Thursday, June 05, 2025

बुभिक्षितम किम न करोति पापम


 आज सबेरे जागकर सबसे पहले उर्दू क़ायदा का अभ्यास किया। पिछले दिनों उर्दू के अक्षर लिखना-पढ़ना सीखा। अब छोटे शब्द और वाक्य भी बना लेते हैं। लेकिन कहीं-कहीं मात्रा , नुक़्ते पहचानने में गड़बड़ हो जाती है। जैसे क्रिकेट में गुगली बाल होती है वैसे ही किसी अक्षर को समझते कुछ हैं , वो निकलता कुछ है।

अंग्रेजी की छोटी बड़ी ए बी सी डी की तरह कुछ अक्षर आधे-पूरे लिखे जाते हैं। अंग्रेजी में वाक्य का पहला अक्षर बड़ा लिखा जाता है। उर्दू में पहला अक्षर छोटा वाला लिखा जाता। आख़िरी अक्षर अकेले होने पर अक्सर पूरा लिखा जाता है। पूरा मतलब बड़ा वाला। कोई कह सकता है कि उर्दू अंग्रेजी से विरोध की भाषा है। कहने को कोई कुछ भी कहे लेकिन भाषाएँ कभी आपस में लड़ती नहीं हैं । इस मामले में वे इंसानों से अलग होती हैं।
क़ायदा का अभ्यास करने के बाद टहलने गए। सोसाइटी के पीछे दो पार्क हैं। एक बड़ा पार्क जिसमें काफ़ी लोग टहलते दिखते हैं। दूसरा अपेक्षाकृत छोटा है लेकिन उसमें पानी का फ़व्वारा चलता है शाम को। इसलिए शाम को उसी में जाना अच्छा लगता है।
आज पार्क में गए तो ट्रैक पर टहलते हुए तमाम लोग दिखे। अधिकतर बीच की उमर के और बुजुर्ग लोग। कुछ बच्चे अलबत्ता पार्क में खेलते दिखे। एक जगह जिम भी दिखा। ओपन जिम। जिम में लोग कसरत करते दिखे।
ट्रैक पर टहलता हुआ हर अगला इंसान अलग तरह का खास लगा। कोई धीमे टहलता , कोई तेज। कोई मोबाइल लेकर ईयर प्लग कान में ठूँसे कुछ सुनाता हुआ कोई फ़ोन पर बतियाता दिखा। बगल से गुजरते एक बुजुर्ग फ़ोन पर किसी से कह रहे थे -“ सबकी निगाह काम पर रहती है। यमुना की सफ़ाई के बारे में लोगों को बताना होगा। दो महीना हो गया अभी तक सफ़ाई कितनी हुई देखना होगा।” उनकी बात से अंदाज़ लगा कि वे दिल्ली की वर्तमान सत्ता से जुड़े हैं या उनके समर्थक दल से हैं।
कुछ महिलायें अपनी सहेलियों के साथ टहल रही थीं। कुछ अकेले । जीवन साथी के साथ टहलते लोग कम ही दिखे। आदमी लोग ज्यादातर ‘एकला चलो रे।’ वाले मोड में दिखे। एक जगह बुजुर्ग , शायद रिटायर्ड , बैठे बतियाते दिखे। उनमें से जो सबसे बुजुर्ग लग रहे थे वे सबसे उत्साह से जवान होने का मुजाहिरा कर रहे थे। कुछ हाँक रहे थे। लोग मजे लेकर सुन रहे थे।
ट्रैक एक चक्कर करीब हज़ार का था। एक चक्कर पूरा करके आए गेट के पास तो एक भाई जी ने फ्री हेल्थ चेकिंग का कार्ड थमा दिया। उन्होंने बताया कि उनका ग्रुप हेल्थ चेकअप के बाद बताएगा कि क्या खाना चाहिए ताकि वजन नियंत्रित रहे। हमने कार्ड जेब के हवाले कर दिया। क्या खाना चाहिए क्या नहीं यह बताने वाले तो तमाम हैं। लेकिन उस पर अमल मुश्किल। इस तरह का ज्ञान लोग खाते -पीते लोगों को ही बाँटते हैं। जो पाँच किलो राशन के लिए सरकार पर निर्भर हैं उनको कोई सिखाये तो वो कहें -“भैया आप जो कहोगे वही खाएँगे बशर्तें मुहैया कराते रहो।”
बीच ट्रैक पर एक कुत्ता चमगादड़ मुद्रा में पैर ऊपर किए लेटा था। देखने से अंदाज़ लगाना मुश्किल कि वह सुबह उठने के पहले वाली अँगड़ाई ले रहा है या आने वाले योगदिवस का अभ्यास। योगदिवस का अभ्यास वाली बात जमी नहीं । उनके यहाँ इस तरह के चोंचले नहीं होते। लेकिन उसकी मुद्रा देखकर लगा कि क्या पता वह आसमान को टांगों पर थामने का अभ्यास कर रहा हो। क्या पता कल को उनके यहाँ भी चुनाव हों और वह इसका पोस्टर छपवा कर चुनाव जीतने का प्रयास करे।
हमने कुत्ते के पास से गुजरते हुए उसकी फ़ोटो लेने का मन बनाया तब तक वह सावधान हो गया। अपनी टांगे मोड़कर एक करवट लेटकर सो गया। हम आगे बढ़ गए।
लौटते में चक्कर पूरा करने पर गेट के पास कुछ लोग मिल गए। वे किसी बैंक में पैसा फिक्स कराने का फार्म बांट रहे थे। हमने लेने से मना किया कहते हुए कि हमारे पास पैसा है नहीं जमा करने के लिए। आप देते हो तो हम जमा कर देंगे। हमारी बात को हँसी में उड़ाकर उसने हमने हमें एक पौधा थमा दिया- एक छुटके गमले में। साथ में फ़ोटो भी खींच लिया। हमने मना किया कि भाई उसको देना जो तुम्हारे पास पैसा जमा कराये। लेकिन वह माना नहीं , उसको भी अपना बवाल कटाना था , अपना टारगेट पूरा करना था। उसने हमको ज़बरियन गमला थमाया और हमसे विरक्त होकर दूसरे पैसा जमाऊ बुजुर्ग को खोजने लगा।
हम डेढ़ किलो के गमले को दिव्य निपटान के लिए ले जाने वाले लोटे के तरह थामे टहलते रहे। कुछ लोग उसी तरह का गमला प्रसाद की तरह आदर के साथ थामे टहलते दिखे।
आगे ट्रैक पर वही कुत्ता फिर मिला। उसी चमगादड़ी मुद्रा में टाँग ऊपर किए। इस बार हमने उसके बगल से या सामने से आने की कोशिश किए बिना उसका फ़ोटो खींच लिया। जैसे ही बगल से गुजरे वह फिर से अपना ‘टांग आसमानी पोज’ स्थगित करके करवट लेकर लेट गया। लगता है उसको पसंद नहीं कि कोई उसका आसमान अपनी टाँगों पर थामे वाले पोज का फोटो देखे।
वहीं एक जगह एक आदमी एक पक्की जगह पर कुछ दाने फैलाकर चला गया। कुछ देर बाद उन दानों को चुगने के लिए तमाम कबूतर आ गए। उन कबूतरों को देखते रहे कुछ देर। कबूतर अपनी गुटरगूँ स्थगित करके दाना चुगने में तल्लीन रहे। उनके पास जाने पर वे सब पंख फड़फड़ा कर आसमान की तरफ़ उड़े। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर नीचे आकार दाना चुगने लगे।
इस मामले में इंसान और जानवर या पंछी की मन:स्थिति एक जैसी होती है। जहाँ खाने को मिलेगा वहीं इकट्ठा होगा। तमाम माननीय लोग जो मौका देखकर पार्टियां बदलते हैं , इधर का कहते हुए उधर के होते जाते हैं वे भी अपने पेट के लिए जाते हैं। कोई ज़िन्दगी भर एक पार्टी में रहते हुए बाद में विचारधारा के नाम पर दूसरी पार्टी में जाता है , ख़ासकर सत्ताधारी पार्टी में तो संस्कृत का जुमला याद आता है -"बुभिक्षितम किम न करोति पापम।” भूखा कौन सा पाप नहीं करता! (मतलब भूखे इंसान द्वारा किया गया पाप, पाप नहीं होता।)
पार्क के घूमते हुए क़रीब घंटा भर हो गया। धूप तेज हो गई। लोग भी घर लौट चुके थे। हम भी वापस आ गए।
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