Monday, June 29, 2020

शराफत के बहाने ऑनलाइन के किस्से

 कल इतवार था। कई काम सोचे थे करने को। कुछ किताबें , कुछ लेख। सोचा था हम भी कुछ लिख लेंगे। फ़िल्म भी देखने की मंशा थी। कुछ नया सीखने का भी मन था। उर्दू सोचते हैं पढ़ना सीख लें , शाहजहांपुर में रहते। कम्प्यूटर पर भी मन करता है काम करना कुछ और सीख लें। एक्सेल की किताबें मंगाई हैं ऑनलाइन । सोचते हैं कुछ अच्छे से सीख लें।

इतने काम एक अकेले इतवार के कंधे पर लाद दिए। इतवार बेचारा डरा-डरा आया। चेहरे पर शिकायत चिपकाए -'एक हमी बचे हैं सब काम के लिए। बाकी दिन खाली मौज मनाएंगे?'
शिकायत भले चेहरे पर चिपकी हो लेकिन मुंह से बोला कुछ नहीं। शरीफ लोगों की तरह चुपचाप सह जाने का भाव। शरीफ लोग बेचारे हमेशा लफड़ों से बचते हैं। उनको हमेशा डर लगता है कि कुछ बोले तो उनकी शराफत वाली पोस्ट छिन जाएगी। 'शरीफ बेरोजगार'हो जाएंगे। भूतपूर्व शरीफ। डरते हैं कि कुछ कहा और किसी ने कह दिया -'शक्ल से शरीफ दिखते हो लेकिन हरकतें ऐसी।' तो बेचारे कहीं मुंह दिखाने के काबिल न रहेंगे।
इसी डर के मारे शरीफ लोग कुछ भी नया करने से बचते हैं। इंतजार करते हैं कि जब सब लोग करने लगेंगे तो वे भी करने लगेंगे। शरीफ लोगों को लगता है कि उनका सब कुछ भले छिन जाए लेकिन शराफत का तमगा न छिने। इसीलिए जहां कोई इधर-उधर की बात हुई शरीफ लोग फौरन कट लेते हैं। वो कहा है न दुष्यंत जी ने:
'लहूलुहान नजारों का जिक्र आया तो
शरीफ लोग उठे और दूर जाकर बैठ गए।'
हम भी कहां की बात किधर मोड़ दिए। बात हो रही थी इतवार की और किस्से सुनाने लगे शराफत के। यह तो ऐसे ही हुआ कि लाइव बातचीत में विषय कुछ दिया जाए और लोग बोलते कुछ और रहें।
अरे हां लाइव की बात भली याद आई। कोरोना काल में जबसे मिलना-जुलना कम हुआ आन लाइन बातचीत बहुत बढ़ गयी है। वीडियो कांफ्रेंसिंग बढ़ी है। आन लाइन इन्टरव्यू बढ़े हैं। कविता पाठ, कहानी पाठ, व्यंग्यपाठ बढ़े हैं। इतवार , शनिवार खासतौर पर 'क्या मेरी बात सुनाई दे रही है?' के कब्जे में चले गए हैं।
ऑनलाइन बातचीत का नजारा यह है कि दिन में इत्ते सत्र मित्रों के प्लान हैं कि किसको सुने, किसको छोड़े , समझ मे नहीं आता। एक ही दिन में कई बारातें निपटाने की जिम्मेदारी जैसी बात। घण्टे-घण्टे भर के सत्र। बीस-बाइस लोग। हो रहे हैं ऑनलाइन सत्र।
ऑनलाइन सत्र के भी मजेदार नेपथ्य होते हैं। उधर ऑनलाइन श्रोता बने बैठे हैं इधर दोस्तों से चैटिंग चल रही है:
-अब ये लम्बा झेलायेगा।
-तो क्या झेलो। तुमने सुनाया तो उसको भी हक़ है झेलाने का।
-हम तो आडियो-वीडियो बन्द करके आंख मूंदकर बतिया रहे।
-अरे अध्यक्ष जी भी पढ़ेंगे। अध्यक्षता का मतलब यह थोड़ी की पाठ भी करेगें। अजीब बकैती है।
-हम तो लॉगआउट कर रहें यार बोर हो गए। हमको दूसरी जगह आन लाइन होना है।
इसी तरह की बतकहियों के बीच ऑनलाइन प्रसारण होता है। जो सामाजिक मीडिया दो-पांच मिनट की पोस्ट को बड़ी मानता है वो फिलहाल घण्टे भर के ऑनलाइन की भरमार कर रहा। लोग बाद में सुनते है। अपने हिसाब। नया चलन है । देखना है कितनी दूर जाएगा।
अरे बात तो इतवार की हो रही थी। लेकिन वह तो कल था। आज तो सोमवार है। सोमवार को इतवार के किस्से सुनने की किसको फुरसत।
चला जाये सोमवार अपने जलवे और खूबसूरती के साथ इंतजार कर रहा है। आपका सोमवार शुभ हो।

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Tuesday, June 23, 2020

पागलखाना -बाजार की फ़ंतासी की दास्तान

 "हर क्रान्तिकारी विचार शुरु के अकेलेपन में पागलपन ही तो होता है।"- 'पागलखाना'से

पिछले हफ़्ते ’पागलखाना’ किताब पूरी की। बड़ा सुकून मिला। बहुत दिनों से , मतलब महीनों से यह किताब पढने की कोशिश कर रहा था। लेकिन इधर पढने की गति इत्ती धीमी हो गयी कि कभी कोई किताब उठाई तो एकाध पन्ना पढकर वापस धर दी। फ़िर कुछ दिन बाद एक पन्ना और। यह बात अच्छी और खराब दोनों तरह की किताबों के साथ है।
जो किताब अच्छी लगती है उसे लगता है कि पूरी न पढो। पढ ली तो फ़िर इसके बाद क्या पढेंगे। खराब किताब के बारे में क्या कहें? वैसे किताब कित्ती भी खराब हो उसे लिखने में लेखक के क्या होते हैं यह कोई लेखक ही जान सकता है। श्रीलाल शुक्ल जी ने एक लेखक की व्यथा बताते हुये लिखा है:
"किताब लिखना दिमाग के लिए कठोर और शरीर के लिए कष्टप्रद कार्य है। इससे तंबाकू की लत पड़ जाती है। काफीन और डेक्सेड्रीन का जरूरत से ज्यादा सहारा लेना पड़ता है। बवासीर, बदहजमी, अनवरत् दुश्चिंता और नामर्दी पैदा होती है।"
श्रीलाल जी ने पाठक के हाल नहीं बयान किये। खासकर ऐसे पाठक के जिसके पास पढने के लिये खूब सारी किताबें हों लेकिन उसकी पढने की आदत कम हो गयी हो।
’पागलखाना’ ज्ञान जी का पांचवां उपन्यास है। बाजार की फ़ंतासी को लेकर लिखे गये इस उपन्यास के बारे में लोगों ने काफ़ी कुछ लिखा है। अधिकतर लोगों ने यह बताया कि उपन्यास में पठनीयता नहीं है। जबरियन खींचा गया उपन्यास है। अनावश्यक विस्तार है। वहीं कुछ लोगों ने यह भी लिखा है कि यह अद्भुत उपन्यास है। जो लोग इसकी बुराई कर रहे हैं वे इसको समझ नहीं पाये हैं। उनकी अकल कमजोर है।
यह दूसरी वाली बात उसी तरह की है जिस तरह लोग कहते हैं जो हमारा विरोध कर रहे हैं वे देशद्रोही हैं।
दुनिया का चलन है कि इंसान आमतौर पर चुगली बड़ी ध्यान से सुनता है और उस पर सहज विश्वास भी करता है। तो अपन ने यही मानकर पढा उपन्यास कि बोरिंग है। हमारी पढने की कम हुई गति ने भी इस नकार भाव में सहयोग किया। बोरिंग है इसीलिये पूरा नहीं पढ पा रहे। वर्ना हजार-हजार के पेज के ’मुगदर साहित्य’ अपन ने 3-4 दिन में पढकर किनारे किये हैं।
लेकिन बोरिंग है तो फ़िर पढ क्यों रहे हैं। किस डॉक्टर ने कहा है कि पढो नहीं तो तबियत खराब हो जायेगी। फ़िर पढना शुरु करते। मेहनत करते। अंतत: मेहनत सफ़ल हुई । किताब पूरी हुई।
बाजार पर केन्द्रित इस उपन्यास को पढते समय मुझे बार-बार कथाकार अखिलेश का कथादेश पत्रिका के फ़रवरी-2000 के अंक में छपा लेख याद आता रहा। लेख का शीर्षक था - "मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं "। इस लेख में बाजार के बढते प्रभाव को लेकर कही कुछ बातें यहां पेश हैं:
१. सबमें वह है। उसी में सब हैं। वह कहाँ नहीं है। अर्थात हर जगह है। वह पृथ्वी,नभ और भू -गर्भ सर्वत्र विराजमान है।संसार के समस्त क्रिया व्यापारों का संचालन उसकी मुट्ठी में हैं।
२.मेरी एक बड़ी ट्रेजडी है कि मैं ईश्वर की तरह हूं जिसके अनेक रूप हैं। हालांकि मैं ईश्वर का विलोम मनुष्य हूं। वाकई मेरे कई रूप हैं। मैं ही हूँ, जो उदास, गम्भीर और एकान्तप्रिय हूँ। मैं ही मितभाषी हूँ, मैं ही बकबक करने वाला हूँ। मैं आधुनिकता, कुलीनता को चाहने वाला हूँ और मैं ही फूहड़ गँवार हूँ। मैं ही सांवली सुन्दरियों का दीवाना हूं और मैं ही हूं जो गौरवर्णी रूपसियों पर लट्टू रहता हूं। मैं भावुकता की हंसी उडाता हूं,जबकि स्वयं बहुत भावुक हूं। जो चिरकुट, कायर, काहिल, घरघुसना, साहसी, फुर्तीला, घुमक्कड़ और सज्जन है वह भी मैं ही हूं। जो विश्वसनीय, मददगार, शाहखर्च है वह भी मैं ही हूं। जो संदिग्ध, ह्दयहीन और मक्खीचूस है वह भी मैं हूं। मैं एक साथ उच्च, नीच, श्रेष्ठ, घटिया, प्रिय, अप्रिय, सुन्दर और कुरूप हूं।
३.यह भी किसको अन्दाजा था कि दूसरा कवि एक इमारत की दसवीं मंजिल से इसलिये छ्लांग लगा लेगा कि जिन्दगी में उसकी रुचि समाप्त हो गयी थी। एक दार्शनिक सड़क दुर्घटना में मारा जायेगा लेकिन उसके नगर को महीनों इसकी खबर नहीं मिलेगी।
४. कोई शराब मांगेगा, आइसक्रीम मांगेगा, स्त्री का शरीर मांगेगा, घूस मांगेगा, कुछ भी मांगेगा। उसे नहीं मिलेगा तो गोली मार देगा । कोई कहेगा कि उसका धर्म सर्वोच्च है, यदि सामने वाले ने स्वीकार नहीं किया तो उसे खत्म कर दिया जायेगा।
अखिलेश जी का यह लेख मुझे इतना पसंद आया था कि मैंने इसे अपने ब्लॉग में पोस्ट किया था। दो पोस्टों में। लिंक यहां पोस्ट में नीचे है।
बहरहाल पागलखाना पढना बहुत अच्छा अनुभव रहा। सूरज के प्री-पेड कार्ड जैसी बातें मेरे दिमाग में आती रही हैं। सुरंग में बार-बार जाते हुये बुजुर्गवार मुझे अपनी उस कल्पना की याद दिलाते रहे जिसमें मैं कभी सोचता था कि एक पूरा का पूरा शहर जमीन के नीचे बसा है। इस कल्पना को विस्तार देने की कभी हिम्मत नहीं हुई।
सूरज के प्री-पेड कार्ड वाली बात पढकर मुझे प्रियंकर पालीवाल जी कविता याद आई:
सबसे बुरा दिन वह होगा
जब कई प्रकाशवर्ष दूर से
सूरज भेज देगा
‘लाइट’ का लंबा-चौड़ा बिल
यह अंधेरे और अपरिचय के स्थायी होने का दिन होगा।
’पागलखाना’ बाजार के प्रभाव में इंसान के सपने छिनने के खतरे और उनसे अपने सपने बचाये रखने की जद्दोजहद का आख्यान है। बुजुर्गवार बार-बार सुरंग के पास ’कदमताल’ करते रहते हैं। बच्चे उनकी बात समझते नहीं। पागल समझते हैं उनको। वे बच्चों को बेवकूफ़ समझते हैं। बाजार उनकी दुनिया पर कब्जा करने के लिये बेताब है, अपनी कोशिश में कामयाब होने वाला लेकिन वे सब उससे बेखबर हैं। मजबूरन बुजुर्गवार को अकेले मोर्चा संभालना पड़ता है। अंतत: वे निपट जाते हैं।
’पागलखाना’ एक सिद्ध कथाकार की नजर से बाजार के बारे में लिखा गया उपन्यास है। ज्ञान जी डिटेलिंग के उस्ताद हैं। बाजार की डिटेलिंग की उन्होंने। बाजार का रकबा बहुत बड़ा होता है। अनंत तक फ़ैले बाजार की रिपोर्टिंग इस उपन्यास में सुरंग, सपने, डॉक्टर की दुकान और ऐसी ही कुछ जगहों से की गयी है। जगर-मगर करते , तेजी से भागते, हर पल रूप बदलते बाजार के बारे में चंद स्थिर जगहों से पकड़ने की कोशिश की गई।
अब जब लिख रहा हूं यह भी लग रहा कि पागलखाना ज्ञानजी ,आलोक पुराणिक जी के साथ मिलकर लिखते तो कुछ और जगहें जुड़तीं।
उपन्यास इस मामले में खास है कि हिन्दी में बाजार को लेकर इतने विस्तार से लिखा गया शायद पहला उपन्यास है। भाषा पर पकड़ ज्ञान जी की जबरदस्त है। उसके अनगिनत नमूने किताब पढते समय दिखते हैं लगता है -’काश हम भी वैसे लिख पाते।’ आखिरी के पन्नों में ’चहबच्चे’ शब्द का प्रयोग कई बार हुआ। ’रोशनी के चहबच्चे’, ’अंधेरे के चहबच्चे’। पुरानी पीढी तक सीमित रहे गये इस तरह के शब्द शायद अगली पीढी के लेखकों के हाथ से निकल जायें।
हिन्दी में उपन्यास कम ही लिखे जाते हैं। साल में आठ-दस उपन्यास चर्चा में आ पाते हैं। पचास-साठ करोड़ की हिन्दी पट्टी की आबादी में यह संख्या हिन्दी में पठन-पाठन, लेखन की स्थिति का बैरोमीटर है। ऐसे में कोई उपन्यास लोग पढें, उसकी आलोचना ही करें यह अपने में एक उपलब्धि है। ज्ञान जी के ’पागलखाना’ की ’हम न मरब’ जितनी तो नहीं लेकिन फ़िर भी लोगों ने आलोचना की। कम आलोचना का कारण शायद इसमें गालियों की अनुपस्थिति भी रही हो। तारीफ़ भी खूब हुई। आलोचना भले संयमित रही लेकिन तारीफ़ जिन्होंने की उन्होंने ’बल भर’ की। कलम, माइक तोड़ दिया। फ़िर इनाम भी मिल गया लाख रुपये का। इससे अधिक और क्या चाहिये उपन्यास के सफ़ल होने के लिये।
ज्ञान जी हमारे समय के कुछ सबसे अच्छे लेखकों में हैं। व्यंग्य में तो लोगों ने उनको देवता मान लिया। ज्ञान जी इसे मानते भले न हों लेकिन जबरदस्ती मना भी नहीं करते। बड़ी प्यारी अदा है यह। वे कहते भले हैं कि लिखकर मैं भूल जाता हूं लेकिन ऐसा होता नहीं। किसी भी मुद्दे पर बात करेंगे तो अपने लेखन के विरोध की बात किसी न किसी तरह आ ही जाती है। ’हम न मरब’ की गालियों पर इत्ती गालियां पड़ीं, लोगों ने इत्ता विरोध किया, ’पागलखाना’ को लोगों ने शुरु में बोर उपन्यास बताया लेकिन बाद में लोगों ने उसे पसन्द किया, इनाम भी मिला। जब भी वे इस तरह की बातें करते हैं तो लगता है कि वे यह कहकर अपने उन अनगिनत पाठकों की अनदेखी करते हैं जिन्होंने इन उपन्यासों को बेइन्तहा पसंद किया और तारीफ़ भी की। अपने उन पाठकों की मोहब्बत की ’बेइज्जती खराब’ करते हैं जो उनके हर तरह के लेखन को प्यार से पढते हैं।
हम भी ज्ञान जी के लेखन को पसंद करने वाले हैं। इसलिए जब वे विरोध करने वालों को लिफ्ट देते हैं तो जलन तो होती ही है। 'पाठकीया डाह' होता है। बुराई करने वालों को इतना फुटेज, तारीफ करने वालों का कोई जिक्र नहीं। शिकायत करें तो कह देंगे ज्ञान जी -'भूल जाता हूँ।' ये अच्छी आदत है कि तारीफ करने वाले भूल जाते हैं, बुराई करने वाले याद रहते हैं। 🙂
’पागलखाना’ एक अनूठी कृति है। एक संवेदनशील कथाकार द्वारा लिखी गयी अपनी तरह किताब। इसे पढा जाना चाहिये। इस पर खूब बात होनी चाहिये। पीठ पीछे खुसुर-पुसुर करने की बजाय खुलकर खूब लिखा जाना चाहिए। खासकर हिन्दी व्यंग्य से जुड़े बड़े लोगों को इस पर बात करनी चाहिये। ज्ञान जी की ही किसी और किताब से इसकी तुलना की बात ठीक नहीं।
आज की दुनिया में दो ही तरह के पाठक हैं एक वे जो ’पागलखाना’ पढ चुके हैं। दूसरे वे जिन्होंने पागलखाना नहीं पढी। हमको खुशी है कि हम उन लोगों में शामिल हो चुके हैं जो ’पागलखाना’ पढ चुके हैं। आप भी ’पागलखाना’ पढ चुके लोगों में शामिल होइये। अच्छा लगेगा।
पागलखाना -लेखक Gyan Chaturvedi
1.उपन्यास : पागलखाना
लेखक: ज्ञान चतुर्वेदी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
पेज: २७१
कीमत: पेपरबैक -२५०
खरीदने का लिंक : https://www.amazon.in/Pagalkhana-Gyan.../dp/938746234X
मनुष्य खत्म हो रहे हैं.. वस्तुयें खिली हुई हैं -भाग १
मनुष्य खत्म हो रहे हैं.. वस्तुयें खिली हुई हैं -भाग २

'पागलखाना' के पंच

 

1. दुनिया बाजारवाद के कब्जे में आ गई थी। दुनिया बाजार में रहना और जीना सीख रही थी। पर कुछ लोगों ने बाजारवाद को पागलपन माना तथा बाजार को पागलखाना।

एक चमकीले अंधेरे से भरा पागलखाना।
2. अब सूर्योदय उन्हीं घरों में होता था जिन्होंने सूरज का प्री-पेड कार्ड बनवा रखा हो और समय पर इसे रिचार्च भी करते रहते हों। बाजार ने सूरज को अपनी मुट्ठी में बांध लिया था और सूरज बाजार का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया।
3. बेहद आलीशान फ़्रेमों में जड़े प्रशंसापत्र तथा डिग्रियां। इतने सुन्दर हैं ये प्रमाणपत्र कि देखते ही इनके नकली होने का अहसास होता है।
4. फ़्रेम यदि एक बार चमकीला , नक्कासीदार और बहुत मंहगा वाला लगा दो तो फ़िर इस बात का कहीं कोई खतरा नहीं रह जाता कि आदमी का ध्यान उस विचार की तरफ़ भी जा सकता है।
5. ’क्या करें बाप हैं!’ वाले भाव में ’तुम बहुत सुन्दर हो’ वाला भाव मिला दो तो चेहरा जैसा बनेगा ,वैसा चेहरा लेकर वह रिशेप्शन पर बैठी युवती को घूर रहा है।
6. सरकार बाजार की ताकत का इस्तेमाल खुद के सरकार बने रहने के लिये करेगी, मानो कोई सुनामी की लहरों से बिजली पैदा करने की योजना बनाये और इस मूर्खता पर अपनी पीठ थपथपाये।
7. बाजार की सत्ता, सरकार की सत्ता से मिलकर यों गड्डमड्ड हो गई थी कि पता करना कठिन हो गया था कि दुकान कहां तक है और सरकार का दफ़्तर कहां से शुरु हो जाता है। सरकारी घोषणायें एकदम बाजार द्वारा डिक्टेट करके लिखवाई गई लगती थीं।
8. सपने देखने की क्षमता ही तो मनुष्य को मनुष्य बनाती है दोस्त।
9. सच, ईमानदारी, प्यार,सफ़लता, भाईचारा,लोकतंत्र,वात्सल्य, भलाई,सुन्दरता,स्वास्थ्य,सुकून भरी नींद, एकता,बराबरी-उसके हर सपने को बाजार ने उठा लिया था और अपने काम पर लगा दिया था।
10. कानून पर इतना भरोसा करना ठीक चीज नहीं क्योंकि स्वयं कानून भी कानून पर कोई खास भरोसा नहीं करता है आजकल।
11. सिस्टम में वह रोशनी पैदा तो कर सकता है पर इस रोशनी का इस्तेमाल स्वयं नहीं कर सकता है वह। उसे बस उन अंधेरों की मिल्कियत दी गई है जिन्हें इसी रोशनी ने पैदा किया है।
12. इन दिनों मानसिक रोगी होना भी एक किस्म की ऐयाशी है।
13. सरकार के विरुद्ध जो भी है, सब पर सरकार की नजर है।
14. वे संविधान में इतने संसोधन करा चुके हैं कि संविधान का हर पेज कटा-पिटा है। अब उसे पढना मुश्किल है, समझना तो और भी मुश्किल।
15. वे हमारा कान पकड़कर हमें सड़क पर बिठा दें तो अदालत भी बस यही कहकर रह जायेगी कि आपका इसका मुआवजा तो दिया जा चुका है न!
16. ’देवता बोले कि वे अब हमारे बस से एकदम बाहर जा चुके हैं। अब खुद सबसे बड़ा देवता बन गया है बाजार !’
17. देवता अब खुद भी बाजार से नहीं लड़ सकते। मैंने पूछा तो कहते हैं कि हमारा पूजा-पाठ भी तो अब बाजार के हाथों में ही है, सो हम तो मजबूर हैं। ... हम बस कभी-कभी आकाशवाणी भर कर सकते हैं।
18. आदमी जब फ़ोटो खिंचाता है तब झूठमूठ खुश हो ही लेता है। कहते हैं इससे फ़ोटो अच्छी आती है।
19. नकटा समय चल रहा हो तो नाक से निजात पाना जरूरी हो जाता है।
20. बाजार में आजकल भ्रम डिस्काउंट रेट पर मिल जाता है और नाक बड़े ऊंचे भाव पर बिक जाया करती है। लोग नाक बेच देते हैं और भ्रम लगाये घूम रहे हैं।इससे सभी को बड़ा सुभीता हो गया है।
21. जब समय ने ही अपनी नाक उतार डाली हो तब ऐसे नकटे समय में अपनी नाक रखने का आग्रह करना बड़ी मूर्खता कहलायेगी।
22. समय अब बाजार के हिसाब से चलना सीख रहा था क्योंकि समय ने भी स्वीकार कर लिया था कि बाजार का समय चल रहा है।
23. बाजार पागलों के लिये भी क्या खूब समय निकलता है।
24. पागल और सही आदमी के बीच अन्तर करना कठिन हो रहा है। यह अन्तर रोज-रोज और भी बारीक होता जा रहा है। दिनोंदिन यह जानना कठिन हो रहा है कि कौन समझदार है और कौन पागल।
25. कोई कितना भी समझदार हो जाये या कितना भी पागल- बाजार दोनों का इस्तेमाल कर सकता है।
26. बाजार को पागलों से कोई डर नहीं लगता। वह तो बस सतर्क रहता है उनसे।
27. कहीं सारी मानव-जाति ने ही तो सपने देखना बन्द नहीं कर दिया? कहां तो वह कभी खुली आंखों से भी खूब सपने देखा करता था और अब, उसके आसपास कहीं कोई सपना ही नहीं?
28. केवल मुर्दे ही नहीं, समझदार लोग भी नहीं सोचा करते।
29. एक बार सामने वाले को पागल भर मान लो तो चीजें आसान हो जाती हैं। तब उसके द्वारा सच भी एक चुटकुला माना जा सकता है।
30. बाजार जितना और-और चमकदार होता जाता था, उसके ठीक नीचे तथा पीछे अंधेरा बढता जाता था।
31. बाजार की यही तो विशेषता है। वह खुद ही अंधेरे पैदा करता है, फ़िर खुद ही उन अंधेरों की चिन्ता भी करता है। वह अपने ही पैदा किये और पाले हुये अंधेरों को दूर करता भी दीखता है। वह इन अंधेरों को दूर करने का संकल्प लेता है और इसके लिये जुगनुओं की व्यवस्था भी कर देता है। वह इन अंधेरों में बिना
बाती की मोमबत्तियां भी लगाकर आता है। वह अंधेरों पर चिन्ता करने वाले सम्मेलन प्रायोजित करता है, बहसें आयोजित करता है। अंधेरों की परिभाषा तय करने के लिये वह उन विद्वानों को आमंत्रित करता है जो बाजार की खाकर , उसकी ही गाते-बजाते हैं।
32. बाजार भी तो आजकल यही करता है। सबको उसी तरह डील करता है मानों सब पागल हों।
33. कई दफ़े , साथ रहने वाला शख्स पागल हो रहा हो तो करीबी लोगों को पता ही नहीं चल पाता। ...आदमी ,अधिकतर बड़ा धीरे-धीरे ही पागल होता है न ! इसीलिये।’
34. खुशबू बस एक भ्रम है। बदबू यथार्थ। वास्तव में सब तरफ़ बदबू ही है।
35. हर क्रान्तिकारी विचार शुरु के अकेलेपन में पागलपन ही तो होता है।
36. हत्यारे अपने हाथों में पुराणों और इतिहास के पन्नों से बने हथियार लिये थे। उनके कई हथियार तो हथियारों जैसे लगते ही नहीं थे। भीड़ में कई हमलावर तो पुष्पगुच्छ और मालायें लेकर दौड़ रहे थे। इनके हाथों में आकर गुलदस्ते, विनम्रता , प्रार्थना और स्वागत भी पैने हथियार बन गये थे। वे हर चीज को हथियार बना सकते थे। वे शातिर हत्यारे थे। वे आदमी की हत्या किये बिना भी उसकी हत्या कर सकते थे।
37. घुटन कहीं भी एक हद से ज्यादा बढ जाये तो विद्रोह खदबदाने लगता है।
38. ग्राहक जितना पागल हो, बाजार के लिये उतना ही फ़ायदेमन्द होता है।
लेखक: Gyan Chaturvedi
पागलखाना के बारे में यह भी पढ़ें
उपन्यास : पागलखाना
लेखक: ज्ञान चतुर्वेदी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
पेज: २७१
कीमत: पेपरबैक -२५०
खरीदने का लिंक : https://www.amazon.in/Pagalkhana-Gyan.../dp/938746234X

Wednesday, June 17, 2020

नर्म बिस्तर, ऊंची सोंचे, फिर उनींदापन

 आज सुबह ढाई बजे ही नींद खुल गयी। वैसे ऐसा कम ही होता है। नींद हमारी सुपरफास्ट ट्रेन की तरह है। रात के स्टेशन पर चढ़ी तो सुबह के जंक्शन पर ही रुकती है। आधी रात में कोई स्टापेज नहीं आता। लेकिन आज खुल गयी नींद। शायद किसी ने 'नींद ट्रेन' की चैन पुलिंग की। क्या पता कोई सपना उतरने की कोशिश कर रहा हो। क्या पता कोई आतंकवादी सपना 'नींद डकैती' की कोशिश में हो।

अब जब खुल गयी नींद तो।सोचा क्या करें? मन किया चाय बनवा के पी जाए। लेकिन फौरन मन ने मना भी कर दिया। मन को ऐसे ही थोड़ी चंचल कहा गया है।
फिर ख्याल आया कि सिरहाने रखी किताब पूरी कर ली जाए। पिछले कई महीनों से पढ़ रहे हैं किताब। पूरी नहीं हो पाई। रोज एक-दो पन्ना पढ़ते हैं, किनारा मोड़ कर रख देते हैं। हमेशा लगता है कि कब पूरी होगी किताब। हर छुट्टी सोचते हैं इस बार निपटा ही देंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। छुट्टी निपट जाती है, किताब नहीं निपटती।
पढ़ने की इच्छा और स्पीड बहुत कम हुई है पिछले कई दिनों में। एक से एक शानदार किताबें कुछ दिन साथ-साथ रहकर 'पढ़-कुंवारी' ही बनी रहीं। साथ छूट गया उनका। बिस्तर, मेज से अलमारी , डेस्क में चली गईं। कभी कुछ खोजते हुए मिलती हैं तो लगता है कोई पुराना दोस्त मिल गया। मन खिल जाता है। कुछ किताबें फिर मेज पर आ जाती हैं। लेकिन अक्सर वैसे ही फिर वापस चली जाती हैं।
बहरहाल किताब पूरी करने का ख्याल की सरकार भी पर्याप्त समर्थन के अभाव में गिर गयी। अंततः हम भी बिना और कुछ सोचे बिस्तर पर गिर गए। जो हुआ वह हम बहुत पहले कह चुके हैं:
'नर्म बिस्तर,
ऊंची सोंचे
फिर उनींदा पन।'
उनींदापन के बाद फिर नींद आई। इसके बाद कायदे से तो कोई सपना आना चाहिए। लेकिन अपन के पास सपने कम आते हैं। सामाजिक दूरी बनाए रखते हैं। लेकिन सुबह तो आई ही। रोज आती है।
सुबह के साथ बढ़िया चाय आई। एक के बाद एक दो पिये। फेसबुक के मैदान पर जल्दी-जल्दी टहले। मामला तनावपूर्ण दिखा। लोग अलग-अलग तरह से चीन से मुकाबला कर रहे थे। हम सभी वीरों को बाहर से समर्थन देते हुए भारत माता की जय बोलकर टहलने निकल लिए।
बाहर लान पर खड़े पेड़ पर एक चिड़िया पेड़ पर बैठी थी। हमको देखकर चोंच इधर-उधर करती हुई मुस्कराई। हम समझ नहीं पाए। हम कुछ कहते तब तक वह पेड़ से फुदककर गुमटी पर बैठ गयी। वहां से भी चोंच हिलाकर हमको नमस्ते टाइप करने लगी। हम भी सर हिलाकर सड़क पर निकल गए।
सड़क पार करके पार्क में आये। तमाम लोग आपस में सटे हुए स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। बिना मास्क के बैठे लोग कोरोना को चुनौती देते हुए दिखे। गोया कह रहे हों -'अबे कोरोना के बच्चे, हिम्मत हो तो आ सामने।' कोरोना बेचारा किसी के सीने में, किसी के फेफड़े में दुबककर बैठ गया होगा। उसकी कहां हिम्मत ऐसे वीरों से मुकाबला करने की जो अक्ल और स्वास्थ्य हथेली पर लिए हवाखोरी करने निकले हों।
एकाध को हमने हिम्मत करके टोंका -'बिना मास्क लगाए कैसे सटे हुए बैठे हैं आप लोग।' लोगों ने हमको -'तुम कौन खाम ख्वाह ' वाली नजरों से देखा। सच बता रहे अगर हम मास्क न लगाए होते तो चेहरा उनकी निगाह से झुलस जाता।
कुछ लोगों ने अलबत्ता जेब से तहाया हुआ मास्क निकालकर चेहरे पर धारण कर लिया। शायद इनकी कोरोना से जान-पहचान या पैक्ट है कि जब आना तो बता देना। तुम्हारा स्वागत हम चेहरे पर मास्क लगाकर करेंगे।
ये टोंकने पर जेब से मास्क लगाने वाले लोग उस घराने के लोग हैं जो अपना हेलमेट घर पर या डिक्की में रखते हैं । टोंके जाने पर धारण कर लेते हैं। मानों दुर्घटनाएं उनसे बताकर घटती हैं। घटने के पहले सूचित करती हैं -'हेलमेट धारण करो आर्यपुत्र, अब मेरे अवतार का समय हो गया।'
पार्क में लोग मस्त थे। हम उनकी हिम्मत देखकर पस्त हो गए। लौट लिए।
सड़क पर लोग आ-जा रहे थे। लान में धूप पसरी हुई थी। वह भी कोई मास्क नहीं लगाए थी। धूप को तो टोंक भी नहीं सकते। उसको कोई कोरोना थोड़ी होना है। हमको लगा कि काश हम भी धूप की तरह होते। नरम, गुनगुने, खुशनुमा। लेकिन चाहने से क्या होता है।

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Saturday, June 06, 2020

क्रांतिकारी आइडिये अकडू होते हैं

 एक बहुत क्रांतिकारी टाइप का आइडिया हमारे दिमाग में घुसने की कोशिश कर रहा था। हमने घुसने नहीं दिया। साफ कह दिया -'कितने भी क्रांतिकारी हो, घुसने नहीं देंगे दिमाग में बिना मास्क लगाए। मास्क लगाओ, फिर आओ।घुसोगे भी तो पहले से मौजूद आइडियों से कम से कम दो फिट दूरी पर रहोगे। सोशल डिस्टैनसिंग का पालन करना पड़ेगा।'

आइडिया भन्ना के फूट लिया कहते हुए -'कुल जमा दो इंच मोटा भी दिमाग नहीं। बड़े आये दो फिट सामाजिक दूरी वाले। दुनिया में न जाने कित्ते और मोटे दिमाग वाले हैं। जा रहे हैं उनमें से किसी के पास। ऐश से रहेंगे। '
हम सुनकर खिसिया गए। कोरोना के चक्कर में क्रांतिकारी आइडिया को नाराज कर दिया। मन किया मना लें। लेकिन तब तक वह फूट लिया था। हमको भी गुस्सा आ गया -'बड़ा अकडू आइडिया है। एक बार जिद करता तो क्या घुसने नहीं देता उसको। घुसा के बन्द कर लेते दिमाग। ये सुसरे क्रांतिकारी आइडिये अकडू बहुत होते हैं।'
कहीं आपके पास तो नहीं आया कोई क्रांतिकारी आइडिया। सम्भलकर रहियेगा। फिर न कहिएगा बताया नहीं।

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Wednesday, May 27, 2020

साहित्य जीवन की तरह है

 पिछले दिनों कुछ व्यंग्य बतकहियों से रुबरु हुआ। कुछ व्यंग्य पाठ। कुछ बातचीत। कुछ में व्यंग्य की चिंता। कुछ में व्यंग्य लेखन कैसे बढ़िया हो सकता है। कुछ में अच्छी रचनाओं के कमजोर पहलू उजागर करती हुई बातें, कुछ में खराब मान ली गयी रचनाओं के उजले पक्ष।

अधिकतर में संकोच के मारे शिरकत नहीं कर पाए। हमको हमेशा लगता है कि व्यंग्य के इलाके में हमारी ऐसी कोई समझ नहीं जिससे हम यहां कह सकें। हमारी नजर ऐसी कसौटी से युक्त नहीं है जिसके सहारे हम किसी रचना को व्यंग्य बता सकें या कह सकें यह व्यंग्य नहीं है। पता नहीं कभी ऐसी समझ आएगी भी क्या ?
एक बात जो मैंने आम तौर पर देखी है इन बातचीतों में । लोग व्यंग्य के प्रति चिंतित बहुत हैं। व्यंग्य के शुभचिंतक हैं। व्यंग्य को प्यार करते हैं। व्यंग्य का स्तर उठाना चाहते हैं (जोर लगाकर हईसा वाले अंदाज में)। इतनी शिद्दत से व्यंग्य के बारे में साथियों/वरिष्ठों/परम वरिष्ठों को व्यंग्य के बारे में चिंता करते देखता हूँ तो बड़ा भला लगता व्यंग्य के बारे में कि उसकी चिंता के लिए लोग इतनी प्रतिबध्दता से जुटे हैं।
लेकिन फिर मुझे परसाई जी की कही बात याद आती है -'आज जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है वही उसको नष्ट कर रहा है।'
मुझे लगता है कि क्या सही व्यंग्य के बारे में इतना चिंतित होने की जरूरत है? मुझे व्यंग्य की चिंता में डूबे लोग व्यंग्यकार देश की चिंता में डूबे हुए जनसेवक जैसे लगने लगते हैं। गनीमत यही है कि व्यंग्य चिंतक भले जैसे लोग हैं।
व्यंग्य के माध्यम से ख्याति पा चुके लोगों की अनेक चिंताओं में से एक प्रमुख चिंता यह रहती है कि नए लेखक लिखते/छपते/पहली किताब आते ही अपने को खलीफा समझने लगता है। यह चिंता एक बड़े बुजुर्ग की चिंता होती तो अलग बात है। अक्सर यह चिंता जिस अंदाज में होती है उसका टोन यह होता है कि नये लोग जिनको लिखना नहीं आता, पढ़ा नहीं है जिन्होने, जिनको व्यंग्य का ककहरा नहीं आता वे भी बस लिखना शुरू करते ही अपने को तीसमार खां समझने लगते हैं।
अलग-अलग तरह से बड़े लोग इस भाव को व्यक्त करते हैं। कोई बताता है कि व्यंग्य लिखना आसान नहीं है, कोई कहता है पैदा होते ही उड़ने लगे, कोई किसी और तरीके से।
वसीम बरेलवी का शेर याद आता है :
'नए जमाने की खुद मुखतारियों को कौन समझाए,
कहाँ से बच निकलना है, कहां जाना जरूरी है।'
जब भी किसी बड़े के मुंह इस तरह की सामान्यीकरण जैसी बातें सुनता हूँ तो मुझे अपने गुरु जी याद आते हैं। बात आज से 39 साल पहले की है। हम इंटर में पढ़ते थे। कक्षा 6 में एबीसीडी सीखे लोग सोचते थे इंटर में पास कैसे होंगे। हमारे गुरु जी ने हमसे दिसम्बर में कहा -'तुम लिख कर लाओ, हम चेक करेंगे। तुम सीख जाओगे।'
हम गए। गुरु जी जांचते। हमारी कमी बताते। हम फिर लिख कर ले जाते। गुरु जी फिर ठीक करते। कभी यह नहीं कहा कि तुम यह नही कर सकते। बल्कि हौसला बंधाते थे -'दुनिया में कोई ऐसा काम नहीं जिसे कोई दूसरा कर सकता है और तुम नहीं कर सकते हो। तुम कर सकते हो।'
गुरु जी की दो-तीन महीने की संगत का असर यह हुआ कि हम लोग जिनके पास होने के लाले पड़े थे उनमें से तीन लोगों के मेरिट में नाम आये। गुरु जी ने तीन महीने के समय में ही जो हौसला हम लोगों को दिया वह आज तक नहीं खत्म हुआ। कोई भी काम हो, लगता है कि हम भी इसे कर सकते हैं। कोई भी कर सकता है।
हम लोगों की अंग्रेजी वाकई बहुत माशाअल्लाह थी। स्पेलिंग मिस्टेक, ग्रामर चौपट, कुछ की राइटिंग भी दाएं-बाएं, लेकिन गुरुजी ने कभी यह नहीं कहा -'तुम लोग नाकारा हो। तुमसे नहीं होगा।' उन्होंने किसी बीते जमाने के छात्र से तुलना करके यह नहीं कहा -'उसके जैसा बनो।' जब बताया तो ऐसे कहा -'उसकी हालत तुमसे भी खराब थी। लेकिन उसने मेहनत की और टॉप किया और वह फलानी जगह। ' हमको लगता कि वह कर सकता है तो हम भी कर सकते हैं। किया भी।
गुरुजी के प्रोत्साहन का अंदाज मेरे दिमाग में इतना पुख़्तगी से जमा हुआ है कि आज जब किसी भी महान को अपने क्षेत्र के नए लोगों को खारिज करते देखता हूँ तो फौरन गुरुजी से तुलना करके उसको खारिज कर देता हूँ। जरूरी भी नहीं कि एक बड़ा लेखक , लेखन का अच्छा शिक्षक भी हो।
बात व्यंग्य की हो रही थी। इतवार को एक ऑनलाइन गोष्ठी में मैंने सुभाष जी से Subhash Chander सवाल पूछा -' आप तो अब बुजुर्ग पीढ़ी में शामिल हो गए। क्या जब आपने लिखना शुरू किया था तो आपके समय की बुजुर्ग पीढ़ी भी इसी तरह अपने समय के युवा/नवोदितों के 'अपने आप को तीसमारखां समझने' वाले रवैये से इसी तरह आक्रांत रहती थी कि बात कोई भी हो लेकिन यह जरूर कहे कि आजकल के नए लेखक शुरुआत से ही खुद को बड़ा , खलीफा मानने लगे हैं?'
सुभाष जी ने ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिया। यह जरूर बताया कि व्यक्तिगत बातचीत में त्यागी जी जैसे लोग लेखकों का ग्रेड बताते थे -' अलां बी ग्रेड का है, फलाँ सी ग्रेड का।' सुभाष जी के अनुसार जिन लोगों को त्यागी ने उस समय बी, सी ग्रेड का बताया था वे आज व्यंग्य के शिखर पर विराजमान हैं और नए लोगों का अपने-अपने हिसाब से ग्रेडिकरण कर रहे हैं। यह अलग बात है कि नए जमाने के लोग भी बिना त्यागी जी जैसी स्थिति तक पहुंचे ऐसे शिखर पुरुषों का भी ग्रेडिकरन करते रहते हैं और अपने-अपने हिसाब से उनको स्वीकार/खारिज करते रहते हैं।
कुछ साल पहले व्यंग्य के एक ग्रुप में एक महिला लेखिका के बारे किसी साथी का बयान था -'व्यंग्य लिखना तुम्हारे बस का नहीं। तुमको लिखना बन्द कर देना चाहिए।' आज वे महिला लेखिका , अच्छा-खराब , कैसा भी लिख रहीं हैं , लेकिन लगातार लिख रहीं हैं। उनके बारे में यह बात कहने वाले साथी अलबत्ता 'लेखन क्वाराइंटेंन' में चले गए हैं।
इतना सब लिखने के बाद मुझे यह याद ही नहीं रहा कि मैं कहना क्या चाहता था। हमारा हाल भी उन सिद्ध लेखकों सरीखा हो गया जो किसी युवा लेखक की किताब के विमोचन में, किसी के सम्मान समारोह में आधा से ज्यादा समय अपने संघर्षों के किस्से, अपने को समुचित महत्व न मिलने के रोने और अपनी पहली रचनाओं की प्रसिद्धि के किस्से सुनाने में जाया कर देते हैं। फिर अचानक याद आने पर लेखक को शुभकामनाएं देकर बैठ जाते हैं।
मैं शायद कहना यह चाहता था कि जब लोग अपनी विधाओं की नई पीढ़ी के लोगों को , शायद कुछ लोगों के व्यवहार के चलते, यह कहकर खारिज करते हैं कि आज लोग पहली किताब छपते ही खलीफा समझने लगते हैं तो उन तमाम लोगों को भी अपमान करते हैं जो तमाम किताबें छपने के बावजूद ' भूमि प्रणाम' की मुद्रा तक विनम्र हैं।
मेरी समझ में किसी भी समय में साहित्य की किसी भी विधा में बहुत अच्छा लिखने वाले लोग कम संख्या में ही होते हैं। खराब लिखने वाले बहुतायत में होते हैं। बेहतर हो कि हम समय के खराब लेखन का रोना रोने की बजाय , अच्छा क्या लिखा जा रहा है, कौन लिख रहा है उसकी बात करें। अच्छे लेखन की चर्चा करें। बढ़िया लिखाई को वायरल करें। इससे शायद वे लोग भी कुछ सीखें जो उतना अच्छा नहीं लिख पाते।
लेकिन यह भी बात सही है कि हर एक को अपनी नजर से दुनिया देखने का हक है। इसी के तहत बड़े-बुजुर्गों को यह पूरा हक है कि वे अपनी नई पीढ़ी को किस तरह देखते हैं। जो कुछ अच्छे लोग हैं उनकी उपस्थिति को मोहब्बत के साथ रेखांकित करते हुए अच्छा महसूस करते हैं या तमाम तथाकथित खराब लोगों से आक्रांत होते हैं। वैसे बुजुर्गियत के इम्तहान में पास होने के लिए अपने बाद के लोगों को नाकारा बताने पर अच्छे नम्बर मिलने का रिवाज बहुत पहले से है।
नए लोगों से, जिनमें मैं खुद अपने को भी शामिल करता हूँ, यही कहना है कि बुजुर्गों के कोसने को आशीर्वाद की तरह लेने का रिवाज रहा है अपने यहां। सबको अनदेखा करते हुए लिखना उससे ज्यादा पढ़ना और उससे भी ज्यादा देखना और महसूस करना जारी रखें। क्या पता कल को आप भी अपने से बाद वाली पीढ़ी के बारे में कुछ कहने के लिए माइक के सामने बुलाये जाएं।
आम तौर पर इस तरह की बातें लिखने के बाद मुझे अफसोस होता है कि बेफालतू में लिखा यह सब। लेकिन अब जो लिख गया तो उसको पोस्ट न करना भी ठीक नहीं इसलिए इसे पोस्ट कर रहा हूँ। इसके बाद अफसोस कर लेंगे।
अपनी बात का खात्मा अपनी ही कही-लिखी बात से:
"साहित्य जीवन की तरह ही है। यहां खूबसूरत , बेहद खूबसूरत फूल भी खिलते हैं तो कम खूबसूरत माने जाने वाले रंगबिरंगे फूल भी। अच्छा-खराब भी हमेशा सापेक्ष ही होता है। तथाकथित अच्छे लिखने वाले तथाकथित खराब लिखने वालों की खिल्ली उड़ाते हैं यह गली-मोहल्लो वाली छुटभैयों की गुंडई जैसी हरकत है। अनगिनत स्तर होते हैं समाज के। उसी के अनुरूप उस स्तर के लोगों की अभिव्यक्ति भी। जो किसी स्तर के लिए शानदार, जबरदस्त , जिंदाबाद हो सकता है वही दूसरों के कूड़ा, फालतू, बकवास हो सकता है।
साहित्य कोई बतासा नहीं है जो खराब लेखन (जिसे नवांकुरों द्वारा लिखा बताया गया) की बारिश मे घुल जायेगा। सबको खिलने, खुलने, पनपने का एकसमान हक़ है यहाँ।"

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Monday, May 25, 2020

शाहजहांपुर की सड़कों पर साइकिलबाजी

 

सफेद घोड़ा काला सवार और अन्य तमाम रचनाओं के लेखक, कहानीकार हृदयेश जी का घर।


सुबह साइकिल से निकले। लोग सड़क पर आ चुके थे। कुछ पार्क में जमे हुए थे। मिलिट्री कैंट से जवान घर जा रहे थे। गेट से बाहर निकलते ही आजाद अंदाज में हो गए। किसी दबी हुई स्प्रिंग से दबाव हटा लेने पर उछलती स्प्रिंग सरीखे लग रहे थे जवान।
अधिकतर लोग मास्क लगाए थे। जो लगाए नहीं थे , वो लटकाए थे। कुछ बाईक पर लोग हेलमेट भले न लगाए हों लेकिन मुस्कका जैसा मास्क जरूर लगाएं थे। मास्क के सेंसेक्स ने हेलमेट के सेंसेक्स को पछाड़ दिया था।
गोविंद गंज रेलवे क्रासिंग के पास एक नए मंदिर के पास कुछ बाबा टाइप लोग बैठे थे। सामने एक पक्का माँगने वाला बैठा था। सब लाकडाउन आसन में थे। कोई देने वाला नहीं, सब मांगने वाले।
क्रासिंग पार दुकानें बन्द थीं। कुछ लोग झाड़ू लगा रहे थे, कुछ लोग कूड़ा जला रहे थे। सड़क सबसे निर्लिप्त तसल्ली से लेटी थी।
कुछ हलवाईयों की दुकानें खुल गयी थीं। कुछ पर जलेबियां छन रहीं थीं। कुछ पर समोसे तले जा रहे थे। दूध वाले अपने पीपों को साइकिल पर लटकाए दूध दे रहे थे। सामाजिक दूरी की ऐसी-तैसी हो रही थी लेकिन इतनीं भी नहीं कि देखने में साफ-साफ असामाजिक लगे।
एक घर के बाहर एक बिस्कुट वाला अपनी साइकिल पर बिस्कुट का बक्सा लादे बिस्कुट बेंच रहा था। घर के बाहर महिला की थाली में गिनकर कुछ बिस्कुट रखे। बिस्कुट थाली पर पूजा के दिये जैसे लगे। हमने खड़े होकर उसको देखा तो बोला -'दस के चार हैं। चाहिये?' हमारी 'न' सुनकर उसने भड़ से सन्दूक बन्द किया और चल दिया।
एक खड़खड़े वाला कुछ गैस के सिलिंडर लादे गैस की डिलीवरी कर रहा था। बीच के सिलिंडर सर उठाये खड़े थे, किनारे वाले सिलिंडर सरेंडर मुद्रा में पस्त पड़े हुए थे।
मोड़ पर ठेलियों पर सब्ब्जी वाले सब्जी लगाए खड़े थे। खीरा, ककड़ी , खीरा बिना सामाजिक दूरी की परवाह किये , बिना मास्क लगाए एक के ऊपर एक पड़ी हुईं थीं। किसी को कोरोना की चिंता नहीं थी। शायद सब्जियों को कोरोना नहीं होता।
चौक के पास एक जगह तमाम मजदूर रोजी के इंतजार में खड़े थे। उनको ले जाने के लिए कोई मिला नहीं। पास खड़े हो गए तो कई लोग मेरे पास आ गए। बोले -'क्या काम है? कित्ते लोग चाहिए?'
हमने बताया कि मजदूर नहीं चाहिए। हम तो ऐसे ही निठल्ले टहल रहे थे। वे उदास हो गए। बातचीत हुई तो लोगों ने बताया -'कोरोना और लाकडाउन के कारण मजदूरों की रेढ़ लगी हुई है। सौ मजदूरों में से बमुश्किल दो को काम मिलता है। तीन सौ देने की बात कहकर ले जाते हैं , दो सौ देते हैं। मजदूरों की आफत है।'
पास ही दुकान खोले दो लोग बैठे थे। मजदूरों से बतियाते देखकर हमसे बोले -'दस मिनट में किसी से बातचीत करके समस्या समझना आसान नहीं।' बातचीत से अंदाजा लगा कि मजदूरों से चोट खाये होंगे। बोले -'इनको पैसा चाहिए, दारू चाहिए, सब करेंगे , लेकिन काम भी बिगाड़ देंगे।' आगे बात बढ़ाते हुए बताया -'काम न करो, कम करो , मंजूर है लेकिन काम बिगाड़ो तो न।'
शायद उन्होंने जिन लोगों को काम पर रखा होगा, उन्होंने उनका काम बिगाड़ दिया होगा।
उनकी बात सुनकर मुझे हार्वर्ड फ्रास्ट की 'आदि विद्रोही' में एक गुलाम सौदागर की अपने गुलामों के बारे में कही बात याद आई-'मैं अपने गुलामों से बहुत अच्छे से व्यवहार करता हूँ। क्योंकि मूड खराब होने पर आप गुलाम की जान ले सकते हो लेकिन गुलाम को काम बिगाड़ने से नहीं रोक सकते।'
साथ में बैठे सरदार जी के पुरखे पाकिस्तान से आये थे। आदमी की फितरत के बारे में बताते हुए जो कहा उन्होंने उसका लब्बोलुआब यह कि -'ईश्वर ने दो पैरों का जानवर बनाया। इस जानवर मंदिर-मस्जिद, गीता -कुरान सब बेंच दिए। गनीमत है कि ईश्वर दिखता नहीं वरना यह उसको भी बेंच देता।'
आगे सर्राफा दुकान की बन्द दुकानों के बाहर नाली के कीचड़ को छानकर लोग उससे सोना-चांदी पाने की कोशिश कर रहे थे। वे बड़ी तसल्ली से कीचड़ छान रहे थे। हमने उनसे फोटो लेने के बारे में पूछा तो उन्होंने मना कर दिया। हमने भी उनकी निजता की इज्जत करते हुए फोटो नहीं लिए।
सड़क किनारे एक कबाड़ी की दुकान में रद्दी की किताबें पड़ी हुई थीं। आटोमोबाइल इंजीनियरिंग की किताब औंधे मुंह पड़ी थीं। लाकडाउन में इंजीनियरों और इंजीनियरिंग कॉलेजों की वाट लगी हुई है। टीचर निकाले जा रहे। किसी के लिए कोई काम नहीं।
इस बीच नुक्कड़ पर एक पतंग आकर गिरी। एक बुजुर्गवार ने अपने साथ के बच्चे का हाथ छोड़कर पतंग लपकी। बचा हुआ मंझा चौआ करके हथेली में समेटकर पतंग कब्जे में कर ली। पतंग लपकने के लिए गली से भागते एक बच्चे ने अपने कदम वापस क्रीज पर खींच लिए। उदास सा वापस लौट लिया।
आगे गांधी लाइब्रेरी दिखी। उसके आगे हृदयेश जी का घर। लोगों ने बताया -'अब वहां कोई रहता नहीं।'घर के बाहर सामने की दीवार पर लिखा था -'देखो हरामी मूत रहा है।' लेकिन हमको कोई दिखा नहीं। लगता है सब लाकडाउन में फंसे हुए हैं।
खरामा-खरामा चलते हुए शहर पार करके लौट लिए। सड़कों पर दुकानें आबाद हो गई थीं। लोग खरीदारी के लिए उमड़ रहे थे।
सड़क किनारे एक गाड़ी से भूसा उतर रहा था। वहीं एक सुअर अपने बच्चों के साथ बिना सामाजिक दूरी की परवाह किये सटे-सटे चला जा रहा था। कोई उनको टोंकने वाला नहीं था। कोई नहीं टोंक रहा था तो हम ही क्यों टोंके। आजकल कोई किसी को किसी बात के लिए टोंकता नहीं। सब डरते हैं कि टोंकने पर कहीं अगला उसको ठोंक न दे।
चौराहे पर पुलिस तैनात थी। मास्क लगाए पुलिस वाले लोगों को साफ नहीं दिखते। जो दिखते भी वे मोबाइल में डूबे । मास्क और मोबाइल के गठबंधन ने पुलिस का डर कम कर दिया है। इसे जब- तब डंडे के बल पर पुलिस फिर से काबिज करती है।
चौराहे पर साबुन और पानी की व्यवस्था थी। पैर से दबाने पर साबुन जो निकलना शुरू हुआ तो फिर निकलता ही गया। लीवर छोड़ने पर भी निकलना बंद नहीं हुआ। हाथ से बन्द करना पड़ा। जिस मतलब से रखा गया था साबुन वह पूरा नहीं हुआ। ऐसे ही जुगाड़ जगह-जगह लगे हुए हैं। साबुन और पानी मिलकर सड़क गीला करते दिखे।
ईद के दिन होने के बावजूद सड़के आम दिनों की तरह ही सुनसान थीं। एक दुकानदार सेवई बेच रहा था। पुलिस के नौजवान आये। डंडा फटकार कर बोले -'दुकान खुलने का समय नौ बजे है। अब्बी बन्द करो।' दुकानदार ने चुपचाप सुन लिया। पुलिस वाले सुनाकर चले गए। दूकान बदस्तूर खुली रही।
पुल के पास एक नौजवान मास्क बेंच रहा था। दस रुपये का एक। सुनील नाम। बताया कि फोटोग्राफी का काम था। कोरोना के कारण बन्द हो गया। अब मास्क बेंचता है। दो -तीन घण्टे बेंचता है। तीन-चार सौ बच जाते हैं। मन किया कहें -'जिसका काम बंद हो गया हो, वो मास्क बेंचे।' लेकिन कहने की हिम्मत नहीं।
बाद में बात करते हुए पता चला कि सुनील को मुंह का कैंसर है। डॉक्टरों को दिखाया। लेकिन ऑपरेशन नहीं कराया। इलाज कराएंगे तो देखभाल कौन करेगा। जबकि उसके पास मुफ्त इलाज वाला आयुष्मान कार्ड है। फिलहाल आयुर्वेद से इलाज चल रहा है। दाना बढ़ा नहीं है।
लौटते हुए देखा फलों की दुकान सज गयीं थीं। एक तरबूज कैरियर पर रखवाया। लौट आए। अभी काटा तरबूज तो फीका निकल गया। एक बार फिर तय हुआ कि अपन को फल लाने की तमीज नहीं।

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