गोहाटी में हम सेना की आफ़िसर्स मेस में रुके हैं। कल शहर से मेस के लिए ऑटो किया तो ऑटो वाले ने पूछा -‘ महाराज जी आते हैं उधर ?’
हमने कहा -‘ सुना है कि आते हैं। लेकिन हमने अभी तक नहीं देखा।’
यहाँ महाराज जी मतलब हाथी है। पास के जंगलों से यहाँ अक्सर हाथी आते रहते हैं। आराम से इधर-इधर टहलते हैं। जैसे मौक़ा मुआयना करने आए हों। ख़रामा-ख़रामा ठहलते हुए निकल जाते हैं। महाराज जी की चाल भी असमिया लोगों के व्यवहार की तरह होती है -लाहे-लाहे।
दिन में तो आसानी से दिख जाते हैं महाराज आते -जाते। लोग उनके रास्ते से अलग हो जाते हैं। आम तौर पर हाथी शांत ही रहते हैं। कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। लेकिन जब अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर चलते हैं तो बच्चों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील रहते हैं। उनको अपने संरक्षण घेरे में लेकर चलते हैं।
रात में अंधेरे में हाथी का रंग भी काला होने के कारण दिखता नहीं कि कब महाराज कहीं से निकलकर आपके बगल में खड़े हो गए। अपनी तरफ़ से भले को नुकसान न करें महाराज लेकिन अचानक जिसकी बगल में आकर खड़े हो जायें उसकी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो सकती है। इसलिए शाम को और रात को लोगों को सावधान रहने की सलाह दी जाती है।
कभी कोई खाने-पीने की चीज पसंद आ जाये तो महाराज उसे फिर से हासिल करना चाहते हैं। आफिसर्स मेस में एक दिन मक्खन खुला रह गया। महाराज जी ने उसका स्वाद लिया। उनको पसंद भी आ गया। अगले दिन फिर उन्होंने मेस के बर्तन टटोले। मक्खन मिला नहीं। मूड ऑफ़ हो गया महाराज जी का। उन्होंने मेस के बर्तन उलट-पुलट दिए। मेज़ कुर्सी खड़खड़ा दी। पटकते रहे। कुछ दिन ऐसा लगातार करते रहे। फिर जब अंदाज़ हो गया होगा कि कुछ मिलना नहीं तो उन्होंने मेस आना छोड़ दिया।
सेना के संस्थान जहाँ बने हैं , पहले तो यहाँ जंगल था। हाथी रहते रहे जंगल में। उनकी जगह पर इंसान ने अतिक्रमण कर लिया है। वे तो अपने इलाके में टहलते हैं। इंसान को देखकर अक्सर ही कुछ नहीं कहते। यह उनका बड़प्पन ही है।
महाराज जब निकलते हैं तो उनको देखकर सुरक्षा कर्मी सीटी बजाकर लोगों को सावधान कर देते हैं। जिस इलाके से गुज़र जाते हैं महाराज उस इलाके के सुरक्षा कर्मी सीटी बजाकर आगे वाले सुरक्षा कर्मियों को बजा देते हैं।
कल ऐसे ही अपने मित्र कर्नल रावत जी के यहाँ डिनर के लिए गए तो सीटी बजी। पता चला कि महाराज टहलने निकले हैं। हमने टेरेस से खड़े होकर देखा कि महाराज जी एक पेड़ के नीचे कुछ देर खड़े रहे। शायद कुछ सोच रहे हों। थोड़ी देर बाद वो टहलते हुए सड़क पर आए और खरामा खरामा चलते हुए अंधेरे में एकाकार होकर वापस चले गए।
आज सुबह कुछ लोग बात करते हुए सुनाई दिए -‘ कल रात को महाराज इधर दिखे थे।’https://www.facebook.com/share/p/14XAncS3QL1/

No comments:
Post a Comment