तिनकारा द्वीप पर टहलने के बाद हम लोग वापस स्टीमर पर पहुंचे। वहाँ से क़रीब 15 मिनट की दूरी पर उस जगह पहुँचे जहाँ हमको स्नार्कलिंग करनी थी।
स्नार्कलिंग के बारे में हमको बताया कि यह स्कूबा डाइविंग की तरह ही है। अन्तर यह कि स्कूबा डाइविंग गहराई में की जाती है जबकि स्नार्कलिंग कम गहरी सतह पर की जाती है। स्कूबा डाइविंग में पीठ पर आक्सीजन सिलिंडर भी होता है। साथ का गाइड आक्सीजन सिलिंडर के हैंडल को पकड़कर इधर-उधर, ऊपर-नीचे, दायें-बायें घुमाता रहता है। इस लिहाज से स्नार्कलिंग स्कूबा डाइव के मुकाबले ज्यादा आसान है। कम खतरनाक है।
स्नार्कलिंग के लिए पानी के नीचे जाने पर हमारे साथ दो गाइड भी थे। एक बार में दो लोगों को स्नॉर्कलिंग के लिए के जाता तय हुआ। पानी का चश्मा और स्नार्कलिंग उपकरण लगाकर दो लोगों को पानी के नीचे ले जाकर अंदर का नजारा दिखाकर वापस लाते गए। दो-दो करके लोग पानी के अंदर जाते गए, स्नार्कलिंग करके वापस आते गए।
हमारे साथ के लोग जब तक स्नार्कलिंग के लिए पानी के अंदर गए तब तक हम लोग लाइफ़ जैकेट पहनकर पानी की सतह पर तैरते रहे। हमको तैरना आता नहीं है। लेकिन लाइफ़ जैकेट पहनकर समुद्र के पानी में पीठ के बल लेटे रहे। जरा सा तिरछे होने पर अंदर जाने को होते तो हड़बड़ा जाते। हमारे साथ के लोग जो तैरना जानते हैं, हमको सीधा कर देते। हम फिर पीठ के बल समुद्र के पानी के बिस्तर में लेट जाते। आसमान देखते हुए पानी में तैरते रहे।
कुछ देर बाद हमने स्टीमर से लटकी सीढ़ी पकड़ ली। उसको एक हाथ से पकड़कर तसल्ली से पानी में लेटे रहे। इतना सुकून से पानी में इधर-उधर हिलते-डुलते हुए लेटे रहे कि तैरना न जानने का डर हवा हो गया। करीब पौन घंटा इसी तरह पानी में लेटे रहे जब तक अपनी स्नार्कलिंग का नम्बर नहीं आ गया।
स्नार्कलिंग का नम्बर आने पर हमने पानी वाला चश्मा चढ़ाया। स्नार्कलिंग का उपकरण मुँह में लगाया और गाइड के साथ पानी के अंदर चले गए। थोड़ा नीचे जाते ही अंदर पानी में रंग बिरंगी मछलियाँ, तरह-तरह की चट्टाने और ख़ूबसूरत नज़ारे दिखाने लगे। अंदर का नजारा देखते हुए दो दिन पहले के स्कूबा डाइविंग के नज़ारे याद आने लगे।
हम आराम से अंदर का नजारा देख रहे थे तब तक मेरी आँख में पानी आ गया। हमने ऊपर चलने का इशारा किया। हमारा गाइड हमको ऊपर ले आया। चश्मा ठीक करके , मुँह में आया नमकीन पानी समुद्र में थूककर वापस नीचे गए। थोड़ी देर अंदर मछलियाँ, शैवाल और तमाम ख़ूबसूरतियों का आंनद लेते रहे। कुछ देर में फिर से पानी मुँह और आँख में आ गया। हमने फिर से गाइड से ऊपर चलने का इशारा किया। गाइड हमको पानी के ऊपर ले आया।
ऊपर आकर हमने मुँह में आया पानी बाहर थूका। आँख के अंदर आया हुआ पानी चश्मा उतारकर साफ़ किया। गाइड ने फिर से नीचे चलने के लिए कहा। लेकिन हमने मना कर दिया। हमारा मन नहीं हुआ फिर से अंदर जाने का। अंदर जाने का मन न होने का एक कारण तो दो बार पानी आँख और मुँह में जाने के अलावा यह भी रहा कि अंदर कोई फ़ोटोग्राफ़ी का इंतज़ाम नहीं था यहाँ।
ऊपर आने के बाद हम वहीं पानी के बिस्तरे पर देर तक लेटे रहे। साथ के लोग पानी में डाइव करते रहे, पानी में तैरते रहे। काफ़ी देर तक पानी में रहने के बाद हम सभी लोगों के साथ ऊपर स्टीमर पर आ गए। यह हमारा स्नार्कलिंग का पहला अनुभव था।
ऊपर आकर हम लोगों ने साथ में लाया हुआ खाना खाया। रेस्टोरेंट से हम लोग तहरी बनवाकर लाए थे। पानी में भीगने के बाद, धूप में सूखते हुए तहरी बड़ी स्वादिष्ट लग रही थी। खाना खाते हुए मजे लेते हुए गाने सुनते रहे। खाना खाने के बाद हम लोग स्टीमर का लंगर उठाया गया। स्नार्कलिंग वाली जगह से करीब 15 मिनट की दूरी पर स्थित 'सैंड बैंक' की तरफ़ गए। यह वही जगह है जहाँ प्रधानमंत्री मोदी जी जनवरी महीने में कुर्सी डालकर बैठे थे। सैंड बैंक के किस्से अगली पोस्ट में।
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