Saturday, December 11, 2021

सेंट्रल स्टेशन की शाम



गाड़ी के इंतज़ार में सवारियाँ हैं तो सवारियों के इंतज़ार में कुली। करीब ३०० कुली हैं सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर। गाड़ियाँ भी कुल मिलाकर ३०० के करीब हैं। मतलब एक गाड़ी के लिए एक क़ुली।
कुलियों के बिल्ले पीतल वाले हैं। नए लोगों को बिल्ले नहीं मिलते।
स्टेशन पर झाडू लगते देख हमने पूछा -“ किसी का दौरा होने वाला है क्या ?”
“रोज़ दौरे होते हैं। मिठाई का डिब्बा लेने आते हैं साहब लोग।” - एक ने कहा और बाक़ी हँसने लगे।
श्रीलाल शुक्ल जी की बात याद आई-“ सरकारी अफ़सर जिधर निक़ल जाता है, वही उसका दौरा हो जाता है।”
दौरा तो ठीक। लेकिन दौरे के साथ मिठाई का गठबंधन गड़बड़ टाईप है।
सूरज भाई आसमान पर बड़के अफ़सर की यह जलवानशीन हैं। उनके अंदाज से लग रहा है बस निकलने ही वाले हैं अपना किरणों का बस्ता समेटकर। कानपुर का सेंट्रल स्टेशन उनको विदाई जैसा देने के लिए विनम्र भाव से खड़ा है।

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मिर्च और रसगुल्ले का गठबंधन



सवारियों के लिए खाना लग रहा है। एक घंटे बाद आने वाली ट्रेन के लिए लग रहा है खाना। सारी प्लेट अनुशासन से एक के बग़ल एक सटी तैयार हो रहीं हैं। कोई प्लेट किसी से लड़ाई नहीं कर रही है। प्लेट का सामान भले ही अलग- अलग जगह से आया हो, चावल कहीं से , आटा कहीं से , अचार कहीं से लेकिन प्लेट पर आकर सब एक हो गए हैं। एक सूत्र में बंध हुए हैं। एक ही गाड़ी में जाने को तैयार। किसी की कोई जिद नहीं कि लीडर हमको बनाओ, तभी साथ आएंगे। थाली का खाना सच्चे अर्थों में मेल-जोल और बंधुत्व भाव का नायाब उदाहरण है। भाई चारा और बहकापा हो तो थाली के खाने की तरह। यहाँ मिर्च और रसगुल्ला अगल-बग़ल में गलबहियाँ डाले मस्ती से रह लेते हैं। बिना सीटों में बँटवारे के लिए जूतमपैजार के गठबंधन बना लेते हैं। उनको लोगों का पेट भरना है , कोई सरकार बनाकर सेवा के नाम पर मनमानी थोड़ी करनी है।

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Monday, December 06, 2021

आजकल बहुत मंदी है। कोई काम नहीं मिल रहा।

 सड़क पर आते ही लोग आते-जाते दिखने लगे। नाश्ते की दुकाने गुलज़ार हो हुईं। चाय, समोसा, पकौड़ा, पराठा घराने का सामान बिकने लगा था। एक ठेलिया के पीछे राजकीय इंटर कालेज दिखा। पीले उदास जैसे रंग में पता स्कूल। अनगिनत होनहार बच्चे पढ़कर निकले होंगे यहाँ से। कभी जलवा रहा होगा जी आईसी का। एडमिशन के लिए मारा- मारी होती होगी। अब क्या पता बच्चे ही न पूरे होते हों क्लासों में। सारे राजकीय इंटर कालेजों के यही हाल हैं।

स्कूल के सामने की नास्ते की दुकान में बिकने वाला सामान बनने लगा था। मिर्च वाली पकौड़ी बनने के लिए जवान मिर्चे पास रखे थे। दुकान वाला पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठा समोसे का मसाला बना रहा था। पास ही रहता है।
घर और दुकान दोनों अक्सर प्रशासन के लोग हटवा देते हैं। कभी-कभी प्रिंसिपल ही दुकान हटवा देते हैं। लड़कों को मनाही है यहाँ से सामान खरीदने की। गेट बंद हो जाता है। इन सभी प्रतिबंधों को धता बताते हुए बच्चे खरीद करते हैं। सामान बिकता है। पेट और बाजार अपने रास्ते में आने वाली हर दीवार में छेद करके रास्ता बनाना जानते हैं।
उदास से खड़े जीआईसी के एक हिस्से को सौंदर्यीकरण अभियान के तहत खूबसूरत सजाया गया है। कृत्तिम घास और ऊंची दीवार। खूबसूरत नजारा। पीछे खड़ा बदरंग स्कूल अपने एक हिस्से को चमकता देखता होगा। अपने पूरे हिस्से को सौंदर्यीकरण होने के दिन गिनता होगा।
खिरनी बाग में एक जगह सीता रसोई की सूचना लगी दिखी। पता चला कोरोना काल में शुरू हुआ काम अब भी जारी है। इतवार को दोपहर को खिचड़ी बनती है। मुफ्त बंटती है। जब तक खत्म नहीं होती तब तक।
इस काम में कभी-कभी कोई अन्य लोग भी सहयोग कर देते हैं। कभी कोई पनीर के पैसे दे देता है, कभी कढ़ी जुड़ जाती है। लोगों की श्रद्धा पर निर्भर है। नियमित खिंचड़ी है, बाकी सब अनियमित।
रसोई के काम में मुख्य भूमिका जिनकी है वो एक स्कूल में अध्यापक हैं। खाना बनाने वाले को 300-400 दिए जाते हैं। दस किलो करीब चावल, दाल के साथ चलती है सीता की रसोई।
जिस जगह सीता की रसोई चलती है वहां चबूतरे पर मंदिर है। उसके आसपास के पार्क में आसपास के लोगों ने अपने-अपने घरों का मलवा फेंक रखा है। जिसके पास जो है वही तो देगा । कोई खाना खिला रहा है, कोई कूड़ा डाल रहा है। पार्क कूड़ा घर जैसा बन गया है।
सदर बाजार में दुकानें खुलने लगी हैं। दूधिये दूध का लेन-देन कर रहे हैं। एक जगह जलेबी छन रही थीं। जलेबी जिस ट्रे में रखी थी वह थोड़ी तिरछी थी। ताजी निकली जलेबियों से बहता हुआ सीरा एक डब्बे में जमा हो रहा था। ताजी , गर्म , सीरे को डब्बे के लिए विदा करती जलेबियों का सौंदर्य वर्णन करना मुश्किल काम है। गूंगे का गुड़ है। जो देखे और खाये , वही उसको देख, समझ सकता है।
आगे एक चबूतरे के पास तीन कूड़ा बीनने वाली महिलाएं और एक बच्चा बैठे थे। बच्चा नाली के ऊपर , चबूतरे पर बैठा पैर हिलाते हुए सीटी बजा रहा था। उसकी सीटी सुनने के बहाने हम वहां रुककर बतियाने लगे।
कूड़ा बीनने वालीं सुबह से निकली थीं। अब कूड़ा बीनकर वापस जाने वाली थीं। अलग-अलग तरह का कूड़ा, अलग-अलग भाव जाता है। दो रुपये किलो से लेकर दस रुपये किलो के भाव। सौ-दो सौ रुपये मिल जाते हैं रोज के।
बात करते हुए देखा पैर हिलाते बच्चे का संतुलन बिगड़ गया। पैर नाली के पानी में डूब गया। सब हंसे। बच्चा भी। इसके बाद उसने पास के हैण्डपम्प से पैर धोए। इस बीच महिला ने रिक्शा मंगा लिया और कूड़ा लदवा कर बैठ गयी। पचास रुपये तय हुए।
कूड़ा लदवाते हुए महिला रिक्शे वाले से बोली -'ठीक से लादना, कल फाड़ दिया था बोरा।'
बोरा लदने के बाद महिला भी बैठ गयी। साथ में बच्चा भी। चल दी कूड़े को कबाड़ी को बेंचने के लिए। बाकी दो के पास कम था कूड़ा। बोली -'हम ऐसे ही ले जाएंगे।'
रिक्शे में जाते हुए महिला को एक जगह पैकिंग का डब्बा दिखा। उसने रिक्शा रुकवाकर बच्चे को भेजकर डब्बा उठवाया। कूड़े में शामिल किया। यह भी बिकेगा। आगे बढ़ी। चलते हुए बताया कि उसका आदमी भी यही काम करता है। केवल सुबह के समय कूड़ा बीनती है। बाकी दिन घर का काम। रोज के सौ-दो सौ मिल जाते हैं।
बच्चे को स्कूल भेजने की बात पर हंस दी वह। आगे बढ़ गई।
आगे बाजार में दिहाडी मजदूर अपने लिए ग्राहक का इंतजार कर रहे थे। ग्राहक नदारद थे। हर तरफ मजदूर ही मजदूर दिखे। एक ने बताया -'आजकल बहुत मंदी है। कोई काम नहीं मिल रहा।'
एक दुकान पर एक आदमी पेंटिंग कर रहा था। सीढ़ी लगाए। उसका पेंट का सामान नीचे रखा था। अक्षर मिलाते हुए दुकान का नाम लिखते देखते रहे कुछ देर। लगा कि इस काम को, जिसको हम बड़ा आसान मानते हैं, में भी कितने घुमाव हैं।
आगे चाय की दुकान पर पंकज मिले। बहुत दिन बाद मिले। बोले -'आपकी जयपुर की पोस्ट पढ़ी थी। जंगल में चाय पीने वाली।'
हमको तमाम लोग बताते हैं कि आपकी पोस्ट पढ़ते हैं। लाइक और कमेंट देखकर लगता है कि कम लोग पढ़ते हैं। लेकिन बताते हैं लोग तो लगता है कि हमारी पोस्टों के 'गुप्त पाठक' भी हैं जो चुपचाप पढ़ते हैं, बिना अपनी प्रतिक्रिया दिए।
पंकज का गाना छूट गया है। दुकान, रोजी, रोटी के चक्कर में शौक दुबक गया। जिस लड़के को गाने का इतना शौक हो कि उसके लिए घर से पैसा लगाकर बैंड बनाये, वह काम में इतना मशगूल हो जाये कि गाना ही भूल जाये, यह भी अपने में एक विडम्बना है।
आगे रजाई में भरने वाली रुई धुनने, भरने की दुकानें खुल गयी हैं। लोग जमा होने लगे हैं रुई धुनवाने, बनवाने के लिए।
जाड़ा दस्तक देने लगा है।
बस स्टैंड के पास रेलवे क्रासिंग बन्द है। लोग सर झुकाकर या बगलिया कर निकल रहे हैं। क्रासिंग पर ही मांगने वाले भी बैठ गए हैं। एक मांगने वाले के हाथ कुष्ठ रोग के कारण खराब हो गए हैं। आंखें भी खराब हैं। वह जोर-जोर से आवाज लगाकर मांग रहा है। अधिकतर लोग उसको अनदेखा/अनसुना करके निकलते जा रहे हैं।
शहर जाग रहा है। इतवार की गुनगुनी धूप में अंगड़ाई लेते हुए उठ रहा है।

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Sunday, December 05, 2021

सुबह की धूप में नहाती नदी



सुबह की शुरुआत सुबह की सैर के साथियों से मुलाक़ात से हुई । पहुँचते ही फ़ोटो बाज़ी हुई। फटाफ़ट फ़ोटो। जो लोग वापस चल दिए थे उनमें से कुछ लौट आए फ़ोटो के लिए। बेंच, चबूतरा बन जाने से लोग खुश थे। तराई हो रही है बेंच, चबूतरे की। एकाध दिन में बैठने लगेगें लोग उस उन पर।
बग़ल की बेंच पर मुंशी जी बैठे थे। बातचीत होते ही उन्होंने फिर घोषणा की -' 95 लोग बेवक़ूफ़ हैं।' लोगों की संग्रह की बढ़ती आदत का उल्लेख करते हुए बोले मुंशी जी -'अगले पल की खबर नहीं, सामान सौ बरस का।' देखा-देखी खर्च करने की आदत पर भी नाराज़गी ज़ाहिर की मुंशी जी ने।
शाहजहाँपुर गर्रा और खन्नौत नादियों के बीच स्थित है। खन्नौत नदी कैंट के पास से ही बहती है। आज मन किया नदी दर्शन किया जाए। पता किया तो थोड़ी दूर ही सड़क किनारे से रास्ता है नदी का। चल दिए।
सामने सूरज भाई अपने आगमन की सूचना दे रहे थे। उनकी अगवानी में आसमान लाल हो गया था। एकदम वीआइपी इंतज़ाम। दिशाएँ अपने नायक की अगवानी में लाल हो रहीं थी। मामला ख़ूबसूरत हो रहा था।
सड़क किनारे कई लोगों से पूछकर नदी के रास्ते उतर गए। धूल भरा रास्ता आगे कीचड़ सना हो गया था। बग़ल के खेत की सिंचाई हुई थी। बचा हुआ पानी पगडंडी पर आ गया था। जूते गीले हो गए। अग़ल-बग़ल कुछ कँटीले पेड़ भी मिले। रास्ता थोड़ा और ऊबड़-खाबड़ हुआ। यह भी लगा कि कहीं कोई जंगली जानवर न मिल जाए, हमला कर दे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कुछ देर में ही नदी दिख गयी। घर से कुल मिलाकर अधिक से अधिक दो किलोमीटर दूर होगी नदी। लेकिन नदी किनारे आने में दो साल गुजर गए।
नदी के पानी से भाप जैसी उड़ रही थी। लगा इतवार की सुबह धूप स्नान करती नदी चाय पी रही है और उसके कप से भाप उड़ रही है। फूंक-फूंक कर चाय पी रही है नदी। यह भी हो सकता है नदी सुबह-सुबह भाप स्नान कर रही हो। बीचोंबीच सूरज भाई नदी में नहा रहे थे। जिस जगह डुबकी लगा रहे थे सूरज भाई वह जगह ललछौंही हो गयी थी।
नदी में दो लोग कपड़े धो रहे थे। रोज़ आते हैं धोने। नदी में रखे पत्थर पर पटक-पटक कर धो रहे थे कपड़े। यह घाट पीपल घाट कहलाता है। पीपल घाट इसलिए क्योंकि पहले यहाँ एक पीपल का पेड़ था। बाढ़ में बह गया पेड़ लेकिन नाम घाट का पीपल घाट ही है। जहां पीपल का पेड़ था वहाँ अब बबूल के दो पेड़ खड़े हैं।
लौटने में खेत से होते हुए आए। रास्ते में एक साइकिल पर कपड़े लादे ले जाते अमित मिले। वो भी कपड़े धोने जा रहे थे। इतवार के दिन जाते हैं नदी किनारे कपड़े धोने। बाक़ी दिन फ़ैक्ट्री में काम करते हैं।
लौट कर सड़क के रास्ते आगे बढ़े। लोग अभी भी कसरतायमान थे। हवा खैंच रहे थे, छोड़ रहे थे। पेट अंदर बाहर कर रहे थे।
रास्ते में एक भाई जी ठेलिया पर तरह-तरह का सामान लादे दिखे। सामान क्या यह समझिए ठेले पर वालमार्ट लिए जा रहे थे। डाल-चावल-हल्दी-मिर्च-तेल आदि घरेलू उपयोग का सामान। पास के गाँव ले जाकर बेंचते हैं। बताया कि रोज़ के 300-400 बच जाते हैं। घर-घर जाकर सामान बेंचने का चलन पहले भी था लेकिन बाज़ार अब ज़्यादा तेज़ी से घर आ रहा है। सेवा से अधिक रोज़गार की मजबूरी ज़्यादा बड़ा कारण है इसके पीछे।
अगले मोड़ पर एक बच्चा साइकिल चलाता दिखा। क़द की कमी के कारण कैंची साइकिल चला रहा था। बार-बार सड़क से दूर घर तक आते-जाते साइकिल चला रहा था। पास ही एक बुजुर्ग हल्के-हल्के जागिंग जैसा कुछ करते हुए कसरतायमान थे।
आगे सड़क पर रुको, देखो और जाओ का अंग्रेज़ी अनुवाद का बोर्ड लगा था -STOP , LOOK, GO के LOOK (देखो) की जगह Luck (भाग्य) लिखा था। वैसे एक तरह से लिखत की चूक से अधिक यह सच भी है। सड़क पर चलते हुए सुरक्षित रहने में भाग्य का भी काफ़ी योगदान होता है।
मोड़ पर कुछ भैंसे बंधी थी। दूध बिकता होगा यहाँ। जाड़े से बचने के लिए वहाँ खड़े कुछ लोग और भैंसे दोनों ही आग की तरफ़ अपना पिछवाड़ा किए आग सेंक रहे थे। बग़ल में पूरी सड़क को घेर कर एक ट्रैक्टर खड़ा था। ट्रैक्टर से भूसा उतर रहा था। एक लड़का जो शायद ड्राइवर होगा ट्रैक्टर का, ट्रैक्टर के अगले पहिए पर बैठा मोबाइल में डूबा था।
मोबाइलिंग करते-करते ही लड़के ने बताया आजकल भूसा हज़ार रुपए टन आता है। एक ट्रैक्टर में क़रीब दस से बारह टन भूसा लद जाता है। अक्सर लोग दिमाग़ में भूसा भरने की बात करते हैं। पता नहीं कितना भूसा लगता है, दिमाग़ में भरने के लिए !
जहां भूसा उतर रहा था वहाँ सूरज भाई आसमान में ऊँचाई पर विराजमान थे जैसे उनको उतरवाई की निगरानी का काम सौंपा गया हो।
आगे चलकर फिर नदी की तरफ़ आ गए। नदी किनारे तमाम लोग कपड़े धो रहे थे। कुछ लोग किनारे और कुछ लोग नदी के बीच। पत्थर पर पटक-पटक कर कपड़े से मैल निकाला जा रहा था। गोया कपड़े को मैल की संगत की सजा मिल रही हो- 'तूने मैल से दोस्ती की कैसी?'
कपड़े धोने वालों में से एक ने बताया कि नदी कहाँ से आती है यह नहीं पता लेकिन इसमें पानी हमेशा रहता है। गर्मी के दिनों में भी पानी रहता है नदी में। आगे रिलायंस कम्पनी में भी नदी का पानी इस्तेमाल होता। वहाँ बत्ती (बिजली) बनती है।
नदी के पानी से निकलकर एक आदमी मसाले की पुड़िया खोलकर खा रहा था। पानी से निकलने के बाद भी पैर सर्दी के कारण उसकी जाँधे थरथरा रहीं थी। यह घाट गोला घाट, खन्नौत घाट कहलाता है।
नदी में कपड़े धोने के अलावा कुछ लोग किनारे साबुन लगाकर भी कपड़े धो रहे थे। बालू में गढ्ढे खोदकर उसको मोमिया (पालीथीन) से ढँककर पालीथीन का तब जैसा बना लिया था। उसी तब में डिटर्जेंट, साबुन डालकर कपड़े धो रहे थे। पालीथीन का टब -एक अनूठा जुगाड़।
जहां लोग कपड़े धो रहे थे, वहीं एक आदमी जगह-जगह घूमते हुए चींटियों के लिए चीनी और आटा डाल रहा था। हमने पूछा -'यहाँ चींटियाँ हैं कहाँ?'
वो झल्लाते हुए बोला -'हैं भाई, अभी आएँगी, खाएँगी अपना दाना-पानी।'
हमने जानकारी के लिए नाम-पता पूछना चाहा कि कब से खिला रहे चींटियों को दाना? वह बोला -'कुछ नहीं बताएँगे, न नाम न यह कि कब से खिला रहे हैं। फ़ोटो भी नहीं खिंचाएँगे।' कहते हुए घूम-घूमकर चींटियों को दाना डालने लगे।
कपड़े धोते लोगों ने उनके बारे में बताया -' दिन भर यहीं रहते हैं। चींटियों को दाना डालते हैं। शाम को वापस जाते हैं।'
आगे सड़क दिखने लगी। मकानों से निकली हुई गंदगी आहिस्ते-आहिस्ते नदी में दाखिल हो रही थी। शहर के बाहर के मकानों के बारे में धूमिल की कविता की तर्ज़ पर कहा जाए तो -'जिसका पिछवाड़ा देखा, गंदा ही पाया।'
नदी किनारे से उचककर आगे सड़क से जुड़ गए। सड़क पर शहर अपनी गति से भागता चला जा रहा था ।

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Saturday, December 04, 2021

लड़कियां इमली ज्यादा खाती हैं



'लड़कियां इमली ज्यादा खाती हैं, लड़के ज्यादातर मीठा खाते हैं, रामदाना, लईया पट्टी खाते हैं'
यह बात बताई रामकुमार राठौर ने जो मिले गोविंदगंज क्रासिंग के पार। ठिलिया पर इमली, चूरन, चटनी और दीगर सामान लादे चले जा रहे थे। ठिलिया पर रखे रिकॉर्डर पर गाना बज रहा था -'खुश हूं मेरे आंसुओं पे न जाना।'
करीब 35 साल से ठिलिया लगा रहे रामकुमार स्कूलों के बाहर सामान बेंचते हैं। छह महीने इमली, चूरन बेंचते हैं। बाकी दिन आइसक्रीम। लड़कियां और महिला टीचर्स इमली ज्यादा खाती हैं। लड़के मीठा सामान ज्यादा पसंद करते हैं। एस पी कॉलेज के लड़के अलबत्ता इमली पसन्द करते हैं। मतलब एसपी कालेज के लड़के स्वाद की पसन्द लड़कियों से मिलती है।
इमली गांव वालों से लेते हैं। ठिलिया लगाने के अलावा केटरिंग का काम भी करते हैं। काम ले लेते हैं, अगर खुद नहीं जा पाते तो भाई-भतीजों को भेज देते हैं। स्कूलों के अलावा गलियों में भी फेरे लगा लेते हैं। इतवार को छुट्टी रहती है।
मुंह टेढ़ा और एक आंख बाहर को निकली देखकर हमने कारण पूछा। पता चला बचपन में फालिज मार गया था। बहुत इलाज कराया लेकिन ठीक नहीं हुआ।
तीन बच्चियां हैं रामकुमार की। तसल्ली से सब बातों के जबाब देते रहे रामकुमार। सामान लगाते रहे। स्कूल खुलने के पहले दुकान सजा लेनी है। सुबह घर से निकलते हुए ऐसे ही सब सामान भर लिया था। निकल लिए थे।
रामकुमार से मिलने के बाद यह विचार मन में आया कि फालिज मारने के बाद चेहरा बेतरतीब सा हो गया लेकिन रोजी-रोटी के लिए किसी के मोहताज नहीं। तीन बच्चियां भी हैं। लेकिन अगर यही कहानी किसी महिला के साथ होती तो क्या उसका घर बसता ? उसकी जिंदगी कैसी गुजरती?
आगे ही एक महिला सड़क पर झाड़ू लगा रही थी। सड़क का कूड़ा किनारे लगाते हुए कुछ सोचती जा रही थी। वहीं सामने से एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ चल रहा था। उसके एक पैर में चोट लगी थी। शायद कोई गाड़ी चढ़ गई हो। ऐसा अक्सर होता है। क्या पत्ता कुत्ते अपनी चौपालों में इस बात और चर्चा करतें होंगे कि नहीं कि इंसान की इस मनमानी का कैसे मुकाबला किया जाए?
गोविंदगंज क्रासिंग पर ही आते-जाते कई ट्रेनें दिखीं। एक ट्रेन आधी निकली तब तक दूसरी तरफ से दूसरी दिख गयी। शाहजहांपुर बालामऊ पैंसेजर चलते हुए अचानक रूक गयी। गार्ड के डिब्बे के पीछे के डिब्बे में एक महिला सवारी चढ़ी। गार्ड ने तसल्ली से चढ़ने की हिदायत दी। सवारी चढ़ने के बाद गाड़ी चली।
लौटते में भी क्रासिंग पर ट्रेन मिली। स्कूल के लिए जाते बच्चे, सुबह की सैर को निकलते लोग और बिजली विभाग की लंबी सीढ़ी ले जाता आदमी दिखा। ऊपर पुल पर कारें और दीगर सवारियां गुजर रहीं थीं। पुल के नीचे बने मंदिर के सामने सड़क पार से एक आदमी मंदिर के देवी-देवाताओं को दूर से 'रिमोट प्रणाम' कर रहा था।
सड़क पर कुत्तों और बन्दरों में कुछ देर खौखियाहट होती दिखी। दोनों में शायद वर्चस्व की लड़ाई होगी। दोनों की पूंछे झंडे की तरह खड़ी हो गईं। लेकिन जल्द ही दोनों पक्ष शांत होकर साथ टहलने लगे। जानवरों और इंसानों में शायद यही अंतर होता है। जानवर अपनी लड़ाई बेफालतू आगे नहीं बढाते।
फुटपाथ के पास बने घरों में से एक घर के सामने कुछ लोग अलाव ताप रहे थे। अलाव की आग बुझ थी। लेकिन गर्मी शायद बाकी होगी। बुजुर्ग महिला छोटे बच्चे को दुलराते हुए उससे खेल रही थी। बच्चा भी मुस्करा रहा था।
सड़क पर दो बच्चियां टहलती दिखीं। वापस लौट रहीं थी सैर करके। एक बच्ची दूसरी को उलाहना दे रही थी -'तुम रोज जल्दी वापस चलने को कहती हो।'
सामने से तेजी से सीतापुर वाले मुंशी जी आते दिखे। बोले -'आज देर हो गयी। बुजुर्ग आदमी हूँ। कभी देर हो जाती है।' मुंशी जी ने यह भी बताया कि 35 साल से टहल रहे हैं, बिना नागा। यही तो एक आदत है जो बनी हुई है।
स्कूल के बच्चे साइकिलों, ऑटो में जा रहे थे। कई ऐसे लोग भी होंगे जो बच्चों को स्कूल पहुंचाने का काम करते होंगे लेकिन उनके खुद के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते होंगे।
निकलने के पहले सुबह की सैर वाले साथी मिले। मैदान पर चबूतरा बन जाने से खुश थे साथी। बेंच भी जल्द ही बन जानी चाहिए।
बगल से सूरज भाई आसमान से मुस्कराते हुए देख रहे थे। शायद कह रहे हों -'बढ़िया जा रहे हो। ऐसे ही टहलते रहो।'

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Friday, December 03, 2021

सुबह की सैर के बहाने



आज सबसे पहले मुलाकात हुई सुबह की सैर के साथियों से। रोज सुबह शहर से सैर के लिए निकलकर रामलीला मैदान पर मुलाकात होती है सबकी। साथियों के जन्मदिन, शादी की सालगिरह मनाई जाती है। राष्ट्रीय पर्व और अन्य त्योहार भी मनाए जाते हैं। केक भी कटते हैं, मिठाई भी बंटती है। हर्ष और उल्लास का आयोजन स्थल है रामलीला मैदान की वह बेंच जो इस समूह की मिलन स्थली है।
डॉ त्रेहन संस्थापक संचालक हैं इस समूह के। इंद्रजीत जी बाद में जुड़े। करीब 50 साल से जारी है सुबह की सैर के बहाने मुलाकात का सिलसिला। सदस्य आते, जाते, जुड़ते, बिछुडते गए होंगे। लेकिन समूह चल रहा है। सुबह 6 से 7 सामान्य समय है मिलने का। कभी देर-सबेर भी हो जाती होगी। लेकिन सिलसिला बदस्तूर जारी है।
पहले अंदर कैंट तक भी जाते थे। पास बना था। फीस पड़ती थी। कोरोना काल में अंदर जाना बंद हो गया। अब कोरोना का प्रकोप कम हुआ। अंदर सैर का सिलसिला फिर शुरू हो सकता है। लेकिन अब यहीं मजा आता है। यहां फोटो , आनन्द मनाने की जो आजादी है वह कैंट के अंदर कहां। इसलिए यहीं तक सही।
आज सुबह पहुंचते ही ग्रीन टी भी मिली पीने को। रोज बंटती होगी।
अनेक वर्षों से चल रहे समूह के साथ अनगिनत कहानियां-किस्से जुड़े होंगे। लोगों की यादें जुड़ी होंगी। यह बेंच भी आने वाले समय में पुलिया की तरह यादगार होगी शायद।
आगे निकलने पर लोग टहलते हुए, सांस लेते हुए, छोड़ते हुए और कसरत करते दिखे।
स्कूल जाते बच्चे साइकिलों पर आते दिखे। एक बच्चा साइकिल के हैंडल पर अपनी नोटबुक पढ़ते साइकिल चलाते दिखा। शायद उसका टेस्ट होगा आज। आखिरी क्षण तक पढ़ाई में तल्लीन बालक।
सीतापुर वाले मुंशी जी बेंच पर बैठे दिखे। हमको देखते ही बताने लगे -' आज 95% लोग बेवकूफ हैं।'
हमारी तरफ देखकर ही कह रहे थे इसलिए साफ है कि हमको 95% में शामिल करते हुए कह रहे थे अपनी बात। मुंशी जी का मानना और कहना है कि आजकल लोग शादी व्याह में अनाप-शनाप पैसा खर्च करते हैं। फिजूलखर्ची करते हैं। इससे अच्छा लड़का-लड़की के नाम पैसा जमा कर दें। हजार पन्द्रह सौ रुपया प्लेट खाना मिलता है। हजार पांच सौ बराती बुलाये जाते हैं। इससे बड़ी बेवकूफी और क्या हो सकती है।
मुंशी जी आजकल के लड़के-लड़कियों, जो दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह हजार के मोबाइल लिए घूमते हैं, पर भी काम भर के नाराज दिखे। आजकल शादी-ब्याह पर फिजूल खर्ची को कोसते हुए मुंशी जी अपने जमाने में चले गये जब बारातें चार-चार, पांच-पांच दिन की होती थीं। शादी-ब्याह में 'गारी' गाई जातीं थीं। इस बात से जबरदस्त शिकायत है मुंशी जी को कि आजकल के लोगों को यह पता ही नहीं कि शादी-ब्याह में गारी होती क्या थीं?
मुंशी जी का मानना है कि कोरोना काल की पांच-पच्चीस लोगों की पाबंदी शादी व्याह में हमेशा के लिए लागू हो जानी चाहिए।
आगे अपने घर के सामने एक तसले में लकड़ियां जलाते, आग तापते चाय पीते बुजुर्गा दिखीं। उनके सामने उनके घर का बच्चा तसल्ली से फुटपाथ पर ही निपटते दिखा। सुलभ शौचालय और स्वच्छता अभियान के सारे नारे आत्मसमर्पण करते हुए कहीं मुंह छिपा रहे होंगे। बच्चा बिना किसी संकोच के हल्का हो रहा था।
पोस्ट करते हुए याद आया कि आज दो साल हो गये शाहजहांपुर आये। इन दो सालों में अनेकानेक खुशनुमा एहसास हुए। सब एक-एक करके सामने से गुजर रहे हैं। सूरज भाई भी मेरे साथ उनको देखते हुए मुस्करा रहे हैं।

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Thursday, December 02, 2021

आखिरी झटके का लौंडा और गन्ना चूसता बन्दर



'आखिरी झटके का लौंडा है इसीलिए फुर्तीला है।'
पुड़िया और चाय की संयुक्त गुमटी पर मसाले की पुड़िया लटकाते हुए बच्चे की तरफ इशारा करते करवाते हुए एक जन बोले। बच्चा इससे बेपरवाह मसाले की लटें बिजली की झालर की तरह लटकाता रहा।
बिजली की झालरों में तो चीनी झालरों की भरमार है। लेकिन पान मसाला बनाने में तो कनपुरिये ही अव्वल हैं। यहाँ चीन कहीं नहीं टिकता।
'आखिरी झटके का लौंडा' किसी आदमी की आखिरी सन्तान होगी। पेटपोंछना बच्चे का पुल्लिंग शब्द युग्म है -'आखिरी झटके का लौंडा।'
खड़े होकर उनकी बातें सुनने के बाद फोटो खींचने लगे तो बच्चे ने मुंह छिपा लिया। एक बोला -'कल अखबार में छपेगी फोटो। बाल श्रम कानून के उल्लंघन की खबर के साथ।' साथ के लोग हंसने लगे। बच्चा भी मुस्कराया।
'अरे घर के काम करना बाल श्रम में थोड़ी आता है। बच्चा स्कूल जाता है। सुबह दुकान आ जाता। काम के बहाने कसरत हो जाती है।' -दूसरे ने बच्चे का वहां होना सही ठहराते हुए कहा।
भगौने में चाय बन रही थी। स्टोव के किनारे अर्धचन्द्राकार टीन की चाहरदीवारी सी उठी थी ताकि लपटें सामने न जाएं। चाय बनाता हुआ आदमी आग की लपटों और चाय की भाप से हाथ सेंक रहा था।
सड़क पार एक बालक अपनी दुकान के सामने का कूड़ा झाड़ू लगाते हुए आगे खिसका रहा था। अपनी दुकान के सामने की सफाई करते हुए पड़ोस गन्दा कर रहा था। इस मामले में उसकी हरकत विकसित देशों की तरह ही लगी जो अपना सारा कूड़ा करकट तीसरी दुनिया के देशों में ठेलती रहती हैं। हालांकि बालक इस मामले में उदार है कि वह बगल की दुकान वाले से अपने कूड़े की कीमत नहीं मांग रहा था। विकसित देश तो अपने कूड़े के ऊंचे दाम वसूल लेते हैं।
पास में स्कूल जाती दो बच्चियां दिखीं। एक की सायकिल की चेन उतर गयी थी। उसको दुकान वाला चढ़ा रहा था। बच्चियां चेन चढ़ने का इंतजार करते हुए अपनी सहेलियों के बारे में बतिया रहीं थीं।
चौराहे पर दो बाइक और एक स्कूटी पर कुछ बच्चे दिखे। सब बिना हेलमेट के। बच्चे किसी का इंतजार करते हुए रुक गए। हमने भी रुककर हेलमेट की अनिवार्यता और जरूरत पर सलाह दी। बच्चों ने उसे बेफालतू की बात वाले अंदाज में ग्रहण किया। स्कूटी वाले ने बाइक वालों के तेज चलाने की शिकायत की। सबके पास दूसरों की कमियों की फेहरिस्त सहज सुलभ होती है।
सड़क पर एक बंदर परिवार टहलता हुआ जा रहा था। एक बन्दरिया अपने बच्चे को पीठ पर बस्ते की तरह लादे हुए टहल रही थी। आगे चलता बन्दर अपनी पूंछ को झंडे की तरह फहराते हुए चलता अपने परिवार को नेतृत्व प्रदान कर रहा था। क्या पता बंदरो के समुदाय में चुनाव होते या नहीं। होते होंगे तो किसी इसी तरह के बन्दर के नेतृत्व में आस्था व्यक्त करते हुए वोटिंग होती होगी।
दूसरी तरफ सड़क पर एक बन्दर गन्ना चूस रहा था। गन्ना पास के खेत से उखाड़ा हुआ था। गन्ना गन्नों की बिरादरी में नवजात शिशु जैसा ही था। बन्दर उस नवजात गन्ने को बेरहमी और बेतकुल्लुफी से चूसते हुए उसके सड़क पर फेंकता जा रहा था। स्वच्छता अभियान की धज्जियां उड़ा रहा था।
पास के पेड़ पर चिड़ियां चहचहा रही थीं। उचकते, फुदकते और उड़ते हुए पेड़ पर उछलकूद कर रही थीं।
एक जगह सड़क किनारे नाली जैसी जगह की धूल में एक कुत्ता सुबह की नींद ले रहा था। मलाई नींद। उसको कोई जगाने वाला होता तो जगाता कहते हुए :
'उठो लाल अब आंखे खोलो
पानी लाई हूं मुंह धोलो।'
क्या पता हो भी कोई लेकिन कुत्ता उसको अनसुना करके यहाँ आकर सो गया हो।
सुबह निकलते हुए सुबह की सैर वाले साथी भी मिले। उन्होंने मैदान के पास बेंच बनवाने के वायदे के बारे में याद दिलाया। महीने भर पहले दिए आश्वासन को अभी तक पूरा न होने की शर्मिंदगी हुई। जल्द ही बनवाने के आश्वासन देकर आगे बढ़े।
टहलते हुए वापस आ गए गए। घड़ी ने बताया दो किलोमीटर टहल लिए। बैटरी 10% बची। बैटरी चार्ज होने के लिए लगा दी।
अपन तो टहलते हुए ही चार्ज हो गए।

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Tuesday, November 30, 2021

जंगल में चायबाजी



जयपुर में जब ट्रेकिंग के लिए निकले तो बस ऐसे ही निकल लिए थे। अंदाज नहीं था कि इतने बहुरंगी अनुभव होंगे। पहले तो शुरुआत में ही हांफ गए। फिर लगा पानी साथ में होना चाहिए। साथ के लोगों के पास बैग में था सामान। पानी भी। लेकिन हांफ और प्यास को जब्त कर लिया। पानी के लिए नहीं कहा यह सोचकर कि हमें खुद लगेगा- 'शुरुआत होते ही पानी मांग गए।'
संकरे जगह वाली चट्टान पार करते हुए लगा कहीं गिर गए तो गया सर। नुकीली चट्टाने सर का स्वागत करने को आतुर दिख रहीं थी जैसे चुनाव के मौसम में पार्टियां दूसरी पार्टी से आये लोगों का बांह फैलाकर स्वागत करती हैं। यह भी लगा कि ट्रेकिंग करते हुए हेलमेट भी होना चाहिए।
जब चटटान पर चढ़ रहे थे तो साथ के लोग हिदायतों की बौछार कर रहे थे। पैर इधर रखो, ऊपर थोड़ा, चटटान की तरफ मुंह करो, आहिस्ते चलो, इसको पकड़ो। हिदायतें ऐसी लग रहीं थीं जैसे गाड़ी चलाते हुए ड्राइवर को पीछे सीट पर बैठी सवारी टोंके -'दाएं मोड़, बाएं काट, आहिस्ता चल, आगे निकल।'
जब हम कोई काम कर रहे होते हैं तो ज्यादा हिदायतें बाज वक्त अवरोध का काम करती हैं। ध्यान बंटता है। मिल्खा सिंह जी का ध्यान दौड़ते समय खुद उनके ही कारण बंट गया था। पीछे वाले धावक को देखने में पिछड़ गए और रिकार्ड बनाने के बावजूद वे मेडल वंचित हो गए थे।
लेकिन यह बात तो हम अब कह रहे हैं जब हम सकुशल पार हो गए। अगर कुछ चोट लग जाती तो साथ के लोगों को कोसते -'बताना चाहिए था।'
इंसान बहुत चालाक आइटम होता है। अपनी हर बात को सही ठहराने के तरीके खोज लेता है।
जब हम पहाड़ी पार करके अपना सीना फूलाते हुए गर्वीली सांस ले रहे थे उसी समय हमसे करीब सौ फीट बहुत दुर्गंम ऊंचाई पर एक नौजवान एक पहाड़ी पार करता दिखा। हमको लगा कि अपनी किसी उपलब्धि पर सन्तोष व्यक्त करना तो ठीक लेकिन बहुत इतराना नहीं चाहिए। जिस समय हम अपनी किसी उपलब्धि पर इतरा रहे होते हैं, उसी समय कायनात के किसी दूसरे हिस्से में कोई उससे बड़ी उपलब्धि हासिल कर रहा होता है।
लौटते में चाय का हिसाब था। एक जगह पत्थरों के बीच चूल्हा जलाया गया। आसपास के पत्ते और लकड़ियां बीन कर आग सुलगाई गयी। थोड़े धुंए के बाद आग सुलग गई। खूबसूरत आग। आग देखकर एक बार फिर लगा, चूल्हे की आग दुनिया की सबसे खूबसूरत आग होती है।
चाय के लिए पानी और दूध गर्म होने लगा। तब तक एक साथी को पास के पेड़ पर मधुमक्खी का छत्ता दिखा। यह लगा कि धुएं से मधुमक्खी के छत्ते की मक्खियां निकलकर हमला कर सकती हैं। इस आशंका के चलते चूल्हे की आग बुझाई गयी। पास ही दूसरी जगह चूल्हा लगाया गया। आग जलाई गई। चाय बनी। छानी गई। पीना शुरू हुआ। बहुत स्वादिष्ट चाय। ऐसी चाय पीने के लिए बार-बार ट्रेकिंग पर जाने का मन करेगा।
चाय बनने के दौरान और पीने के समय भी गप्पाष्टक जारी रहा। स्थानीय राजनीति और इधर-उधर के किस्से। आसपास पत्थरों के सोफों और कुर्सियों पर बैठे हम लोग चाय का इंतजार करते हुए आनन्दित हो रहे थे। एक साथी ने मौके का उपयोग योग करते हुए किया। पास के पत्थर पर बैठकर योग करते हुए लम्बी-लम्बी सांसे पतंग की डोर की तरह खींचनी शुरू कर दी। दाएं से खींची, बाएं से खींची, सामने से खींची। मतलब हर तरफ़ की हवा खींचकर ऑक्सीजन ग्रहण कर ली।
चाय के एक दौर के बाद दूसरा दौर भी चला। तीसरा दौर तो नहीं चला क्योंकि तब तक चाय ख़त्म हो चुकी थी। लेकिन बची हुई चाय खत्म करने का जिम्मा हमने निभाया। समूह में। इतना सहयोग की भावना तो होनी चाहिए।
लौटते हुए जगह-जगह फोटोबाजी हुई। एक पेड़ के पास हम लोग अलग-अलग पोज में खड़े होकर फोटोबाजी किये। पेड़ भी सोचता होगा कि -"ये नामुराद हमारे ऊपर , दाएं-बाएं खड़े होकर फोटो खिंचा रहे हैं। अगर खड़ा होता तो पास से होकर निकल जाते। किसी की हिम्मत न होती हम पर चढ़ने की। "
सामने से सूरज भाई भी दिख रहे थे। उनको मुस्कराते हुए देखकर लगा मानो हमसे कह रहे हों -'बड़ा मजा आ रहा है।'
हम भी मुस्कराते हुए कुछ कहते तब तक माथे पर आई पसीने की बूंद बोल उठी -'यकीनन, कोई शक!'
अब इस बात का किसी के पास कोई जबाब है क्या ?

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Monday, November 29, 2021

जंगल में ट्रैकिंग


जयपुर में ट्रेकिंग के लिए उकसाया दोस्त Naresh Thakral नरेश ठकराल ने। हम भी पानी पर चढ़ गए। सुबह उठकर पहुंच गए विद्यार्थीनगर। वहां से पापड़ वाले हनुमान जी के पास से शुरु हुआ जंगल का सफर।
पापड़ वाले हनुमान जी का नाम वहां स्थित गांव के नाम पर पड़ा। पापड़ वाले हनुमान जी की प्रसिद्ध से जुड़ी कथा यह है कि यहां आई एक बाढ़ में जब आसपास के इलाके डूब गए थे, तब भी मंदिर बचा रहा। इस तरह की घटनाओं से ही मान्यताएं बनती हैं।
हमारे समूह में करीब 15 लोग थे। लगभग 40 से 70 साल की उम्र के । नियमित सैर करते हैं शनिवार को। समूह का नाम है -'फारेस्ट लवर्स' मतलब 'जंगलप्रेमी'।
शुरुआत में अंधेरा था। जमीन में निकली पेड़ों की जड़ों पर पैर पड़ने से मुंह के बल गिरते बचे। ऊपर और दाएं-बाएं कटीले पेड़ों में भी कपड़े फंसने का डर। मतलब चौतरफा देखकर चलने की चुनौती।
थोड़ी देर बाद रास्ते में रेत मिली। पैर रेत में धंसने लगे। रेत जूतों से होते हुए मोजे के अंदर घुसकर पंजो, तलुओं से गले मिलते हुए उनके हाल-चाल पूछने लगे। पैर बेचारे मजबूर। घुसपैठिया रेत को मजबूर होकर बर्दास्त करते रहे।
कुछ देर के बाद सांस लेने में समस्या होने लगी। मुंह खुल गया सांस लेने में। मुंह खोलकर सांस लेते हुए आवाज दूर तक सुनाई देने लगी। समूह के लोग सब आगे निकल गए। आगे निकलकर फिर रुककर हमारा इंतजार करते। हम फिसड्डी ट्रैकर के रूप में चलते रहे।
कुछ दूर तक रेत में चलते हुए इतना हांफ गए कि लगा कि कहीं सांस दाएं-बाएं हो गयी तो क्या होगा। अगर कुछ गड़बड़ हुई तो शहर तक कैसे जाएंगे। वहीं चलते-चलते कसम खाई कि अब से नियमित चलाई करेंगे ताकि ऐसी समस्या न आये।यह कसम हम कई बार खा चुके हैं,इसलिए एक बार और खाने में कोई हिचक नहीं हुई। कसम खुद से खानी थी इसलिए कोई दुविधा भी नहीं हुई। किसी और से खानी होती तो और भी कुछ नाटकीय अंदाज में कहना होता -'अगर कसम तोड़ी जो सजा दोगे वो मंजूर।'
थोड़ी देर में सांस सम पर आ गयी। तसल्ली से चलने लगे। आगे चलकर रास्ता पथरीला हो गया। हर पत्थर पर पैर रखकर आगे बढ़ना एक चुनौती। कहीं पैर फिसलता कहीं ठोकर लगती। किसी जगह पैर पत्ते पर पढ़कर नीचे धंस जाता। हर कदम पर एक चुनौती।
ट्रेकिंग करते हुए लगा -हर अगला कदम आपकी मंजिल है।
एक जगह बड़ी चट्टान पर चढ़कर रास्ता था। ठहरते हुए उस पर चढ़े। हिदायतों की बौछार में चढ़ना और कठिन हो जाता है। लेकिन सफलता पूर्वक रास्ता पार करके जो सांस ली उसको चैन की सांस कहते हैं।
आगे रास्ते के पत्थर और नुकीले होते गए। लेकिन तब तक अभ्यास हो गया था। एक जगह धंस गए पैर पत्थर और गड्ढे में। हम ठहर गए। जिसे पत्थरों ने स्टेच्यू बोल दिया हो हमको। साथ के लोगों ने सहारा देकर निकाला हमको।
करीब चार किलोमीटर के बाद एक कुंड मिला। कुंड का पानी हरा हो गया था। कुछ लोग उसके पास बैठे फोटो खिंचा रहे थे।
वहीं ऊपर पहाड़ी पर एक बाबा मात्र लँगोटी पहने मौका मुआयना वाले अंदाज में टहलते दिखे। कुछ देर हम लोगों को और आसपास देखा। फिर अपनी कुटिया में चले गए।
आखिरी बिंदु पर पत्थर की बड़ी चट्टान थी। उसके आगे रास्ता नहीं था। चटटान बर्फी की शक्ल में कटी थी। बरसात के दिनों में यहां झरना बन जाता है। पानी अपना रास्ता खोज कर आगे बढ़ता है।
सामने से सूरज भाई भी दिखने लगे। लगता है हमको देखकर मुस्करा रहे थे। हम भी उनको देखकर मुस्कराए। दोनों को मुस्कराता देखकर पूरी कायनात मुस्कराने लगी। 'मुस्कान अनुनाद' हो गया समझिए।
कुछ देर वहां रहने के बाद हम वापस लौट लिए। वापसी के किस्से आगे।

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Saturday, November 27, 2021

खबरों के पीछे का सच

 


सुबह-सुबह मैदान में जोर-जोर से ताली बजाते दिखे लोग। हमको लगा कोरोना के नए वैरियंट को आने के पहले ही भगाने का अभ्यास हो रहा है। दुश्मन के पांव जमाने के पहले ही उसके छक्के छुड़ाने का अभ्यास। नजदीक से देखा तो योग और अन्य गतिविधियां भी हो रही थीं। 20-30 लोग । इतनी सुबह नियमित आ जाते हैं कसरत करने हमारे लिए ताज्जुब की बात।
लेकिन ताज्जुब किस बात का। जिस काम को हम करना चाहते हैं उसको करने के हजार तरीके निकल आते हैं। कोई काम नहीं है मुश्किल जब किया इरादा पक्का।
बाद में पता चला कि यह एक स्कूल का खेल का मैदान था। जयपुर स्कूल। स्कूल में पढ़ने, काम करने वाले लोग ही रहे होंगे। एक जगह रहने वालों को साथ लेना सहज।
सड़क पर अखबार वाला घरों में अखबार डाल रहा था। साइकिल चलाते हुए बैग से अखबार निकाल कर घरों में थ्रो कर देता। जैसे क्रिकेट के मैदान में खिलाड़ी अंदाज से दौड़ते हुए गेंद थ्रो कर देते हैं। कभी विकेट पर लगती है, कभी दूर निकल जाती है।
हॉकर के फेके हुए अखबार अधिकतर घरों के अंदर गिरे। कुछ गेट, दीवार से टकराकर इधर-उधर छिटक गए। अखबार वाले ने इधर-उधर गिरे हुए अखबार उठाकर दुबारा फेंकने की जहमत नहीं उठाई। उसको तमाम अख़बार फेंकने थे।
अखबार फेंकते समय न्यूटन के क्रिया-प्रतिक्रिया के नियम के अनुसार साइकिल हिल जाती। सन्तुलन बिगड़ता। साइकिल वाला एक तरफ झुक कर फौरन फिर सन्तुलन बना लेता। अगले घर में अख़बार फेंकने लगता।
अखबार फेकने की फ़ोटो ली। पता नहीं क्या हुआ, अंधेरा था या क्लिक करते समय हाथ हिल गया, लेकिन फ़ोटो साफ नहीं आया। थोड़ा धुंधला गया। कुल मिलाकर जो फोटो साफ -सुथरी आनी चाहिए वह धुंधली होकर मॉर्डन आर्ट का बेहूदा नमूना होकर रह गयी।
अखबार वाले का धुंधला फ़ोटो आज के समय की खबरों की तरह लगा। यहाँ अखबार वाला वास्तव में है, हम उसको सामने देख रहे हैं। लेकिन फोटो देखने में चेहरा-मोहरा, भाव भंगिमा समझ नहीं आते।
आज की खबरों के भी यही हाल हैं। किसी घटना की खबरें इस तरह छपती, प्रसारित होती हैं कि सच क्या है ,पता नहीं लगता। हर खबरिया चैनल , अखबार उस घटना की ऐसी हिली हुई रिपोर्टिंग करता है कि बाज दफा पता ही नहीं चलता कि हुआ क्या है। जब तक खबर का सच पता चले उससे पहले ही दूसरी घटना घट जाती है। नई खबर हल्ला मचाने लगती है।
खबरों के पीछे के सच को छिपाने और बदरंग करने में ताली और गाली और समाज की जहालत का भी काफी योगदान होता है।
बहरहाल हमारी मंजिल न ताली सुनना था न ही अखबार का वितरण देखना। हम आये थे जंगल की सैर करने। हमारे मित्र नरेश ठकराल ने उकसा दिया कि आइए सुबह सैर कराते हैं जंगल की। हम चढ़ गए पानी में। देर रात एक विवाह समारोह से लौटने से बावजूद पांच बजे जग गए। मन किया करवट बदल के सो जाएं। लेकिन फिर फटाक से तैयार होकर निकल लिए। ये किस्से उसके बाद के, नरेश का घर खोजने के दरम्यान के।
आगे और पीछे के किस्से आगे आएंगे। आने चाहिये अगर आलस्य और काम के बोझ ने दबोच न लिया।

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Tuesday, November 23, 2021

दुनिया एक खूबसूरत किताब



सुबह जगने पर पहले लोग जम्हूआई लेते थे। अब सबसे पहले मोबाइल देखते हैं।सोते समय मोबाइल का नेट अगर खुला रहा तो आये हुए सन्देश और नोटिफिकेशन अपने देखे जाने के इंतजार में दुबले होते हैं। अगर नेट बन्द रहा तो खुलते ही संदेशे भड़भड़ाकर , चुनाव के समय पार्टियों के लुभावने वायदों की तरह मोबाइल पर हमला कर देते हैं। भगदड़ मच जाती है संदेशों में। एक के ऊपर एक लदते-फदते मोबाइल पर गिरते हैं। न जाने कितने चुटहिल हो जाते होंगे।
ऐसे ही एक नोटिफिकेशन दिखा -'आप मोबाइल के एडिक्ट तो नहीं हो रहे।' पढा तो सब बातें अपन के ऊपर लागू। आदत खराब बताई गई थी मोबाइल एडिक्ट होना। फौरन बन्द कर दिया मोबाइल। आज के जमाने में कौन शरीफ आदमी बुरा बनना चाहेगा ।
मोबाइल बन्द करके किताब उठा ली। तीन-चार किताब हमेशा बगल में धरे रहते हैं। जब मन आये कहीं से भी पढना शुरू कर देते हैं। कई बार तो पढ़ी हुई चीज फिर पढ़ जाते हैं। रोचकता से ज्यादा भुलक्कड़ी का योगदान है इसमें। तमाम किताबें पढ़े जाने के इंतजार में हैं।
किताब कुछ देर पढ़ी। रोचक थी। लेकिन अचानक मोबाइल की याद आ गयी। फौरन खोल लिया। खोलते ही याद आया, बार-बार मोबाइल देखना बुरी आदत है। लेकिन लगा कि इतना भी बुरा नहीं। कौन कोई देख रहा है। अकेले में बुरा बनना चलता है। दुनिया में तमाम खराब माने जाने वाले काम इसी बहाने होते रहते हैं -'कोई देख थोड़ी रहा है।'
बहरहाल मोबाइल में एक पिक्चर के बारे में सूचना दिखी। रोचक लगी। मन किया देखें। लेकिन फ़िल्म की अवधि घण्टे भर से ज्यादा थी। बाद के लिए टाल दिया।
अगला नोटिफिकेशन स्पेंसर ट्यूनिक के फोटो शूट का था। स्पेंसर ट्यूनिक अमेरिका के फोटोग्राफर हैं। ( https://youtu.be/YXIOgCreeA0 )कई जगह लोगों के बिना कपड़ों के फोटो खींचते हैं। सैकड़ों,हजारों की संख्या में लोग बिना कपड़े उनके शो में शामिल होते हैं। इजरायल में ' ब्लैक सी' की बदहाली पर ध्यान दिलाने की मंशा से न्यूड फोटो ग्राफी की थी स्पेंसर ने। तमाम फोटो शूट कर चुके हैं तब से। अलग-अलग मुद्राओं में बैठकर, लेटकर, खड़े होकर बिना कपड़ों के शूटिंग में शामिल होते हैं। आदमी और औरत दोनों।
एक इंटरव्यू में स्पेंसर ट्यूनिक ने बताया -'लोग इसका विरोध करते हैं इससे मुझे अपने मुद्दे पर फोकस मिलता है।'
कई फोटो सेशन देखकर मुझे कौतूहल हुआ कि फोटोग्राफी के लिए इतना तामझाम करने के लिए लोग इनके पास अपने आप आते हैं या भुगतान करना होता है इनको। कई कौतूहल और भी। दुनिया कितनी बहुरंगी है।
कुछ देर बाद मोबाइल छोड़कर फिर किताब उठा लिए। कुछ देर पढ़ते रहे। लगा इसी गति से पढ़ते रहे तो किताब तो खत्म हो जाएगी आज ही। हम इस आशंका से दहल गए। किताब खत्म हो जाएगी तो बचेगा क्या ? बन्द कर दी किताब।
हमारे पास अनगिनत बेहतरीन किताबे इसीलिए अनपढी, अधपढी रखी हैं कि लगता है ये खत्म हो गयीं तो बचेगा क्या? किताबें बचीं हैं तो लगता है दुनिया बची है। लेकिन किताबें तो पढ़ी जानीं चाहिए। सही है। लेकिन लगता है साथ हैं तो पढ़ भी ली जाएंगी कभी न कभी। किताबें ताबीज की तरह तमाम अलाय-बलाय से बचाने का एहसास देती हैं।
लेकिन सबसे बड़ी किताब तो यह दुनिया है। इसको नियमित बांचते रहते हैं। देखते रहते हैं। अलटते-पलटते रहते हैं। रोज नए किरदार मिलते हैं।
कल एक आदमी हमारे रामलीला मैदान की पानी की टँकी पर चढ़ गया। अपने बेटों से आजिज था। बेटे उसको मारते-पीटते थे। पैसे के लिए। पुलिस आई ,लड़के आये, उतारा। जब तक यह हुआ,तमाशबीन जमा होते रहे।
परसों रात टहलने निकले। लोग शहर से आकर यहां की बेंचों पर बैठकर बतियाते दिखे। मैदान में अंधेरा। हाई मास्ट लाइट बन्द। लगा कि अनदेखी होने पर कितनी चीजें अस्त-व्यस्त हो जाती हैं। कल रात जलती दिखी लाइट। मैदान खूबसूरत हो गया।
लौटते हुए रिक्शा स्टैंड पर एक आदमी बेंच पर सोता दिखा। पास ही स्कूटी खड़ी दिखी। स्कूटी से उतरे लड़के बगल की इमारत के पास खड़े किसी बात पर गाली गलौज कर रहे थे। बगल के मैदान में कुछ बच्चे बैडमिंटन खेल रहे थे। इन दोनों से बेखबर बेंच पर लेटा आदमी कम्बल ओढ़े आराम से सो रहा था।
यह तो कल-परसों की बात हुई। अब तो सुबह हो गयी। सूरज भाई सामने से पूछ रहे हैं -'दफ्तर नहीं जाना क्या आज?'
सूरज भाई तो खैर इसी तरह पूछते रहते हैं। कल एक मित्र ने पूछा -'सूरज देवता आपके भाई कैसे हुए?'
हमने सूरज भाई से पूछा क्या जबाब दें इसका ? बोले -'कह दो जैसे तुम्हारे लिए देवता हैं वैसे ही हमारे भाई हैं सूरज भाई।'
'वैसे हर बात का जबाब देना कोई जरूरी नहीं होता। मौन भी एक जबाब होता है' यह पुच्छला भी जोड़ दिया सूरज भाई ने अपने जबाब में।
हम कुछ कहें तब तक सूरज भाई आसमान में चढ़कर मुस्कराने लगे।

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