Sunday, August 24, 2025

अक्षरधाम मंदिर

 


कल शाम अक्षरधाम मंदिर देखने गए। राजधानी के पास बने मंदिर के विशाल परिसर को देखकर सबसे पहला सवाल उठा कि इतनी ज़मीन मंदिर को मिली कैसी? सुरक्षा व्यवस्था को देखकर लगा कि किसी बच्चे को एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में बताना हो तो उसे अक्षरधाम मंदिर दिखा देना चाहिए।

अक्षरधाम मंदिर बने अभी कुछ वर्ष ही हुए हैं। दुनिया के हिंदू मंदिरों की तुलना में बहुत जूनियर है। लेकिन इसके आकार के कारण इसका नाम गिनीज बुक ऑफ़ वार्ड रिकार्ड में दर्ज है।
मंदिर में घुसते ही बारिश होने लगी। मंदिर में मोबाइल, घड़ी ले जाने की अनुमति नहीं है इसलिए सब गाड़ी में रख दिए थे। चप्पल पहन के आए थे। कोई ऐसा सामान पास में नहीं था जिसके भीगने से ख़राब होने का डर हो। इसलिए बहुत दिन से बरसात में भीगने की तमन्ना पूरी हुई।
हमारे पास कुछ भीगने से ख़राब होने लायक़ नहीं था इसलिए भीगने की न जाने कितने दिनों की तमन्ना पूरी हुई। इससे एक बार फिर लगा कि तथाकथित संपन्नता से जुड़ी चीजें हमारे गति अवरोधक होते हैं। हमें मनचाहा करने से रोकते हैं। किसी बदलाव के लिए प्रयास में भी यह भाव बाधक होता है -"हाय, इसके चलते हमारा यह छिन जाएगा। मध्यम वर्गीय, नौकरी पेशा समाज के दब्बू, कायर होने के पीछे यह भाव बहुत तेजी से काम करता है।
अक्षरधाम में वाटर शो भी होता है। 220 रुपया फ़ीस है। हमारे पैसे बचाने के लिए प्रकृति ने अपने मुफ्त वाले वाटर शो का इंतजाम कर दिया। झमाझम हुई बारिश में जमकर भीगे।
पानी जगह-जगह जमा हो गया था। ख़ासकर जूते-चप्पल जमा कराने वाली जगह पर। घुटने तक पानी भरा था वहाँ। नीचे के सीढ़ियाँ दिख नहीं रहीं थीं। उतरते हुए गिरते-गिरते बचे। जूते-चप्पल जमा कराने वालों के पास थैले खत्म हो गए थे। इस काम में लगे कार्यकर्ताओं ने जूते बाहर ही रखने के लिए कहा और तसल्ली से बरसात का नजारा देखने में मशगूल हो गए। लोगों ने हिचकते हुए, मजबूरी में जूते बारिश में रखें और मंदिर की तरफ़ रुख़ किया। कुछ लोग अपने साथ के किसी सदस्य को जूते की रखवाली के लिए छोड़कर मंदिर दर्शन के लिए गए। हमको मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी का जुमला याद आया :
"कुछ लोग इतने मज़हबी होते है... कि जूता पसंद करने के लिए भी मस्ज़िद का रुख़ करते हैं"
बारिश में टाइल्स पर चलते हुए कई लोग फिसल कर गिरे। हालांकि एक टाटपट्टी के साइज की खुरदुरी कारपेट जैसी बिछी थी वहाँ लेकिन कम लोग ही उस पर चल रहे थे। लिहाजा फिसल रहे थे। फिसलते हुए गाना सोच रहे होंगे -"आज रपट जायें तो हमें न बचइयो।"
बाहर भव्य मंदिर के अंदर घुसते ही ज्योतिर्धर भगवान स्वामिनारायण की सुनहरी प्रतिमा दिखी। बाद में पता चला कि यह मूर्ति सोने की है। इसके अलावा भी तमाम प्रतिमाएँ थीं वहाँ। कुछ चित्र भी थे। उनके विवरण लगे थे। मंदिर का बाहरी स्वरूप जितना आकर्षक लगा , अंदर उतना आकर्षक नहीं लगा।
मंदिर को देखकर अनायास मन में भाव उठा -"इससे अच्छा तो अपने कानपुर का जेके मंदिर है।" जैसे ही यह भाव उठा हमने उसको फौरन दबा दिया। समझाते हुए कि बेटा चुप रहो कोई बुरा मान जाएगा तो अंदर कर देगा। इतवार को कोर्ट बंद रहता है। जमानत भी नहीं होगी।
बाद में सोचा कि हमारी सोच कोई बहुत बेतुकी भी नहीं थी। इतना शहर-मोहल्लावाद तो चलता है। मन का भाव जिसको दबा दिया था उसको सहलाते हुए प्यार किया। बोला इसलिए नहीं क्योंकि वहाँ तमाम लोग थे। कोई अपने लिए समझ लेता तो लफड़ा होता।
मंदिर के अंदर बारिश के चलते लोग बैठे थे। उनके बगल में जगह-जगह लिखा था -"कृपया यहाँ न बैठें, यहाँ बैठना मना है।" किसी को कोई रोकने वाला नहीं था। सब लोग बारिश के मजे लेने में जुटे हुए थे।
मंदिर फटाफट घूमकर अपन बाहर आ गए। बारिश में खड़े होकर भीगते रहे। जूते -चप्पल की देखभाल करते रहे। नज़ारे देखते रहे। नज़ारे ही नज़ारे। मोबाइल गाड़ी में बंद था, वरना कुछ नज़ारे आपको भी दिखाते।
लौटने के बाद वहीं के फ़ूड कोर्ट में खाना खाया। अच्छी वयवस्था है। डोसा वाला बच्चा एक साथ आठ-दस डोसों को कान पकड़ के थाली में लेकर आया और एक-एक करके थाली में लगाकर देने लगा। डोसा चाहे प्लेन हो या मसाले वाला -दाम एक था - 95 रुपए। हमको सबसे अच्छा मिष्ठी-दही लगा- 40 रुपए का। चाय भी 40 रुपए की थी। बारिश में भीगने के कारण चाय सहज रूप से ठीक लगे।
बाहर आए तो फिर पानी बरसने लगा। भीगते हुए कार तक आए। रास्ते में जाम। लेकिन घर पहुँच ही गए। यहाँ फोटो इंटरनेट से।

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