सबेरे जागने पर लगता है कोई पोस्ट लिख दी जाये। लिखने की बात सोचते ही तमाम आईडीए आते हैं। जितनी तेजी से विचार आते हैं उतनी ही तेजी से उनको ख़ारिज करते जाते हैं। सोचते हैं उन पर आराम से लिखेंगे।
कई मित्रों की किताबें आईं हैं। उन पर लिखना है। लेकिन सोचते हैं कायदे से लिखेंगे। इसी चक्कर में बेकायदे से भी नहीं लिख पाते।
अपनी किताबों के प्रकाशन की बात भी सोचते हैं। अब तक लिखी सारी 'कविता नुमा लिखाई' जिसमें कट्टा कानपुरी की ख़ुराफ़ातें भी शामिल हैं इकट्ठा करके कविता संग्रह तैयार किया रखा है -महीनों से। नाम भी तय कर लिया है -"अंधेरे का बड़प्पन।" हफ़्ते भर का काम है लेकिन महीनों से आजकल पर टलता जा रहा है। हमारे साथ यह अक्सर होता है, जो काम लगभग पूरा हो जाता है वह 'लटक' जाता है।
कविता संग्रह का एक कवर पेज भी बनाया था चैटजीपीटी से। कवर पेज तो 'बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य' का भी बनाया था। लेकिन सब कुछ अधूरा है मामला।
कविता संग्रह के साथ यह संकोच भी है कि कौन पढ़ेगा मेरी कवितायें? कवियों की भरमार के बीच कौन किसी 'अकवि' का कलाम पढ़ना चाहेगा। कविता संग्रह का नाम 'अंधेरे का बड़प्पन' हमारे नाम पुरोहित Alok Puranik जी ने सुझाया है। नाम के पीछे कट्टा कानपुरी के इस शेर का हाथ है :
जरा सा जुगनू भी चमकता है अँधेरे,
ये अँधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है?
यात्रा वृत्तांत भी कई तैयार हैं। अमेरिका का यात्रा वृत्तांत तो प्रकाशक को दिया है।नाम है -"कनपुरिया कोलम्बस।" उसके प्रकाशन का इंतज़ार है। देखिए कब उसके दिन बहुरते हैं।
इसके अलावा कश्मीर, लेह लद्दाख, नेपाल, श्रीलंका के यात्रा वृत्तांत भी तैयार हैं किताब हैं। लेकिन अच्छे से करने के चक्कर में ख़राब तरीक़े से भी नहीं हो पाते कई काम।
इस बीच भाषाएँ स्पेनिश और उर्दू सीखने का काम भी चल रहा है। उर्दू पढ़ना और लिखना सीख गए थे काफ़ी कुछ। लेकिन इधर स्पेनिश को थोड़ा समय ज़्यादा देने के चलने उर्दू मुँह फुलाने लगाने है। भाषाओं में भी सौतिया डाह भले न होता लेकिन 'अधिकार भावना तो होती ही है।'
60 पार की उम्र में कोई नई भाषा सीखने के अपने मजे और समस्याएं होती हैं। अभी-अभी सीखा हुआ शब्द याद नहीं आता। कभी कोई विपरीत शब्द प्रयोग हो जाता है। वैसे कोई भी भाषा सीखने का सबसे अच्छा तरीका होता है उसको लिखकर, अभ्यास करते हुए सीखना। लेकिन हम अपने को बढ़ा ज्ञानी समझते हैं। सोचते हैं यह तो आता ही है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। अभ्यास जरूरी है। मजेदार भी।
सीखने के साथ पढ़ना चलता रहता है। कैच -22 के साढ़े तीन सौ पेज पढ़ चुके। दो सौ बचे हैं। किंडल से पढ़ने पर जहाँ हर शब्द के अर्थ फौरन मिल जाते हैं, लगता है कि यह कठिन उपन्यास है। लेकिन साथ ही लगता है इतना अद्भुत उपन्यास पढ़ने से इतने दिन चुके कैसे? व्यंग्य लिखने-पढ़ने के लोगों को यह उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए।
मैं तो कैच-22 के अनुवाद के बारे में भी सोचता हूँ। लेकिन यह भी सोचता हूँ कि जिसको पढ़ते हुए 'भार्गव डिक्शनरी ' याद आ जाती है उसका अनुवाद कैसे होगा। जिसको पढ़ने में महीनों लग गए उसका अनुवाद कितने दिन में होगा? लेकिन यह भी सोचते हैं कि सोचने में हर्ज क्या है?
आप क्या सोचते हैं इस बारे में?
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