Wednesday, November 12, 2025

लैगून बीच पर खरीदारी और सेल्फी



 लक्षद्वीप प्रवास के आख़िरी दिन हम फिर से लैगून बीच घूमने गए। हम मतलब मतलब मैं, अनन्य और सुमन गुप्ता जी। बलवंत गुप्ता जी होटल में ही रहे। बाक़ी लोगों के घर पहुँचने या रास्ते में होने के मेसेज आने शुरू हो चुके थे।

लैगून बीच करीब पाँच किलोमीटर दूर है होटल से। ऑटो से गए। शाम हो गई थी। सूरज भाई अपनी दुकान समेटने की तैयारी में लगे थे। हमको देखकर खुशी से लाल हो गए। हमने उनके कई फोटो खींचे। खूबसूरत लग रहे थे।
सबसे पहले अपन गिफ्ट वाली दुकान पर गए। एक दिन पहले हैट का आर्डर देकर आए थे। दुकान पहुंचे तो दुकान पर मौजूद जसमीरा ने बताया हैट आ गए हैं। हमने कुछ हैट लिए। कुछ माला और कान की बालियाँ भी। चलते समय दुकान में मौजूद लोगों के फोटो लिए।
हैट के साथ जसमीर का फ़ोटो लिया। दुकान में खड़े फोटो साफ़ नहीं आया तो दुकान के बाहर आकर उसने फ़ोटो खिंचाया। अच्छा आया फोटो। हैट के साथ अपना फ़ोटो देखकर जसमीरा खुश हो गई।
चलने के पहले कुछ और लोग याद आ गए। हमने कुछ सामान और ले लिया। दुकान वालों ने कुछ आइटम 'गिफ्ट' के लिए देने की पेशकश की। हमने मना करते हुए उसके पैसे दिए। गिफ्ट इसलिए भी मना किया क्योंकि उन लोगों ने बताया था कि पंद्रह लोगों की रोजी-रोटी चलती है दुकान के काम से। यहाँ भी बिक्री कम ही होती है। हज़ार -डेढ़ हज़ार की ख़रीद में भी सौ रुपए की गिफ्ट ले लें तो ठीक नहीं।
फिर उन लोगों कोई अचार देते हुए कहा -"ये ले जाइए। 'अच्चा' है। टेस्टी है।" हमने कहा -"मछली का तेल है। हम नहीं खाते। वापस कर दिया।" दुकान में मौजूद लोगों के V बनाते हुए फ़ोटो लेने के बाद फिर बीच पर टहलने लगे।
बीच पर ही I Love laigoon लिखा हुआ सेल्फी /फोटो प्वाइंट था। हमने वहाँ खड़े होकर कई फ़ोटो खिंचाए। कोई अच्छा नहीं आया। अच्छा नहीं आया मतलब हमारी टी शर्ट पर जो लिखा था -"झाड़े रहो कलट्टरगंज" उसका फ़ोटो साफ़ नहीं आ रहा था। चेहरा तो खैर जैसा है वैसा ही आयेगा। कैमरा कोई चेहरा थोड़ी बदल देगा। आख़िर में एक ठो सेल्फी लिए जिसमें "झाड़े रहो कलट्टरगंज" साफ़ आ रहा था। सेल्फी में शक्ल देखकर ऐसा लग रहा है कि कोई दुखी आत्मा है। लेकिन "झाड़े रहो कलट्टरगंज" चमक रहा है।
पास में ही एक पिता अपने बच्चे को बालू में खिला रहा था। नारियल के खोल के आधे टुकड़े में बालू भरकर खाली कर रहा था। पिता बार-बार नारियल का खोल बच्चे की तरफ़ फेंक रहा था। बच्चा उसमें बालू भरता ख़ाली करता जा रहा था। पिता फ़ोन पर बात करते हुए बच्चे को खिला रहा था। बच्चा प्यारा लग रहा था।
पास में ही कुछ बच्चे बालू में फुटबॉल खेल रहे थे। सारे बच्चे नंगे पांव थे। पेनाल्टी स्ट्रोक की तैयारी चल रही थी। गोलकीपर गोल पर चौकन्ना खड़ा हो गया। बच्चे ने भागते हुए किक लगाई । गेंद लुढ़कते हुए गोलकीपर तक पहुंची। उसने गोल बचा लिया। बच्चों ने ताली बजाते हुए उसका हौसला बढ़ाया। अब दूसरा बच्चा किक के लिए तैयार होने लगा।
बच्चों को फुटबॉल खेलते छोड़कर हम आगे बढ़े। कुछ दूरी पर एक आदमी बच्चों को कसरत करा रहा था। गोल घेरे में बच्चों को बैठाए हुए अलग -अलग आसन। उनके पास एक फुटबॉल रखी थी। बातचीत से पता चला वो बच्चों को फुटबॉल सिखाते हैं।
हमारे साथ की सुमन गुप्ता जी ने बच्चों को इकट्ठा करके हँसना सिखाया। सब बच्चे फुटबॉल सीखना छोड़कर 'हा, हा, हा ' करने लगे। कुछ देर तक बच्चों को सिखाने के बाद हम लौट पड़े। बच्चे फिर फुटबॉल खेलने लगे होंगे।
शाम हो गई थी। हमारे साथ के लोग वापस लौटने के लिए कहने लगे। हमने पैदल आने को कहते हुए उनको वापस भेज दिया। हमको आगाती के गली -मोहल्ले देखने थे।
साथियों को विदा करते हुए हम कुछ देर और घूमे। बीच पर ही एक पेड़ की जड़ें देखकर लगा जैसे बुढ़ापे में पेड़ के हाथ की नसें दिखने लगीं हों।
एक बार फिर सादिया दुकान पर चाय पी। उसके पापा , छोटी बहन के साथ उसकी फ़ोटो ली। पीछे के बल्ब के चलते फ़ोटो साफ़ नहीं आई थी। कुछ देर उनसे बात करके फिर वापस चल दिए। वीडियो के देखने के लिए पोस्ट का लिंक नीचे दिया है।
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