Friday, January 30, 2026

शिलांग की शाम




 पुलिस बाजार पहुंचकर कुछ देर चौराहे पर खड़े होकर इधर- उधर देखते रहे। सभी दुकानों के शटर बंद थे। बंद दुकानों के सामने तमाम लोग तरह तरह के फुटकर सामान बेच रहे थे।

सड़क के दोनों तरफ टैक्सियों की लाइन लगी थी। ज्यादातर टैक्सी वाले गुवाहाटी की सवारियों के लिए आवाज लगा रहे थे। इनमें साझे की टैक्सी भी थीं और अकेले ले जाने वाली भी। कुछ टैक्सियां स्थानीय जगहों के लिए भी सवारी खोज रहीं थीं।
एक टैक्सी वाले ने मुझे इधर उधर ताकते देखा तो लोकल टूर का प्रस्ताव पेश कर दिया। पांच- छह जगहें गिना डालीं जहां वह अगले चार पांच घंटे में मुझे ले जाने वाला था। यह टूर उसने पंद्रह सौ रुपए में ऑफर किया। हमने सोचा चला जाए। बैठ गए टैक्सी में। चल दिए।
हमारी पहली मंजिल शिलांग पीक प्वाइंट थी। ऊंचाई पर स्थित इस जगह से शिलांग शहर का नजारा दिखता है।
रास्ते में ' शिलांग में देखने लायक जगहों में से एक' लेडी हैदरी पार्क पड़ा। टैक्सी रोककर हम उसे देखने के लिए उतरे। पता चला सोमवार होने के कारण पार्क बंद था। सोमवार को पार्क की साप्ताहिक बंदी होती है। हम लौट पड़े।
लौटने से पहले हमने पार्क के गेट से उचक कर पार्क के अंदर का नजारा देख लिया। अंदर पार्क था, बैठने की जगह थी, झूले थे और थोड़ा पानी का इंतजाम। 'बच्चा प्रधान पार्क'। हमने सोचा कि अच्छा ही हुआ पार्क बंद मिला। खुला होता तो इसे देखने में कम से कम आधा घंटा लगता। सामान्य से दिखने वाले पार्क को देखने में लगने वाले आधा घंटा और पार्क की फीस के रुपए खर्च करने से बचाकर अच्छा ही लगा।
पार्क के बाहर ही एक महिला गुब्बारे बेच रही थी। हमने सोचा एक खरीद ले। लेकिन सोच पर अमल किए बिना लौट लिए। लौटने के पहले गुब्बारा बेचने वाली महिला की फोटो जरूर खींच ली। उसने भी हमको फोकटिया समझकर कोई एतराज नहीं किया।
शिलांग पीक जाते हुए एलिफेंट झरने के पास से गुजरते हुए एक दिन पहले वहां की सड़क पर स्कूटी से गिरने की याद ताजा हो गई। अनायास हाथ घुटने की तरफ़ चला गया। हमने चोट को सहलाया। दर्द का आभास अभी भी बचा हुआ था। पिछले दिन के मुकाबले सड़क और रपटीली हो गई थी। लोग सरकते हुए आगे बढ़ रहे थे। हमने तसल्ली की सांस ली कि हम दुपहिया गाड़ी की बजाय चौपहिया गाड़ी में बैठे थे।
शिलांग पीक व्यू प्वाइंट पर पहुंचने पर पता चला कि गणतंत्र दिवस होने के कारण व्यू प्वाइंट बंद है। हमने सोचा व्यू प्वाइंट भी कोई बंद होने की जगह है। लेकिन हमारे सोचने से क्या होता है? वह बन्द ही था।।
हमको वहां खड़ा देखकर वहां टहलते हुए फुटकर सामान बेचने वाली बच्चियां और महिलाएं आ गई। एक महिला ने चेरी का पैकेट हमारे सामने हिलाते हुए दाम बताए- 'सौ रुपए के तीन।' हमने एक पैकेट ले लिया। उस महिला को पैसे दिए। उससे पूछा कि वहां चाय कहां मिलती है? उसने कुछ जवाब नहीं दिया। हमने दुबारा पूछा। वह बोली नहीं। फिर वहां खड़ी एक बच्ची ने बताया कि वह ऊंचा सुनती है।
हमने ऊंची आवाज में पूछा। उसने बताया कि चाय की कोई दुकान नहीं है वहां। हमने चेरी का पैकेट खोलकर एक चेरी उसको खाने को दी। उसने मना किया। ड्राइवर ने उससे लोकल भाषा में ले लेने को कहा। उसने ले लिया। खाने भी लगी। हमने और ड्राइवर ने और वहां मौजूद एक बच्ची ने भी चेरी खाई।
ड्राइवर ने हमारे कहने पर चिल्ला कर महिला का नाम पूछा। ड्राइवर ने उससे पूछकर बताया कि उसका नाम ' ना ' है। हो सकता है कि ड्राइवर ने कुछ और कहा हो लेकिन हमको ' ना ' ही समझ आया।
हम लौट पड़े। महिला ने 'लला फिर अइयो खेलन होरी' वाले अंदाज में अगले दिन फिर आकर शिलांग व्यू प्वाइंट देखने का निमंत्रण दिया।।हम मुंडी हिलाते हुए गाड़ी में बैठ गए।
हमारी अगली मंजिल वार्ड झील (Wards Lake) थी। ड्राइवर हमको वहां ले गया। सड़क पर गाड़ियों की भीड़ थी। ड्राइवर ने झील से करीब दो सौ मीटर पहले गाड़ी एक नुक्कड़ पर खड़ी कर दी। आगे जाना मुनासिब नहीं था। उसने हमसे कहा - ' आप घूम कर आओ। मैं यहीं इंतजार करता हूं।' हम झील की तरफ चल दिए।
झील के प्रवेश द्वार पर लोगों की लंबी लाइन लगी थी। सौ -डेढ़ सौ मीटर । लोग अनुशासन बद्ध होकर प्रवेश द्वार की तरह बढ़ रहे थे। झील के बाहर की सड़क और अंदर पार्क पूरा भरा था। लड़के, लड़कियां अपने दोस्तों - सहेलियों और परिवार के साथ घूमने आए थे। तमाम लोग झील में बोटिंग भी कर रहे थे।
अंदर पार्क में खाने-पीने के स्टॉल लगे थे। एक जगह स्टेज पर कुछ लोग गाना गा रहे थे। वहीं पर टाट के पर्दे लगे कई चबूतरे से बने थे। लोग इन टाट के पर्दों को स्क्रीन की तरह इस्तेमाल करते हुए फोटो खींच रहे थे। सेल्फी ले रहे थे।
वहीं एक महिला माइक पर कोई गाना गा रही थी-'जान भी मेरी तू है।' कुछ बच्चे उसके सामने डांस कर रहे थे। सामने एक डब्बा रखा था। लोग डब्बे में कुछ पैसे डालते जा रहे थे।
लौटते हुए एक लड़का और एक लड़की दिखे। गले में Young Leaders Dialogue का बिल्ला लटकाये हुए थे। पूछने पर पता चला कि वे राजभवन में गणतंत्र दिवस के प्रोग्राम में भागेदारी करके आए हैं। कुछ दिन पहले दिल्ली भी गए थे। मेघालय का प्रतिनिधित्व करने। दिल्ली में हुए कार्यक्रम में उन्होंने एक प्रस्तुति दी थी। प्रस्तुति का विषय ' भारत वर्षोंन्नति।कैसे हो सकती है 'जैसा था।
बच्चों से बात करने पर पता चला कि वे बीकॉम के छात्र हैं। शिलांग से करीब साठ किलोमीटर दूर एक गांव से राजभवन में सम्पन्न गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में भाग लेने आए थे। एक ही गांव के रहने वाले बच्चे राजभवन में होने वाले समारोह में भाग लेने के बाद घर लौटने से पहले घूमने आए थे। उन बच्चों से बाद में भी बात हुई और उनके बारे में जानकारी हुई।
झील से लौटते हुए एक बार फिर स्टेज की तरफ गए। गायक गाना गा रहा था । स्टेज पर बोर्ड लगा था -'मेघालय ग्रास रूट म्यूजिक प्रोग्राम।' लोग बैठकर, खड़े होकर गाने सुन रहे थे।गाना चल रहा था -'तू दे दे मेरा साथ थामे ले मेरा हाथ।'
हमने गाने का वीडियो बनाया। वीडियो बनाते हुए कैमरा श्रोताओं की तरफ भी घुमाया। मेरे पीछे खड़ी कुछ लड़कियां भी गाना सुन रही थीं। साथ में गा भी रहीं थीं। वीडियो बनाते हुए मोबाइल का कैमरा उनकी तरफ घुमा तो इनमें से एक ने असहज होते हुए मुंह बिचकाया। जबकि उसके साथ की दूसरी लड़की मुस्काती हुई कैमरे की तरह देखती रही। गाना पूरा होने तक हमने एक राउंड फिर श्रोताओं की तरफ घुमाया। लड़कियों की प्रतिक्रिया पहले जैसी ही थी। गाना पूरा होने पर हमने रिकॉर्डिंग बंद की। चलते समय उन बच्चियों की तरह देखा तो मुस्कराते हुए रिकॉर्डिंग देखने वाली बच्ची फिर से मुस्कराई। हमको एक बार फिर से लगा -' मुस्कराते हुए लोग कितने खूबसूरत लगते हैं।'
पार्क के बाहर आकर हम सेट मेरी कैथड्रल चर्च देखने गए। वहां सीढ़ियों पर तीन बच्चियां दो- दो करके फोटो ले रहीं थी। हमने उनका कैमरा लेकर तीनों का एक साथ फोटो खींच दिया। फोटो देखकर वे खुश हो गई। खूबसूरत बच्चियों का फोटो खूबसूरत आया था। फिर हमने उनसे पूछकर अपने मोबाइल से भी उनका फोटो खींचा । वह फोटो और खूबसूरत आया था । उसे देखकर वे और भी खुश हो गई। हमने उनको फोटो भेज दिया । वे फोटो बार बार देखकर खुश हो रही थी। हमने उनसे पूछा कि उनका फोटो अपने फेसबुक पर पोस्ट करने में उनको एतराज तो नहीं है ?
मेरे इस सवाल पर दो बच्चियों को तो कोई एतराज नहीं था। लेकिन तीसरी बच्ची को हिचक थी। उसने बताया -' उसके घर वालों को एतराज हो सकता है।' उसकी हिचक को देखकर मैने कहा -' ठीक है नहीं पोस्ट करेंगे।'
चर्च के अहाते में ईसा मसीह और मेरी की मूर्तियां थी। प्रार्थना घर में बेचें लगीं थीं। एक महिला खड़े-खड़े वहां रखे रजिस्टर में कुछ लिख रही थी। देर तक लिखती रही। उसके जाने के बाद मैने कौतूहल वश रजिस्टर देखा। उसने जो लिखा था उसका लब्बोलुआब था -' हे ईश्वर, आप ही मेरी बात समझ सकते हो। मुझे और मेरे बच्चों को सही रास्ता दिखाते रहना।'
उसकी प्रार्थना पढ़ने के बाद मुझे लगा कि शायद किसी दूसरे की प्रार्थना को पढ़ना नहीं चाहिए। ईश्वर और भक्त के बीच संवाद और संपर्क व्हाट्सएप के संदेश की तरह होते हैं। दोनों के अलावा किसी और को सुनाई दिखाई नहीं देना चाहिए। उनको किसी तीसरे द्वारा पढ़ना पाप हुआ। लेकिन अब क्या कर सकते हैं। हम ईश्वर से इस कृत्य के लिए माफी मांगते हैं। ईश्वर महान है वह जरूर हमें माफ करेगा।
चर्च के बाद हम लोग शिलांग का गोल्फ कोर्स (गोल्फ लिंक्स) देखने गए । शिलांग गोल्फ कोर्स, जिसे "पूर्व का ग्लेनीगल्स" (Glenn Eagle of the East) कहा जाता है, मेघालय की राजधानी शिलांग में स्थित एक ऐतिहासिक और सुरम्य 18-होल गोल्फ कोर्स है। 1886 में स्थापित, यह भारत के सबसे पुराने और सबसे खूबसूरत गोल्फ कोर्सों में से एक है, जो चारों ओर देवदार के पेड़ों और पहाड़ियों से घिरा है।
कुछ देर वहां रहने के बाद हम वहां से लौट पड़े। लौटने से पहले वहां का फोटो और वीडियो अपने मित्र अजय सिंह को भेजा और गोल्फ कोर्स के बारे में बताया। उन्होंने इसे अपनी विश लिस्ट में जोड़ लिया है। देखते हैं इच्छा सूची पर पूरी होने का टिक कब लगता है। जीवन में हम अपनी इच्छा सूची में अनगिनत इच्छायें जोड़ते जाते हैं। उनमें से कुछ पूरी होती हैं, बहुत कुछ अधूरी रह जाती हैं। अधिकतर के बाद में तो याद भी नहीं होता कि कभी यह हमारी इच्छा सूची में था भी।
गोल्फ कोर्स से लौटते हुए कुछ लोगों ने गाड़ी ने बैठने के लिए लिफ्ट मांगी। ड्राइवर ने लिफ्ट नहीं दी। हमने उससे कहा - 'एक दो सवारी बैठा लो। कुछ और कमाई कर लो।'
उसने कुछेक लोगों को लिफ्ट दी। कुछ कमाई की। आगे एक जगह एक साथ चार लोगों ने लिफ्ट मांगी। ड्राइवर ने दरवाजा खोल दिया। एक आदमी आगे बैठा। तीन पीछे। हमको लेकर पीछे कुल चार लोग हो गए। पीछे बैठी एक सवारी ने हमको धकिया कर सरकने के लिए कहा। हमने सोचा - ' अपनी ही गाड़ी में हम धकिया दिए गए। जब बेइज्जती है।'
कुछ देर बाद हम वापस पुलिस बाजार पहुंचे। ड्राइवर को पैसे दिए। ड्राइवर ने अपना नंबर दिया। हमने उसको सेव कर लिया। बाद में फोन मिलाने पर -' यह नम्बर मौजूद नहीं है की आवाज आती रही।' फर्जी नंबर रहा होगा।
पुलिस बाजार चौराहे पर सुंदर रोशनी हो रही थीं। चौराहे पर रोशनी में चमकते ' आई लव शिलांग ' के सामने खड़े होकर फोटो खिंचा रहे थे। मैंने चौराहे की फोटो खींचकर सुरक्षित रख की।
वापस लौटते हुए एक बड़ी इमारत के सामने दो लड़कियां और एक लड़का फोटो खींच रहे थे। लड़का लंबा था। लड़कियों की तुलना में काफी लंबा। फोटो खींचने के चक्कर में लड़कियों के बराबर दिखने की कोशिश में टेढ़ा हो रहा था। सड़क पर लंबलेट जैसा हो रहा था। पास से गुजरने पर हमने लड़के को सीधा किया और उसका कैमरा लेकर उनका फोटो खींच दिया। फोटो अच्छी आई। वे खुश हो गए।
पता लगा कि वे दिल्ली , चंडीगढ़ और बंगलौर की कम्पनियों में काम करते हैं। देश के तीन प्रदेशों की राजधानी के तीन लोग वर्क फ्रॉम होम सुविधा का फायदा उठाकर चौथी जगह ( शिलांग) महीनों से एक जगह टिके हुए हैं। दो कमरे के एक एयरविंग में तीनों लोग रह रहे हैं, काम कर रहे हैं। मेरे लिए यह कौतूहल का विषय है कि तीन अलग अलग जगहों में रहने में वाले लड़के-लड़कियां किसी चौथी जगह पर किराए पर रहते हुए काम करें। लेकिन मेरे ताज्जुब करने से क्या होता है? उसकी क्या औक़ात?
रास्ते में शिलांग का राजभवन दिखा। गणतंत्र दिवस के मौके पर जनता के देखने के लिए खुला था। लोग उसे देखने आए थे। राजभवन की शुरुआत में ही पानी का फ़व्वारा चल रहा था। लोग उसके पास खड़े होकर फ़ोटो खिंचवा रहे थे। पानी के फ़व्वारे मुझे हमेशा से अच्छे लगते रहे हैं। पानी बहता देखकर लगता है जीवन प्रवाह हो रहा है।
राजभवन देखने के बाद बाहर आए। टहलते हुए थकान महसूस हुई। एक दुकान के बाहर बैठकर चाय पी। दुकान पर एक बच्ची काम कर रही थी। साथ में बैठा बच्चे से बात करने पर पता चला कि वो ऐसे ही सहायता के लिए बैठा है। मध्यमवर्गीय सोच के हिसाब से मैंने कल्पना की उन बच्चों के बीच प्रेम संबंध के बीज पड़ रहे हैं।
चाय पीकर हम वापस लौट आये। लौटकर मेस में ड्राइवर से हुई बातचीत के बारे में सोचा। बंगाली ड्राइवर शिलांग में पैदा हुआ, पला ,बढ़ा है। 38 साल उमर। अभी तक शादी नहीं हुई। पिछले तीन-चार साल से 25 साल की एक स्थानीय लड़की से प्रेम संबंध हैं। यौन संबंध भी। छोटी बहन की शादी के बाद ख़ुद की शादी करेगा। अपने प्रेम संबंध के बारे में बहादुरी से बताया उसने कि उसने कैसे लड़की पटाई।
हमने उससे पूछा कि तुम्हारी बहन भी यहीं पली-बढ़ी है। उसके भी कोई प्रेम संबंध होंगे। उससे कर लेगी वह शादी। तुम इतने बूढ़े हो गए। शादी में देरी करना समझ में नहीं आता। तुमको कर लेनी चाहिए।
उसने कहा -'मेरी बहन का कोई प्रेम संबंध नहीं है। वह घर में ही रहती है। उसकी शादी के बाद ही दो-तीन साल में शादी कर लूँगा।'
दो दिन में एक नेपाली मूल के और एक बंगाली मूल के ड्राइवरों के प्रेम संबंध के वीरता पूर्ण आख्यान सुनकर लगा कि बाहर से आकर बसे लोगों ने स्थानीय रीति-रिवाजों और खुलेपन का फायदा उठाते हुए स्थानीय लड़कियों से संबंध बनाए। इसे अपनी उपलब्धि के रूप में विस्तार से बयान किया। मुझे खोया पानी का यह प्रसंग याद आया :
"बहुत तीर मारा तो ब्रिटिश नागरिकता हासिल करके वो रही-सही इज्जत भी गवां दी, जो टूरिस्ट या मेहमान होने के कारण उपलब्ध थी। ब्रिटिश पासपोर्ट और देशवासियों की बेबसी का प्रतिरोध लेने के लिए किसी अंग्रेज औरत से शादी कर ली और अपनी तरफ़ से सारे अंग्रेजों को नाड़े के रिश्ते में बाँधकर डाल दिया।'
लेकिन दो दिन के पर्यटन के आधार पर किसी समाज के बारे में कुछ धारणा बनाना उचित नहीं है। लेकिन इंसानी फ़ितरत के अनुसार जिसके बारे में कुछ नहीं जानते उसके बारे में धारणायें फौरन बनती हैं-'अज्ञानी का आत्मविश्वास तगड़ा होता है।'
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