Friday, August 11, 2017

वइसे भी बुरा मानने पर कोई जीएसटी तो लगा नही है

आज सुबह-सुबह साइकिल सामने पड़ गई। पड़ क्या अड़ सी गई। घुमा के लाओ। खड़े-खड़े पहिये-पैडल सब अकड़ गए हैं।
दफ्तर का समय हो रहा था। मन किया साइकिल को गाना सुना दें:
'मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग।'
यह सोचते ही साइकिल निकाली और गद्दी को घोड़े की पीठ की तरह सहलाते हुए निकल लिए।
पहला पैडल मारते ही पता चला कि पैडल मडगार्ड से सटकर चल रहा है। लगता है दोनों की अंतरात्मा जाग गई है। गठबंधन हो गया है दोनों में। हमने सोचा इसका इलाज अब बाद में । आगे बढ़ गए।
सड़क एकदम गुलजार हो गयी थी। गड्ढे युक्त सड़क पर लोग उचकते-धँसते आते-जाते दिखे। ज्यादातर लोग दिहाड़ी कमाने निकले थे। कुछ बच्चे भी स्कूल जा रहे थे।
शुक्लागंज की तरफ से आने वाली सड़क पर तमाम बच्चे स्कूल की ड्रेस में आते दिखे। एक बच्ची साइकल से आ रही थी। चलते-चलते अपनी चुन्नी भी संभालती जा रही थी। सर सीना झुकाए चुन्नी सम्भालते अगल-बगल चौकन्ना देखते हुए साइकिल चलाते बच्चियों का स्कूल जाना भी अपने आप में पराक्रम है।
सड़क किनारे लोग सोये हुये थे। अधनंगे बदन विभिन्न मुद्राओं में सोए लोग। जो जग गए थे, खासकर युवा होते लड़के , किनारे खड़े सड़क की सवारियों को देखते हुए समय की ऐसी-तैसी कर रहे थे।
हम गंगापुल पर आ गए। सोचा सूरज भाई मिलेंगे। लेकिन वो गोल। गंगा जी दोनों तटों तक पसर गईं थीं। बांहे पसारे अलमस्त,अलसाई सुंदरी से अपने तट के बिस्तर पर लेटी हुई थीं।
गंगा जी का पानी सरपट भगा चला जा रहा था। लगता है उसको कोलकाता पहुंचने की हड़बड़ी हो। जगह-जगह पानी अलग-अलग अंदाज में बह रहा था। अलग-अलग आकृतियों में। लम्बवत आकार में बहता पानी अचानक किसी गोले की तरह की आकृति में बहने लगता। कोई बड़े आकार का पानी का गोल फूटकर छोटे आकारों में बहने लगता। राजनीतिक पार्टियों की तरह पानी अलग-अलग टूट-फूट-मिल-जुलकर आगे भगा चला जा रहा था। सामने जाते किसी पानी के समूह को देखकर कहना मुश्किल की दस मीटर पहले किस तरह बह रहा था।
अलग-अलग गुट में बहता पानी गंदगी के लिहाज से भी अलग-अलग दिखा। कोई टुकड़ा भूरा और कम गन्दा तो उसके बगल वाला थोड़ा उजला और क्यूट। लेकिन उसके बगल का ही पानी गाढा काला। देखकर लगता सीधे नाले से निकलकर वीआईपी की तरह नदी में घुस गया है। अलग-अलग तरह के गंदे पानी एक दूसरे इलाके में घुसकर 'सर्जिकल स्ट्राइक' टाइप करते हुये आगे बढ़ रहे हैं।
बीच-बीच में किसी जगह कोई पानी का बड़ा बबूला नदी सतह पर उभरता और चारों तरफ फैल जाता। ऐसा लगता मानों नदी के पेट से गैस निकली हो। नदी ने डकार ली हो और पानी हिल गया। मन किया नदी को सलाह दें कि सुबह-सुबह खाली पेट एक ठो 'ओमेज' खा लिया करो। लेकिन फिर सलाह दिए नहीं। आजकल लोग सलाह का बुरा मान जाते हैं। मानते हमेशा रहे हैं लेकिन आजकल कुछ ज्यादा ही मानते हैं। वइसे भी बुरा मानने पर कोई जीएसटी तो लगा नही है।
पुल के नीचे से निकलता पानी ऐसे सरपट भाग रहा था जैसे कांजी हाउस से छूटे जानवर, स्कूल से छूटे बच्चे, कारखानों ने निकले कामगार या फ़िर कमजोर हुई पार्टी से अंतरात्मा की आवाज पर निकला जनसेवक। पुल के ऊपर खड़ी रेल नदी का सौंदर्य निहार रही थी। रुकी हुई थी। काफ़ी देर तक खड़ी रही। फ़िर चल दी। रेल को पता नहीं चला कि हम नदी की कहानी सुना रहे हैं वर्ना वह नंदन जी की गजल हमको सुनाने लगती:
नदी की कहानी कभी फिर सुनाना,
मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना।
मुझे वो मिलेगा ये मुझ को यकीं है
बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भँवर देखना कूदना डूब जाना।
अभी मुझ से फिर आप से फिर किसी
मियाँ ये मुहब्बत है या कारखाना।
ये तन्हाईयाँ, याद भी, चान्दनी भी,
गज़ब का वज़न है सम्भलके उठाना।
हम गजल सुनकर फारिग ही हुए थे कि पुल बड़ी तेजी से हिलने लगा। मुझे लगा हमसे गले मिलने की तमन्ना है उसकी। लेकिन फिर याद आया कि रेल की गजल के जबाब में उसको भी दुष्यंत कुमार का शेर याद आ गया होगा:
तुम किसी रेल सी गुजरती हो
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
हम लौट पड़े। सामने से आता एक रिक्शा दिखा। रिक्शे में 12 स्कूली बच्चे लदे थे। रिक्शा वाला उचक-उचककर रिक्शा चला रहा था। एक आटो बीच पुल रुक गया। आटो वाला चाबी घुमा-घुमाकर उसको चलाने की कोशिश करता रहा। एक सवारी आटो उतरकर नदी को निहारते हुये बीड़ी सुलगाने लगी।
हम सवारी, नदी, पुल को निहारते हुये वापस शहर की तरफ़ लौट पड़े। कानपुर नगर निगम हमारा स्वागत कर रहा। शहर में घुसते हुये मन यह सोचकर खुश था कि अभी शहर से आने-जाने पर जीएसटी नहीं लगी है।

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Tuesday, August 08, 2017

बारिश – कुछ गद्यात्मक बिम्ब


कल बारिश में बाहर निकलना हुआ। कुछ् दिखा। उसे आपको भी दिखाता क्या, बताता हूं।
१. एक मौरम से लदा एक ट्रक कीचड़ और पानी में फ़ंसा था। उसका अगला पहिया मंहगाई की तरह ऊपर उठा था, पिछला हिस्सा खरीददारी की औकात की तरह नीचे जा रहा था। ट्रक वाले ने बालू ज्यादा लाद ली होगी। ऊपर से इंद्र देवता ने झल्ला के पानी हचक के बरसा दिया। सड़क ने भी बारिश के स्वागत में दिल खोल दिया और ट्रक उस दिल में समा गया। 
२. बारिश में सड़कों का पानी के साथ बह जाना आम बात है। जैसे ही कोई सड़क बही लोग भ्रष्टाचार को गरियाने लगते हैं। लोग पैसा क्या पूरी सड़क खा गये। 
सड़क चाहे जित्ती ईमानदारी से बनायी जाये लेकिन जब तक उसके किनारे पानी की निकासी की व्यवस्था नहीं होगी सड़क बह जायेगी। सड़क पर जमा हुआ पानी सड़क के लिये जानलेवा है। १०% -२०% की बेईमानी को गरियाते-गरियाते लोग ८०%-९०% चिरकुट प्लानिंग को अनदेखा कर देते हैं।
भ्रष्टाचार की आड़ में चिरकुट योजनाविद मलाई काटते हैं। खराब योजना भ्रष्टाचार से ज्यादा खतरनाक है। यह भी तब जब ज्यादातर लोगों को योजना बनाकर काम करना सबसे बड़ी चिरकुटई लगती है। 
३. सड़क पर के गढ्ढे और गढ्ढे और गढ्ढे में धंसी सड़क भारत के स्वर्णिम अतीत का अनायास भान कराते हैं। बचपन में पढ़ा हुआ इतिहास भड़ से याद आ जाता है -मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा में पानी की निकासी की उत्तम व्यवस्था थी।
४. सड़क पर भरा पानी, पटरी पर बैठे दुकानदारों को डराने का प्रयास करता है। लेकिन जब पानी देखता है कि यहां पटरी पर तो प्लास्टिक, रबड़ की जूते-चप्पलों की दुकानें सज गयीं, पालीथीन का मोलभाव होने लगा तो बेचारा शर्मा के थका-थका नाले,नाली, गटर,शटर में छुप जाता है। बादल भी जूते-चप्पल की दुकाने देखकर डर जाता है कि ससुरे कहीं जुतिया न दें। 
५. ऊपर की बात से यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि जहां पानी ज्यादा बरसे वहां जूते-चप्पल की दुकान खुल जाने से पानी बन्द हो सकता है। यह् हर जगह सफ़ल होता है। अगर असफ़ल भी हुआ तो क्या हुआ? पानी बन्द न हो तो दुकान तो बन्द हो ही सकती है।
६. बारिश में सड़क के किनारे खड़े एक उम्रदराज पेड़ से जमीन ने अपना समर्थन वापस ले लिया। पेड़ की सरकार गिर गयी। सड़क पर जाम लग गया। गाडियों की पेंपें-पेंपें और हार्नबाजी के बावजूद जब गाडियां टस से मस नहीं हुईं। तमाम भाईसाहब इधर होइये उधर होइये बेकार हो गये। अंतत: पुलिस के दो सिपाहियों ने मां-बहन का सहारा लिया। सारा ट्रैफिक थोड़ी देर में सीधा हो गया। जाम रास्ता, आम रास्ता हो गया।
अलग-थलग पड़े सैकड़ों भाईसाहब , बहनजी जिस काम को नहीं कर पाते उसी काम को एक मां_बहन मिलकर कर लेते हैं। इससे सिद्ध होता है कि संगठन में शक्ति है। 
७.जैसे आपके सर पर उगे हुये बाल आपकी चांद को भिगाने से रोक नहीं सकते वैसे ही आपकी छत पर उगे पीपल, बरगद के पेड़ , चाहे उन पर कोई देवता बसते हों, छत को टपकने से बचा नहीं सकते। छत टपकने से बचाने के लिये पानी का छत से सटकना जरूरी है। छत पर ठहरा हुआ पानी दायें-बायें होकर नहीं निकलता। वह आज नहीं तो कल छत पर छेद करके ही नीचे बहेगा। इस मामले में पानी बहुत जिद्दी होता है। इसलिये अपनी छत हमेशा घुटी हुयी चांद की तरह रखें। छत का कोई भी कचरा आपके कमरे के आमलेट बनने की दिशा में बढ़ा हुआ कदम है। 
८. बारिश में सड़क पर जमा हुआ पानी सभी के साथ एक समान व्यवहार करता है। वह कार और स्कूटर के इंजिन में एक ही इश्टाईल में घुसता है। अब यह बात अलग है कि आप स्कूटर की तरह कार को टेढ़ा करके उसको दौड़ाकर उछलते हुये उस पर बैठकर उसको झटके से गीयर में लाने की कोशिश नहीं कर पाते। 
९. दफ़्तर में आपकी छत से टपकता हुआ पानी आपको इस बात का विश्वास दिलाता है कि भगवान अपने बंदों के पास अपनी करुणा का प्रसाद पहुंचानें में देर भले कर दे अंधेर नहीं करता। वह जमीन के जिस टुकड़े को चाहता है उस तक पहुंच के रहता है चाहे इसके लिये उसे छत ही क्यों न फोड़नी पड़े। इसलिये छत और आपके के कमरे की फ़र्श का जब मिलन हो रहा हो तो आपको सब क्रिया-कलाप छोड़कर भगवान पर आस्था रखनी चाहिये और यह सोचना चाहिये कि भगवान को और भक्तों से भी मिलने जाना है इसलिये ये यहां से चले ही जायेंगे। 
१०. भक्त और भगवान के मिलन में अगर आपको देर लगती दिखे तो आप चाय की चुस्कियों के बीच देश, समाज, जनता, नेता को अपने मन की स्थिति के अनुसार याद करते हुये समय काटिये। लेकिन कोई काम करने से पहले फ़ाइलों को वापस जरूर भेज देजिये ताकि वे आपके दफ़्तर में जब दुबारा आयें तो और भीगी हुयी हों।

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Monday, August 07, 2017

आज नौकरी भी इंकलाब है


क्या खूब मजे का हिसाब है,
आज नौकरी भी इंकलाब है!
पता नहीं कब कहां रगड़ दें,
मालिकों का दिमाग खराब है।
कल जिस काम पर खुश थे,
आज उसी पर गर्म बेहिसाब हैं।
अरे चाय पियो यार मस्त रहो,
आज दुनिया का यही हिसाब है।
-कट्टा कानपुरी

Sunday, August 06, 2017

पंचबैंक


1. नेता और वे (डकैत) , दोनों एक ही काम करते हैं, लूटमार और डकैती का, जिसके लिए नेता आदर-सम्मान और सुख-सुविधाएं भोगते हैं, जबकि उन्हें निंदा और अपमान झेलते हुये बीहड़ों में नारकीय जीवन बिताना पड़ता है। - Suresh Kant
2. बंदूक खुद-ब-खुद किसी पर गोली नहीं दागती। जब उसका घोड़ा दबाया जाता है , तभी गोली चलती है। उससे अगर किसी की जान चली जाए , तो दोष बन्दूक चलाने वाले का ही माना जायेगा , न कि बन्दूक का। Suresh Kant
3. वे थोड़ा झुककर चलते हैं। तमाम मुद्दों पर स्टैंड लेते-लेते कुछ लचक गए हैं। - Sushil Siddharth
4. राजनीति में रहना है तो सोचना पड़ता है। ऐसे में विचार बदलेगा ही। जिस अखबार के लिए बोलना है उसके अनुसार बदलेगा। - Sushil Siddharth
5. हम गोबर लेकर लीप देते हैं। यह है हमारा विचार। -Sushil Siddharth
6. सबका गरीब अलग है। सत्ता का अलग। बेसत्ता का अलग। -Sushil Siddharth
7. पार्टी ने जाने कितना पूजा-पाठ कराया है, जाने कितने गण्डा ताबीज बनवाये हैं, तब किसानों के लटकने का शुभ अवसर आया है। इस लटकोत्सव को गंवाना नहीं है। लम्बा खींचना है। उनकी फांसी की रस्सी को पकड़कर हमें कुर्सी तक पहुंचना है| Sushil Siddharth
8. जो इतना मुल्क में हो रहा है, वह सब करने वाली जनता क्या कनाडा से मंगाई जा रही है या लंदन से आ रही। मौज सब मारें, मरने के लिए हम। Sushil Siddharth
9. चोर पकड़े जाने से बुरा शर्मिंदा होने का मानता है। शर्मिन्दगी इस बात की कि वह पकड़ा गया। वह चोर ही क्या, जो पकड़ा जाये।- Suryakant Nagar
10. जेल में सड़ रहे संत-नेता अदालत ले जाते वक्त हाथ हिलाकर मुस्कराते हैं तो इसकी वजह चरबी चढी उनकी देह है। शर्म रिबाउंड कर जाती है। - सूर्यकांत नागर
11. खुदकशी और आत्मदाह जनता टाइप गरीब-गुरबों में से कोई करता है। उसके लिये रेलगाड़ी की पटरी, नकली दवाओं के लाइसेंस, डिग्रियों का घुन खाता पुलिंदा और पापी पेट आदि स्थितियां हर कहीं उपलब्ध हैं। - सूर्यबाला
12. देश पर बड़े-बड़े लोग ही मरा-मिटा करते हैं। सबके बस की बात नहीं यह। बड़ी हिकमत लगानी पड़ती है, मेनीफ़ेस्टो बनाने होते हैं -उसमें सिलसिलेवार मर-मिटने का प्रक्रिया दर्ज करनी होती है। -सूर्यबाला
13. जब तक मंत्री पद पर व्यक्ति होता है, वह ’सर’ सहित होता है, मंत्री पद से हटते ही ’सर’ रहित। - Hari Joshi
14. सरकार बहरी और प्रजा गूंगी, तो तंत्र निर्विरोध काम करता है। सुनना न सुनना सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है। - Hari Joshi
15. सरकार के बिना अपने समाज की कल्पना असंभव है, इसलिये बड़े शहरों में बहुतायत से और छोटे गांवों या कस्बों में बिखरी हुई, कहीं दबंगई से, तो कहीं ठिठक- ठिठककर चलती हुई सरकारें देखी जा सकती हैं। -@Hari Joshi
16. सरकार वही, जो तेज चाल चले। जब वह कोई चाल नहीं चलती, तो उसमें भी कोई न कोई चाल छिपी होती है। - Hari Joshi
17. सरकारें उन्हीं को कहते हैं, जिनमें कई-कई सर और अनेकानेक कारें होती हैं। - Hari Joshi
18. ’आप कैमरे की नजर में हैं’ पढकर मुझे लगता है कि यह वाक्य कह रहा है कि हे देश के उठाईगीरे, बेईमान, चोर और भ्रष्ट नागरिक, संभल जा। कैमरे लगे होने के कारण कोई ऐसी-वैसी छिछोरी हरकत मत करना। हम तेरा असली चरित्र जानते हैं। तू पैदाइशी शरीफ़ बदमाश है तथा पलक झपकते ही कुछ भी गायब कर सकता है और अंटी कर सकता है।- हरीश कुमार सिंह
19. हम उन्हें वोट देते हैं जिताने के लिये, वो हमें झुग्गी देते हैं सिर छिपाने के लिये। हम एक-दूजे के लिये हैं। तू मेरे लिये मैं तेरे लिये। -Harish Naval
20. राशन कार्ड हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। वह हमारा पासपोर्ट है। सबको मिलना चाहिये, मिलेगा। बिजली बोर्ड वाले हमें कहीं से भी तार खींचकर बिजली दे जाते हैं, हम खुशहाली दिखाते हैं। -@Harish Naval
21. हमने देश में सुलभ का कारोबार बढाया है। समझो, हम उनकी इंडस्ट्री में कच्चा माल सप्लाई करते हैं। उनकी वाहवाही होती है, हमारी सफ़ाई होती है। - Harish Naval
Giriraj Sharan Agrawal एवं Ramesh Tiwari द्वारा संपादित संकलित ’समकालीन हिन्दी व्यंग्य’ से साभार !

शर्तें लगाई नहीं जाती दोस्तों के साथ

आज सुबह घर से निकले तो तीन बच्चे मिल गए। एक केवल पटरे वाला जांघिया पहने। दो कमीज धारी। सड़क पर गलबहियां डाले चले जा रहे थे। हाथ में राखी टाइप धागे बंधे थे। लेकिन बात की तो पता चला 'फ्रेंडशिप बैंड' है। बिना कमीज वाला बच्चा तीन बैंड बांधे थे। एक की कीमत बताई 8 रुपया।
कई दोस्त हैं बच्चों के। नाम भी गिनाने लगे। बताया चार, तीन में पढ़ते हैं। बिना कमीज वाला केजी में पढता है। छुटपन में भाई नहीं रहा तो पढ़ाई छुड़वा दी गयी थी। बहन नहीं है लेकिन रक्षा बंधन के खर्चे के लिए हलकान।हमको फ्रेंडशिप बैंड बेचने की बात भी की लेकिन बस ऐसे ही।
सुबह उठकर खेलने जा रहे थे।लेकिन फिर बात करते हुए वापस लौटकर चल दिये।
आज फ्रेंडशिप डे है। मुझसे फेसबुक पर आए सन्देशों से पता चला। सुबह-सुबह और कई मित्रों के संदेशों के एक नए मित्र का सन्देशा आया। राघव । पिछले हफ्ते मुलाकात हुई थी राघव से। अर्मापुर के रास्ते में ओएफसी के सामने फुटपाथ पर प्लास्टिक की रस्सी के बने झूले बेंचता है। 100 रुपये का एक। विज्ञापन के रूप में एक झूला पेड़ पर डालकर उस पर झूलता रहता है।
उस दिन झूलते हुये मैने उसकी फोटो खींची तो बोला मुझे भेज दो व्हाट्सएप पर। मुझसे बनी नहीं तो फौरन खाता जोडकर खुद को भेज दी। उसका नाम भी सेव कर लिया मैंने। राघव। आज मेसेज आया तो ध्यान आया इतवार को मिले थे। लहजे से लगता है दक्षिण भारत का रहने वाला है। कानपुर में मुंबई से आया है। कानपुर में पेड़ तो घरों में बचे नहीं। झूला कौन झूलेगा।
दोस्ती दिवस पर जिन दोस्तों के संदेशे आये उनको भी मुबारक 'फ्रेंडशिप डे'। वसीम बरेलवी के इस शेर के साथ:
शर्तें लगाई नहीं जाती दोस्तों के साथ
कीजिये मुझे कुबूल मेरी हर कमी के साथ।
दोस्तों के मामले में मैं हमेशा सौभाग्यशाली रहा। बहुत अच्छे दोस्त मिले जीवन में। इनमें आभासी दुनिया के माध्यम से बने दोस्त भी शामिल हैं। अब यह दोस्तों की किस्मत कि उनके पल्ले हम पड़े। 

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Saturday, August 05, 2017

हर कला विकसित होते-होते ’कलाबाजी’ हो जाती है -परसाई



परसों ’ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान’ पर अपनी बात रखी। इसके बाद परसाई जी का एक लेख पढा। अच्छा लगा तो सोचा आपसे भी साझा करें। परसाई जी का यह लेख उनके कल्पना पत्रिका में छपे लेखों के संकलन ’और अन्त में’ से लिया गया है। किताब का पहला संस्करण 1980 में आया था। मतलब लेख उसके पहले का होगा।
लेख इनाम के संदर्भ में है। लेख के कुछ पंच पहले पेश करते हैं :
1. भारतीय लेखक की हालत अजीब हो गई है। अदना से अदना लेखक के चेहरे पर मुझे एक लाख का चैक चिपका दिखता है।
2. जिसे इनाम चाहिये वह चुप ही रहेगा।
3. जो इनाम की आलोचना कर रहे हैं , वे अपना भविष्य बिगाड़ रहे हैं। उन्हें इनाम नहीं मिलेगा।
4. जो जय बोल रहे हैं, उन्हें भी नहीं मिलेगा क्योंकि इनामदाता जानते हैं कि ये लॉटरी और वर्ग पहेली के इनामों में भी इसी तरह जय बोलते हैं।
5. इनाम उन्हें मिलेगा, जो चुप हैं।
6. हर कला विकसित होते-होते ’कलाबाजी’ हो जाती है। इसलिये जो आगे देखता है, जो भविष्यदृष्टा है, वह कला को छोड़कर ’कलाबाजी’ पर ध्यान देता है।
7. मान भी लिया कि पक्षपात होगा, तो क्या गलत होगा? कोई पैसा भी दे गांठ से और आप उसे बतायें कि अमुक को दे दो! कोई सार्वजनिक चन्दे का पैसा तो है नहीं !
8. भारतीय लेखक, विशेषकर हिन्दी लेखक विचित्र होता है। वह सर पर कफ़न बांधे रहता है। इसे पैसा नहीं दो तो शिकायत करता है कि लेखक को कुछ नहीं मिलता। और पैसा देने लगो, तो दूर भागता है। पैसे की कीमत ही नहीं समझता वह।
अब लेख भी बांच लीजिये।
प्रिय बन्धु,
दुनिया के आकाश और भारत के साहित्याकाश , दोनों में एक साथ हलचल मच गई। उधर क्रिसमस द्वीप पर बम विस्फ़ोट हुआ , इधर दिल्ली में एक लाख के इनाम की घोषणा हुई। दोनों विस्फ़ोट एक साथ हुये- पता नहीं किसने किसके साथ समय साधा! भारतीय लेखक की हालत अजीब हो गई है। अदना से अदना लेखक के चेहरे पर मुझे एक लाख का चैक चिपका दिखता है।
भारी हलचल है। पुरस्कार के पक्ष में और विपक्ष में लोग बोल और लिख रहे हैं। ’जय’ और ’धिक’ के नारों से आसमान ऐसा भर गया कि प्रेमीजनों को रेडियो सीलोन के गाने सुनने में कठिनाई पड़ रही है। लोग मुझसे कहते हैं कि तुम इस पर कुछ क्यों नहीं बोलते। मैं कहता हूं , मैं चुप हूं, क्योंकि मुझे इनाम चाहिये। जिसे इनाम चाहिये वह चुप ही रहेगा। जो इनाम की आलोचना कर रहे हैं , वे अपना भविष्य बिगाड़ रहे हैं। उन्हें इनाम नहीं मिलेगा। जो जय बोल रहे हैं, उन्हें भी नहीं मिलेगा क्योंकि इनामदाता जानते हैं कि ये लॉटरी और वर्ग पहेली के इनामों में भी इसी तरह जय बोलते हैं। इनाम उन्हें मिलेगा, जो चुप हैं। शीतयुद्द में तटस्थ देशों को लाभ मिलता है; भिलाई और राउरकेला दोनों हाथ आते हैं। इसीलिये हम चुप हैं। हमें यह इनाम लेना ही है।
मेरे सामने प्रश्न यह है कि यह इनाम किसे मिलेगा। घोषणा को ध्यान से पढने पर मेरे हाथ ’कला की दृष्टि’ शब्द पड़े। यही योजना की पकड़ है। विशुद्ध कला की दृष्टि से जो ग्रंथ श्रेष्ठ होगा, उसी पर इनाम मिलेगा। आप जानते हैं कि हर कला विकसित होते-होते ’कलाबाजी’ हो जाती है। इसलिये जो आगे देखता है, जो भविष्यदृष्टा है, वह कला को छोड़कर ’कलाबाजी’ पर ध्यान देता है। जो लोग इनाम के पक्ष-विपक्ष में बोल रहे हैं, वे कला को दृष्टि में रखकर सोच रहे हैं। वे भूल रहे हैं कि साहित्य रचना कला की सीमा से आगे बढकर ’कलाबाजी’ तक पहुंच गई है। जो कला में अटके रहेंगे, उनका भविष्य बिगड़ेगा।
मैं जब स्कूल में पढता था , तब हर साल किसी लड़के को सर्वोच्च आचरण पर इनाम मिलता था। इनाम का निर्णय हैडमास्टर साहब, ड्रिल मास्टर की सलाह से करते थे। सर्वविदित है कि स्कूलों में लड़कों के आचरण पर नजर रखने की जिम्मेदारी ड्रिल मास्टर पर होती है। जिन लड़कों को इनाम पाना होता, वे इन दोनों की निगाह में अच्छे लड़के बनने का प्रयत्न करते थे। वे दिन में दस बार हैडमास्टर को ’नमस्ते सर!’ कहते थे। जहां कहीं हैडमास्टर दिख जाते, एकदम झुककर ’नमस्ते सर!’ छोटी छुट्टी में, बड़ी छुट्टी में, स्कूल बंद होने पर, खेल के मैदान में हर बार ’नमस्ते सर’ कहते थे। इसी तरह ड्रिल मास्टर को खुश करते थे। बड़े मान से कवायद करते, उनके हर काम करने को तैयार रहते, उनके लिये पास के बगीचे से अमरूद तोड़कर ले आते। साल के अन्त में अच्छे आचरण के लड़के का नाम घोषित होता और वह इनाम पा जाता। कभी ऐसा भी होता था कि जो अपने को सबसे अच्छा लड़का सिद्ध करता, उसे न मिलकर इनाम दूसरे को मिल जाता क्योंकि वह दूसरा लड़का स्कूल कमेटी के किसी सदस्य का कोई होता। मगर एक बात विचित्र होती- ’जिसे इनाम मिलता, वह लड़कों के बीच बहुत निकम्मा और सत्वहीन माना जाता। साल-भर इनाम लेने की कोशिश में वह ऐसी ’कलाबाजियां’ करता कि जब उसे इनाम मिलता तो हमें लगता एक हममें से सबसे निकम्मे, दब्बू और व्यक्तित्वहीन लड़के को चुन लिया गया। फ़िर भी कोशिश होती ही थी क्योंकि इनाम बड़ी चीज है।
बन्धु, स्कूल की सीखी बातें जीवन भर काम आती हैं। इनाम पाने की इस तरकीब के उपयोग करने का अब मौका आया है। हैडमास्टर को ’नमस्ते सर’ का सिलसिला जमाता हूं। ड्रिल मास्टर को खुश करने के प्रयत्न भी करूंगा। लोगों ने घोषणा के बाद जैसा बातावरण बना दिया है, उसमें कई लोग कोशिश करने में झेपेंगे। जो साहस से काम लेगा, उसे इनाम मिल जायेगा।
बन्धु, लोग अटकलें लगाने लगे हैं- अमुक को मिलेगा, अमुक प्रकार के साहित्य को मिलेगा, अमुक विचारधारा वालों को मिलेगा। उधर से जबाब आता है कि निर्णय निष्पक्ष होगा। मैं कहता हूं, इस मामले में हमें नाई से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। नाई रे नाई मेरे सिर में कितने बाल? नाई ने निहायत संजीजगी से कहा- ’अभी सामने आये जाते हैं!’ पहला इनाम साल भर में मिल ही जायेगा। उसी से पता चल जायेगा। और मान भी लिया कि पक्षपात होगा, तो क्या गलत होगा? कोई पैसा भी दे गांठ से और आप उसे बतायें कि अमुक को दे दो! कोई सार्वजनिक चन्दे का पैसा तो है नहीं !
बन्धु भारतीय लेखक, विशेषकर हिन्दी लेखक विचित्र होता है। वह सर पर कफ़न बांधे रहता है। इसे पैसा नहीं दो तो शिकायत करता है कि लेखक को कुछ नहीं मिलता। और पैसा देने लगो, तो दूर भागता है। पैसे की कीमत ही नहीं समझता वह। घोषणा-पत्र में इसी नासमझी को ध्यान में रखकर समझाया गया है कि हे लेखक, तुझे पाठक मिलने से उतनी खुशी नहीं होती जितनी पैसा मिलने से। इतना साफ़ समझाने पर भी कोई न समझे तो वह अभागा है। भई हम तो हेडमास्टर को ’ नमस्ते सर’ कहेंगे।
- हरिशंकर परसाई ’और अंत में’ पुस्तक से।
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Friday, August 04, 2017

जुगाड़ देखते-देखते सरकारों तक पहुंच रहे हैं लोग



घर से निकलते ही बाबा जी गेट पर मिल गए। साथ में गौबच्चा। गाय की गर्दन पर उभरी 'गूमड़ खाल' उठाकर हमको दिखाने लगे। गाय की आशीष मुद्रा। गाय गूंगी। चुप। क्या पता कहना चाह रही हो -'उसके झांसे में मत आना।' लेकिन कह नहीं पा रही थी।
गाय के हाल उस महापुरुष सरीखे लगे जिस पर उसके स्वयंसेवक जबरियन कब्जा कर लेते हैं। उसको अपने हिसाब से चलाते हैं और उसके आधिकारिक प्रवक्ता बन जाते हैं।
बाबा जी उसका आशीष हमको दे रहे थे। गाय पर बाबा का मालिकाना हक इसलिये बाबा उनके अकेले भाष्यकार।
गाय के चलते बाबा ताकतवर से लगे। लेकिन हालचाल पूछते ही मुलायम हो गए। पता चला फैजाबाद के हैं। शुक्लागंज में डेरा है। गंगाघाट पर। गंगा किनारे बनाते -खाते हैं। इसके पहले नवरात्र में बारादेवी पर रहे। खानेपीने का चौकस जुगाड़ बनता रहा।
मुझे लगा कि बाबा लोग सबसे बढ़िया जानकार होते हैं इस बात के कि खाने पीने का जुगाड़ कहां है। जुगाड़ देखते-देखते सरकारों तक पहुंच रहे हैं लोग कहीं-कहीं।
परिवार में बताया पत्नी हैं। दो बेटियों की शादी कर दी। जिम्मेदारी पूरी। अब टहल रहे हैं आराम से। घरैतिन घर में। बाबा जी शहर में।
हमने पूछा कि घरैतिन को घर में छोड़कर यहां कहाँ घूम रहे कानपुर में।
बोले- 'हम गोसाईं लोग हैं। ऐसे ही रहते हैं।'
गऊ की उम्र करीब तीन साल बताई। दान में मिली है। गर्दन पर मांस खाल वाली गाय को लोग दान कर देते हैं। रखते नहीं। जो घरवालों के लिए जिस कारण बेकार उसी को दिखाकर बाबा जी कमाई कर रहे।
अपने खाने के साथ गाय के खाने का भी इंतजाम करना होता है। भूसी चूनी आदि।
काफी बात हो गयी तो मन किया कुछ दिया ही जाए बाबा जी को। बटुए में एक्को पैसा नहीं। घर से मंगाकर 10 रुपये दिए बाबा जी को। डर भी था कहीं शिकायत न कर दें -'सबेरे-सबेरे बोहनी खोटी की गाय की।'
चलते चलते नाम बताया बाबू लाल। पास से देखा आगे के अब दाँत मसाले के हमले में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। चेहरे पर निरीह भाव। गाय के चेहरे के भावों से जुगलबन्दी करते हुए।
हम चले आये। बाबा किसी ओर घर के बाहर गाय की गर्दन का मांस उठाकर दिखाते हुए सावन का आशीर्वाद दे रहे होंगे। खाने का जुगाड़ कर रहे होंगे।

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Thursday, August 03, 2017

ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान


कल Sushil Siddharth जी ने ’ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान’ की घोषणा की। सुशील जी पहले भी कई बार कई इनाम घोषित कर चुके हैं। वलेश सम्मान की घोषणा 'गोपाल चतुर्वेदी' जी को देने के लिये की। गोपाल जी ने फ़ौरन मना किया तो सुशील जी फ़ौरन उसे निरस्त कर चुके हैं। गोपालजी के साथ Indrajeet Kaur के लिये भी घोषित किया था उन्होंने मना नहीं किया लेकिन गोपाल जी के मना करने के साथ उनका स्वत: ही निरस्त हो गया। गेंहूं के साथ घुन पिसना इसे ही कहते हैं शायद।
अब इस बार ’ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान’ की घोषणा हुई। ज्ञानजी बिना शक हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ रचनाकार हैं। आज के सबसे अग्रणी व्यंग्यकारों में हैं। लेकिन उनके नाम से इनाम की घोषणा सुनकर कुछ अटपटा लगा।
अटपटा इसलिये कि किसी के नाम पर सम्मान उसके स्मृतिशेष होने पर दिये जाने का चलन है। जबकि ’हम न मरब’ के रचनाकार ज्ञान जी को अभी कई कृतियां देनी हैं हिन्दी साहित्य को।
मध्यप्रदेश में 'लता मंगेशकर सम्मान' दिया जाता है। लता जी उनमें से आज तक कभी गयीं
पता नहीं इस इनाम में ज्ञान जी की सहमति है कि नहीं? अगर है तो यह उनकी पुरस्कारों के मामले में फ़िर एक गलती की तरह सामने आयेगी। उन्होंने अपने मित्र समर्थ लेखक अंजनी चौहान को कोई इनाम दिलाने की मंशा से लालित्य ललित के लिये सम्मान देने की स्वीकृति की थी। जिसे बाद में हल्ला मचने पर उन्होंने उसे अपनी गलती माना और अपने को मैला ढोने वाला लेखक बताया।
सुशील जी ने अगर यह इनाम अपनी तरफ़ से घोषित किया है तब मुझे कोई एतराज नहीं है। वे ज्ञान जी को ’व्यंग्य का देवता’ मानते हैं। देवता को खुश करने के लिये किये गये तमाम प्रयासों में से यह एक प्रयास है तब भी कोई एतराज नहीं। वैसे देवताओं के नाम पर मंदिर बनाये जाने की परंपरा है अपने यहां। इनाम वाली परंपरा नई शुरुआत है। व्यंग्य का नया तेवर है यह। इसमें करुणा की घनघोर अन्तर्धारा धारा बह रही है।
अगर सुशील जी ने ज्ञान जी को अपना गुरु मानते हुये इस इनाम की घोषणा की है तो उनका ’श्रीलाल शुक्ल जी स्मृति सम्मान’ देने का पहला कर्तव्य बनता है। 15 हजार रुपये इनाम भी बहुत कम हैं भाई। लेकिन अगर देना ही है तो इनाम के पैसे कुछ ज्यादा करो भाई। हिन्दी व्यंग्य संसार इतना भी दरिद्र नहीं कि ज्ञान जी के सम्मान के नाम पर सहयोग न कर सके।
बातें बहुत हैं। वह फ़िर कभी लेकिन यह व्यंग्य का मजेदार पहलू है। ज्ञान जी की इस पर प्रतिक्रिया क्या है यह पता नहीं चली। वैसे भी ज्ञान जी आम तौर पर अपने पत्ते देर से खोलते हैं। तसल्ली से तौलकर प्रतिक्रिया देते हैं।
मेरा कोई विरोध तो नहीं ’ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान’ से। लेकिन इसके पीछे मंशा सस्ते में मठाधीश बनने की लगती है। देवता को मंदिर से निकालकर उसको झंडे की तरह फ़हराने की लगती है। एक समकालीन श्रेष्ठ व्यंग्यकार पर कब्जा करने की कोशिश की लगती है। एक बहुत बड़े लेखक को 15000 रुपये की बाउंड्री बनाकर उसमें कैद करके बैठा देने की लगती है।
ज्ञान जी का वास्तविक सम्मान करने के लिये मेरी समझ में उनके लिखे पर खूब सारी बातें होनी चाहिये। उनके लेखन के विविध आयामों पर चर्चा होनी चाहिय।
यह बातें इसलिये लिखी क्योंकि ज्ञान जी मेरे प्रिय लेखकों में से एक हैं। हालांकि दुनिया उन्होंने मुझसे ज्यादा देखी है लेकिन फ़िर भी मुझे लगता है कि जिस बात से उनका सम्मान कम होने की बात लगे उसको मुझे साफ़ बताना चाहिये। वे मेरे प्रिय हैं, आदरणीय हैं । देवता नहीं।
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Wednesday, August 02, 2017

आओ बाबू, चाय पी लेव


'आओ बाबू, चाय पी लेव' - घर के बाहर बैठी महिलाओं ने कहा।
कल ही मिली थीं। दो मिनट की बातचीत के बाद चाय का न्योता। हालांकि पिलानी नहीं थी क्योंकि सबके पास एक ही प्लास्टिक के ग्लास में थी चाय। लेकिन जज्बा था। वही बहुत।
बैठे हुए चाय पीते महिलाएं कल खड़ी हुई बतियाती महिलाओं से अलग लगीं। आज वे बातचीत ने बेतकल्लुफ थीं। मुखर। हमने पूछा -'एक और कहां गयीं? आज नहीं आई क्या?'
'वो चाय की दुकान पर चाय पी रहीं हैं। आती होंगी।' -बताया उनलोगों ने।
कुछ के पास टिफिन हैं। कुछ बेटिफिन। हम पूछते हैं -'बिटिया
बहुरिया बनाती होंगी टिफ़िन तो ?
'कहाँ हैं बहुरिया। खुदै बनवाएं का परत है।' - एक ने कहा।
'अरे तुम्हरे नहीं हैं तो का केहुके नहीं हैं। हमार तौ बहुरिया बना के देति है सबेरे टिफ़िन। ' - दूसरी ने प्रतिवाद किया।
बिटिया बहुरिया से बात मायके तक पहुंची। हमने एक से पूछा -'मायका कहां है तुम्हार ?
'बहुत दूर है। सफीपुर। उन्नाव।'
'बहुत दूर कहां? आजाद नगर से आती हो। दो बार आने जाने के बराबर दूरी पर है मायका।' -हम अपना ज्ञान झाड़ते हैं।
इस बीच बात दिहाड़ी की हुई। बोली, 'हमरी नौकरी लगवा देव साहब, तो हमहू का पैसा ठीक मिलन लगिहैं।'
हम बोले -'नौकरी लगना मुश्किल है आजकल। नौकरी लग कहां रहीं हैं। छूट रही हैं आजकल।'
इन लोगों को चाय दुकान पर किसी ने दिला दी। ये पीते हुए बतियाते हुए दिन की शुरुआत कर रही हैं। सब उम्रदराज हो रही हैं। अधिकतर के दांत हारी हुई पार्टी के विधायकों की तरह मुंह का साथ छोड़ चुके हैं। लेकिन काम करते हुए चुस्ती बरकरार रखे हुए हैं सब।
महिलाओं से गुफ्तगू के पहले वहीं खड़े रिक्शेवाले से बतियाये। मुंह पूरा पान से भरा हुआ। हमने मुंह खुलवाकर फोटो खींचकर दिखाया उनका फोटो उनको ही। समझाया भी कि दांत खराब हो गए पान के चक्कर में। काहे खाते हो?
उसने सुन लिया और मुस्कराते हुए बोला -'दांत तो बहुत पहले बचपन से ही खराब हो गए।'
जबाब का अंदाज , 'अब क्या खाक मुसलमां होंगे वाला था। '
आगे चलते हुये देखते हैं इनके साथ कि महिला भी चाय की दुकान से लपकती हई चली जा रही है। अब तक वो काम मे जुट गयीं होंगी।
हम भी जुटते हैं। आपका दिन चकाचक बीते।

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Tuesday, August 01, 2017

न पहनें न ओढ़े, फ़ोटो खिंचवावन खातिर बीच मां टप्प से घुसि गईं


सबेरे दफ्तर के लिए निकले। गाड़ी सर्विसिंग के लिए जमा है। साथी चतुर्वेदी जी लेने के लिए आने वाले हैं। उनका इंतजार करते हुए घर से बाहर निकलते हैं। घर के बाहर कुछ महिलाएं इकट्ठा हैं। हम चतुर्वेदी जी का इंतजार करते हुए उनसे बतियाने लगते हैं।
मैदान में घास छीलने का काम करने के लिए आई हैं महिलाएं। साढ़े आठ बजे मैदान खुलेगा। तब काम शुरु होगा। शाम पांच बजे तक काम करती हैं। 200 रुपये मिलते हैं रोज के। दो-तीन दिन बाद मिलते हैं पैसे।
न्यूनतम मजदूरी 536 रुपया प्रतिदिन है। आधे से भी कम मजदूरी में काम करती हैं महिलाएं। हम कहते हैं -'बहुत कम मिलते हैं।'
रोज 20 रुपया खर्च करके आते हैं हम लोग - 'एक बताती है। '
उनको पता भी नहीं है कितनी न्यनतम मजदूरी है। कितना उनका हक है। पता हो जाए तो शायद दुख हो। अभी तो चहकती हुई, अच्छे से तैयार होकर काम पर आई हैं। 200 रुपये भी बहुत हैं उनके लिए।
फोटो खींचने के लिए पूंछते हैं तो हंसने लगती हैं। एक मुंह ढंककर पीछे चली जाती हैं। खींचकर दिखाते हैं तो लपककर देखती हैं। दुबारा खींचने की बात करते हैं तो एक कहती हैं (सामने हरी साड़ी वाली) खराब आये डिलीट कर देना। उनको फोटो अच्छी न आने पर डिलीट करने का हिसाब पता है।
दुबारा खींचकर दिखाते हैं तो खुश-खुश देखती हैं। तब तक चतुर्वेदी जी आ जाते हैं। हम चल देतेे हैं।
पीछे से सुनते हैं सब महिलाएं एक महिला से मजे लेते हुए कहती हैं -'न पहनें न ओढ़े, फ़ोटो खिंचवावन खातिर बीच मां टप्प से घुसि गईं।' सबकी हंसी दूर तक सुनाई देती है।
ये महिलाएं घर से निकल रही हैं । बिना 'सेल्फी विदाउट मेकअप' और 'ब्लैक डीपी' के अभियान के अपनी तरह से महिला सशक्तिकरण की मुहिम पर लगी हैं। दोनों में कोई विरोध भी नहीं है। हर तरफ से आगे बढ़ना है।
आगे सड़क पर जाम है। बस वाला बीच सड़क पर बस रोककर सवारी भर रहा है। बस को 'जाम करके ' वह बस आगे बढ़ाते। जाम हटता है। हम आगे बढ़ते हैं। जाम का सदुपयोग करके पोस्ट रास्ते में टाइप करते हैं।
दफ्तर आकर बायोमेट्रिक में उपस्थिति दर्ज कराते हैं। इसके बाद काम में जुट जाते हैं।
आप मजे से रहिये। बाकी किस्सा जल्दी ही शाम को सुनाते हैं।
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Monday, July 31, 2017

लाला भइया की फेमस चाय


कल टहलते हुये तमाम लोगों से मेल-मुलाकात हुई। गये थे ’सैंट्रो सुन्दरी’ की सर्विंग कराने। गाड़ी को सर्विस के लिये छोड़कर पैदल , ऑटो , बस से टहलते हुये आये।
फ़जलगंज से ’ई रिक्शा’ में बैठकर आये नरेन्द्र मोहन सेतु तक। वहां उतारकर रिक्शावाला चला गया। हम आगे चल दिये। कुछ देर बाद फ़िर पीछे से आया और हमको जबरियन टाइप बैठाकर पचास कदम और आगे छोड़ दिया। मुफ़्त में।
रीजेन्सी में एक साथी को देखने गये। बिजली मिस्त्री का काम करते हैं। ओईएफ़ में। पिछले हफ़्ते खम्भे की बिजली ठीक कर रहे थे। ’ऊंचे वाले प्लेटफ़ार्म’ गाड़ी पर। अचानक ढाल पर खड़ी गाड़ी पीछे चल दी। खम्भों से टकराती हुई गाड़ी पीछे चल दी। एक गड्डे में घुस गयी। जान बचाने के लिये ऊंचाई से कूद गये सत्यवान। दोनो पैर, दोनो हाथ और जबड़ा टूट गये। जान बच गई का सुकून लिये रीजेन्सी में इलाज करा रहे हैं।
जरा सी असावधानी जिन्दगी के लिये कितनी भारी पड़ जाती है इसका एहसास फ़िर से हुआ कल।
रीजेन्सी के बाहर ही ’लाला भइया की फ़ेमस चाय’ की दुकान’ बैनर फ़ड़फ़ड़ा रहा था। बैनर चाय का लेकिन बिक चाय के अलावा और तमाम कुछ रहा था। हम भी फ़ेमस चाय का जायका लेने के लिये रुक गये। चाय बनने की जगह दुकान ’लाला टी स्टॉल’ हो गयी थी। भइया गोल हो गये। चुनाव घोषणा पत्र और उसके अमली जामें में अन्तर टाइप।
बड़े भगौने में चाय ’चुर’ रही थी। भइया जी सफ़ेद दाढी में तल्लीनता से चाय बनाये जा रहे थे। बनने के बाद सबको बांटी। कुछ लोग ले जाने के लिये भी आये थे चाय। चार चाय का एक नपना भी था। उसमें पॉलीथीन को घुसाकर चाय डालते और फ़िर लपेटकर दे देते। नपाई और सफ़ाई की व्यवस्था एक साथ। फ़िर भी काउंटर पर काम भर की गंदगी थी। एल्युमिनियम का प्लेटफ़ार्म काला पड़ गया था। लेकिन कहे कौन ? कहते तो क्या पता अगल-बगल की दुकानों की गंदगी दिखाते हुये कहते उनसे तो साफ़ है। राजनीतिक दल ऐसा ही तो करते हैं। किसी की कोई गड़बड़ी की बात करो तो दूसरे दल की बड़ी गड़बड़ी का हवाला देते हुये अपनी गड़बड़ी को दुरुस्त बताता है।
एक चाय के दाम छह रुपये। हमने कुल्हड़ में ली। चाय बढिया लगी। तारीफ़ की तब थोड़ा खुश हुये भइया जी। छह रुपये लिये। हम आगे बढे!
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जीवित रहने की इच्छा का गोंद

रीजेंसी से टहलते हुए रावतपुर क्रासिंग पर आए। सवारी तलाश रहे थे कि सामने से बस धड़धड़ाती हुई आई। हम लपककर चढ़ लिए। किनारे की सीट खाली थी। हम बैठ गए। बैठने से पहले देख लिया कि सीट महिला और बुजुर्ग की तो नहीं है।
रावतपुर से फूलबाग का टिकट काट दिया कंडक्टर ने 12 रुपये। हम सालों बाद शहर में किसी बस में बैठे थे। अकेले ऑटो इत्ती दूर के सौ-दो सौ लेता। ओला कम से कम 200 रुपये का गोला छोड़ता। लेकिन सार्वजनिक बस 12 रुपये की। ये खूब सारी चलनी चाहिए।
ड्राइवर गाड़ी चला रहा था और कंडक्टर को हिदायत भी देता जा रहा था। एक तरह से ड्राइवरी और कंडक्टरी एक साथ कर रहा था। इसके बाद उसको हड़काता भी जा रहा था कि तुम्हारा काम भी मैं ही कर रहा हूँ। किसी सरकार के ऐसे मुखिया की तरह जो अपने काम के साथ अपने सहयोगियों के काम भी करता रहे।
फूलबाग दस-बारह मिनट में ही पहुँच गए। उतरकर पैदल चल दिये कैंट की तरफ। रास्ते में कई नजारे दिखे। एक जगह एक रिक्शा वाले फुटपाथ पर बैठे लकड़ी चीरने का जुगाड़ कर रहे थे। बताया कि बिठूर से आये थे। सालों पहले। तबसे यहीं फुटपाथ पर बसेरा है। मिट्टी, मोमिया और कबाड़ के गठबंधन की झोपड़ी। अतिक्रमण करके रहते हुए बीस साल गुजर गए।
बिठूर के रहने वाले सत्यप्रकाश गुप्ता मुंह में फुल मसाला भरे अपने बिठूर से कैंट आने की कहानी सुनाते रहे। पचास की उम्र है। चार बच्चों में एक बिटिया की शादी कर चुके। तीन को पालना है। बच्चे अब्बी पढ़ते हैं। फुटपाथ में रहते हुए क्या पढ़ते होंगे, क्या जीते होंगे समझना मुश्किल।
हमारे घर की बाउंड्री के बाहर एक रिक्शेवाले गद्दी पर बैठे खाना खा रहे थे। साथ में रिक्शे के पास खड़े कुत्ते को खिला रहे थे। पता चला शुक्लागंज में रहते हैं। रिक्शा लेकर अभी कुछ देर पहले घर से निकले हैं। खाना लेकर। अभी खाना खाकर कुछ देर आराम करेंगे फिर दो बजे से रिक्शा चलाएंगे।
हमने पूछा -'जब घर से निकलते ही खाना खाना था तो खाना खाकर निकलते। आराम से दो बजे।' इस पर बोले -'घर से खाकर निकलते तो फिर निकल नहीं पाते। खाना खाने के बाद आलस आता है । निकलने का मन नहीं करता।'
'किधर चलाओगे रिक्शा आज' पूछने पर बोले बेगमगंज, परेड की तरफ जायेंगे। उधर सवारी मिल जाती हैं आज के दिन।
और बात करने पर पता चला कि गोण्डा के रहने वाले हैं मोहम्मद शामी उर्फ छिद्दन मियां। लेकिन रहे शुरू से कानपुर में। ससुराल रानीगंज पश्चिम बंगाल।
हम पूछे कि गोण्डा, कानपुर के आदमी की ससुराल बंगाल। फिर किस्सा सुनाया कि उनकी पत्नी कहीं आईं थीं किसी शादी में वहीं किसी ने दिखाया। तो हो गयी शादी।
किस्से पर किस्से बताते गए छिद्दन मियां। बोले-'हमारे ससुर बड़े रईस आदमी थे। मिल चलती थीं उनकी। ऊंचे खानदान की है हमारी बीबी। हम तो अनपढ़ हैं लेकिन वो खूब पढ़ी लिखी हैं। अंग्रेजी 9 तक पढ़ी हैं, उर्दू की बड़ी वाली किताब पढ़ी हैं, बंगला भी जानती है।'
फिर ऐसे अंतर के बाद तुम्हारी शादी कैसे हुई? हमारे इस सवाल के जबाब में जो बताया छिद्दन ने उसका लब्बो लुआब यह था कि उनके चेहरे में कुछ ट्यूमर टाइप था। इन्होंने कहा-'शक्ल तो अल्लाह ने दी। हो गयी शादी।'
बात फिर दिहाड़ी की तरफ मुड़ी। बोले -'जबसे ये बैटरा (ई रिक्शा) चला है , रिक्शेवालों की आफत है। पहले रोज चार-पांच सौ कमा लेते थे। अब 200 रुपया कमाना मुहाल हो गया है। उसमें भी 50 रुपये रिक्शे वाले को किराए के देने होते हैं।'
हमने कहा -'तुम भी ले लो बैटरा लोन लेकर।' बोले-'अब बन्द होने वाले हैं। रजिस्ट्रेशन होगा तो कम हो जाएगे सब।'
बच्चों के बारे में बताया - 'बेटा कैरीबैग का काम करता है। दो बेटे रहे नहीं। पता होता कि ऐसा हो सकता तो पत्नी का ऑपरेशन न करवाते।'
बातें तो औऱ तमाम हुईं। जो याद रहीं वो लिखी यहां।
आप देखिए अपना देश कितनी तेजी से तरक्की कर रहा है। शहर स्मार्ट हो रहे हैं। मंगल पर पहुँच रहे है हम। लेकिन उसी हिंदुस्तान का बहुत बड़ा तबका जिस तरह जी रहा है वह बेहद कठिन जिंदगी है। उस पर भी तुर्रा यह कि हममें से तमाम लोगों को यह पता भी नहीं कि ऐसा हिंदुस्तान हमारे अगल-बगल भी है जिसके लिए आज का दिन जी लेना भी एक चुनौती है। संग्राम है। मजे की बात वह जी भी रहा है बिना शिकवे-शिकायत के। मजबूर है - क्या करे।
बकौल परसाई जी -''हड्डी ही हड्डी, पता नहीं किस गोंद से जोड़कर आदमी के पुतले बनाकर खड़े कर दिए गए हैं। यह जीवित रहने की इच्छा ही गोंद है।'

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Sunday, July 30, 2017

ठेले पर भुनता भुट्टा




ठेले पर भुनता भुट्टा और थर्मोकोल की फ्रिज में रखा पाउच का पानी।
मिट्टी की अंगीठी ईंटों के ऊपर रखी लोहे की कड़ाही पर रखी है। उस पर भुट्टे भून कर बेचे जा रहे हैं। समय क्रम के हिसाब से देखा जाए तो आग सबसे बुजुर्ग है इनमें जिसका अविष्कार सबसे पहले हुआ। फिर शायद लोहा और उसके बाद भुट्टा। लेकिन लकड़ी तो उसके पहले आ चुकी थी। शायद सबसे पहले। आदमी लकड़ी के बाद।
थर्मोकोल सबसे युवा अविष्कार है। पालीथिन काफी पहले शुरू हुई लेकिन उसमें पानी के पाउच अभी कुछ साल से बिकना शुरू हुए। 'पानी पाउच' थर्मोकोल से उम्र में छोटा पड़ेगा लेकिन बिकता सबसे फुर्ती से है।
इतने अलग- अलग कालखण्ड में जन्मे सामान एक ही ठेलिया में मोहब्बत के साथ बिक रहे हैं बिना हल्ला-गुल्ला किये। सबको मिलकर पेट की आग बुझानी है।
लाखों साल की समयावधि में पैदा हुये सामान जब एक ही ठेलिया में बिक सकते हैं धड़ल्ले से तो फिर एक ही कालखण्ड में पैदा हुए राजनीतिक दल सरकार चलाने के लिए मिलकर क्यों नहीं चल सकते।

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Thursday, July 27, 2017

देश के राजनीतिज्ञ समझदार होते जा रहे हैं


देश में ट्रक बनाने वाली दो प्रमुख कंपनियां टाटा और अशोक लेलैंड हैं। वी एफ जे में काम करने के दौरान अशोक लेलैंड के कुछ सीनियर अफसरों से मिलने पर पता चलता था कि वे अशोक लेलैंड में आने के पहले 20-30 साल टाटा में काम कर चुके थे। बाद में उन्नति के लिए उन्होंने कम्पनी बदली।
प्राइवेट संस्थानों में उन्नति के लिए कुछ साल बाद कंपनी बदलने का चलन आम बात है। नौकरी वहां 'कांट्रैक्ट मैरिज' टाइप होती है।
सरकारी नौकरियां हिंदुस्तानी विवाह की तरह होती हैं। नौकरी करने वाला इंसान हिंदुस्तानी बहुओं की तरह होता है। जिस घर मे डोली आई वहीं से अर्थी निकलने की तर्ज पर जहां ज्वाइन करता है वहीं से रिटायर मेन्ट लेता है।
पहले की राजनीति भी आमतौर पर सरकारी नौकरियों की तरह करते थे लोग। जिस दल, विचार धारा से शुरू करते थे, आमतौर पर उसी से जुड़े रहते थे।
इधर सरकारी नौकरियां तेजी से कम हुई हैं। काम चलाने के लिए कांट्रैक्ट वर्कर का चलन बढा है। ठिकाना नहीं कि कब निकाल दिए जाएं।
राजनिति में भी प्राइवेटाइजेशन बढ़ा है। लोग मौका देखकर धुर विरोधी पार्टी में शामिल होने में गुरेज नहीं करते। बल्कि मौके पर पार्टी और स्टैंड बदल लेना सबसे बड़ी समझदारी मानी जाती है। जिसको गरियाते हुए सत्ता में पाई बाद में उसी के साथ सरकार बनाना सफल और समझदार राजनीतिज्ञ की निशानी है।
देश के राजनीतिज्ञ समझदार होते जा रहे हैं। वे ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की तरह काम करने लगे हैं।जो ठेकदार रोजी-रोटी देगा उसी के जुड़कर जनता की सेवा करने पर मजबूर है।
आज राजनीति का सबसे बड़ा ठेकेदार बाजार है। क्या पक्ष क्या विपक्ष सब बाजार के इशारे पर उठते-बैठते, हिलते-डुलते हैं। बाजार के इशारे पर पक्ष-विपक्ष आपस में ग्लेडियेटर की तरह लड़ने का नाटक करते हैं। बाजार दोनों में से किसी को मरने नहीं देता। जिंदा रखता है दोनों को। आखिर दोनों को बनाने में उसका ही पैसा लगता है।
जनता बेचारी इन्हीं लोगों से अपनी सेवा कराने को मजबूर है। जिसको वह अपनी सेवा के लिए चुनती है वह अगर बाजार को पसन्द नहीं आता तो वह उसे बदल देता है। आखिर सेवक चुनने में पैसा तो उसी का लगता है। इसलिए जनता का सेवक चुनने का हक भी उसी को है।
जनता को तो बस सेवा से मतलब होना चाहिये। सेवक कौन होगा यह तय करना बाजार का काम है।


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Wednesday, July 26, 2017

सूरज भाई भी रोशनी की जलेबी नहीं जलेबा बनाते हैं

सुबह बरामदे में आये तो सूरज भाई ने चमकते हुए गुडमार्निंग किया। 15 डिग्री ऊपर चमक रहे थे। तीन चार काले बादल उनको कमांडो की तरह घेरे हुए थे। सुबह जब निकले होंगे तब आसमान में रोशनी का खूंटा गाड़ा होगा। फिर उसके चारों तरफ किरणें छितरा दी होंगी। जैसेे जलेबी बनाते हुए हलवाई पहले कपड़े से थोड़ा मैदा कड़ाही में चुआने के बाद उसके आसपास जलेबी की कढ़ाई करता है वैसे ही सूरज भाई भी रोशनी की जलेबी नहीं जलेबा बनाते हैं। हलब्बी जलेबा।।
फोटो खींचते हैं तो सूरज भाई चमकते हुए दिखते हैं। काले बादल गोल। नेपथ्य में चले गए। हमको सामने सूरज को घेरे हुए काले बादल दिख रहे। लेकिन फोटो में केवल चमकदार सूरज भाई और उनकी किरणें। मने कैमरा भी टीवी चैनल हो गया और सूरज भाई सरकार। सिर्फ चमक दिखानी है। कुछ भी धुंधला दिखे उसे चमक के पीछे कर दो। वाह रे मेरे कैमरे। जियो।
कैमरे से ध्यान आया कल दफ्तर जाते समय कुछ फ़ोटो खैंचे थे। पानी बरस रहा था। गाड़ी में बैठे-बैठे फोटो खैंचे। देखिये आप भी। बताते चलते हैं उनके बारे में।
घर से निकलते ही एक बुजुर्ग साइकिल पर मोमिया की चादर लपेटे जाते दिखे। देखते ही आइडिया आया कि जिस तरह जाड़ो में कम्बल बांटते हैं गरीबों को उसी तर्ज पर गरीबों को बरसात में मोमिया की चादर बांटी जाए।
एक जगह लोग ठेलिया के ऊपर काली बरसाती की छत के नीचे बैठे पानी के नजारे देख रहे थे। एक आदमी छाता लिए बैठा था। हमने रुक कर फोटो कहीं खींची तो 'बरसाती कैम्प' के नीचे बैठे लोग ध्यान से हमको देखने लगे। हमने भी 'जैसे को तैसा' के नियम का पालन करते हुये उनको देखा और आगे बढ़ गए।
आगे एक आदमी साइकिल पर छाता लगाए जाते दिखा। जब तक फोटो खींच पाते वह निकल गया बगल से। हमने कैमरे को डांटा कि इतने सुस्त हो। कैमरा बेचारा चुप।
सड़क पर एक आदमी दाएं हाथ में छाता पकड़े और बाएं हाथ में दूध का डब्बा लिए तसल्ली से चला जा रहा था। उसकी चाल में किसी बहुमत वाली सरकार का आत्मविश्वास था।
वहीं पानी की लाइन में काम के लिए गहरा गड्डा खुदा था। गहराई में काम के लिए रोशनी की दरकार होती है। भाई लोगों ने पास खड़े बिजली के खम्भे को गर्दनिया नीचे झुका लिया था। प्राइवेट संस्थानों में गर्दन पकड़कर काम कराने का खुला इश्तहार कर रहा था गड्ढे के ऊपर झुका हुआ खम्भा।
आगे सड़क पर तमाम लोग बारिश से अपनी-अपनी तरह से मुकाबला करते हुए सड़क पर जा रहे थे। एक बुजुर्ग बिना छाते के भीगते चले जा रहे थे। उनका कुर्ता कमर के जरा उपर तक भीगा हुआ था। पानी की बूँदे शायद बुजुर्गियत का लिहाज करते हुए आगे और नीचे बढ़ने में संकोच कर रहीं थीं।
सड़क पर कुछ बच्चियां भी जाती दिखीं। सहेलियों के साथ एक छाते में किनारे से भीगते हुए हाथ थामे एक -दूसरे का हाथ थामे। हाथ पकड़ने के पीछे 'ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे' वाला भाव रहा होगा। वैसे हो तो यह भी सकता है कि सड़क पर चलते हुए सुरक्षा के लिहाज से दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ रखा हो।
कोई लड़का नहीँ दिखा एक दूसरे का हाथ थामे सड़क पर जाता।
पुल पर एक आदमी स्कूटर धकेलते आता दिखा। शायद उसका पेट्रोल खत्म हो गया हो। पुल के बीच पहुंचकर सुस्ताने के लिए खड़े होकर कुछ देर उसने इधर-उधर देखा। लेकिन इधर-उधर देखने से कुछ होता तो नहीं है न। अगर होता तो दुनिया इधर-उधर ही देखती रहती। कुछ देर बाद फिर वह स्कूटर को धकेलते हुए आगे बढ़ गया।
इस बीच एक जगह पानी का भराव मिला। पानी से गाड़ी गुजरी तो पहिये के नीचे आया पानी कुचलने के डर से छिटककर फुटपाथ पर गुजरते आदमी के सीने से चिपक गया। हमने हमेशा की तरह एक बार फिर से सोचा कि पानी में गाड़ी धीमी करनी चाहिए। लेकिन तब तक गड्डा पार हो गया था।
बारिश के सीन देखते हुये शेर अपने आप याद आ गया:
तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
भीग तो पूरा गए पर हौसला बना रहा।
आज पानी तो नहीं बरस रहा। लेकिन दफ्तर तो जाना है। इसलिए निकलते हैं। आप भी मजे करिये।

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