Thursday, January 15, 2026

सपने में कार

 


आजकल सपने भी मजे लेने लगे हैं। बहुरंगी। बहुधंधी।भेष बदल-बदलकर आने लगे हैं। झाँसेबाज़ नेताओं की तरह। सपना न हुआ चुनावी वादा हो गया। कर दो। चुनाव के बाद कौन पूछता है।

नए सपने में देखते क्या हैं कि अपन कार चला रहा हैं। संभल नहीं रही है कार। हम हैरान। कार बार-बार बहक रही है। मानों कार न हुई देश हो गया जिसे बड़े लोग संभाल नहीं पा रहे हैं।
बाद में पता चला कि अपन कार पीछे की सीट पर बैठ कर चला रहे थे। लगभग लेट जाने के बावजूद पैर ब्रेक और एक्सीलेटर पर ठीक से पहुँच नहीं पा रहे हैं। लेकिन यह बाद हमको तब पता चली जब हमारी कार दो पेड़ों के बीच जाकर फँस गई।
कार बस फंसी ही थी , भिड़ी नहीं थी इसलिए चोट-चपेट नहीं लगी। बाहर आए तब पता चला कि अपन कार पीछे की सीट से बैठकर कम लेटकर ज़्यादा हाँक रहे थे। आगे बढ़ती चीज हो पीछे से हाँकने से ऐसा होता है।
इस सपने का मतलब समझने की कोशिश की तो याद आया कि दो दिन पहले कार बाजार गए थे। लखनऊ के लालबाग में कार बाजार है। कार के सामान की तरह-तरह की दुकानें। रिपेयर के अड्डे।
अपन गए थे अपनी कार की बैटरी दिखाने। दो साल पहले कानपुर से खरीदी थी। आरिफ़ बैटरी सर्विस से। एमरान की बैटरी। बैठ गई थी। अभी गारंटी पीरियड में थी। दुकान वाले ने डिटेल भेज दिया। कहा -'चले जाओ , दिखा लो सर्विस सेंटर में। वो ठीक कर देंगे या बदल देंगे।'
हम गए। सर्विस सेंटर एक संकरी गली में था। कार से गए थे। वहाँ कहीं गाड़ी खड़ी करने का जुगाड़ ही नहीं था। जहाँ खड़ी करने का सोचो तो कोई डरा दे -'यहाँ मत खड़ी करो। नगर निगम वाले उठा ले जायेंगे।' हमने सर्विस सेंटर के कई चक्कर लगाए लेकिन कहीं कार खड़ी करने की जगह नहीं मिली। फिर सोचा पास में ही लालबाग पार्किंग में जमा कर देंगे कार। इसके बाद बैटरी जमा करके वापस लौट जाएँगे।
पार्किंग की तरफ़ जाते हुए लालबाग चौराहे पर जाम में फँस गए। हर तरफ़ गाड़ियाँ ही गाड़ियाँ। हर गाड़ी वाला आगे निकलने को बेताब। लेकिन आगे बढ़ना मुहाल। घंटे भर से ज़्यादा एक ही जगह खड़े रहे। लालबाग हमारे लिए बवालबाग बन गया। गाड़ी में बैठे-बैठे ही अपन ने कई बार कसमें खायीं कि अब कभी आना हुआ लालबाग तो ऑटो से आयेंगे।
काफ़ी देर बाद वहाँ एक फ़ोटोग्राफ़र आया। बीच चौराहे पर लगे बाल गंगाधर तिलक जी की मूर्ति के पास खड़ा होकर अपने कैमरे की गन से चारों तरफ़ की फ़ोटो शूट करता रहा। शायद किसी अख़बार का फ़ोटोग्राफ़र का रहा होगा। हमें लगा कि शायद कल के अख़बार में ख़बर आए। हम उसकी तरफ़ देखकर देर तक मुस्कराते रहे यह सोचकर कि क्या पता हम भी कल अख़बार में दिखें। दिखें तो मुस्कराते हुए दिखें। भले ही जाम में फँसे हों।
काफ़ी देर बाद जाम खुला। गाड़ियाँ सरकती हुईं आगे बढ़ीं। अपन लालबाग क्रासिंग की तरफ़ बढ़े। लेकिन वहाँ खड़े चौकीदार ने बाहर से हाथ डमरू की तरह हिलाते हुए बता दिए कि वहाँ गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं है। पार्किंग फुल है। बाद में देश के चौकीदार को डमरू बजाते हुए देखा तो पार्किंग वाला चौकीदार याद आया।
लालबाग पार्किंग फुल होने की सूचना के बाद मन किया घर लौट चलें। लेकिन फिर अचानक अयोध्याप्रसाद हरिऔध जी की कविता याद आ गई :
'देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं।
रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नही
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं।।'
यह भी याद आया कि 'भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं' को जबलपुर के दिनों में कंट्रोलर ऑफ़ फाइनेंस रहे Harsh Vaidya जी अक्सर दोहराते थे।
हरिऔध जी कविता ने घर वापस लौटने के इरादे को डपट दिया।अपन फिर हरज़रतंग पार्किंग की तरफ़ बढ़े। वहाँ गाड़ी खड़ी करके ऑटो से फिर लालबाग आए। इस बार चौराहा साफ़ था। बैटरी सर्विस सेंटर में जमा की। लौट पड़े।
लौटते हुए नुक्कड़ पर कुछ लोग छोटे-छोटे डब्बे टाइप के लिए बैठे थे। पता चला कि ये लोग गाड़ियों के टूटे बंपर रिपेयर करते हैं। बंपर कुछ हजार का मिलता है। रिपेयर कुछ सौ में हो जाता है। रिपेयर, रफ़ू वगैरह पुरानी चीजों को सहेजने के उपाय हैं। ये उपभोक्तावाद विरोधी हैं। समाज के तथाकथित आधुनिक होते जाने के साथ ग़ायब होने लगते हैं। पता नहीं कितनी देर चलेंगे।
घायल बंपर के रिपेयर की तैयारी करते हुए कामगार का वीडियो यहाँ देखिए। एक आदमी कहता सुनाई देता है -'कौन भाई साहब,दो हज़ार ढाई हज़ार का बंपर लेगा नया :
वहीं खड़े एक आदमी ने राजनीति से जुड़ी कोई ऊँची बात कही। अब वह भूल गई। राजनीतिक जुमले आजकल अल्पजीवी हो गए हैं। फ़ैक्स मशीन की स्याही की तरह। रोज़ पैदा होते हैं रोज़ मरते हैं। कीड़ों-मकोड़ों की तरह।
आगे नुक्कड़ पर शर्मा जी की कचौड़ी की दुकान दिखी। लखनऊ की शर्मा जी की चाय प्रसिद्ध है। हमें लगा यही दुकान है। भूख लगी थी। हमने दो कचौड़ी खाई। फिर चाय की फ़रमाईश की। उसने बताया कि चाय वहाँ नहीं मिलती है। आगे दुकान है चाय वाली। आगे देखा तो वहाँ जामा मस्जिद दिखी। पता चला कि और आगे है दुकान।
शर्मा जी की चाय के बारे में पहली बार Alankar Rastogi ने बताया था। वादा किया था कि उनका उपन्यास 'पंडित भया न कोय' लेने पर शर्माजी की चाय पिलायेंगे। साल बीत गया, लेकिन अलंकार की चाय अभी तक बकाया है।
शर्मा जी की चाय की दुकान पर काफ़ी भीड़ थी। दुकान कोरोना काल की याद दिला रही थी। चबूतरे पर दुकान के बाहर के फुटपाथ पर शर्मा जी की दुकान का कब्जा है। पता नहीं नगर निगम वाले यहां चाय पीने आते हैं कि नहीं। फुटपाथ के किनारे पर मेज़ों के काउंटर लगे हैं। लोग खड़े-खड़े चाय पी रहे थे। समोसा , बन मक्खन और चाय के साथ वाली चीजें।
शर्मा जी यहाँ कुल्हड़ की चाय 20/- की है। अपन ने चाय के साथ एक समोसा खाया। आसपास चाय पीते, समोसा वगैरह खाते देखा। लोग परिवार और दोस्तों के साथ खा-पी रहे थे। कुछ लोग पास बनी बेंचों पर बैठकर खा-पी रहे थे।
वहीं बने एक छुटके मंदिर के पास दो बाबाजी टाइप साधु बैठे थे। बुजुर्ग बाबा जी सर झुकाये दिखे। शायद दुखी मुद्रा में। उनके साथ के युवतर बाबाजी सामने देख रहे थे। उनको देखकर हमको 'स्वाभिमान यात्रा' की याद आई। लेकिन इसके साथ भी हमको परसाई जी के लेख का शीर्षक याद आया -'शर्म की बात पर ताली पीटना।'
शर्मा जी की दुकान से चलकर अपन हजरतगंज पार्किंग वापस लौटे। गाड़ी निकाली। बाहर निकलने के रास्ते का संकेत दिखा नहीं ठीक से। जो रास्ता दिखा उस पर बढ़ते गए। रास्ते पर बढ़ते हुए कुछ देर में देखा अपन पार्किंग की छत पर पहुँच गए। यह तो ऐसे ही हुआ विकास के रास्ते पर चलते हुए विनाश तक पहुँच गए। हज़ार साल आगे पहुँचने के लिए चलने के नाम पर हज़ार साल पीछे पहुँच गए।
बहरहाल, पता चलने पर धीरे-धीरे चलते हुए नीचे उतरे। पार्किंग के बाहर आए। घर पहुँचकर तसल्ली की साँस ली। आप भी ले लीजिए। साँस लेने वाली हवा भले ही प्रदूषण युक्त हो गई है लेकिन तसल्ली की सांस लेने पर अभी जीएसटी लागू नहीं हुआ है ।

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