शिलांग में घूमने की शुरुआत सुंदर और घटनापूर्ण रही। पिछले दिन लगी घुटने की चोट सुबह तक रात की घटना की याद दिलाती रही। स्कूटी ड्राइवर से सुने हुए उसके प्रेम प्रसंग एहसास दिलाते रहे कि जीवन कितना बहुरंगी है।
सुबह 26 जनवरी थी। घूमने के लिए निकले तो सबसे पहले डॉन बास्को म्यूजियम जाने की सोची। गणतंत्र दिवस के कारण उसके खुलने पर संदेह था लेकिन फिर भी निकल ही लिए।
मेस के बाहर आकर उबर से गाड़ी बुक कराने के लिए देखने पर दुपहिया वाहन 65 रुपए और कार ढाई सौ रुपए से ज्यादा बता रहा था। पाँच किलोमीटर की दूरी के लिए ढाई सौ रुपए ज़्यादा लगे। बाइक बुक कर ली।
पाँच मिनट में बाइक बालक अपनी स्कूटी सहित आ गया। उचक कर पीछे बैठे तो लगा कोई हड्डी शरीर के किसी हिस्से से समर्थन न वापस ले ले। स्कूटी स्टार्ट होते ही न्यूटन बाबा के नियम के चलते हम पीछे हुए। लगा गिर जाएँगे। लेकिन गिरे नहीं। इसके बाद हम आगे ड्राइवर से सट के सीट को कस के पकड़कर बैठ गए।
सड़कें खाली थीं। बाजार बंद था। शिलांग की लहरिया दार सड़कों पर आगे बढ़ते हुए हर मोड़ पर लगता कि कहीं गाड़ी फिसल न जाये। कहीं अचानक ज़मीन से जुड़ना न हो जाये। इधर-उधर देखते हुए हम अपने इस डर को कम करते रहे। बालक ड्राइवर धैर्यवान था। हर स्पीड ब्रेकर पर गाड़ी आहिस्ते-आहिस्ते निकलता। झटके से बचाव करते हुए आगे बढ़ता रहा।
एक जगह टीले पर कब्रिस्तान दिखा। मेघालय ईसाई बहुल प्रदेश है। जगह-जगह ईसा मसीह की मूर्ति और ईसाई धर्मोपदेश लगे दिखे। सड़कों पर लोग बहुत कम दिखे। घरों में भी लोग लगता है अंदर ही बैठे हुए गणतंत्र दिवस मना रहे थे। तमाम घर छुट्टी के दिन के स्कूल की तरह लग रहे थे।
रास्ते में एक आदमी बहंगी पर कनस्तर में पानी लादे ले जा रहा था। चढ़ाईदार सड़कों पर बाल्टी में पानी ले जाना मुश्किल होता होगा।
म्यूजियम पहुँचे तो उसके बंद होने की सूचना लगी दिखी। हमने स्कूटी पहले ही छोड़ दी थी। कुछ देर वहीं म्यूजियम के अहाते में टहलते रहे। अपने बाद में आने वाले लोगों को म्यूजियम बंद होने की सूचना देते रहे। एक जोड़ा महाराष्ट्र से आया था। म्यूजियम बंद होने की सूचना से भन्नाया हुआ अकेले-अकेले फ़ोटो खींच रहा था। हमने उसको साथ खड़ा करके फ़ोटो खींच दिया। उसके भन्नाहट कुछ कम हुई। महिला तो मुस्करा भी दी। मराठी मानुष अलबत्ता अपने मुँह का दरवाज़ा बंद किए रहा। मजाल जो मुस्कान को बाहर निकलने दे।
एक युवा बंगाली जोड़ा मोटर साइकिल पर गुवाहाटी से घूमने आया था। म्यूजियम बंद होने से निराश था। गाड़ी में बैठे-बैठे उसने काफ़ी देर तक मुझसे बात की। फिर किक मारकर खुले हुए संस्थान देखने चला गया।
म्यूजियम पर कुछ देर बेमतलब घूमने के बाद बाहर सड़क पर आ गए। 'कहीं का भी जनजीवन वहाँ की सड़कों, दुकानों, बाजारों में होता है' यह याद करते हुए सड़क पर टहलने लगे। सुंदर धूप थी। इफ़रात समय। पैर मजबूत। लादने के लिए कोई वजन नहीं। निश्चिंत आगे बढ़ गए।
म्यूजियम के पास के ही एक घर में एक महिला अपने पति के साथ अपने बरामदे में खड़ी थी। हमने उससे बात करने के लिए म्यूजियम के बारे में जानकारी लेनी शुरू कर दी। उसने बताया गणतंत्र दिवस होने के कारण म्यूजियम बंद है। हमको यह बात तो पहले से ही पता थी। लेकिन हमने उसके मुँह से ऐसे सुना जैसे पहली बार सुना हो।
महिला पान खाये हुए थी। पान की पीक उसके होंठ की खिड़की से बाहर झांकते हुए उसके मुँह में पान के कुचले जाने की चुगली कर रही थी। आदमी अलबता साफ़ मुँह का था। बाद में कई जगह महिलायें पान बड़े शौक से और खूब खाती दिखी। बातचीत करते हुए महिला के साथ खड़ा आदमी किसी अभिभावक के साथ खड़े बच्चे की तरह चुप खड़ा रहा। महिला बतियाती रही। हमें लगा या कहीं हमने आशा की कि महिला कहेगी -'आइए आपको चाय पिलाते हैं।' लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं।
महिला को शायद एहसास हो गया कि अगला ज़बरियन गले पड़ने की कोशिश कर कर रहा है। यह भान होते ही उसने अपने आदमी का हाथ किसी छोटे बच्चे के हाथ की तरह पकड़ा और उसको अंदर ले जाते हुए मुझसे बोली -'ओके देन हैव ए नाइस डे।'
दो मिनट की उस महिला के साथ बातचीत से मुझे एहसास हो गया कि मेघालय मातृ सत्तात्मक समाज है।
सड़क किनारे बने छोटे-छोटे घर बड़े प्यारे लग रहे। हाहा हूती , बहूमंजिला मकानों को देखने की आदी आँखों को एक मंज़िला , छुटके घर देखकर बड़ा सुकून हुआ। सड़कें साफ़ सुथरी। कहीं कोई कूड़ा नहीं। हर घर के बाहर एक कूड़ादान लगा दिखा जिसमें लिखा था -USE ME.जगह-जगह सड़क पर कूड़ा न फेंकने के बोर्ड लगे थे।
घरों के बीच जाती सड़क की शुरुआत में उसकी लंबाई भी लिखी थी। एक सड़क की लंबाई 120 मीटर की सूचना सड़क शुरू होने पर लगे बोर्ड में लगी थी।
कुछ घरों के बाहर बनीं दुकानों में आम जरूरत का सामान मिल रहा था। अलबत्ता चाय की कोई दुकान नहीं दिखी। एक जगह कुछ बच्चे आपस में खड़े बात करते दिखे।
तसल्ली से टहलते हुए सड़क के ऊपर से नीचे की सड़क और नीचे पहुँचकर पीछे की ऊपर की सड़क देखते हुए उसको ख़ूबसूरती का प्रमाणपत्र देते हुए आगे बढ़ते रहे। पीछे खड़े मकान किसी बालकनी में खड़ी हुए महिला की तरह हमें देखते हुए लगे। मोड़ पर धीरे-धीरे मुड़ती छुटकी गाड़ियाँ सड़क पर इठलाती जाती किसी सुन्दरी सरीखी ख़ूबसूरत लग रहीं थी।
एक जगह फुटपाथ पर दो महिलायें धूप में खड़ी, तसल्ली से पान चबाती हुई, बतिया रही थीं। उनसे बतियाने के लिहाज़ से हमने पुलिस बाजार का रास्ता पूछा। उन्होंने बताया। हमने पीछे के घर की तरफ़ इशारा करके पूछा -'आप लोग यहीं रहतीं हैं क्या?' उनमें से एक ने कहा -'हाँ।' एक कमरे के दो मंजिला बने घर को देखते हुए हमने कहा -' सुंदर है।'
महिला ने घर के लिए कही बात को अपने लिये कहा माना। जो कि मेरी धारणा -'हर इंसान अपने में ख़ूबसूरत होता है ' के अनुसार सही ही था। उसने मेरी बात की प्रतिक्रिया में कहा -' अरे बुड्ढी हो गई मैं। कहाँ से सुंदर?'
मकान के लिए कही बात को अपने पर लेते हुए महिला ने जब अपने को बुड्ढी कहा तो मैंने कहा -' बुड्ढी कहाँ। ज़्यादा उमर तो लगती नहीं आपकी।चालीस -पैंतालीस साल होगी।'
मेरी बात पर ख़ुश होने और शर्माने की बजाय महिला ने अपने से सर का शॉल झटके से हटाया और अपना सफेद बालों से भरपूर सर मेरे सामने करते हुए कहा -'सब बाल सफेद हो गया। सिक्स्टी एट (68 ) ईयर है मेरी उमर।' उसके साल वाली महिला
हमने उनके सफेद बॉल और उनकी बुड्ढे होने की घोषणा को नकारते हुए कहा -'उमर और बाल से क्या होता है। चेहरे से तो आप बुजुर्ग नहीं लगती।'
इस पर महिला हंसते हुए बोली -'दूऊऊऊऊर।'
बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो उन्होंने बताया कि उनके चार लड़के, एक लड़की हैं। सबकी शादी हो गई। हमारे बारे में पूछा। हमने बताया दो बेटे हैं। वह बोली -'बहुत अच्छा है।' अकेले घूमने आने की बात पर फिर बोली -'दूऊऊऊऊर'। फैमिली को नहीं लाया। अकेला चला आया घूमने। 'दूऊऊऊऊर' उनका तकिया कलाम था। हर तीसरी बात पर बोलती -'दूऊऊऊऊर।'
परिवार की बात चलने पर हमने अपने मोबाइल में अपने परिवार और पत्नी का फ़ोटो दिखाया। इस बार उन्होंने अपने तकियाकलाम 'दूऊऊऊऊर' का त्याग करके कहा 'वेरी ब्यूटीफुल वाइफ।'
हमने चलने के लिए उनसे विदा माँगी तो वो बोली -'पैदल दूर है। थक जाओगे। टैक्सी से चले जाओ।बीस रुपया लगेगा।'
हमने कहा -'बीस रुपए में टैक्सी कहाँ मिलेगी?' कहते हुए मैं आगे बढ़ने को हुआ तो उन्होंने मुझे रोक लिया। बोली -'रुको अभी मिलेगा टैक्सी।'
थोड़ी देर में ही सामने से आती एक टैक्सी को हाथ से रोककर उसको बोला -'इसको बड़ा बाजार छोड़ देना।'
हमने टैक्सी में बैठते हुए उनको धन्यवाद देते हुए बॉय मुद्रा में हाथ हिलाया। टैक्सी बड़ा बाजार की तरफ़ बढ़ गई। शिलांग के एक मोहल्ले की फुटपाथ पर धूप में खड़ी , पान चबाती , हाथ हिलाती हुई उस महिला की ख़ूबसूरत मुस्कराहट का अनुवाद अगर संभव होता तो शायद लगता कि वो कह रही हैं -'दूऊऊऊऊर।'
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