रिए इन कैसीनो में आनलाइन दाँव लगाने की भी सुविधा है। दुनिया में न जाने कितने लोग रोज़ दांव लगाते होते होंगे। आबाद -बर्बाद होते होंगे।
अपन के लिए तो एक बार का अनुभव बहुत है।

Wednesday, August 27, 2025

कोलंबो का डच हॉस्पिटल




 कहीं घूमने निकलते हैं तो लगता है जहाँ गए हैं वहाँ के सारे प्रसिद्ध स्थल देख लें। इसी मासूम भावना के वशीभूत होकर कोलंबो के पेट्टा बाजार (लिंक टिप्पणी में) घूमने के बाद पास ही स्थित डच अस्पताल देखने गए।

श्रीलंका पर पुर्तगालियों, डच और अंग्रेजों का अधिकार रहा। ये यूरोपियन लोग लगता है जहाँ मन आता चले जाते और जिस देश में मन आता अपना झंडा गाड़ देते। शुरुआत उन देशों के व्यापारी करते थे। कब्जा के बाद अपने अधिकार में आए देश को नजराने के रूप में अपने देश की सरकार को सौंप देते थे।
डच ईस्ट इंडिया अपने अफसरों और की देखभाल के लिए यह अस्पताल बनवाया। अस्पताल कब बना यह पता नहीं लेकिन एक अनुमान के अनुसार अस्पताल 1681 में मौजूद था। मतलब क़रीब साढ़े तीन सौ साल पुराना है यह अस्पताल।
कोलंबो क़िले के पास स्थित यह अस्पताल बंदरगाह के पास होने के कारण डच नाविकों की देखभाल के लिए भी इस्तेमाल होता था।
अस्पताल में आए मरीजों को चटाई और बीमारों के लिए गद्दे का इंतजाम था। चटाई और गद्दे इंडोनेशिया से आते थे। चटाई और गद्दे उस समय नहीं बनते होने सीलोन में। यहाँ काम करने वाले डाक्टर हरमन (Dr Paul Hermann) को श्रीलंका में बाटनी का पितामह कहा जाता है।
पुरानी फोटुओं से पता चलता है कि पहले यहाँ एक नहर भी थी। बाद में जब अंग्रेजों के क़ब्ज़े में आया सीलोन तो उन्होंने नहर पटवा दी। नहर नहीं रही लेकिन जहाँ नहर थी उस सड़क को नहर रो लेन कहते हैं।
अंग्रेजों द्वारा कोलंबो पर कब्जे के बाद नहर को बंद करा देना शासन का शाश्वत सूत्र रहा है। हर नया शासक आने पर पुराने शासन के तमाम रीति-रिवाज बदलता है। कई मामलों में यह सुधार के लिहाज से होता है, कई बार बिना किसी मतलब के। सुनते हैं जाट लोगों ने आगरे पर कब्जा किया तो उन्होंने ताजमहल का उपयोग अपने घोड़ों के लिए भूसा रखने के काम में किया।
बदलाव का रिवाज सरकारों में भी जारी रहता है। नई सरकारें पुरानी सरकारों के तमाम चलन बदल देती हैं। कुछ नहीं हुआ तो योजनाओं शहरों के नाम ही बदल देती हैं। इस बदलाव को ही अपनी उपलब्धि के रूप में बताने में करोड़ों रुपए फूँक देती हैं।
बदलाव का चलन हाकिमों-हुक्कामों में भी जारी रहता है। नया हाकिम आते ही सबसे पहले दफ़्तर के पर्दे, फर्नीचर बदलवाता है। कुछ नहीं तो बैठने वाली मेज़-कुर्सी का सेटअप बदलता है। महीने भर पहले पुते घर को फिर से पुतवाता है। पुराने हाकिम द्वारा बनवाये किचन, ड्राइंगरूम को 'ऑल्टर' करवाता है। जनता के पैसे का अहमक इस्तेमाल का नायाब नमूना होते हैं हाकिमों के बदलने पर उनके दफ्तरों-घरों में हुए मरम्मत के काम।
डच और अंग्रेजों के बाद इस अस्पताल बिल्डिंग के उपयोग बदलते गए। 1980 से 1990 तक यहाँ पुलिस स्टेशन था। इसके पहले मेडिकल सेवाओं से संबंधित काम होते थे। 1996 में लिट्टे के भीषण हमले में इस इमारत को काफ़ी नुक़सान हुआ।
2011 में इस इमारत को शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और खान-पान परिसर में बदल दिया गया। हर ऐतिहासिक इमारत के साथ ऐसा ही होता है। एक दिन वह किसी न किसी रूप में बाजार में तब्दील हो जाती है। उसका अस्तित्व बने रहने के लिए जरूरी होता है शायद। बाजार की शरण में आने पर ऐतिहासिक इमारतों के स्वरूप भले बदल जायें लेकिन उनकी साँसे चलती रहती हैं।
डच अस्पताल को दूर से और फिर पास से देखा। बाहर से एक बड़ी इमारत, बड़ा अहाता। उसके परिसर में अंदर तमाम दुकानें थीं। ज्यादातर खाने-पीने की। अंदर की तरफ़ जाने पर देखा तो इमारत के खुले आँगन जैसी जगह में तमाम बेंच पड़ी थीं। तमाम लोग उन पर बैठे हुए धूप सेंकते हुए खाने-पीने में जुटे हुए थे। पास के बरामदे में खाना सर्व करने वाले काउंटर थे।
इन लोगों में अधिकतर विदेशी थे। शायद यूरोप से आए यायावर। क्या पता उनमें से कुछ डच लोग हों जो देखने आए हों कि श्रीलंका रहते हुए उनके पूर्वज कहाँ इलाज करवाते थे। वहाँ खाने-पीने की दुकानों का स्तर देखकर लगा कि यहाँ खाना-पीना मंहगा ही होगा। ज्यादातर लोग अपनी ग्लासों में दारु लिए परिसर का आनंद उठा रहे थे। इनमें महिलाएँ भी थीं। स्थानीय लोग कम ही दिखे।
पहले तो मन किया कि हम भी वहाँ बैठकर चाय-कॉफ़ी कुछ पियें। लेकिन जहाँ बैठने का मन किया वहाँ चाय-कॉफ़ी के लिए दुकान वाले ने सॉरी बोल दिया। अंदर बैठने का मन नहीं था। लिहाजा कुछ देर वहाँ इधर-उधर टहलने के बाद चले आये।
आगे के मोर्चे हमको आवाज़ दे रहे थे।

Tuesday, August 26, 2025

रील्स, वीडियो, फ़िल्में


 आजकल दिन का बड़ा हिस्सा रील, यूट्यूब और फ़िल्में देखते बीतता है। मोबाइल पर कोई रील खुल जाती है। उसके बाद एक के बाद दूसरी चलती जाती है। यूट्यूब पर वीडियो देखने में भी काफ़ी समय जाता है। छोटे-छोटे पाँच-दस मिनट के वीडियो तो देख लिए जाते हैं। लेकिन घंटे-दो घंटे लंबे वीडियो देखने में हिम्मत जुटानी पड़ती है। किताब पढ़ते हुए तो पन्ने पलटते हुए उसके मजनून का अंदाज़ा लगाया जा सकता है लेकिन वीडियो पूरा ही देखना पड़ता है। इसी चक्कर में तमाम वीडियो बाद में देखने के लिए बचे हैं।

रील्स देखने के बारे में मुस्ताक यूसुफ़ी साहब का जुमला याद आता है -"मूंगफली और आवारगी में एक खराबी ये है कि आदमी एक बार शुरू कर दे तो समझ नहीं आता खत्म कैसे करे।" आज यूसुफ़ी साहब होते तो 'रील्स' को भी मूंगफली और आवारगी के साथ जरूर शामिल करते।
फ़िल्मों के साथ भी मामला कुछ ऐसा ही है। इधर बीच तमाम फ़िल्में देखीं। जिस किसी फ़िल्म के बारे में दोस्त लोग बताते हैं, देख लेते हैं।ज्यादातर फ़िल्में नेटफ्लिक्स पर देखते हैं। प्राइम टाइम और दीगर प्लेटफार्म पर भी देखते हैं लेकिन नेटफ्लिक्स पर ज्यादातर। हर महीने नेटफ्लिक्स के पैसे कटते हैं तो लगता है कम से कम एक फ़िल्म रोज़ देखनी चाहिए। लेकिन ऐसा हो कहाँ पाता है।
कानपुर में रहते हुए देखी फ़िल्मों में गॉडफ़ादर, लेडी चैटरलीज़ लवर, कटहल, लापता लेडीज और तमाम फ़िल्में याद हैं। गॉडफ़ादर, लेडी चैटरलीज़ लवर तो कई बार देखी। इन उपन्यासों को पढ़ा नहीं लेकिन पढ़ने का मन है। हंड्रेड ईयर्स इन सॉलिट्यूड उपन्यास पढ़ने के बाद इस पर बनी फ़िल्म देखने में उतना मजा नहीं आया। लेडी चैटरलीज़ लवर और तमाम फ़िल्में देखते हुए लगा विदेशों फ़िल्मों में रोमांस के दृश्य कितने आम हैं।
the scent of a woman (प्राइम टाइम) में रिटायर्ड सेनाधिकारी की एक्टिंग गजब की है। बंदे को दिखाई नहीं देता लेकिन किसी महिला से मुलाक़ात होने पर उसकी गंध से उसकी उम्र, क़द, रंग का अंदाजा लगाकर सटीक बता देता है। एक दृश्य में रेस्तराँ में डांस फ्लोर का साइज पूछकर साथ आई युवा स्त्री के साथ डांस करते हुए उसके मन से डांस न कर पाने का डर निकाल देता है। फ़िल्म के अंत में अपना देखभाल करने वाले बच्चे को बचाने के लिए की गई उसकी बहस अद्भुत है। महिला के साथ डांस और स्कूल की बहस को देखने के लिए बार-बार यह फ़िल्म देखी है।
OTT प्लेटफार्म पर बनने वाली सीरियल फिल्मों के बारे में सुनते हैं लेकिन अभी तक देखी कम ही हैं। पंचायत, मिर्जापुर टाइम्स जैसी प्रचलित सीरीज भी अभी देखनी हैं। लगता है देख लेंगे।
देखने के लिए फ़िल्मों का चुनाव दोस्तों की पोस्ट पढ़कर करते हैं। मित्र Niraj Kela किसी फ़िल्म के बारे में बताते हैं तो हम कहते हैं -नाम लिखकर भेजो। वो भेजते हैं। हम देख लेते हैं। Sudipti ने जिन फ़िल्मों के बारे में लिखा उनको देखा। लेकिन कुछ फ़िल्में अपने आप भी देख लेते हैं। कई बार सर्च करके भी देखा -"सबसे अच्छी/प्रसिद्ध/रोमांटिक फ़िल्में।" लेकिन लिस्ट पर अमल कम ही हो पाता है।
ऐसी ही अपने आप देखी फ़िल्मों में एक फ़िल्म है Frida . नेटफ्लिक्स पर देखी यह फ़िल्म मेक्सिकन पेंटर Frida Kahlo के बारे में है। Frida Kahlo बचपन से पोलियो ग्रस्त है। बड़े होने पर एक एक्सीडेंट में घायल हो जाती है। तमाम हड्डियां टूट जाती हैं। महीनों बिस्तर पर रहती है। बिस्तर पर पड़े-पड़े पेंटिंग सीखती है। प्रसिद्धि पाती है। अपने से उम्र में बड़े पेंटर से शादी करती है जिसे (क़द में अंतर के कारण) उसकी माँ हाथी और चीटी की शादी कहती है। शादी में धोखा होता है, तलाक होता है फिर साथ रहते हैं। पति की तरह उसके ख़ुद भी कई प्रेम संबंध होते हैं। रूसी कामरेड ट्रॉट्स्की से भी रोमांस चलता है।
Frida में सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाला तत्व उसकी जिजीविषा है। घायल, बीमार होने के बावजूद पेंटिंग करती रहती है। एक सेमिनार में अपने बिस्तर सहित जाती है। हास्य बोध भी गजब का है। अपने एक्सीडेंट के बारे में बताते हुए कहती है -I lost my verginity by the rod in accident (मेरा कौमार्य दुर्घटना में लोहे की रॉड से भंग हुआ). अपने आसपास जब लोगों को जरा-जरा सी तकलीफ़ों के बारे में रोते हुए देखते हैं तो लगता है Frida Kahlo जैसी महिलायें भी हुई हैं जो तमाम तकलीफ़ों के बावजूद उनका रोना रोए बिना अपनी शर्तों पर जीवन जीते हैं। सफल, प्रसिद्ध होते हैं। अपनी कमजोरियों का स्पीडब्रेकर तोड़ते हुए आगे बढ़ते हैं।
अभी तक समय का अभाव रहा इसलिए फ़िल्में देख नहीं पाये। अब उसकी भरपाई कर रहे हैं। मन है कि हर भाषा की कालजई फ़िल्में देख सकें। जो फ़िल्में अच्छी लगी उनसे जुड़ी किताबों को पढ़ने का भी मन है।
आप अपनी पसंदीदा फ़िल्मों के नाम बतायें (टिप्पणी या मेसेज करके)। हम देखने वाली लिस्ट में शामिल करके क्या पता उनको देख ही लें।
फोटो मेरे बेटे Anany Shukla की जो आजकल Firgun Travels के टूर पर स्पेन में हैं।

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Monday, August 25, 2025

सीखने के साथ पढ़ना


 सबेरे जागने पर लगता है कोई पोस्ट लिख दी जाये। लिखने की बात सोचते ही तमाम आईडीए आते हैं। जितनी तेजी से विचार आते हैं उतनी ही तेजी से उनको ख़ारिज करते जाते हैं। सोचते हैं उन पर आराम से लिखेंगे।

कई मित्रों की किताबें आईं हैं। उन पर लिखना है। लेकिन सोचते हैं कायदे से लिखेंगे। इसी चक्कर में बेकायदे से भी नहीं लिख पाते।
अपनी किताबों के प्रकाशन की बात भी सोचते हैं। अब तक लिखी सारी 'कविता नुमा लिखाई' जिसमें कट्टा कानपुरी की ख़ुराफ़ातें भी शामिल हैं इकट्ठा करके कविता संग्रह तैयार किया रखा है -महीनों से। नाम भी तय कर लिया है -"अंधेरे का बड़प्पन।" हफ़्ते भर का काम है लेकिन महीनों से आजकल पर टलता जा रहा है। हमारे साथ यह अक्सर होता है, जो काम लगभग पूरा हो जाता है वह 'लटक' जाता है।
कविता संग्रह का एक कवर पेज भी बनाया था चैटजीपीटी से। कवर पेज तो 'बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य' का भी बनाया था। लेकिन सब कुछ अधूरा है मामला।
कविता संग्रह के साथ यह संकोच भी है कि कौन पढ़ेगा मेरी कवितायें? कवियों की भरमार के बीच कौन किसी 'अकवि' का कलाम पढ़ना चाहेगा। कविता संग्रह का नाम 'अंधेरे का बड़प्पन' हमारे नाम पुरोहित Alok Puranik जी ने सुझाया है। नाम के पीछे कट्टा कानपुरी के इस शेर का हाथ है :
जरा सा जुगनू भी चमकता है अँधेरे,
ये अँधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है?
यात्रा वृत्तांत भी कई तैयार हैं। अमेरिका का यात्रा वृत्तांत तो प्रकाशक को दिया है।नाम है -"कनपुरिया कोलम्बस।" उसके प्रकाशन का इंतज़ार है। देखिए कब उसके दिन बहुरते हैं।
इसके अलावा कश्मीर, लेह लद्दाख, नेपाल, श्रीलंका के यात्रा वृत्तांत भी तैयार हैं किताब हैं। लेकिन अच्छे से करने के चक्कर में ख़राब तरीक़े से भी नहीं हो पाते कई काम।
इस बीच भाषाएँ स्पेनिश और उर्दू सीखने का काम भी चल रहा है। उर्दू पढ़ना और लिखना सीख गए थे काफ़ी कुछ। लेकिन इधर स्पेनिश को थोड़ा समय ज़्यादा देने के चलने उर्दू मुँह फुलाने लगाने है। भाषाओं में भी सौतिया डाह भले न होता लेकिन 'अधिकार भावना तो होती ही है।'
60 पार की उम्र में कोई नई भाषा सीखने के अपने मजे और समस्याएं होती हैं। अभी-अभी सीखा हुआ शब्द याद नहीं आता। कभी कोई विपरीत शब्द प्रयोग हो जाता है। वैसे कोई भी भाषा सीखने का सबसे अच्छा तरीका होता है उसको लिखकर, अभ्यास करते हुए सीखना। लेकिन हम अपने को बढ़ा ज्ञानी समझते हैं। सोचते हैं यह तो आता ही है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। अभ्यास जरूरी है। मजेदार भी।
सीखने के साथ पढ़ना चलता रहता है। कैच -22 के साढ़े तीन सौ पेज पढ़ चुके। दो सौ बचे हैं। किंडल से पढ़ने पर जहाँ हर शब्द के अर्थ फौरन मिल जाते हैं, लगता है कि यह कठिन उपन्यास है। लेकिन साथ ही लगता है इतना अद्भुत उपन्यास पढ़ने से इतने दिन चुके कैसे? व्यंग्य लिखने-पढ़ने के लोगों को यह उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए।
मैं तो कैच-22 के अनुवाद के बारे में भी सोचता हूँ। लेकिन यह भी सोचता हूँ कि जिसको पढ़ते हुए 'भार्गव डिक्शनरी ' याद आ जाती है उसका अनुवाद कैसे होगा। जिसको पढ़ने में महीनों लग गए उसका अनुवाद कितने दिन में होगा? लेकिन यह भी सोचते हैं कि सोचने में हर्ज क्या है?
आप क्या सोचते हैं इस बारे में?

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Sunday, August 24, 2025

अक्षरधाम मंदिर

 


कल शाम अक्षरधाम मंदिर देखने गए। राजधानी के पास बने मंदिर के विशाल परिसर को देखकर सबसे पहला सवाल उठा कि इतनी ज़मीन मंदिर को मिली कैसी? सुरक्षा व्यवस्था को देखकर लगा कि किसी बच्चे को एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में बताना हो तो उसे अक्षरधाम मंदिर दिखा देना चाहिए।

अक्षरधाम मंदिर बने अभी कुछ वर्ष ही हुए हैं। दुनिया के हिंदू मंदिरों की तुलना में बहुत जूनियर है। लेकिन इसके आकार के कारण इसका नाम गिनीज बुक ऑफ़ वार्ड रिकार्ड में दर्ज है।
मंदिर में घुसते ही बारिश होने लगी। मंदिर में मोबाइल, घड़ी ले जाने की अनुमति नहीं है इसलिए सब गाड़ी में रख दिए थे। चप्पल पहन के आए थे। कोई ऐसा सामान पास में नहीं था जिसके भीगने से ख़राब होने का डर हो। इसलिए बहुत दिन से बरसात में भीगने की तमन्ना पूरी हुई।
हमारे पास कुछ भीगने से ख़राब होने लायक़ नहीं था इसलिए भीगने की न जाने कितने दिनों की तमन्ना पूरी हुई। इससे एक बार फिर लगा कि तथाकथित संपन्नता से जुड़ी चीजें हमारे गति अवरोधक होते हैं। हमें मनचाहा करने से रोकते हैं। किसी बदलाव के लिए प्रयास में भी यह भाव बाधक होता है -"हाय, इसके चलते हमारा यह छिन जाएगा। मध्यम वर्गीय, नौकरी पेशा समाज के दब्बू, कायर होने के पीछे यह भाव बहुत तेजी से काम करता है।
अक्षरधाम में वाटर शो भी होता है। 220 रुपया फ़ीस है। हमारे पैसे बचाने के लिए प्रकृति ने अपने मुफ्त वाले वाटर शो का इंतजाम कर दिया। झमाझम हुई बारिश में जमकर भीगे।
पानी जगह-जगह जमा हो गया था। ख़ासकर जूते-चप्पल जमा कराने वाली जगह पर। घुटने तक पानी भरा था वहाँ। नीचे के सीढ़ियाँ दिख नहीं रहीं थीं। उतरते हुए गिरते-गिरते बचे। जूते-चप्पल जमा कराने वालों के पास थैले खत्म हो गए थे। इस काम में लगे कार्यकर्ताओं ने जूते बाहर ही रखने के लिए कहा और तसल्ली से बरसात का नजारा देखने में मशगूल हो गए। लोगों ने हिचकते हुए, मजबूरी में जूते बारिश में रखें और मंदिर की तरफ़ रुख़ किया। कुछ लोग अपने साथ के किसी सदस्य को जूते की रखवाली के लिए छोड़कर मंदिर दर्शन के लिए गए। हमको मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी का जुमला याद आया :
"कुछ लोग इतने मज़हबी होते है... कि जूता पसंद करने के लिए भी मस्ज़िद का रुख़ करते हैं"
बारिश में टाइल्स पर चलते हुए कई लोग फिसल कर गिरे। हालांकि एक टाटपट्टी के साइज की खुरदुरी कारपेट जैसी बिछी थी वहाँ लेकिन कम लोग ही उस पर चल रहे थे। लिहाजा फिसल रहे थे। फिसलते हुए गाना सोच रहे होंगे -"आज रपट जायें तो हमें न बचइयो।"
बाहर भव्य मंदिर के अंदर घुसते ही ज्योतिर्धर भगवान स्वामिनारायण की सुनहरी प्रतिमा दिखी। बाद में पता चला कि यह मूर्ति सोने की है। इसके अलावा भी तमाम प्रतिमाएँ थीं वहाँ। कुछ चित्र भी थे। उनके विवरण लगे थे। मंदिर का बाहरी स्वरूप जितना आकर्षक लगा , अंदर उतना आकर्षक नहीं लगा।
मंदिर को देखकर अनायास मन में भाव उठा -"इससे अच्छा तो अपने कानपुर का जेके मंदिर है।" जैसे ही यह भाव उठा हमने उसको फौरन दबा दिया। समझाते हुए कि बेटा चुप रहो कोई बुरा मान जाएगा तो अंदर कर देगा। इतवार को कोर्ट बंद रहता है। जमानत भी नहीं होगी।
बाद में सोचा कि हमारी सोच कोई बहुत बेतुकी भी नहीं थी। इतना शहर-मोहल्लावाद तो चलता है। मन का भाव जिसको दबा दिया था उसको सहलाते हुए प्यार किया। बोला इसलिए नहीं क्योंकि वहाँ तमाम लोग थे। कोई अपने लिए समझ लेता तो लफड़ा होता।
मंदिर के अंदर बारिश के चलते लोग बैठे थे। उनके बगल में जगह-जगह लिखा था -"कृपया यहाँ न बैठें, यहाँ बैठना मना है।" किसी को कोई रोकने वाला नहीं था। सब लोग बारिश के मजे लेने में जुटे हुए थे।
मंदिर फटाफट घूमकर अपन बाहर आ गए। बारिश में खड़े होकर भीगते रहे। जूते -चप्पल की देखभाल करते रहे। नज़ारे देखते रहे। नज़ारे ही नज़ारे। मोबाइल गाड़ी में बंद था, वरना कुछ नज़ारे आपको भी दिखाते।
लौटने के बाद वहीं के फ़ूड कोर्ट में खाना खाया। अच्छी वयवस्था है। डोसा वाला बच्चा एक साथ आठ-दस डोसों को कान पकड़ के थाली में लेकर आया और एक-एक करके थाली में लगाकर देने लगा। डोसा चाहे प्लेन हो या मसाले वाला -दाम एक था - 95 रुपए। हमको सबसे अच्छा मिष्ठी-दही लगा- 40 रुपए का। चाय भी 40 रुपए की थी। बारिश में भीगने के कारण चाय सहज रूप से ठीक लगे।
बाहर आए तो फिर पानी बरसने लगा। भीगते हुए कार तक आए। रास्ते में जाम। लेकिन घर पहुँच ही गए। यहाँ फोटो इंटरनेट से।

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