Tuesday, August 16, 2016

ज्यादा पढ़ने-लिखने से दिमाग खराब हो जाता है।

रोज फ़ैक्ट्री जाते समय अनवरगंज के पास डिवाइडर पर बैठे इनको देखते थे। बैठकी मुद्रा से लगता था कि शायद पूजा कर रहे हैं बैठे हुये। समय पर पहुंचने की जल्दी में कभी रुककर फ़ोटो नहीं ली। बात नहीं की। बस देखते हुये निकल लेते थे।

अनुशासन और समय की पाबंदी का साइड इफ़ेक्ट है कि अपने आसपास की दुनिया से हम अपरिचित रह जाते हैं। पता ही नहीं चलता कि क्या हो रहा है हमारे अगल-बगल।

लेकिन परसों इतवार था। आराम से दफ़्तर जाने की सुविधा। जरा जल्दी भी निकले थे। दिख गये तो गाड़ी किनारे खड़ी करके हाल-चाल लिये बुजुर्गवार के।

पंकज बाजपेयी नाम है। इसके बाद दस मिनट की बतकही में इतनी विरोधाभासी, एक दूसरे से असंबद्ध बातें बताईं कि याद रखना मुश्किल। लेकिन बताने का अंदाज इतना रोचक कि उनको सुनते रहने का मन करता रहा।

बताया कि बचपन में उनका अपहरण हो गया था। डा. के. एल. रोहतगी चांदकुमारी अस्पताल में पैदा हुये थे। जब पैदा हुये बदल दिया गया। हमारी जगह लड़की को वो वहां डाल आई , होशियार थीं। हमको उठा लाईं। असल में उनके बार-बार लड़की होती थीं और वो लड़का चाहती थीं इसलिये हमको उठा लाईं। फ़िर दो हजार पौंड में नैनीताल में बेंच रहीं थी बस स्टाप पर। हमारे पास कागज हैं, हम आपको दिखायेंगे।

बाद में कोर्ट का आर्डर हुआ और हमारा नाम बदला गया। पहले हमारे नाम के आगे शुक्ला लिखा था। बाद में कोर्ट ने काट के बाजपेयी कर दिया।

यहां रोज डिवाइडर पर बैठते हैं। धूप तेज होने तक। फ़िर सामने मामा की चाय की दुकान पर चाय पीते हैं। इसके बाद मम्मी के यहां चले जाते हैं। पद्मा जयललिता बाजपेयी मम्मी हैं। उन्हीं के यहां रहते हैं।वो जीत के आई हैं उन्होंने ही हमारा नाम बदलवाया।

बच्चों को जो लोग अपहरण करते हैं हम उनको बचा लेते हैं। मजिस्ट्रेट के यहां जमा करवा देते हैं।

परिवार के बारे में पूछा तो बताया कि पत्नी हैं। लेकिन आती नहीं। शहर में गन्दगी बहुत है। इसलिये नहीं आतीं। बच्चा था उसको मरवा दिया लोगों ने। विदेशी लोग यहां आते हैं। वे बच्चों को खाते हैं। बच्चे के कपड़ों से पता चला कि उसको मरवा दिया गया है।

बोले-’ अब हम कुछ दिन में महाराष्ट्र चले जायेंगे। बांद्रा में रहने के लिये।’ जब कभी गये नहीं महाराष्ट्र तो कैसे जायेंगे रहने के लिये बांद्रा इस सवाल का कोई जबाब दिये बिना वे अपनी ही बात कहते रहे। जिस आत्मविश्वास से वे बोल रहे थे उससे लग रहा था कि इनको माइक के सामने खड़ा कर दिया तो लोग फ़ैन हो जायें इनके तो बड़ी बात नहीं।

मोटी सी जैकेट के जेब में न जाने क्या-क्या अगड़म-बगड़म सामान ठूंसे पंकज बाजपेयी जी के झोले में भी बहुत सामान भरा था। बोले इसमें तमाम सामान है। ''आर्नामेंट'' भी हैं। हम जमा कर देते हैं शाम को। फ़िर सुबह ले आते हैं सिटी मजिस्ट्रेट के यहां से।

तमाम और भी एक-दूसरे को काटती हुई बातें सुनने के बाद फ़ोटो लेने की कोशिश की तो बोले-’ फ़ोटो मत लेओ। सीबीआई ने मना किया है।’ फ़िर बोले -अच्छा लै लेव।

पास के लोग हमको डिवाइडर पर खड़े होकर पंकज बाजपेयी से बतियाते देख रहे थे। एक दुकान वाले ने बताया कि -’सामने हाते में संयुक्त परिवार में रहते थे। उन लोगों का ही हाता था। ज्यादा पढ-लिख गये तो दिमाग खराब हो गया। इनके बहनोई रहते हैं पास में। उन्होंने ही एक कमरा ले दिया है। वहीं रहते हैं। ऐसे ही इधर-उधर घूमते रहते हैं।’

हम चले गये फ़ैक्ट्री दुकानदार की कही बात याद करते हुये-’ ज्यादा पढ़ने-लिखने से दिमाग खराब हो जाता है।’ 

Sunday, August 14, 2016

देश सेवा का बहुत काम पड़ा है



कल सुबह उठने के बाद दरवज्जा खोलने लगे तो देखा सिटकनी के पास एक चीटा ऊपर की तरफ़ चला जा रहा था। चीटे के पंख भी निकले हुये थे। बरसात में निकल आते हैं पंख। चीटे के पंख ऐसे लग रहे थे मानो वो सफ़ेद लुंगी लपेट के निकला हो। लगा तो यह भी कि मानों कोई आदमी मोरपंख लगाकर डांस करने के लिये निकला हो। चीटा अकेला ही चला जा रहा था ऊपर की तरफ़। आदमी हो तो ताम-झाम लेकर चलता। वीडियो सीडियो बनाता। सेल्फ़ी फ़ेल्फ़ी लेता। भले ही इस चक्कर में लद्द से गिर पडता।

घर से निकले तो एक दुबला-पतला आदमी सिकुड़ा-सिमटा सा सड़क पर जा रहा था। सिकुड़ने-सिमटने के चक्कर में वो और दुबला लगने लगा था। शायद सड़क पर चलते हुये उसको लग रहा हो कि कहीं फ़ैलकर चले तो कोई टोंक न दे। क्या पता कोई किसी तरह का सर्विस टैक्स ही न ठोंक दे। गरीब आदमी हर जगह सहम कर चलता है।

ओएफ़सी के पास सड़क पर बैठी महिला अपने बच्चे को दूध पिला रही थी। उसकी तसल्ली देखकर लग रहा था अपने घर के आंगन में बैठी है। साथ में उसके आज एक बुजुर्ग महिला भी थी। शायद सास रही हो । दोनों ’मंगती मुद्रा’ में बैठी थी। उसकी बच्ची पास में आकर रुकी कार की खिड़की पर मुंड़ी सटाकर भीख मांग रही थी। लम्बाई बमुश्किल कार की खिड़की के बराबर थी इसलिये थोड़ा उचककर मांग रही थी। दो-चार मिनट जब कार वाले ने उसको तवज्जो नहीं दी तो वह अगली कार की तरफ़ लपक ली जो उसी समय बगल में आकर खड़ी हुई थी।

सड़क किनारे बच्ची को दूध पिलाती महिला को देखकर पिछले दिनों वायरल हुये किसी विदेशी राजनयिक की उस फ़ोटो की याद आई भाषण देते हुये अपने बच्चे को दूध पिला रही थी। जिस सहज भाव से वह भाषण देते हुये पिला रही थी उसकी तारीफ़ करते हुये उसके समाज की तारीफ़ करते हुये यह सवाल टाइप भी किया गया था कि क्या भारत में यह संभव है। हमारा कहने का मन हुआ कि भारत में लाखों-करोड़ों कामकाजी महिलायें अपना काम करते हुये ऐसा करते हुये ऐसा करती हैं लेकिन उनकी फ़ोटो वायरल नहीं होते क्योंकि उनके लिये यह रोजमर्रा का काम है। फ़ोटो तो कभी-कभार किये जाने वाले कामों का वायरल होता है। उस राजनयिक का काम है भाषण देना, सड़क किनारे बैठी महिला का काम है भीख मांगना। लेकिन इसका फ़ोटो वायरल होने का सवाल ही नहीं उठता।

फ़जलगंज के पास कूड़े का ढेर बदस्तूर फ़ैला हुआ था लेकिन कल सुअर नहीं दिखे वहां पर। शायद शनिवार होने के चलते वीकएंड पर रहे हों या फ़िर किसी और दूसरे कूड़े के ढेर पर मुंह मारने चले गये हों।

अनवरगंज के सामने एक बुजुर्ग बीच के डिवाइडर पर रोज बैठे दिखते हैं। कल भी दिखे। जिस जगह दिखते हैं , फ़तेहपुर वहां से 85 किलोमीटर दूर है। पता नहीं क्या करते हैं। दफ़्तर जाने की हड़बड़ी में रुककर पूछना संभव नहीं होता। आज दिखेंगे तो पूछेंगे हाल।

कल झकरकटी पुल पर ’जाम दर्शन’ हो गये। आते समय कई बार फ़ंसे जाम में। लेकिन जाते समय कल पहली बार ऐसा हुआ। सोचा पांच दस मिनट में साफ़ हो जायेगा लेकिन आधे घंटे से ज्यादा फ़ंसे रहे उस जाम में। अगल-बगल से देखते कि मोटरसाइकिल और साइकिल सवार ’पैदल पट्टी’ पर चढकर सरसराते हुये निकलते जा रहे थे। हम कार पर सवार उचक-उचककर जाम हटने का इंतजार करते रहे।

जैसे ही जाम कुछ हटने को हुआ वैसे ही एक मोटरसाइकिल और फ़िर एक कार बगल से सरर्राते हुये आगे निकलकर बीच में जा खड़ी हुई। किसी कोर्ट के आदेश की तरह। ’जाम स्टे’ हो गया। मन किया उसको कोसते हुये देश के हालात पर कुछ भुनभुनायें। पर कोई सुनने वाला ही नहीं था तो किसको सुनाते। चुप बैठ गये। रहीमदास को याद करते हुये:
रहिमन चुप ह्वै बैठिये, देखि दिनन को फ़ेर।

चुप बैठे हुये देखा कि दफ़्तर पहुंचने के समय से आधा घंटा ऊपर हो गया था। मीटिंग होने के समय जाम में फ़ंसे थे। मल्लब ’मीटिंग जाम’ की जगह ’ट्रैफ़िक जाम’। साहब को फ़ोन करके बताया कि आने में देर होगी।

इस मामले में हम ’अच्छे दिन’ से ज्यादा जिम्मेदार हैं। देर हुई बता दिया। ऐसे ही ’अच्छे दिन’ भी फ़ोन करके बता देता कि ’घपला घोटाला जाम’ या फ़िर ’ ब्लैक मनी जाम’ या ’गोरक्षा जाम’ और कुछ नहीं तो ’असहिष्णुता जाम’ में फ़ंसे हुये हैं। आने में देर होगी। कोई कुछ कहता थोड़ी। मान लेते। लेकिन ’अच्छे दिन’ को सामान्य शिष्टाचार भी नहीं आता। लेकिन उसकी भी क्या गलती। पहली बार आ रहा है। उसको पता ही नहीं होगा कि जिस समाज में जा रहा है वहां के नियम कानून और सामाजिक शिष्टाचार क्या हैं।

लौटते हुये देखा एक आदमी रिक्शे पर अपने दोगुनी ऊंचाई के पीपे लादे लिये जा रहा था। वजन ज्यादा था तो उचक-उचक कर रिक्शा चला रहा था। आगे निकलकर कार खड़ी करके उसका इंतजार करने लगे कि फ़ोटो खैंचेगे। लेकिन देखा वह पहले ही सड़के की दूसरी तरफ़ चला गया था। मतलब पटरी बदल ली। जिस तेजी से उसने पटरी बदली उस तेजी से नेता लोग अपनी पार्टियां तक नहीं बदलते। लेकिन हमने जो फ़ोटो लेने की सोची थी वो लेकर ही माने। उसके बाद घर आये।

आज इतवार को द्फ़तर के लिये निकलते हुये जबलपुर की याद कर रहे हैं। वहां होते तो दोपहर तक ऐंडियाते बिस्तर पर पड़े-पड़े। सामने खुल्ले दरवज्जे से सड़क पर आते जाते वाहनों, लोगों को निहारते। सूरज भाई से बतियाते। साइकिल उठाकर टहल आते। दोपहर को मेस में डोसे का नाश्ता करते। चार ठो डोसा चांपकर कहते -आज लंच बंद। बीच में घर फ़ोन करके दूर होने का रोना भी रो लेते।

इस बीच जबलपुर से दीपा अपनी मौसी के यहां चली गयी। कटनी के पास गांव में रहती है दीपा। उसका पिता मजूरी कर रहा है बदस्तूर। कलीम का काम चल निकला है। मुर्गी दाने के साथ-साथ मछली का दाना भी बनाने की योजना है उसकी। रामफ़ल का बेटा फ़ल का काम कर नहीं पाया। दिहाड़ी मजूरी से काम चला रहा है। बकिया चकाचक है।
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आप मजे से रहो जी। अपन निकलते हैं दफ़्तर। देश सेवा का बहुत काम पड़ा है। देर होगी तो जिन्दाबाद हो जायेगा। 

Thursday, August 11, 2016

तुलसी जयन्ती के बहाने

कल विजय नगर चौराहे से आगे बढे तो बताया ही कि 100 नंबर वाली जीप पर ड्राइवर अकेले बैठा था। उसके सिपाही अगल-बगल टहल रहे थे। मार्निंग वाक करते हुये नजारे देख रहे थे। जैसे ही कोई करता फ़ोन तो ड्राइवर उनको बुलाकर चल देता घटना स्थल पर।

मो्तीझील में ’मानस संगम’ की तरफ़ से तुलसी जयंती समारोह आयोजित किया गया था। कानपुर के बद्री नारायण जी मानस संगम के माध्य्म से हर वर्ष लगातार विविध कार्यक्रम कराते रहते हैं। रामकथा से जुड़े देश देश विदेश के विद्वानों को आमंत्रित करते रहते हैं, उनके व्याख्यान कराते रहते हैं, सम्मानित करते रहते हैं। हमारे मामा नंदन जी जब भी कानपुर आते थे तो उनसे अवश्य मुलाकात होती। उस संबंध के चलते सहज स्नेह के मिलता रहता है । जिस किसी से परिचय कराते बताते -’ये नंदन जी के भांजे हैं।’ संबंधों की ’सहजटैगिंग’ है यह।

हमारे मित्र शरद अग्रवाल ने बद्रीनारायण तिवारी जी को बता दिया कि हम कानपुर आ गये हैं तो उन्होंने कार्यक्रम के कार्ड की विशिष्ट अतिथि वाली खाली जगह में हमारा नाम भर दिया। नाम के साथ पद भी जरूरी था। बल्कि वही ज्यादा जरूरी था सो लिखा। लेकिन फ़ैक्ट्री बदल दी। ओपीएफ़ की जगह ओईएफ़ हो गया।

नाम के साथ ऐसा अक्सर हो जाता है। पिछले महीने एक जगह मुख्य अतिथि बनाये गये तो कार्ड में नाम लिखा गया -अरुण कुमार शुक्ल। पद भी वह लिखा था जिस पर हम आज से 14 साल पहले थे। मने पदावनति करके मुख्य अतिथि बना दिया। खैर मंच पर अतिथि बनने के लिये यह सब तो कुर्बानी करनी ही पड़ती है।

मोतीझील पहुंचे तो कार्ड दफ़्तर में ही छोड़ आये थे। कार्यक्रम की जगह पता करने के लिये मोटरसाइकिल एक किनारे धरकर फ़ोन करने लगे। फ़ोन करते हुये इधर-उधर देखने भी लगे। एक महिला तेज-तेज टहलते हुये अचानक रुककर एक आदमी से बतियाने लगी। महिला टहलने वाली पगडंडी पर थी और आदमी पार्क में। दोनों के बीच में हरी वाली झाड़ी थी, दो फ़ुट चौड़ी। झाड़ी के आरपार से दोनों कुछ देर बतियाते रहे। इस बीच हमारा फ़ोन मिल गया और हम ’कार्यक्रम स्थल’ पूछने लगे।
फ़ोन करके हमने देखा तो बतियाते महिला-पुरुष नहीं दिखे। अपने-अपने काम से लग गये होंगे।

तुलसी उपवन हम समय से करीब पन्द्रह मिनट लेट पहुंचे। वहां ज्यादातर कुर्सियां खाली थीं। हमसे मंच पर बैठने को कहा गया लेकिन हमने सोचा अभी अकेले क्या बैठना मंच पर। मंच पर कुछ भजन गायक अपने-अपने नाम बुलाये जाने पर भजन गायन कर रहे थे। हम मौके का फ़ायदा उठाकर टहलने लगे।

पार्क में कुछ लोग बड़ी तेजी से टहल रहे थे। कुछ लोग बीच पार्क में खड़े हुये कसरत नुमा कुछ कर रहे थे। एक महिला बड़ी तेजी से अपने हाथ कन्धों से आगे-पीछे फ़ेंक रही थी। उसके सामने खड़ा एक आदमी हाथ कंधों से गोल-गोल घुमा रहा था। जिस तेजी से कंधे हिला-घुमा रहे थे दोनों उससे मुझे लगा कहीं हाथ उनके कंधे से उखड़कर हवा में बल्ले की तरह न उछल जायें। हम इत्ती तेजी से करें तो हमारे तो कंधे उतर जायें।

मंच के पीछे सफ़ाई कर्मचारी गंदगी साफ़ कर रहे थे। किसी भी साफ़ जगह के पीछे गंदगी का जमावड़ा होता है। ज्यादा साफ़ जगह के पीछे गंदगी आमतौर पर ज्यादा होती ही है। जैसे बड़ी इमारतों के आसपास झुग्गियों-झोपडियों की भीड़ होती है।
तुलसी उपवन में मानस की चौपाइयां लगी हुई थीं। हमारी पसंदीदा कविता पंक्ति भी दिखी:

’जो होता है वह होने दो
यह पौरुष हीन कथन है
जो हम चाहेंगे वह होगा
इन शब्दों में जीवन है।’

लेकिन इस कविता पंक्ति को लिखते हुये अभी लगा कि पुरुषार्थ अपने में लैंगिग भेदभाव वाला शब्द है। मने मन चाहा करना पुरुषार्थ है तो इसका मतलब महिलाओं को मनमाफ़िक काम करने की छूट नहीं है। ’पुरुषार्थ’ की तरह ’महिलार्थ’ जैसा कोई शब्द भी होना चाहिये न !

करीब डेढ घंटे देरी के बाद काम भर के मुख्य, सम्मानित अतिथि आ गये। इस बीच गिरिराज किशोर जी से मुलाकात हो गयी। उन्होंने कस्तूरता गांधी पर लिखे अपने उपन्यास की जानकारी दी। उनका गान्धी जी पर लिखा उपन्यास ’पहला गिरमिटिया’ जो करीब हजार पन्ने का है ( श्रीलाल शुक्ल जी के शब्दों में मुग्दर साहित्य) हमने हफ़्ते भर में पढ लिया था। अब तो सौ पेज की किताबें भी पढ़ने में महीने निकल जाते हैं , बिना पढे। कस्तूरबा पर लिखा गिरिराज जी का उपन्यास जल्दी ही मंगायेंगे।

शहर पर भी कुछ चर्चा हुई। शहर की बिगड़ती स्थिति पर अफ़सोस भी । सुबह-सुबह और क्या किया जा सकता है इसके अलावा शहर के बारे में।

हमारे जाने का समय हो गया था। कार्यक्रम अभी शुरु नहीं हुआ था। हमने अनुमति मांगी तो तिवारी जी ने थोड़ा रुकने को कहा। कार्यक्रम शुरु हुआ। मुख्य अतिथि के फ़ौरन बाद क्रम तोड़कर हमको माला पहना दिया गया और उसको लेकर हम चले आये।

इस बीच नीचे सुरेश साहनी दिखे। हमने उनको देखकर मिलने के लिये नीचे जाना चाहा लेकिन जिस तरफ़ वो थे उधर मंच इत्ता ऊंचा था कि जा नहीं पाये। सोचा नीचे उतरकर मिलेंगे। पर नीचे उतरने पर वे दिखे नहीं। मंच से दूर जाते हुये हमने सुना कमलेश द्विवेदी अपनी हास्य कविता पढ़ रहे थे। लौटकर फ़िर मंच की तरफ़ आये फ़ोटो लेने मंच की तरफ़ ताकि सनद रहे। अनवरी बहनों के साथ सभी लोग वंदे मातरम गा रहे थे। हमने भी दोहराया - ’सुजलाम, सुफ़लाम, मलयज शीतलाम, शस्य श्यामलाम मातरम, वन्दे मातरम।’

बाद में पता चला कि कार्यक्रम बहुत अच्छा और शानदार रहा।

इसके बाद फ़टफ़टिया स्टार्ट करके जो चले तो सीधी गाड़ी फ़ैक्ट्री के अंदर ही रुकी। हम समय पर पहुंच गये अपनी दुकान यह जानकर फ़िर सुकून की सांस लिये एक ठो।

Wednesday, August 10, 2016

चेहरे पर संतई

आज भी जल्ली ही निकल लिये। जल्ली मल्लब बहुत जल्दी। सबेरे मोतीझील में ’मानस संगम संस्था’ द्वारा आयोजित तुलसी जयन्ती समारोह में भाग लेना था। सबेरे छह बजे से कार्यक्रम होना था इसलिये सुबह तड़के ही चाय पीकर फ़टफ़टिया पर सुबह के नजारे देखते हुये निकल लिये।

घर के बाहर ही एक बच्ची अकेली टहलती हुई जाती दिखी। दोनों हाथ अनुशासित तरीके से आगे पीछे करती हुई। ऐसा लग रहा था मानो हाथों के चप्पू चलाती हुई सड़क रूपी नदी पर शरीर रूपी नौका खेते हुये चली जा रही थी। हाथ के साथ-साथ उसकी चुटिया भी हिल रही थी। बित्ता भर और बड़ी होती चोटी तो हथेलियों के बराबर हो जाती।
एक आदमी शायद लंबा टहलकर आया था। सड़क पर हौले-हौले पैर धरते हुये दौड़ने की अदा में टहल रहा था। जिस तरह सड़क पर पैर धर रहा था उसको देखकर ऐसा लग रहा मानो सड़क पर पंजों से मोहर लगाता जा रहा हो।
आर्मापुर गेट के पास दो कुत्ते आगे-पीछे दुलकी चाल से दौड़ते हुये आते दिखे। आगे वाला कुत्ता पीछे वाले से करीब पचास कदम आगे चल रहा था। मानो पीछे वाले वीआईपी कुत्ते का पायलट कुत्ता हो। दोनों कुत्ते इतने शांत भाव से दौड़ते आ रहे थे कि आकार के अलावा कुत्ते लग ही नहीं रहे थे। उनके चेहरे पर संतई सरीखी पसरी हुई थी। शायद संत कुत्ते थे वे। इतने हल्के से पैर रख रहे थे कुत्ते सड़क पर मानों उनको सड़क को अपने पंजों की खरोच बचा रहा हो। या फ़िर शायद अपने पंजों के नाखून घिसने से बचा रहा हो।
चौराहे पर एक पुलिस वाला मोटरसाइकिल पर बैठा मोबाइल का स्क्रीन देख रहा था। आगे एक सौ नंबर वाली जीप पर बैठा ड्राइवर सामने देख रहा था। उसके साथ वाले सिपाही इधर-उधर टहल रहे थे।



Tuesday, August 09, 2016

आपको चिंता करने की जरूरत नई है



सबेरे भगे चले आ रहे थे फ़ैक्ट्री की तरफ़। आज हालांकि रोज के मुकाब ले जल्दी ही थे। लेकिन कानपुर में और शहरों की तरह जाम और लफ़डे का कोई भरोसा नहीं कहां मिल जाये। एस.ए.एफ़ के फ़ैक्ट्री के सामने कर्मचारी लोग सभा कर रहे थे। एक जन माइक पर। बाकी सामने से उसको उसको सुन रहे थे। हम उधर से गुजरे तो श्रोताओं में से एक ने देखा तो नमस्कारी-नमस्कारा हो गया। कार के अंदर से ही हमने हाथ हिलाये। ज्यादा नहीं जरा सा। ज्यादा हिलाने पर कार का संतुलन बिगड़ जाता।

ओएफ़सी के सामने एक महिला सड़के पर भीख मुद्रा में बैठी थी। आज वह छाता नहीं लगाये थी। उसके बच्चे उसके आसपास खेल रहे थे। महिला का पति रिक्शा चलाता है। उसके दो बच्चे हैं। तीसरा शायद उसकी जेठानी का है। जब तक पति रिक्शा चलाता है तब तक वह भी मांगकर कुछ कमाई कर लेती होगी।

जरीब चौकी का रेलवे फ़ाटक खुला था। झटके से मने भागते हुये मल्लब कार स्पीड में करके उसको पार किया। न जाने कब फ़ाटक बन्द हो जाये और फ़ैक्ट्री पहुंचने में देर हो जाये। घर से डांट पड़े , जब जल्दी निकले थे तो देर कहां हुई। फ़ैक्ट्री से सूचनार्थ जानकारी मिले -’ आज आप तीन मिनट लेट आये।’

रेलवे फ़ाटक पार करते ही जो सांस ली कुछ लोग उसे चैन की कहते हैं कुछ लोग सुकून की। अब यह तसल्ली थी कि जो भी मिलेगा वह जाम होगा। रेलवे फ़ाटक की बाधा तो पार हो गयी जिस पर कोई बस नहीं अपन का। जाम में तो कोई गुंजाइश भले न हो लेकिन हमेशा लगता है बस अब खुलने ही वाला है।

अनवरगंज स्टेशन के आगे देखा कि एक हाथ रिक्शा पर दो लोग चले जा रहे थे। दोनों लोग साथी हाथ बढ़ाना की तर्ज पर हाथ से रिक्शा चला रहे थे। आगे निकलकर गाड़ी किनारे लगाई। रोककर उनका फ़ोटो खैंचा। पूछा किधर जा रहे हो, किधर ध्यान है।
पता सफ़ेद शर्ट वाला दिव्यांग है। पैर से दिव्यांग। दूसरा वाला उसके लिये रोजी-रोटी का जुगाड़ करने जा रहा है। कहीं पर खड़ा करके पान-मसाला बेंचने का इंतजाम करेगा उसके लिये। मलतब खुद तो विकलांग है ही। पचीस और लोगों को विकलांग बनाने का इंतजाम करेगा। पान-मसाला खाकरे इतने साथियों को कैंसर से मरते देखा है पिछले दिनों कि यह धंधा करने वाले समाज के दुश्मन ही नजर आते हैं।

जब फ़ोटो खैंच रहे थे तभी याद आया लगता है गाड़ी का दरवाजा बन्द कर दिये और चाबी गाड़ी में ही रह गयी। मतलब हो गयी लभेड़। कहां जल्दी निकले थे और इधर लेट का इंतजाम हो गया। फ़ौरन पलटे कि देखें कोई दरवाजा खुल्ला है क्या । दरवाजा खुला देखा तो एक बार फ़िर चैन की सांस आई। मतलब दस मिनट के ही अंतर में दो बार चैन की सांस मिल गयी। इत्ती चैन से अच्छा तो लगा लेकिन यह भी लगा कि इत्ता चैन ठीक नहीं जिन्दगी के सुकून के लिये।

आगे सड़क किनारे एक झोपड़ पट्टी के पास एक बच्ची अपनी सहेलियों के साथ जमीन पर उछलती हुई कड़क्को खेल रही थी। उसके आगे एक आदमी सड़क के किनारे भैंस दुह रहा था। उसके चारो तरफ़ गोबर पसरा हुआ था। गोबर की भीनी-भीनी सुगन्ध गाड़ियों से निकलने वाले धुयें से पंजा लड़ा रही थी। पास के नाले की दुर्गन्ध भी उनके साथ गलबहियां कर रही थी।

फ़ैक्ट्री के सामने एक जनप्रतिनिधि आत्मविश्वास पूर्ण आवाज में भाषण दे रहा था-’ साथियों आपको चिंता करने की जरूरत नई है।’

हम उस आवाज को अनसुना करके फ़टाक से फ़ैक्ट्री में जमा हो गये। समय से पहले पहुंचने की खुशी में फ़िर से चैन की सांस लेने का मन हुआ लेकिन फ़िर सोचा कार्यस्थल पर चैन से रहना ठीक नहीं हमने चैन की सांस को कह दिया - ’अब फ़िर आना। अब हम काम पर लगेंगे। ’

हम तो लग लिये काम पर आप भी काम पर लगोगे कि चैन की सांस ही लेते रहोगे। 

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Saturday, August 06, 2016

दुनिया के कवि कितने मासूम होते हैं

चांद ने ठोंक दिया है मुकदमा
कापीराइट एक्ट के तहत अदालत में!

दुनिया में जिन-जिन लोगों ने
अपनी प्रेमिकाओं के मुखड़े
चांद जैसे बताये हैं
उनसे बसूलेगा हर्जाना ब्याज सहित!

दर अभी तय नहीं हुयी है
लेकिन दुनिया भर के तमाम कवि
अखबारों में सूचना छपवा रहे हैं
मेरी सारी कविताओं में चांद की जगह
ये पढ़ा जाये, वो समझा जाये।

अखबारों की चांदी है
वे पैसा लेकर छाप रहे हैं कवियों की सूचनायें
महीने के अंत में सारी सूचनाओं के हिसाब के साथ
भेज देते हैं चांद के पास उसके हिस्से का चेक।

चांद की चांदी है वह जमा करवा रहा है
सारा पैसा स्विस बैंक के अपने खाते में
सोचते हुये कि दुनिया के कवि
कितने मासूम होते हैं!
कट्टा कानपुरी

Friday, August 05, 2016

औरत का सुरक्षित जिन्दा रहना भी आज के समय की अहम चुनौती है



कल घर से दुकान जाने के लिये निकले आठ बजकर दस मिनट पर! मने रोज से करीब दस मिनट लेट। आज लेट हो गये, सोचते ही एक्सिलेटर पर पड़ा। गाड़ी अचकचा के भागी आगे की तरफ़। स्पीड चालीस से लपककर पहुंच गयी साठ पर। इंजन और चेसिस ने इस अचानक परिरर्तन पर नाखुशी जाहिर की। इंजन हुर्र-हुर्र करके और बाडी ने खड़खड़ाकर आपस में कुछ बातचीत की। अब हम उनकी भाषा तो बूझते नहीं। शायद भुनभुना रहे हों मेरे ऊपर। कह रहे हों दोनों मिलकर -’सुबह टाइम पर निकलता नहीं है। देर करता है। फ़िर सोचता है फ़ौरन पहुंच जाये दफ़्तर- आदमी कहीं का।’

हम कुछ और सोचते तब तक एक गाय सामने आ गयी। गाय बीच सड़क पर खड़ी थी। पहले उसने बायीं तरफ़ सींग दिया मुड़ने को फ़िर मन किया तो दायीं तरफ़ चलने का इशारा किया। हम गाड़ी धीमी कर दिये। लेकिन फ़िर शायद उसका मूड बना नहीं दायें भी चलने का और वह वहीं खड़ी हो गयी। हम चुपचाप अपनी गाड़ी किनारे करके बगलियाते हुये आगे निकल गये। गाय वहीं बीच सड़क पर आराम से खड़ी पगुराती रही। गाड़ियां उसके बगल से चुपचाप निकलती रहीं।

गाय आराम से बीच सड़क पर खड़ी लोगों को अपने दायें-बायें से निकलते देखती रही। कभी-कभी अपने कान और पूंछ फ़टकारकर मक्खियां उड़ाने जैसा कुछ काम करने लगती। फ़िर देश की प्रगति की तरह, दो कदम दायें-बायें, तीन कदम आगे-पीछे होकर , वहीं खड़ी हो जाती। गाय को कोई खतरा नहीं था सड़क पर। वह गाय थी कोई लड़की या महिला थोड़ी जिसका सड़क पर अकेले निकलना खतरे से खाली नहीं होता।

लड़कियां और महिलायें आज देश दुनिया के हर कोने पर जा रही हैं। एवरेस्ट से लेकर अंतरिक्ष पर जा रही हैं। हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। आगे बढ़ रही हैं। लेकिन साथ ही साथ हर जगह उनको पीछे भी घसीटने का काम जारी है। हर जगह वे असुरक्षित भी हो रही हैं। विकट बवाल है । औरत का सुरक्षित जिन्दा रहना भी आज के समय की अहम चुनौती है।

आगे सड़क पर एक आदमी अपनी स्कूटी को बीच सड़क पर रोककर किसी से बतियाने लगा। उसके सर ऊपरकर बतियाने के अंदाज से लग रहा था कि उसको मोबाइल कंपनी पर भरोसा नहीं है और वह सीधे सेटेलाइट में अपनी आवाज घुसेड़कर दूसरी तरफ़ भेज देना चाहता हो। हम उसकी बतकही की तन्मयता के प्रति नतमस्तक होकर उसको बतियाता हुये देखने लगे। दो्नों बीच सड़क पर। उसकी ’फ़ोन तपस्या’ शायद हमको पीछे देखकर भंग हो गयी। उसने अपने पैरों के स्टैंड से स्कूटी को उतारा और सरकाते हुये स्कूटी को किनारे किया। इस सब में जरूर उसने कुछ पेट्रोल बचाया होगा। ’हरित क्रांति’ में में संक्षिप्त योगदान देकर वह फ़िर दुबारा सड़क किनारे स्कूटी को अपने दोनों टांगों के बीच फ़ंसाये हुये सर ऊपर करके बतियाने लगा।

आगे फ़जलगंज के पहले एक जगह कूड़े का ढेर लगा था। दो-चार सुअर बड़ी तेजी और तन्मयता से उस कूड़े के ढेर पर पड़े कूड़े को इधर-उधर कर रहे थे। जिस तन्मयता से वे सुअर कूड़े को चिंचियाते हुये खखोर रहे थे उसको देखकर लगा मानों बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय-बहु्राष्ट्रीय कम्पनियां देश-दुनिया की प्राकृतिक संपदा हिल्ले लगाने के काम में जुटी हों।

सामने सूरज भाई दिखे। एक उंचे मकान की छत पर बैठे थे। छत पर सरिया निकली हुई थीं। मने मकान ऊंचाई और बढ़ने का इंतजाम हो रखा है। हमने मसखरी करते हुये कहा- ’अरे भाई, सरिया पर मत बैठो। बवाल हो जायेगा।’

लेकिन सूरज भाई उदास टाइप ही बने रहे। किरणें भी दुखी-दुखी दिखीं। लगता है हाल में बच्ची और उसकी मां के साथ हुये अत्याचार का सदमा उनको भी लगा था। हमें कुछ समझ नहीं आया कि क्या कहें उनसे । सूरज भाई के हाल देखकर एकबार फ़िर अजय गुप्त जी की कविता पंक्ति याद आ गई:

सूर्य जब-जब थका हारा ताल के तट पर मिला
सच कहूं मुझे वो बेटियों के बाप सा लगा।
कल अखबार में कई खबरें पढीं जिनमें लड़कियों को परेशान करने के किस्से थे। एक जगह एक लड़की के साथ जबरियन दुष्कर्म करके उसका वीडियो बनाकर फ़िर महीनों उसके साथ बलात्कार किया गया। लड़की ने मारे डर के घर में बताया नहीं। जब अति हो गयी तब बताया और वह आदमी दबोचा गया। दूसरी जगह एक लड़की के एक विवाहित पुरुष से संबंध हो गये। घर वालों ने जब पकड़ा तो कहा-सुना होगा और लड़की ने आत्महत्या कर ली। दोनों मामलों में लड़कियां दुनिया के छलावे और छद्म का शिकार बनीं।

दुनिया के नैतिक प्रतिमानों के हिसाब से यौन अपराधों में दोष भले ने स्त्री का न हो लेकिन सबसे ज्यादा सजा उसको ही मिलती है। न जाने कितने साल, सदी लगेंगे इस सोच को बदलने में।

इस तरह की घटनायें जिसके साथ होती हैं उनकी मन:स्थिति वही समझ सकती हैं। लेकिन अगर वे समझ सकें कि जीवन से अमूल्य कुछ नहीं होता तो सदमों से उबरना आसान होगा ।

आज रानी का जन्मदिन है। जब यह स्कूल जाती बच्ची थी तब इससे 10 साल बड़े एक आदमी ने इस पर तेजाब फ़ेंका था क्योंकि रानी ने उसके प्रेम प्रस्ताव को ठुकराया था और उसको थप्पड़ मारा था। तेजाब के हमले से रानी की दोनों आंखे चली गयीं थी और बहुत तकलीफ़ में रही। महीनों कोमा में और फ़िर आईसीयू में रही। आज भी रानी की जिन्दगी दूसरों पर निर्भर है लेकिन साथियों ने उसको सदमें से उबारा। जीने की ललक पैदा की। अब तो रानी का उसका हौसला इतना ऊंचा है कि ताज्जुब होता है देखकर।
रानी को उसके जन्मदिन की मंगलकामनायें।
रानी के बारे में लिखा पहले का लेख
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Wednesday, August 03, 2016

पानी को गुदगुदी

कल झाँसी जाना हुआ। बच्चा लंबी छुट्टी के बाद वापस लौट रहा था। उसको भेजने के लिए। सड़क के रास्ते गए। सड़क के दोनों तरफ खेत-मैदान 'पानी पटे' थे। लबालब पानी। कोई पूछता खेत और मैदान से -'भैया थोरो पानी और लै लेव' तो शायद जबाब देते -'न भैया, और न चाहिए। अफर गए। मने पेट भर गया।'

बीच-बीच में हवा खेत-मैदान में जमा पानी को हिला सा देती। पानी को गुदगुदी होती होगी। वह सिहरता सा होगा। उसके निशान खेत के पेट पर दीखते। लहरें सी दिखती पानी पर और फिर शांत हो जाती। फिर कुछ देर में अगली लहर चलती।जैसे कोई मुद्दा मिडिया में उछलता है और कुछ दिन बाद शांत हो जाता ताकि अगला मुद्दा उछल सके।

सड़क सावन के मौसम में झूले सी थी। गाड़ी को हलके-हलके झुलाती हुई आगे बढ़ा रही थी। बीच-बीच में कोई गढ्ढा आ जाता तो गाड़ी ज्यादा उछल जाती। तब लगता कि भैया ई सड़क है सावन का झूला नहीं।

जाते समय 4 ठो टोल बूथ पड़े। 220 किलोमीटर की यात्रा में आने जाने का कुल टोल टैक्स 525 रुपया हुआ। मतलब एक रुपया प्रति किलोमीटर से भी अधिक। इत्ते में आदमी रेल से जनरल डिब्बे में दो बार आना-जाना कर ले।

बात खाली पैसे की ही नहीं भाई। लौटते में देखा तो जगह-जगह सड़क कटी-फ़टी, टूटी-फूटी मिली। मानो टोल टैक्स के 525 रूपये लेकर 'एडवेंचर टूरिज्म' कराने की व्यवस्था की गयी हो। गाड़ी जरा-जरा देर में ऐसे उछलती मानो किसी की याद में हिचकी आ रही हों उसे। उछलकर गाड़ी थोड़ा धीमे होती। एकाध घूँट डीजल पीती और आगे चल देती।

इन गढ्ढों युक्त सड़कों से स्पीड कम और दुर्घटना वगैरह होती हैं वो तो है ही। उनके किस्से तो अखबार में आ जाते हैं। पर तमाम लोगों की हड्डी इनकी चपेट में आकर चोटिल हो जाती है उसका कोई हिसाब नहीं मिलता। गाड़ी भगी चली जा रही है। कोई आराम से बैठा है, कोई लेटा है। कोई ऊँचा नीचा हिस्सा मिला सड़क का और गाड़ी उछल गयी। गयी किसी की रीढ़ काम से। दौड़ते रहो न्यूरो डाक्टर के पास। कई तो अपाहिज हो जाते हैं।

यह हाल हाई वे पर ही नहीँ है। शहर की तो हर सड़क रीढ़ की हड्डी की मुफ़्त बीमारी प्रदान करती है। आ तो जाइये आप सड़क पर किसी वाहन में। आपको रीढ़ के दर्द की सुविधा मुफ़्त में गारन्टी सहित मिलेगी।

ऐसा हो भी क्यों न। हाइवे पर जो सड़क बनाने वाले ठेकेदार हैं वे या तो खुद माफिया हैं या फिर माफिया के सताये हुए। कल अख़बार में देखा कि एक हाईवे पर सड़क बनाने का ठेका जिस कम्पनी को मिला है उससे उस इलाके के माफिया ने एक करोड़ रूपये एक मुस्त और शायद 10 लाख रूपये प्रति माह मांगे हैं तब ही वो सड़क बनने देगे। अब जो सड़क उगाही में पैसे देकर बनेगी उसमें गढ्ढे नहीं होंगे तो और क्या होगा।

पिछले दिनों टोल टैक्स भी बढ़ा है। क्या पता वह भी किसी को उगाही देने के लिए बढ़ा हो।

सड़क किनारे ही एक ढाबे में चाय पी। बाद में बताया ड्राइवर ने कि यह ढाबा राज्य के एक मंत्री के साले का है। सब जमीन पर अवैध कब्ज़ा है। ढाबा धक्काडे से चल रहा है। दनादन पैसा पीट रहा है ढाबे वाला।

जो जमीन पर अवैध कब्जा करके ढाबा चलने वाली बात एक आम आदमी को पता है वह आला अधिकारियों को भी पता होगी। लेकिन कोई कुछ कैसे करे। जब मामला अख़बार में उछलेगा तब देखा जाएगा।

एक जगह जाम भी मिला। पता चला कि एक नहर में एक लड़का नहाने गया था। वह डूब गया। गांव वाले उसके शव को सड़क पर धरकर मुवावजे की मांग करते हुए सड़क पर धरना देकर बैठे थे। बाद में पुलिस ने आकर जाम हटवाया।

झांसी में अजित वड़नेरकर से भी मुलाकात हुई।काफी दिन बाद मिलना हुआ। मजा आया। खूब बतकही हुई। 'शब्दों के सफर' के दो भाग आ चुके हैं। तीसरा तैयार है। दस खण्ड तक 'शब्दों का सफर' (http://shabdavali.blogspot.in/ )करने की योजना है अजित भाई की। इसके बाद ' शब्द व्युत्प्तति कोष' आएगा। बढ़िया काम होगा।

’शब्दों का सफ़र’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हैं। इसमें शब्दों की जन्मकुंडलियां हैं। कोई शब्द कैसे बना, कहां से चला, कहां तक पहुंचा इसकी चर्चा है। इसको खरीदने के लिये यहां पहुंचिये।
उनके दफ्तर के एक बालक ने कई फोटो खैंचे। उसकी रूचि फोटो टेढ़े करके खींचने में ज्यादा थी। लेकिन हमारा एक सीधा फोटो भी आ ही गया। देखिये।

एक फोटो झांसी के सीपरी बाजार में टोकरी बेचती महिला का। वह आराम से लेट गयी थी जहाँ बेच रही थी टोकरी। लेकिन अचानक पानी आ गया और उसको उठना पड़ा।

बालक अनन्य के साथ सेल्फी भी ली गयी। देखिये। अब तो वह नागपुर पार कर गया होगा। अपन भी चलते हैं दफ्तर की तरफ। आप मजे करिये।

Monday, August 01, 2016

फ़ैशन अपने में भेड़चाल है

घर लौट रहे थे दफ़्तर से कल। फ़टफ़टिया फ़र्राटे से चलाते हुये। टाट मिल चौराहे तक तो मामला चौकस रहा। लेकिन आगे झकरकटी पुल पर ’थम’ हो गया। जाम लग गया था।

हमें लगा कि ये ससुर झकरकटी पुल भी भेडचाल फ़ैशन का शिकार हो गया। कल देखा उधर गुड़गांव को जाम के कारण मीडिया चर्चित होते देख लगता यह भी जाम के लिये हुड़कने लगा। जिसको देखो वो आजकल भेड़चाल फ़ैशन का शिकार है।

वैसे सच तो यह है कि फ़ैशन अपने में भेड़चाल है। अमेरिका , यूरोप का फ़ैशन दिल्ली, मुम्बई लपकती है। दिल्ली ,मुम्बई से बाकी शहर झपटते हैं। इसके बाद फ़िर छुटके , चिल्लर शहरों तक पहुंचता है फ़ैशन। कभी खरामा, खरामा। कभी फ़र्राटे से। बाजार की रुचि होती है तो फ़ैशन एकदम अफ़वाह की गति से फ़ैलता है।

एक बारगी तो मन तो किया पुल को हड़कायें -’जाम को क्या फ़ेसबुकिया फ़ोटो फ़ैशन समझ लिया क्या है बे कि जिसे देखो ’चैलेन्ज एक्सेप्टेड’ लिखकर तस्वीर काली कर रहा है। इत्ता तो अकल होनी चाहिये तेरे को कि फ़ोटो काली सफ़ेद करने में एक मिनट लगता है लेकिन जाम का झाम तो घंटो का होता है। पुराने पुल हो, ज्यादा जाम के लिये हुड़कोगे तो किसी दिन चू पडोगे और 'शान्त' हो जाओगे।’

लेकिन फ़िर सोचा कि पुल बेचारे का क्या दोष! वह तो बेचारा चुपचाप अपने ऊपर से गुजरते हुये लोगों को देखता है। अब लोगों को ही सलीका नहीं पुल पार करने का तो अगला क्या करे।

खैर जब फ़ंस ही गये तो ’जाम सुषमा’ निहारने लगे। मेरे बाईं तरफ़ आटो, मोटर साइकिल और कारों की लाइन लगी थी। हम भी साथ में लग लिये। कुछ लोग अपनी फ़टफ़टिया उठाकर फ़ुटपाथ पर चढ़ा लिये और फ़र्राटा मारते हुये आगे निकल लिये। उनको देखकर अपन का जी भी ललचाया कि हम भी उचका कर निकल लें। लेकिन फ़िर यह सोचकर कि अकेले उठा न पायेंगे मोटरसाइकिल आधा फ़ुट ऊंची फ़ुटपाथ पर हम जाम में ही फ़ंसे रहे।

मोटरसाइकिल उठाने में सामर्थ्य के अभाव ने सभ्य नागरिक बने रहने में सहायता की।

हम सरकते हुये आगे बढ रहे थे तब तक देखा कि पीछे से एक एम्बुलेन्स हुंहु आती हुयी आगे आयी। हमने तो उसको अपने और बायें होते हुये रास्ता दे दिया लेकिन सामने से आते एक ट्रक ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उसकी भी गलती नहीं। वह आगे ही बढ सकता था। उसके पीछे जाम लग गया था। वह पी छे जा ही नहीं सकता था। मजबूरन एम्बुलेन्स को पीछे आना पड़ा। जाम तो उसके पीछे भी लगने लगा था लेकिन लोगों ने उसको पीछे आने दिया।

सामने से आता ट्रक बहुत धीरे-धीरे पुल पर आगे बढ रहा था। पचास पार का ड्राइवर दांत भींचे ट्रक हांक रहा था। ट्रक चींटी की रफ़्तार से तो नहीं पर बहुत धीरे-धीरे चल रहा था। लोगों अपनी-अपनी गाड़ियों के दामन ट्रक से बचाते हुये किनारे होते जा रहे थे- जैसे कभी और कुछ जगह तो आज भी लोग दलितों की छाया से भी बचते हैं उसी तरह सवारियां ट्रक के साये से दूर भाग रही थीं।

ट्रक के पीछे देखा कि एक रिकवरी वैन अपने पीछे एक ट्रक को गिरफ़्तार जैसा किये चली जा रही थी। जित्ती बड़ी रिकवरी वैन उससे दो गुना बड़ा ट्रक। दोनों के बीच में लोहे की जंजीर। ट्रक बेचारा बड़ा शरीफ़ था। अपने से आधी कद और ताकत की रिकवरी वैन के घसीटने से घिसटता हुआ पुल पर चला जा रहा था। घिसट क्या रहा था कि वह खुद अपना इंजन चालू किये वैन के पीछे शरीफ़त की चाल से चला जा रहा था।

एक मिनट के लिये लगा कि यह सोच डालें कि अपने से आ धे कद काठी की वैन के पीछे शरीफ़ों की तरह चलता ट्रक अपने से आधे कद की घरैतिन के इशारे पर सहमते हुये चलते घरवाले जैसा लग रहा था।

जब रिकवरी वैन आगे ट्रक को लेकर आगे निकल गयी तब जाम कुछ कम सा हुआ। तब तक दायीं तरफ़ एक महिला फ़ुटपाथ पर अपना सामान लुढकाते हुये आती दिखी। जाम अचानक खूबसूरत टाइप लगने लगा। बहुत गोरी सी थी महिला। खूबसूरत भी। शायद जाम के चलते अपनी सवारी छोड़कर पैदल जाने को मजबूर हो गयी होगी। बस या ट्रेन न छूट जाये इसलिये 11 नम्बर की बस पकड़ ली।

पहले तो हमने सोचा कि जब जाम में फ़ंसे ही हैं और सामने से कोई महिला आ रही है तो उनको देखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन फ़िर याद आया कि कहीं ज्यादा देख लिया तो उसे घूरना कहा जायेगा। यह तो गंदी बात है। यह ध्यान में आते ही हमने फ़ौरन दूसरी-तीेसरी-चौथी तरफ़ देख डाला। कोई और नहीं दिखा तो मोटर साइकिल के शीशे में अपनी तरफ़ ही देख डाला। देखकर बड़ा खराब लगा कि सारी खूबसूरती मने कि स्मार्टनेस हेलमेट के नीचे कैद है। मन किया कि हेलमेट उतारकर बाल काढने के बहाने एक बार फ़िर देख लें चेहरा लेकिन फ़िर याद आया कि कंघा तो था ही नहीं जेब में। मन मारकर फ़िर इधर-उधर देखते हुये फ़िर उधर ही उधर देखने लगे जिधर देखने से बचने के लिये इधर-उधर देखना शुरु किया था।

चूंकि दायीं तरफ़ फ़ुटपाथ पर जाम नहीं लगा था इसलिये महिला आहिस्ता-आहिस्ता आगे और नजरों के पार चली गयीं। उनकी सुस्त चाल से ऐसा लगा कि शायद उनको इस तरह आगे चला जाना रास न हीं आ रहा था। बेमन से जाम के अभाव में उनको आगे निकलना पड़ रहा था। अनमने मन से जाते हुये शायद वे चाह रही थी कि थोड़ा जाम इधर फ़ुटपाथ पर भी लगता तो कित्ता अच्छा होता। हो सकता है कि वे यह भी सोच रही हों जाते हुये कि ये लोग जाम में क्यों फ़ंसे हुये हैं। इधर फ़ुटपाथ पर क्यों नहीं चलते जिधर जाम नहीं है।

खैर, कुछ देर में जाम खत्म हो गया। और हम आगे निकल लिये। पुल के नीचे देखा कुछ स्थानीय नागरिक पुलिस का सहयोग करते हुये गाड़ियों को सही से आगे -पीछे कर रहे थे। अराजक लोगों को तात्कालिक रू प से सभ्य बना रहे थे।

जाम सुषमा

घर लौट रहे थे दफ़्तर से कल। फ़टफ़टिया फ़र्राटे से चलाते हुये। टाट मिल चौराहे तक तो मामला चौकस रहा। लेकिन  आगे झकरकटी पुल पर ’थम’ हो गया। जाम लग गया था।

हमें लगा कि ये ससुर झकरकटी पुल भी भेडचाल फ़ैशन का शिकार हो गया। कल देखा उधर गुड़गांव को जाम के कारण मीडिया चर्चित होते देख लगता यह भी जाम के लिये हुड़कने लगा। जिसको देखो वो आजकल भेड़चाल फ़ैशन का शिकार है।
वैसे सच तो यह है कि फ़ैशन अपने में भेड़चाल है। अमेरिका , यूरोप का फ़ैशन दिल्ली, मुम्बई लपकती है। दिल्ली ,मुम्बई से बाकी शहर झपटते हैं। इसके बाद फ़िर छुटके , चिल्लर शहरों तक पहुंचता है फ़ैशन। कभी खरामा, खरामा। कभी फ़र्राटे से। बाजार की रुचि होती है तो फ़ैशन एकदम अफ़वाह की गति से फ़ैलता है।

एक बारगी तो मन तो किया पुल को हड़कायें -’जाम को क्या फ़ेसबुकिया फ़ोटो फ़ैशन समझ लिया क्या है बे कि जिसे देखो ’चैलेन्ज एक्सेप्टेड’ लिखकर तस्वीर काली कर रहा है। इत्ता तो अकल होनी चाहिये तेरे को कि फ़ोटो काली सफ़ेद करने में एक मिनट लगता है लेकिन जाम का झाम तो घंटो का होता है। पुराने पुल हो, ज्यादा जाम के लिये हुड़कोगे तो किसी दिन चू पडोगे और शान्त हो जाओगे।’

लेकिन फ़िर सोचा कि पुल बेचारे का क्या दोष! वह तो बेचारा चुपचाप अपने ऊपर से गुजरते हुये लोगों को देखता है। अब लोगों को ही सलीका नहीं पुल पार करने का तो अगला क्या करे।

खैर जब फ़ंस ही गये तो ’जाम सुषमा’ निहारने लगे। मेरे बाईं तरफ़ आटो, मोटर साइकिल और कारों की लाइन लगी थी। हम भी साथ में लग लिये। कुछ लोग अपनी फ़टफ़टिया उठाकर फ़ुटपाथ पर चढ़ा लिये और फ़र्राटा मारते हुये आगे निकल लिये। उनको देखकर अपन का जी भी ललचाया कि हम भी उचका कर निकल लें। लेकिन फ़िर यह सोचकर कि अकेले उठा न पायेंगे मोटरसाइकिल आधा फ़ुट ऊंची फ़ुटपाथ पर हम जाम में ही फ़ंसे रहे।

मोटरसाइकिल उठाने में सामर्थ्य के अभाव ने सभ्य नागरिक बने रहने में सहायता की।

हम सरकते हुये आगे बढ रहे थे तब तक देखा कि पीछे से एक एम्बुलेन्स हुंहुआती हुयी आगे आयी। हमने तो उसको अपने और बायें होते हुये रास्ता दे दिया लेकिन सामने से आते एक ट्रक ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उसकी भी गलती नहीं। वह आगे ही बढ सकता था। उसके पीछे जाम लग गया था। वह पीछे जा ही नहीं सकता था। मजबूरन एम्बुलेन्स को पीछे आना पड़ा। जाम तो उसके पीछे भी लगने लगा था लेकिन लोगों ने उसको पीछे आने दिया।
सामने से आता ट्रक बहुत धीरे-धीरे पुल पर आगे बढ रहा था। पचास पार का ड्राइवर दांत भींचे ट्रक हांक रहा था। ट्रक चींटी की रफ़्तार से तो नहीं पर बहुत धीरे-धीरे चल रहा था। लोगों अपनी-अपनी गाड़ियों के दामन ट्रक से बचाते हुये किनारे होते जा रहे थे- जैसे कभी और कुछ जगह तो आज भी लोग दलितों की छाया से भी बचते हैं उसी तरह सवारियां ट्रक के साये से दूर भाग रही थीं।

ट्रक के पीछे देखा कि एक रिकवरी वैन अपने पीछे एक ट्रक को गिरफ़्तार जैसा किये चली जा रही थी। जित्ती बड़ी रिकवरी वैन उससे दो गुना बड़ा ट्रक। दोनों के बीच में लोहे की जंजीर। ट्रक बेचारा बड़ा शरीफ़ था। अपने से आधी कद  और ताकत की रिकवरी वैन के घसीटने से घिसटता हुआ पुल पर चला जा रहा था। घिसट क्या रहा था कि वह खुद अपना इंजन चालू किये वैन के पीछे शरीफ़त की चाल से चला जा रहा था।

एक मिनट के लिये लगा कि यह सोच डालें कि अपने से आधे कद काठी की वैन के पीछे शरीफ़ों की तरह चलता ट्रक अपने से आधे कद की घरैतिन के इशारे पर सहमते हुये चलते घरवाले जैसा लग रहा था।

जब रिकवरी वैन आगे ट्रक को लेकर आगे निकल गयी तब जाम कुछ कम सा हुआ। तब तक दायीं तरफ़ एक महिला फ़ुटपाथ पर अपना सामान लुढकाते हुये आती दिखी। जाम अचानक खूबसूरत टाइप लगने लगा। बहुत गोरी सी थी महिला। खूबसूरत भी। शायद जाम के चलते अपनी सवारी छोड़कर पैदल जाने को मजबूर हो गयी होगी। बस या ट्रेन न छूट जाये इसलिये 11 नम्बर की बस पकड़ ली।
पहले तो हमने सोचा कि जब जाम में फ़ंसे ही हैं और सामने से कोई महिला आ रही है तो उनको देखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन फ़िर याद आया कि कहीं ज्यादा देख लिया तो उसे घूरना कहा जायेगा। यह तो गंदी बात है। यह ध्यान में आते ही हमने फ़ौरन दूसरी-तीेसरी-चौथी तरफ़ देख डाला। कोई और नहीं दिखा तो मोटर साइकिल के शीशे में अपनी तरफ़ ही देख डाला। देखकर बड़ा खराब लगा कि सारी खूबसूरती मने कि स्मार्टनेस हेलमेट के नीचे कैद है। मन किया कि हेलमेट उतारकर बाल काढने के बहाने एक बार फ़िर देख लें चेहरा लेकिन फ़िर याद आया कि कंघा तो था ही नहीं जेब में। मन मारकर फ़िर इधर-उधर देखते हुये फ़िर उधर ही उधर देखने लगे जिधर देखने से बचने के लिये इधर-उधर देखना शुरु किया था।
चूंकि दायीं तरफ़ फ़ुटपाथ पर जाम नहीं लगा था इसलिये महिला आहिस्ता-आहिस्ता आगे और नजरों के पार चली गयीं। उनकी सुस्त चाल से ऐसा लगा कि शायद उनको इस तरह आगे चला जाना रास नहीं आ रहा था। बेमन से जाम के अभाव में उनको आगे निकलना पड़ रहा था। अनमने मन से जाते हुये शायद वे चाह रही थी कि थोड़ा जाम इधर फ़ुटपाथ पर भी लगता तो कित्ता अच्छा होता। हो सकता है कि वे यह भी सोच रही हों जाते हुये कि ये लोग जाम में क्यों फ़ंसे हुये हैं। इधर फ़ुटपाथ पर क्यों नहीं चलते जिधर जाम नहीं है।
खैर, कुछ देर में जाम खत्म हो गया। और हम आगे निकल लिये। पुल के नीचे देखा कुछ स्थानीय नागरिक पुलिस का सहयोग करते हुये गाड़ियों को सही से आगे -पीछे कर रहे थे। अराजक लोगों को तात्कालिक रूप से सभ्य बना रहे थे।

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