Tuesday, August 10, 2021

गर्दिश के दिन -परसाई

 [आज परसाई जी की पुण्यतिथि के मौके पर परसाई जी का यह लेख पढ़ें- 'गर्दिश के दिन' । यह लेख परसाई जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखे लेखों के संकलन आंखन देखी (प्रकाशक वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली)से लिया गया। इसका संपादन प्रसिद्ध लेखक स्व. कमला प्रसाद ने किया था।]

लिखने बैठ गया हूँ पर नहीं जानता संपादक की मंशा क्या है और पाठक क्या चाहते हैं,क्यों आखिर वे उन गर्दिश के दिनों में झांकना चाहते हैं,जो लेखक के अपने हैं और जिन पर वह शायद परदा डाल चुका है। अपने गर्दिश के दिनों को, जो मेरे नामधारी एक आदमी के थे, मैं किस हैसियत से फिर से जीऊँ?-उस आदमी की हैसियत से या लेखक की हैसियत से ? लेखक की हैसियत से गर्दिश को फिर से जी लेने और अभिव्यक्ति कर देने में मनुष्य और लेखक ,दोनों की मुक्ति है। इसमें मैं कोई ‘भोक्ता’ और ‘सर्जक’ की नि:संगता की बात नहीं दुहरा रहा हूँ। पर गर्दिश को फिर याद करने, उसे जीने में दारुण कष्ट है। समय के सींगों को मैंने मोड़ दिया। अब फिर उन सींगों को सीधा करके कहूँ -आ बैल मुझे मार!
गर्दिश कभी थी ,अब नहीं है,आगे नहीं होगी-यह गलत है। गर्दिश का सिलसिला बदस्तूर है,मैं निहायत बेचैन मन का संवेदनशील आदमी हूँ। मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता,इस लिये गर्दिश नियति है।
हाँ ,यादें बहुत हैं। पाठक को शायद इसमें दिलचस्पी हो कि यह जो हरिशंकर परसाई नाम का आदमी है,जो हँसता है,जिसमें मस्ती है,जो ऐसा तीखा है,कटु है-इसकी अपनी जिंदगी कैसी रही? यह कब गिरा, फिर कब उठा ?कैसे टूटा? यह निहायत कटु,निर्मम और धोबी पछाड़ आदमी है।
संयोग कि बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की है। १९३६ या ३७ होगा। मैं शायद आठवीं का छात्र था। कस्बे में प्लेग पड़ी थी। आबादी घर छोड़ जंगल में टपरे बनाकर रहने चली गयी थी। हम नहीं गये थे। माँ सख्त बीमार थीं। उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था। भाँय-भाँय करते पूरे आस-पास में हमारे घर में ही चहल-पहल थी। काली रातें। इनमें हमारे घर जलने वाले कंदील। मुझे इन कंदीलों से डर लगता था। कुत्ते तक बस्ती छोड़ गये थे,रात के सन्नाटे में हमारी आवाजें हमें ही डरावनी लगतीं थीं। रात को मरणासन्न माँ के सामने हम लोग आरती गाते-
ओम जय जगदीश हरे,
भक्त जनों के संकट पल में दूर करें।
गाते-गाते पिताजी सिसकने लगते,माँ बिलखकर हम बच्चों को हृदय से चिपटा लेतीं और हम भी रोने लगते। रोज का यह नियम था। फिर रात को पिताजी,चाचा और दो -एक रिश्तेदार लाठी-बल्लम लेकर घर के चारों तरफ घूम-घूमकर पहरा देते। ऐसे भयानक और त्रासदायक वातावरण में एक रात तीसरे पहर माँ की मृत्यु हो गयी। कोलाहल और विलाप शुरू हो गया। कुछ कुत्ते भी सिमटकर आ गये और योग देने लगे।
पाँच भाई-बहनों में माँ की मृत्यु का अर्थ मैं ही समझता था-सबसे बड़ा था।
प्लेग की वे रातें मेरे मन में गहरे उतरी हैं। जिस आतंक,अनिश्चय,निराशा और भय के बीच हम जी रहे थे,उसके सही अंकन के लिये बहुत पन्ने चाहिये। यह भी कि पिता के सिवा हम कोई टूटे नहीं थे। वह टूट गये थे। वह इसके बाद भी ५-६ साल जिये,लेकिन लगातार बीमार,हताश,निष्क्रिय और अपने से ही डरते हुये। धंधा ठप्प। जमा-पूँजी खाने लगे। मेरे मैट्रिक पास होने की राह देखी जाने लगी। समझने लगा था कि पिताजी भी अब जाते ही हैं। बीमारी की हालत में उन्होंने एक भाई की शादी कर ही दी थी-बहुत मनहूस उत्सव था वह। मैं बराबर समझ रहा था कि मेरा बोझ कम किया जा रहा है। पर अभी दो छोटी बहनें और एक भाई थे।
मैं तैयार होने लगा । खूब पढ़ने वाला,खूब खेलने वाला और खूब खाने वाला मैं शुरू से था। पढ़ने और खेलने में मैं सब कुछ भूल जाता था। मैट्रिक हुआ,जंगल विभाग में नौकरी मिली। जंगल में सरकारी टपरे में रहता। ईंटे रखकर,उन पर पटिया जमाकर बिस्तर लगाता, नीचे जमीन चूहों ने पोली कर दी थी। रात भर नीचे चूहे धमाचौकड़ी करते रहते और मैं सोता रहता। कभी चूहे ऊपर आ जाते तो नींद टूट जाती पर मैं फिर सो जाता। छह महीने धमाचौकड़ी करते चूहों पर मैं सोया।
बेचारा परसाई?
नहीं,नहीं ,मैं खूब मस्त था। दिन-भर काम। शाम को जंगल में घुमाई। फिर हाथ से बनाकर खाया गया भरपेट भोजन शुद्ध घी और दूध!
पर चूहों ने बड़ा उपकार किया। ऐसी आदत डाली कि आगे की जिन्दगी में भी तरह-तरह के चूहों मेरे नीचे ऊधम करते रहे, साँप तक सर्राते रहे ,मगर मैं पटिये बिछा कर पटिये पर सोता रहा हूँ। चूहों ने ही नहीं मनुष्यनुमा बिच्छुओं और सापों ने भी मुझे बहुत काटा- पर ‘जहरमोहरा’मुझे शुरू में ही मिल गया। इसलिये ‘बेचारा परसाई’ का मौका ही नहीं आने दिया। उसी उम्र से दिखाऊ सहानुभूति से मुझे बेहद नफरत है। अभी भी दिखाऊ सहानुभूति वाले को चाँटा मार देने की इच्छा होती है। जब्त कर जाता हूँ,वरना कई शुभचिन्तक पिट जाते।
फिर स्कूल मास्टरी। फिर टीचर्स ट्रनिंग और नौकरी की तलाश -उधर पिताजी मृत्यु के नजदीक। भाई पढ़ाई रोककर उनकी सेवा में। बहनें बड़ी बहन के साथ,हम शिक्षण की शिक्षा ले रहे थे।
फिर नौकरी की तलाश। एक विद्या मुझे और आ गयी थी-बिना टिकट सफर करना। जबलपुर से इटारसी, टिमरनी,खंडवा,देवास बार-बार चक्कर लगाने पड़ते। पैसे थे नहीं। मैं बिना टिकट बेखटके गाड़ी में बैठ जाता। तरकीबें बचने की बहुत आ गयीं थीं। पकड़ा जाता तो अच्छी अंग्रेजी में अपनी मुसीबत का बखान करता। अंग्रेजी के माध्यम से मुसीबत बाबुओं को प्रभावित कर देती और वे कहते-लेट्‌स हेल्प दि पुअर ब्वाय।
दूसरी विद्या सीखी उधार माँगने की। मैं बिल्कुल नि:संकोच भाव से किसी से भी उधार मांग लेता। अभी भी इस विद्या में सिद्ध हूँ।
तीसरी चीज सीखी -बेफिक्री। जो होना होगा,होगा,क्या होगा? ठीक ही होगा। मेरी एक बुआ थी। गरीब,जिंदगी गर्दिश -भरी,मगर अपार जीव शक्ति थी उसमें। खाना बनने लगता तो उनकी बहू कहती-बाई , न दाल ही है न तरकारी। बुआ कहती-चल चिंता नहीं। राह-मोहल्ले में निकलती और जहाँ उसे छप्पर पर सब्जी दिख जाती,वहीं अपनी हमउम्र मालकिन से कहती- ए कौशल्या,तेरी तोरई अच्छी आ गयी है। जरा दो मुझे तोड़ के दे। और खुद तोड़ लेती। बहू से कहती-ले बना डाल,जरा पानी जादा डाल देना। मैं यहाँ-वहाँ से मारा हुआ उसके पास जाता तो वह कहती-चल,चिंता नहीं,कुछ खा ले।
उसका यह वाक्य मेरा आदर्श वाक्य बना-कोई चिन्ता नहीं। गर्दिश,फिर गर्दिश!
होशंगाबाद शिक्षा अधिकारी से नौकरी माँगने गये। निराश हुये। स्टेशन पर इटारसी के लिये गाड़ी पकड़ने के लिये बैठा था,पास में एक रुपया था,जो कहीं गिर गया था। इटारसी तो बिना टिकट चला जाता। पर खाऊँ क्या? दूसरे महायुद्ध का जमाना। गाड़ियाँ बहुत लेट होतीं थीं। पेट खाली। पानी से बार-बार भरता। आखिर बेंच पर लेट गया।चौदह घंटे हो गये । एक किसान परिवार पास आकर बैठ गया। टोकरे में अपने खेत के खरबूजे थे। मैं उस वक्त चोरी भी कर सकता था। किसान खरबूजा काटने लगे। मैंने कहा- तुम्हारे ही खेत के होंगे। बडे़ अच्छे हैं। किसान ने कहा- सब नर्मदा मैया की किरपा है भैया! शक्कर की तरह हैं। लो खाके देखो। उसने दो बड़ी फांके दीं। मैंने कम-से-कम छिलका छोड़कर खा लिया। पानी पिया। तभी गाड़ी आयी और हम खिड़की में घुस गये।
नौकरी मिली जबलपुर से सरकारी स्कूल में। किराये तक के पैसे नहीं। अध्यापक महोदय ने दरी में कपडे़ बाँधे और बिना टिकट चढ़ गये गाड़ी में। पास में कलेक्टर का खानसामा बैठा था। बातचीत चलने लगी। आदमी मुझे अच्छा लगा। जबलपुर आने लगा तो मैंने उसे अपनी समस्या बताई। उसने कहा -चिन्ता मत करो। सामान मुझे दो। मैं बाहर राह देखूँगा। तुम कहीं पानी पीने के बहाने सींखचों के पास पहुँच जाना। नल सींखचों के पास ही है। वहाँ सींखचों को उखाड़कर निकलने की जगह बनी हुई है। खिसक लेना। मैंने वैसा ही किया। बाहर खानसामा मेरा सामान लिये खड़ा था। मैंने सामान लिया और चल दिया शहर की तरफ। कोई मिल ही जायेगा,जो कुछ दिन पनाह देगा,अनिश्चय में जी लेना मुझे तभी आ गया था।
पहले दिन जब बाकायदा ‘मास्साब’ बने तो बहुत अच्छा लगा। पहली तनख्वाह मिली ही थी कि पिताजी की मृत्यु की खबर आ गयी। माँ के बचे जेवर बेचकर पिता का श्राद्ध किया और अध्यापकी के भरोसे बड़ी जिम्मेदारियाँ लेकर जिंदगी के सफर पर निकल पड़े।
उस अवस्था की इन गर्दिशों के जिक्र मैं आखिर क्यों इस विस्तार से कर गया? गर्दिशें बाद में भी आयीं ,अब भी आतीं हैं,आगे भी आयेंगी, पर उस उम्र की गर्दिशों की अपनी अहमियत है। लेखक की मानसिकता और व्यक्तित्व निर्माण से इनका गहरा सम्बन्ध है।
मैंने कहा है- मैं बहुत भावुक,संवेदनशील और बेचैन तबीयत का आदमी हूँ। सामान्य स्वभाव का आदमी ठंडे-ठंडे जिम्मेदारियाँ भी निभा लेता,रोते-गाते दुनिया से तालमेल भी बिठा लेता और एक व्यक्तित्वहीन नौकरीपेशा आदमी की तरह जिंदगी साधारण सन्तोष से गुजार लेता।
मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ,जिम्मेदारियाँ,दुखों की वैसी पृष्ठभूमि और अब चारों तरफ से दुनिया के हमले -इस सब सबके बीच सबसे बड़ा सवाल था अपने व्यक्तित्व और चेतना की रक्षा । तब सोचा नहीं था कि लेखक बनूँगा। पर मैं अपने विशिष्ट व्यक्तित्व की रक्षा तब भी करना चाहता था।
जिम्मेदारी को गैर-जिम्मेदारी की तरह निभाओ।
मैंने तय किया-परसाई,डरो मत किसी से। डरे कि मरे। सीने को ऊपर-ऊपर कड़ा कर लो। भीतर तुम जो भी हो। जिम्मेदारी को गैर-जिम्मेदारी की तरह निभाओ। जिम्मेदारी को अगर जिम्मेदारी के साथ निभाओगे तो नष्ट हो जाओगे। और अपने से बाहर निकलकर सब में मिल जाने से व्यक्तित्व और विशिष्टता की हानि नहीं होती। लाभ ही होता है। अपने से बाहर निकलो। देखो, समझो और हँसो।
मैं डरा नहीं । बेईमानी करने में भी नहीं डरा। लोगों से नहीं डरा तो नौकरियाँ गयीं। लाभ गये,पद गये,इनाम गये। गैर-जिम्मदार इतना कि बहन की शादी करने जा रहा हूँ। रेल में जेब कट गयी,मगर अगले स्टेशन पर पूड़ी-साग खाकर मजे में बैठा हूँ कि चिन्ता नहीं। कुछ हो ही जायेगा। मेहनत और परेशानी जरूर पड़ी यों कि बेहद बिजली-पानी के बीच एक पुजारी के साथ बिजली की चमक से रास्ता खोजते हुये रात-भर में अपनी बड़ी बहन के गाँव पहुँचना और कुछ घंटे रहकर फिर वापसी यात्रा। फिर दौड़-धूप! मगर मदद आ गयी और शादी भी हो गयी।
इन्हीं परिस्थितियों के बीच मेरे भीतर लेखक कैसे जन्मा,यह सोचता हूँ। पहले अपने दु:खों के प्रति सम्मोहन था। अपने को दुखी मानकर और मनवाकर आदमी राहत पा लेता है। बहुत लोग अपने लिये बेचारा सुनकर सन्तोष का अनुभव करते हैं। मुझे भी पहले ऐसा लगा। पर मैंने देखा,इतने ज्यादा बेचारों में मैं क्या बेचारा! इतने विकट संघर्षों में मेरा क्या संघर्ष!
मेरा अनुमान है कि मैंने लेखन को दुनिया से लड़ने के लिये एक हथियार के रूप में अपनाया होगा। दूसरे,इसी में मैंने अपने व्यक्तित्व की रक्षा का रास्ता देखा। तीसरे,अपने को अवशिष्ट होने से बचाने के लिये मैंने लिखना शुरू कर दिया। यह तब की बात है,मेरा ख्याल है, तब ऐसी ही बात होगी।
पर जल्दी ही मैं व्यक्तिगत दु:ख के इस सम्मोहन-जाल से निकल गया। मैंने अपने को विस्तार दे दिया।दु:खी और भी हैं। अन्याय पीड़ित और भी हैं। अनगिनत शोषित हैं। मैं उनमें से एक हूँ। पर मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना सम्पन्न हूँ।
यहीं कहीं व्यंग्य – लेखक का जन्म हुआ । मैंने सोचा होगा- रोना नहीं है,लड़ना है। जो हथियार हाथ में है,उसी से लड़ना है। मैंने तब ढंग से इतिहास, समाज, राजनीति और संस्कृति का अध्ययन शुरू किया। साथ ही एक औघड़ व्यक्तित्व बनाया। और बहुत गम्भीरता से व्यंग्य लिखना शुरू कर दिया।
मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता। मनुष्य की छटपटाहट मुक्ति के लिये,सुख के लिये,न्याय के लिये।पर यह बड़ी अकेले नहीं लड़ी जा सकती। अकेले वही सुखी हैं,जिन्हें कोई लड़ाई नहीं लड़नी। उनकी बात अलग है। अनगिनत लोगों को सुखी देखता हूँ और अचरज करता हूँ कि ये सुखी कैसे हैं! न उनके मन में सवाल उठते हैं न शंका उठती है। ये जब-तब सिर्फ शिकायत कर लेते हैं। शिकायत भी सुख देती है। और वे ज्यादा सुखी हो जाते हैं।
कबीर ने कहा है-
सुखिया सब संसार है,खावै अरु सोवे।
दुखिया दास कबीर है,जागे अरु रोवे।
जागने वाले का रोना कभी खत्म नहीं । व्यंग्य-लेखक की गर्दिश भी खत्म नहीं होगी।
ताजा गर्दिश यह है कि पिछले दिनों राजनीतिक पद के लिये पापड़ बेलते रहे। कहीं से उम्मीद दिला दी गई कि राज्यसभा में हो जायेगा। एक महीना बड़ी गर्दिश में बीता। घुसपैठ की आदत नहीं है,चिट भीतर भेजकर बाहर बैठे रहने में हर क्षण मृत्यु-पीडा़ होती है। बहादुर लोग तो महीनों चिट भेजकर बाहर बैठे रहते हैं,मगर मरते नहीं। अपने से नहीं बनता। पिछले कुछ महीने ऐसी गर्दिश के थे। कोई लाभ खुद चलकर दरवाजे पर नहीं आता। चिरौरी करनी पड़ती है। लाभ थूकता है तो उसे हथेली पर लेना पड़ता है,इस कोशिश में बड़ी तकलीफ हुई। बड़ी गर्दिश भोगी।
मेरे जैसे लेखक की एक गर्दिश और है। भीतर जितना बवंडर महसूस कर रहे हैं,उतना शब्दों में नहीं आ रहा है, तो दिन-रात बेचैन हैं। यह बड़ी गर्दिश का वक्त होता है,जिसे सर्जक ही समझ सकता है।
यों गर्दिशों की एक याद है। पर सही बात यह है कि कोई दिन गर्दिश से खाली नहीं है। और न कभी गर्दिश का अन्त होना है। यह और बात है कि शोभा के लिये कुछ अच्छे किस्म की गर्दिशें चुन लीं जाएं। उनका मेकअप कर दिया जाये,उन्हें अदायें सिखा दी जायें- थोडी़ चुलबुली गर्दिश हो तो और अच्छा-और पाठक से कहा जाए-ले भाई,देख मेरी गर्दिश!
-हरिशंकर परसाई

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Sunday, August 01, 2021

जगदीश्वर चतुर्वेदी जी से बातचीत

 आज पहली बार आदरणीय जगदीश्वर चतुर्वेदी जी से बात हुई। लम्बी बातचीत। पहली बार बात होने के बावजूद ऐसा नहीं लगा नहीं कि पहली बार बात हो रही है। सहज रूप में बातचीत के दरम्यान बहुत सारी रोचक जानकारियां हासिल हुई। उनके गुरु नामवर जी पर भी बातचीत हुई। उसी सिलसिले में मेरे अनुरोध पर जगदीश्वर चतुर्वेदी जी ने अपने गुरु नामवर जी पर बात करना स्वीकार किया । आभार इस बातचीत के लिए।

बातचीत की कड़ी: https://www.youtube.com/watch?v=ikJbkaOZVkc

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Tuesday, July 27, 2021

नेता का चरित्र जनता की मौत से बनता है

 नेता का चरित्र जनता की मौत से बनता है। जनता जितना अंधेरा देगी, नेता उतना ही चमक सकेगा।

-धूमिल
18 अगस्त, 1970 की डायरी

भय अफवाह से चलता है

 भय नहीं, भय अफवाह से चलता है, राजनीतिज्ञों का जीवन। राजनेता के लिए उगाया गया भय उसके चरित्र को चासनी देता है। उसमें चमक आती है। इस सारे प्रबन्ध के पीछे सुरक्षा से अधिक विज्ञापन का ध्यान रहता है। यह एक ऐसा ब्योरा है जो साधारण आदमी को अपनी ओर खींचता है। पंजों पर खड़े होकर , कामधाम छोड़कर रास्ते की बाड़ से गर्दन उचकाने का मौका देता है।

-धूमिल की डायरी से
12 जनवरी, 1970

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Thursday, July 22, 2021

दुनिया में पैसे के सब साथी होते हैं


कल बहुत दिन बाद 'सैंट्रो सुंदरी' की संगत हासिल हुई। 21 साल की उम्र हो गयी अगली की लेकिन कस-बल नई गाड़ियों जैसे। मजाल कि स्टार्ट होने के लिए चाबी एकबार आधे से ज्यादा कभी घुमानी पड़े।
21 साल में सरकारी लिहाज से तीन गाड़ियां अपनी उम्र पूरी करके किलो के भाव, कौड़ियों में बिक चुकी होती हैं। इस लिहाज से हमारी सैंट्रो सुंदरी तीन पीढ़ियों के बाद चौथी पीढ़ी की उम्र में दाखिल हो गयी है। लोग कहते हैं बदल डालो, बेंच दो। हमको समझ में नहीं आता किस लिये।
बहुत दिन बाद मुलाकात होने के बावजूद कोई उलाहना नहीं, कोई शिकायत नहीं। चाबी घुमाते ही चल पड़ी। चलते ही पीली बत्ती जलाकर अलबत्ता इशारा कर दिया कि पेट में कुछ है नहीं। ज्यादा दूर चलना हो भरवा लो।
पेट्रोल के हर दिन बढ़ते दाम के किस्से रोज सुनते हैं लेकिन भरवाया अर्से से नहीं। हर शहर में अलग दाम। कानपुर में पता चला 99 रुपये लीटर बिक रहा। मतलब बाटा के जूतों के घराने वाले दाम। भरवा लिया काम भर का।
सुबह दुकाने कम खुलीं थी। हलवाई और उनकी भट्टियां नींद की खुमारी में थीं। कुछ लोग अल्बत्ता सड़क पर फुर्तीली चाल से न जाने किधर लपके जा रहे थे। हमने कोशिश की किसी दुकान में जलेबी मिल जाये लेकिन हर जगह जबाब मिला -'टाइम लगेगा।' हम बिना जलेबी समोसे लिए ही पंकज बाजपेयी से मिलने चल दिये।
पंकज बाजपेई अपने ठीहे पर, अनवरगंज के सामने की जीटी रोड के पास के डिवाइडर के पास टहल रहे थे। उनको टहलते देख अनायास अनारकली फ़िल्म के जलालुद्दीन अकबर की टहलती हुई शक्ल याद आयी। फ़िल्म में अकबर बादशाह अलबत्ता हाथ पीछे किये, सर नीचा किये सोचते हुए टहलते हैं। यहां पंकज बाजपेयी सर उठाये हाथ में झोला लिए टहल रहे थे।
देखते ही -'कहाँ थे इतने दिन, अबकी बहुत दिन बाद आये, सीबीआई वाले पीछे पड़े हैं ' कहते हुए लपककर पास आये और पांव छूने वाले अंदाज में हाथ टेढ़ा किया। कोरोना के आने के बहुत पहले ही पंकज 'दूर प्रणाम' करते रहे हैं। बिना छुए पैर छूना। सुरक्षित दूरी अपनाते हुए।
बातचीत शुरू होने के साथ ही पहला सवाल -'माल कहां है?' माल मतलब जलेबी, दही, समोसा। बताया कि अभी दुकाने खुली नहीं हैं। इस पर पंकज ने फौरन रबड़ी, रसगुल्ला और खस्ते दिलाने का वायदा बिना हाँ बोले ले लिया।
मामा की दुकान पर चाय पीने गए। मामा मतलब गुप्ता जी ने बताया कि पंकज हमारा इंतजार करते थे। इसके बाद रोजगार पर कोरोना की मार का जिक्र। बताया आज ईद के दिन यहां दुकान पर इतनी भीड़ होती थी कि सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती थी। अब देखिए सन्नाटा है। सब चौपट हो गया।
चाय की दुकान पर ही एक बुजुर्गवार मिले। एक आंख कुछ नीली, शायद मोतियाबिंद हो, मूछें आधे चन्द्रमा की तरह होंठ की चहारदीवारी की तरह ,दाढ़ी बढ़ी हुई, दांत ज्यादातर गायब। चाय पीते हुए बतियाने लगे उनसे।
पता चला रिक्शा चलाते हैं। 1992 तक लक्ष्मीरत्न कॉटन मिल में नौकरी करते थे। मिल बन्द हुई तो जो पैसा मिला 50-60 हजार उससे साल-दो साल ऐश की। इसके बाद कई तरह के काम किये और फिर अंततः रिक्शा पकड़ लिया। 25 साल हो गए करीब रिक्शा चलाते हुए।
कानपुर के तमाम रिक्शावालों , कामगारों की कमोवेश इसी तरह की मिलती-जुलती कहानी है।
मिल के काम के अनुभव बताते हुए बोले-'बिनता पर काम करते थे। हर तरह का कपड़ा बनाया। बम्बई भी गए थे काम सीखने। अब सब मिलें बन्द हो गई। अब न वो मिलें रहीं, न वो कारीगर। मिलों के चलने की बाद सुनते हैं लेकिन सुन ही रहे हैं। कहीं कुछ चलते दिखता नहीं। सब कहते हैं, करता कोई कुछ नहीं।
परिवार के बारे में पूछने पर बोले-'अब यही रिक्शा हमारी बीबी, हमारे बच्चे और घर परिवार है। इसी के साथ रहना, बैठना, गुजर-बसर होती है। और किसी से कोई मतलब नहीं।'
और बतियाने पर पता चला दो बेटियां हैं, दोनों की शादी हो गयी, बीबी भी है लेकिन कोई साथ नहीं रहता। कहां हैं यह भी पता नहीं।
साथ क्यों नहीं पूछने पर बोले -'जब तक पैसे थे हमारे पास तब तक वो साथ में थे। पैसे खत्म हुए तो सबने साथ छोड़ दिया। दुनिया में सब पैसे के साथी होते हैं।'
हमने पूछा -'ऐसे कैसे? कोई तो कारण रहा होगा कि वे साथ नहीं रहते।'
बोले -'उनकी लाइन खराब हो गयी इसीलिए साथ छोड़ दिया उन्होंने।'
हमने पूछा -'क्या लाइन खराब हो गयी?'
फाइनल जबाब वाले अंदाज में वे बोले-'जब बीबी, लड़कियां साथ न रहना चाहें तो समझ लो उनकी लाइन क्या खराब हो सकती है।'
इसके बाद बात रिक्शे की हुई। 40 रुपये रोज के किराए पर है रिक्शे। इसी में रहना, सोना होता है। बारिश होती है तो मोमिया तान लेते हैं। खाना होटल में खाते हैं। जब मन आये रिक्शा चलाते हैं। जब न मन करे आराम करते हैं। जिंदगी ऐसे ही गुजर रही है।
एक कम सत्तर की उम्र के बुजुर्गवार की एक आंख की रोशनी कम हो रही। डॉक्टर को दिखाया है लेकिन ठीक नहीं हुई। शायद ऑपरेशन होना हो। लेकिन पैसे के कारण न हो सका हो।
गरीब इंसान अपनी तमाम बीमारियों के इलाज पैसे के कारण नहीं करा पाता। अपने अंगों को भी निर्लिप्त भाव से खराब होते देखता है। तसल्ली के लिए बहाना रहता है-'बहुत दिखाया, बहुत इलाज कराया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।'
बात करते हुए चाय पीने के पास बुजुर्गवार ने जेब से चुनहीँ तम्बाकू निकाली, प्लास्टिक की छुटके पाउच को दबाकर चूना मिलाया और दोनों को रगड़ते हुए फटकारने के बाद मुंह में दबाकर रिक्शे का हैंडल थाम लिया।
चाय की दुकान से वापस चले तो गाड़ी के पास पंकज खड़े थे। हलवाई की दुकान से रबड़ी, रसगुल्ला लिया और खस्ते के पैसे एडवांस में। जब बनेगा तो ले लेंगे। सत्तर रुपये हुए। बाकी बचे 30 रुपये पंकज को दिए तो बोले -'आज सौ रुपये लेंगे। बहुत दिन बाद आये हो।'
हमने 20 रुपये और देकर कहा -'फिर आएंगे जल्दी ही।'
इस पर ठुनकते हुए पूरे सौ रुपये के लिए बच्चों जैसे जिद करने लगे पंकज। लेकिन हमने दिए नहीं। पूछा ऐसे कितने लोगों से पैसे मिलते हैं तुमको?
बताया 12-14 लोग हैं जो नियमित-अनियमित आते हैं, मिलते हैं, सामान-पैसा देते हैं। आसपास दुकान वाले भी कुछ न कुछ देते रहते हैं। जिनका कोई नहीं, उनका दाता राम।
इस सारे बातचीत और घटनाक्रम से अलग एक आदमी अखबार में मुंडी घुसाए खबरों को हजम करने में जुटा था। ऊपर आसमान में सूरज भाई मुस्कराते हुए पूरी दुनिया को गुडमार्निंग कर रहे थे।

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Monday, July 19, 2021

मजदूरों को कोरोना नहीं होता



कल सुबह देर तक धूप नहीं निकली। शायद बादलों ने अपने बरसने का प्रोग्राम सूरज भाई को व्हाट्सएप कर दिया होगा। अपने पानी के पीपे खाली करने की परमिशन मांगी होगी। सूरज भाई ने भी कह दिया होगा, बरस लो, कर लो मन के अरमान पूरे।
किरणों को बता दिया होगा सूरज भाई ने कि आज स्कूल बंद है तुम्हारा। यहीं रहो। किरणों ने भी फूल, पौधों, पत्तियों और जहां-जहां भी वे बैठती थीं , सबको मेसेज कर दिया होगा-'आज हम नहीं आयेंगे। कल मिलेंगे तब गप्पें करेंगे।
किरणें, रश्मियां भले न आई लेकिन उजाले की तो ड्यूटी लगी थी। उसको आना पड़ा। स्कूल बंद होने पर भी मास्टरों को तो आना ही पड़ता है।
सड़क पर लोग कम थे। बच्चे ज्यादातर क्रिकेट खेल रहे थे। रामलीला मैदान में और सामने कैंट मैदान में भी। कुछ लोग योग भी करते दिखे। कुछ लोग जल्दी-जल्दी टहलते दिखे। ऐसे गोया कुछ देर में ही टहलने में टैक्स लगने वाला हो। टैक्स लगने के पहले जितना सम्भव हो मुफ्त में टहल लिया जाए।
एक मार्निंग वाकर कदमताल करते हुए सड़क के बीचों-बीच सर उठाये, गर्वीली मुद्रा में कदमताल करता चला जा रहा था। ऐसे जैसे कोई रोड रोलर बीच सड़क पर चला जा रहा हो। वो तो कहो कोई गाड़ी उसके सामने आई नहीं, आती तो टकरा के क्षतिग्रस्त हो जाती।
खेलकर लौटते हुए एक बच्चे ने बल्ले से गेंद को जोर से हिट किया। गेंद ऊंचे उछलते हुए पीछे मैदान पर जाकर गिरी। उसके साथियों ने उसे हड़काते हुए गेंद उठाकर लाने के लिए दौड़ाया। वह झेंपी हुई बहादुरी के साथ दौड़ता हुआ गया और गेंद उठा लाया। आगे बढ़ गए अपने साथियो के साथ मिल गया।
एक महिला बीच सड़क पर खड़े सेल्फी ली रही थी। कामकाजी महिला थी। बच्चे , पति दूसरे शहर में रहते हैं। सुबह-सुबह सेल्फी भेजकर परिवार के साथ होने के एहसास को जीने की कोशिश कर रही थी।
दो सफाई कर्मचारी सड़क साफ करके वापस जाते दिखे। झाड़ूओं को बल्लम की तरह हाथ में पकड़े हिलाते चले जा रहे थे। झाड़ू सफाई कर्मियों का हथियार ही तो होती है, जिससे वे दुश्मन कूड़े का संहार करते हैं।
लौटते में सड़क किनारे बेंच पर दो लोग बैठे दिखे। दोनों दिहाड़ी मजदूर। काम की तलाश में गए थे। काम मिला नहीं। घर वापस लौट रहे थे। पास के गांव में रहते हैं।
गांव में थोड़ी बहुत खेती है। लेकिन उससे गुजारा नहीं होता। इसलिए बाजार जाते हैं काम की तलाश में। कभी-कभी काम मिल भी जाता है। लेकिन अक्सर नहीं मिलता। बहुत मिला तो महीने में दस दिन। कोरोना के बाद तो और भी कम हो गया है।
गांव में कोरोना हुआ किसी को पूछने पर बताया रामसेवक ने -मजदूरों, मेहनत करने वालों को नहीं होता कोरोना। ये सब पैसे वालों को और काम न करने वालों को होता है। जो लोग पाप करते हैं, उनको होता है। गांव में किसी को नहीं हुआ।
रामसेवक ने बताया -'मेहनत करने वालों को कोरोना नहीं होता।' शायद इसीलिए तमाम गरीबों को मरने पर कोरोना से मरने के प्रमाणपत्र नहीं मिले।
रामसेवक नाम हाथ में गुदा हुआ था। उसकी भी कहानी बताई -'मेला में एक जगह भीड़ लगी थी। लोग अपना नाम गुदवा लिया। पिछले साल तो हुआ नहीं मेला, इस बार भी होना मुश्किल।'
रामसेवक के साथ बच्चे का नाम मनोज बताया शायद। 18 साल की उम्र। पिता रहे नहीं। मां और छोटा भाई है। बहन की शादी हो गयी। बाली उम्र में जिम्मेदारी का बोझ। स्कूल न जाने कब छूट गया। मेहनत-मजदूरी करके जिंदगी के स्कूल की पढ़ाई चल रही है।
'मजदूरी कभी मिलती है, कभी नहीं मिलती। तो दूसरा कोई काम क्यों नहीं सीखते। सिलाई ही सीख लो। काम मिलता रहेगा' - हमने कहा।
सिलाई कौन सिखाएगा? कहां से सीखेंगे? काम कहाँ मिलेगा? इसी तरह के सवाल में सलाह उड़ गई हमारी।
'अठारह साल के हो गए । अब शादी वाले आने लगे होंगे। शादी करोगे कुछ दिन में?'- हमने पूछा।
इस सवाल का जबाब रामसेवक की तरफ से आया।-' होएगी शादी। कोई ठीक रिश्ता मिला तो हो जाएगी शादी।'
किसी प्रेम प्रसंग की बात पूछने पर मनोज ने अपने शरीफ बच्चे होने की ताकीद रामसेवक से करवाते हुए कहा -'हम उस तरह की लड़के नहीं।'
और भी तमाम बातें हुई। सबसे ज्यादा इस बात पर कि रोजगार कम होते जा रहे हैं, मंहगाई बढ़ रही है। सबके बावजूद कोई बहुत खास तल्खी नहीं दिखी दोनों के लहजे में।
श्रीलाल शुक्ल फिर याद आये -'अपने समाज में कष्ट सहने की अपार क्षमता है। कोई बड़ा बदलाव निकट भविष्य में सम्भव नहीं लगता। सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।'
शाम को झमाझम बारिश हुई। सारे मैदान तालाबों में बदल गए।

Saturday, July 17, 2021

तकनीक के सहारे विकास कितना आसान काम है

 काउंटर पर लिखा था -'फोटोकॉपी डाउनलोडिंग होती है।' हमको लगा है कि समाज आदमी के पतन से बेकार-बेफालतू हलकान है। हमको समझना चाहिए कि समाज, आदमी पतित नहीं हो रहा है। वास्तव में वह डाउनलोड हो रहा है। तकनीक का समाज के विकास में योगदान किया जाना चाहिए। आदमी को पतित नहीं डाउनलोड होता बताया जाना चाहिए। पतन से लगता है कुछ गड़बड़ हो रहा है। डाउनलोड होने से उन्नति का एहसास होता है। एक बार फिर लगा कि तकनीक के सहारे विकास कितना आसान काम है।


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Tuesday, July 13, 2021

आज मजहब भी पूंजीपतियों ने पूंजी के बल पर अपने अधीन कर लिया है

 वास्तविकता यह है कि आज मजहब भी पूंजीपतियों ने पूंजी के बल पर अपने अधीन कर लिया है। ऐसे में ईश्वर का सच्चा धर्म शेष नहीं रहता। सच्चा ईश्वरीय धर्म तो प्राणियों की सेवा, प्रेम, मोहब्बत, इंसाफ वफादारी और ईमानदारी है। उसमें ईश्वर के प्राणियों का हित और लाभ है। यह आज आप जो कुछ देख रहे हैं, यह पूंजीपतियों ने केवल अपने उद्देश्य पूरे करने के लिए धर्म के नाम पर एक खेल बनाया है। यह वर्तमान मजहब तो मात्र कुछ लोगों के ऐशो आराम के लिए है। ईश्वर के प्राणियों के आराम के लिए नहीं है। जब धर्म स्वार्थी लोगों के हाथों में चला जाता है तो यही हाल होता है। कुरान तो यह कहती है कि मुसलमान वही है जिसे कुर्रान पर विश्वास हो और इससे पहले जो किताबें ईश्वर की ओर से आई हैं उन पर भी। हम नहीं समझते कि दुनिया में धर्म के नाम पर ये झगड़े और लड़ाई क्यों और कैसे पैदा हुई?

-अब्दुल गफ्फार खान की आत्मकथा 'मेरा जीवन मेरा सँघर्ष' से

Monday, July 12, 2021

लोगों की दुआयें और मन का सुकून असली कमाई है


आजकल टहलते हुए कदम घड़ी बांधे रहते है। घड़ी बताती है कि कितने कदम चल लिए। रोज का लक्ष्य दस हजार कदम का रहता है। अक्सर पूरा हो जाता है। कभी-कभी रह भी जाता है। बीच में तो 15 हजार तक भी गए कई दिन।
सुबह करीब 4 हजार कदम के बाद सोचा कि एक हजार कदम और करके चाय बनाई जाए। लेकिन फिर अचानक मन किया तो बाहर निकल गए। सड़क पर और फिर आर्मी गेट से बाहर।
रामलीला मैदान में और आसपास लोग अपने-अपने हिसाब से कसरत कर रहे थे। एक आदमी चप्पू जैसा चलाते हुए हवा को आगे से खींचकर पीछे कर रहा था। एक भाई जी हाथ में पकड़ी ईंट को ऊपर नीचे कर रहे थे। लग रहा था खींचकर जमीन पर मारेंगे।
मार्निंग वाकर ग्रुप के सदस्य आने लगे थे। पता चला तीस-चालीस साल से चल रहा है ग्रुप। लोग रोज आते हैं , मिलते हैं, बातें साझा करते हैं। शहर का सूचना स्थल है मार्निंग वाकर ग्रुप वाली बेंच।
वहीं एक बेंच पर एक भाई जी कुछ स्केच बनाते दिखे। हम ठहरकर देखने लगे उनको। बतियाना शुरू किए। पता चला भाई जी हरफनमौला हैं। दिल्ली में काम करते हैं। लाकडाउन में काम कम हुआ तो शाहजहांपुर आ गए। यहां बच्चों को शतरंज सिखाते हैं। संगीत सिखाते हैं। और न जाने क्या-क्या सिखाते हैं।
शतरंज पर काफी बात हुई। बताया रियाज अहमद जी ने कि उन्होंने तमाम लोगों को शतरंज सिखाई। उनके सिखाये बच्चे चैम्पियन हैं। तमाम लोगों को शतरंज का बोर्ड और गोटियां दी हुई हैं। शहर में शतरंज और संगीत सिखाने के लिए कोचिंग भी देते हैं। मुफ्त में। पियानो भी सिखाते हैं। बताया कि सीखने वाले तीन-चार दिन में सीख जाते हैं। हमको लगा हम भी सीख लें। लेकिन लगने से क्या होता है।
शतरंज से जुड़ी कई बातें बताई रियाज जी ने। कम्प्यूटर भी सिखाता है लेकिन उससे लोग सालों तक नहीं सीख पाते। विश्वनाथन आनन्द की रेटिंग सबसे ज्यादा है। और भी तमाम जानकारियां।
अपनी छोटी बेटी मायरा को शतरंज सिखा रहे हैं रियाज। दो साल की है। उसको यूरोप ले जाएंगे कम्पटीशन में। चाहे जितना पैसा लगे। उसके नाम ही शतरंज अकादमी खोलेंगे। बड़े सपने हैं।
दिल्ली में लाकडाउन के चलते घर आये हैं रियाज। बताते हैं दिल्ली में जो लोअर 12 रुपये में सिला जाता है उसकी सिलाई यहां शाहजहांपुर में 25 रुपये है। वहां बाहर से आये लोग कम पैसे में सिलाई करते हैं।
पैसे की बात चली तो बताया जिंदगी जीने के लिए बहुत पैसे की दरकार नहीं होती। 29-30 हजार में आराम से काम चल जाता है। ज्यादा पैसा भी किसी न किसी बहाने निकल ही जाता है। लोगों की सहायता से जो दुआएं मिलती हैं, जो सुकून मिलता है वह असली कमाई है।
आज के आपाधापी वाले जमाने में सहायता, सुकून, दुआयें वाली बात दकियानूसी समझी जाती हैं। लेकिन आज भी ऐसे लोग हैं जो इस पर भरोसा करते हैं। दुनिया ऐसे ही लोगों से खूबसूरत बनी हुई है।

Sunday, July 11, 2021

सीट रिजर्व है

 



शाम को टहलने निकले। सूरज भाई जाने की हड़बड़ी में थे। बिना बॉय बोले निकल लिए। मन में डर होगा कि बतियाना शुरू करेंगे तो उनकी बस छूट जायेगी। जबकि बात होती तो हम खुद उनसे कहते -'भाई जी आप निकलो। अंधेरा हो रहा है। तुमको किरणों, रश्मियों के साथ जाना है। जमाना खराब है। देर करना ठीक नहीं।'
रामलीला मैदान पर लोग अलग-अलग तरह से व्यस्त थे। कोई गाड़ी चलाना सीख रहा था, कोई क्रिकेट खेल रहा था। एक भाई जी स्कूटी की फुट रेस्ट को चौकी बनाये बैठे , मैदान पर लेटे दोस्त से बतिया रहे थे। दो बच्चे गले में बाहें डाले गपियाने में व्यस्त थे।
रामलीला मंच के पास कुछ नौजवान आपस में खड़े बतिया रहे थे। अंदाज सहज बकैती वाला। कुछ के हाथ में सिगरेट भी थी। एक नौजवान हाथ में पकड़ी सिगरेट पर इस अंदाज में उंगली फिरा रहा था जैसे बकैत लोग अपने कट्टे की नाल पर फिराते हैं।
नौजवानों के हाथ में सिगरेट देखकर हमने कल्पना कर डाली कि ये इसमें भरकर गांजा या चरस पीने के पहले वाले दौर में हैं। कल्पना में यह भी आया कि यह गलत काम है। हमको इनको टोकना चाहिए। लेकिन फिर लगा कि हम अकेले ये कई लोग। हमारे टोकने पर कहीं ये हमको ठोंक न दें। अकेले में कौन जानता है कि हम कौन हैं।
हम बिना उनके टोंके उनके पास से चुपचाप , मन में शंका करते हुए, निकलकर रामलीला मंच के पास जाकर खड़े हो गए। वहीं से फोन मिलाकर मंच के आसपास सफाई करने का निर्देश देने लगे। निर्देश देते हुए हमारे अंदर बहादुरी बिना अनुमति लिए घुसती चली गयी। हमको लगा कि इन नौजवानों से बतियाना चाहिए।
लेकिन न जाने क्या हुआ कि वे नौजवान वहां से खरामा-खरामा चलते हुए मैदान पार करके बाहर चले गए। शायद उनको मेरी उपस्थिति अखर रही हो। सिगरेट भी पिये और मजा भी न आये, क्या फायदा ऐसी सुट्टाबाजी का जिसमें इत्मीनान न हो।
मैदान में बेतरतीब टहलते हुए हम लोगों को देखते रहे। लोग यहां शहर से टहलने आते हैं। ताजी हवा, खुला मैदान, भीड़ मुक्त सड़क लोगों को सुकून देती है।
मैदान पर टहलने के बाद अपन सड़क पर टहलने लगे। सड़क के दोनों ओर बेंचों पर लोग बैठे हुए थे। कुछ लोग गाने सुन रहे थे, कुछ बतिया रहे थे। ज्यादातर लोग अफसोस मुद्रा में गर्दन झुकाए मोबाइल में डूबे हुए थे। आज दुनिया के अधिकतर लोग गर्दन झुकाए मोबाइल में घुसे रहते हैं।
गर्दन झुकाए मोबाइल में घुसे रहने की बात से याद आया कि जिराफ की गर्दन पहले लम्बी नहीं होती थी। बाद में गर्दन उचकाकर पेड़ों की पत्तियां खाने से उसकी गर्दन लम्बी हो गयी। जिस तरह पूरी दुनिया में गर्दन झुकाकर मोबाइल में घुसे रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है उसे देखकर डर लगता है कि आने वाली नस्लों की गर्दन कहीं पैदायशी झुकी न हो। झुकी हुई गर्दन वाली नस्ल 'मोबाइल नस्ल' के रूप में जानी जाएगी।
पास ही पम्प हाउस है। वहां मौका मुयायना करने पहुंच गए। पम्प हाउस के सामने खड़ी गाड़ियां हटवाई। पम्प आपरेटर से बतियाये। पता चला ग्रेजुएट कर रहे हैं। सेना में भर्ती की कोशिश भी चल रही है। उसके लिए दौड़ का अभ्यास भी करते हैं। गए साल भी सेलेक्शन हुआ था। लेकिन दौड़ प्रतियोगिता की सूचना समय पर मिल नहीं पाई। दौड़ में भाग नहीं ले पाए। सेलेक्शन रह गया।
सूचना के विस्फोट के इस युग में किसी नौजवान के इंटरव्यू की सूचना उस तक न पहुंच सके और वह नौकरी से वंचित रह जाये, इससे बड़ा विद्रूप क्या होगा? लेकिन इससे बिना निराश हुए नौजवान अभ्यास में जुटा है। आशान्वित है। यह आशा का भाव सुकूनदेह है।
सड़क के किनारे रखी बेंचों लोग बैठे हुए हैं। एक बेंच का आधा हिस्सा खाली दिखा। हमने सोचा थोड़ा इत्मीनान से बैठकर सड़क मुआयना करें। लेकिन बैठने से पहले ही एक बच्ची ने टोंक दिया-'यह सीट रिजर्व है।'
हमने हंसते हुए पूछा -'यहां कैसा रिजर्वेशन?' बच्ची ने बिना हंसे तरस मुद्रा में बताया-'आंटी बैठी थीं यहां पर। टहलने गयी हैं। वो देखिए आ रहीं। यहीं बैठेंगी।'
हम दूसरी सीट की तलाश में बढ़े। सामने एक बेंच दिखी जिस पर कोई नहीं बैठा था। सड़क पार करके बेंच के पास गए तो दिखा कि बेंच का एक पटरा टूटा हुआ था। उस 'दिव्यांग बेंच' पर भी एक भाई साहब अपने दोस्त के साथ लपकते हुये बैठ कम , लटक ज्यादा गए। हम बेंच को सहानुभूति वाले भाव से देखते हुए वापस हो लिए।

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Saturday, July 10, 2021

अंधकार निरोधक अध्यादेश

 

कल सुबह टहलने निकले। बहुत दिनों के बाद। सड़क पर चलता पहला इंसान ऊंघता हुआ दिखा। बेमन से टहलता। चेहरे पर उबासी लादे चलता। फुटपाथ की ठोकर से सहम कर चौकन्ना हो गया। ठोकरें हमको चौकन्ना बनाती हैं, सावधान करती हैं।

दो दरबानों में से एक की ड्यूटी ख़त्म हो गयी थी। वह अपनी वर्दी बदलकर जाने की तैयारी कर चुका था। अपने रिलीवर के इंतजार में था। घर जाने की बेताबी चेहरे पर हावी थी।
एक महिला दूसरे के घर खिले फूल उचककर तोड़ रही थी। जल्दी-जल्दी फूल तोड़कर झोले में डालती जा रही थी। हड़बड़ी में एकाध फूल नीचे गिर गए। चोट लगी होगी नीचे गिरे फूल को। लेकिन उससे बेखबर महिला फूल तोड़ती रही। अपनी पहुंच तक के सारे फूल तोड़कर महिला आगे बढ़ गयी। तेजी से।
उसी जगह एक बच्चा आसपास गिरे आम बीन रहा था। एक पालीथिन में। छोटे-टपके आम। दो-तीन किलो आम होंगे। पालीथिन में इकट्ठा आम नीचे गिरने पर टूट-फूट गए थे। किसी का मुंह घायल, किसी का पेट फटा, किसी की टांग टूटी, सिर्फ गुठली सलामत। सारे आम पालीथिन में किसी शरणार्थी कैम्प में भीड़ की तरह जमा थे।घर से उखड़े-उजड़े के यही हाल होते हैं।
सड़क पर टहलते लोग दिखे। कोई तेजी से, कोई आहिस्ते-आहिस्ते। कोई अकेले, कुछ लोग साथ में। एक बच्ची अपने घरवालों के साथ जाते हुए कोरोना से बचाव के सबक याद कर रही थी। बोली- 'मास्क, दूरी, सफाई-कोरोना से बचाव की पक्की दवाई'। उसके चेहरे पर तेजी से चलने के कारण पसीना सैनिटाइजर की तरह चमक रहा था। हमने उससे पूछा -' लेकिन तुम तो मास्क लगाये नहीं हो।'
'टहलते हुए मास्क लगाना जरूरी नहीं'-कहते हुए बच्ची आगे चली गयी।
मैदान पर तमाम लोग अपने-अपने हिसाब से मशगूल थे। दो बच्चियां बैडमिंटन खेल रहीं थीं। कुछ महिलाएं जमीन पर बैठी अनुलोम-विलोम कर रहीं थीं। कुछ लोग कसरत कर रहे थे। उठक-बैठक करता हुआ आदमी इतनी तेजी से बैठ रहा था मानो जमीन को जबरियन नीचे दबा रहा हो। जमीन दब नहीं रही थी तो गुस्से में और दबा रहा था।
कुछ लोग समूह में योग कर रहे थे। एक आदमी निर्देश दे रहा था, बाकी उसका अनुसरण कर रहे थे। जब हमने देखा तो लोग एक पैर पैर खड़े , दूसरे को ऊपर उठाये तथा हाथ दोनों ओर पंखे की तरह फैलाये हुए थे। एक पैर पर जहाज मुद्रा में खड़े थे लोग। कुछ लोग लड़खड़ाकर दोनों पैरों पर हो गए। फिर एक पैर पर खड़े होकर जहाज बनने की कोशिश करने लगे।
बात यहां कसरत तक ही सीमित थी। सही में जहाज बनते तो तेल के बढ़ते दाम के कारण साइकिल बनने की कोशिश में जुट जाते। जहाज मुद्रा की जगह साइकिल मुद्रा अपनाते।
हम सब इसी तरह जहाज बनते हुये सन्तुलन बनाने की कोशिश करते हुए लड़खड़ाते रहते हैं। लडखडाते हैं, सम्भलते हैं, स्थिर हो जाते हैं। जरूरत के हिसाब से स्टैंड, आसन बदलते हैं।
एक बच्चा पालीथिन में आटा लिए जगह-जगह डालता जा रहा था। जहाँ छेद दिखा , चीटिंयों का सुराग मिला, वहां आटा डाल दिया। रामनगर से आता है। घर से निकलता है आटा लेकर। जगह-जगह चींटियों के लिए आटा डालता चलता है। चीटियां कभी उसको न धन्यवाद देती हैं, न कोई वोट। उसको संतोष मिलता है, इसलिये वह यह काम करता है। सब कुछ अपनी ही कामना के लिए प्रिय होता है- 'आत्मनस्तु वै कामाय सर्वंम प्रियम भवति।'
आसमान में सूरज भाई अंधकार निरोधक अध्यादेश की तरह चमक रहे थे। कोई भी अंधेरे का टुकड़ा दिखे, फौरन उसका संहार करो। सूरज भाई की शक्ल देखते ही अंधकार अपने कुनबे समेत फूट लेता होगा।
मन किया सूरज भाई से पूछें -'ठीक है भाई आप चमको लेकिन अंधकार ने कौन तुम्हारी भैंस खोली है जो तुम उसको देखते ही कत्ल कर दो। आखिर उसका भी जीने का हक है।'
लेकिन फिर पूछे नहीं। क्या पता सूरज भाई बुरा मान जाएं। हमको अपने दोस्ती के पद से इस्तीफा देने को कहे और नए दोस्त अपने मित्रमंडल में शामिल कर लें। कोई भरोसा नहीं आजकल सूरज भाई का। बड़े बमक रहे हैं आजकल गर्मी में। गुस्से में बमकते साथी को कोई सलाह नहीं देनी चाहिए। वैसे भी सूरज भाई आसमान के राजा हैं। महाभारत में कहा गया है- ' राजाओं को बिना मांगे सलाह नहीं देना चाहिए।'

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Monday, July 05, 2021

हमको छोटी-छोटी खुशियों का आनंद उठाना सीखना चाहिए

 हमको छोटी-छोटी खुशियों का आनंद उठाना सीखना चाहिए।

हमारे आसपास तमाम बहुत अच्छे लोग हैं।
हमको अपने आप को भी प्यार करना चाहिए।
इसी तरह की और इसके साथ कुछ खूबसूरत कविताएं भी सुनिए इस बातचीत में। बातचीत में शामिल है हमारे छोटे सुपुत्र Anany Shukla

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इंसान और प्रेम

 इंसान के व्यक्तित्व का एक हिस्सा होता है जो हमेशा प्रेम को अस्वीकार करता है। यह वह हिस्सा होता है जो नष्ट होना चाहता है। ऐसे हिस्से को हमेशा अनदेखा/माफ किया जाना चाहिए।

"There is always a part of man that refuses love ;it is that part which wants to die;it is that part which needs to be forgiven".
-अल्वेयर कामू
बमार्फत Shree Krishna Datt Dhoundiyal



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Sunday, July 04, 2021

प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है

 *इंसान को मुसीबतजदा लोगों की तरफ से जरूर लड़ना चाहिए, लेकिन अगर वह लड़ाई के सिवा हर चीज में दिलचस्पी लेना बंद कर दे तो लड़ाई का क्या फायदा?

*प्यार के बगैर दुनिया मौत की तरह सूनी है और हमेशा इंसान की जिंदगी में ऐसा वक्त आता है जब वह कैद से, अपने काम से, कर्तव्य परायणता से ऊब जाता है, और सिर्फ एक ही चीज की तमन्ना करने लगता है - किसी प्रिय चेहरे की, प्यार भरे किसी दिल की गरमी और जादू पाने की।
*इंसानों में घृणा करने योग्य बातों की अपेक्षा प्रशंसनीय गुण अधिक मात्रा में हैं।
अल्वेयर कामू के उपन्यास ' प्लेग' से।

हारा वही जो लड़ा नहीं

 "कोई लक्ष्य

मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं,
हारा वही जो लड़ा नहीं।"
-कुंवर नारायण

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Friday, July 02, 2021

जहां-जहां उपस्थित हो तुम

 जहां-जहां उपस्थित हो तुम ,

वहां-वहां बंजर कुछ नहीं रहना चाहिए ,
निराशा का कोई अंकुर फूटे,
तुम्हें ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए|
-भवानी प्रसाद मिश्र

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10222610951595952

मेरी ख्वाबगाह में नंदन- ज्ञानरंजन



(25 सितंबर,2010 को कन्हैयालाल नंदनजी का लम्बी बीमारी के बाद दिल्ली में निधन हो गया। उनके बारे में ज्ञानरंजन जी का लिखा एक संस्मरण देखिये। ज्ञानरंजन जी और नंदनजी साथ पढ़े थे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में। यह संस्मरण ज्ञानरंजन जी ने शायद नंदन जी के निधन के दो-तीन साल पहले लिखा था।)
कन्हैयालाल नंदन से भौगोलिक रूप से मैं 1957-58 में बिछुड़ गया क्योंकि इसी साल के बाद वह इलाहाबाद छोड़कर मुंबई नौकरी में चला गया। हेरफ़ेर 4-6 महीने का हो सकता है। गदर के सौ साल बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हमने एक साथ डिग्री हासिल की और काले गाउन पहनकर फ़ोटो खिंचवाई थी। लगभग आधी शताब्दी का समय हमारे संबंधों के बीच सिनेमा की रील की तरह रोल्ड है।
वह ऐसा समय था कि चारों तरफ़ खजाना ही खजाना था और कोई लूटपाट नहीं करता था। जो चाहो वही मिलता था। पर क्या चाहें क्या न चाहें इसकी कोई तमीज नहीं थी। किताबों की, सत्संग की, कुसंग की,संवाद-विवाद की, लड़ने-झगड़ने और सैर-सपाटे और रचनात्मक उत्तेजनाओं की कोई कमी नहीं थी। असंख्य रचनाकार थे और कहानियां थीं। इतिहास में जाते लेखक थे,वर्तमान में उगते कवि थे और भविष्य की संभावनाओं वाले रचयिता। मर जाने पर भी किसी की जगह खाली नहीं हो जाती थी जैसा कि आजकल हो जाती है। एक मणिमाला थी जो अविराम चल रही थी।
साहित्य संसार से इतर रसायन में सत्यप्रकाश जी थे, गणित में गोरखप्रसाद, हिंदी में धीरेन्द्र वर्मा, अंग्रेजी में एस. सी.देव और फ़िराक। और वह दुनिया भी भरी-पूरी थी। न चाहो तो भी छाया हम पर पड़ रही थी। टेंट में पैसा नहीं होता था पर अपने समय के अपने समय को पार कर जाने वाले दिग्गजों को देख-सुन रहे थे। उनसे मिल रहे थे, सीख रहे थे। नंदन से ऐसे ही किसी समय मिलना हुआ और फ़िर वह तपाक से गहरी मैत्री में बदल गया। पचास सालों में अनंत वस्तुयें छूट गईं हैं। अनगिनत लोग विदा हो गये। करवट लेकर अब संपत्ति शास्त्र के कब्जे में अधमरे कैद पड़े हैं। मेरे सहपाठियों में से निकले मित्रों में केवल दो ही भरपूर बचे रहे। एक दूधनाथ सिंह और दूसरे कन्हैयालाल नंदन।
नंदन की दोस्ती का जाला किस तरह और कब बुना जाता रहा इसकी पड़ताल असंभव है। वह अज्ञात और अंधेरे समय की दास्तान है। हम छत पर बने कमरों में साथ-साथ पढ़ते थे। मेरी मां खाना खिलाती थी। हम वहीं पढ़ते-पढते सो जाते थे। बाकी समय नंदन साइकिल पर दूरियां नापते हुये जीविकोपार्जन के लिये कुछ करते थे। चित्र बनाते, ले-आउट करते, प्रूफ़ देखते थे। आज भी उतनी ही मशक्कत कर रहे हैं। बीमार होते हैं, अस्पताल जाते हैं और लौटकर उतनी ही कारगुजारी हो रही है। गुनगुनाते रहते हैं और काम चलता रहता है।
बेपरवाह और जांगर के धनी। उन्नीस-बीस साल के कठिन और काले दिनों में भी नन्दन ने कभी अपने सहपाठियों को जानने नहीं दिया कि वह चक्की पीस रहा है। दीनता तब भी न थी। नन्दन के चेहरे को हंसता हुआ देखकर भी कोई यह नहीं कह सकता था कि वह वाकई रो रहा है या हंस रहा है। सामने तो वह कभी रोया नहीं। जीवन में कब कोई किस तरह से आ जाता है इसे जानने की कोशिश बेकार है। यह एक रचना प्रक्रिया है जिसे खोलना बहुत फ़ूहड़ लगता है। रिश्ता बनाते समय दुनियादार लोग हजार बार सोच विचारकर यह तय कर लेते हैं कि लंबे समय में यह रिश्ता कहीं नुकसानदेह तो नहीं होगा। सारे भविष्य के संभावित लाभ-हानि वे सांसारिक तराजू पर नाप-तौल लेते हैं। फ़िर कदम बढ़ाते हैं।
मेरे और नंदन के बीच आज भी दुनिया का प्रवेश नहीं है। यहां किसी का हस्तक्षेप संभव नहीं। हमारी बीबियों का भी नहीं और उनका भी जो हमें इसी की वजह से नापसंद करते हैं।
एक सफ़ल व्यक्ति था और मैं भी कोई ऐसा असफ़ल नहीं हूं। लेकिंन नंदन का बायोडाटा ज्वलंत है। उसके चारो तरफ़ बिजली की लतर जल-बुझ ही नहीं रही , जल ही जल रही है। यह नंदन की सबसे बड़ी समस्या है। इस पर उसका बस नहीं है। इस सबके बावजूद जिस समाज में व्यवहारिकतायें भी तड़ाक-फ़ड़ाक से मुरझा जाती हैं और सौदेबाजी भी दो-चार से अधिक नहीं चल पातीं उसी समाज में हम 50 साल से एकदम अलग-अलग रास्तों पर चलते हुये किस तरह मित्र विहार करते रहे यह एक ठाठदार सच है। हमारा लिखना-पढ़ना, जीवन शैलियां ,काम-धाम, विचार-विमर्श कठोरतापूर्वक एक दूसरे से विपरीत रहा। हमने कभी एक-दूसरे को डिस्टर्ब नहीं किया। हमने कभी नहीं पूछा कि यह क्यों किया और यह क्यों नहीं किया।
(नई दुनिया, दिल्ली के 26 सितंबर,2010 के अंक से साभार!)

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