आज इतवार है। रिटायर हुए डेढ़ साल होने के बावजूद इतवार से याराना बना हुआ है। इतवार आता है तो लगता है कोई जिगरी दोस्त आया है।
आज चाय पीते हुए फेसबुक पर कुछ पोस्ट देखे। अलग-अलग मिजाज के पोस्ट। राजनीतिक रुझान वाले लोगों के यहाँ लगातार फायरिंग होती रहती है। विपरीत टिप्पणी करने वाले की 'डिजिटल लिचिंग' हो जाती है। मिशनरी निंदक लोग मिशनरी खुन्दकियों में बदल गए हैं।
हास्य बोध कहीं गुम हो गया है लोगों का। लोग झल्ला जाते हैं 'हास्य बोध' के नाम पर। क्या कहीं इसकी रपट लिखाई जा सकती है?
आज पुरानी कुछ पुरानी पोस्ट्स देखी। उसमें से कुछ के वन लाइनर देखिए :
- अपनी खु्शी बचाये रखने के लिये हमें अपनी मूर्खतायें बनाये रखनी होंगी। मूर्खता खतम , खुशी खल्लास।
-दुनिया में मूर्ख नहीं होते तो दुनिया कित्ती तो विकसित और बदसूरत दिखती।
-समझदार लोग मूर्खों से जलते हैं इसीलिये हमेशा उनकी खिल्ली उड़ाते रहते हैं।
-दुनिया में कोई भी सुन्दर दिखेगा तो उसमें मूर्खता का कुछ न कुछ अंश जरूर होगा।
-सबेरे-सबेरे एक बेवकूफ़ी का स्टेटस लिख लेने से मन हल्का हो जाता है। लगता है मौलिकता बची हुई है।
बेवक़ूफ़ी से जुड़े इन वनलाइनर को पढ़कर अच्छा लगा। आपको भी अच्छा लगेगा। न लगे तो बताइयेगा। दूसरे वनलाइनर पोस्ट करेंगे।
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