इस पुल को इसकी ऊँचाई के कारण 'आसमान में पुल' और सिहली में " अहास नामे पलामा " ( नौ आसमान पुल ) कहते हैं। यह पुल आज सबसे ज़्यादा फ़ोटो खींचे जाने वाले ढांचों में से एक है।
करीब एक सदी पहले बने इस अनूठे पुल के बनने की कहानी रोचक है। पुल 1919 में बनकर तैयार हुआ था। उस समय श्रीलंका में अग्रेजों का शासन था। अंग्रेज़ों के सुपरविजन में बने इस पुल को स्थानीय लोगों की मदद से बनाया गया था। पुल को बनाने में ईंट ,रेत -सीमेंट ब्लाक आदि का उपयोग हुआ था।
पुल को चुनौतीपूर्ण नौ-डिग्री घुमाव और खड़ी ढलान को समायोजित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। इस तरह के कठिन घुमाव और ढलान पर पुल बनाना एक चुनौती थी।
पुल से जुड़ी रोचक कहानी यह भी कि जिस समय पुल बन रहा था उस समय पहला विश्व युद्ध चल रहा था। पुल के बनने के समय यह अफवाह उडी कि पुल के लिए जो आवंटित स्टील अंग्रेजों की युद्ध संबंधी परियोजनाओं को आवंटित कर दिया गया। अब बिना स्टील के पुल कैसे बने! परिणामस्वरूप पुल का काम रुक गया। इसके बाद स्थानीय पत्थर की ईंटों और सीमेंट से पुल का निर्माण किया। पुल बिना स्टील के बना। पुल में केवल रेल की पटरी और स्टील पिन को छोड़कर बाक़ी और कहीं लोहा नहीं लगा।
आम लोगों की भागेदारी और स्थानीय संसाधन से पुल बनना ही इसे ख़ास बनाता है।
पुल को बनाने में अंग्रेज़ों के परामर्श के अलावा स्थानीय बिल्डर पीके अप्पूहामी के योगदान के चर्चा होती है। हालांकि कहीं दस्तावेजों में कहीं अप्पुहामी का जिक्र नहीं है लेकिन लोककथाओं में अप्पुहामी का किस्सा जीवित है।
पीके अप्पुहामी का जन्म 1870 में हुआ था और वे एक लोकप्रिय ड्रमर और शैतान नर्तक रहे हैं। एक दिन वे थोविल समारोह के दौरान एक अन्य ड्रमर से ड्रमिंग प्रतियोगिता हार गए और पारंपरिक शैतान पोशाक में घर लौट आए।
उस समय रेलवे का निर्माण हो रहा था और अंग्रेज़ों ने उन्हें ओहिया रेलवे स्टेशन के पास उनकी वेशभूषा में देखा और वे डर गए। लेकिन बाद में उनके बीच संबंध स्थापित हो गए और अप्पुहामी ने अंग्रेज़ों को मज़दूर मुहैया कराकर रेलवे के निर्माण में मदद की।
जब निर्माण कार्य दो पहाड़ियों के बीच की खाई तक पहुँच गया तो अंग्रेज इंजीनियर इस खाई के नीचे दलदल के कारण चिंतित हो गए। पुल के स्तंभों को ज़मीन पर सुरक्षित रूप से टिकाना एक समस्या थी। तब तक अप्पुहामी ने इंजीनियरों का भरोसा जीत लिया था और इस विशाल पुल के निर्माण का काम उन्हें सौंपने का अनुरोध किया। पहली बार मना करने के बाद, वे अंततः इस विशाल कार्य को अप्पुहामी को सौंपने के लिए सहमत हो गए।
उन्होंने 1913 के आसपास काम शुरू किया और अपने आदमियों से इस खाई में बड़ी-बड़ी चट्टानें गिराने को कहा, जब तक कि वे नीचे तक भर न जाएं और फिर उन्होंने इस चट्टानी तल पर ईंट के स्तंभ बनाए। उन्होंने लगभग एक साल के भीतर काम पूरा कर लिया और निर्माण की लागत इतनी कम थी कि अंग्रेज़ों को पुल की संरचनात्मक अखंडता के बारे में संदेह था।
अप्पुहामी ने आश्वासन दिया था कि इस पुल से होकर गुजरने वाली पहली रेल यात्रा के दौरान वह पुल के नीचे लेट जाएंगे और कहा जाता है कि जब रेलवे लाइन पहली बार चालू हुई तो उन्होंने अपना वादा निभाया।
पुल पर से दिन में दो बार रेलगाड़ी गुजरती है। सुबह 11.30 बजे और दोपहर बाद 3.30 बजे। सड़क के पुल तक पहुँचने के लिए लोग टुकटुक पर जाते हैं। संकरे रास्ते से होकर पुल तक पहुंचते हैं। पुल के पास टुकटुक की भीड़ लग जाती है।
हम लोग पुल के पास पहुंचे तो तमाम लोग रेल की पटरी पर टहलते हुए , मेहराब पर खड़े होकर और आसपास घूमते हुए पुल को देख रहे थे। फोटो खिंचा रहे थे। वीडियो बना रहे थे। एक जगह पर अलग -अलग पोज में फोटोग्राफी कर रहे थे। रेलवे ट्रैक की तरफ़ जाने वाला कोना लोगों के फ़ोटो खींचने का सबसे पापुलर स्पाट था। लोग वहाँ खड़े होकर फ़ोटो खिंचा रहे थे।
संयोग से हम लोग जिस समय वाहन थे उसी समय एक रेलगाड़ी पुल पर से गुजरी। सीटी के आवाज सुनकर सब पटरी के किनारे हो गए। रेलगाड़ी पटरी से गुजरी तो लोगों ने ट्रेन में बैठे यात्रियों का अभिवादन करते हुए उनको आगे भेजा। ट्रेन में बैठे यात्री भी डब्बे में लटककर आनंद लेते दिखे। रेल के डब्बों में लटकने वालों में सभी महिला यात्री थीं जो डब्बे से एक-एक , दो-दो फुट बाहर लटककर ख़ुद आनंदित हो रहीं थीं। उनकों देखकर वहां मौजूद लोग आनंदित हो रहे थे।
ट्रेन के वाहन गुजरने के वीडियो भी बनाया हम लोगों ने। पटरी पर से खटर-खट, खटर-खट करती, धुँआ उड़ाती , सीटी बजाती गुजरती ट्रेन को देखकर हमको एक बार फिर आलोक धन्वा जी की कविता याद आई :
"हर भले आदमी के एक रेल होती है
जो उसके माँ के घर जाती है
धुँवा उड़ाती हुई , सीटी बजाती हुई।"
रेल हमारे सामने से होते हुए सामने के सुरंग में घुस गई।
रेल के चले जाने के बाद कुछ देर हम वहाँ रहे। फोटो-सोटो हुए और इसके बाद हम वापस चल दिये। जिस टुकटुक पर आए थे उसी से वापस सड़क पर वाहन पहुंचे जहाँ हमारी बस खड़ी थी। बस के पास खड़े होकर हम आपने बाक़ी साथियों का इन्तज़ार करते रहे। कुछ लोग वहाँ आने में भटक गए लेकिन आ ही गए।
साथियों के आने तक हम सड़क के नज़ारे देखते रहे। एक लड़की जो शायद किसी यूरोपीय देश की रही होगी, एक स्कूटर पर अपने साथी को बिठाए पेट्रोल पंप का पता पूछ रही थी। हमको पता नहीं था लेकिन मन हुआ कि उसको बतायें कि हमको नहीं पता पेट्रोल पंप का रास्ता। लेकिन हम जब तक उसको बतायें ,सड़क पर मौजूद किसी दूसरे ने उनको रास्ता बता दिया। वह उनको थैंक्स बोलकर स्कूटर स्टार्ट करके चली गई।
हम लोग भी बस में बैठकर एला रेलवे स्टेशन के तरफ़ चल दिए।
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